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                <title>challenges - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>रक्षा क्षेत्र की चुनौतियों से निपटने का माध्यम है आत्मनिर्भरता : यह हमारी सरकार के लिए केवल नारा नहीं, राजनाथ सिंह ने कहा- भारत की ही पुरानी परंपरा का आधुनिक रूप है आत्मनिर्भरता का विचार </title>
                                    <description><![CDATA[ रक्षा मंत्री ने कहा कि विनिर्माण और उच्च प्रौद्योगिकी में स्वदेशीकरण को प्राथमिकता देकर सरकार ने उसी परम्परा को आधुनिक रूप देने का प्रयास किया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/self-reliance-is-the-means-to-deal-with-the-challenges-of/article-130706"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/capture444.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आत्मनिर्भरता के विचार को देश की प्राचीन परंपरा का आधुनिक रूप करार देते हुए कहा है कि यह सरकार के लिए केवल नारा भर नहीं, बल्कि रक्षा क्षेत्र की मौजूदा और भविष्य की चुनौतियों से निपटने का माध्यम है। सिंह ने यहां सोसायटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्यूफैक्चरर (एसआईडीएम) के वार्षिक सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि प्राचीन समय में भारत को सोने की चिड़यिा कहा जाता था और आत्मनिर्भरता का विचार इसी का आधुनिक रूप है। आत्मनिर्भरता का जो विचार है, वह हमारी सरकार के लिए सिर्फ एक स्लोगन भर नहीं है, बल्कि भारत की ही पुरानी परंपरा का आधुनिक रूप है। इतिहास में एक समय ऐसा भी था, जब हमारा लगभग हर गांव अपने आप में इंडस्ट्री था। भारत सोने की चिड़यिा इसलिए कहलाता था क्योंकि हम अपनी जरूरतों के लिए बाहर की ओर नहीं देखते थे, उसे अपनी ही जमीन पर पूरा करते थे। रक्षा मंत्री ने कहा कि विनिर्माण और उच्च प्रौद्योगिकी में स्वदेशीकरण को प्राथमिकता देकर सरकार ने उसी परम्परा को आधुनिक रूप देने का प्रयास किया है। </p>
<p>उन्होंने कहा कि सरकार ने अब निजी क्षेत्र के लिए भी दरवाजे खोल दिये हैं और इसी भरोसे का परिणाम है कि आज देश सेमी कंडक्टर फेब्रिकेशन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में भी मजबूती से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि देश में लगभग 19 फेब्रिकेशन संयंत्र स्थापित हो रहे हैं। मोबाइल फोन विनिर्माण में भी, जहां कभी हम केवल आयातक थे वहां हम अब निर्यातक बन चुके हैं।Þ प्रत्येक क्षेत्र में अच्छे परिणाम मिल रहे हैं। रक्षा मंत्री ने कहा कि रक्षा क्षेत्र सरकार के लिए केवल आर्थिक वृद्धि नहीं बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता का भी आधार है। उन्होंने कहा कि हमारे लिए रक्षा क्षेत्र केवल आर्थिक वृद्धि का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता का आधार है। और जब संप्रभुता की बात आती है, तो यह सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि हर नागरिक, हर संगठन और हर उद्योग की सामूहिक जिम्मेदारी बन जाती है। यह बात आज, ऑपरेशन ङ्क्षसदूर के बाद और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है।</p>
<p><br />उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद स्थितियां कुछ ऐसी बनी  कि दुनिया में शांति और कानून व्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ गई है और उसे ध्यान में रखते हुए हमें हर क्षेत्र में स्थिति का विश्लेषण कर कदम उठाने होंगे। उन्होंने कहा कि रक्षा क्षेत्र और युद्ध के स्वरूप में जो बदलाव हो रहे हैं, उनसे स्वदेशीकरण के माध्यम से ही निपटा जा सकता है। स्वदेशी हथियारों और हथियार प्रणालियों की सफलता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इससे न केवल क्षेत्रीय बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की साख बढी है। सिंह ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर की सफलता का श्रेय सैनिकों के साथ-साथ पीछे रहकर उस मिशन को सफल बनाने में लगे हुए लोगों को भी जाता है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री वारियर जिन्होंने नवाचार, डिजायन और विनिर्माण के मोर्चे पर बिना थके काम किया वह भी इस जीत के उतने ही हकदार हैं। किसी भी युद्ध जैसी स्थिति के लिए हमें न केवल तैयार रहना है, बल्कि हमारी तैयारी अपनी खुद की बुनियाद पर होनी चाहिए। मुझे इस बात की खुशी है कि हमारी रक्षा इंडस्ट्री इस दिशा में मजबूती से कदम आगे बढ़ा चुकी है। सिंह ने कहा कि जब भी हम बड़ा उपरकण या हथियार खरीदते हैं, तो उसके जीवन चक्र के दौरान के खर्च का अच्छा खासा असर होता है। इसलिए हमारा लक्ष्य, आपूर्ति श्रंखला या रखरखाव आपूर्ति के क्षेत्र में मजबूती का भी होना चाहिए। </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Oct 2025 18:07:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>प्रवासी पक्षियों को लुप्त होने से बचाने की बढ़ती चुनौतियां </title>
