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                <title>कई प्रकार के ब्लड कैंसर में प्रभावी है इम्यूनोथैरेपी, ब्लड कैंसर के इलाज में क्रांतिकारी बदलाव ला रही है इम्यूनोथैरेपी</title>
                                    <description><![CDATA[खून से जुड़ी जानलेवा बीमारियों, जैसे ल्यूकेमिया, लिम्फोमा और मायलोमा जैसी ब्लड कैंसर की स्थितियों में इम्यूनोथैरेपी ने चिकित्सा जगत को नई दिशा दी है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/immunotherapy-is-effective-in-many-types-of-blood-cancer-immunotherapy/article-113754"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-05/news-(8)4.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। खून से जुड़ी जानलेवा बीमारियों, जैसे ल्यूकेमिया, लिम्फोमा और मायलोमा जैसी ब्लड कैंसर की स्थितियों में इम्यूनोथैरेपी ने चिकित्सा जगत को नई दिशा दी है। यह तकनीक शरीर की अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त बनाकर कैंसर कोशिकाओं से लड़ने में मदद करती है और परंपरागत कीमोथैरेपी की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी और कम दुष्प्रभाव वाली सिद्ध हो रही है। भगवान महावीर हॉस्पिटल के सीनियर हिमेटोलॉजिस्ट डॉ. उपेंद्र शर्मा ने बताया कि इम्यूनोथैरेपी एक ऐसी आधुनिक चिकित्सा विधि है, जिसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली को प्रशिक्षित किया जाता है कि वह कैंसर कोशिकाओं को पहचान कर उन्हें नष्ट करे। यह इलाज न केवल कैंसर को जड़ से खत्म करने की संभावना बढ़ाता है, बल्कि उसके दोबारा लौटने की आशंका को भी कम करता है।</p>
<p><strong>कैसे करती है काम</strong><br />डॉ. शर्मा ने बताया कि इम्यूनोथैरेपी के कई प्रकार होते हैं जिनमें से कार-टी सेल थेरेपी सबसे उन्नत तकनीकों में गिनी जाती है। इसमें रोगी की टी-कोशिकाओं को शरीर से निकालकर प्रयोगशाला में इस प्रकार परिवर्तित किया जाता है कि वे विशेष कैंसर कोशिकाओं को पहचानकर नष्ट कर सकें। इसके बाद इन्हें वापस शरीर में प्रविष्ट कराया जाता है। इसके अतिरिक्त मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज और इम्यून चेकपॉइंट इनहिबिटर्स भी इम्यूनोथैरेपी के महत्वपूर्ण अंग हैं, जो कैंसर कोशिकाओं की रक्षा प्रणाली को तोड़ते हैं और शरीर को उन्हें समाप्त करने का मौका देते हैं।</p>
<p><strong>किस प्रकार के ब्लड कैंसर में होती है उपयोगी</strong></p>
<ul>
<li> एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया </li>
<li> क्रॉनिक लिम्फोसाइटिक ल्यूकेमिया </li>
<li> नॉन-हॉजकिन लिम्फोमा</li>
<li> हॉजकिन लिम्फोमा</li>
<li> मल्टीपल मायलोमा</li>
<li> अमायलोडोसिस इम्यूनोथेरेपी के फायदे</li>
<li> कीमोथेरेपी की तुलना में कम साइड इफेक्ट</li>
<li> लंबे समय तक कैंसर से छुटकारे की संभावना</li>
<li> कैंसर की पुनरावृत्ति को रोकने में मदद</li>
<li> वृद्ध और कमजोर रोगियों के लिए भी उपयुक्त विकल्प</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 11 May 2025 13:24:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>चेचक की वैक्सीन मंकी पॉक्स के लिए भी कारगर</title>
