<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/category-44" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Dainik Navajyoti Rising Rajasthan RSS Feed Generator</generator>
                <title>इंडिया गेट - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
                <link>https://dainiknavajyoti.com/category/44/rss</link>
                <description>इंडिया गेट RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>सतरंगी सियासत</title>
                                    <description><![CDATA[जम्मू-कश्मीर में नई उमर अब्दुल्ला सरकार ने कामकाज संभाल लिया। चुनाव परिणाम के बाद राजनीतिक उठापटक की संभावना थी। सो, उसका पहला संकेत आ गया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-93552"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/india-gate031.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>एक और परीक्षा..</strong><br />तो महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई। चुनाव आयोग ने इससे पहले हरियाणा एवं जम्मू-कश्मीर में चुनाव करवाए। जहां झारखंड में आदिवासियों के अधिकारों एवं संविधान समाप्त कर देने वाला नैरेटिव झीला पड़ता सा लग रहा। तो महाराष्ट्र में एक पूर्व विधायक की हत्या होने के बाद माहौल बदलने के आसार! मतलब अब तक जो मराठा आरक्षण आंदोलन का शोर था। शायद वह धीमा पड़ जाए। हां, इसके साथ ही दो लोकसभा उपचुनाव भी। जिसमें राहुल गांधी द्वारा छोड़ी गई वायनाड सीट भी। वहां से प्रियंका गांधी मैदान में। लेकिन अब बात पहले जैसी नहीं। क्योंकि माकपा पूरी ताकत से मुकाबला करेगी। क्योंकि साल 2026 में केरल में उसे कांग्रेस से लड़ता हुआ भी दिखाना होगा! लेकिन यहां लड़ाई में भाजपा भी होगी। और कोई बड़ी बात नहीं कि त्रिकोणिय संघर्ष में कोई बड़ा उलटफेर हो जाए!</p>
<p><strong>बीच में अमरीका...</strong><br />तो आखिरकार अमरीका, भारत और कनाडा के बीच तल्खी बढ़ाने में कामयाब रहा। जहां भारत, नई दिल्ली से कनाडाई राजनयिकों के निष्कासन पर मजबूर हुआ। तो उसके पहले कनाडा ने भारतीय राजनयिकों के खिलाफ विषवमन किया। असल में, कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रुडो जरुरत से ज्यादा भारत के खिलाफ आक्रामक हो रहे। लेकिन इसमें असली शह अमरीका की। उसी ने कनाडा की सरकार को भारत के खिलाफ उकसाया। जिससे ट्रुडो ने ऐसे बयान दिए कि हालात यहां तक पहुंच गए। हालांकि भारत ट्रुडो को ढीला करने में सफल रहा। लेकिन उन्हें भारत से ज्यादा अमरीका की मदद की दरकार। दोनों देश पड़ोसी भी। जबकि अमरीका भारत के खिलाफ वास्तव में ट्रुडो को उपयोग कर रहा। जो उन्हें शायद बाद में समझ आए। लेकिन फिलहाल तो वह अपनी धरती से अमरीकी हितों को संरक्षण दे रहे। क्योंकि मामला वोट बैंक का।</p>
<p><strong>गुंजाईश छोड़ी!</strong><br />जम्मू-कश्मीर में नई उमर अब्दुल्ला सरकार ने कामकाज संभाल लिया। चुनाव परिणाम के बाद राजनीतिक उठापटक की संभावना थी। सो, उसका पहला संकेत आ गया। कांग्रेस ने नेशनल कांफ्रेंस के साथ विधानसभा चुनाव तो गठजोड़ करके लड़ लिया। लेकिन कांग्रेस गठबंधन सरकार में शामिल नहीं हुई। कांग्रेस के सभी छह विधायक मुस्लिम समुदाय से। उसमें से एक जम्मू क्षेत्र से और बाकी घाटी से। अभी तो विधायक दल के नेता पर सहमति नहीं बन पाई। ऐसे में संभावना जताई जा रही। आज नहीं तो कल कहीं कांग्रेस विधायकों के एनसी में शामिल न हो जाएं। कांग्रेस हरियाणा की करारी हार से अभी तक उभर नहीं पा रही। सो, कहीं, महाराष्ट्र और झारखंड में भी कोई चूक न हो जाए। इसलिए अभी जम्मू-कश्मीर को छेड़ना ठीक नहीं समझा। हां, यह वह पहली सरकार। जो अनुच्छेद- 370 समाप्ति के बाद गठित हुई।</p>
<p><strong>झलक दिखेगी...</strong><br />इस साल आम चुनाव- 2024 हो जाने के बाद अक्टूबर में दो राज्यों की जनता ने अपनी राय व्यक्त कर दी। अब महाराष्ट्र और झारखंड की बारी। इसके साथ ही 15 राज्यों में 48 विधानसभा एवं दो लोकसभा सीटों पर भी उपचुनाव होने वाले। इसमें राजस्थान समेत उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार एवं आंध्रप्रदेश जैसे राज्य शामिल। सो, मानो एक सैंपल सर्वे भी राजनीतिक दलों के सामने वाला कि आम चुनाव के बाद देश की जनता अब क्या सोच रही? इसमें भाजपा एवं कांग्रेस की सबसे ज्यादा परीक्षा। क्योंकि लगभग सभी जगह इन दोनों ही दलों की साख दांव पर होगी। बाकी तो क्षेत्रीय दल। वैसे, कहीं भी उपचुनाव में माना जाता कि जनता उसी दल को वोट देती। जिसकी वर्तमान में सरकार। क्योंकि यह निरंतरता का भी प्रतीक। लेकिन यदि कहीं भी उलटफेर हुआ तो मानो खतरे की घंटी!</p>
<p><strong>मायने क्या होंगे?</strong><br />राजस्थान में सात विधानसभा सीटों पर भाजपा की भजनलाल सरकार की परीक्षा का समय आ गया। सवाल यह कि सफल रहे तो क्या होगा और हारे तो क्या समीकरण बनेंगे? हालांकि लोकसभा में आशानुरूपप रिणाम नहीं आए। उपचुनाव निपटने तक सरकार का लगभग एक साल भी पूरा हो जाएगा। सो, यह जनता की मुहर भी होगी कि भजनलाल सरकार ने प्रशासन कैसा चलाया। हां, इस दौरान पार्टी संगठन में तालमेल को लेकर कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया। फिर प्रदेश भाजपा में फिलहाल संगठन महामंत्री भी नहीं। उपचुनाव में जो प्रत्याशी तय किए गए। उनके नामों से ही लग रहा कि प्रदेश नेतृत्व की बात मानी गई। जो स्वाभाविक कि स्थानीय समीकरणें के लिहाज से दिए गए। हां, एक बात और। इन उपचुनावों के बहाने केवल सीएम एवं प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की ही राजनीतिक प्रतिष्ठा दांव पर? या कुछ और?</p>
<p><strong>घमासान तय!</strong><br />मानकर चलिए कि महाराष्ट्र में सत्ताधारी महायुति और विपक्षी एमवीए गठबंधनों के बीच भारी राजनीतिक घमासान होगा। हालांकि पूर्वानुमानों के मुताबिक न तो महायुति से अजित पवार बाहर हुए। और न ही अभी तक एमवीए से उद्धव ठाकरे की शिवसेना। हां, सीट बंटवारे में सिर फुटोवव्ल पूरी हो रही। इसके अलावा छोटे-छोटे दल भी जोर मार रहे। महायुति में राज ठाकरे की संभावनाएं। तो उधर, शेतकारी संगठनों से जुड़े दल। महाराष्ट्र के चुनाव देश की राजनीति के लिए बेहद अहम। क्योंकि मुंबई देश की आर्थिक राजधानी। और फिर इसके बाद कुछ ही समय में मुंबई महानगर पालिका के चुनाव भी होंगे ही। जिसमें उद्धव ठाकरे का सब कुछ दांव पर होगा। जहां अब वह पहले जैसी स्थिति में तो बिल्कुल भी नहीं होंगे। एक संभावना यह भी। चुनाव परिणाम के बाद महायुति और एमवीए में से कुछ दल इधर-उधर होंगे!</p>
<p><strong>-दिल्ली डेस्क</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-93552</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-93552</guid>
                <pubDate>Mon, 21 Oct 2024 12:04:30 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-01/india-gate031.jpg"                         length="170189"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सतरंगी सियासत</title>
                                    <description><![CDATA[पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनिया भले ही पिछले साल विधानसभा चुनाव में हार गए हों। लेकिन अब संगठन में उनका कद बढ़ना तय।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-93003"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-12/india-gate.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>कद बढ़ेगा...</strong><br />पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनिया भले ही पिछले साल विधानसभा चुनाव में हार गए हों। लेकिन अब संगठन में उनका कद बढ़ना तय। उन्होंने इसके लिए अपने को साबित कर दिया। वैसे वह प्रदेश में सीएम का चेहरा माने जा रहे थे। लेकिन हार के कारण वह संभावनाएं जाती रहीं। इधर, केन्द्रीय नेतृत्व ने उनके संगठन कौशल एवं व्यापक अनुभव को देखते हुए हरियाणा में प्रभारी बनाया। हालांकि लोकसभा चुनाव में यथोचित परिणाम नहीं रहा। लेकिन विधानसभा चुनाव में बाजी ही पलट गई। दिन रात दौड़ते रहे। ऑपरेशन हो जाने के बावजूद कर्मक्षेत्र में डटे रहे। सो, अब भाजपा का वह एक बड़ा जाट चेहरा। अब उन्हें केन्द्रीय संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिले। इसकी संभावना प्रबल। वहीं, यूपी जैसे राज्य में विधानसभा चुनाव के दौरान बड़ी भूमिका संभव। क्योंकि भाजपा के लिए यूपी में कील कांटे दुरूस्त करना जरूरी।</p>
<p><strong>खुल गई पोल</strong><br />हरियाणा में तमाम चुनावी सर्वेक्षण और एग्जिट पोल में कांग्रेस को जीतता हुआ दिखाया गया। लेकिन परिणाम इसके ठीक उलट रहे। असल में, राजनीतिक दलों के बीच यही नेरैटिव और परसेप्शन की लड़ाई। एक बात जरुर माननी होगी। नेरैटिव बनाने के मामले में कांग्रेस का ईको सिस्टम अभी जिंदा ही नहीं, कारगर भी। इसीलिए ओपिनियन मैकिंग में वह भाजपा से कहीं आगे। सो, चुनाव परिणाम से पहले सर्वे और एग्जिट पोल में भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले पीछे दिखाया गया। लेकिन परिणाम के दिन जनता का निर्णय अलग। हां, एक बात और। भारतीय मतदाता हमेशा से बहुत समझदार और दूरदर्शी। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के दौरान उसके मन की थाह लेना इतना आसान नहीं। हो भी क्यों? क्योंकि यह मामला सरकार चुने का। और दुकानदारी चला रहे लोगों के यह बात समझ नहीं आएगी! जिनकी साख गिरने में ही लोकतंत्र की भलाई।</p>
<p><strong>असर!</strong><br />हरियाणा एवं जम्मू-कश्मीर के चुनाव परिणाम का असर सबसे ज्यादा दो दलों पर। हालांकि क्षेत्रीय दल भी इसके प्रभाव से अछूते नहीं। लेकिन राष्ट्रीय परिदृश्य में तो सबसे ज्यादा प्रभावित केन्द्र में सत्ताधारी भाजपा एवं मुख्य विपक्षी कांग्रेस। असल में, आम चुनाव- 2024 के बाद यह पहली परीक्षा। जहां जनता ने एक बार फिर से पीएम मोदी पर विश्वास जताया। मानो कह रहे हों। लोकसभा चुनाव में 272 नहीं देकर गलती कर दी। वहीं, आम चुनाव में सीटें सौ के करीब हो जाने से आत्मविश्वास से लबरेज दिख रहे राहुल गांधी निराश। शायद अब उनकी आक्रामकता भी कम हो। हां, संघ की महत्ता भाजपा को अब समझ आ गई होगी। विपक्षी आइएनडीआइए गठबंधन में कांग्रेस का रूतबा कम ही नहीं होगा। बल्कि सहयोगी उसकी परेशानी बढ़ाएंगे। यह महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव में सीटों के बंटवारे में दिखेगा! इतना तय।</p>