                                    <description><![CDATA[दुनिया में वन्य और पालतू प्राणियों की जान बचाना एक बड़ी चुनौती है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/increasing-challenges-to-save-migratory-birds-from-disappearance/article-114305"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-05/rtrer-(4)28.png" alt=""></a><br /><p>दुनिया में वन्य और पालतू प्राणियों की जान बचाना एक बड़ी चुनौती है। वन्य प्राणियों पर बढ़ते खतरों की वजह से उसका असर जैव विविधता पर साफ दिखाई पड़ने लगा है। जैव विविधता को बनाए रखने में अहम रोल निभाने वाले पक्षियों पर खतरे लगातार बढ़ रहे हैं। पक्षियों की सुरक्षा और उनके संरक्षण के लिए बना कानून भी नाकाम साबित हुआ है। यही वजह है कई प्रवासी पक्षी प्रजातियों पर लुप्त होने का खतरा लगातार मडराता रहता है। जब देश में कोविड 19 की दहशत से लोग परेशान थे, लेकिन प्रवासी मेहमान देश के कई अभ्यारण्यों और तालाबों में प्रवास के लिए पहुंच रहे थे। यह पहली दफा था, जब प्रवासी पक्षियों के लिए हवा और हरीतिमा सबसे अनुकूल मिली। लेकिन इस अनुकूलता का नाजायज फायदा प्रवासी पक्षियों के दुश्मन शिकारियों ने उठाया। लॉक डाउन और आंशिक बंदी के बावजूद प्रवासी पक्षियों का शिकार और व्यापार जारी रहा। सैकड़ों ग्रीष्म कालीन प्रवासी पक्षी लौट कर अपने घर नहीं जा सके। ऐसे में जब आदमी को बचाना मुश्किल हो गया हो, दूसरे प्राणियों की हिफाजत तो भगवान भरोसे ही होनी थी। </p>
<p>अभ्यारण्यों में इस साल और पिछले साल बड़ी तादाद में प्रवासी पक्षी आए, लेकिन उनके शिकार व व्यापार की खबरें भी आती रही हैं। जबकि स्वदेशी पक्षियों और प्रवासी पक्षियों का शिकार करना गैर कानूनी है। गौरतलब है पक्षियों का शिकार होने की वजह से पिछले 35 सालों में पक्षियों की दुर्लभ 23 प्रजातियां लुप्त हो गई हैं, जबकि सौ साल में इसके पहले औसतन एक प्रजाति लुप्त होती थी। कुछ खास तरह के भारतीय पक्षियों का शिकार पिछले 35 सालों में तेज हुआ है। इसी तरह प्रवासी पक्षियों में कॉमन कूट, ब्लैक बिंग्ड स्टिल्ट, नदन फावडे, रूडी शेल्डक, लेसर व्हिस्लिंगडक, वाइड एवोसेट और कैस्पियन मूल भारत में हर साल प्रवास के लिए आते हैं, का शिकार होने की खबरें भी आती रही हैं। </p>
<p>पिछले कुछ वर्षों से जलवायु सम्मेलनों में हिस्सा लेने वाले देशों ने जलवायु परिवर्तन के चलते प्रवासी पक्षियों पर लुप्त होने का मडराते खतरे पर चिंता जाहिर करते रहे हैं, लेकिन इस बाबत ऐसा कदम नही उठाया जा सका कि विश्व स्तर पर पक्षियों के दुश्मनों में दहशत पैदा होती। जाहिर तौर पर प्रवासी व देशी दोनों तरह के पक्षियों को लुप्त होने से बचाना एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई है। इंटर नेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर के अनुसार शिकार और परिस्थितिक प्रणाली के कारण देश में निवास करने वाली 180 पक्षी प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर हैं या खतरे में हैं। प्रवासी और देशी पक्षियों के संरक्षण के लिए और उन्हें स्वतंत्रता देने के लिए कानून बनाए गए हैं, लेकिन उन कानूनों का भ्रष्टाचार की वजह से कड़ाई से पालन नहीं हो पा रहा है। वहीं दूसरी तरफ देश में ऐसे भी लोग हैं, जो प्रवासी और देशी पक्षियों के संरक्षण के लिए अपना जीवन लगाए हुए हैं, लेकिन ऐसे लोग बहुत कम हैं। ज्यादातर मारने वाले हैं, जिलाने वाले अंगुलियों पर हैं। </p>
<p>प्रवासी पक्षी अपनी लम्बी यात्रा से विभिन्न संस्कृतियों और परिवेशों को जोड़ने का कार्य करते हैं। ये पक्षी रेगिस्तान, समुद्र और पहाड़ों को पार करके एक देश से दूसरे देश का सफर करते हैं। पक्षियों की ज्ञात प्रजातियों में 19 फीसदी पक्षी नियमित रूप से प्रवास करते हैं। यदि इनका संरक्षण पूरी तरह से निश्चित नहीं किया गया तो, कुछ ही सालों में बचे प्रवासी और देशी पक्षी हमेशा के लिए लुप्त हो जाएंगे। विश्व प्रसिद्ध संभर झील हो या झारखंड और भरतपुर का प्रसिद्ध केवलानंद अभ्यारण्य में पहले से बहुत कम प्रवासी पक्षी अब आते हैं। वहीं पर डुंगुरपुर, बांसवाड़ा और उदयपुर में पहले से ज्यादा प्रवासी पक्षी आते हैं। इसी तरह राजस्थान के छोटे से गांव मेनार में ग्रामीण पर्यावरण संरक्षण की एक नई इबारत लिखने लगे हैं। ऐसी ही जीव रक्षा की भावना देश के दूसरे हिस्सों में में हो जाए, तो पक्षियों की सुरक्षा और संरक्षण की चिंता ही खत्म हो जाएगी। भारत में पक्षियों की 1200 से ज्यादा प्रजातियों तथा उपप्रजातियों के लगभग 2100 प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं। इनमें से लगभग 350 प्रजातियां प्रवासी हैं, जो देश के अलग-अलग क्षेत्रों में शीत और ग्रीष्म ऋतु में आते हैं। </p>
<p>कुछ प्रजातियां जैसे पाइड क्रेस्टेड, चातक भारत में बरसात के समय प्रवास पर आते हैं। स्थानीय स्तर के प्रवासी पक्षी भी बड़ी संख्या में देश के एक कोने से दूसरे कोने का सफर कर प्रवासी बनते हैं। बिहार में 35 से 40 प्रतिशत प्रजातियां प्रवासी पक्षियों की हैं। इनकी सुरक्षा और संरक्षण करना एक बड़ी चुनौती है। जानकारी के मुताबिक यूं तो देश में, जहां भी प्रवासी पक्षी प्रवास करते हैं, वहां उनका शिकार होना आम बात है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में इन प्रवासियों का शिकार तेजी से हो रहा है। इसलिए ऐसा कानून होना चाहिए की पक्षियों के दुश्मनों में दहशत पैदा हो, जिससे पक्षियों को बचाया जा सके। आज भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में प्रवासी पक्षियों का संरक्षण करना कई स्तरों पर चुनौती बनी हुई है। </p>
