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                <title>Madras High Court - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>Madras High Court RSS Feed</description>
                
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                <title>करूर भगदड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, पीड़ित परिवारों को अनुकंपा नौकरी देने पर मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक</title>
                                    <description><![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें करूर भगदड़ त्रासदी के पीड़ितों के परिवारों को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले को रद्द कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए मामले में आगे की सुनवाई तय की है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/supreme-courts-big-decision-in-karur-stampede-case-stay-on/article-162930"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/superme-court.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें करूर भगदड़ त्रासदी के पीड़ितों के परिवारों को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले को रद्द कर दिया गया था। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली राज्य सरकार और अन्य की याचिका पर नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश के अमल पर अंतरिम रोक लगा दी है।</p>
<p>तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी ने संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत करूर भगदड़ पीड़ितों के परिवारों को अनुकंपा नियुक्ति देने के राज्य के फैसले का बचाव किया। सिंघवी ने मद्रास उच्च न्यायालय के दखल पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार की नीति को किसी ने चुनौती नहीं दी थी। वहीं, एक राजनीतिक दल की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ए. वेलन ने हितों के टकराव का आरोप लगाते हुए राज्य सरकार की इस नीति का विरोध किया।</p>
<p>सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति पारदीवाला ने इस आपत्ति पर सवाल उठाया और पूछा कि सरकार किसी पीड़ित के जीवित आश्रितों को रोजगार क्यों नहीं दे सकती, खासकर तब जब मृतक ही परिवार का एकमात्र कमाने वाला व्यक्ति रहा हो। इसके साथ ही, न्यायमूर्ति चंद्रन ने इस मामले में राजनीति को बीच में लाने से बचने की चेतावनी दी। उल्लेखनीय है कि इससे पहले मद्रास उच्च न्यायालय ने इन नियुक्तियों को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि ये संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करती हैं। उच्च न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की थी कि इस तरह के फैसले से भविष्य में ऐसे दावों की बाढ़ आ सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 18:24:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>अभिनेता राजकुमार अपहरण मामला: मद्रास हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा, वीरप्पन गिरोह के सदस्य होने का था संदेह</title>
                                    <description><![CDATA[मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा कन्नड़ अभिनेता राजकुमार के 2000 में हुए अपहरण मामले में वीरप्पन गिरोह के नौ संदिग्ध सदस्यों को बरी करने के फैसले की पुष्टि। अदालत ने अभियोजन पक्ष की विसंगतियों और एफआईआर में देरी को माना आधार। दशकों पुराने विवादित मामले पर कानूनी मुहर। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/actor-rajkumar-kidnapping-case-madras-high-court-upheld-lower-court/article-144665"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/actor-rajkumar-case.png" alt=""></a><br /><p>चेन्नई। मद्रास उच्च न्यायालय ने 2018 के निचली अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें कुख्यात वन दस्यु वीरप्पन के गिरोह के नौ सदस्यों को बरी कर दिया गया था। अदालत ने 2019 में राज्य सरकार द्वारा दायर उस अपील को खारिज कर दिया, जो 2018 में नौ व्यक्तियों को बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ दायर की गई थी। इन व्यक्तियों पर वन दस्यु वीरप्पन के गिरोह का सदस्य होने का संदेह था।</p>