<p><strong>बदलेगी तस्वीर</strong><br />जम्मू-कश्मीर की तस्वीर बदलेगी। क्योंकि वहां अब निर्वाचित सरकार सत्ता में होगी। जो जनता के प्रति जवाबदेह होगी। आम जनता भी अपने चुने हुए नुमाइंदों के पास जाकर अपने शिकवे शिकायत कर सकेगी। यानी प्रशासन पर जनप्रतिनिधियों का नियंत्रण होगा। जो अब तक उपराज्यपाल के जरिए बाबुओं के पास था। सीटों के संख्याबल को देखें। तो भविष्य में राजनीतिक उठापटक से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं, प्रदेश सरकार की केन्द्र पर निर्भरता पहले से ज्यादा रहेगी। सो, केन्द्र एवं राज्य सरकार में तालमेल सबसे जरुरी। भले ही उमर अब्दुल्ला कमान संभालेंगे। लेकिन काम करने की आजादी पहले जैसी बिल्कुल नहीं होगी। क्योंकि असली बॉस उपराज्यपाल ही होंगे। नई दिल्ली का नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण पूरा होगा। एक-एक पैसे का हिसाब भी देना होगा। और हां, पुलिस पर नियंत्रण भी केन्द्र का होगा। यानी राज्य सरकार कोई मनमानी नहीं कर सकती।</p>
<p><strong>समीकरण दर समीकरण...</strong><br />हरियाणा और जम्म-कश्मीर के चुनाव परिणाम से विपक्ष में हलचल। सबसे बुरी हालत कांग्रेस की। अब तो उसके साथी दल ही पीछे पड़ गए। इसमें नेशनल कांफ्रेंस, आम आदमी पार्टी, उद्धव ठाकरे की शिवसेना यूबीटी और समाजवादी पार्टी इसमें शामिल। सो, कांग्रेस मानो बैकफुट पर। अभी महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनाव होने बाकी। ऐसे में यह तय। कांग्रेस से सहयोगी दल सीट बंटवारे में ज्यादा मोल भाव करेंगे। जब तक अगले साल फरवरी में राजधानी दिल्ली के विधानसभा चुनाव निपटेंगे। तब तक बिहार का माहौल बनने लगेगा। जहां कांग्रेस का गठजोड़ राजद से। पिछली बार कांग्रेस को गठबंधन में 70 सीटें मिलीं थी। जो इस बार संभव नहीं। फिर सीएम नीतीश कुमार की यह अंतिम पारी जैसी। भाजपा अपना मौका देख रही। तो लालूजी अपने बेटे तेजस्वी यादव के लिए क्यों न देखें? सो, समीकरण दर समीकरण बदल रहे।</p>
<p><strong>भारत की ताकिद</strong><br />बांग्लादेश में हालात जस के तस। खासकर अल्पसंख्यक हिन्दुओं एवं उनके पूजा स्थालों पर हमले हो रहे। लेकिन अमरीका और यूएनओ चुप्पी साधे हुए। लोकतंत्र और मानवाधिकारों के नाम पर कई देशों एवं सरकारों को बदनाम करने वाली ताकतों को बांगलादेश में सब कुछ ठीकठाक लग रहा। लेकिन भारत उम्मीद से ज्यादा सक्रियता दिखा रहा। बांग्लादेश की कार्यवाहक सरकार को भारत द्वारा ताकिद किया जा रहा। अल्पसंख्यकों की सुरक्षा चाक चौबंद रखें। भारत एक साथ कई को संकेत और संदेश दे रहा। बीते कुछ समय से बांग्लादेश की कार्यवाहक सरकार का टोन डाउन जरुर हुआ। लेकिन जमीन पर असर दिख नहीं रहा। असामाजिक तत्व अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे। ऐसे में, एक संभावना यह बन रही। अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव के बाद वैश्विक हालात बदलेंगे! फिर दक्षिण एशिया क्षेत्र में भारत का प्रभाव और बढ़ने की भी उम्मीद।</p>
<p><strong>-दिल्ली डेस्क</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-93003</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-93003</guid>
                <pubDate>Mon, 14 Oct 2024 11:52:40 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2023-12/india-gate.jpg"                         length="178465"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सतरंगी सियासत</title>
                                    <description><![CDATA[ आतिशी मर्लोना राजधानी दिल्ली की सीएम हो गईं। लेकिन आखिर आतिशी ही क्यों? कोई और नेता क्यों नहीं? वैसे अतिशी कोई जन नेता नहीं। पार्टी कैडर में भी उनका प्रभाव नहीं। संगठन में भी कभी उतनी सक्रिय नहीं रहीं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-92477"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-12/india-gate03.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>यहां पहुंच गए!</strong><br />आतिशी मर्लोना राजधानी दिल्ली की सीएम हो गईं। लेकिन आखिर आतिशी ही क्यों? कोई और नेता क्यों नहीं? वैसे अतिशी कोई जन नेता नहीं। पार्टी कैडर में भी उनका प्रभाव नहीं। संगठन में भी कभी उतनी सक्रिय नहीं रहीं। वह आंदोलन से निकली हुई नेता भी नहीं। बस कभी डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया की सलाहकार हुआ करती थीं। लेकिन राजनीति में कम समय समय में लंबी छलांग लगाने में सफल रहीं। अब तो उनके बॉस रहे सिसोदिया से भी वह डेकोरम में सीनियर हो गईं। हां, आजकल आम आदमी पार्टी में वह नेता भी बहुत कम बचे। जो अन्ना आंदोलन के समय केजरीवाल के इंडिया अगेन्स्ट करप्शन में जुडे थे। बल्कि समय के साथ एक-एक करके किनारे होते चले गए। या ठिकाने लगा दिया गया। सो, अब सरकार में भी वही हाल। कहां से चले थे और कहां पहुंच गए?</p>
<p><strong>मतदाता का संदेश</strong><br />तो यह बिल्कुल साफ। जम्मू-कश्मीर की अवाम क्या चाहती। भारी मतदान करके कश्मीर की जनता ने बता दिया। उसे न अलगाववाद पंसद और न ही आतंक। उसे अपनी भावी पीढ़ी के लिए शांति, शिक्षा एवं कानून व्यवस्था चाहिए। दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधि भी चुनावी प्रक्रिया को देखने पहुंचे। किसी ने भी गड़बड़ी की आशंका तक नहीं जताई। अब वह नरैटिव भी हवा होे गया। जो दशकों से बनाया जा रहा था। यानी राज्य में लोकतंत्र की बहार। अब सवाल उनका। जो इतने दशकों से कश्मीर के नाम पर दुकानें चला रहे थे। अब उनकी जगह कहां होगी? यह सब चुनावी परिणाम तय करेंगे। राज्य में नया नेतृत्व सामने आने की संभावना। आम जनता जड़ता एवं यथास्थितिवाद से बाहर आना चाहती। वैसे भी सोशल मीडिया के जमाने में भारत का बुरा चाहने वाले कब तक झूठ का नेरैटिव चलाएंगे?</p>
<p><strong>कांग्रेस सरकारें...</strong><br />कांग्रेस की इस समय तीन राज्यों में सरकारें। कर्नाटक, तेलंगाना एवं हिमाचल प्रदेश इसमें शामिल। लेकिन इन दिनों तीनों ही सरकारों पर संकट के बादल। कर्नाटक के सीएम सिद्धसमैया एक जमीन घोटाले में फंसे हुए। मामला कोर्ट में। सो, इस्तीफा देने की नौबत संभव। वहीं, तेलंगाना के सीएम रेवन्त रेड्डी पड़ोसी राज्य में हुए तिरूपति मंदिर लड्डू विवाद में कुछ बोल नहीं पा रहे। क्योंकि तेलंगाना कभी आंध्रप्रदेश का ही हिस्सा था। सो, यहां उस विवाद का असर न हो। यह संभव नहीं। पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में स्ट्रीट वेंडर पॉलिसी और दुकानों पर नेम प्लेट लगाने वाला नियम चर्चा का विषय बना हुआ। जो यूपी के सीएम योगी की तर्ज पर। इससे कांग्रेस आलाकमान असहज। वहीं, प्रदेश के चर्चित मंत्री विक्रमादित्य सिंह लगातार पार्टी को परेशानी में डाल रहे। क्या कांग्रेस इतनी बुरी स्थिति के बावजूद संभल नहीं रही?</p>
<p><strong>बदलेगा माहौल!</strong><br />तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने अपने बेटे उदयनिधि मारन को डिप्टी सीएम बना ही दिया। हालांकि गठबंधन के कुछ सहयोगियों के विरोध के चलते इसमें थोड़ी देरी हुई। लेकिन पीढ़गत बदलाव हो गया। लेकिन ऐसी चर्चा। करूणानिधि का परिवार इससे खुश नहीं। खासकर सांसद कणिमोझी असहज। उधर, एआईएडीएमके के एके पलानीस्वामी भाजपा से दूरी बनाए हुए। तो पूर्व सीएम ओपीएस की भाजपा से नजदीकियां। शशिकला राजनीतिक बियांबान में। तो मुख्य प्रतिद्वंदी डीएमके एवं एआईएडीएमके ही। तमिलनाडु की राजनीति में इन दोनों दलों के पास करीब 50 फीसदी वोट बैंक। हां, केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा 2026 में किसके साथ गठजोड़ करेगी। यह देखने वाली बात। क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में उसने वोट पाने के मामले में दहाई का आंकड़ा पार कर लिया। और यदि इसमें बढ़ोतरी हुई। तो भाजपा महत्वपूर्ण किरदार होगी। मतलब, तमिलनाडु में राजनीतिक माहौल बदलाव की ओर!</p>
<p><strong>हिसाब बराबर!</strong><br />मानो जैसे अजय माकन ने भूपिन्दर सिंह हुड्डा से पुराना हिसाब बराबर कर लिया हो। साथ में राहुल गांधी के सामने अपने नंबर भी बढ़वा लिए। असल में, हरियाणा के पीसीसी चीफ रहे अशोक तंवर की घर वापसी माकन की ही रणनीति। किसी को कानो कान भनक तक नहीं लगने दी। तंवर वैसे माकन के रिश्तेदार भी। लेकिन राजनीति में रिश्तेदारी अपनी जगह और राजनीति की अपनी चाल। फिर तंवर का हरियाणा की कांग्रेस राजनीति में हुड्डा से 36 का आंकड़ा रहा। इसीलिए उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी थी। लेकिन माकन ने मौके पर चौका मार दिया। याद रहे, माकन कभी केवल एक वोट से हरियाणा से राज्यसभा नहीं पहुंच सके थे। तब सात विधायकों के वोट स्याही के चक्कर में खारिज कर दिए गए। इसमें हुड्डा की भूमिका बताई गई। इसीलिए उस समय का हिसाब अब माकन ने बराबर किया!</p>
<p><strong>किस करवट?</strong><br />हरियाणा में तमाम चुनावी सर्वे शुरू से ही माहौल कांग्रेस में पक्ष में बताते रहे। अब तो एग्जिट पोल भी सामने। हालांकि अंतिम परिणाम मंगलवार को आएगा। तब तक जो भी आशार्थी। उनके मन में लड्डू फूटना स्वाभाविक। इसीलिए सीएम पद को लेकर कांग्रेस में अच्छा खासा बखेड़ा चल रहा। इसमें पूर्व सीएम भूपिन्दर सिंह हुड्डा से लेकर सांसद कुमारी शैलजा और रणदीप सिंह सुरजेवाला भी शामिल। हालांकि सांसदों को चुनाव नहीं लड़वाया गया। उसके बावजूद दावेदारी ठोंकने में कोई पीछे नहीं। हुड्डा साहब की मानो यह अंतिम पारी। सो, देखना यह होगा कि उंट किस करवट बैठेगा? हां, भाजपा में भी एंटी इंकम्बेंसी का डर शुरू से रहा। आखिर उसके शासन को दस साल हो गए। वैसे, क्षेत्रीय एवं छोटे दल भी अपनी मौजूदगी दर्ज करवाने के लिए पूरी जोर आजमाइश करते रहे। कितना सफल होंगे। यह परिणाम बताएगा।</p>
<p><strong>दिल्ली डेस्क</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-92477</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-92477</guid>
                <pubDate>Mon, 07 Oct 2024 11:32:37 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2023-12/india-gate03.jpg"                         length="170189"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सतरंगी सियासत</title>
                                    <description><![CDATA[जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के वादे और इरादे सामने। साथ में, भाजपा और कांग्रेस में ऐन चुनावी मौके पर सांगठनिक नियुक्तियां भी इशारा कर रहीं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-91950"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/india-gate.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>हद हो गई...</strong><br />अमरीकी दोगलेपन की एक और बानगी। एक तरफ तो पीएम मोदी अमरीका की धरती पर थे। और जब वह बाइडेन से बात कर रहे थे। उसी समय व्हाइट हाउस में खालिस्तानी तत्वों से अमरीकी अधिकारियों की चर्चा हुई। यह अमरीकी दोहरे चरित्र का सबूत। अमरीका हमेशा से लोकतंत्र और मानवाधिकारों के नाम पर हर देश में दखल देता रहा। वहीं, खुद अपनी ही धरती पर आतंकी तत्वों को पालता पासता। ऐसे में, अब भारत का रूख क्या होगा? लेकिन इतना तय। अमरीका भारत की बढ़ती हुई ताकत को सहन नहीं कर पा रहा। जो वह कर रहा। यह उसकी बौखलाहट का प्रमाण। यह काम ठीक वैसे ही। जैसे, जब दिल्ली में पाक प्रतिनिधि आते। तो वह भारत के साथ आधिकारिक वार्ता से पहले कश्मीरी अलगाववादियों से मिलते। लेकिन अब वह अतीत की बात। एक दिन यही हाल अमरीका का होगा।</p>