                                    <description><![CDATA[ भारत में अभी मंकी पॉक्स मरीज नहीं मिले लेकिन सरकार इस बीमारी को लेकर नई गाइड लाइन तैयार कर रही है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/smallpox-vaccine-also-effective-for-monkeypox/article-10258"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/101.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोरोना से पीछा छूटा नहीं कि मंकी पॉक्स नाम की बीमारी पैर पसारने लगी है। अब तक 11 से अधिक देशों में इसके मरीज मिल चुके है। भारत में अभी इसके मरीज नहीं मिले लेकिन सरकार इस बीमारी को लेकर नई गाइड लाइन तैयार कर रही है। इस बीमारी में बच्चों को सबसे ज्यादा खतरा है कारण कि अभी तक बच्चों के लिए वैक्सीन नहीं है। इसलिए सावधानी ज्यादा जरूरी है। कोटा के डॉक्टरों का कहना है कि मंकी पॉक्स एक छुआछूत की बीमारी है। इसमें सावधानी रखना जरूरी है। वर्ल्ड हेल्थ सिक्योरिटी एजेंसी डब्ल्यूएचओ का कहना है कि अब तक11 लोगों में इसका संक्रमण पाया गया है। सीडीसी के  अनुसार चेचक की वैक्सीन भी मंकी पॉक्स के संक्रमण पर असरदार साबित होती है। इस दुर्लभ बीमारी से बचने के लिए अमेरिका के फूड एंड ड्रग एसोसिएशन एफडीए ने 2019 में जिनीओस  नाम की वैक्सीन को मंजूरी दी थी। इसे यूरोपियन मेडिसिन एजेंसी ने 2013 में ही अप्रूव कर दिया था। हालांकि, वैक्सीन को 18 साल से ज्यादा उम्र के लोगों पर ही इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसे में बच्चों का विशेष ध्यान रखने की डॉक्टर सलाह दे रहे है। <br /><br /><strong>मंकी पॉक्स बीमारी ये दिखाई दे तो हो जाए सावधान</strong><br />मंकी पॉक्स में चेहरे पर एक तरह के दाने उभरने लगते हैं, जो शरीर के दूसरे हिस्सों में भी फैल सकते हैं। मंकी पॉक्स में चेहरे पर एक तरह के दाने उभरने लगते हैं, जो शरीर के दूसरे हिस्सों में भी फैल सकते हैं। डब्ल्यूएचओं के मुताबिक, मंकी पॉक्स के शुरुआती लक्षणों में बुखार, सिर दर्द, मांसपेशियों में दर्द, कमर दर्द, कंपकंपी छूटना, थकान और सूजी हुई ग्रंथियां शामिल हैं। इसके बाद चेहरे पर एक तरह के दाने उभरने लगते हैं, जो शरीर के दूसरे हिस्सों में भी फैल सकते हैं। संक्रमण के दौरान यह दाने कई बदलावों से गुजरते हैं और आखिर में पपड़ी बनकर गिर जाते हैं।<br /><br /><strong>ये रखनी होगी सावधानी</strong><br />अभी 11 देशों में मंकी पॉक्स के मामले आए है।  जिसमें यूरोप, आॅस्ट्रेलिया और कनाडा से बिना किसी मौत के रिपोर्ट संक्रमित मिले है। भारत में मंकी पॉक्स की रिपोर्ट नहीं हुई है, लेकिन नए मामलों के साथ विभिन्न देशों से पता लगाया जा रहा है कि भारत में इस बीमारी के होने की संभावना है इंकार नहीं किया जा सकता। दुनिया भर में जो मामले सामने आए हैं, वे दोनों के कारण हैं स्थानीय संचरण और अफ्रीकी देशों की यात्रा के कारण भी हो सकता है।  सर्तकता के  रूप में एनसीडीसी, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने कई सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यों की पहचान की है । भारत से संदिग्ध मामलों की रिपोर्ट होने की स्थिति के अनुसार कार्र्य किया जाएगा। पिछले 21 दिनों में किसी ऐसे देश की यात्रा की हो या जिसने हाल ही विदेश की यात्रा की हो मंकीपॉक्स के पुष्ट  या संदिग्ध मामले वाले देश से लौटे लोगों से संपर्क में सावधानी रखनी होगी। <br /><br /><strong>इनका कहना</strong><br />सरकार की ओर से मंकी पॉक्स को लेकर गाइड लाइन तैयार की जा रही है। अभी सावधानी रखने की आवश्यकता है।  