<p>भारत एक गर्म जलवायु का क्षेत्र है। इसलिए यहां उन क्षेत्रों के पक्षी प्रवास में लाखों की संख्या में आते हैं, जहां जलवायु अत्यंत ठंठी है, लेकिन जलवायु परिवर्तन की समस्या हमारे यहां भी बड़ी समस्या बनती जा रही है। इसका असर उन प्रवासी पक्षियों पर देखा जा रहा है, जो अनुकूलता के लिए यहां चार से छ महीने रहते हैं। भारत में मांसाहार जैसे-जैसे तेजी से बढ़ रहा है पक्षियों का शिकार और सुरक्षा करना चुनौती बन गए हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रवासी पक्षियों को सरकारी इंतजाम और कानून के जरिए सुरक्षा दी जा सकती है।</p>
<p><strong>-अखिलेश आर्येन्दु</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 16 May 2025 11:42:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कम नहीं हैं विमानन क्षेत्र की चुनौतियां  </title>
                                    <description><![CDATA[हाल ही में एयर इंडिया की सर्विस को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/the-challenges-of-the-aviation-sector-are-not-less-%C2%A0/article-105714"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/257rtrer-(1)81.png" alt=""></a><br /><p>हाल ही में एयर इंडिया की सर्विस को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया। इस विवाद के पीछे वजह यह है कि अबकी बार सवाल मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री  शिवराज सिंह चौहान द्वारा उठाया गया है। यह पहली बार नहीं है, जब विमान सेवाओं पर सवाल उठाया गया हो। इससे पहले भी अनेकों बार देश में खराब होती विमान सेवाओं के यात्री लंबे समय से शिकायत करते रहे हैं और विमानन सर्विस पर सवाल उठाते रहें हैं। ताजा मामला मौजूदा सरकार के वरिष्ठ मंत्री का है, इसलिए शायद यह मामला ज्यादा चर्चा में आ गया है। आज देखने में आता है कि विमानों में भी हालत कमोबेश किसी बस जैसे हैं। शिवराज सिंह चौहान के बाद अब पंजाब बीजेपी के प्रमुख सुनील जाखड़ ने भी चंडीगढ़-दिल्ली उड़ान की टूटी सीटों की तस्वीरें साझा की हैं। पंजाब बीजेपी अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने भी हाल ही में फ्लाइट की टूटी हुई सीटों की तस्वीरें शेयर कीं। यह फ्लाइट उन्होंने जनवरी में ली थी। जाखड़ ने बताया कि 27 जनवरी की फ्लाइट में उन्होंने टूटी सीटों के बारे में केबिन क्रू को बताया था। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए एयरलाइन ने जवाब दिया था कि उनकी फ्लाइट्स की सीटों में निकलने वाले कुशन होते हैं। हमारे लिए यात्रियों की सुरक्षा सबसे जरूरी है।</p>
<p> जाखड़ ने इंडिगो और एयर इंडिया पर चलता है रवैया अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने अपील की कि दोनों एयरलाइन्स उड़ानों के सुचारू संचालन के साथ-साथ सुरक्षा मानकों से समझौता न करें। पाठकों को यह भी बताता चलूं कि जाखड़ का यह बयान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के एयर इंडिया की शिकायत के एक दिन बाद आया है। चौहान को भोपाल से दिल्ली की हालिया उड़ान में टूटी हुई सीट मिली थी। दरअसल केंद्रीय मंत्री को भोपाल से दिल्ली जाते समय एयर इंडिया की फ्लाइट में टूटी सीट मिली तो इस पर उन्होंने नाराजगी जाहिर करते हुए पूछा था कि क्या यह यात्रियों से चीटिंग नहीं है, इसके बाद एयर इंडिया ने भी सोशल मीडिया पर चौहान से खेद प्रकट किया और यह वादा किया कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा। कृषि मंत्री ने एक्स पर लिखा मैंने विमान कर्मियों से पूछा कि खराब सीट थी तो आवंटित क्यों की, उन्होंने बताया कि प्रबंधन को पहले सूचित कर दिया था कि ये सीट ठीक नहीं है, इसका टिकट नहीं बेचना चाहिए। ऐसी और भी सीटें हैं।</p>
<p>केंद्रीय मंत्री की एक्स पर पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाओं की बाढ़ सी आ गई और लोगों ने रेल और बस सेवाओं में महसूस की जाने वाली अनेक समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित किया गया। यहां तक कि अनेक लोगों ने एयर इंडिया को निजी हाथों में सौंपने से सरकार के फैसले पर भी सवाल खड़े कर दिए। पूरा पैसा वसूलने के बाद यात्रियों को अच्छी सीट मिलनी चाहिए, क्यों कि यदि ऐसा नहीं होता है तो यात्रियों को यात्रा के दौरान अनेक प्रकार की समस्याओं से रूबरू होना पड़ता है। विशेषकर जब कोई यात्री लंबी यात्रा करता है तो उसे बहुत परेशान होना पड़ता है। इस संदर्भ में स्वयं कृषि मंत्री ने यह बात लिखी है कि यात्रा के दौरान मुझे बैठने में कष्ट की चिंता नहीं है, लेकिन यात्रियों से पूरा पैसा वसूलने के बाद उन्हें खराब और कष्टदायक सीट पर बैठाना अनैतिक है। यहां प्रश्न यह उठता है कि जब विमान में यात्रियों को ऐसी परेशानी झेलनी पड़ रही है तो यातायात के अन्य साधनों की परिकल्पना बखूबी की जा सकती है। विदित हो कि प्रयोगकर्ता विमान में यात्रा के समय यातायात के किसी भी अन्य साधनों की तुलना में कहीं अधिक या एक बड़ी धनराशि चुकाता है, ऐसे में क्या उसे सुविधाएं प्राप्त करने का हक या अधिकार नहीं है, यह प्रश्न यहां एक यक्ष प्रश्न है।  एविएशन की नियामक संस्था डीजीसीए ने तत्परता दिखाते हुए तत्काल एयर इंडिया को नोटिस भेज दिया है। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय नागरिक उड्डयन के क्षेत्र में नियामक निकाय है, जो मुख्य रूप से सुरक्षा मुद्दों से निपटता है। </p>