<p><strong>वादे-इरादे!</strong><br />जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के वादे और इरादे सामने। साथ में, भाजपा और कांग्रेस में ऐन चुनावी मौके पर सांगठनिक नियुक्तियां भी इशारा कर रहीं। जबकि नेशनल कांफे्रंस और पीडीपी के लिए स्थानीय एवं क्षेत्रीय दल परेशानी बढ़ा रहे। फिर राशिद इंजीनियर जैसे नेता दोनों ही दलों की धड़कनें तेज रहे। सो, आपस में तीखे आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी। हां, भाजपा को छोड़ सभी दलों में एक ही होड़। दावा कर रहे कि प्रदेश में अनुच्छेद- 370 की बहाली करेंगे। लेकिन कैसे करेंगे? यह कोई नहीं बताता। और इसमें एनसी की सहयोगी कांग्रेस भी। केवल एक भाजपा ही। जिसने साफ कर दिया। ऐसा कभी नहीं होगा। क्योंकि अनुच्छेद- 370 अब अतीत। और उसे इतिहास का एक विशिष्ट पन्ना समझकर भूल जाना ही सभी के लिए श्रेयकर होगा। वैसे भी अब आम जनता जागरूक। ख्याली वादों का क्या?</p>
<p><strong>यह तो बहाना!</strong><br />पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने जयपुर में राज्य सरकार के खिलाफ एक दिन के धरने की घोषणा क्या की। मामला निपटता सा लगा। सवाल यह नहीं कि मुद्दा क्या? बल्कि यह कि वह फिर से मैदान में। गहलोत एक साथ कई तीर छोड़ रहे। अपनों के लिए, राज्य सरकार एवं भाजपा के लिए भी। तो क्या माना जाए? गहलोत ने सूंघ लिया कि भविष्य में कुछ बड़ा घटनाक्रम होने जा रहा। और वह अपने पिटारे में से जादू दिखाने की तैयारी कर रहे। गहलोत स्वास्थ्य लाभ के लिए करीब तीन माह से आराम कर रहे थे। उसके बाद दिल्ली आए। तुरंत उन्हें हरियाणा चुनाव में जिम्मेदारी मिल गई। लेकिन राजस्थान से कभी दूर नहीं होते। तो क्या गहलोत सही समय का इंतजार कर रहे। सो, धरने की बात तो बहाना। शायद यही संकेत। आराम के बहाने आत्ममंथन तो नहीं किया?</p>
<p><strong>दोहरे मापदंड</strong><br />जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव परिणाम पर पूरी दुनियां की नजरें। खासतौर से वह ताकतें। जो भारत को आगे बढ़ता हुआ देखना ही नहीं चाहतीं। इसीलिए उनके लिए यदि चुनाव ठीक नहीं रहे। तो समझो मिशन पूरा! लेकिन ऐसा होगा नहीं। क्योंकि पहले दो चरणों में सूबे की अवाम ने जिस उत्साह तरह से मतदान में हिस्सा लिया। वह तो कुछ और ही कहानी बयां कर रहा। हां, यदि भाजपा जीती। तो यह ‘चुनाव’। और यदि विपक्ष जीत गया। तो कहानी एकदम विपरीत होगी। फिर एजेंडे और नेरैटिव का खेल चलेगा। जो आज तक जम्मू-कश्मीर के बारे में चलता रहा। यही ताकतें कहेंगी। चुनाव अनुच्छेद- 370 पर जनमत संग्रह जैसा था। जिसमें भाजपा फेल हो गई! और यही राग सब ओर सुनाई देने की संभावना। फिलहाल तो भाजपा के लिए सुखद खबर! करीब ढाई दर्जन निर्दलीय प्रत्याशी प्रभावी चुनाव लड़ रहे।</p>
<p><strong>तीन सीएम</strong><br />कर्नाटक सीएम सिद्धरमैया एक जमीन के मामले में फंसे हुए। हाईकोर्ट ने इसे सही पाया। अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में जाएगा। और यदि एससी ने भी इसे बरकरार रखा। तो शायद पद छोड़ना पड़ जाए। इधर, भाजपा और डीके शिवकुमार अपनी बारी के इंतजार में। इसी प्रकार, तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन 2026 से पहले बेटे को डिप्टी बनाना चाहते। लेकिन उनके ही वरिष्ठ साथी इसे पचा नहीं पा रहे। जिससे स्टालिन असमंजस में। फिर सरकार में गठबंधन सहयोगी वीसीके अलग राह चुनने का संकेत दे रही। वहीं, पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी इन दिनों भारी दबाव में। जिसका लाभ कांग्रेस लेने के फिराक में। इसीलिए वहां पीसीसी भी बदल दिया गया। कांग्रेस को लग रहा। ममता से कुछ भी पाने का यही अवसर। मतलब कांग्रेस को अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन में से कुछ मिलने की आस।</p>
<p><strong>उफान पर...</strong><br />जम्मू-कश्मीर और हरियाणा ही नहीं। बल्कि महाराष्टÑ और झारखंड में भी चुनावी माहौल उफान पर। खासतौर से महाराष्टÑ को लेकर सभी की निगाहें। वहीं, झारखंड में आरक्षण एवं आदिवासी कार्ड कितना चल पाएगा। यह देखने वाली बात होगी। हां, जम्मू-कश्मीर में जिस तरह से पहले के मुकाबले शांतिपूर्ण तरीके से बंपर वोटिंग हुई। उससे वह तमाम लोग एवं संगठन ठंडे पड़ गए। जो आजादी के सात दशक बाद भी एक विशेष एजेंडा चला रहे थे। हां, बात महाराष्टÑ की हो रही थी। मुंबई देश की आर्थिक राजधानी। चुनाव से पहले चाचा, भतीजा एक साथ आने की सुगबुगाहट। वहीं, अमित शाह ने तो विचारधारा तक की बात कर डाली। उद्धव ठाकरे अभी भी संकट में। सीएम शिंदे भाजपा के मजबूत साथ से पूरी तरह मुतमईन लग रहे। इधर, देवेन्द्र फड़नवीस ही नहीं। नितिन गडकरी को लेकर भी कई चर्चाएं तैर रहीं!</p>
<p><strong>घेराबंदी...</strong><br />मानो भारत की घेराबंदी हो रही। और यह अमरीका और चीन द्वारा। सबसे ताजा बांग्लादेश। इससे पहले मालदीव। फिर पाक का तो कहना ही क्या? वह तो सदाबहार। डेढ़ दशक पहले नेपाल वामपंथी हो गया। अब श्रीलंका में भी चीन से निकटता रखने वाले वामपंथी राष्टÑपति आ गए। चीन ने भारत से दुश्मनी की शुरूआत तिब्बत को कब्जा करके की। 1962 में युद्ध भी कर लिया। एशिया पर अमरीका की लंबे समय से नजर। भारत के लिए असहज स्थिति। अमरीका चाहता कि चीन से लड़ने में भारत उसकी मदद करे। लेकिन भारत का इनकार और न ही इस ट्रेप में फंसा। अमरीका की लगातार कोशिश। रूस से भी भारत दूर रहे। लेकिन अब तक ऐसा हुआ नहीं। अमरीका लोकतंत्र और मानवाधिकारों की आड़ में हर उस देश में बवाल करवाता। जो भविष्य में उसे चुनौती देने की स्थिति में हो।</p>
<p><strong>दिल्ली डेस्क</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-91950</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-91950</guid>
                <pubDate>Mon, 30 Sep 2024 12:15:52 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-01/india-gate.jpg"                         length="178465"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सतरंगी सियासत</title>
                                    <description><![CDATA[भारत दुनिया की धुरी बन रहा और इसे अमेरिका से ज्यादा कौन समझेगा? वैसे भी उसकी अब वह बात नहीं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-91317"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/india-gate02.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>पीएम की यात्रा</strong><br />पीएम मोदी अमेरिका की यात्रा पर। जब मोदी अमेरिका में हो तो चर्चा स्वाभाविक। जहां उनका यूएन महासभा में संबोधन भी। अब भारत ग्लोबल साउथ की सशक्त आवाज। इसीलिए पीएम मोदी की बात का वजन ज्यादा। हां, इस बार अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव का माहौल। जहां डेमोक्रेट उम्मीदवार बदला जा चुका। जबकि 78 वर्षीय डोनाल्ड ट्रम्प भी पुरजोर तरीके से चुनावी मैदान में है। पिछली बार पीएम मोदी ने उनके समर्थन में प्रचार किया था, जिसकी घरेलू स्तर पर काफी चर्चा रही। लेकिन इस बार हालात बदले हुए है। भारत कुछ न कहते हुए भी बहुत कुछ करने की स्थिति में है। फिर बांगलादेश में जो हो रहा वह किसी से छुपा हुआ नहीं है। जिसमें अमेरिका की भूमिका कोई बहुत अच्छी नहीं। भारत दुनिया की धुरी बन रहा और इसे अमेरिका से ज्यादा कौन समझेगा? वैसे भी उसकी अब वह बात नहीं।</p>
<p><strong>बवाल कट रहा...</strong><br />हरियाणा में मानो राजनीतिक बवाल कट रहा। भाजपा तो सत्ताधारी। सो, समझ आता। लेकिन कांग्रेस में भी कम मुसीबत नहीं। सांसदों को टिकट नहीं देने का निर्णय हुआ। तो हालात यह बन गए कि उनके रिश्तेदारों को टिकट से नवाजना पड़ा। क्योंकि राजनीति नाम ही पग-पग पर समझौते करने का। यानी सब कुछ मजबूरी। आखिर अवसर भी तो पांच साल बाद आता। कोई भी जोखिम लेना या अड़ियल रुख अपनाना नहीं चाहता। पांच साल पीछे ले जाने का खतरा पैदा करता। अब तो छोटे दलों की भी पौ बारह। आखिर उनको भी तो अपनी स्पेस बनाने का यही अवसर। सो, कोई अकेला तो कोई गठजोड़ कर रहा। हालांकि अधिकतर बेमेल और जरूरत के लिहाज के। जिनका जमीनी सच्चाई से कोई लेना देना नहीं। लेकिन जनता के बीच अपनी प्रजेंस भी तो देनी पड़ती। ताकि अगले पांच साल तक राजनीतिक कामकाज चलता रहे।</p>
<p><strong>बुरे फंसे...</strong><br />उत्तर प्रदेश के पूर्व सीएम अखिलेश यादव आजकल दोराहे पर। उन्हें दोनों ओर नुकसान दिख रहा। एक तरफ वोट बैंक तो दूसरी ओर छवि बिगड़ने की चिंता। असल में, कुछ अपराधियों के खिलाफ योगी सरकार ने कड़ी कार्रवाई कर दी। जिनके पक्ष में अखिलेश खड़े हो गए। अब इसे संयोग कहे या कुछ और। जो अपराधी पकड़े गए वह अखिलेश का कोर वोटर। अब यदि पक्ष में खड़े हुए तो आम जनता में छवि खराब होने का खतरा। और यदि दूरी बनाते है तो कोर वोटर के खिसकने का डर। ऐसे में, अखिलेश क्या करें? उधर, सीएम योगी लगातार जघन्य अपराधों में शामिल लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई कर रहे। अब अखिलेश इतना ही बोल पा रहे कि जानबूझकर टारगेट किया जा रहा। लेकिन योगी सब कुछ कानून सम्मत कर रहे। जिसकी कोई भी काट सपा अध्यक्ष के पास नहीं।</p>
<p><strong>असर!</strong><br />राहुल गांधी विदेशी धरती पर अल्पसंख्यकों को लेकर बोल तो गए। इसी बीच, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनई का बयान। वह भी भारत का नाम लेकर। अब इसे संयोग कहे या कुछ और। लेकिन इसी बीच, भाजपा ने भी राहुल के बयान पर पलटवार किया। फिर विदेश मंत्रालय का बयान। कहा, अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न संबंधी टीका टिप्पणी बिल्कुल अस्वीकार्य। इनका कोई आधार नहीं। इससे पहले पीएम मोदी बोले, विदेशी धरती से आरक्षण समाप्त किए जाने की बातें हो रही। यह सब उचित नहीं। सो, क्या यह सब राहुल गांधी के बयानों का असर? हालांकि कांग्रेस का भी जवाब। भाजपा नेता भी विदेशी धरती से बहुत कुछ बोल चुके। आरोप यह भी कि भाजपा नेताओं ने परंपरा और नैतिकता तोड़ी। लेकिन इससे  देश की छवि का क्या? वह प्रभावित होती! दुनिया में भारत को अलग नजर से देखा जाता।</p>
<p><strong>इस्तीफा...</strong><br />अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली का मुख्यमंत्री पद अचानक छोड़ दिया। वहीं, विधानसभा चुनाव फरवरी 2025 में संभावित। केजरीवाल का इस्तीफा राजनीतिक निर्णय और अगले चुनाव में लाभ लेने की कोशिश। लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा? यह नतीजे बताएंगे। फिर यदि चुनाव जीत गए तो क्या केजरीवाल दोषमुक्त हो जाएंगे? जिसके लिए वह जेल गए। शायद नहीं। क्योंकि उन्हें फिर से कोर्ट जाना होगा। जहां कोर्ट उन्हें राहत देगा या नहीं। यह भी देखने वाली बात। लेकिन केजरीवाल के दांव से भाजपा जरूर भौचक्की। फिर कांग्रेस का क्या? हालांकि पिछला लोकसभा चुनाव कांग्रेस एवं आप ने गठबंधन करके लड़ा। लेकिन विधानसभा चुनाव में भी यह होगा। फिलहाल कुछ कह पाना असंभव। आतिशी मार्लेना को सीएम बनाकर केजरीवाल क्या संदेश दे रहे? क्या वह चंपई सोरेन साबित होंगी? वैसे, पद संभलाने से पहले ही उन्होंने कहा- अगले सीएम अरविंद केजरीवाल ही होंगे।</p>