<p>इन्हीं लोगों पर आरोप था कि उन्होंने 30 जुलाई 2000 को कन्नड़ सिनेमा के महान अभिनेता राजकुमार और तीन अन्य लोगों का अपहरण किया था तथा उन्हें 108 दिनों तक बंधक बनाकर रखा, जिसके बाद उन्हें रिहा किया गया था।</p>
<p>ये आरोपी 2000 में कन्नड़ अभिनेता राजकुमार और तीन अन्य के अपहरण मामले में संदिग्ध थे। अभिनेता का 30 जुलाई 2000 को तमिलनाडु के इरोड जिले के थलवाड़ी तालुक स्थित गजानूर गांव में स्थित उनके फार्महाउस से अपहरण कर लिया गया था और 108 दिनों तक बंधक बनाए रखने के बाद रिहा किया गया था। </p>
<p>उच्च न्यायालय द्वारा जिन नौ आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले की पुष्टि की गई है। उनके नाम एस. मारन उर्फ सेंगुट्टवन उर्फ मणिवन्नन उर्फ मुल्लैवलवन उर्फ कन्नैयन, एस. गोविंदराज उर्फ मेगननाथन उर्फ सभा उर्फ इनियन उर्फ परंजोथि उर्फ राजू, डी. एंड्रिल उर्फ एलुमलाई उर्फ परंजोथि, आर. सेल्वम उर्फ सत्य उर्फ राजू, के.अमृतलिंगम उर्फ लिंगम उर्फ चेलझियन, बसुवन्ना, आर. नागराज,  एस. पुट्टुसामी और एस. राम उर्फ कलमंडीपुरम राम हैं। कुल मिलाकर पुलिस ने 10 आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र (चार्जशीट) दायर किया था लेकिन उनमें से एक सी. मल्लू, की सुनवाई पूरी होने से पहले ही मृत्यु हो गई। शेष आरोपियों को निचली अदालत ने हत्या के प्रयास, अवैध हथियार रखने सहित अन्य आरोपों से बरी कर दिया था।</p>
<p>तमिलनाडु पुलिस द्वारा 2019 में दायर अपील को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति पी. वेलमुरुगन और न्यायमूर्ति एम. जोतिरामन की खंडपीठ ने 25 सितंबर 2018 को गोबीचेट्टीपलायम स्थित तृतीय अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय द्वारा पारित बरी आदेश की पुष्टि की। उच्च न्यायालय ने कहा कि सत्र न्यायालय के सुविचारित फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है। न्यायालय ने उल्लेख किया कि अपहरण की प्राथमिकी (एफआईआर) घटना के लगभग 24 घंटे बाद दर्ज की गयी थी और वह भी एक ग्राम प्रशासनिक अधिकारी (वीएओ) की शिकायत के आधार पर, जो प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। </p>
<p>वीएओ ने बताया था कि उसे घटना की जानकारी आम जनता से मिली थी, जबकि अभियोजन पक्ष के अनुसार अभिनेता और अन्य लोगों का अपहरण कई लोगों की मौजूदगी में हुआ था। पीठ ने यह भी नोट किया कि प्राथमिकी में 30 जुलाई 2000 से संशोधित कर 31 जुलाई 2000 की गयी थी और आरोपियों द्वारा आपराधिक साजिश रचने का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं था। वीएओ ने भी अपने बयान में किसी साजिश का जिक्र नहीं किया था। </p>
<p>न्यायालय ने अभियोजन पक्ष की कई विसंगतियां पाई थीं और इन्हीं आधार पर नौ आरोपियों को बरी किया था, जिसे उच्च न्यायालय ने बरकरार रखा। उल्लेखनीय है कि चंदन तस्करी के लिए कुख्यात वीरप्पन को विशेष कार्य बल (एसटीएफ) ने ऑपरेशन कुकून के तहत मुठभेड़ में मार गिराया था। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Feb 2026 14:06:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>मद्रास हाई कोर्ट का बड़ा सुझाव: लिव-इन पार्टनर को सुरक्षा के लिए मिले 'पत्नी' का दर्जा</title>
                                    <description><![CDATA[मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने हाल ही में कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए गंधर्व विवाह की पुरानी अवधारणा के तहत पत्नी का दर्जा दिया जाना चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/madras-high-courts-big-suggestion-is-that-live-in-partners-should/article-140347"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/mdaras-hc.png" alt=""></a><br /><p>मदुरै। मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने लिव-इन रिलेशनशिप में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। जस्टिस एस. श्रीमति ने कहा कि लिव-इन पार्टनर को 'गंधर्व विवाह' की प्राचीन अवधारणा के तहत 'पत्नी' का दर्जा दिया जाना चाहिए, ताकि उन्हें कानूनी सुरक्षा और अधिकार मिल सकें।</p>