<p>यहां यह उल्लेखनीय है कि डीजीसीए की ओर से वर्ष 2022 में जारी डायरेक्टिव में यह स्पष्ट तौर पर कहा जा चुका है कि एयरलाइन कोई ऐसी सीट नहीं बेचेगा जो सर्विस के लायक न हो। जानकारी के अनुसार क्रू मेंबर्स ने मैनेजमेंट को खराब सीटों के बारे में जानकारी भी दे दी थी, लेकिन इसके बावजूद उन सीटों के लिए टिकट बुक की गई। वास्तव में प्रबंधन को इस ओर ध्यान देना चाहिए था। बहरहाल यह भी एक आम सोच रही है कि पब्लिक सेक्टर की इस कंपनी को प्राइवेट हाथों में देने से सबकुछ ठीक हो जाएगा, लेकिन सिर्फ पब्लिक से प्राइवेट में आ जाने भर से किसी कंपनी की बेहतरी सुनिश्चित नहीं हो जाती। आज विमानन क्षेत्र में अनेक प्रकार की चुनौतियां हैं। </p>
<p><strong>-सुनील कुमार महला</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 27 Feb 2025 11:22:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>सद्भावना सम्मेलन में देश की चुनौतियों पर लिया संकल्प</title>
                                    <description><![CDATA[सम्मेलन में दमन प्रतिरोध आंदोलन राजस्थान में शामिल सभी संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। सम्मेलन में सीटू सहित कई सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/resolution-taken-on-countrys-challenges-in-sadbhavana-conference/article-99015"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/6622-copy63.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिला दमन प्रतिरोध आंदोलन, राजस्थान की ओर से पिंकसिटी प्रेस क्लब में संविधान की रक्षा, सद्भावना और भाईचारा सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस सम्मेलन में दमन प्रतिरोध आंदोलन राजस्थान में शामिल सभी संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। सम्मेलन में सीटू सहित कई सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। </p>
<p>दमन प्रतिरोध आंदोलन के सदस्य डॉ. संजय माधव ने बताया कि देश में भाजपा सरकार ने देश के सामने कई चुनौतियां खड़ी कर दी है। संविधान, विरासत और संस्कृति खतरे में है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए सामूहिक मंथन करके जनजागरण चलाने का प्रस्ताव पारित किया गया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 29 Dec 2024 16:30:11 +0530</pubDate>
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                <title>नाटो के सामने अब नई चुनौतियां</title>
                                    <description><![CDATA[पिछले सप्ताह संयुक्त राज्य अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में उत्तर अटलांटिक संधि संगठन की 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर त्रिदिवसीय शिखर सम्मेलन संपन्न हुआ।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/nato-now-faces-new-challenges/article-84924"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/111u1rer-(2)4.png" alt=""></a><br /><p>पिछले सप्ताह संयुक्त राज्य अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में उत्तर अटलांटिक संधि संगठन की 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर त्रिदिवसीय शिखर सम्मेलन संपन्न हुआ। इस सम्मेलन पर पूरे विश्व की नजरें टिकी हुई थीं। सम्मेलन में सभी सदस्यों ने एक स्वर से यूक्रेन के साथ एकजुटता दिखाते हुए उसे पर्याप्त सुरक्षा सहायता जारी रखने का फैसला लिया गया। तो दूसरी ओर चीन को आड़े हाथों लेकर उस पर तीखे प्रहार किए। सम्मेलन में यह भी तय हुआ कि अगला शिखर सम्मेलन अगले वर्ष जून माह में नीदरलैंड की राजधानी हेग में आयोजित किया जाएगा। 75 वां शिखर सम्मेलन ऐसे वक्त पर हुआ जब इसका नेतृत्व करने वाले देश अमेरिका में अगले नवंबर माह में राष्ट्रपति चुनाव होने जा रहे हैं। ब्रिटेन में लेबर पार्टी के कीर स्टॉर्मर नए प्रधानमंत्री बने हैं। अमेरिकी चुनाव के नतीजे आने के बाद ही सम्मेलन में लिए गए तमाम महत्वपूर्ण फैसलों का क्रियान्वयन और रणनीति की दशा और दिशा सुनिश्चित हो पाएगी। </p>
<p>शिखर सम्मेलन को मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन ने संबोधित किया है। उन्होंने अपने संबोधन में यह समझाने की पूरी कोशिश की कि नाटो को इस अवसर का उपयोग जश्न मनाने के लिए इसलिए करना चाहिए , क्योंकि अमेरिका को इस गठबंधन से काफी लाभ मिला है। इसकी सदस्यता में एक ओर जहां वृद्धि हुई तो दूसरी ओर रक्षा पर यूरोपीय राज्यों के बढ़े बजटीय व्यय की रूपरेखा भी तैयार हुई। </p>
<p>उन्होंने यूक्रेन युद्ध में रूस की सहायता करने पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की कड़ी निंदा की। चेतावनी दी कि यदि बीजिंग ने मास्को को सहायता देना तुरंत बंद नहीं किया तो उसे इसके परिणाम भुगतने पड़ेंगे। लेकिन सम्मेलन में बाइडन की जुबान की लड़खड़ाहट ने उनकी कमजोरी को भी जाहिर कर दिया। जब उन्होंने पास खड़े यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की को पुतिन और कमला हैरिस को ट्रंप के नाम से संबोधित किया। इससे पहले राष्ट्रपति चुनाव के लिए हुई पहली बहस में बाइडन को ट्रंप के मुकाबले मिली हार तथा उनकी जुबानी फिसलन ने उनकी बढ़ती उम्र की ओर डेमोक्रेटिक पार्टी को गंभीरता से सोचने को विवष कर दिया है। पार्टी के भीतर उनसे चुनावी मैदान से हटने का दबाव बन रहा है। लेकिन इसके बावजूद वे चुनाव लडने पर अड़े हुए हैं। यदि वे मैदान पर डटे रहे तो चुनावी नतीजे रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशी डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में जा सकते हैं। दूसरी ओर नाटो को लेकर पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के नजरिए पर भी गौर करना होगा। अपने राष्ट्रपति कार्यकाल में टं्रप ने नाटो गठबंधन में शामिल देशों की व्यय साझा करने की अनिच्छा की खुलकर आलोचना की थी। ऐसे में उनका मत था कि वैश्विक सुरक्षा की जिम्मेदारी के वहन से अमेरिका को मिलता क्या है? हालांकि अब हालात में काफी बदलाव आ चुका है। अधिकांष यूरोपीय देश, अपनी जीडीपी के दो फीसदी हिस्से के बराबर धन देने के दायित्व को पूरा कर रहे हैं। ट्रंप को लेकर यह धारणा भी है कि वे पुतिन के करीबी हैं। </p>