<p><strong>चर्चा में मोसाद...</strong><br />आजकल इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद की चर्चा दुनियाभर में। कारनामा ही ऐसा। हालांकि मोसाद ने खुद कुछ कहा नहीं। लेकिन जो हुआ, वह आज तक हुआ नहीं। ईरान द्वारा पाला-पोसा आतंकी संगठन हिजबुल्ला लेबनान से इजराइल के खिलाफ युद्धरत। यह संघर्ष बरसों से जारी। जिसमें हर फन आजमाया जा रहा। लेकिन इस बार दुनिया भोचक्की। लेबनान में अचानक पहले पेजर फटने लगे और उसके बाद वॉकी टॉकी और सोलर पेनल तक में धमाके होने लगे। हजारों घायल हो गए और दर्जनों की मौत। यह युद्ध का नया तरीका। लेकिन जिसने भी इसकी योजना बनाई। वह अपने आप में नायाब। कानोंकान किसी को खबर तक नहीं। इलेक्ट्रानिक उपकरण का उपयोग करने वाला डरा सहमा सा। कब कहा क्या हो जाए? इस कारनामे के लिए मोसाद की ओर शक की सुई। जो अपने कारनामों से दुनिया में लोहा मनवाती रहती है।</p>
<p><strong>-दिल्ली डेस्क</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-91317</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-91317</guid>
                <pubDate>Mon, 23 Sep 2024 12:14:18 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-01/india-gate02.jpg"                         length="353716"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सतरंगी सियासत</title>
                                    <description><![CDATA[ कांग्रेस कभी अन्य दलों से गठबंधन से परहेज करती थी। लेकिन उसे समय ने बहुत कुछ समझा दिया। सो, अब भाजपा से मुकाबले के लिए अपनी जमीन को छोड़ने से भी परहेज नहीं कर रही। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-90605"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/india-gate.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>गठबंधन...</strong><br />कांग्रेस कभी अन्य दलों से गठबंधन से परहेज करती थी। लेकिन उसे समय ने बहुत कुछ समझा दिया। सो, अब भाजपा से मुकाबले के लिए अपनी जमीन को छोड़ने से भी परहेज नहीं कर रही। कांग्रेस नेतृत्व 2024 के परिणाम से उत्साहित! अब हरियाणा चुनाव ही लिजिए। भले ही प्रदेश के नेता किसी दल से गठबंधन नहीं चाहते। लेकिन दिल्ली के स्तर पर आम आदमी पार्टी से गठबंधन की अंत तक सुगबुगाहट। इसमें प्रदेश नेताओं से राय नहीं ली गई। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने गठबंधन पर रूचि दिखाई। अबयदि हरियाणा में कांग्रेस-आप का गठबंधन हो जाता। तो हंगामा तय था। क्योंकि पहले ही वहां प्रदेश नेताओं में सीएम चेहरे को लेकर कई दावेदार। अब यदि गठजोड़ होता। तो कुछ सीटें छोड़नी पड़ती। अब यदि किसी सीएम पद के आशार्थी की सीट गठबंधन में चली जाती। तो नया बखेड़ा हो जाता।</p>
<p><strong>राहुल की यात्रा</strong><br />राहुल गांधी ने अमरीकी यात्रा में वही सब बोला। जैसा कि उम्मीद। उन्होंने केन्द्र सरकार, पीएम मोदी एवं आरएसएस को विदेशी धरती पर आड़े हाथों लिया। दूसरी ओर, भाजपा ने उन्हें राजनीतिक नैतिकता एवं परंपरा याद दिलाई। लेकिन राहुल गांधी कहां मानने वाले? हां, अमरीका में अभी राष्टÑपति पद का चुनावी माहौल। डेमोक्रेट और रिपब्लिकन प्रत्याशियों का ताबड़तोड़ प्रचार जारी। सो, यह भी एक एंगल। राहुल गांधी वैसे भी देश में बहुत कुछ बोलते। अब तो वह बकायदा संवैधानिक पद यानी नेता प्रतिपक्ष भी। सो, उनके बोलने के मायने। कहीं, उन्होंने भाजपा को हमलावर होने का मौका तो नहीं दे दिया? फिर यह आरोप कई बार लग चुका कि अमरीका भारत की व्यवस्था में लगातार दखलंदाजी कर रहा। खासकर एनडीए की तीसरी सरकार बनने के बाद ऐसी चीजें ज्यादा मुखरता से सामने आ रहीं। हालांकि इन सबसे अमरीका का इनकार।</p>
<p><strong>टिकट बंटवारा!</strong><br />हरियाणा विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी भाजपा की पहली सूची आते ही बवाल मच गया। चूंकि पार्टी सत्ता में। सो, ऐसा होना स्वाभाविक। लेकिन कुछ अतिरंजना भी। कई पुराने नेताओं के इस्तीफे और उन्हें मनाने की भी कोशिश। लेकिन क्या इससे बात बनेगी? उधर, कांग्रेस में भी कम गदर नहीं। क्योंकि पार्टी नेताओं को हरियाणा में सत्ता की वापसी की आस। सो, कड़ा मुकाबला होगा ही। हां, फिलहाल भाजपा के लिए राहत की बात। उसके विरोधी वोट कम से कम कागजों पर तो बंट ही रहे। आप, बसपा एवं जजपा जैसे दल चुनावी दंगल में। इससे भाजपा मान रही। यह उसके लिए लाभदायक। सो, उसकी संभावनाएं ज्यादा होंगी। लेकिन अंत तक यह माहौल रहेगा या पलटेगा। यह देखने वाली बात। लेकिन टिकट बंटवारे से लग रहा। भाजपा का हाल देख कांग्रेस ने निरंतरता रखने का प्रयास किया। बजाए जोखिम लेने के।</p>
<p><strong>अगली बारी!</strong><br />इन चार राज्यों के चुनाव परिणाम मोदी सरकार पर सीधा प्रभाव न डालें। लेकिन उसका आधा कार्यकाल पूरा होने तक महत्वपूर्ण राज्यों के चुनाव। इसमें बिहार, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, गोवा एवं असम जैसे राज्य शामिल। और तय मानिए, मोदी सरकार कठोर निर्णय लेगी या राजनीतिक हालात के सामने समझौता करेगी। यह सब उस समय तय हो जाएगा। वैसे 2027 के मध्य में राष्टÑपति चुनाव भी। वह चुनौती मोदी सरकार के लिए आसान नहीं। क्योंकि एक तो केन्द्र में सांसदों की संख्या का सवाल। दूसरा, राज्यों में यदि एनडीए का संख्याबल घटा। तो फिर भाजपा के लिए मुश्किल होगी। क्योंकि राज्यों में जहां एनडीए सिकुड़ेगा। वहीं, विपक्षी गठबंधन बढ़त में रहेगा। सो, आने वाले दो साल अहम। भले ही मोदी लगातार निर्णयों के जरिए निरंतरता का संकेत कर रहे हों। लेकिन नौ राज्यों के चुनाव बहुत कुछ तय करेंगे!</p>
<p><strong>सुगबुगाहट!</strong><br />बिहार में अगले साल के अंत में विधानसभा चुनाव। सो, लालू जी और नीतीश जी की शायद यह अंतिम पारी हो। जबकि तेजस्वी और चिराग पासवान जैसे नेताओं के लिए राजनीति में निखरने एवं चमकाने का अवसर। सो, सुगबुगाहट शुरू हो चुकी। चिराग पासवान की हालिया बयानबाजी ऐसी। जो भाजपा को पसंद नहीं। इसीलिए उनके चाचा पशुपति पारस से अमित शाह मिले। इसी प्रकार नीतीश बोले, दो बार गलती कर चुके। अब भाजपा का साथ नहीं छोड़ेंगे। लेकिन नेता की हां और ना के मायने होते। नीतीश चुनाव से पहले भाजपा को शायद इशारा कर रहे। उपेन्द्र कुशवाह को भाजपा नीतीश को साधने के लिए साथ रखेगी। लेकिन अबकी बार उनकी स्थिरता की परीक्षा। लेकिन भाजपा का क्या? इतने साल नीतीश के साथ रहने के बावजूद वह नया नेतृत्व खड़ा नहीं कर सकी। बिहार में भाजपा की यही कमजोर कड़ी।</p>
<p><strong>आएगा उबाल!</strong><br />जैसे ही महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव की घोषणा होगी। राजनीति में उबाल आना तय। हालांकि महाराष्ट्र के साथ झारखंड भी। लेकिन भाजपा और कांग्रेस की नजर महाराष्ट्र पर रहेगी। यहां सीएम एकनाथ शिंदे, उद्धव ठाकरे, अजित पवार की राजनीतिक साख दांव पर। भाजपा की कोशिश सौ का आंकड़ा पार करने की। जबकि कांग्रेस की इच्छा। भाजपा को सत्ता से बाहर हो। हां, शरद पवार का इरादा बेटी सुप्रिया सुले को सेटल करने का। क्योंकि उनकी भी आयु। भाजपा शिंदे को साथ रखना चाहेगी। जबकि अजित पवार से पिंड छुड़ाने की जुगत में। वह भाजपा के लिए उपयोगी नहीं रहे। इसीलिए अजित चाचा शरद पवार के साथ जाने को उतावले। शिवसेना के लिए बुरा दौर। उद्धव ठाकरे की सीएम बनने की महत्वाकांक्षा ने पार्टी का बहुत नुकसान करवा दिया। फिर उन्हें अपने बेटे आदित्य ठाकरे का राजनीतिक भविष्य भी तो देखना।</p>
<p><strong>नया संकट..</strong><br />कांग्रेस अभी हरियाणा एवं जम्मू-कश्मीर की चुनावी तैयारियों में व्यस्त। इसके बाद झारखंड और महाराष्ट्र में जुटना होगा। लेकिन दक्षिण से उसके लिए अच्छी खबर नहीं। असल में, तमिलनाडु में कांग्रेस, डीएमके के साथ सत्ता में हिस्सेदार। सीएम स्टालिन की तबियत ठीक नहीं बताई जा रही। ऐसी खबरें उनके करीब ही लीक कर रहे। जिससे कांग्रेस परेशान। क्योंकि सीएम एमके स्टालिन ही रहें, तो ठीक। लेकिन उनकी नजर साल 2026 पर। जब राज्य में विधानसभा चुनाव होंगे। इसे देखते हुए ही वह समय रहते बेटे उदयनिधि स्टालिन को डिप्टी सीएम बनाना चाहते। लेकिन डीएमके के ही वरिष्ठ नेता राजी नहीं। जिससे सीएम स्टालिन कोई निर्णय नहीं ले पा रहे। कहीं, चुनाव से पहले ही बगावत के हालात न बन जाएं। और इससे कांग्रेस की परेशानी बढ़ेगी। क्योंकि तमिलनाडु में कांग्रेस के मुकाबले भाजपा बड़ी तेजी से राजनीतिक विस्तार कर रही।    </p>
<p><strong>-दिल्ली डेस्क</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-90605</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-90605</guid>
                <pubDate>Mon, 16 Sep 2024 11:22:08 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-01/india-gate.jpg"                         length="178465"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सतरंगी सियासत</title>
                                    <description><![CDATA[कर्नाटक में नया झमेला। सीएम सिद्धारमैया के खिलाफ एक जमीन घोटाले में मुकदमा चलेगा। राज्यपाल ने इसकी अनुमति दे दी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-88653"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/india-gate.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>नवीन की हिम्मत</strong><br />नवीन पटनायक गजब की हिम्मत दिखा रहे। वह 25 साल प्रदेश की कमान संभाल चुके। अब उम्रदराज हो चुके। उसके बावजूद हिम्मत देखिए। पहले तो नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी संभाल ली। और अब प्रदेशभर के दौरे पर निकलने वाले। उनके सहयोगी एवं पूर्व नौकरशाह पांडियन अब कहीं नेपथ्य में। जबकि विधानसभा चुनाव से पूर्व उनको लेकर कई कयास थे। अब उन सब पर विराम। सवाल यह कि नवीन असल में करने क्या वाले? क्योंकि राज्य में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बन चुकी। नया सीएम भी आदिवासी समाज से बनाया। सो, आराम से सरकार चलने की उम्मीद। इधर, लोकसभा में भी भाजपा ने शानदार प्रदर्शन किया। ऐसे में, नवीन बाबू को करने के लिए बचा क्या? किसी को अभी तक अपनी राजनीतिक विरासत भी नहीं सौपी। वहीं, आयु के भी सात दशक पार कर चुके। लेकिन गजब के हिम्मती!</p>
<p><strong>चंपई का दांव...</strong><br />झारखंड मुक्ति मोर्चा के पूर्व सीएम संपई सोरेन ने चुनावी कार्यक्रम की घोषणा से पहले हलचल मचा दी। यह जेएमएम ही नहीं बल्कि कांग्रेस के लिए भी झटका। जहां वह झारखंड में जेएमएम के ही भरोसे। माना जा रहा था। जेल जाने के कारण हेमंत सोरेन को विधानसभा चुनाव में सहानुभूति मिलेगी। लेकिन चंपई सोरेन ने सारा खेल बिगाड़ दिया। बागी तेवर दिखाकर उन्होंने भाजपा की राह आसान कर दी। क्योंकि सत्ताधारी गठबंधन ने आम चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया था। इधर, भाजपा में भी कशमकश। अमित शाह बोले, चुनाव सामूहिक नेतृत्व में लड़ा जाएगा। मतलब बाबूलाल मरांडी और अर्जन मुंडा ही नहीं। कोई ओर भी सीएम होने का सपना देख सकता। तो उसमें चंपई सोरेन क्यों नहीं हो सकते? क्योंकि एक राजनेता के रुप में उनकी खास पहचान और साख। यह ‘एक्स’ पर लिखे गए उनके शब्दों से स्पष्ट।</p>
