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                <title>biological park - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>उम्मेदगंज पक्षी विहार, अभेड़ा तालाब,जोहराबाई का तालाब व बायोलॉजिकल पार्क बना बर्ड्स वॉचिंग का डेस्टिनेशन</title>
                                    <description><![CDATA[हर साल सर्दियों में देश-विदेश से आते हैं 10 हजार से अधिक पक्षी।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/ummedganj-bird-sanctuary--abheda-talab--johrabai-s-talab--and-biological-park-have-become-bird-watching-destinations/article-127337"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/_4500-px)-(6)3.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहर के 4 वैटलैंड न केवल बर्ड्स वॉचिंग के डेस्टिनेशन बन रहे बल्कि अनुसंधान का केंद्र भी बन रहे हैं। वर्तमान में यहां 200 प्रजातियों के 6 हजार से ज्यादा पक्षियों का बसेरा बसा है। दुनियाभर से हर साल हजारों की तादाद में परिंदे प्रवास पर आ रहे हैं। जिनमें से कई पक्षी तो ऐसे हैं, जो पिछले पांच सालों में पहली बार नजर आए हैं। वन्यजीव विभाग कोटा की ओर से शहरी सीमा के वैटलैंड्स को पक्षियों के अनुकूल हैबीटाट के रूप में विकसित किए गए हैं। जिनमें अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क, अभेड़ा तालाब, जोहरा बाई का तालाब और उम्मेदगंज पक्षी विहार शामिल हैं। इन वैटलैंड पर गत फरवरी माह में हुई गणना में विभिन्न प्रजातियों के 10 हजार से अधिक पक्षी काउंट किए गए थे। जबकि, यह संख्या मात्र उम्मेदगंज पक्षी विहार सहित तीन वैटलैंड की है। जबकि, शहरी क्षेत्र में दो दर्जन से अधिक वैटलैंड हैं। जहां बड़ी संख्या में पक्षियों का प्रवास रहता है। </p>
<p><strong>अनुसंधान का केंद्र बन रहे वैटलैंड </strong><br />वन्यजीव विभाग कोटा के अधीन उम्मेदगंज पक्षी विहार परिंदों की पहली पसंद बना हुआ है। यहां वाइल्ड लाइफ डिपार्टमेंट की ओर से गत वर्ष से अब तक कई डवलपमेंट कार्य करवाए गए। अवैध फिशिंग के खिलाफ ताबड़तोड़ कार्रवाई व संदिग्ध घुसपैठ पर पूर्णत: प्रतिबंध लगाए जाने पेड़ों की अवैध कटाई रुकी। इससे पक्षियों का हैबीटाट  न केवल सुरक्षित हुआ बल्कि भोजन की भी पर्याप्त उपलब्धता भी हो गई। अवैध गतिविधियां थमने से परिंदों का कुनबा आबाद हुआ। वर्तमान में यहां पेड़ों पर करीब 80 प्रजातियों के 3 हजार पक्षियों की कॉलोनी बसी है। </p>
<p><strong>यूरोप से लेकर एशिया तक से आते हैं हजारों परिंदे </strong><br />वन्यजीव विभाग के उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर ने बताया कि बर्ड्स रिसर्च की दृष्टि से शहर के वैटलैंड अनुसंधान के केंद्र बन चुके हैं। गत 30 व 31 जनवरी को मिड विंटर वाटर फोल पापुलेशन ऐस्टीमेशन-2025 के तहत पक्षियों की गणना करवाई गई थी। जिसमें जोराबाई का तालाब, अभेड़ा  व सालकिया तालाब, बायोलॉजिकल पार्क व उम्मेदगंज पक्षी विहार को मिलाकर करीब 8000 से ज्यादा पक्षी नजर आए थे। इनमें यूरोप से लेकर एशिया तक के पक्षी शामिल हैं। हर साल दुनियाभर से इन वैटलैंड पर हजारों पक्षी आते हैं। कोटा विवि सहित प्रदेश के विभिन्न जिलों से बर्ड्स रिसर्चर आते हैं। </p>
<p><strong>पक्षियों की भूमिका पर बढ़ रहा शोध </strong><br />डीएफओ भटनागर कहते हैं, उम्मेदगंज पक्षी विहार, अभेड़ा तालाब, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क, सालकिया व जोहराबाई का तालाब, किशोर सागर, गैपरानाथ, गरड़िया महादेव सहित शहर के विभिन्न वैटलैंड बर्ड वॉचिंग का डेस्टिनेशन बन चुके हैं। यहां की फिजा विभिन्न प्रजातियों के देसी-विदेशी पक्षियों की  चहचहाट से गुलजार रहती है। कोटा विश्वविद्यालय, महाविद्यालयों  व कई शिक्षण संस्थानों से विद्यार्थी और स्कॉलर्स ईको सिस्टम में पक्षियों की भूमिका, उनके व्यवहार, हैबीटाट, विशेषताएं, सिमटते वनों व वैटलेंड से पक्षियों पर पड़ने वाले नकारात्मक असर पर शोध कर रहे हैं। </p>
<p><strong>यह पक्षी आते हैं नजर</strong><br />उम्मेदगंज पक्षी विहार सहित अन्य वैटलैंड पर कोमन पोचार्ड, क्रेस्टेड पोचर्ड, टफ्टेड पोचार्ड, लिटिल गीब, लिटिल रिंग फ्लॉवर, रफ, कॉमन टील, ब्लू थ्रोट,  विस्किर्ड टर्न, रिवर टर्न, कॉमन कूट, गेडवेल, गागीर्नी, इंडियन कर्सर,कॉटन पिग्मी गीज, बुटेड ईगल,ग्रेटर स्पॉटेड ईगल, टावनी ईगल, मार्स हैरियर, इंडियन वाइट आई, ब्लू फ्लाई कैचर, हनी बजार्ड, ग्रे हेडेड कैनरीफ्लाई कैचर,ओस्प्रे, मार्स हैरियर, इंडियन वाइट आई सहित विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों की आबादी बसी हुई है। जिन्हें देखने बड़ी संख्या में बड्स वॉचर्स यहां आते हैं। </p>
<p><strong>चंबल की कराइयों में बसी गिद्दों की कॉलोनी </strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी बताते हैं, शहर के तलाबों पर हर साल विभिन्न प्रजातियों के पक्षी हजारों मील का सफर तय कर कोटा आते हैं। सर्दी में भोजन, रहवास के लिए तथा गर्मी में वापस माइग्रेशन में चली जाते है। वहीं, गैपरनाथ व गराड़िया महादेव वन क्षेत्र में चंबल की कराइयों के बीच गिद्दों की साउथ ईस्ट एशिया की सबसे बड़ी कॉलोनी बसी है। मोटे अनुमान के तौर पर चंबल में करीब 200 इंडियन वल्चर है।  </p>
<p><strong>इन देशों से आते हैं पक्षी</strong><br />बर्ड्स रिसर्चर हर्षित शर्मा ने बताया कि कोटा के विभिन्न इलाकों में स्थित वैटलैंड पर इन दिनों देसी विदेशी पक्षियों का कलरव गूंज रहा है। आलनिया, उम्मेदगंज, अभेड़ा, उदपुरिया, बरधा डेम, गिरधरपुरा, बोराबांस का तालाब, सोखिया तालाब, किशोर सागर तालाब, उम्मेदगंज, अभेड़ा सहित कई इलाके परिंदों की चहचहाट से गुलजार हैं।  यह पक्षी यूरोप, सेंट्रल एशिया, साइबेरिया, हिमालय, उत्तरी अमेरिका, चीन, रूस, कजाकिस्तान सहित यूरोपियन व एशियाई देशों से आते हैं। शोधार्थियों के लिए शहर के वैटलेंड ज्ञान का खजाना हैं।  </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Sep 2025 17:48:17 +0530</pubDate>
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                <title>बायोलॉजिकल पार्क में बनेगा 80 लाख का सुरक्षा कवच</title>
                                    <description><![CDATA[सौलर फेंसिंग से कवर होगा पूरा बायोलॉजिकल पार्क।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/a-security-cover-of-80-lakhs-will-be-built-in-the-biological-park/article-126229"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/untitled-design-(3)4.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क को अब मांसाहारी जानवरों के हमले से सुरक्षित बनाया जाएगा। इसके लिए 80 लाख की लागत से सौलर फेंसिंग का सुरक्षा कवच बनाया जाएगा। जिसमें शाकाहारी वन्यजीव व रात को ड्यूटी पर तैनात वनकर्मियों की जान महफूज रह सकेगी। पार्क की सम्पूर्ण दीवार सौलर फेंसिंग रूपी लक्ष्मण रेखा से कवर्ड होगी, जिसमें विद्युत करंट प्रवाहित होता रहेगा। यदि, लेपर्ड छलांग लगाकर दीवार पार करने की कोशिश करेगा तो सौलर फेंसिंग, करंट का झटका देगी। इलेक्ट्रिक शॉक लगने से पैंथर बायोलॉजिकल पार्क के अंदर घुस नहीं पाएंगे। हालांकि, इस करंट से वाइल्ड एनिमल को नुकसान नहीं होगा।  दरअसल, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के चारों ओर घना जंगल है। जहां पैंथर, भालू , जरख, भेड़िया सहित कई खूंखार मांसाहारी जानवरों का मूवमेंट रहता है। ऐसे में वह पार्क की 10 फीट ऊंची सुरक्षा दीवार को फांद अंदर घुस जाते हैं। जिससे शाकाहारी वन्यजीवों व रात को गश्त करते वनकर्मियों पर हमले का खतरा बना रहता है। गत वर्ष ऐसी घटना घट चुकी है। वन्यजीव विभाग ने सौलर फेंसिंग लगवाने के लिए प्रस्ताव बनाकर उच्चाधिकारियों को भेज दिए हैं। </p>