<p>खैर, अमेरिकानीत इस सैन्य संधि संगठन के सामने मौजूदा वैष्विक परिदृश्य में दो प्रमुख चुनौतियां उभर कर सामने आ रही हैं। एक तो यूक्रेन के खिलाफ युद्ध छेड़े रूस को चीन की ओर से मदद मिलना। तो दूसरी ओर चीन का हिंद-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में वर्चस्व बढाने की नीति, इस के साथ उसकी परमाणु हथियारों और अंतरिक्ष क्षेत्र में आक्रामक क्षमता हासिल कर लेना। सम्मेलन के केंद्र में चीन का मुद्दा हालांकि पहले भी वर्ष 2019 के सम्मेलन में उठा था। लेकिन तब नाटो के वक्तव्य में चीन के जिक्र की भाषा इतनी कड़ी नहीं थी। लेकिन इस बार की तीखी घोषणा के तुरंत बाद चीन ने प्रतिक्रिया दी। उसने रूस की मदद के लगाए आरोपों को सरासर झूठ बताया है। उसकी ओर से जोर देकर कहा गया है कि रूस और चीन के बीच व्यापार और मैत्री का उद्देश्य किसी तीसरे पक्ष को निशाना बनाना नहीं है। लेकिन नाटो की ताजा घोषणा की भाषा ने रूस-यूक्रेन युद्ध को अब नाटो-चीन के बीच छद्म युद्ध में बदल दिया है। खैर, इतना जरूर हुआ कि नाटो की शिखर वार्ता शुरू होने से पहले यूक्रेन को अमेरिकी एफ-16 लड़ाकू विमानों की पहली खेप डेनमार्क और नीदरलैंड से भेज दी गई है। आने वाले दिनों में इनका इस्तेमाल किया जा सकता है। उसे रूसी हवाई हमलों से बचाव करने में भी मदद मिलेगी।</p>
<p>सम्मेलन में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन की ओर से यूक्रेन की नाटो संगठन की सदस्यता को लेकर स्पष्ट और मजबूत सेतू की बात तो जरूर कही गई है। लेकिन अंतिम फैसला युद्ध समाप्ति के बाद ही संभव हो पाएगा। तेजी से बदलते वैश्विक माहौल में आने वाली नई चुनौतियों से नाटो अब कैसे निपटता है, यह कठिन परीक्षा की घड़ी होगी।</p>
<p><strong>-महेश चंद्र शर्मा<br /></strong><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jul 2024 10:49:08 +0530</pubDate>
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                <title>आपत्तिजनक कंटेंट हटाने के भारत सरकार के आदेश को ट्विटर ने दी कानूनी चुनौती, बताया अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली। ट्विटर ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से कंटेंट हटाने से जुड़े भारत सरकार के कुछ फैसलों को अदालत में चुनौती देने का फैसला किया है। न्यूज एजेंसी ने इस मामले से वाकिफ कुछ सूत्रों के हवाले से बताया है कि ट्विटर ने कुछ अधिकारियों की तरफ से अधिकार के कथित दुरुपयोग को कानूनी चुनौती दी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/twitter-challenges-indian-government-s-order-to-remove-objectionable-content--says-it-violates-freedom-of-expression/article-13722"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-07/twitter.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। ट्विटर ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से कंटेंट हटाने से जुड़े भारत सरकार के कुछ फैसलों को अदालत में चुनौती देने का फैसला किया है। न्यूज एजेंसी ने इस मामले से वाकिफ कुछ सूत्रों के हवाले से बताया है कि ट्विटर ने कुछ अधिकारियों की तरफ से अधिकार के कथित दुरुपयोग को कानूनी चुनौती दी है। आपत्तिजनक कंटेंट हटाने के आदेश की न्यायिक समीक्षा की ये कोशिश इस अमेरिकी कंपनी और भारत सरकार के बीच टकराव में एक और कड़ी साबित होगी।<br /><br /><strong>खालिस्तान समर्थकों पर सरकार ने एक्शन को कहा</strong> <br />दरअसल भारत सरकार ने ट्विटर को उन अकाउंट्स के खिलाफ ऐक्शन लेने को कहा है जो खालिस्तान समर्थक हैं। सरकार ने उन पोस्ट्स पर भी कार्रवाई करने को कहा है जिन्होंने किसानों के विरोध-प्रदर्शन से जुड़ी गुमराह करने वाली और झूठी सूचनाएं फैला रहे थे। इसके अलावा कोरोना वायरस महामारी से निपटने को लेकर सरकार की आलोचना करने वाले कुछ ट्वीट्स पर भी कार्रवाई करने को कहा गया है।<br /><br /><strong>सरकार के आदेश का पूरी तरह नहीं किया पालन</strong><br />भारत सरकार पहले ही कह चुकी है कि ट्विटर समेत बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों ने कंटेंट हटाने के अनुरोध पर कार्रवाई नहीं की है। पिछले महीने आईटी मिनिस्ट्री ने ट्विटर को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वह कुछ आदेशों का पालन नहीं करती है तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जाएगी। सूत्रों के हवाले से बताया है कि ट्विटर ने अपने खिलाफ कार्रवाई होने के डर से इस हफ्ते सरकार के आदेशों को पालन किया है।