जानें राज-काज में क्या है खास

जानें राज-काज में क्या है खास

सूबे की ब्यूरोक्रेसी की नजरें 31 जनवरी पर टिकी हैं। इस दिन ब्यूरोक्रेसी को नया मुखिया जो मिलेगा। ब्यूरोक्रेसी में चर्चा नए मुखिया को लेकर कम, लेकिन इस समय वाले मुखिया को लेकर ज्यादा है।

नजरें 31 की तरफ
सूबे की ब्यूरोक्रेसी की नजरें 31 जनवरी पर टिकी हैं। इस दिन ब्यूरोक्रेसी को नया मुखिया जो मिलेगा। ब्यूरोक्रेसी में चर्चा नए मुखिया को लेकर कम, लेकिन इस समय वाले मुखिया को लेकर ज्यादा है। हर कोई लंच केबिनों में बतियाता है कि पाली वाले आर्य साहब को जो भी नई जिम्मेदारी मिलेगी, उससे राज में रोल ज्यादा ही रहेगा। भाई साहब की फितरत भी भीड़भाड़ में रहने की है, जो राज भी उनकी इस वर्किंग स्टाइल को सतोलते हुए सीएमओ में ही ठिकाना देने का मानस बना चुका है। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि निरंजनजी को पब्लिक ग्रीवंस को सुनकर उनका निराकरण का जिम्मा मिलने के चांस कुछ ज्यादा ही है।


माथापच्ची सूची बनाने की
आजकल राज का काज करने वाले भाई लोग एक सूची बनाने में जुटे हैं। लेकिन सूची में तीन-चार से ज्यादा नाम नहीं जुड़ पा रहे। काज निपटाने वाले लंच क्लब में इस सूची पर रोज कवायद कर रहे हैं। सूची भी छोटे-मोटों की नहीं, बल्कि राज करने वाले बेदाग और साफ छवि वाले लोगों की है। केवल 30 लोगों की सूची में से दस को छांटना भी मुश्किल हो रहा है। अब तो वे दूसरे वर्गों की मदद भी ले रहे हैं। हर आने वालों से पूछ रहे हैं कि ऐसे दस मंत्रियों के नाम बताओ, जिनकी बेदाग और साफ छवि है।


वर्कर्स का दुखड़ा
इन दिनों दोनों तरफ वर्कर्स की कोई पूछ नहीं है। उनकी कोई सुनने वाला भी नहीं है, सो अपनी मन की बात चाय की दुकानों पर एक दूसरे को कह कर संतोष लेते हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के दफ्तर तो दु:खड़ा रोने का अंदाज ही कुछ अलग है। वर्कर बोलने लगे हैं कि राज में तो पूछ है नहीं, हमारे तो केवल पुण्यतिथि और जयंतियों के मौके पर फूल चढ़ाने तक सीमित कर दिया। गुजरे जमाने में सरकार के आने पर वर्कर्स का रैळा आता था, अब तो केवल फोटो खिंचवाने वाले चंद चेहरे ही नजर आते हैं। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में भगवा के ठिकाने में भी दास्तान कुछ इसी तरह की है।

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याद बीते दिनों की
आजकल खाकी वालों पर शनि की दशा कुछ ज्यादा ही है। शनि के दोष से कभी चौराहे पर तो कभी गली में पिट रहे हैं। और तो और चूड़ियों वाली तक हाथ पैर चला जाती है। बेचारे खाकी वाले भी क्या करे, उनको अपने ऊपर वालों पर भरोसा नहीं है, कब इंक्वायरी बिठा दे। सो पिटने में ही अपनी भलाई समझते हैं। करे भी तो क्या पुलिस का इकबाल जो खत्म हो गया। अब टाइगर और लॉयन तक दहाड़ मारना भूल गए। पीटर और गामाज के बारे में सोचना तो बेईमानी होगी। विक्टर की मजबूरी जगजाहिर है। उनके काम में खलल की किसी में दम नजर नहीं आ रहा। अब तो खाकी वाले भाई लोग ऊपर वालों से प्रार्थना कर रहे हैं कि कोई उनके बीते दिन लौटा दे ताकि खाकी का इकबाल कायम रहे।


चर्चा में सियासत
सियासत तो सियासत ही होती है, इसे किए बिना कई भाई लोगों की पार भी तो नहीं पड़ती है। कई नेता तो ऐसे हैं कि उनकी बिना किसी मुद्दे के भी सियासत करना उनकी मजबूरी बन जाती है। सियासत करने के मामले में भगवा वालों के साथ ही हाथ वाले भाई लोग भी कम नहीं हैं। सिर्फ वे मौका तलाशने में रात-दिन गुजार देते हैं। अब देखो ना मत्स्य क्षेत्र में एक घटना को लेकर इतनी सियासत हो गई कि नेताओं को खुद समझ नहीं आ रहा कि आखिर माजरा क्या है। वो तो भला हो खाकी वाली कप्तान का, जिसने अपना मुंह खोल दिया, जिससे कइयों के सपनों पर पानी फिर गया, वरना तैयारी तो सूबे को बंद कराने तक की थी। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में चटकारे लेकर बतियाते हैं कि बेचारे नेताओं का कोई कसूर नहीं है, ठाले बैठने पर पब्लिक उनको नेता भी तो नहीं मानती है।


एक जुमला यह भी
सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि कोरोना को लेकर है। यह जुमला हर गली-चौराहों पर पब्लिक की जुबान आ गया है। जुमला है कि कोरोना सूबे के राज के लिए लाइफ लाइन बन गया है। जब भी दिल्ली से जोधपुर वाले भाई साहब पर कोई प्रेशर आता है, कोरोना लाइफ लाइन बन कर आए बिना नहीं रहता।
 

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        एल. एल. शर्मा

(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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