<p><strong>केस और कोर्ट का कड़ा रुख</strong></p>
<p><strong>अदालत ने तिरुचिरापल्ली के एक व्यक्ति की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए यह बात कही। आरोपी पर शादी का झांसा देकर यौन शोषण का आरोप है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत धोखे से बनाए गए शारीरिक संबंध एक गंभीर अपराध हैं।</strong></p>
<p>आधुनिकता और कानूनी सुरक्षा</p>
<p>जस्टिस श्रीमति ने कहा कि कई पुरुष आधुनिकता के नाम पर लिव-इन का विकल्प चुनते हैं, लेकिन रिश्ता टूटने पर महिलाओं के चरित्र पर सवाल उठाते हैं। उन्होंने जोर दिया कि लिव-इन में रहने वाली महिलाएं अक्सर 'कल्चरल शॉक' और असुरक्षा का शिकार होती हैं क्योंकि उनके पास विवाहित महिलाओं जैसे कानूनी अधिकार नहीं होते। कोर्ट के अनुसार, पुरुषों को कानून का सामना करना ही होगा यदि वे शादी के वादे से मुकरते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 21 Jan 2026 14:04:13 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर दीपम जलाने के एकल न्यायाधीश के आदेश को बरकरार रखा</title>
                                    <description><![CDATA[मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर दीप जलाने के आदेश को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की सुरक्षा संबंधी दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने इसे धार्मिक परंपरा और सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक बताया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/madras-high-court-upholds-single-judges-order-to-burn-deepam/article-138638"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/madras.png" alt=""></a><br /><p>चेन्नई। मद्रास उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने मंगलवार को थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम जलाने के एकल न्यायाधीश के आदेश को बरकरार रखा, जिसके बारे में दावा किया गया था कि वह मदुरै शहर में सिकंदर दरगाह के पास एक दीपथून है।</p>
<p>न्यायमूर्ति जी जयचंद्रन और केके रामकृष्णन की खंडपीठ ने कानून-व्यवस्था के लिए खतरे और सांप्रदायिक अशांति के बारे में राज्य की दलील को एक काल्पनिक बताते हुए उसकी अपील खारिज करते हुए कहा कि एकल न्यायाधीश का आदेश 'रेस जूडीकेटा' के तहत नहीं आता है क्योंकि इस मुद्दे पर पहले के मुकदमों में फैसला नहीं हुआ था। ये अपीलें न्यायाधीश जीआर स्वामीनाथन के पिछले एक दिसंबर के आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई थीं। यह आदेश एक हिंदू कार्यकर्ता की याचिका पर दिया गया था। इस याचिका में मंदिर अधिकारियों को निर्देश दिया गया था कि वे दरगाह के पास पत्थर के खंभे और ऊंचे पिल्लयार मंदिर में पारंपरिक दीप मंडप पर भी दीप जलाएं। यह मंदिर पहाड़ी की तलहटी में मशहूर मुरुगन मंदिर के ठीक ऊपर है। </p>
<p>जब आदेश का पालन नहीं किया गया तो न्यायाधीश ने एक अवमानना याचिका पर कार्रवाई करते हुए याचिकाकर्ता को सीआईएसएफ की निगरानी के साथ दीप जलाने का निर्देश दिया। पुलिस ने कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए इसे भी रोक दिया और भाजपा नेताओं और कुछ हिंदू कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। सरकार इस बात से नाराज थी कि यह आदेश एक दशक पहले एक खंडपीठ के फैसले के खिलाफ था।</p>
<p>न्यायाधीशों ने कहा,''आगम शास्त्र पत्थर के खंभे पर दीप जलाने से नहीं रोकता है और मामले में अपील करने वाले, जिनमें राज्य के अधिकारी और हजरत सुल्तान सिकंदर बादुशा अवुलिया दरगाह शामिल हैं, इसके उलट''पक्के सबूत देने में नाकाम रहे हैं'और इस दलील को खारिज कर दिया कि दीप जलाने से शांति व्यवस्था में गड़बड़ी होगी। खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा ''मजेदार बात है और इस पर  यकीन करना मुश्किल है कि समर्थ  राज्य सरकार  को डर है कि देवस्थानम के प्रतिनिधियों को साल में किसी खास दिन पत्थर के खंभे पर दीया जलाने की इजाजत देने से गड़बड़ी होगी। कानून और व्यवस्था का डर राज्य के अधिकारियों की कल्पना है ताकि वे एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ शक के दायरे में ला सकेंज्ऐसा तभी हो सकता है जब ऐसी गड़बड़ी खुद राज्य द्वारा प्रायोजित की गई हो।</p>
