अमेरिकी मिड-टर्म पोल: नतीजों में छिपे कई संदेश

कोई भी शासन-व्यवस्था हो, जनता ‘अतिवाद’ को ज्यादा दिनों तक तवज्जो नहीं देती

अमेरिकी मिड-टर्म पोल: नतीजों में छिपे कई संदेश

साल 1994 में तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्ल्टिंन और 2010 में बराक ओबामा को भी अपने शासन के पहली टर्म में हुए मध्यावधि चुनावों में उनके दलों को काफी जमीन खोनी पड़ी थी।

संयुक्त राज्य अमेरिका में पिछले मंगलवार को सम्पन्न हुए मध्यावधि चुनावों के नतीजों ने पूरे विश्व को लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में छिपे कई मौन और महत्वपूर्ण संदेश दिए हैं। इनमें सबसे अहम तो यह है कि कोई भी शासन-व्यवस्था हो, जनता ‘अतिवाद’ को ज्यादा दिनों तक तवज्जो नहीं देती। बल्कि वह मौजूदा शासन के समयानुकूल लिए जाने वाले जनहित कार्यों और फैसलों का आंकलन करते हुए ही चुनावों में अपना जनादेश देती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो यह है कि चुनावों से पूर्व विभिन्न सर्वेक्षणों और विश्लेषकों का अनुमान था कि मिड-टर्म पोल में रिपब्लिकन पार्टी की ‘लाल-लहर’ चलेगी। इस दावे के पीछे यह तर्क दिए जा रहे थे कि इन दो सालों में राष्ट्रपति जो बाइडन की लोकप्रियता में पहले के मुकाबले काफी गिरावट आई है। देश आर्थिक मंदी, बेरोजगारी और महंगाई के दौर से घिरा रहा। यहां बता दें कि साल 1994 में तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्ल्टिंन और 2010 में बराक ओबामा को भी अपने शासन के पहली टर्म में हुए मध्यावधि चुनावों में उनके दलों को काफी जमीन खोनी पड़ी थी।

इस बार के चुनावों की दूसरी बड़ी खासियत यह रही कि बिना कोई हिंसक घटना के शांतिपूर्ण सम्पन्न हुए। सीनेट हो या हाउस आॅफ रिप्रजेंटेटिव्ज या गवर्नर पद पर हारे हुए सभी प्रत्याशियों ने इसे सहज भाव से स्वीकार किया और विजयी प्रत्याशियों को शुभकामनाएं दीं, जो एक अच्छे लोकतांत्रिक माहौल को दर्शाता है। तीसरी सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इन चुनावों में महिला का उसके अपने शरीर के अधिकार को आम मतदाता ने ज्यादा महत्व दिया। भले ही अदालत के एक फैसले ने गर्भपात के खिलाफ  फैसला सुनाया हो। गर्भपात निरोधी कानून लागू करने वाले कई रिपब्लिकन समर्थक राज्यों की महिलाओं और युवाओं ने डेमोक्रेट पार्टी को समर्थन दिया। चौथी खासियत, देश में बह रही सत्ता विरोधी लहर के बावजूद बाइडन की सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी इन चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी को कड़ी टक्कर देने में कामयाब रही। इसका अंदाजा चुनावी नतीजों को देखकर लगाया जा सकता है। यानी जनता ने सत्तारूढ़ दल के साथ मजबूत विपक्ष को देखना पसंद किया। रविवार तक चुनाव परिणामों की ताजा स्थिति सीनेट में कुल सौ सीटों में से डेमोक्रेट्स की 50 और रिपब्लिकन ने 49 सीटें अब तक हांसिल की हैं। अभी भी एक परिणाम आना शेष है। यदि यह सीट भी डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में गई तो वह बहुमत में आ जाएगी।

वहीं हाउस ऑफ  रिप्रजेंटेटिव्ज में रिपब्लिकन का पलड़ा फिलहाल डेमोक्रेटे की तुलना में थोड़ा भारी जरूर नजर आ रहा, लेकिन ‘लाल की सुनामी’ आने की तमाम अटकलें गलत साबित हुईं। शुक्रवार तक घोषित परिणामों में कुल 435 स्थानों में से डेमोक्रेटिक पार्टी ने 203 और रिपब्लिकन ने 211 सीटों पर कब्जा किया। दोनों दल इस हाउस में 218 सीटें जीतकर अपना बहुमत लाने के प्रयास कर रहे हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी गर्भपात के अधिकारों, कोरोना महामारी पर नियंत्रण के बाद सामान्य हुए देश के हालात, महंगाई पर काबू पाने, गैस की कीमतों में कमी लाने, रोजगार अवसरों को बढ़ाने, नकदी हस्तांतरण, आधारभूत ढांचे में निवेश, छात्र ऋण से संबंधित लिए गए फैसलों के दम पर मतदाताओं पर प्रभावी छाप छोड़ी। इसके अलावा जनता ने बाइडन प्रशासन की ओर से जलवायु संकट में फिर से अमेरिकी भागीदारी, यूक्रेन-रूस युद्ध दौरान और नाटो संगठन के विस्तार के किए गए प्रयासों से अमेरिका को फिर से वैश्विक शक्ति के रूप में उभारने के प्रयासों के रूप में लिया है।

पांचवीं खासियत यह रही कि इन चुनावों में भारतवंशियों की विजय बढ़ते उनके राजनीतिक कद की ओर इशारा दे रही है। चुनावी परिणाम इस बात का भी संकेत दे रहे हैं कि अमेरिका की राजनीति में अब भारतवंशियों का दबदबा बढ़ने लगा है। इन चुनावों में बतौर डेमोक्रेट राजा कृष्णमूर्ति, रो खन्ना, प्रमिला जयपाल विजयी रहे। अरूणा मिलर मैरीलैंड में लैफ्टिनेंट गवर्नर का पद संभालने वाली पहली महिला भारतवंशी बनी। वहीं, रिपब्लिकन पार्टी की ओर से मिशिगन से कांग्रेस का चुनाव जीतने वाले श्री थानेदार रिपब्लिकन पार्टी के पहले भारतवंशी बने। यही नहीं, कैलिफोर्निया की प्रांतीय एसेंबली में जसमीत कौर बैंस, इलिनोइस में नबीला सईद चुनाव जीतीं। मेरीलैंड के इतिहास में पहली बार अश्वेत वेस मूर गवर्नर का चुनाव जीते। ऐसा भी नहीं है कि डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से दी गई कड़ी टक्कर से बाइडन की राह आसान हो गई हैं बल्कि उन्हें अपने शासन के अगले दो सालों में कई बाधाओं के दौर से गुजरना पड़ सकता है। विधायिका और कार्यपालिका के बीच कांग्रेस और व्हाइट हाउस के बीच छिड़ने वाली लड़ाई पर नियंत्रण पाना और इसे अपने फैसलों के अनुरूप रिपब्लिकन सदस्यों को साधना असंभव तो नहीं, लेकिन थोड़ा मुश्किल जरूर होगा। वहीं अगले राष्टÑपति चुनाव से पहले राज्यों में विश्वसनीय चुनाव प्रणाली के लिए अधिक निवेश भी जरूरी होगा। वहीं, रिपब्लिकन पार्टी के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अगले राष्ट्रपति चुनावों में प्रत्याशी बनने की दावेदारी को भी झटका लग सकता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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