<br /><br /><strong>कानून सम्मत नहीं हैं सरकार के आदेश</strong><br />ट्विटर ने न्यायिक समीक्षा की मांग करते हुए दलील दी है कि कुछ रिमूवल आॅर्डर भारत के आईटी ऐक्ट के प्रावधानों पर खरे नहीं उतरते हैं। हालांकि, ट्विटर ने इसका स्पष्ट तौर पर जिक्र नहीं किया है कि वह किस या किन रिमूवल आॅर्डर की न्यायिक समीक्षा चाहता है। आईटी ऐक्ट के तहत सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा समेत कुछ अन्य वजहों से कुछ कंटेंट तक लोगों की पहुंच खत्म करने का अधिकार है।<br /><br /><strong>ट्विटर ने अभिव्यक्ति की आजादी का दिया हवाला</strong><br />भारत में करीब 2.4 करोड़ यूजर्स वाले ट्विटर ने ये भी दलील दी है कि कुछ आॅर्डर्स में कंटेंट के लेखक को नोटिस तक नहीं दिया गया। इसमें ये भी कहा गया है कि कुछ पोस्ट राजनीतिक दलों के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से पोस्ट किए गए हैं। इनको ब्लॉक करना एक तरह से अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन है।<br /><br />पिछले साल की शुरूआत में शुरू हुआ टकराव<br />भारत सरकार और ट्विटर के बीच तब टकराव बढ़ा जब पिछले साल की शुरूआत में माइक्रो ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म ने सरकार के एक आदेश पर पूरी तरह अमल से इनकार कर दिया था। सरकार ने कुछ अकाउंट्स के खिलाफ ऐक्शन लेने को कहा था जो सरकार-विरोधी किसान आंदोलन के बारे में कथित तौर पर झूठी और भ्रामक सूचनाएं फैला रहे थे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 06 Jul 2022 14:10:23 +0530</pubDate>
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                <title>स्वास्थ्य क्षेत्र की बढ़ती चुनौतियां</title>
                                    <description><![CDATA[यहां डॉक्टरों तथा आबादी का अनुपात संतोषजनक नहीं है, ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/-editorial--the-growing-challenges-of-the-health-sector/article-7549"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/e1.jpg" alt=""></a><br /><p>भारतीय समाज में सदियों से धारणा रही है ‘जान है तो जहान है’ तथा ‘पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में हो माया’। ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया:’ अर्थात ‘सब सुखी हों और सभी रोगमुक्त हों’ मूलमंत्र में यही स्वास्थ्य भावना निहित है। लोगों के स्वास्थ्य स्तर को सुधारने तथा स्वास्थ्य को लेकर प्रत्येक व्यक्ति को जागरूक करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 7 अप्रैल को वैश्विक स्तर ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ मनाया जाता है। इस दिवस को मनाए जाने का प्रमुख उद्देश्य दुनिया के हर व्यक्ति को इलाज की अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना, उनका स्वास्थ्य बेहतर बनाना, उनके स्वास्थ्य स्तर को ऊंचा उठाना तथा समाज को बीमारियों के प्रति जागरूक कर स्वस्थ वातावरण बनाते हुए स्वस्थ रखना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के बैनर तले मनाए जाने वाले इस दिवस की शुरुआत 7 अप्रैल 1950 को हुई थी और यह दिवस मनाने के लिए इसी तारीख का निर्धारण डब्ल्यूएचओ की संस्थापना वर्षगांठ को चिन्हित करने के उद्देश्य से किया गया था।</p>
<p><br />सम्पूर्ण विश्व को निरोगी बनाने के उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ नामक वैश्विक संस्था की स्थापना 7 अप्रैल 1948 को हुई थी, जिसका मुख्यालय स्विट्जरलैंड के जेनेवा शहर में है। कुल 193 देशों ने मिलकर जेनेवा में इस वैश्विक संस्था की नींव रखी थी, जिसका मुख्य उद्देश्य यही है कि दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा हो, बीमार होने पर उसे बेहतर इलाज की पर्याप्त सुविधा मिल सके। संस्था की पहली बैठक 24 जुलाई 1948 को हुई थी और इसकी स्थापना के समय इसके संविधान पर 61 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। संगठन की स्थापना के दो वर्ष बाद ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ मनाने की परम्परा शुरू की गई। इस वर्ष पूरी दुनिया 72वां विश्व स्वास्थ्य दिवस मना रही है। संयुक्त राष्ट्र का अहम हिस्सा ‘डब्ल्यूएचओ’ दुनिया के तमाम देशों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर आपसी सहयोग और मानक विकसित करने वाली संस्था है। इस संस्था का प्रमुख कार्य विश्वभर में स्वास्थ्य समस्याओं पर नजर रखना और उन्हें सुलझाने में सहयोग करना है। अपनी स्थापना के बाद इस वैश्विक संस्था ने ‘स्मॉल पॉक्स’ जैसी बीमारी को जड़ से खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और टीबी, एड्स, पोलियो, रक्ताल्पता, नेत्रहीनता, मलेरिया, सार्स, मर्स,  इबोला जैसी खतरनाक बीमारियों के बाद कोरोना की रोकथाम के लिए भी जी-जान से जुटी है। इस संस्था के माध्यम से प्रयास किया जाता है कि दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से पूर्ण स्वस्थ रहे।</p>