<p><strong>5 हजार मीटर सुरक्षा दीवार पर लगेगी सौलर फेंसिंग </strong><br />वन्यजीव विभाग के उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर ने बताया कि अभेड़ा बायोलॉजिकल की सुरक्षा दीवार 5 हजार रनिंग मीटर लंबी है। वर्तमान में यह दीवार 10 फीट ऊंची है, जिस पर करीब 4 फीट ऊंची सौलर फेंसिंग लगाई जाएगी, जो सौलर से कनेक्ट रहेगी और चार्ज होने के साथ उसमें निर्धारित मात्रा में विद्युत करंट प्रवाहित होता रहेगा। इससे बाहर का कोई भी वाइल्ड एनिमल खास तौर पर लेपर्ड दीवार फांद पार्क के अंदर नहीं आ सकेगा। जिससे शाकाहारी वन्यजीव व गश्त करते वनकर्मियों पर मांसाहारी जानवरों के हमले का खतरा टल सकेगा। इस सौलर फेंसिंग से पूरा बायोलॉजिकल पार्क कवर्ड रहेगा। इसमें करीब 80 लाख रुपए का खर्चा आएगा। इसके प्रस्ताव बनाकर उच्चाधिकारियों को भेज दिए हैं।  </p>
<p><strong>पिंजरे में घुसकर लेपर्ड ने किया था ब्लैक बक का शिकार</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में वर्ष 2023 में 29 अप्रेल की रात को लेपर्ड ने बाहर से बायोलॉजिकल पार्क की 10 फीट ऊंची दीवार फांद परिसर में घुस गया था और ब्लैक बक के एनक्लोजर में घुसकर हमला कर दिया। शाकाहारी वन्यजीवों के नाइट शेल्टर तक पहुंच गया और ब्लैक बक के शावक का शिकार कर लिया। घटना का पता अगले दिन सुबह गश्त कर रहे कर्मचारियों की सूचना पर लगा। घटना के बाद से वनकर्मियों में भी सुरक्षा को लेकर चिंता व्याप्त हो गई थी। ऐसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए लेपर्ड प्रूफ सौलर फेंसिंग लगवाना बेहद जरूरी है। इसलिए सैकंड फेस के निर्माण कार्यों में सौलर फेंसिंग करवाए जाना भी शामिल किया है। </p>
<p><strong>रात को गश्त करते वनकर्मियों पर हमले का रहता खतरा </strong><br />नाम न छापने की शर्त पर वनकर्मियों ने बताया कि बायोलॉजिकल पार्क के आसपास खुला वनक्षेत्र है। जिसमें खूंखार मांसाहारी जानवरों का मूवमेंट रहता है।  चूंकी, वन्यजीव रात को ही सक्रिय होते हैं और शिकार की तलाश में जंगल से बाहर निकलते हैं। ऐसे में भालू, जरख, भेड़िया और पैंथरों का बायोलॉजिकल पार्क में प्रवेश करने का अंदेशा लगा रहता है। जिससे रात को पार्क में गश्त करने वाले वनकर्मियों व होम गार्ड पर मांसाहारी वन्यजीवों के हमले का खतरा रहता है। ऐसे में सुरक्षा दीवारों पर सौलर फेंसिंग होने से शाकाहारी वन्यजीवों के साथ गश्त करने वाले कर्मचारी भी अनजाने खतरों से महफूज हो सकेंगे। </p>
<p><strong>इधर, 50 लाख से लगेगा इलेक्ट्रिक शवदाह गृह</strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में सैकंड फेज के निर्माण कार्यों में इलेक्ट्रिक शवदाह गृह भी बनवाया जाना शामिल है। इससे मृत जानवरों के शव का सुगमता से डिस्पोजल हो सकेगा। अब तक शव का अंतिम संस्कार करने के लिए जलाया जाता है, जिससे लकड़ियों की खपत बढ़ती है और धुएं से हवा में प्रदूÑषण भी बढ़ता है। ऐसे में  इलेक्ट्रिक शवदाह गृह बनने से लकड़ियों की खपत रुकेगी और वायुमंडल में प्रदूषण भी नहीं फैलेगा। इसके अलावा इंफेक्शन, बैक्ट्रेरिया व संक्रमण का खतरा भी टलेगा। ऐसे में 50 लाख की लागत से इलेक्ट्रिक शवदाह गृह बनाया जाएगा। वन्यजीव विभाग द्वारा तैयार किए प्रस्ताव में इसे भी शामिल किया गया है। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />बजट घोषणा के तहत अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के द्वितीय चरण के निर्माण के लिए  25 करोड़ रुपए का प्रस्ताव बनाकर मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक व मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को भेजे गए हैं। प्रस्ताव में बायोलॉजिकल पार्क को लेपर्ड पू्रफ सौलर फेंसिंग से कवर्ड किया जाना शामिल किया है। वहीं, 50  लाख की लागत से इलेक्ट्रिक शवदाह गृह भी बनाया जाना है। बजट मिलने पर अधूरे प्रस्तावित कार्यों का निर्माण कार्य पूर्ण हो सकेंगे। पर्यटकों की सुविधाओं में विस्तार के प्रयास लगातार जारी है। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, उप वन संरक्षक वन्यजीव विभाग कोटा </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Sep 2025 17:30:00 +0530</pubDate>
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                <title>मांसाहारी डक्टिंग की कूलिंग में तो ऐमू कूलर की हवा में मस्त, दोपहर को एनक्लोजरों में हो रहा पानी का छिड़काव </title>
                                    <description><![CDATA[तापमान बढ़ने के साथ ही सूर्य की तल्खी भी तेज हो गई। इंसान ही नहीं जानवर भी धूप की तपिश से बेहाल हैं]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/carnivores-are-enjoying-the-cooling-of-ducting-while-emus-are-enjoying-the-air-of-coolers/article-114039"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-05/news-(2)24.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। तापमान बढ़ने के साथ ही सूर्य की तल्खी भी तेज हो गई। इंसान ही नहीं जानवर भी धूप की तपिश से बेहाल हैं। गर्म हवाओं के थपेड़ों व चिलचिलाती धूप से बेजुबानों को बचाने के लिए अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में विशेष इंतजाम किए गए हैं। मांसाहारी वन्यजीव डक्टिंग की कूलिंग में तो शाकाहारी पानी के फव्वारों और कूलर की ठंडी हवा में मस्त हो रहे हैं। दरअसल, बायोलॉजिकल पार्क में सभी मांसाहारी वन्यजीवों के नाइट शेल्टर में डक्टिंग की व्यवस्था की गई है, ताकि ठंडी हवा पिंजरों में लगातार बनी रहे। वहीं, आॅस्ट्रेलियन पक्षी ऐमू के लिए कूलर लगाया गया है। इसके अलावा हिरण व नीलगाय के  एनक्लोजर को ग्रीन नेट से कवर किया गया है। वहीं, घास की छतरियां बनाई गई हैं। ताकि, एनक्लोजर में छाया बनी रहे। </p>
<p><strong>डक्टिंग से चिल्ड हो रहे नाइट शेल्टर </strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में लॉयनेस, बाघिन, पैंथर के पिंजरों में डक्टिंग शुरू कर दी गई है। दोपहर को हीट वेव चलने व तपन बढ़ने पर एनिमल नाइट शेल्टर या कराल में चले जाते हैं, जहां डक्टिंग की ठंडी हवा में आराम करते हैं। इसी दौरान वे कभी नाइट शेल्टर में तो कभी डिस्प्ले एरिया में अपनी गुफाओं में बैठे रहते हैं। इसके अलावा एनक्लोजर में स्प्रिंगलर लगवाए गए हैं। फव्वारों से गिरता पानी हवा के साथ वन्यजीवों को ठंडक पहुंचा रहा है। लॉयनेस सुहासिनी दिनभर शेड की छांव के नीचे तो महक फव्वारों के आसपास ही बैठे नजर आ रहे हैं। हालांकि सभी वन्यजीवों के एनक्लोजर में दो-दो गुफा बनी हुई है, जहां अक्सर दोपहर को आराम फरमाते हैं।  </p>
<p><strong>पानी में अळखेलियां कर रहे भेडिए </strong><br />भेड़िए दोपहर व शाम के समय एनक्लोजर में बने पानी के होद में अळखेलियां करते नजर आते हैं। दोपहर को अधिकतर समय नाइट शेल्टरों में ही बैठे रहते हैं। जब पर्यटक आते हैं तो उनकी चहल कदमी की आवाज सुन बाहर डिस्पले एरिया में दौड़े चले आते हैं। इनके एनक्लोजर की जालियों में ग्रीन नेट भी बांधी गई है ताकि सूरज की सीधे किरणों से राहत मिल सके। वहीं, एनक्लोजर में 6-7 फोगर्स लगे हुए हैं, जिनसे दिनभर पानी का फव्वारे चलते हैं।</p>
<p><strong>कूलर की ठंडी हवा खा रहा ऐमू</strong><br />दुनिया के दूसरे सबसे बड़े पक्षी ऐमू के लिए कूलर की व्यवस्था की गई है। वहीं, एनक्लोजर पर ग्रीन नेट भी बांधी गई है। साथ ही पानी के फव्वारे चलाकर एनक्लोजर को ठंडा किया जाता है। वनकर्मियों ने बताया कि वर्तमान में यहां 4 ऐमू बर्ड्स हैं, जिनके नाइट शेल्टर के बाहर कूलर लगाए गए हैं। उनके पिंजरे कूलर की ठंडी हवा से चिल्ड रहते हैं।  वहीं, डिस्पले एरिया में दिनभर पानी का फव्वारे चलते हैं।</p>