<p><strong>सबसे खास</strong><br />जम्मू-कश्मीर का विधानसभा चुनाव इस बार सबसे खास होने जा रहा। पाक, चीन और अमरीका ही नहीं। यूरोप और यूएनओ की भी इस दौरान नजर रहने वाली। इसमें किसी को संदेह नहीं। सो, सरकार और चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा और साख दांव पर। इसके लिए दिल्ली पूरी तरह तैयार। इसीलिए पूरी तैयारी के बाद ही चुनाव करवाने का निर्णय लिया गया। वैसे, आम चुनाव से ही इसके संकेत थे। आड़ भले ही न्यायालय का आदेश हो। लेकिन यह सभी कारणों में से एक कारण। पिछले कुछ दिनों से जम्मू क्षेत्र में घाटी से ज्यादा आतंकी वारदातें हो रहीं। जो चिंता का सबब। अब तो अनुच्छेद- 370 नहीं। विधानसभा क्षेत्रों का डि-लिमिटेशन भी हो चुका। सीटों की संख्या बढ़कर 87 से 90 हो गई। इसमें भी पहली बार एससी-एसटी को आरक्षण। सो, इस बार का विधानसभा चुनाव सबसे खास रहने वाला।</p>
<p><strong>जमीन पर कुछ और!</strong><br />बांग्लादश में बीती पांच अगस्त को हुए शेख हसीना के तख्तापलट के बाद से जमीनी हालात बदल रहे। इस सारे मामले में अमरीकी दखल से इनकार से हो या फिर अंतरिम सरकार के मुखिया मुहम्मद यूनुस का पीएम मोदी से बात करना हो। फिर यूनुस द्वारा बांग्लादेश में हिन्दुओं की सुरक्षा का आश्वासन देना हो या फिर अभी भी शेख हसीना का भारत में रूकना। हसीना का बयान, वह फिर से लौटेंगी। कई की धड़कनें बढ़ा रहा। इधर, भारत में पड़ोसी देश में हो रही हिंसा के खिलाफ लगातार धरना एवं विरोध प्रदर्शन। लोकतंत्र और मानवाधिकारों का ढ़िढोरा पीटने वालों के मुंह पर ताला। बहुतों की पोल पट्टी खोल रहा। कूटनीति में कई काम पर्दे के पीछे से किए जाते। वह जारी होगा। किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। हां, कुछ बातें अमरीका की उम्मीद के बिल्कुल विपरित हो रहीं।</p>
<p><strong>नई गलफांस...</strong><br />कर्नाटक में नया झमेला। सीएम सिद्धारमैया के खिलाफ एक जमीन घोटाले में मुकदमा चलेगा। राज्यपाल ने इसकी अनुमति दे दी। उपरी तौर पर लग रहा यह भ्रष्टाचार का मामला। लेकिन सारा माजरा कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति का। डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार बहुत ज्यादा इंतजार करने के मूड में नहीं। यदि सीएम के खिलाफ मुकदमा चला और निर्णय आ गया। तो नैतिकता के नाते उन्हें पद छोड़ना पड़ेगा। तो डीके की मन की मुराद भी पूरी होना संभव। लेकिन क्या कांग्रेस आलकमान इन सबसे से अनजान होगा? सरकार चलाने और पॉलिटिकल ऑपरेशन करने के मामले में कांग्रेस का कोई जवाब नहीं। वैसे सिद्धारमैया की आयु 75 के आसपास। वहीं, डीके भी 65 के आसपास। कांग्रेस की अंदरुनी उठापटक से भाजपा लाभ लेने के मूड में। यदि कुछ भी हुआ। तो यह भाजपा के लिए अवसर। जिसकी उसे पहले दिन से आस।</p>
<p><strong>मंथन का दौर</strong><br />भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष को लेकर मंथन का जारी। एक बैठक आरएसएस पदाधिकारियों के साथ हो चुकी। तो पार्टी ने अपना सदस्यता अभियान की भी तैयारी कर ली। इस बार कार्यवाहक नहीं बल्कि अगले साल पूर्णकालिक चुनावित अध्यक्ष ही जिम्मेदारी संभालेगा। माना जा रहा। नए अध्यक्ष के चयन में आम चुनाव- 2024 के परिणाम प्रभावित करेंगे। क्योंकि परिणाम उम्मीद के अनुरुप नहीं आए। जिससे भाजपा कैडर ही नहीं। आरएसएस भी मायूस। इसी से उभरने के लिए लो प्रोफाइल अध्यक्ष की तलाश हो रही। जो जमीनी भी हो और लगातार कार्यकर्ताओं से संवाद रख सके। जो अपने आवास से नहीं। कार्यालय से पार्टी चलाए। मतलब अब भाजपा पुराने दौर में लौटने की कोशिश कर रही। यह प्रयास कितना सफल होगा। समय बताएगा! लेकिन इतना तय। आरएसएस 2004 वाला दौर नहीं चाहता। ना ही भाजपा को इतना छूट कि पकड़ ढीली हो।</p>
<p><strong>मुसीबत में ममता</strong><br />ममता बनर्जी अपने तीसरे कार्यकाल में पहली बार भारी विरोध का सामना कर रहीं। इससे निपटने के लिए वह वही गलती कर रहीं। जो कभी वामपंथी सरकारों ने की थी। एक मेडिकल छात्रा के साथ हुए गैंग रेप और बर्बर हत्या से देशभर के रेजीडेंट डाक्टर सड़कों पर आ गए। बीच मं सुप्रीम कोर्ट को आना पड़ा। ज्यों-ज्यों मामले की जांच आगे बढ़ रही। मामला उलझता ही जा रहा। फिर राज्यपाल की सक्रियता ममता सरकार को और असहज कर रही। अभी कुछ दिन पहले बांग्लादेश के घटनाक्रम से सबसे ज्यादा ममता बनर्जी ही परेशान हुई थीं। पड़ोसी देश में जिस प्रकार से अल्पसंख्यक हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा का तांडव चला। तो पश्चिम बंगाल की जनता सोचने को मजबूर हो गई। इधर, विपक्षी भाजपा लगातार ममता बनर्जी पर तुष्टिकरण और घुसपैठ का आरोप लगाती रही। जिसकी काट फिलहाल उनके पास नहीं।</p>
<p><strong>दिल्ली डेस्क</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-88653</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-88653</guid>
                <pubDate>Mon, 26 Aug 2024 11:10:57 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-01/india-gate.jpg"                         length="178465"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सतरंगी सियासत</title>
                                    <description><![CDATA[ किसानों के दर्द एवं समस्याओं को उजागर करने पर बधाई भी दी। असल में, शिवराज लगातार रंग जमा रहे। अपना अलग ही स्थान बना रहे। ऐसे में, कई का ध्यान उनकी ओर जा रहा! ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-87513"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/india-gate031.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>छेड़ा तो...</strong><br />राज्यसभा में बीते सोमवार कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान बोले, छेड़ा तो छोड़ूंगा नहीं। और उन्होंने कांग्रेस के कार्यकाल में हुई किसानों पर ज्यादतियों को गिनाना शुरू कर दिया। लगातार शोरगुल के बीच चौहान ने अपनी फेहरिस्त पढ़ना जारी रखा। इससे असहज हुई कांग्रेस सदन से बायकाट कर गई। चौहान ने फिर दोहराया। मुझे छेड़ा तो मैं छेड़ूंगा नहीं। असल में, चौहान कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के कार्यकरण पर बोले। उनके दावों पर कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह और रणदीप सुरजेवाला खासतौर से आपत्ति जता रहे थे। लेकिन सीधे-साधे दिखने वाले चौहान ने जब आक्रामकता से अपनी बात कहनी शुरू की। तो सभापति जगदीप धनखड़ भी एकटक उन्हें देखने लगे। उन्हें किसानों के दर्द एवं समस्याओं को उजागर करने पर बधाई भी दी। असल में, शिवराज लगातार रंग जमा रहे। अपना अलग ही स्थान बना रहे। ऐसे में, कई का ध्यान उनकी ओर जा रहा!</p>
<p><strong>आरक्षण तो बहाना...</strong><br />तो श्रीलंका और मालदीव के बाद अब बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता। बताया जा रहा। यह खेल उसके पड़ोसी और दुनियां की ताकतों का। वह भी भारत के खिलाफ। लेकिन सवाल, क्या एक चुनी हुई सरकार के खिलाफ केवल आरक्षण के मुद्दे पर जनता बगावत करेगी? या बात कुछ और? वैसे शेख हसीना पहले ही आशंका जता चुकी थीं। सो, हो गया। अब बांग्लादेश पर नियंत्रण कट्टरपंथी ताकतों के हाथों में। जो भारत के हित में नहीं। भारत श्रीलंका, म्यांमार, मालदीव एवं नेपाल की अस्थिरता को देख रहा। अब उसमें बांगलादेश भी शामिल। लेकिन जो बताया जा रहा। क्या मसला वहीं तक? क्योंकि दुनियां की ताकतों में दक्षिण एशिया में शुरू से ही गहरी रूचि। खासकर भारत में। लेकिन बीते तीन बार से स्थिर और मजबूत सरकार के कारण यहां उनकी दाल नहीं गल रही। तो पड़ोसियों के जरिए भारत को परेशानी में डालने की कवायद!</p>
<p><strong>वैसा हुआ तो?</strong><br />बांग्लादेश में आज हालात वैसे ही। जैसे 2021 में अफगानिस्तान में हो गए थे। तब पाकिस्तान की खुशी का ठिकाना नहीं था। मानो अफगानिस्तान उसी का हो जाएगा। तब वहां भारत के बीस हजार करोड़ रूप्ए दांव पर थे। तो देश में कुछ असामाजिक तत्व खुश थे। लेकिन भारत धीरे-धीरे आगे बढ़ा। अपनी कूटनीति के जरिए तालिबान को भी विश्वास में लिया। और बाकी दुनिया को भी तालिबान से बात करने को राजी किया। फिर कहानी कैसे आगे बढ़ी। बताने की जरुरत नहीं। अब अब लग रहा बांग्लादेश भी उसी राह पर! इस समय वहां कट्टरपंथियों का बवाल और तांडव चल रहा। अल्पसंख्यकों में कोई सुरक्षित नहीं। वहां की करीब आठ फीसदी आबादी हिन्दू, ईसाई और बौध धर्मावलंबियों की। ऐसे में भारत चुप रहेगा। संभव नहीं। जानकार बता रहे। बांग्लादेशी सेना को आगाह किया जा चुका। मानकर चलिए। बाजी भारत के ही हाथ रहने वाली!</p>
<p><strong>भारत की कूटनीति!</strong><br />पड़ोसी बांग्लादेश में हालात ऐसे बने कि शेख हसीना का तख्ता पलट हो गया। उन्हें अचानक सब कुछ छोड़कर भारत आना पड़ा। भारत ने हसीना की संकट के समय यथोचित मदद भी की। अब कूटनीतिक गलियारे में चर्चा। भारत ने ऐसा क्यों किया? क्योंकि नुकसान भी संभव। उसके बावजूद भारत ने यह जोखिम लिया। शायद भारत की संकट में आए व्यक्ति को शरण, सम्मान एवं सुरक्षा देना सैंकड़ो वर्षों की परंपरा। वैसे, शेख हसीना को उनके विरोधी भारत समर्थक मानते। भारत पहले भी उनकी सुरक्षित रिहाई और आवास उपलब्ध करावा चुका। बांग्लादेश की पीएम रहते हुए शेख हसीना ने भारत के हितों का हमेशा ख्याल रखा। उनके कार्यकाल में दोनो देशों के संबंध काफी मधुर रहे। फिर मोदीजी दुनियां को संदेश देने से कहां चूकने वाले। क्योंकि भारत के पड़ोस में यह करतूत उन्हीं ताकतों की। जो भारत का अच्छा होते हुए देखना नहीं चाहते।</p>
<p><strong>किसकी लगेगी लॉटरी?</strong><br />राजस्थान में राज्यसभा की एक सीट के लिए उपचुनाव होने जा रहे। जो कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल के इस्तीफे से खाली हुई। संख्याबल के लिहाज से यह सीट भाजपा की झोली में जाएगी। अब सवाल यह कि लॉटरी किसकी लगेगी? किसी महिला को मौका मिलेगा या दिल्ली से किसी को एडजस्ट किया जाएगा? या फिर प्रदेश के ही किसी वरिष्ठ नेता को उच्च सदन में भेजा जाएगा। प्रत्याशी चयन में छह विधानसभा सीटों के उपचुनाव का सियासी समीकरण तो नहीं देखा जाएगा? इन सबका पटाक्षेप एक सप्ताह में हो जाएगा। लेकिन इतना तय। अंतिम निर्णय दिल्ली से होगा। प्रदेश की भूमिका कोई बहुत ज्यादा दिखती नहीं। हां, भावी प्रत्याशी संगठन से होगा या राजनीतिक। यह भी देखने वाली बात। क्योंकि लोकसभा चुनाव में दूसरी पार्टियों से आने वाले नेताओं को काफी तवज्जो दी गई। जिसका फायदा होने के बजाए भाजपा को नकसान ज्याादा उठाना पड़ा।</p>