<p>खंडपीठ ने कहा''हम प्रार्थना करते हैं कि कोई भी सरकार अपना राजनीतिक एजेंडा पूरा करने के लिए उस स्तर न गिरे'और कहा कि जिला प्रशासन को इसे मध्यस्थों के जरिए समुदायों के बीच पुल बनाने के मौके के तौर पर लेना चाहिए था। खंडपीठ ने पहाड़ी पर पुराने स्मारकों के बचाव के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की तय शर्तों के मुताबिक पत्थर के खंभे पर दीप जलाने के बारे में दिशा निर्देश भी जारी किए। सिर्फ अधिकारियों को ही दीप जलाने की रस्म पूरी करनी चाहिए और लोगों को कम संख्या में इजाजत दी जा सकती है। न्यायाधीशों ने फैसला सुनाया कि व्यवस्था और सुरक्षा पक्की करने के लिए, यह कार्यक्रम सीधे जिला कलेक्टर की देखरेख में होना चाहिए।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 06 Jan 2026 18:59:23 +0530</pubDate>
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                <title>16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया बैन : मद्रास हाईकोर्ट सुझाव का संयुक्त अभिभावक संघ ने किया समर्थन, सुरक्षित भविष्य की दिशा में ऐतिहासिक कदम</title>
                                    <description><![CDATA[मद्रास हाईकोर्ट द्वारा 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के सुझाव का संयुक्त अभिभावक संघ ने स्वागत करते हुए इसे बच्चों के सुरक्षित भविष्य की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया। संघ ने कहा कि आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया बच्चों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है, जो उनके मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/joint-parents-association-supports-madras-high-court-suggestion-to-ban/article-137444"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/1200-x-600-px)-(1200-x-600-px)-(3)8.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। मद्रास हाईकोर्ट द्वारा 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के सुझाव का संयुक्त अभिभावक संघ ने स्वागत करते हुए इसे बच्चों के सुरक्षित भविष्य की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया है। संघ ने कहा कि आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया बच्चों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है, जो उनके मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। संयुक्त अभिभावक संघ का मानना है कि सोशल मीडिया के माध्यम से बच्चों में हिंसा, अश्लीलता, साइबर बुलिंग, डिजिटल एडिक्शन और आत्मघाती प्रवृत्तियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। यही नहीं, इसी प्लेटफॉर्म के जरिए हैकिंग और अन्य साइबर अपराधों को भी बढ़ावा मिल रहा है। संघ ने बताया कि वह पहले भी केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर 16 वर्ष तक के बच्चों पर सोशल मीडिया बैन के लिए सख्त कानून बनाने की मांग कर चुका है।</p>
<p>संघ के राजस्थान प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि सोशल मीडिया आज ड्रग्स की तरह काम कर रहा है, जिसकी लत बच्चों के भविष्य को अंधकार में धकेल रही है। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि यदि 2047 तक ‘विकसित भारत’ का सपना साकार करना है, तो बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए सोशल मीडिया पर सख्त प्रतिबंध तुरंत लागू किया जाना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 27 Dec 2025 15:55:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur PS]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मद्रास हाईकोर्ट का फैसला, पासपोर्ट आवेदन के लिए महिला को पति के हस्ताक्षर की जरूरत नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[पासपोर्ट के लिए आवेदन करते समय पत्नी को अपने पति की अनुमति और उसके हस्ताक्षर की आवश्यकता आवश्यक नहीं है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/wife-does-not-require-husbands-permission-for-passport-application-madras/article-118055"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-06/rtr4oer-(3)1.png" alt=""></a><br /><p>चेन्नई। मद्रास हाईकोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में कहा कि पासपोर्ट के लिए महिला को पति की अनुमति या हस्ताक्षर की जरूरत नहीं है। अदालत ने इसे महिला की स्वतंत्रता के खिलाफ और पुरुष प्रधान सोच करार दिया। मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि किसी महिला को पासपोर्ट के लिए आवेदन करने से पहले अपने पति की अनुमति लेने या उसके हस्ताक्षर करवाने की जरूरत नहीं है। जस्टिस एन आनंद वेंकटेश ने यह फैसला हाल ही में रेवती नाम की महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। रेवती ने अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की थी कि वे उनके पति के हस्ताक्षर की अनिवार्यता के बिना ही एक नया पासपोर्ट तय समय में जारी करें।</p>
<p>याचिकाकर्ता का मामला यह था कि उसकी शादी 2023 में हुई थी, लेकिन पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद शुरू हो गया था। इसी वजह से उसके पति ने स्थानीय अदालत में तलाक की अर्जी दी थी, जो अभी विचाराधीन है। रेवती ने इस साल अप्रैल में क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय (आरपीओ) में पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था। जब उसका आवेदन आगे नहीं बढ़ा तो उसने जानकारी ली, जिसके बाद उसे बताया गया कि उसे फॉर्म-जे में पति के हस्ताक्षर लेने होंगे, तभी पासपोर्ट आवेदन पर आगे कार्रवाई की जाएगी।</p>
<p>आरपीओ ने यह भी कहा कि चूंकि पति-पत्नी के बीच कोर्ट में विवाद चल रहा है, इसलिए यह हस्ताक्षर जरूरी हैं। इन्हीं परिस्थितियों में रेवती ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। जज ने अपने फैसले में कहा कि कोर्ट के विचार में यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता द्वारा दिया गया पासपोर्ट आवेदन की स्वतंत्र रूप से प्रक्रिया की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी पत्नी को पासपोर्ट के लिए आवेदन करने से पहले पति की अनुमति या उसके हस्ताक्षर की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।</p>
<p>जज ने कहा कि आरपीओ की यह मांग यह दिखाती है कि हमारे समाज में विवाहित महिलाओं को अब भी पति की संपत्ति की तरह देखा जाता है। यह चौंकाने वाली बात है कि पासपोर्ट ऑफिस पति की अनुमति और एक विशेष फॉर्म में उसके हस्ताक्षर पर ही पासपोर्ट की प्रक्रिया आगे बढ़ा रहा था। उन्होंने कहा कि जब पति-पत्नी के बीच रिश्ते पहले से ही बिगड़े हुए हैं, तब आरपीओ की ओर से पति के हस्ताक्षर की मांग करना याचिकाकर्ता से असंभव चीज की उम्मीद करने जैसा है।</p>
<p>जज ने कहा कि विवाह के बाद महिला अपनी पहचान नहीं खोती और वह पति की अनुमति या हस्ताक्षर के बिना भी पासपोर्ट के लिए आवेदन कर सकती है। उन्होंने कहा कि पति की अनुमति लेने की यह प्रथा महिला सशक्तिकरण की ओर बढ़ रहे समाज के लिए सही संकेत नहीं देती और यह पुरुष प्रधान मानसिकता का प्रतीक है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Jun 2025 10:38:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>श्रीराम होंगे राजस्थान हाईकोर्ट के सीजे : राजस्थान हाईकोर्ट के सीजे एमएम श्रीवास्तव को मद्रास हाईकोर्ट में सीजे नियुक्त करने की सिफारिश </title>