<p><br />विश्व स्वास्थ्य संगठन का पहला लक्ष्य वैश्विक स्वास्थ्य कवरेज रहा है लेकिन इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह सुनिश्चित किया जाना बेहद जरूरी है कि समुदाय में सभी लोगों को अपेक्षित स्वास्थ्य सुविधाएं व देखभाल मिले। हालांकि दुनिया के तमाम देश स्वास्थ्य के क्षेत्र में लगातार प्रगति कर रहे हैं लेकिन कोरोना जैसे वायरसों के समक्ष जब अमेरिका जैसे विकसित देश को भी बेबस अवस्था में देखा और वहां भी स्वास्थ्य कर्मियों के लिए जरूरी सामान की भारी कमी नजर आई, तब पूरी दुनिया को अहसास हुआ कि अभी भी जन-जन तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन तो स्वयं मानता है कि दुनिया की कम से कम आधी आबादी को आज भी आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं। विश्वभर में अरबों लोगों को स्वास्थ्य देखभाल हासिल नहीं होती। करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं तथा स्वास्थ्य देखभाल में से किसी एक को चुनने पर विवश होना पड़ता है।</p>
<p><br />जन-स्वास्थ्य से जुड़े कुछ वैश्विक तथ्यों पर ध्यान दिया जाए तो हालांकि टीकाकरण, परिवार नियोजन, एचआईवी के लिए एंटीरिट्रोवायरल उपचार तथा मलेरिया की रोकथाम में सुधार हुआ है लेकिन चिंता की स्थिति यह है कि अभी भी दुनिया की आधी से अधिक आबादी तक आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच नहीं है। विश्वभर में 80 करोड़ से भी ज्यादा लोग अपने घर के बजट का कम से कम दस फीसदी स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं पर खर्च करते हैं। यही नहीं, स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं पर बड़ा खर्च करने के कारण दस करोड़ से ज्यादा लोग अत्यधिक गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। चिंता की स्थिति यह है कि पिछले कुछ दशकों में एक ओर जहां स्वास्थ्य क्षेत्र ने काफी प्रगति की है, वहीं कुछ वर्षों के भीतर एड्स, कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों के प्रकोप के साथ हृदय रोग, मधुमेह, क्षय रोग, मोटापा, तनाव जैसी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी तेजी से बढ़ी हैं। ऐसे में स्वास्थ्य क्षेत्र की चुनौतियां निरन्तर बढ़ रही हैं।अगर भारत की बात की जाए तो मौजूदा कोरोना काल को छोड़ दें तो आर्थिक दृष्टि से देश में पिछले दशकों में तीव्र गति से आर्थिक विकास हुआ लेकिन कड़वा सच यह भी है कि तेज गति से आर्थिक विकास के बावजूद इसी देश में करोड़ों लोग कुपोषण के शिकार हैं। <br />   <strong> - योगेश कुमार गोयल</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong><br /><br />राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार तीन वर्ष की अवस्था वाले तीन फीसदी से भी अधिक बच्चों का विकास अपनी उम्र के हिसाब से नहीं हो सका है और चालीस फीसदी से अधिक बच्चे अपनी अवस्था की तुलना में कम वजन के हैं। इनमें करीब अस्सी फीसदी बच्चे रक्ताल्पता (अनीमिया) से पीड़ित हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक दस में से सात बच्चे अनीमिया से पीड़ित हैं जबकि महिलाओं की तीस फीसदी से ज्यादा आबादी कुपोषण की शिकार है। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक देश में अभी भी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह मुफ्त नहीं हैं और जो हैं, उनकी स्थिति संतोषजनक नहीं है। विश्व बैंक की 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका अपनी जीडीपी का 16.9 फीसदी, जर्मनी 11.2, जापान 10.9, कनाडा 10.7, यूके 9.8 तथा आस्ट्रेलिया 9.3 फीसदी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करते हैं जबकि भारत में यह जीडीपी का महज 3.54 फीसदी ही है और उसमें से भी सरकारी खर्च का योगदान केवल 1.54 फीसदी ही है।</p>
<p><br />भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को देखा जाए तो स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रशिक्षित लोगों की बड़ी कमी है। यहां डॉक्टरों तथा आबादी का अनुपात संतोषजनक नहीं है, बिस्तरों की उपलब्धता बेहद कम है। देश में सवा अरब से अधिक आबादी के लिए 47 हजार लोगों पर सिर्फ एक सरकारी अस्पताल है। देशभर के सरकारी अस्पतालों में इतनी बड़ी आबादी के लिए करीब सात लाख बिस्तर हैं। सरकारी अस्पतालों में करीब 1.17 लाख डॉक्टर हैं अर्थात दस हजार से अधिक लोगों पर महज एक डॉक्टर ही उपलब्ध है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के नियमानुसार प्रति एक हजार मरीजों पर एक डॉक्टर होना चाहिए। कुछ राज्यों में तो स्थिति यह है कि 40 से 70 हजार ग्रामीण आबादी पर केवल एक सरकारी डॉक्टर है। भारतीय चिकित्सा परिषद के अनुसार देश में 50 फीसदी से भी ज्यादा झोलाझाप डॉक्टर हैं। परिषद का मानना है कि शहरी क्षेत्रों में जहां योग्य चिकित्सकों की संख्या 58 फीसदी है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह 19 प्रतिशत से भी कम है। बहरहाल, विश्व स्वास्थ्य दिवस के माध्यम से जहां समाज को बीमारियों के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया जाता है, वहीं इसका सबसे महत्वपूर्ण बिन्दू यही होता है कि लोगों को स्वस्थ वातावरण बनाकर स्वस्थ रहना सिखाया जा सके। दरअसल विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्ण स्वस्थ होना ही मानव-स्वास्थ्य की परिभाषा है।<br /><br /><strong>विश्व स्वास्थ्य दिवस</strong><br />दुनिया के तमाम देश स्वास्थ्य के क्षेत्र में लगातार प्रगति कर रहे हैं लेकिन कोरोना जैसे वायरसों के समक्ष जब अमेरिका जैसे विकसित देश को भी बेबस अवस्था में देखा और वहां भी स्वास्थ्य कर्मियों के लिए जरूरी सामान की भारी कमी नजर आई, तब पूरी दुनिया को अहसास हुआ कि अभी भी जन-जन तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 Apr 2022 14:44:17 +0530</pubDate>