<p><strong>खिड़की में बैठ ठंडी हवा खा रहा भालू  </strong><br />भालू के एनक्लोजर में बड़े पेड़-पौधे नहीं होने से दोपहर को छांव नहीं रहती। हालांकि, शेड बना हुआ है लेकिन धूप की सीधी किरणों के कारण गर्मी से राहत नहीं मिल पाती। छायादार जगह नहीं होने से भालू दिनभर खिड़की के बाहर बैठा रहता है। हालांकि, उसके नाइट शेल्टर में डक्टिंग की सुविधा है। लेकिन, वह दोपहर को डिस्पले एरिया में उछलकूद करते हंै। दिनभर डक्टिंग चलने से पिंजरें कूल रहते हैं। वह खिड़की के बाहर बैठकर ठंडी हवा के साथ बाहर का नजारा देखता है।  </p>
<p><strong>शाकाहारियों के पिंजरों में बनवाई घास की छतरियां</strong><br />शाकाहारी वन्यजीवों चीतल, ब्लैक बक, नील गाय सहित अन्य जानवरों के एनक्लोजर मे 15 गुना 20 फीट चौड़ी घास की छतरियां बनवाई गई है। साथ ही स्प्रिंगलर भी लगवाए हैं। वहीं, पिंजरों पर ग्रीन नेट लगाकर गर्मी से बचाव के इंतजाम किए हैं। इसके अलावा नाइट शेल्टरों में पराल बिछाई गई है। दोपहर को चीतल, चिंकारा, ब्लैक बक शेड के नीचे बैठे रहते हैं। इनके पिंजरों में बड़ी-बड़ी खिड़कियां हैं, जिनपर खसखस की टाटियां भी लगाई गई है। इन टाटियों पर पानी का छिड़काव किया जाता है ताकि हवा के साथ उन्हें ठंडक का अहसास होता रहे। </p>
<p><strong>पथरीला क्षेत्र, पारा रहता अधिक</strong><br />बायोलॉजिक पार्क में तैनात वनकर्मियों ने बताया कि पथरीला क्षेत्र होने के कारण पार्क का तापमान अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक होता है। जयपुर नाहरगढ़ की तुलना में अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में तापमान भी अधिक होता है। क्योंकि, यहां वन्यजीवों के पिंजरों के आसपास बड़े पेड़-पौधे नहीं है। यहां  मई-जनू में पारा 45 डिग्री सेल्सीयस के करीब पहुंच जाता है। ऐसे में वन्यजीवों को गर्मी व लू के थपेड़ों से बचाव के लिए विशेष इंतजाम किए जाते हैं।  </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में वन्यजीवों का विशेष ध्यान रखा जाता है। गर्मी से बचाव के सभी जरूरी प्रबंध किए जा चुके हैं। मांसाहारी वन्यजीवों के नाइट शेल्टरों में डक्टिंग शुरू कर दी गई है। वहीं, एनक्लोजर में स्प्रिंगलर-फोगर्स लगवाए गए हैं। शाकाहारी वन्यजीवों के बाड़े में ग्रीन नेट व घास की छतरियां लगवाई गई है। पानी का नियमित छिड़काव किया जाता है।  वहीं, ऐमू के लिए कूलर लगाया गया है। इसके अलावा दिन में उनके एनक्लोजर में पानी का छिड़काव किया जा रहा है। वन्यजीवों की सुरक्षा व सहुलियत के लिए पुख्ता बंदोबस्त किए गए हैं।<br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 13 May 2025 17:51:49 +0530</pubDate>
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                <title>जल्द दिखेगा दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा पक्षी </title>
                                    <description><![CDATA[ऐमू को फॉक्स के एनक्लोजर में रखा जाएगा। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/world-s-second-largest-bird-will-be-seen-soon/article-97791"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/jld-dikhega-duniya-ka-dusra-sbse-bda-pakshi...kota-news-16-12-2024.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटावासियों को जल्द ही दुनिया के दूसरे सबसे बड़े नॉन फ्लाई बर्ड यानी(उड़ने में अक्षम) पक्षी एमू की झलक देखने को मिल सकेगी। वन्यजीव विभाग को जोधपुर के माछिया बायोलॉजिकल पार्क से 4 ऐमू पक्षी लाने की परमिशन मिल चुकी है। ऐसे में अगले हफ्ते तक ऐमु को कोटा बायोलॉजिकल पार्क में शिफ्ट किया जाएगा। इसके साथ ही नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क जयपुर से 5 चिंकारा लाने की भी स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है। ऐसे में विशालकाय पक्षी के आने से पर्यटयन का थमा दौर फिर से पटरी पर आ सकेगा। दरअसल, नर टाइगर व लॉयन सहित बड़े एनीमल्स नहीं होने से पर्यटकों का अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के प्रति रुझान घटा है। ऐसे में ऐमु के आने से पर्यटकों की संख्या में इजाफा होगा, जिससे सरकार के राजस्व में वृद्धि हो सकेगी। </p>
<p><strong>फॉक्स के एनक्लोजर में रहेंगे ऐमू</strong><br />वन्यजीव विभाग कोटा के उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर ने बताया कि अभेड़ा बायलॉजिकल पार्क में जयपुर के नाहरगढ़ से 4 एमू पक्षी व जोधपुर के माछिया से 5 चिंकारा लाए जाएंगे। ऐमू को फॉक्स के एनक्लोजर में रखा जाएगा। जिसकी तैयारियां भी कर ली गई है। अब सीजेडए से शिफ्टिंग की परमिशन लेनी है, जो आसानी से मिल जाएगी। शिफ्टिंग में सबसे बड़ी रुकावट एनीमल देने वाले नाहरगढ़ व माछिया बायोलॉजिकल से स्वीकृति मिलने की थी, जो दूर हो चुकी है। ऐसे में अब शिफ्टिंग का रास्ता साफ हो चुका है। अगले सप्ताह तक ऐमू व चिंकारा अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में ले आएंगे। </p>
<p><strong>गत वर्ष हो गई थी 4 एमू की मृत्यु</strong><br />अगस्त 2019 में चार एमू जोधपुर के माछिया बायोलॉजिकल पार्क से कोटा चिड़िया घर में लाए गए थे, जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बने रहे। जिन्हें गत वर्ष 6 जून 2022 को अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में शिफ्ट किया गया था। लेकिन, कुछ समय बाद एक-एक कर चारों पक्षियों की मौत हो गई थी। इसके बाद से कोटावासियों को एमू देखने को नहीं मिले।</p>
<p><strong>4 से 5 फीट ऊंचा होता है ऐमू</strong><br />वन्यजीव विशेषज्ञ एएच जैदी बताते हैं, एमू मूल रूप से आॅस्ट्रेलिया का पक्षी है। यह करीब चार से पांच फीट ऊंचा होता है। यह विश्व के नहीं उड़ने वाले पक्षियों में दूसरा सबसे बड़ा पक्षी है। यह शाकाहारी व कीटाहारी पक्षी है। इसे दाल, दलिया, बाजरा, चना चूरी, चावल व हरी सब्जी खासी पसंद है।  ऊंचाई में नर की अपेक्षा मादा बड़ी होती है। मादा को दोस्त बनाने के लिए इन्हें प्रतिद्वंद्वी नर से झगड़ा करना होता है। अपने मजबूत पैरों से गड्ढ़ा खोदकर आशियाना बनाता है। नर एमू भूरा तो मादा मटमैली होती है। इनकी चोंच मजबूत व लंबी होती है।</p>
<p><strong>नर एमू करता है बच्चे का पालन-पोषण  </strong><br />उन्होंने बताया कि नर ऐमू की सबसे बड़ी खासियत बच्चे के प्रति पिता की तरह जिम्मेदारी निभाना है। मादा पक्षी के एक बार अंडे देने के बाद अंडे को सहेजना से लेकर बच्चे निकलने तक देखभाल करने की सारी जिम्मेदारी नर एमू ही निभाता है। इसके अलावा बच्चों का पालन-पोषण भी पिता की तरह यही करता है।  </p>
<p>जयपुर के नाहरगढ़ व जोधपुर के माछिया बायोलॉजिकल पार्क से 4 ऐमू व 5 चिंकारा लाने की परमिशन मिल चुकी है। ऐसे में अगले सप्ताह तक दोनों एनिमल्स व बर्ड्स कोटा ले आएंगे। इसके अलावा अन्य बड़े एनिमल्स भी लाने की कोशिश लगातार जारी है।<br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 Dec 2024 17:35:46 +0530</pubDate>
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                <title>अब भोपाल पर टिकी कोटा की उम्मीदें</title>