                                    <description><![CDATA[बतौर वकील उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, उपभोक्ता आयोगों, सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और सेवा कर अपीलीय न्यायाधिकरण, प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण और कंपनी कानून बोर्ड में सफलतापूवर्क वकालत की।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/shriram-will-be-recommended-to-appoint-cj-mm-srivastava-of/article-115678"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-05/rtroer44.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। जस्टिस केआर श्रीराम राजस्थान हाईकोर्ट के नए मुख्य न्यायाधीश होंगे। वहीं मौजूदा सीजे एमएम श्रीवास्तव को मद्रास हाईकोर्ट का सीजे बनाया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने हाल ही में देश के चार हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों का तबादला करने की सिफारिश की है। कॉलेजियम की सिफारिश के अनुसार मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केआर श्रीराम को राजस्थान हाईकोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट के सीजे एमएम श्रीवास्तव को मद्रास हाईकोर्ट में सीजे नियुक्त करने की सिफारिश की गई है। 28 सितंबर, 1963 को मुंबई में जन्मे सीजे केआर श्रीराम ने मुंबई विश्वविद्यालय से एलएलबी करने के बाद लंदन से समुद्री विज्ञान में एलएलएम किया। वहीं उन्होंने जुलाई 1986 को महाराष्ट्र एवं गोवा बार कौंसिल में वकील के रूप में पंजीकृत हुए। बतौर वकील उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, उपभोक्ता आयोगों, सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और सेवा कर अपीलीय न्यायाधिकरण, प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण और कंपनी कानून बोर्ड में सफलतापूवर्क वकालत की।</p>
<p>वहीं उन्हें 21 जून, 2013 को बॉम्बे हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया और 2 मार्च, 2016 को इस पद पर स्थाई नियुक्ति दी गई। जस्टिस श्रीराम को 21 सितंबर 2024 को मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद पर पदोन्नत किया गया। दूसरी ओर सीजे श्रीराम सामाजिक कार्यों में सक्रिय रूप से शामिल होते थे। उन्होंने कई सालों तक एक एनजीओ में उपाध्यक्ष के तौर पर काम किया। यह एनजीओ दिवंगत लोगों के लिए अंतिम संस्कार और श्राद्ध करने की व्यवस्था करता है। इसके अलावा उन्हें गोल्फ खेलना भी पसंद है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 29 May 2025 09:35:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur PS]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ईडी ने सभी हदें पार की : मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक, सुप्रीम कोर्ट ने कहा: आप किसी निगम पर छापेमारी कैसे कर सकते हैं? </title>
                                    <description><![CDATA[ उच्चतम न्यायालय ने शराब दुकानों के लाइसेंस जारी करने से संबंधित कथित भ्रष्टाचार के एक मामले में तमिलनाडु राज्य विपणन निगम के खिलाफ धन शोधन जांच पर रोक लगाई]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/the-ed-has-stayed-the-order-of-the-madras-high/article-115075"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-05/news-(1)38.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने शराब दुकानों के लाइसेंस जारी करने से संबंधित कथित भ्रष्टाचार के एक मामले में तमिलनाडु राज्य विपणन निगम के खिलाफ धन शोधन जांच पर रोक लगाते हुए गुरुवार को कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) संविधान का उल्लंघन करके सारी सीमाएं लांघ रहा है। </p>
<p>मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की याचिका पर कथित 1,000 करोड़ रुपए के घोटाले में ईडी जांच की अनुमति देने वाले मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी। पीठ ने केंद्रीय एजेंसी  की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू से कहा कि ईडी सारी हदें पार कर रही है। आपका कार्यालय किसी निगम पर छापेमारी कैसे कर सकता है? आप देश के संघीय ढांचे का पूरी तरह उल्लंघन कर रहे हैं। शीर्ष न्यायालय ने ईडी को नोटिस जारी करते हुए कहा कि वह इस मामले की अगली सुनवाई गर्मी की छुट्टियों के बाद करेगा। </p>