मंकी पॉक्स की वैक्सीन है। विदेश यात्रा कर आए लोगों को अपने स्वास्थ्य की जांच करा लेनी चाहिए। <br /><strong>- डॉ. विजय सरदाना, प्राचार्य मेडिकल कॉलेज</strong> <br /><br /><strong>चेचक वायरस परिवार का सदस्य मंकी पॉक्स</strong><br />मंकी पॉक्स का वायरस स्मॉल पॉक्स यानी चेचक के वायरस के परिवार का ही सदस्य है। यह बीमारी मंकी पॉक्स वायरस के कारण होती है। यह इन्फेक्शन ज्यादा गंभीर नहीं है और इसके फैलने की दर भी काफी कम है। फिलहाल मंकी पॉक्स मध्य और पश्चिम अफ्रीकी देशों के कुछ इलाकों में पाया गया है। इसकी दो मुख्य स्ट्रेंस भी हैं- पश्चिम अफ्रीकी और मध्य अफ्रीकी। हालांकि भारत में इसका केस नहीं आया इसलिए चिंता नहीं है। बच्चों को चेचक के टीके लगे हुए लेकिन इस बीमारी से सावधान रहने की आवश्यकता भी है। <br /><strong>-डॉ. गोपी किशन शर्मा, उप अधीक्षक व शिशुरोग विशेषज्ञ</strong><br /><br /><strong>18 वर्ष के लिए वैक्सीन, बच्चों को बीमारी से बचाना जरूरी</strong> <br />यह बीमारी 1970 में पहली बार एक कैद किए गए बंदर में पाई गई थी, जिसके बाद यह 10 अफ्रीकी देशों में फैल गई थी। 2003 में पहली बार अमेरिका में इसके मामले सामने आए थे। 2017 में नाइजीरिया में मंकी पॉक्स का सबसे बड़ा आउटब्रेक हुआ था, जिसके 75 प्रतिशत मरीज पुरुष थे। ब्रिटेन में इसके मामले पहली बार 2018 में सामने आए थे। मंकी पॉक्स संक्रमित व्यक्ति के करीब जाने से फैलता है। यह वायरस मरीज के घाव से निकलकर आंख, नाक और मुंह के जरिए शरीर में प्रवेश करता है। यह संक्रमित बंदर, गिलहरी या मरीज के संपर्क में आए बिस्तर और कपड़ों से भी फैल सकता है। अभी 18 वर्ष से अधिक आयु के लिए जिनीओस  नाम की वैक्सीन बनी है।  हालांकि चेचक की वैक्सीन इसमें 85 प्रतिशत कारगर रही है। बच्चों का विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है। बच्चों के लिए वैक्सीन नहीं है।<br /><strong>- डॉ. अभिमन्यु शर्मा, टीकारण व जांच प्रभारी</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 May 2022 12:19:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कोविशील्ड वैक्सीन दूसरे डोज के बाद सिर्फ तीन महीने ही प्रभावी</title>
                                    <description><![CDATA[ताजा स्टडी ने बढ़ाई चिंता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%80%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%A1-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%A8-%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%A1%E0%A5%8B%E0%A4%9C-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AB-%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%A8-%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%80/article-3423"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-12/covidshild.jpg" alt=""></a><br /><p>लंदन। कोविशील्ड वैक्सीन के प्रभाव को लेकर की गई ताजा स्टडी ने भारत समेत कई देशों की चिंताएं बढ़ा दी है। प्रसिद्ध सांइस जर्नल द लांसेट में प्रकाशित एक स्टडी में दावा किया है कि ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका के कोविड वैक्सीन की दो खुराक लेने के तीन महीने बाद इससे मिलने वाली सुरक्षा घट जाती है। ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका वैक्सीन को ही भारत में कोविशील्ड के नाम से जाना जाता है। भारत समेत कई देशों के लिए इस वैक्सीन का उत्पादन सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया करती है। स्टडी में बताया गया है कि ब्राजील और स्कॉटलैंड से मिले डेटा के आधार पर निकाले गए रिजल्ट से पता चलता है कि एस्ट्राजेनेका वैक्सीन लगवा चुके लोगों को गंभीर रोग से बचाने के लिए बूस्टर खुराक की जरूरत है। शोधकतार्ओं ने एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की दोनों डोज ले चुके स्कॉटलैंड में 20 लाख लोगों और ब्राजील में 4.2 करोड़ लोगों से जुड़े आंकड़े का विश्लेषण किया।</p>