                                    <description><![CDATA[कोटा वन्यजीव विभाग ने मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक व सीजेडए को लिखा पत्र। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/now-kota-s-hopes-are-pinned-on-bhopal/article-97789"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/257rtrer33.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में युवा बाघ-बाघिन का जोड़ा लाने की कवायद तेज हो गई है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य  वन्यजीव प्रतिपालक व भोपाल चिड़िया घर प्रशासन को पत्र भेजा जा चुका है। अब भोपाल जू प्रशासन की स्वीकृति का इंतजार है। भोपाल की रजामंदी मिलने के साथ ही शिफ्टिंग का रास्ता भी साफ हो जाएगा। हालांकि, कोटा वाइल्ड लाइफ डिपार्टमेंट स्वीकृति मिलने की उम्मीद जता रहा है। गौरतलब है कि अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में बाघ नाहर की मौत व लॉयन नहीं होने से पार्क के राजस्व पर विपरीत असर पड़ा। ऐसे में वन्यजीव विभाग बड़े एनिमल लाने की तैयारी में जुटा है। </p>
<p><strong>4 से 8 वर्ष के बाघ-बाघिन लाना प्राथमिकता</strong><br />वन्यजीव विभाग के डीएफओ अनुराग भटनागर ने बताया कि भोपाल चिड़ियाघर में अच्छी संख्या में बाघ-बाघिन हैं। वहां से कम उम्र का ही जोड़ा लाना प्राथमिकता है। हमारी कोशिश है कि 4 से 8 वर्ष के बीच आयु के बाघ-बाघिन लाने की है। ताकि, ब्रिडिंग होने से बायोलॉजिकल पार्क में इनकी संख्या में इजाफा हो सके और भविष्य में यहां बाघों का कुनबा पनप सके। इस संबंध में मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को पत्र लिखा जा चुका है। भोपाल चिड़ियाघर के अधिकारियों से भी सम्पर्क किया गया है। </p>
<p><strong>सज्जनगढ़ ने लॉयन देने से किया इंकार  </strong><br />डीएफओ भटनागर ने कहा, उदयपुर के सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क से लॉयन लाया जाना था लेकिन उनके यहां लॉयन सफारी शुरू किए जाने के कारण लॉयन देने से मना दिया। वहीं, सज्जनगढ़ में गुजरात से लॉयन का जोड़ा लाया जा चुका है। ऐसे में एक लॉयन अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क को मिले, इसके लिए मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को फिर से पत्र लिखा गया है। पार्क के विकास के लिए हर संभव कोशिश की जा रही है। </p>
<p><strong>समय पर चेत जाते तो मिल जाता लॉयन</strong><br />जानकारी के अनुसार अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में लॉयनेस व लॉयन का जोड़ा लाने की तत्कालीन मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक जयपुर से स्वीकृति दिसम्बर 2022 में ही मिल गई थी। इसके लिए कोटा से वन्यजीव डीएफओ उदयपुर से पत्राचार भी किया गया था। उस समय वहां से हाईब्रिड लॉयन अली कोटा को दिए जाने की हरी झंडी भी मिल गई थी। लेकिन, कोटा वन्यजीव विभाग के तत्कालीन अधिकारी स्वीकृति मिलने के दो साल बाद भी केंद्रिय चिड़ियाघर प्राधिकरण से शिफ्टिंग की स्वीकृति नहीं ले सके। जिसकी वजह से शिफ्टिंग में अनावश्यक देरी होती रही। इसका नतीजा यह रहा कि वर्तमान में सज्जनगढ़ में अब लॉयन सफारी शुरू किए जाने की तैयारी चल रही है। ऐसे में अब उन्होंने कोटा को लॉयन देने में असमर्थता जाहिर कर दी। </p>
<p><strong>लॉयन-टाइगर नहीं होने से घटा राजस्व</strong><br />विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, लॉयन व टाइगर जैसे बड़े एनीमल न होने से अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क की सालाना इनकम पर विपरीत असर पड़ रहा है। जनवरी 2023 से 14 अक्टूबर 2024 तक बायोलॉजिकल पार्क को 63 लाख 25 हजार 82 रुपए का ही राजस्व एकत्रित हॉुआ है। राजस्व का यह आंकड़ा करीब दो साल का है। जबकि, गत वर्ष 12 महीनों में ही राजस्व करीब 48 लाख रुपए था। ऐसे में लॉयन, टाइगर व एमू, फॉक्स जैसे वन्यजीव के अभाव में पर्यटकों का अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के प्रति रुझान कम हो रहा है। जिससे सरकार को होने वाली आय में गिरावट हो रही है। </p>
<p><strong>मगरमच्छ, घड़ियाल आए तो दोगुनी हो आय </strong><br />बायोलॉजिकल पार्क के निर्माण के दौरान 44 एनक्लोजर बनने थे लेकिन प्रथम चरण में मात्र 13 ही बन पाए। जबकि, 31 एनक्लोजर अभी बनने बाकी हैं। जब तक यह एनक्लोजर नहीं बनेंगे तब तक पुराने चिड़ियाघर में मौजूद घड़ियाल, मगरमच्छ, अजगर, बंदर, कछुए, सारस व लव बर्ड्स सहित एक दर्जन से अधिक वन्यजीव बायलॉजिकल पार्क में शिफ्ट नहीं हो पाएंगे। यदि, यह जानवर व पक्षी यहां शिफ्ट किया जाए तो पार्क की कमाई में दोगुना इजाफा होगा। वहीं, पर्यटकों को देखने के लिए ज्यादा एनीमल मिल सकेंगे। </p>
<p><strong>पर्यटक बोले-क्या देखें, बड़े एनिमल तो है ही नहीं</strong><br />विज्ञान नगर निवासी भावेश नागर, कविता नागर, गांधी गृह निवासी मेहमूद भाई ने बताया कि अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में पहले दो टाइगर थे, लेकिन  कुछ महीनों पर वह भी मर गया। जिसके बाद वन अधिकारी कोई बड़ा एनिमल्स नहीं लाए। वहीं, ऐमू पक्षी लाने की सिर्फ बातें ही की जाती है लेकिन लाते नहीं है। इसके अलावा वर्ष 2022 से ही लॉयन लाने की बात कही जा रही है लेकिन अब तक वह भी नहीं आ सका। ऐसे में यहां बड़े एनिमल तो है ही नहीं तो देखने क्या जाएं। सुविधाएं भी आधी-अधूरी हैं। जबकि, टिकट महंगा है। </p>
<p><strong>इनका कहना</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के विकास के लिए लगातार प्रयास जारी हैं। भोपाल चिड़ियाघर से बाघ का एक जोड़ा लाने का प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक  व भोपाल चिड़ियाघर अधिकारियों को पत्र लिखा जा चुका है। साथ ही ऐमू व चिंकारा सहित अन्य एनीमल लाने की परमिशन मिल चुकी है, जो अगले हफ्ते तक कोटा ले आएंगे। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 Dec 2024 15:58:53 +0530</pubDate>
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                <title>पिंजरे से निकल जंगल में लगाई आजादी की छलांग</title>
                                    <description><![CDATA[बाघिन 5 हैक्टेयर के एनक्लोजर में रहकर जंगल के तौर-तरीके सीखेंगी। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/leaped-out-of-the-cage-and-entered-the-jungle-for-freedom/article-97416"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/257rtrer-(3)15.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में पल रही बाघिन टी-114 की मादा शावक को आखिरकार 25 महीने बाद पिंजरे से आजादी मिल ही गई। नर शावक के रामगढ़ शिफ्ट होने के 8 दिन बाद बुधवार को मादा शावक को भी मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के दरा रेंज में सॉफ्ट रिलीज कर दिया गया। यहां बाघिन 5 हैक्टेयर के एनक्लोजर में रहकर जंगल के तौर-तरीके सीखेंगी। साथ ही घात लगाकर शिकार करने की कला व जंगल की चुनौतिपूर्ण परिस्थितियों में खुद को ढाल सकेगी। असल में रिवाइल्डिंग बेहतर तरीके से हो सकेगी। </p>
<p><strong>दोपहर 1 बजे लगाई खुले जंगल में छलांग</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में सुबह 8 बजे से ही शिफ्टिंग को लेकर हलचल तेज हो गई थी। सुबह 9 बजे वन अधिकारी व एनटीसीए द्वारा गठित टीम के सदस्य पिंजरे में पहुंच गए थे। 9 बजकर 15 मिनट पर डॉट लगाकर बाघिन को ट्रैंकुलाइज किया। स्वास्थ्य परीक्षण कर ब्लड व डीएनए सैंपल लिए। साथ ही वजन किया। बाघिन का वजन 160 किलो था। इसके बाद रेडियोकॉर्लर लगाकर 11 बजे मुकुंदरा टाइगर रिजर्व के लिए रवाना कर दिया। दोपहर 1 बजे दरा रेंज पहुंचे और 1.12 मिनट पर बाघिन ने 5 हैक्टेयर के एनक्लोजर में आजादी की छलांग लगाई। </p>
<p><strong>रिवाइल्डिंग केंद्र बनकर उभरेगा मुकुंदरा</strong><br />उन्होंने बताया कि राजस्थान का यह पहला रिवाइल्डिंग का प्रयास है। सफल हुए तो प्रदेश में कोटा रिवाइल्डिंग केंद्र के रूप में उभरकर सामने आएगा।  प्रदेश के अन्य जंगलों में जहां कहीं भी अनाथ शावक होंगे तो भविष्य में उन्हें कोटा में लगाकर रिवाइल्ड किए जा सकेंगे। वनकर्मी व अधिकारी पूरी शिद्दत से सफल रिवाइल्डिंग में जुटे हैं। तत्कालीन सीसीएफ शारदा प्रताप सिंह का विजन शावकों की रिवाइल्डिंग में काफी अहम रहा। </p>
