ना मैदान ना संसाधन, कैसे भाला फेंके बेटियां

प्रशिक्षकों ने कहा सुविधाएं मिले तो बहुत कुछ कर सकती है यहां की लाडलियां

ना मैदान ना संसाधन, कैसे भाला फेंके  बेटियां

कोटा की लड़कियां नयापुरा स्थित स्टेडियम के ही एक कोने में अभ्यास करती हैं। प्रशिक्षक बताते हैं कि अगर यहां की लड़कियों को पर्याप्त संसाधन मिले तो क्षेत्र की लड़कियां भी भाला फैंकने में महारत हांसिल कर सकती हैं क्योंकि इन लड़कियों में जोश और जुनून तो है लेकिन संसाधनों के अभाव में वो पीछे हट जाती है।

कोटा। कोटा की कई बेटियों ने कई खेलों में ना केवल राष्ट्रीय बल्कि अन्तरराष्टÑीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई है, कोटा का नाम रोशन किया है लेकिन पर्याप्त मैदान के अभाव में यहां की बेटियां भाला फैंकने में कोई कमाल नहीं दिखा पाई है। यहीं कारण है कि कोटा की लड़कियों में भाला फैंकने के प्रचलन से लेकर अब तक केवल एक लड़की नेशनल लेवल तक पहुंच पाई है। यहां तक कि स्टेट लेवल पर भी केवल 5 या 6 लड़कियां ही अपना प्रदर्शन कर सकी हैं। यहां की लड़कियों को भाला फैंकने का गुर सिखाने वालों का कहना हैं कि यहां की कुछ लड़कियां भले ही इस खेल में अपनी रूचि दिखा रही हैं लेकिन यहां अभ्यास करने के लिए कोई पर्याप्त मैदान ही नहीं है, तो लड़कियां अभ्यास ही कहा करें। जिला खेल एसोसिएशन राज्य सरकार को पत्र लिखते -लिखते ही थक गई है लेकिन राज्य सरकार दूसरी सुविधाएं तो दूर की बात भाला फैंकने का अभ्यास करने के लिए मैदान तक उपलब्ध नहीं करवा पाई है। प्रशिक्षकों का कहना हैं कि एक तो सरकार की ओर से कोई मैदान उपलब्ध नहीं है। दूसरा इस खेल में सामान्य वर्ग की ही लड़कियां रूचि लेती है लेकिन भालों की कीमत ही इतनी होती है कि उनके परिजन पीछे हट जाते हैं। साधारण भाले 1500 से 2000 हजार तक के आते हैं जो एक या दो बार के अभ्यास में ही टूट जाते हैं। जबकि ढंग के भाले 10000 से 20000 तक के आते हैं जो लाना सबके वश की बात नहीं है। कोटा की लड़कियां नयापुरा स्थित स्टेडियम के ही एक कोने में अभ्यास करती हैं। प्रशिक्षक बताते हैं कि अगर यहां की लड़कियों को पर्याप्त संसाधन मिले तो क्षेत्र की लड़कियां भी भाला फैंकने में महारत हांसिल कर सकती हैं क्योंकि इन लड़कियों में जोश और जुनून तो है लेकिन संसाधनों के अभाव में वो पीछे हट जाती है। हां, इनके माता-पिता जरुर कुछ हद तक इन लड़कियों को इस खेल में आगे बढ़ते देखना चाहते हैं लेकिन उनकी भी एक सीमा है। 

इनका कहना हैं
लड़कियां मेहनत करने में कोई कसर नहीं छोड़ती है लेकिन किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त संसाधनों का होना आवश्यक है और कुछ नहीं तो कम से कम मैदान तो होना ही चाहिए। 
- श्याम बिहारी नाहर, कोच। 

यहां की लड़कियों में भाला फैंकने को लेकर काफी उत्सुकता है लेकिन मैदान के अभाव में ये लड़कियां अभ्यास ही नहीं कर पाती है। माता-पिता कुछ हद तक इनको सपोर्ट करते हैं। श्रीनाथपुरम में राष्टÑीय स्तर का स्टेडियम बना है अब उसके संचालन होने के बाद ही पता लगेगा कि वहां की व्यवस्था कैसी रहती है। 
- राकेश कुमार, सचिव, जिला एथेलेटिक्स संघ, कोटा।

बीते एक साल से अभ्यास कर रही हंू। रोजाना करीब 5 स 6 घंटे का अभ्यास करती हंू। नेशनल लेवल पर खेल चुकी हंू। परिजनों का पूरा सहयोग मिलता है। अभ्यास का पढ़ाई पर थोड़ा फर्क जरुर पड़ता है लेकिन तालमेल बिठा लेती हंू। भाला फैंकने में अन्तरराष्टÑीय स्तर पर खेलना चाहती हंू। 
- महिमा चौधरी, खिलाड़ी। 

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