<p><strong><br /> अस्पताल में भर्ती होने और मौत की गुंजाइश पांच गुनी ज्यादा</strong><br /> शोधकतार्ओं ने बताया कि स्कॉटलैंड में दूसरी डोज लेने के दो हफ्ते बाद की तुलना में करीब पांच महीने बाद शरीर में मौजूद एंटीवायरस की जांच पड़ताल की। जिसके बाद उन्हें पता चला कि दोनों डोज लेने के करीब पांच महीने बाद कोरोना वायरस संक्रमण के चलते अस्पताल में भर्ती होने या मौत होने की गुंजाइश पांच गुना बढ़ गई। उन्होंने यह भी बताया कि वैक्सीन की क्षमता में पहली बार कमी दोनों डोज लगने के करीब तीन महीने बाद दिखाई दी। ऐसी स्थिति में दूसरी खुराक लेने के दो हफ्तों की तुलना में अस्पताल में भर्ती होने और मौत का खतरा भी दोगुना पाया गया। स्कॉटलैंड और ब्राजील के शोधकतार्ओं ने पाया कि दूसरी खुराक के बाद महज चार महीने पर अस्पताल में भर्ती होने की संभावना और मौत का खतरा तीन गुना बढ़ गया। अध्ययनकतार्ओं के मुताबिक, इसका मतलब है कि प्रभाव क्षमता में कमी टीके का प्रभाव घटने और वायरस के स्वरूपों के प्रभाव के चलते आई।</p>
<p><strong><br /> वैक्सीन की ताकत कम होने से वैज्ञानिक भी परेशान</strong><br /> यूनिवसिर्टी ऑफ एडिनबर्ग,यूके के प्रोफेसर अजीज शेख ने कहा कि महामारी से लड़ने में टीका एक महत्वपूर्ण उपाय है, लेकिन उसकी प्रभाव क्षमता का कम होना चिंता का विषय है। शेख ने कहा कि ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका टीके की प्रभाव क्षमता कम पड़ने की शुरूआत होने का पता लगने से सरकारों के लिए बूस्टर खुराक का कार्यक्रम तैयार करना संभव होगा, जिससे अधिकतम सुरक्षा बरकरार रखना सुनिश्चित हो पाएगा। स्टडी कर रही टीम ने स्कॉटलैंड और ब्राजील के बीच आंकड़ों की तुलना भी की क्योंकि दोनों देशों में दो खुराक के बीच 12 हफ्ते का एक समान अंतराल है। हालांकि, अध्ययन अवधि के दौरान दोनों देशों में कोरोना वायरस का प्रबल स्वरूप अलग-अलग था। स्कॉटलैंड में डेल्टा जबकि ब्राजील में गामा स्वरूप था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Dec 2021 12:15:58 +0530</pubDate>
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                <title>चार जिलों में कोई भी अफसर ने राजनेताओं के प्रोटोकॉल में रहेंगे और नहीं मंच साझा करेंगे</title>
                                    <description><![CDATA[24 दिसम्बर तक प्रभावी रहेगी आचार संहिता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/61c073cc4e9e9/article-3385"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-12/secretariat_630x4003.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर।प्रदेश के जिन चार जिलों में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव हो रहे हैं, उनके लिए राज्य निर्वाचन आयोग ने सोमवार को आचार संहिता संबंधी दिशा-निर्देश जारी कर दिए। आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि बारां, करौली, कोटा और श्रीगंगानगर जिलों में 24 दिसम्बर तक कोई भी अधिकारी किसी भी जन प्रतिनिधि के प्रोटोकॉल नहीं रहेगा और नहीं उनके साथ मंच साझा करेगा।</p>
<p>आयोग की मुख्य निर्वाचन अधिकारी चित्र गुप्ता ने कहा है कि इन चारों जिलों में पंचायत समिति और जिला परिषद सदस्यों के निर्वाचन के लिए आचार संहिता 24 दिसम्बर तक प्रभावी है। इसलिए आपका विश्वास-हमारा प्रयास जिला स्तरीय कार्यक्रम में निर्वाचनों से जुड़ा कोई भी अधिकारी मंत्री, विधायक एवं किसी भी दल के राजनीतिज्ञ के प्रोटोकॉल में उपस्थित नहीं हो सकता, ना ही मंच साझा कर सकता है। निर्वाचन से जुड़े अधिकारियों की इन कार्यक्रमों में भागीदारी को आचार संहिता का उल्लंघन माना जाएगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Dec 2021 18:22:03 +0530</pubDate>
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