<p><strong>बढ़ रही हलचल!</strong><br />जम्मू-कश्मीर में साल के अंत में विधानसभा चुनाव संभावित। सो, राजनीति के जानकारों की ढेरों जिज्ञासाएं। वैसे हलचल राजनीतिक दलों में ही नहीं। चुनाव आयोग द्वारा भी हो रही। इस बीच, घाटी को छोड़ जम्मू क्षेत्र में हो रहीं आतंकवाद की घटनाएं चिंता का सबब। फिर जम्मू-कश्मीर का चुनाव अंतर्राष्ट्रीय चर्चाओं का विषय भी बनेगा। क्योंकि अनुच्छेद- 370 हटने के बाद यह पहला विधानसभा चुनाव होगा। जिसमें भले ही भाजपा की पूर्ण सफलता पर प्रश्नचिन्ह हो। लेकिन क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ने की पूरी संभावना। लोकसभा चुनाव इस ओर साफ इशारा कर रहे। वहीं, पीडीपी एवं नेशनल कांफे्रंस के लिए मानो यह चुनाव जीवन-मरण जैसा। यही दो दल। जो प्रदेश में पहले कांग्रेस और बाद में भाजपा के साथ मिलकर सरकारें बनाते-चलाते रहे। हां, भाजपा शुरू से ही घाटी में बिल्कुल प्रभावहीन। लेकिन उसने बड़े करीने से पीडीपी और एनसी का रूतबा जरूर घटा दिया!</p>
<p><strong>विडंबना देखिए...</strong><br />बांग्लादेश इस समय भारी राजनीतिक उथल-पुथल के दौर। भारत ने समय पर सही निर्णय न लिया होता। तो शेख हसीना का जीवन खतरे में था। लेकिन चाहे बात यूरोप या अमरीका की हो। या फिर संयुक्त राष्ट्र संघ की। इनका दोहरा रवैया साफ दिख रहा। एक तो ब्रिटेन ने शेख हसीना को राजनीतिक शरण नहीं दी। वहीं, अमरीका ने नई अंतरिम सरकार के गठन का स्वागत किया। जबकि आरक्षण के विरोध से शुरू हुआ आंदोलन हिंसक ही नहीं हुआ। बल्कि वह अल्पसंख्यक समुदाय के लिए अस्तित्व का संकट बन गया। बांग्लादेश में तख्तापलट के साथ ही अल्पसंख्यकों के खिलाफ भारी हिंसा की खबरें। लेकिन न तो मानवाधिकारों की बात हो रही। न ही लोकतंत्र की। यूएनओ अभी ठीक से बोला नहीं। जबकि इनका अफगानिस्तान पर रूख अलहदा था। फिर इराक को कैसे भूला जा सकता? इधर, भारत के सामने एक मानवीय त्रासदी मुंह बाए खड़ी हुई।<br /><strong> </strong></p>
<p><strong>दिल्ली डेस्क</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-87513</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-87513</guid>
                <pubDate>Mon, 12 Aug 2024 12:01:18 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-01/india-gate031.jpg"                         length="170189"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सतरंगी  सियासत</title>
                                    <description><![CDATA[ पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर एक चुनावी सभा में गोलीबारी हो गई। घटना चौंकाने वाली। इससे अमरीका जैसे देश की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुल गई। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-85473"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/india-gate02.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>पोल खुली!</strong><br />पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर एक चुनावी सभा में गोलीबारी हो गई। घटना चौंकाने वाली। इससे अमरीका जैसे देश की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुल गई। वहां लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं कितनी साफ सुथरी और सुरक्षित। पहले अमरीका में कैपिटल हिल में आम जनता घुस चुकी। गौर करने वाली बात यह कि पश्चिमी ताकतें हमेशा ही भारत की लोकतांत्रिक परंपरा और प्रक्रियाओं पर सवाल उठाते रहीं। लेकिन खुद अपने गिरेबां में नहीं झांकती। लेकिन दूसरों पर अंगुली उठाना मानो अपना हक समझती। भारत के हालिया आम चुनाव में इन ताकतों ने दखलंदाजी करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। उसके बावजूद सफलता नहीं मिली। लेकिन पश्चिमी ताकतों से ज्यादा भारत का लोकतंत्र मजबूत। भारत में शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता हस्तांतरण और बदलाव इसकी गवाही। भारत में कभी भी खून बहने की नौबत नहीं आई। लेकिन जो पारदर्शिता और साफगोई का दावा करते। उनका हाल देखने लाय।</p>
<p><strong>कहां अटका मामला?</strong><br />भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल 30 जून का समाप्त हो गया। वह काबिना मंत्री भी बन गए। लेकिन नए अध्यक्ष की सुगबुगाहट शुरू होकर धीमी भी पड़ गई। वैसे, यह देरी क्यों? भाजपा पर करीब से नजर रखने वाले कह रहे। मंथन जारी। शायद सिंतबर की शुरूआत में कुछ सुगबुगाहट पता चले। तब तक मामला टल गया! आम चुनाव में जो प्रदर्शन भाजपा का रहा। इससे भी ज्यादा जो बयान जेपी नड्डा ने संघ को लेकर दिया। उससे चीजें सामान्य नहीं लग रहीं। सो, कहीं ऐसा न हो कि दिल्ली सर्किल से बाहर का नेता भाजपा अध्यक्ष बन जाए। जैसे कभी राष्ट्रीय राजनीति से इतर नितिन गडकरी को लाया गया था। हालांकि कयास और नाम कई चले। लेकिन फाइनल कुछ भी नहीं। बातचीत और चर्चा होगी। लेकिन अंतिम निर्णय कुछ ही नेताओं में चर्चा बाद होने की संभावना। और वह कौन? यह सभी जानते!</p>
<p><strong>अब क्या जवाब?</strong><br />मुकेश अंबानी के बेटे अनंत अंबानी के विवाह के चर्चे देश-दुनियां में चारों ओर। करीब पांच हजार करोड़ खर्च होने का अनुमान। इस विवाह में समाज जीवन से जुड़े हर क्षेत्र के दिग्गज पहुंचे। अब राजनीतिक दिग्गज कैसे बचे रहेंगे? सो, विवाह में पीएम मोदी भी नवदम्पत्ति को आशीर्वाद देने पहुंचे। लेकिन जो नेता एवं दल पूरे समय अंबानी की मजम्मत करते रहते। वह भी समारोह में सपरिवार पहुंचे। इसमें सपा के अखिलेश यादव और राजद के लालू यादव प्रमुख। जब लालू कहीं जाएं और उसकी चर्चा न हो। ऐसा कैसे संभव। हां, गांधी परिवार को निमंत्रण होने के बावजूद वहां कोई नहीं पहुंचा। लेकिन कई कांग्रेस नेता गए। अब इसे क्या कहा जाए? आप किसी की सार्वजनिक आलोचना भी करेंगे। जब वह अपने पारिवारिक समारोह में बुलाए। तो जाएंगे भी। भारतीय समाज का यह भी एक पहलू! आम जनता इस पर भी गौर करे!</p>
<p><strong>संकेत और संदेश</strong><br />महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले 11 सीटों पर हुए विधान परिषद चुनाव बहुत कुछ संकेत और संदेश दे रहे। कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी। तो एमवीए के लिए भी असहजता वाला हाल। हां, भाजपानीत सरकार के लिए मानो राहत की सांस। लेकिन माना जा रहा। इस गठजोड़ में अजित पवार ज्यादा भरोसे लायक नहीं। क्योंकि उनके गुट के नेता शरद पवार मिल रहे। इसीलिए भाजपा खासी आशंकित। कांग्रेस विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की। जबकि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले अकेले ही चुनाव लड़ने का दंभ भर रहे। शिवसेना यूबीटी और शिंदे गुट फिलहाल राहत में। जबकि भाजपा किसी प्रकार का जोखिम लेने के मूड में नहीं। सफलता की संभावना वाला हर विकल्प खुला। फिर महाराष्टÑ का दिल्ली कनेक्शन भी। पिछले पांच साल कैसे निकले। यह दिल्ली भाजपा ही जानती। ऐसे में हर मोहर और चाल चली जाए। तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए!</p>
<p><strong>चैक एंड बैलेंस!</strong><br />भारत के दो पड़ोसी मानो चैक बैलेंस कर रहे। एक बांगलादेश और दूसरा नेपाल। वैसे, चीन और पाक तो भारत का कभी अच्छा चाहते ही नहीं। बीते कुछ समय से भारत अपने पड़ोसियों पर प्रभाव छोड़ रहा। चीन के प्रभाव के चलते केपी शर्मा ओली का भारत विरोधी रूख रहा। अब फिर उनकी वापसी हो गई। ओली भारत के लिए कब असहज स्थिति बना दें। कहा नहीं जा सकता। वहीं, बांगलादेश की पीएम शेख हसीना की हालिया चीन यात्रा की चर्चा। कानाफूसी यह कि वह यात्रा बीच में ही छोड़कर स्वदेश लौट गईं। चीन में उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं हुआ। जबकि मोदी 3.0 में वह दो बार भारत आ चुकीं। यानी हसीना ने चीन के मुकाबले भारत को ज्यादा प्राथमिकता दी और भरोसा भी जताया। सवाल बांगलादेश में योगदान का नहीं। बल्कि नीति और नीयत का। इस मामले में भारत की साख कहीं ज्यादा।</p>
<p><strong>भाजपा की कशमकश!</strong><br />दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीता। यह कहावत आजकल भाजपा पर चरितार्थ हो रही। आम चुनाव में जमीनी कार्यकर्ताओं को तवज्जो नहीं देने के परिणाम सामने। वहीं, उत्तर प्रदेश में बयानबाजी का दौर। जो किसी के हित में नहीं। हिमाचल प्रदेश में आम चुनाव से पहले निर्दलीय विधायकों को साथ लेकर कांग्रेस सरकार को संकट में डालने की कोशिश भाजपा को उल्टी पड़ रही। सीएम सुक्खु पहले से ज्यादा मजबूत हो गए। इसी से सबक लेकर पार्टी तेलंगाना में खासी सतर्क। वहां बीआरएस के केसीआर का राजनीतिक ग्राफ लगातार नीचे जा रहा। उनके नेता, कार्यकर्ता इधर-उधर हो रहे। सत्ताधारी कांग्रेस उन्हें वैसे ही तोड़ रही। जैसे उन्होंने कभी उसे तोड़ा था। इनमें से कुछ भाजपा में भी आने के इच्छुक। लेकिन पार्टी नेतृत्व हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल और महाराष्टÑ से सबक ले रहा। क्योंकि इस सबसे भाजपा का मूल कॉडर ही नाराज हो रहा।</p>
<p><strong>चर्चा में यूपी...</strong><br />लोकसभा चुनाव परिणाम को लेकर इन दिनों यूपी चर्चा में। हो भी क्यों नहीं? आखिर यूपी में 80 लोकसभा क्षेत्र। खासकर सीएम योगी को लेकर कई तरह की अफवाहें तैर रहीं। अब इनमें सच्चाई कितनी। यह तो समय बताएगा। लेकिन सीएम योगी की अपना काम करने की शैली ज्यों की त्यों। हां, दिल्ली और लखनऊ में अफवाहबाजों की कमी नहीं। सो, उनका भी काम जारी। भले ही यूपी भाजपा संगठन में बदलाव हों। लेकिन प्रदेश सरकार में मंत्रियों को छोड़कर किसी बड़े बदलाव की संभावना फिलहाल नहीं। क्योंकि सीएम योगी की आज स्थिति वही। जो साल 2013 में पीएम मोदी की थी। आज योगी मॉडल की देशभर में लोकप्रियता। खासकर कानून व्यवस्था को लेकर। उन पर भ्रष्टाचार का बीते सात सालों में व्यक्तिगत रुप से कोई आरोप नहीं लगा। सो, योगी भाजपा के भीतर ही नहीं। बल्कि देशभर में जनता के बीच भी बेहद लोकप्रिय।</p>
<p><strong>दिल्ली डेस्क</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-85473</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-85473</guid>
                <pubDate>Mon, 22 Jul 2024 10:11:52 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-01/india-gate02.jpg"                         length="353716"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सतरंगी सियासत</title>