<p><strong>एनक्लोजर में छोड़े 16 चीतल</strong><br />वरिष्ठ वन्यजीव चिकित्सक डॉ. तेजेंद्र सिंह रियाड़ ने बताया कि बाघिन को मुकुंदरा में सॉफ्ट रिलीज कर दिया गया है। बाघिन के आने से पहले ही एनक्लोजर में 16 चीतल छोड़ दिए गए थे। जल्द ही यहां नीलगाय भी छोड़ने की योजना है। वैसे, यह अपने भाई नर बाघ के मुकाबले काफी एक्टिव है। बायोलॉजिकल पार्क में जब इनके सामने शिकार छोड़ते थे तो यही सबसे पहले शिकार तक पहुंचती थी। यदि, बाघिन 50 शिकार सफलतापूर्वक कर लेती है तो हार्ड रिलीज किया जा सकता है। मादा शावक चिकित्सकों की गहन निगरानी में रहेगी। इस दौरान उसके व्यवहार, गतिविधियां, भोजन लेने की मात्रा, घात लगाकर शिकार कर पा रही या नहीं सहित तमाम गतिविधियों पर नजर रखी जाएगी।  </p>
<p><strong>एनक्लोजर में लगे कैमरा ट्रैप </strong><br />दरा रेंज के पांच हैक्टेयर एनक्लोजर को ग्रीन नेट से पूरी तरह से कवर किया गया है। वहीं, जगह-जगह कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं। रेडियोकॉर्लर के सिग्नल व तीन मंजिला वॉच टॉवर से 24 घंटे निगरानी की जा रही है। साथ ही मानव दखल से बिलकुल दूर व जीरो मॉबिलिटी सुनिश्चित की गई है। बाघिन की निगरानी के लिए टीम तैनात कर दी गई है। शिफ्टिंग के दौरान  सीसीएफ रामकरण खैरवा, मुकुंदरा डिसीएफ मूथु एस, आरवीटीआर डीएफओ संजीव शर्मा, डब्ल्यू डब्ल्यूएफ से राजशेखर, वन्यजीव चिकित्सक डॉ, राजीव गर्ग, तेजेंद्र सिंह रियाड़ सहित बायोलॉजिकल पार्क के सहायक वनपाल मनोज शर्मा, सुरेंद्र सैनी, कमल प्रजापति, बुधराम जाट सहित अन्य वनकर्मी मौजूद रहे।</p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />एनटीसीए से मंजूरी मिलने के बाद मादा शावक को मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में शिफ्ट कर दिया गया है। बाघिन टी-114 की मौत के बाद मादा शावक को फरवरी 2023 को रणथम्भौर से अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क शिफ्ट किया गया था। जहां दो साल से रिवाइल्डिंग  की जा रही थी। अब यह सब एडल्ट की श्रेणी में है। एनटीसीए की गाइड लाइन की पालना करते हुए मुकुंदरा में शिफ्ट किया गया है।  <br /><strong>-मूथू एस, डीएफओ मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Dec 2024 15:43:36 +0530</pubDate>
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                <title>बायोलॉजिकल पार्क: हर माह 1 लाख का मिल रहा झटका</title>
                                    <description><![CDATA[इसके बावजूद अब तक सौलर सिस्टम शुरू नहीं हो सका। जबकि, वन्यजीव विभाग बजट की कमी से जूझता रहता है। ऐसे में वर्तमान में पार्क का अप्रेल-मई माह का बिजली का बिल बकाया चल रहा है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/biological-park--getting-a-shock-of-1-lakh-every-month/article-79523"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-05/biological-park-har-mah-ek-lakh-ka-mil-raha-jhataka...kota-news-27.05.2024.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क हर महीने एक लाख रुपए बिजली का बिल करंट झेल रहा है। जबकि, पार्क में 40 किलोवाट का सौलर सिस्टम लगा हुआ है। लेकिन, लेटलतीफी के कारण 4 माह बाद भी शुरू नहीं हो सका। ऐसे में वन्यजीव विभाग को प्रतिमाह 80 हजार से 1 लाख रुपए का बिजली बिल चुकाना पड़ रहा है। यदि, सौलर शुरू हो जाता तो सूरज से बनने वाली बिजली से बायोलॉजिकल पार्क का बिल आधा रह जाता। जिससे विभाग को बजट की बचत हो सकती है।  दरअसल, कैम्पा योजना के तहत बायोलॉजिकल पार्क में 25 लाख की लागत से गत जनवरी माह में 40 किलोवॉट का सौलर सिस्टम लगाया गया था। फाउंडेशन लगने के बाद फरवरी में सौलर प्लेटें भी लगा दी गई। इसके बावजूद अब तक सौलर सिस्टम शुरू नहीं हो सका। जबकि, वन्यजीव विभाग बजट की कमी से जूझता रहता है। ऐसे में वर्तमान में पार्क का अप्रेल-मई माह का बिजली का बिल बकाया चल रहा है। </p>
<p><strong>हर महीने 1 लाख का बिजली बिल</strong><br />वन्यजीव विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क का बिजली बिल प्रतिमाह 1 लाख से अधिक का आता है। सर्दियों की अपेक्षा गर्मियों में खपत अधिक बढ़ जाती है। यहां मांसाहारी वन्यजीवों के 6 एनक्लोजर हैं, जिनके नाइट शेल्टरों में कूलिंग के लिए डक्टिंग चलाई जाती है। इसके अलावा पानी की टंकी भरने सहित अन्य व्यवस्था के लिए नियमित मोटर चलाई जाती है। जिससे बिजली की खपत अधिक रहती है। ऐसे में सालाना बिजली बिल 12 लाख से अधिक पहुंच जाता है, जिसे भरने में विभाग को पसीने आ जाते हैं।</p>
<p><strong>मांसाहारी वन्यजीवों के शेल्टर में चल रहे डक्टिंग </strong><br />इन दिनों जिले में भीषण गर्मी पड़ रही है। जिससे इंसान ही नहीं वन्यजीव भी बेहाल है। ऐसे में बायोलॉजिकल पार्क में मांसाहारी वन्यजीवों के नाइट शेल्टर में गर्मी से बचाव के लिए कूलिंग सिस्टम डक्टिंग चलाई जा रही है। जिससे बिजली की खपत बढ़ रही है। हालांकि, गर्मी से बचाव के लिए डक्टिंग चलाए जाना आवश्यक है।</p>
<p><strong>सालाना 6 लाख की हो सकती बचत </strong><br />राजस्थान रील इलेक्ट्रोनिक्स एंड इंस्टूमेंट लिमिटेड के अशोक कुमार ने बताया कि अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में 40 किलोवाट का सौलर सिस्टम लगाया जा रहा है। एक किलोवाट औसतन 3 से  4 यूनिट बिजली का उत्पादन करता है। ऐसे में चालीस किलोवाट सौलर से प्रतिदिन 160 यूनिट बिजली जनरेट होगी और सालभर में 58 हजार से अधिक यूनिट का उत्पादन होगा। ऐसे में एक यूनिट 10 रुपए चार्ज के हिसाब से बायोलॉजिकल पार्क को 5.84 लाख रुपए की बचत हो सकती है। हालांकि, सौलर से बिजली का उत्पादन सूरज के ताप पर निर्भर करता है। ऐसे में औसतन, विभाग को सालाना बिजली बिल में 6 लाख की बचत होने से 12 लाख का बिल आधा रह जाएगा।</p>
<p><strong>अप्रेल-मई का बकाया चल रहा बिल</strong><br />सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार वर्तमान में अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क का अप्रेल-मई का बिजली बिल बकाया चल रहा है।  बायोलॉजिकल पार्क संचालित हुए करीब दो साल से अधिक समय हो गया है लेकिन इसके मेंटिनेंस को लेकर बायोलॉजिकल पार्क के नाम से एक बार भी बजट नहीं मिला। पार्क के मेंटिनेंस का खर्चा रियासतकालीन चिड़ियाघर के बजट से चल रहा है। ऐसे में यहां सौलर सिस्टम लगने से विभाग को बिजली के बिल में काफी राहत मिल सकेगी। </p>
<p><strong>क्यों शुरू नहीं हो पा रहा सौलर</strong><br />विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, सौलर से बनने वाली बिजली को स्टोर करने के लिए एक मीटर लगता है। उसमें स्टोर हुई बिजली के बदले विद्युत कम्पनी से बिजली मिलती है। इसके लिए नेट मिटरिंग करनी होती है। लेकिन, इस प्रक्रिया पूरी करने के लिए आवश्यक डॉक्यूमेंट की आवश्यकता होती है, जिसकी पूर्ति न हो पाने की वजह से सौलर सिस्टम शुरू नहीं हो पा रहा। हालांकि, इसके लिए फाइल तैयार कर ली गई है। जल्द ही सौलर सिस्टम शुरू किए जाने की संभावना है। </p>
<p><strong>बायोलॉजिकल पार्क में 80 से ज्यादा वन्यजीव</strong><br />बायलॉजिकल पार्क में मांसाहारी व शाकाहारी मिलाकर करीब 80 से ज्यादा वन्यजीव हैं। मांसाहारी में लॉयनेस- 1, बाघ-बाघिन- 2, भेड़िया-4, सियार-5, भालू-2, लेपर्ड-2, जरख-3 है। वहीं, 1 मादा भालू है। इसी तरह शाकाहारी में नीलगाय-12, चिंकारा-5, चितल 27, ब्लैक बक 17 है। यहां एक सांभर भी था, जिसकी गत माह पहले मृत्यु हो गई।</p>