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                <title>प्रदेश कांग्रेस के लिए नया साल नहीं होगा आसान, कई तरह की रहेंगी चुनौतियां</title>
                                    <description><![CDATA[प्रदेश कांग्रेस कमेटी का साल 2021 भले ही हर की चुनौतियों के साथ बीत गया हो लेकिन नए साल 2022 मैं कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B8-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%A8%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A8--%E0%A4%95%E0%A4%88-%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%B9-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%80-%E0%A4%9A%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%8C%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%82/article-3699"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-12/dotasra_makan_gehlot.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। प्रदेश कांग्रेस कमेटी का साल 2021 भले ही हर की चुनौतियों के साथ बीत गया हो लेकिन नए साल 2022 मैं कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।नए साल में प्रदेश कांग्रेस को राजनीतिक नियुक्तियां, गुटबाजी, संगठन विस्तार, विधायकों की नाराजगी जैसी चुनौतियों का सामना करना होगा। साथ ही विधानसभा चुनावों को देखते हुए विपक्षी पार्टी भाजपा के हमले भी तेज होंगे। हालांकि प्रदेश कांग्रेस मिशन 2023 को लेकर तैयारियों में जुटी है, लेकिन उन्हें सबसे पहले उन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है जो अभी भी प्रदेश कांग्रेस के सामने बनी हुई है। उनका समाधान किए बगैर साल 2023 के विधानसभा चुनाव की तैयारी अधूरी होगी। प्रदेश कांग्रेस के सामने तकरीबन आधा दर्जन प्रमुख समस्याएं हैं, जिनका समाधान उसे इसी साल करना होगा।<br /> <br /> प्रदेश कांग्रेस के सामने प्रमुख चुनौतियों में सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक नियुक्तियां हैं। कांग्रेस कार्यकर्ता तीन साल से राज्य नियुक्तियों का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन कार्यकर्ताओं को राजनीतिक नियुक्तियों में एडजस्ट नहीं किया गया। अब नए साल में राजनीतिक नियुक्तियां करने की बात की जा रही है, लेकिन बड़ी बात यह है कि जिन कार्यकर्ताओं और नेताओं के नंबर राजनीतिक नियुक्तियों में नहीं लग पाएंगे। उन कार्यकर्ताओं और नेताओं को प्रदेश कांग्रेस की ओर से किस प्रकार संतुष्ट किया जाएगा यह अपने आप में एक बड़ी चुनौती प्रदेश कांग्रेस के सामने होगी। संगठन विस्तार भी एक बड़ी चुनौती है। कांग्रेस को अगर 2023 में विधानसभा चुनाव की तैयारियों में अभी से ही जुटना है तो सबसे पहले संगठन को मजबूत करना पड़ेगा, लेकिन बड़ी बात यह कि प्रदेश कांग्रेस के तमाम विभाग-प्रकोष्ठ, ब्लॉक और जिलाध्यक्षों की कार्यकारिणी भंग पड़ी है। प्रदेश कांग्रेस में अभी 39 सदस्य प्रदेश कार्यकारिणी और 13 जिलाध्यक्षों की नियुक्ति हुई है। ऐसे में पार्टी के सामने 42 जिला अध्यक्षों, 400 ब्लॉक अध्यक्ष, जिलों की कार्यकारिणी, विभिन्न विभाग प्रकोष्ठ में नियुक्तियां जैसे काम करने होंगे। ऐसे में प्रदेश कांग्रेस के सामने संगठन विस्तार भी एक बड़ी चुनौती है। अन्य मुख्य चुनौतियों में गुटबाजी भी शामिल है। भले ही मंत्रिमंडल पुनर्गठन के बाद कांग्रेस में गुटबाजी खत्म करने के दावे किए जा रहे हैं लेकिन गहलोत-पायलट गुट के अलावा अन्य धड़ों के नेता भी एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी करने से परहेज नहीं करते हैं। ऐसे में प्रदेश कांग्रेस के सामने चुनौती यही है कि वे किस प्रकार गुटबाजी को खत्म करके सभी दलों के नेताओं को एक मंच पर एकजुट करके चुनाव के लिए तैयार करें।</p>
<p><br /> विधायकों की नाराजगी भी एक बड़ी चुनौती है। मंत्रिमंडल पुनर्गठन में अपना नंबर नहीं आने से सरकार को समर्थन दे रहे कई निर्दलीय और बसपा से कांग्रेस में आए विधायकों की नाराजगी खुलकर सामने आ चुकी है। कांग्रेस के भी कई विधायक अंदर खाने अपनी नाराजगी जता चुके हैं। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले सत्ता और संगठन में यह एकजुटता बनाए रखना बड़ी जिम्मेदारी और चुनौती है, अन्यथा विधानसभा के बजट सत्र में समर्थन देने वाले कुछ विधायकों की ही नाराजगी झेलनी पड़ सकती है।</p>
<p><strong><br /> माकन के आश्वासन की परख:</strong><br /> प्रदेश प्रभारी अजय माकन और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की तरफ से संकेत दिए गए हैं कि मई-जून के बीच फिर से मंत्रिमंडल विस्तार हो सकता है। जिसमें नए और पुराने चेहरों को मंत्रिमंडल में मौका मिल सकता है, लेकिन चुनौती यहां भी है कि जिन चेहरों को मंत्रिमंडल से बाहर किया जाएगा उनकी नाराजगी भी सत्ता और संगठन को झेलनी पड़ेगी।</p>
<p><strong><br /> चुनावी बयार में भाजपा भी होगी हमलावर:</strong><br /> सरकार के चौथे साल में विपक्षी पार्टी भाजपा भी सत्ता और संगठन के नेताओं पर जुबानी हमले तेज करेगी। सड़क से लेकर सदन तक भाजपा की ओर से सत्तारूढ़ कांग्रेस को घेरा जाएगा। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के सामने यह भी एक कठिन चुनौती होगी, जिसका उनको सामना करना है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 31 Dec 2021 16:36:44 +0530</pubDate>
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