तात्या टोपे ने अंग्रेजों के खिलाफ 5 हजार सैनिकों के साथ बनास नदी पर डाला डेरा

क्रांति की बरखा अलग ही महकार दे रही थी

तात्या टोपे ने अंग्रेजों के खिलाफ 5 हजार सैनिकों के साथ बनास नदी पर डाला डेरा

आजादी के दीवानों ने अपने बदन की मिट्टी को अपने लहू में भिगोकर मातृभूमि के आंगन को लीपने की ठान रखी थी।

वह आजादी की रुत के अनूठे दिन थे और देश के साथ राजस्थान में भी क्रांति की बरखा अलग ही महकार दे रही थी। आजादी के दीवानों ने अपने बदन की मिट्टी को अपने लहू में भिगोकर मातृभूमि के आंगन को लीपने की ठान रखी थी। कम लोगों को मालूम है कि बेमिसाल क्रांतिकारी तात्या टोपे मध्य प्रदेश में अंग्रेजों के बाद राजस्थान आए थे। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ 5000 सैनिकों के साथ बनास नदी पर डेरा डाला, लेकिन मेवाड़ की सेना ने अंग्रेजों का साथ दिया। यह फरवरी 1858 की बात है। तात्या इससे भी नहीं हारे और उन्होंने विद्रोह की ज्वाला ऐसी जलाई कि टोंक पर नवाब का शासन खत्म कर बागियों ने नागरिकों की विजय का डंका बजा दिया।

1857 के विद्रोह को अंग्रेजों ने कुचल दिया था, फिर भी तात्या जंगलों में गुरिल्ला सेनानी के रूप में प्रतिरोध की ज्वाला जलाए रहे। वह मेवाड़, मारवाड़, झालावाड़, कोटा, जयपुर सहित विभिन्न राजस्थानी रियासतों की सेनाओं को विद्रोह करने के लिए प्रेरित करते रहे। वह जब बनास नदी पर अपनी तोपों को तैनात कर रहे थे तो मेवाड़ ने अंग्रेजी सेना के प्रमुख जॉन मिशेल का साथ दिया और तात्या को भागना पड़ा, लेकिन विद्रोह को दबा देने के बाद अंग्रेजों का असली रंग सामने आया और मेवाड़ के महाराणा उस समय स्तब्ध रह गए, जब उन्हें पुरस्कार में मिला निंबाहेड़ा टोंक के नवाब को सौंप दिया।

इतिहासकार बताते हैं कि तात्या 1859 तक जयपुर पहुंचे, लेकिन यहां भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। इससे पहले तात्या ने अपने सैनिकों के साथ 11 दिसंबर 1857 को बांसवाड़ा को जा घेरा था और उस पर अधिकार कर लिया था। महारावल राजधानी छोड़कर जंगलों में भाग गया। प्रदेश के सरदारों ने तो विद्रोहियों का साथ दिया, लेकिन अंग्रेज इन क्रांतिकारियों को ज्वार को थामने में सफल रहे। विद्रोहियों ने अपने बलिदान के उद्दश्यों और अपने रक्त की बूंदों की बौछार के साथ स्वतंत्रता के सावन को करीब ला दिया।

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राजस्थान की धरती आजादी के दीवानों की गाथा गा रहा है। स्वतंत्रता की लहर का आंचल थामकर अपनी एक-एक सांस होम देने वाले इन रणबांकुरों की कहानियां इतनी अनूठी हैं कि इनके बिना आजादी का हर इतिहास बेमानी है।

तात्या टोपे (तांतिया टोपे भी लिखा जाता है।) अंग्रेजों ने उन्हें एमपी के शिवपुरी में फांसी का तख्ता बना कर सार्वजनिक मृत्यु दण्ड दिया था। उनका मूल नाम रामचन्द्र पाण्डुरंग यवलकार था। वे नासिक के येवला में उत्पन्न हुए थे। वह झांसी की रानी लक्ष्मी बाई के सिपहसालार थे।

टोंक के नवाब की सेना में बगावत नवाब किले में छुप गया
यह जानना दिलचस्प है कि टोंक का नवाब खां अंग्रेजों के साथ था, लेकिन उसकी सेना के विद्रोही बड़ी तादाद में तात्या से जा मिले थे। यहां तक मीर आलम खां ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। भांजे नवाब के हिमायती सैनिकों ने मीर आलम खां को घर में ही घेर का मार डाला। उसकी जागीर जब्त कर ली, लेकिन 600 विद्रोही सैनिक दिल्ली पहुंचने में सफल रहे। जयपुर से निराश तात्या को टोंक में कुछ कामयाबी तब मिली जब वे बंदा के नवाब के साथ टोंक पहुंचे और एक जागीरदार नासिर खां ने टोपे का साथ दिया। नवाब के विद्रोहियों ने तात्या के साथ मिलकर नवाब की सेना से मुठभेड़ की। भयभीत नवाब किले में छुपा रहा। उन्होंने तोपखाने पर अधिकार कर लिया और जेल से कैदियों को मुक्त कर दिया। विद्रोहियों ने टोंक पर अधिकार कर लिया और नवाब के खजानों को लूट लिया। इससे दिल्ली थर्रा उठी और मेजर ईडन बड़ी सेना लेकर टोंक के लिए रवाना हुआ। विद्रोही अब नाथद्वारा की ओर कूच कर गए।

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