                                    <description><![CDATA[ कांग्रेस दोराहे पर। संविधान के पक्ष में खड़े हो या फिर अपने पुराने निर्णय के साथ जाए। फिर कांग्रेस की संविधान बचाने की मुहिम आजकल चर्चा में। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-84723"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/india-gate03.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>मोदी और पुतिन</strong><br />पीएम मोदी की रूस यात्रा की चर्चा दुनियाभर में। तीसरे कार्यकाल की उनकी यह पहली विदेश यात्रा। सो, व्लादिमीर पुतिन के लिए भी खासा महत्वपूर्ण। मोदी 2019 के बाद मास्को पहुंचे थे। एक बार तो दौर तय हो जाने के बाद भी मोदी रूस नहीं जा सके। जिससे पुतिन असहज हुए थे। खैर, जब भारत-रूस शिखर सम्मेलन हुआ। तो अमरीका और यूरोप असहज। क्योंकि उन्होंने पूरी कोशिश कर ली कि भारत-रूस संबंध प्रगाढ़ नहीं हों। लेकिन मोदी तमाम दबावों को दरकिनार करके दोस्ती निभाने मास्को पहुंच गए। वैसे मोदी दोस्ती तो कोविड-19 के समय से निभा रहे। जब तमाम अमरीकी और पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद भारत, रूस से बड़ी मात्रा में तेल आयात करता रहा। इससे रूस संभला रहा। वहीं, भारत पर आने वाला खतरा भी टला। सो, मोदी की यात्रा से संबंध और प्रगाढ़ होने की पुष्टि। दुनियां के ताकतवार देश देखते रह गए।  </p>
<p><strong>डबल इंजन</strong><br />बीती दस जुलाई को प्रदेश की भाजपा सरकार का बजट आया। तो अब 23 जुलाई को केन्द्र सरकार का आम बजट आने वाला। चूंकि केन्द्र और राज्य को मिलाकर डबल इंजन की सरकार। सो, आम जनता की उम्मीदें ज्यादा। ऐसे में, दोनों सरकारें आशा और अपेक्षाओं पर कितना खरी उतरेंगी। इस पर मुहर तो जनता ही लगाएगी। अब राज्य सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा अगले कुछ ही समय में होने वाले पांच विधानसभा सीटों पर उपचुनाव। यहां भाजपा के मुकाबले विपक्षी दलों के विधायक अब सांसद बन गए। सो, सीएम भजनलाल के सामने चुनौती कम नहीं। इसमें केन्द्र सरकार की साख भी दांव पर होगी। क्योंकि वह भी काम शुरू कर चुकी। ऐसे में जनता क्या राय देगी? यह देखने वाली बात। लेकिन जानकारों की नजर कहीं ओर! उपचुनाव के बहाने बहुत कुछ तय होने की भूमिका बन जाएगी। मतलब अगले छह माह बेहद महत्वपूर्ण!</p>
<p><strong>हाल-ए-पाक!</strong><br />पड़ोसी पाक हैरान, परेशान। भारत ने टी-20 वर्ल्डकप क्या जीता। उसे पच ही नहीं रहा। यहां तक दावा। भारत गड़बड़ करके जीता। पाक स्वीकारने को राजी नहीं कि भारत जीत चुका। खैर, यह तो रही उसकी मानसिकता की बात। लेकिन यह पाक की पुरानी बीमारी। वह भारत की किसी भी तरक्की को झेल नहीं पाता। पाक के पड़ोसी अफगास्तिान में तालिबान सत्तारूढ़। अब पाक को यह भी रास नहीं आ रहा कि वहां जो शांति प्रक्रिया और बातचीत चल रही। उसमें भारत भी भागीदार। जबकि पाक वहां अपनी जन्मजात दखल मानता रहा। दोहा की हालिया वार्ता में भारत की ओर से संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी ने शिरकत की। और यह पाक को मंजूर नहीं। जबकि अफगान सरकार भारत पर पूरा भरोसा कर रही। वह पाक को भाव देने के मूड में नहीं। क्योंकि पाक की साख दुनिया में रसातल में। आर्थिक तंगी अलग से।</p>
<p><strong>पहला बजट</strong><br />तो राजस्थान की भाजपा सरकार का पहला बजट सामने। बजट घोषणाओं से लग रहा। भजनलाल सरकार कई मामलों में केन्द्र की मोदी सरकार का अनुसरण कर रही। सीएम ने बजट को विजन- 2047 की झलक बताया। तो विपक्ष की अपेक्षित प्रक्रिया। खैर, इन सबके बावजूद बजट संतुलित और कई मायनों में अलग दिख रहा। यहां तक कि खबरनवीसों का भी ख्याल रखा गया। सो, दिल्ली से आम बजट में क्या घोषणाएं होने वालीं? लेकिन यह तय। मोदी सरकार में जो निरंतरता दिख रही। उसकी झलक निश्चित रूप से आम बजट में देखने को मिलेगी। बात योजना और नीति के स्तर पर हो या उसके क्रियान्वयन की। देश के किसान, महिला, युवा, वंचित वर्ग के लिए पहले से बेहतर योजनाओं की आशा। वैसे भी मोदी सरकार का नारा। किसी का तुष्टिकरण नहीं। बल्कि सभी का संतुष्टिकरण। मतलब समग्रता और व्यापकता का भाव। लोकलुभावना वादों से परहेज!</p>
<p><strong>कशमकश जारी!</strong><br />कर्नाटक में हलचल की उम्मीद। लेकिन कांग्रेस आलाकमान की नजर साल के अंत में होने वाले चार राज्यों के विधानसभा चुनाव पर। पार्टी नेतृत्व आम चुनाव के परिणाम से उत्साहित। लेकिन कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार की महत्वकांक्षा और सीएम सिद्धरमैया की वरिष्ठता एवं अनुभव। दोनों की कशमकश में यह देखने वाली बात। असल में, सीएम को ढाई साल बाद जाना होगा और उसके बाद केपीसीसी चीफ भी बने हुए डीके कुर्सी संभालेंगे। इस सहमति की शुरू से ही चर्चा। डीके शिवकुमार का धैर्य अब जवाब दे रहा। और इंतजर के मूड में नहीं। एक तो सिद्धरमैया की आयु हो रही। और यदि शिवकुमार भी इस कार्यकाल में सीएम नहीं बने। तो आगे के लिए आश्वस्त नहीं। क्योंकि वह भी 70 पार होंगे। बाद में क्या राजनीतिक परिस्थितियां बनेंगी? कोई नहीं जानता। ऐसे में निर्णय आलाकमान को लेना। इस बीच, भाजपा भी ताक में!</p>
<p><strong>जटिल होता झारखंड</strong><br />झारखंड में हेमंत सोरेन वापस कुर्सी पर। नाराजगी और असहजता के बीच चंपई सोरेन वापस उनकी कैबिनेट में मंत्री। ध्यान रहे केन्द्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा चुनाव हार गए। तो बाबूलाल मरांडी इन दिनों चर्चाओं से गायब से। आम चुनाव में भाजपा पांच सीटें गंवा चुकी। सो, नेतृत्व का चिंतित होना स्वाभाविक। क्योंकि सामाजिक समीकरणों एवं संसाधनों के लिहाज से आदिवासी बहुल झारखंड महत्वपूर्ण। पूर्व में भाजपा रणनीतिक चूक कर चुकी। जिसे वह दोहराना नहीं चाहेगी। जबकि हेमंत सोरेन की जेल से रिहाई से सत्तापक्ष उत्साहित। जेएमएम में पहले से ज्यादा आत्मविश्वास नजर आ रहा। फिर सहयोगी भी कांग्रेस। जबकि भाजपा का मनोबल कुछ गिरा हुआ सा। आखिरी मौके पर भी बदलाव संभव। वह क्या होगा? यह देखने वाली बात। लेकिन जिस तरह से महाराष्टÑ में भाजपा घिरी हुई। बहुत जोखिम लेने की स्थिति में नहीं! फिर जम्मू-कश्मीर का चुनाव भी। वहां के हालात एकदम जुदा।</p>
<p><strong>अब क्या करे?</strong><br />कांग्रेस दोराहे पर। संविधान के पक्ष में खड़े हो या फिर अपने पुराने निर्णय के साथ जाए। फिर कांग्रेस की संविधान बचाने की मुहिम आजकल चर्चा में। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को भी गुजारा भत्ता पाने का हकदार बना दिया। यह एक ऐतिहासिक निर्णय। जिसके दूरगामी परिणाम होने वाले। इसीलिए कांग्रेस अब क्या करे? इधर जाए या उधर? शाहबानो प्रकरण में राजीव गांधी की प्रचंड बहुमत वाली कांग्रेस सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय पलट दिया था। उस समय उसने शरिया के प्रावधानों के अनुसार दी गई व्यवस्था के साथ ही जाना उचित समझा। जिसका भारी विरोध भी हुआ। लेकिन मामला वोट बैंक का जो ठहरा। लेकिन अब सर्वोच्च न्यायालय ने संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार अपना निर्णय सुना दिया। अब कांग्रेस शरिया के साथ जाए या संविधान के। इसीलिए वह कुछ बोल ही नहीं पा रही। मामला संवेदनशील अलग से!</p>
<p><strong>दिल्ली डेस्क</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-84723</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-84723</guid>
                <pubDate>Mon, 15 Jul 2024 11:43:22 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-01/india-gate03.jpg"                         length="170189"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सतरंगी सियासत</title>
                                    <description><![CDATA[भाजपा नेतृत्व ने दो दर्जन राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों में संगठन प्रभारी एवं सहप्रभारी नियुक्त कर दिए। इसमें अपने राजस्थान से पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया भी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-84026"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/india-gate.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>पहली तकरीर..</strong><br />राहुल गांधी ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में अपने पहले ही भाषण में गर्माहट पैदा कर दी। हालत यह हो गई कि पीएम मोदी को भी बीच में बोलना पड़ा। आखिर राहुल गांधी ने बोला ही ऐसा। फिर अमित शाह भी बोले। खैर, राहुल गांधी वही बोले जैसी उम्मीद थी। लेकिन अब वह नेता प्रतिपक्ष। और वह भी संसद के निचले सदन में। जो बहुत महत्वपूर्ण। पूरा देश देखा-सुन रहा होता। भाजपा की प्रतिक्रिया भी वैसी ही। जैसी कि अपेक्षित। लेकिन बोले तो यूपी के सीएम योगी भी। उन्होंने कहा, हिन्दू इस देश की आत्मा। लग रहा, मानो दोनों ही ओर से मुद्दा मिल गया। जो आगे तक चलेगा। मतलब काम की बात न हो। और ऐसे मुद्दों पर संसद के भीतर और बाहर बवाल होता रहे। जिनका आम जनता के हितों से कोई सरोकार नहीं हो। तो फिर यह किसके हित में?</p>
<p><strong>खड़गे की जिजीविषा...</strong><br />राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जन खड़गे करीब 82 साल के। लेकिन उनके परिश्रम और सक्रियता में कोई कमी नहीं। करीब पांच दशकों से ज्यादा समय से राजनीति में। वह कांग्रेस अध्यक्ष भी। बीते सोमवार को जब राज्यसभा में खड़गे राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने के लिए खड़े हुए। तो शुरूआत में ही उन्होंने सभापति जगदीप धनखड़ से कहा कि उन्हें पैर में तकलीफ। सो, बीच में रूकावट संभव। जिस पर सभापति ने कहा, आप अपनी सुविधा से खड़े होकर या बैठकर बोलें। तो खड़गे बोले, बैठकर बोलने में वह जोश नहीं आता। सो, घंटेभर से ज्यादा जमकर बोले। एनडीए सरकार, भाजपा और आरएसएस की खूब मजम्मत की। लेकिन खड़गे एक बार भी थककर अपनी सीट पर नहीं बैठे! ऐसे में बाकी सांसदों का अचम्भित होना लाजमी। खड़गे सदन की वेल में भी आ चुके। उन्होंने पूरे जोश से सरकार के खिलाफ विरोध दर्ज करवाया था।</p>
<p><strong>पीएम का जवाब</strong><br />आम चुनाव संपन्न होने के बाद संसद सत्र में पीएम मोदी का पहला संबोधन। वैसा ही बोले। जैसा उन्हें जाना जाता। जो अपेक्षा विपक्ष पाले हुआ था। वैसा कुछ भी नहीं हुआ। मतलब गठबंधन साथियों का दबाव या भाजपा को 272 पार नहीं होने का कोई असर नहीं दिखा। विपक्ष और खासकर राहुल गांधी की एक-एक बात का जवाब दिया। उसी चिरपरिचित अंदाज में। हां, इस बार राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष के रूप में उनके सामने थे। तो हंगामा, शोरगुल, टोका टाकी नारेबाजी आपत्ति, वार, प्रतिवार अपेक्षित था। वह जमकर हुआ। इन सबमें स्पीकर को कई बार सांसदों को डाटना डपटना पड़ा। नाराज भी हुए। सदन की परंपराओं को याद भी दिलाया। साथ में अनुशासन और नैतिकता की दुहाई भी। लेकिन इस बार असर कहां होना था। दोनों ओर के सांसद भी पूरे जोश में थे। आखिर अपने नेता के सामने निष्ठावान भी तो दिखाना।</p>
