छात्रों में विफलता का भय पैदा करने के त्रासद नतीजे

परिवार और शिक्षकों का दबाव किसी को भी मानसिक रूप से विक्षिप्त बना सकता है

छात्रों में विफलता का भय पैदा करने के त्रासद नतीजे

जब खुदकुशी के मामले बढ़ रहे हैं, आईआईटी-जी और कोचिंग की राजधानी कोटा में ई-रेट मिल रहा है, तो समझ लें कि वह समय आन पहुंचा है, जब किशोरों के सुकुमार मानस पर अपनी आकांक्षाओं का बोझ लादने से पूर्व उन्हें उन उम्मीदों का पुनर्मूल्यांकन कर लेना चाहिए

देश में हर किसी ने फिल्म थ्री ईडियट्स देखी और उसकी तारीफ की है। उसकी चर्चा तो थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। यह फिल्म इंजीनियरिंग के छात्रों की जिंदगी को बड़ी साफगोई से दिखलाती है। इसमें उनकी कामयाबी दिखती है और उनकी विफलता भी। साथ ही इन दोनों हालात के बीच की हर चीज नजर आती है।  फिल्म के दौरान उनके परिजन और मित्र  दोनों ही हंस हैं और रो भी देते हैं, लेकिन भले ही वे इसे कितनी ही बार देखें, वे इस फिल्म के मूल संदेश को नहीं समझ पाते। वह संदेश यह है कि परिवार और शिक्षकों का दबाव किसी को भी मानसिक रूप से विक्षिप्त बना सकता है। 

आईआईटी कोचिंग की राजधानी कोटा में जब खुदकुशी के मामले बढ़ रहे हैं, तो समझ लें कि वह समय आन पहुंचा है, जब किशोरों के सुकुमार मानस पर अपनी आकांक्षाओं का बोझ लादने से पूर्व उन्हें उन उम्मीदों का पुनर्मूल्यांकन कर लेना चाहिए। सोलह वर्ष की नाजुक उम्र में, जब मनुष्य स्वयं को समझना शुरू ही करता है, तो वे अपने चतुर्दिक अनेक मामले देखने लगते हैं-(पारिवारिक और रूमानी मित्रता), आत्मसम्मान, जो इस उम्र में निम्नतम स्तर पर होता है, दूसरों की धौंसपट्टी और शैक्षणिक दबाव। 

कुछ अभिभावक इन चीजों की अनदेखी करते हैं और समझते हैं कि उनका बच्चा बेहतर ग्रेड लाने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहा। वे अपने बच्चे को कोचिंग सेंटर में भेज देते हैं और उनसे बेहतरीन नतीजों की उम्मीद लगा लेते हैं। वे समझ बैठते हैं कि अगर यह रास्ता अख्तियार कर लिया गया, तो वे बाकी उम्र भर के लिए पूरी तरह आरामदेह स्थिति में आ जाएंगे। कोचिंग सेंटर छात्रों के मन में विफलता का आतंक पैदा कर देते हैं। कोटा आने वाले अधिकतर छात्र अपने घरों से दूर रह रहे होते हैं। अत: शिक्षकों का फर्ज है कि वे उनका माता-पिता की तरह मार्गदर्शन करें। उन्हें छात्रों पर पड़ रहे दबाव को समझना चाहिए। प्रबंधन और शिक्षकों को न केवल छात्रों, बल्कि अभिभावकों के साथ भी नियमित रूप से परामर्श बैठकें आयोजित करनी चाहिए। साथ ही मानसिक स्वास्थ्य के प्रति उनकी सजगता की भी अभिवृद्धि करनी चाहिए। ये सुविधाएं अनिवार्य होनी चाहिए। क्योंकि ये संस्थान उनसे भारी धन वसूल करते हैं। कोचिंग संस्थानों में ज्यादा से ज्यादा छात्रों को आईआईटी और अन्य इंजीनियरिंग कालेजों में दाखिला दिलाने की होड़ रहती है। वे अपनी प्रसिद्धि में इजाफे के खेल में छात्रों का इस्तेमाल शतरंज के प्यादों की तरह करते हैं। वे नहीं समझते कि छात्रों पर बेहतर प्रदर्शन के लिए दबाव डालना कितना नुकसानदेह हो सकता है। शिक्षकों द्वारा फूहड़ भाषा के प्रयोग और छात्रों के बीच प्रतियोगिता और एक-दूसरे से तुलना विद्यार्थियों को मानसिक विकृति का शिकार बना देती है। इन विकृतियों में चिंता, अवसाद और अनिद्रा शामिल हैं। इस कारण छात्र एक-दूसरे से न मित्रता कर पाते हैं, न अच्छे सम्बंध बना पाते हैं। क्योंकि वे सहपाठियों को प्रतिद्वंद्वितापूर्ण नजरों से देखते हैं। इससे वे एकाकीपन के शिकार हो जाते हैं। 

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इसके अतिरिक्त कॅरियर काउंसलिंग भी की जानी चाहिए। इसका मतलब ये कि उन्हें केवल अपने उस कॅरियर की सीमाओं में ही बंध कर न रहने का मशविरा दिया जाना चाहिए, जिसमें उन्हें डाला जा रहा है। हर कोई इंजीनियर बनने के लिए पैदा नहीं होता। अत: यह शिक्षकों का उत्तरदायित्व है कि वे हर छात्र की अभिरुचियों को समझें और उसे उसी के अनुरूप दिशानिर्देश दें। क्योंकि ग्रेड तो दिखायी पड़ते हैं, लेकिन मन में क्या चल रहा है, यह समझ में नहीं आता। अत: मन की हलचलों की अनदेखी कर देना आसान लगता है। जबकि यह नासमझी जीवन भर के लिए उनका इतना नुकसान पहुंचा देती है, जितना परीक्षा में प्राप्त नम्बर नहीं पहुंचा सकते।  अत: छात्रों पर नजर रखना और उनसे बेहतर प्रदर्शन के लिए परिवार द्वारा डाले जा रहे दबाव की जानकारी लेते रहना आवश्यक है। छात्रों द्वारा अपने आप को नुकसान पहुंचा लेने की दर बढ़ती जा रही है। कोचिंग सेंटरों के लिए इससे सीख लेना आवश्यक है। उनके मन में विफल होने का जो डर बैठा दिया जाता है, वह जीवन भर बना रहता है। भले ही वे परीक्षा में पास हो जाएं और बेहतरीन इंजीनियरिंग कॉलेज में उनका नामांकन भी हो जाए, फिर भी अपने प्रति असंतोष जीवन भर बना ही रहता है। कोचिंग संस्थान बदनामी अपने सिर लेना नहीं चाहते और शैक्षणिक दबाव का दोषारोपण माता-पिता पर किया जाता है। जबकि छात्र अपने अधिकतर समय इन संस्थानों में ही गुजारते हैं। इसलिए वहां होने वाली बुरी बातों की जिम्मेदारी उन्हें लेनी चाहिए। शिक्षक एवं प्रबंधन का फर्ज है कि वे संस्थान को छात्रों के लिए पूरी तरह महफूज बनाएं। ऐसा नहीं करके शिक्षण संस्थान हमारे युवाओं के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में विफल हो रहे हैं। छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी  से इनके प्रति जो दुर्व्यवहार होता है, उसे अंगीकार करना आवश्यक है। अत: इस हालात में परिवर्तन के लिए आवश्यक कदम उठाना अब अनिवार्य हो गया है।

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