<p><strong>रील कम्पनी को दिए नोटिस</strong><br />राजस्थान इलेक्ट्रोनिक्स एंड इंस्ट्रूमेंशन लिमिटेड (रील) कम्पनी को सौलर शुरू नहीं किए जाने को लेकर दो बार नोटिस चुके हैं लेकिन उनकी तरफ अभी तक जवाब नहीं मिला है। कम्पनी को 31 मार्च तक काम पूरा करना था। लेकिन, अब तक पूरा नहीं किया गया। नेट मिटरिंग के लिए रील कम्पनी को बिजली कम्पनी में फाइल लगानी है, जो अब तक नहीं लगाई गई। हालांकि, सौलर सिस्टम जल्द से जल्द शुरू करवाने की प्रक्रिया की जा रही है। <br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ, वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>
<p>आवश्यक डॉक्यूमेंट नहीं मिल रहे<br />नेट मिटरिंग प्रक्रिया पूरी करने के लिए आवश्यक दस्तावेजों की जरूरत होती है, जो वन्यजीव विभाग की ओर से अभी तक नहीं मिले हैं। इसकी वजह से हमारी फाइल अटकी हुई है। हमारे कर्मचारी विभाग के नयापुरा व अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के चक्कर काट चुके हैं। इसके बावजूद डॉक्यूमेंट नहीं मिल पा रहे। जैसे ही डॉक्यूमेंट मिलेंगे, वैसे ही निजी बिजली कम्पनी में फाइल लगा दी जाएगी।  जहां से अप्रूव्ल मिलते ही सौलर प्लांट शुरू हो जाएगा।  <br /><strong>-अशोक कुमार, कोटा डिविजन इंचार्ज, रील</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 May 2024 16:25:37 +0530</pubDate>
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                <title>हर साल रोया बजट का रोना, मिला तो लौटा दिए 87 लाख </title>
                                    <description><![CDATA[नयापुरा स्थित चिड़ियाघर में रखे पक्षियों की भी शिफ्टिंग हो सकती थी। इससे यहां आने वाले पर्यटकों को बर्ड वॉचिंग का मौका मिलता। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/every-year-we-cried-for-the-budget--when-we-got-it-we-returned-87-lakhs/article-72407"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-03/transfer-(6)6.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। वन्यजीव विभाग हर साल यूं तो बजट का रोना रोता है लेकिन जब मिलता है तो उसका उपयोग करने के बजाए वापस लौटा दिया जाता है। अधिकारियों की लापरवाही से पक्षियों का संसार बसने से पहले ही उजड़ गया। वहीं, रियासतकालीन चिड़ियाघर में पिछले दो साल से नजरबंद एक दर्जन से अधिक पक्षियों के बायोलॉजिकल पार्क में शिफ्ट होने की गुंजाइश भी खत्म हो गई। दरअसल, वित वर्ष 2023-24 के बजट घोषणा में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने राज्य के अधिकतर जिलों में पक्षी घर बनाने की घोषणा की थी। जिसके तहत अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में पक्षी घर बनाया जाना था। इसके लिए गत अगस्त माह में 87 लाख रुपए का बजट भी मिल गया था। लेकिन विभाग ने न तो टेंडर करवाए और न ही स्टीमेट बनवाए और 6 माह तक बजट अपने पास ही पटका रखा। बाद में इसी वर्ष फरवरी माह में सरेंडर करते हुए विभाग ने बजट वापस सरकार को लौटा दिया। </p>
<p><strong>पक्षियों के लिए बनने थे चार एनक्लोजर</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में पक्षी विहार में 4 एनक्लोजर बनाए जाने थे। जिनमें दो बड़े व दो छोटे एनक्लोजर शामिल थे। जिनमें विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों को रखा जाना था। साथ ही शहरभर में रेस्क्यू किए जाने वाले घायल पक्षियों को भी आवास मिलता। इसके अलावा नयापुरा स्थित चिड़ियाघर में रखे पक्षियों की भी इनमें शिफ्टिंग हो सकती थी। इससे यहां आने वाले पर्यटक ों को बडर्् वॉचिंग का मौका मिलता। </p>
<p><strong>पक्षी क्लिनिक भी बनाना था </strong><br />शहरभर से रेस्क्यू होने वाले पक्षियों का इलाज के लिए यहां पक्षी क्लिनिक भी बनाई जानी थी। मकर संक्रांति पर मांजे की चपेट में आने से कई पक्षी जख्मी हो जाते हैं, ऐसे पक्षियों को यहां इलाज किया जाए और उन्हें इन्हीं एनक्लोजर में रखा जाना था। लेकिन, वन्यजीव विभाग के अधिकारियों की लापरवाही से पक्षी घर बन नहीं पाया। </p>
<p><strong>छह महीने तक  पटक रखा बजट</strong><br />गत सरकार ने पक्षी पुर्नवास के नाम से प्रदेश के सभी जिलों को पक्षी घर बनाने के लिए 87 लाख रुपए का बजट जारी किया था। जिसका उद्देश्य रेस्क्यू होने वाले घायल पक्षियों का इलाज कर उनका संरक्षण व पर्नुवास करना था। लेकिन, वन्यजीव विभाग कोटा ने इस दरमियान न तो एस्टीमेट बनाया और न ही टेंडर निकाले। इसके बाद 9 अक्टूबर को विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लगने से जो काम होने थे वो भी नहीं हो पाए। जबकि, इसके उलट वन मंडल ने अनंतपुरा स्थित लवकुश वाटिका में पक्षी विहार का आचार संहिता लगने से पहले ही टेंडर की पक्रिया पूरी कर काम शुरू करवा दिया था। दिसम्बर में सरकार के गठन के बाद भी पक्षी घर निर्माण को लेकर कोई कार्य नहीं किए गए। ऐसे में जनवरी माह में विभाग ने काम करवाने को लेकर हाथ खड़े कर दिए और लाखों का बजट सरेंडर कर दिया। </p>
<p><strong>विशेषज्ञों ने बताए दो प्रमुख कारण </strong><br />विशेषज्ञों का मत है, गत वर्ष अगस्त माह में बजट जारी हुआ था। अधिकारियों ने लापरवाही करते हुए न तो स्टीमेट बनवाया और न ही टेंडर करवाए। अक्टूबर माह में विधानसभा की आचार संहिता लग गई, जो 5 दिसम्बर तक परिणाम जारी होने तक रही। ऐसे में वित्तिय वर्ष भी समाप्ती की ओर बढ़ रहा था। वहीं, नई सरकार के गठन के बाद मुख्यमंत्री ने नए कार्यों के टेंडर व नए काम शुरू करने पर रोक लगा दी थी। ऐसे में वन्यजीव विभाग के सामने वित्तिय वर्ष मार्च तक पक्षी घर का काम करवाना चूनौती बन गया। ऐसे में विभाग ने जनवरी माह में सरकार को 87 लाख का बजट वापस लौटा दिया। </p>
<p>मैंने यहां 22 फरवरी को चार्ज लिया था। आते ही मैंने फाइल चेक की थी, जिसमें सरेंडर लिखा था। हालांकि, स्पष्ट कारण नहीं लिखे थे।<br /><strong>- अनुराग भटनागर, उप वन संरक्षक, वन्यजीव विभाग</strong></p>
<p>पक्षी घर बनाने का प्रपोजल आया था लेकिन क्या बनना है, कैसे बनना है, इसकी स्पष्ट गाइड लाइन नहीं थी। ऐसे में तत्कालीन डीएफओ समझ नहीं पाए। वहीं, प्रदेश के अधितर जिलों में भी बजट सरेंडर किए गए हैं। <br /><strong>- रामकरन खैरवा, मुख्य वन संरक्षक एवं फिल्ड डायरेक्टर, एमएचटीआर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 Mar 2024 15:39:01 +0530</pubDate>
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                <title>असर खबर का - खुश खबरी : आज से बायोलॉजिकल पार्क में दौड़ेंगी गोल्फ कार्ट</title>
                                    <description><![CDATA[पर्यटकों की परेशानियों को लेकर नवज्योति ने लगातार खबरें प्रकाशित गंभीर मुद्दों प्रमुखता से उठाया था। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of-news---good-news--golf-carts-will-run-in-the-biological-park-from-today/article-70515"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-02/asar-khabar-ka---khushkhabri---aaj-s-biological-park-me-daudegi-golf-cart...kota-news-19-02-2024.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। पर्यटकों के लिए खुश खबरी है। पांच महीने से पर्दे में ढकी गोल्फ कार्ट बुधवार से अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में दौड़ती नजर आएगी। लंबे इंतजार के बाद सैलानी 12 लाख की गोल्फ में सवार होकर जंगल का लुफ्त उठाएंगे और वन्यजीवों की दुनिया से रुबरू होंगे। दैनिक नवज्योति के लगातार प्रयासों से पर्यटकों को ई-कार्ट की सौगात मिलेगी। दोपहर तीन बजे मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक रामकरन खैरवा गोल्फ कार्ट का शुभारंभ करेंगे। दरअसल, डीसीएम श्रीराम फर्टिलाइजर कम्पनी ने ईको ट्यूरिज्म बढ़ाने के उद्देश्य से गत वर्ष 10 सितम्बर को वन्यजीव विभाग को 12 लाख की दो गोल्फ कार्ट सौंपी थी, जो 5 माह से धूल खा रही थी। पार्क का ट्रैक साढ़े तीन किमी लंबा होने के कारण पूरा पार्क देखे बिना पर्यटकों को बैरंग लौटना पड़ता था। पर्यटकों की परेशानियों को लेकर नवज्योति ने लगातार खबरें प्रकाशित गंभीर मुद्दों प्रमुखता से उठाया था। जिसकी वजह से ही विभाग को ई-कार्ट संचालित करने की सुध आई। </p>