<p><strong>दोनों ओर खुशी...</strong><br />संसद सत्र समाप्त हो गया। सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच खुशी का माहौल। विपक्ष इसलिए खुश कि उसकी संख्या बढ़ गई। सरकार के खिलाफ ज्यादा आक्रामक हो पाएगा। खासकर कांग्रेस। फिर नेता विपक्ष राहुल गांधी बन गए। इस बीच, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई चर्चा में राहुल गांधी जिस अंदाज में बोले। उससे उनके समर्थक खासे खुश। उनको ऐसी ही उम्मीद थी। लेकिन दूसरी ओर, पीएम मोदी ने भी उसी आक्रामक और हमलावर अंदाज में जवाब दिया। जिसकी उम्मीद कम से कम विपक्ष को नहीं थी। क्योंकि वह संख्या बल के कारण मोदी के ढीला पड़ जाने की आस लगाए बैठे थे। लेकिन उन्हें निराशा मिली। मोदी समर्थक एवं भाजपा कार्यकर्ता भी खुश। क्योंकि मोदी 3.0 में उन्हें कुछ नया होने की उम्मीद। और मोदी ने कहा भी। दस सालों में मैने बहुत बर्दाश्त कर लिया। अब जो जैसे समझेगा। उसी भाषा में समझाया जाएगा।</p>
<p><strong>संशय, असमंजस!</strong><br />बाबा किरोड़ी जी ने मंत्री पद छोड़ दिया। लेकिन जो कारण बताया जा रहा। वह उथला और सतही। कारण कुछ और संभव। जो अभी सामने आया नहीं। जो डा. किरोड़ीलाल को करीब से जानते। या जो उनकी राजनीति को करीब से समझते। उनके लिए शायद कुछ और ही होने वाला! बात चाहे भाजपा नेतृत्व की हो या राज्य सरकार की। बाबा को कोई मना नहीं पाया। इसीलिए संशय और असमंजस। आखिर जो नेता चार दशकों से ज्यादा सार्वजनिक जीवन में हो। और परंपरागत राजनीति करता हो। उसे समझ पाना इतना आसान भी नहीं। आज के दौर के नेताओं के तो यह बस की बात नहीं। शायद बाबा की यही पीड़ा। वह इशारों में कई बार कह चुके। लेकिन जिनको निर्णय लेना। शायद हालात उनके लिए अनुकूल नहीं हो। लेकिन पांच विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव भी। जो लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा के लिए ज्यादा चुनौतिपूर्ण।</p>
<p><strong>आहट या जल्दबाजी?</strong><br />भाजपा नेतृत्व ने दो दर्जन राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों में संगठन प्रभारी एवं सहप्रभारी नियुक्त कर दिए। इसमें अपने राजस्थान से पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया भी। जिन्हें हरियाणा की जिम्मेदारी सौंपी गई। इधर, हाल ही में संपन्न आम चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन आशानुुरूप नहीं रहा। जिससे पार्टी नेतृत्व चिंतित। लेकिन अब सतर्क भी। इसीलिए नए अध्यक्ष की नियुक्ति की आहट के बीच बिना देरी किए चुनावी राज्यों हरियाणा, जम्मू-कश्मीर एवं झारखंड समेत 24 प्रदेशों में संगठनात्मक नियुक्ति कर दी गई। मतलब, ढिलाई की गुंजाइश नहीं। अब भाजपा में यह बदलाव की आहट या जल्दबाजी? वैसे भाजपा की पहचान कैडर बेस पार्टी की। लेकिन जब भी पार्टी केन्द्र की सत्ता में रहती। पार्टी नेतृत्व कैडर के बजाए सरकार चलाने में ज्यादा व्यस्त रहता। जिसे अब दुरूस्त करने की कोशिश की जा रही। इसीलिए समय, परिस्थितियों एवं जरूरत के हिसाब से निर्णय हो रहे।</p>
<p><strong>दिल्ली डेस्क</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-84026</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics/article-84026</guid>
                <pubDate>Mon, 08 Jul 2024 12:52:24 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-01/india-gate.jpg"                         length="178465"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सतरंगी सियासत</title>
                                    <description><![CDATA[ आपातकाल मानो कांग्रेस की दुखती रग। विशेष रूप से भाजपा इसकी याद दिलाती रहती। इसमें वह विपक्षी दल भी शामिल हो जाते। जो आज कांग्रेस के साथ। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics-bjp-congress-rahul-gandhi-narendra-modi/article-83279"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/india-gate.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>दो तरफा निशाना</strong><br />आपातकाल मानो कांग्रेस की दुखती रग। विशेष रूप से भाजपा इसकी याद दिलाती रहती। इसमें वह विपक्षी दल भी शामिल हो जाते। जो आज कांग्रेस के साथ। संसद सत्र की शुरूआत में ही आपातकाल को लेकर दो तरफा निशाना। पहले, लोकसभा में ओम बिरला बोले। तो अगले ही दिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी सांसदों के संयुक्त संबोधन में इसका जिक्र किया। सो, कांग्रेस का असहज होना लाजमी। वैसे कांग्रेस ने लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव के दिन ही सदन में हंगामा किया। असल में, कांग्रेस कई बार आरोप लगाती कि आज देश में अघोषित आपातकाल जैसे हालात। मोदी सरकार विपक्षी दलों को डरा रही। लेकिन भाजपा के पास इसकी तगड़ी काट। सो, वह समय-समय पर इस दुखती रग को दबाती रहती। नई सरकार का गठन हो गया। कामकाज शुरू ही हुआ था कि दो संवैधानिक पदों पर बैठे महानुभावों ने आपातकाल का जिक्र कर डाला।  </p>
<p><strong>असमंजस तो नहीं?</strong><br />आरएलपी सांसद हनुमान बेनीवाल और भारत आदिवासी पार्टी (बाप) के राजकुमार रोत मानो असमंजस में! वह विरोधी खेमे के साथ। लेकिन केन्द्र और राज्य में भाजपा की सरकार। क्षेत्र की जनता के लिए काम भी इन्हीं से करवाने। सो, कांग्रेस के साथ दिखाकर आखिर क्या मिलेगा? इसीलिए शुरूआत में ही मानो संकेत। वह कांग्रेस के मेहरबानी से नहीं जीते। बल्कि राजनीति में खुद जगह बनाकर संसद तक पहुंचे। इससे एक बार तो कांग्रेस भी असहज। लेकिन इसी से खुश कि भाजपा को हरा दिया। हां, इन दोनों ही दलों का राजनीतिक विस्तार, मतलब केवल कांग्रेस का घाटा। बेनीवाल एवं रोत अपनी आक्रामक राजनीति के लिए जाने जाते। हनुमान बेनीवाल तो कभी भाजपा में भी रह चुके। लेकिन राजकुमार रोत की राजनीति भाजपा से एकदम विपरीत। उन्हें कांग्रेस भी रास नहीं आती। लेकिन सवाल जनता की सेवा का। इसीलिए भाजपा के प्रति साफ्ट रहना भी जरूरी!</p>
<p><strong>होश ठिकाने...</strong><br />टीआरएस से बीआरएस होने वाली पार्टी के मुखिया केसीआर अब जमीन पर। और इस मुश्किल समय में उनके साथी एक-एक करके छोड़ते जा रहे। एक तो आम चुनाव में बुरी तरह हार गए। पिछले साल राज्य की सत्ता चली गई। जिस पर वह दस साल से काबिज थे। उधर, बेटी कविता शराब नीति मामले में लंबे समय से जेल में। कहां तो वह देश का पीएम बनने का सपना संजोकर देश भ्रमण पर निकले थे। इसके लिए अपने राजस्थान के छोटे दलों से भी उन्होंने संपर्क साधा। लेकिन बात आगे बड़ी नहीं। अब तो केसीआर के पिछले विधानसभा में जीते हुए विधायक भी कांग्रेस में शामिल हो रहे। आंध्रप्रदेश में पार्टी का कोई अस्तित्व नहीं। राज्य की जनता केसीआर को पसंद नहीं करती। क्योंकि वही तो राज्य के बंटवारे के कर्णधार और सूत्रधार। तो बीआरएस के वहां पैर कैसे जमेंगे? मतलब केसीआर के होश ठिकाने।</p>
<p><strong>माकूल जवाब</strong><br />अमरीका का इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रिडम (आइआरएफ) की रिपोर्ट के बहाने भारत पर निशाना। लेकिन इस बार भारत ने उसे माकूल जवाब दिया। असल में, यह सब अमरीका की सालाना रेगुलर प्रेक्टिस। जब वह किसी देश पर दबाव बनाने की कोशिश करता। तो यही तरकीब अपनाता। अमरीका अभी तक यह स्वीकारने को राजी नहीं कि भारत अब पहले जैसा नहीं। इसीलिए हर तरह से भारत पर शिकंजा कसने की कोशिश करता रहता। लेकिन भारत ने इस बार कहा, पहले खुद अपने यहां हुई घटनाओं पर ही गौर कर ले। फिर दूसरे को ज्ञान दें। बात लोकतंत्र की हो या शासन में पारदर्शिता की। अथवा मानवाधिकार की हो या धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति की। अमरीका इन्हीं बहानों से मजबूत हो रहे किसी देश पर शिकंजा कसता। लेकिन अपनी गिरेबां में कभी नहीं झांकता। बल्कि दूसरे पर दबाव बनाकर उसे अपने इशारे पर चलने को मजबूर करता।</p>
<p><strong>जोश में विपक्ष!</strong><br />कांग्रेस की अगुवाई में इस बार विपक्ष जोश में। एक तो सांसद बढ़ गए। दूसरा, मोदी की अगुवाई में भाजपा लगातार तीसरी बार 272 का जादुई आंकड़ा पार नहीं कर सकी। फिर जदयू और टीडीपी ऐसे दल। जो कभी कांग्रेस की अगुवाई वाले वाले गठबंधन में रह चुके। कांग्रेसी भरोसे का एक एंगल यह भी। सो, उम्मीद पालना गलत नहीं। लेकिन जिस तरह से पीएम मोदी अपने प्रशासनिक एवं राजनीतिक कामकाज में निरंतरता दिखा रहे। उससे लग नहीं रहा कि वह विपक्षी आशावाद पर गौर कर रहे। बल्कि वह अपनी गति से आगे बढ़ रहे और महत्वपूर्ण नियुक्तियां कर रहे। लगातार अपने साथियों को आगे आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए आगाह कर रहे। हां, कांग्रेस जितनी एका की बात कर रही। वह जमीन पर नहीं दिख रहा। लोकसभा स्पीकर के चुनाव में मत विभाजन के करीब जाकर पीछे हट जाना। इसी का इशारा!</p>
<p><strong>एक और चयन!</strong><br />संजय झा के रूप में जदयू में एक नई नियुक्ति। यह आम चुनाव बाद का चयन। हालांकि नीतीश कुमार लंबे समय से सीएम पद पर विराजमान। साल 2025 में होने वाले विधानसभा चुनाव किसकी अगुवाई में होंगे? जदयू द्वारा भाजपा को समर्थन देने की एवज में नीतीश यह आश्वासन ले चुके। यानी नीतीश ही सीएम पद के प्रत्याशी होंगे। लेकिन यह लंबा चलेगा। इसमें जानकारों को संदेह! नीतीश के साथ प्रशांत किशोर उपाध्यक्ष रह चुके। तो लल्लन सिंह और आरसीपी सिंह भी जदयू की अगुवाई कर चुके। लेकिन नीतीश के प्रभाव से बाहर नहीं आए। और अब संजय झा। केसी त्यागी सीएम नीतीश के राजनीतिक सलाहकार। जो काफी वरिष्ठ और अनुभवी भी। उन्होंने कई दौरे देखे। वैसे, माना जा रहा। साल के अंत में महाराष्ट्र समेत चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव बाद उलटफेर की संभावना! आखिर अगली आस लगाकर रहने में परेशानी क्या?</p>
<p><strong>राहुल की परीक्षा!</strong><br />साल 2004 से ही लगातार लोकसभा सांसद चुने जा रहे राहुल गांधी के भी अब राजनीतिक कौशल परीक्षा। इसी दौरान संप्रग दस साल तक सत्ता में रहा। लेकिन राहुल गांधी किसी जिम्मेदारी पर नहीं रहे। इस बार नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में। जानकार भले ही पीएम मोदी की परीक्षा बता रहे हों। क्योंकि आज तक उन्होंने गठबंधन की नहीं। बल्कि भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार चलाई। लेकिन यही बात राहुल गांधी के लिए भी। उनके सामने विपक्षी नेता के रूप में सभी सहयोगियों को साथ लेकर चलने की चुनौती। लोकसभा स्पीकर के चुनाव में पहले ममता बनर्जी की टीएमसी ने हिला हवाली दिखाई। तो के. सुरेश को स्पीकर पद का प्रत्याशी घोषित करते समय सपा से राय मश्विरा करने की जरूरत महसूस नहीं की गई। सो, तालमेल एवं चर्चा करके निर्णय करने की बात सामने आ ही गई। और यही समस्या आगे भी संभव!</p>
<p><strong>-दिल्ली डेस्क</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics-bjp-congress-rahul-gandhi-narendra-modi/article-83279</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/india-gate/colorful-politics-bjp-congress-rahul-gandhi-narendra-modi/article-83279</guid>
                <pubDate>Mon, 01 Jul 2024 10:30:23 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-01/india-gate.jpg"                         length="178465"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        