<p><strong>यह है मामला</strong><br />तमिलनाडु सरकार ने ईडी ओर से सरकारी शराब खुदरा विक्रेता तमिलनाडु राज्य विपणन निगम के परिसरों में जांच के दौरान की गई छापेमारी की वैधता को चुनौती दी थी। मद्रास उच्च न्यायालय ने 23 अप्रैल, 2025 को राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी थी और ईडी की कार्रवाई को हरी झंडी दे दी थी। उच्च न्यायालय ने ईडी को धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत कार्रवाई जारी रखने की अनुमति दी। उच्च न्यायालय ने निगम द्वारा लगाए गए आरोपों को खारिज कर दिया था कि चेन्नई में तलाशी के दौरान ईडी ने उसके कर्मचारियों और अधिकारियों को परेशान किया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 23 May 2025 11:47:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>SC ने चुनाव आयोग के खिलाफ मद्रास HC की टिप्पणियों को बताया कठोर, कहा- भाषा संवेदनशील हो</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणियों को कठोर करार दिया है, लेकिन इसे हटाने से यह कहते हुए इनकार कर दिया, क्योंकि यह न्यायिक आदेश का हिस्सा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही कोर्ट की टिप्पणियों की रिपोर्टिंग करने से मीडिया को रोकने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि फैसलों और बेंच की भाषा संविधान के मुताबिक संवेदनशील होनी चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/sc-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%9A%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B5-%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AB-%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B8-hc-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9F%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%A3%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%AC%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%A0%E0%A5%8B%E0%A4%B0--%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE--%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A4%B6%E0%A5%80%E0%A4%B2-%E0%A4%B9%E0%A5%8B/article-274"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-05/supreme_court.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणियों को कठोर करार दिया है, लेकिन इसे हटाने से यह कहते हुए इनकार कर दिया, क्योंकि यह न्यायिक आदेश का हिस्सा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही कोर्ट की टिप्पणियों की रिपोर्टिंग करने से मीडिया को रोकने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि फैसलों और बेंच की भाषा संविधान के मुताबिक संवेदनशील होनी चाहिए। साथ ही कहा कि चुनाव आयोग को ये निश्चित करना चाहिए कि आदेशों का पालन हो। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एम आर शाह की खंडपीठ ने मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी के खिलाफ चुनाव आयोग की याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि हाईकोर्ट की टिप्पणी कठोर जरूर है लेकिन उसे हटाने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि यह टिप्पणी आदेश का हिस्सा नहीं है।<br /> <br /> सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणियों पर कहा कि बिना सोचे-समझे की गई टिप्पणियों की गलत व्याख्या किए जाने की आशंका होती है। कोर्ट ने मीडिया को न्यायिक टिप्पणियों की रिपोर्टिंग करने से रोकने से इनकार करते हुए कहा कि मीडिया को अदालत की कार्यवाही की रिपोर्टिंग करने का अधिकार है। मीडिया को सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों की रिपोर्टिंग करने से रोका नहीं जा सकता। खंडपीठ ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 19 न केवल आम नागरिक को, बल्कि मीडिया को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को टिप्पणियां करने और मीडिया को टिप्पणियों की रिपोर्टिंग करने से रोकना प्रतिगामी कदम होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 06 May 2021 17:41:35 +0530</pubDate>
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