<p><strong>गोल्फ कार्ट से जंगल की सफारी</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के रैंजर दुर्गेश कहार ने बताया कि बुधवार दोपहर तीन बजे अतिथि सीसीएफ रामकरन खैरवा, डीसीएम कम्पनी प्रतिनिधि, डीएफओ सुनील गुप्ता व एसीएफ राज बिहारी मित्तल की उपस्थिति में 5 सीटर व 7 सीटर दोनों गोल्फ कार्ट का शुभारंभ किया जाएगा। इसी के साथ पर्यटक गोल्फ की सवारी का लुफ्त उठा सकेंगे। </p>
<p><strong>प्रति व्यक्ति 50 रुपए होगा टिकट </strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में गोल्फ कार्ट संचालन के लिए टिकट दर तय कर दी गई है। प्रत्येक व्यक्ति का टिकट 50 रुपए रहेगा। 5 सीटर ई-कार्ट के लिए 250 रुपए तथा 7 सीटर के लिए 350 रुपए शुल्क तय किया गया है। पूरी सीट भरने पर ही पर्यटकों को गोल्फ कार्ट की सवारी करवाई जाएगी। शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों के पिंजरों पर कुछ देर रुक कर पर्यटकों को साइटिंग करवाई जाएगी। यदि, निर्धारित समय के बाद भी पर्यटक रुकते हैं तो उनसे प्रत्येक 15 मिनट के लिए 100 रुपए अलग से चार्ज किए जाएंगे। </p>
<p><strong>शंभुपुरा कमेटी करेगी ई-कार्ट का संचालन</strong><br />ई-कार्ट का संचालन ईको इवलपमेंट कमेटी शंभुपुरा के माध्यम से किया जाएगा। इस कमेटी के माध्यम से दोनों गोल्फ कार्ट चलाई जाएगी। इससे वाली आय कमेटी के बैंक खाते में जमा होगी। जिससे दोनों वाहनों के ड्राइवरों को 8-8 हजार रुपए प्रति माह मानदेय दिया जाएगा। शेष राशि को बायोलॉजिकल पार्क के रख-रखाव में उपयोग ली जाएगी। </p>
<p><strong>बायोलॉजिकल पार्क के राजस्व में होगा इजाफा</strong><br />वन्यजीव विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क को पर्यटकों से प्रतिमाह 3 लाख रुपए का राजस्व प्राप्त होता है। ऐसे में दोनों गोल्फ कार्ट चलने से सरकार को होने वाले राजस्व में इजाफा होगा। </p>
<p><strong>वनकर्मियों को झेलना पड़ता था पर्यटकों का गुस्सा  </strong><br />पार्क में आने वाले पर्यटकों में बच्चे, बुर्जुग और दिव्यांगजन भी होते हैं। जिन्हें साढ़े तीन किमी का लंबा ट्रैक पैदल चलने में परेशानी होती है। ऐसे में वे टिकट लेकर भी बायोलॉजिकल पार्क के पूरे वन्यजीवों को देखे बिना ही वापस बैरंग लौटना पड़ता था। सुविधा होने के बावजूद न मिलने से पर्यटकों का गुस्सा वहां तैनात वनकर्मचारियों को झेलना पड़ता है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 19 Feb 2024 16:45:18 +0530</pubDate>
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                <title>एक हजार किमी का सफर तय कर पहली बार जैविक उद्यान पहुंचा ऊदबिलाव का जोड़ा</title>
                                    <description><![CDATA[दैनिक नवज्योति ने सबसे पहले खबर प्रकाशित कर जानकारी दी थी कि प्रदेश के जैविक उद्यानों में पहली बार जयपुर स्थित नाहरगढ़ जैविक उद्यानों में ऊदबिलाव की उपस्थिति देखने को मिलेगी।  ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/a-pair-of-otters-reached-the-biological-park-for-the-first-time-after-traveling-a-thousand-km/article-53159"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-07/999-photo.jpg" alt=""></a><br /><p>ब्यूरो/नवज्योति, जयपुर। प्रदेश के जैविक उद्यानों में पहली बार ऊदबिलाव का जोड़ा विजिटर्स को जयपुर स्थित नाहरगढ़ जैविक उद्यान में देखने को मिलेगा। गुजरात के सूरत से रवाना हुई जैविक उद्यान की टीम में शामिल एसीएफ रघुवीर मीणा, डॉ. अरविंद माथुर और गौरव चौधरी ऊदबिलाव का जोड़ा लेकर रविवार देर रात नाहरगढ़ जैविक उद्यान पहुंचे। जानकारी के अनुसार करीब एक हजार किमी का सफर कर ऊदबिलाव के जोड़े को जयपुर लाया गया है। ऐसे में अब जल्द ही पर्यटकों के लिए यह जोड़ा आकर्षण का केन्द्र होगा। गौरतलब है कि इससे पहले नाहरगढ़ जैविक उद्यान की टीम 27 जुलाई को एक्सचेंज कार्यक्रम के तहत जयपुर से दो जोड़े घड़ियाल और एक जोड़ा वुल्फ लेकर सूरत जू के लिए रवाना हुई थी। दैनिक नवज्योति ने सबसे पहले खबर प्रकाशित कर जानकारी दी थी कि प्रदेश के जैविक उद्यानों में पहली बार जयपुर स्थित नाहरगढ़ जैविक उद्यानों में ऊदबिलाव की उपस्थिति देखने को मिलेगी।  </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 31 Jul 2023 09:56:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> मुकुंदरा को झटका, सज्जनगढ़ जाएगा टी-104</title>
                                    <description><![CDATA[एनटीसीए की अनुमति के बाद बाघ टी-104 की शिफ्टिंग का रास्ता साफ हो गया है। ऐसे में साढ़े तीन साल के बाद टी-104 को रणथम्भौर के भिड नाके में बने एनक्लोजर से सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में शिफ्ट किया जाएगा। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/shock-to-mukundara-t-104-will-go-to-sajjangarh/article-44981"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-05/mukundara-ko-jhataka,-sajjanagadh-ko-t-104...kota-news-photo-08-05-2023.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा।  वन विभाग व नेशनल टाइगर कनजर्वेशन अथोरियटी (एनटीसीए) की ओर से आखिरकार रणथम्भौर के खूंखार बाघ टी-104 की किस्मत का फैसला कर दिया गया है। अब यह बाघ मुकुंदरा की जगह उदयपुर शिफ्ट किया जाएगा। एनटीसीए ने वन विभाग की ओर से भेजे गए प्रस्ताव पर मोहर लगा दी है। अब बाघ को रणथम्भौर से उदयपुर के सज्जनगढ बॉयोलिकल पार्क में शिफ्ट करने की अनुमति दे दी गई है। अनुमति मिलने के बाद विभाग की ओर से शिफ्टिंग की तैयारियां शुरू कर दी गई है। अगले सप्ताह तक बाघ टी-104 की शिफ्टिंग होना संभव है। </p>
<p><strong>अब टी-104 की शिफ्टिंग का रास्ता साफ</strong><br />एनटीसीए की अनुमति के बाद बाघ टी-104 की शिफ्टिंग का रास्ता साफ हो गया है। ऐसे में साढ़े तीन साल के बाद टी-104 को रणथम्भौर के भिड नाके में बने एनक्लोजर से सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में शिफ्ट किया जाएगा। गौरतलब है कि रणथम्भौर में लगातार बाघ टी-104 को अन्य जगह शिफ्ट करने की मांग की जा रही थी।</p>
<p><strong>अगले सप्ताह की जाएगी शिफ्टिंग</strong><br />सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बाघ टी-104 को शिफ्ट करने की अनुमति मिलने के बाद वन विभाग की ओर से भी शिफ्टिंग की तैयारियां शुरू कर दी गई है। जानकारी के अनुसार वन विभाग की ओर से बाघ को अगले सप्ताह रणथम्भौर से उदयपुर के सज्जनगढ़ बॉयोलोजिकल पार्क में शिफ्ट कर दिया जाएगा।</p>
<p><strong>कमेटी ने माना था बाघ का स्वभाग उग्र</strong><br />पूर्व में वन विभाग की ओर से बाघ टी-104 के स्वभाव के अध्ययन के लिए एक कमेटी का गठन किया गया था। कमेटी ने बाघ का स्वभाव उग्र मानते हुए इंसानों के लिए खतरा करार दिया था और बाघ को खुले जंगल में छोड़ने से इंकार किया था।</p>
<p><strong>दरा के सॉफ्ट एनक्लोजर में किया जाना था शिफ्ट  </strong><br />बाघ टी-104 को पूर्व में मुकुंदरा के दरा वनक्षेत्र के सॉफ्ट एनक्लोजर में शिफ्ट किया जाना था। यहां दो एनक्लोजर है। जिसमें पहला 32 स्क्वायर वर्ग किमी का और दूसरा 12 स्वायर वर्ग किमी का सॉफ्ट एनक्लोजर है। इस बाघ को इसी सॉफ्ट एनक्लोजर में शिफ्ट किया जाना था। इसके लिए विभाग द्वारा पहले एनटीसीए को प्रस्ताव भी भिजवाए गए थे और अनुमति मिलने की संभावना जताई जा रही थी लेकिन एनटीसीए से बाघ टी-104 को मुकुंदरा में शिफ्ट करने की अनुमति नहीं मिल सकी। ऐसे में अब बाघ दरा की जगह सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में शिफ्ट किया जाएगा। </p>
<p><strong>पहले मुकुंदरा भेजने का तैयार किया था प्रस्ताव </strong><br />पिछले साल जुलाई माह में वन विभाग के चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन की ओर से बाघ टी-104 को मुकुंदरा के दरा में बने एनक्लोजर में शिफ्ट करने का प्रस्ताव तैयार किया गया था। इस संबंध में पीसीसीएफ की ओर से रणथम्भौर के सीसीएफ और नेशनल टाइगर कनजर्वेशन अथोरियटी को भी पत्र लिखा था। लेकिन, एनटीसीए की ओर से इस संबंध में अनुमति नहीं मिल सकी थी। हाला ही में मुकुंदरा में बाघिन एमटी-4 की मौत के बाद बाघ को कोटा की जगह उदयपुर के सज्जनगढ़ बॉयोलोजिकल पार्क में शिफ्ट किया जाएगा।</p>
<p>एनटीसीए की ओर से टी-104 को सज्जनगढ़ बॉयोलिकल पार्क में शिफ्ट करने की अनुमति मिल गई है। शिफ्टिंग की तैयारी की जा रही है। अगले सप्ताह में बाघ को शिफ्ट कर दिया जाएगा।<br /><strong>- सेडूराम यादव, सीसीएफ, रणथम्भौर बाघ परियोजना सवाईमाधोपुर।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 May 2023 14:29:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
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                <title>20 करोड़ मिले तो बदले बायोलॉजिकल पार्क की सूरत</title>
                                    <description><![CDATA[ बायोलॉजिकल पार्क के निर्माण के दौरान 44 एनक्लोजर बनने थे लेकिन प्रथम चरण में मात्र 13 ही बन पाए। जबकि, 31 एनक्लोजर अभी बनने बाकी हैं। जब तक यह एनक्लोजर नहीं बनेंगे तब तक पुराने चिड़ियाघर में मौजूद अजगर, मगरमच्छ, बंदर व कछुए व ऐमु सहित एक दर्जन से अधिक वन्यजीव बायलॉजिकल पार्क में शिफ्ट नहीं हो पाएंगे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/20-crores-will-change-the-face-of-biological-park/article-43891"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-04/14.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। राजस्थान का सबसे बड़ा बायोलॉजिकल पार्क दो साल से बजट को तरस रहा है। बजट के अभाव में सुविधाएं विकसित नहीं हो पा रही। वहीं, रियासतकालीन चिड़ियाघर से वन्यजीवों की अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में शिफ्टिंग भी नहीं हो पा रही। यहां न तो कैफेटेरिया है और न ही ई-रिक्शा। ऐसे में यहां आने वाले पर्यटकों को चाय नाश्ते के लिए भटकना पड़ता है। दरअसल, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में द्वितीय चरण के तहत 20 करोड़ की लागत से कई निर्माण कार्य होने हैं, जो बजट के अभाव में शुरू नहीं हो पाए। जबकि, वन्यजीव विभाग प्रशासन सरकार को कई बार प्रस्ताव भेज चुका है। इसके बावजूद बजट स्वीकृत नहीं हुआ। इसके चलते एक दर्जन से अधिक वन्यजीव चिड़ियाघर से बायोलॉजिक पार्क में शिफ्ट नहीं हो पा रहे। बायोलॉजिकल पार्क के निर्माण के दौरान 44 एनक्लोजर बनने थे लेकिन प्रथम चरण में मात्र 13 ही बन पाए। जबकि, 31 एनक्लोजर अभी बनने बाकी हैं। जब तक यह एनक्लोजर नहीं बनेंगे तब तक पुराने चिड़ियाघर में मौजूद अजगर, मगरमच्छ, बंदर व कछुए व ऐमु सहित एक दर्जन से अधिक वन्यजीव बायलॉजिकल पार्क में शिफ्ट नहीं हो पाएंगे। एनक्लोजर की कमी के कारण चिड़ियाघर के वन्यजीवों की शिफ्टिंग अटक गई। </p>
<p><strong>कैफेटेरिया व ई-रिक्शा की खल रही कमी</strong><br />वर्तमान में बायोलॉजिकल पार्क में कुल 64 वन्यजीव हैं, जिनमें 10 मांसाहारी और 54 शाकाहारी हैं। यहां आने वाले पर्यटक 52 रुपए खर्च कर पार्क में वन्यजीवों के दीदार को  आते हैं लेकिन इलेक्ट्रिकल व्हीकल नहीं होने से 3 किमी लंबे ट्रैक पर पैदल घूमना मुश्किल हो जाता है। वहीं, कैफेटेरिया सुविधा नहीं होने से लोगों को चाय-नाश्ते के लिए परेशान होना पड़ता है। इसके अलावा पर्यटकों के बैठने के लिए छायादार शेड व वाटरकूलर भी र्प्याप्त नहीं हैं। पानी के लिए भी भटकना पड़ता है।   </p>
<p><strong>आॅपरेशन या पोस्टमार्टम के लिए लगता  है16 किमी का चक्कर</strong><br />वेटनरी हॉस्पिटल नहीं होने से वन्यजीवों के इलाज में परेशानी होती है। इलाज के संबंधित कुछ उपकरण बायोलॉजिकल पार्क में तो कुछ चिड़ियाघर में हैं। वन्यजीवों को यदि दवाइयां देनी हो तो यहां से दे देते हैं लेकिन आॅपरेशन या पोस्टमार्टम करना हो तो उसे करीब 16 किमी दूर नयापुरा स्थित चिड़ियाघर  लाना होता है। ऐसे में कई बार वन्यजीवों को समय पर इलाज मुहैया करवाना काफी चुनौतिपूर्ण हो जाता है। </p>
<p><strong>30 करोड़ से बना था बायोलॉजिकल पार्क </strong><br />डीसीएफ उड़नदस्ता अनुराग भटनागर ने बताया कि वर्ष 2017 में 30 करोड़ की लागत से बायोलॉजिकल पार्क का निर्माण कार्य शुरू हुआ था। जिसे 2019 में पूरा किया जाना था लेकिन कोविड के 2 साल के कारण काम समय पर पूरा नहीं हो सका। इसके बाद 21 नवम्बर 2021 को काम पूरा हुआ। </p>
<p><strong>प्रथम चरण में ये हुए थे कार्य </strong><br />प्रथम चरण के तहत पार्क में 13 एनक्लोजर बनाए गए। इसके अलावा पाथ-वे, पर्यटकों के लिए सुविधाघर, छायादार शेड, कैफेटेरिया का थोड़ा कार्य, जल व्यवस्था के लिए टैंक सहित फेंसिंग करवाई गई। वहीं, अभी तक यहां करीब 25 हजार पौधे लगवा चुके हैं। </p>
<p><strong>क्यों पास नहीं हो पा रहा बजट   </strong><br />वन्यजीव अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2020-21 में जाइका प्रोजेक्ट के तहत बायलोजिकल पार्क में अधूरे निर्माण कार्यों को पूरा करवाने के लिए सरकार को प्रस्ताव भेजा था। जिस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद फिर से रिव्यू प्रस्ताव भेजे गए, वह भी स्वीकृत नहीं हुए। गत वर्ष 4 जून को वन विभाग के शासन सचिव शिखर अग्रवाल के बायलॉजिकल पार्क निरीक्षण के दौरान समस्या से अवगत कराया था। इस पर उन्होंने जल्द ही बजट पास करवाने का भरोसा दिलाया था लेकिन दो साल बीतने के बाद भी बजट नहीं मिल पाया।   </p>
<p><strong>द्वितीय चरण में यह होने हैं कार्य </strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में द्वितीय चरण के तहत 20 करोड़ की लागत से 31 एनक्लोजर, स्टाफ क्वार्टर, कैफेटेरिया, वेटनरी हॉस्पिटल, इंटरपिटेक्शन सेंटर, पर्यटकों के लिए आॅडिटोरियम हॉल, छांव के लिए शेड, कुछ जगहों पर पथ-वे सहित अन्य कार्य शामिल हैं। </p>
<p><strong>इसी वर्ष बजट मिलने की उम्मीद</strong><br />द्वितीय चरण में बेहद महत्वपूर्ण काम होने थे, जो बजट के अभाव में नहीं हो सके। सरकार को पूर्व में प्रस्ताव भेजे गए हैं लेकिन अभी तक बजट स्वीकृत नहीं हुआ। अभी 31 एनक्लोजर बनने शेष हैं। इस कारण चिड़ियाघर से अन्य वन्यजीवों को बायोलॉजिक पार्क में शिफ्ट नहीं कर पा रहे। वहीं, वेटनरी हॉस्पिटल, स्टाफ  क्वार्टर, आॅडिटोरियम, इंटरपिटेक्शन सेंटर व कैफेटेरिया बनना पर्यटन की दृष्टि से जरूरी है। हालांकि, इसी वर्ष बजट मिलने की उम्मीद है। बायोलॉजिकल पार्क में सुविधाएं विकसित करने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। <br /><strong>-राजबिहारी मित्तल, एसीएफ वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 26 Apr 2023 15:38:33 +0530</pubDate>
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