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                <title>जनता क्लिनिक का जनता को पता नहीं : नाम नया हालात वही, कोटा के आरोग्य मंदिर बने खाली कुर्सियों के केंद्र</title>
                                    <description><![CDATA[डॉक्टर महीनों से नदारद, दो-तिहाई केंद्रों पर स्टाफ अधूरा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/public-unaware-of--janata-clinics---new-name--same-old-story%E2%80%94kota-s--arogya-mandirs--become-centers-of-empty-chairs/article-146814"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/1200-x-60-px)-(1)26.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहर में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत ह्यशहरी आयुष्मान आरोग्य मंदिरह्ण के नाम पर चल रहे पूर्व के जनता क्लिनिकों में साफ दिखाई दे रही है। नाम बदलने और बड़े दावों के बावजूद जमीनी स्तर पर हालात बेहद खराब हैं। 20 दिनों तक किए गए भौतिक सत्यापन में सामने आया कि अधिकांश केंद्रों पर डॉक्टर ही नहीं हैं, कई जगह स्टाफ अधूरा है और कुछ केंद्रों पर तो ताले लटके मिले।</p>
<p><strong>2 माह से अधिक गुजरा समय</strong><br />विभाग ने 2 माह पूर्व ही इन शहरी आयुष्मान केन्द्रों का संचालन नयी एजेन्सी को दिया है। क्षेत्र से लगातार मिल रही जानकारीयों के सत्यापन के लिये नवज्योति रिपोर्टर टीम ने 24 फरवरी से बड़गांव, सुखाडिया, नान्ता, घोड़ा बस्ती, एक मीनार मस्जिद, गोवर्धनपुरा और बंजारा कॉलोनी समेत कई आरोग्य मंदिरों का दौरा किया। केंद्रों में कहीं भी पूरा स्टाफ ड्यूटी पर मौजूद नहीं मिला। दो केंद्रों पर तो निरीक्षण के दौरान ताले लगें मिलें, जबकि जिन केंद्रों पर ड्यूटी ओपीडी का बोर्ड लगा था वहां भी डॉक्टर नदारद थे। कही पर सात कार्मिकों के नाम की जानकारी तो दी गयी, लेकिन मौके पर उनकी उपस्थिति नहीं मिली, ज्यादातर जगह पर कार्मिक के बारे में कहा गया कि वह अन्य जगह पीएचसी पर गये हुये है। हालांकि नये नियमार्न्तगत शहरी आयुष्मान केन्द्रों के स्टाफ की ड्यूटी का जिम्मा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय का है ।</p>
<p><strong>1.45 रू. प्रति माह के 7 स्टाफ की अनुशंसा</strong><br />सरकारी निदेर्शों के अनुसार प्रत्येक आरोग्य मंदिर के लिये 1.45 रू. मेनपॉवर के दिये जाते है जिससे एक डॉक्टर, दो नर्सिंग स्टाफ, एक फार्मासिस्ट, एक एएनएम, एक सहायक कर्मचारी और एक सफाई कर्मचारी सहित कुल सात कर्मचारियों की व्यवस्था होनी चाहिए। लेकिन नए वित्तीय सत्र के दो महीने गुजर जाने के बाद भी अधिकांश केंद्रों पर चतुर्थ श्रेणी और सहायक कर्मचारी तक नियुक्त नहीं किए गए। परिणामस्वरूप कई जगह गंदगी, बिखरी दवाइयां और अव्यवस्था का आलम देखने को मिला।</p>
<p><strong>महिला स्टाफ की सुरक्षा</strong><br />सबसे खराब स्थिति गोवर्धनपुरा आरोग्य मंदिर में सामने आई। यहां कायर्करत डॉक्टर रूद्रप्रताप छावनी आरोग्य मंदिर पर ड्यूटी कर रहे थे, हांलाकि यहां पर स्टाफ के नाम पर मौजूद एक फार्मासिस्ट ने बताया कि सामुदायिक भवन में चल रहे इस केंद्र पर स्टाफ रुकना नहीं चाहता, क्योंकि अधिकतर कर्मचारी महिलाएं हैं, और सुरक्षा की समस्या बनी रहती है । इसी तरह एक मीनार मस्जिद, छावनी क्षेत्र में शनिवार को दोपहर 2:50 बजे ही केंद्र का ताला लगा मिला। स्थानीय लोगों ने बताया कि यहां डॉक्टर और एजेंसी के बीच विवाद चल रहा है, जिसके कारण डॉक्टर नहीं आते। मरीज अक्सर इलाज की उम्मीद में आते हैं लेकिन बिना चिकित्सक के खाली कुर्सी देखकर वापस लौट जाते हैं।</p>
<p><strong>ओपीडी समय चस्पा कर दिया पर ताले नहीं खुले</strong><br />घोड़ा बस्ती आरोग्य मंदिर में कागजों पर दो टाइम ओपीडी का समय लिखा है, लेकिन वास्तविकता में स्टाफ एक बजे से पहले ही निकल जाता है। मौके पर बिजली विभाग का कर्मचारी भी बिल सम्बन्धी काम से बाहर खड़ा मिला। ओपीड़ी समय के अनुसार हमारी टीम शाम को फिर से यहां पहुंची तो भी यहां मुख्य दरवाजे पर ताला ही लगा मिला।सबसे अजीब स्थिति बंजारा कॉलोनी में सामने आई, जहां आरोग्य मंदिर का कोई बोर्ड तक नहीं लगा है। यह केंद्र स्थानीय पार्षद के घर के भीतर चलाया जा रहा है और यहां पिछले तीन महीनों से डॉक्टर ही नहीं है। स्थानीय पीएचसी शॉपिंग सेंटर के चिकित्सक डॉ. संजय शायर के अनुसार डॉक्टर नहीं होने से मरीजों को काफी परेशानी हो रही है।</p>
<p><strong>आॅनलाईन फोटो में भी आधा ही स्टाफ</strong><br />केंद्रों के संचालन में पारदर्शिता पर भी सवाल उठ रहे हैं। कर्मचारियों के अनुसार अटेंडेंस के नाम पर सभी कर्मचारी एक साथ फोटो खींचकर आॅनलाइन अपलोड कर देते हैं, जबकि मौके पर आधे कर्मचारी भी मौजूद नहीं होते। ऐसे में भी विभाग द्वारा इन पर संज्ञान न लेना लापरवाही का सबसे बड़ा उदाहरण है।</p>
<p><strong>जनता तो क्या जनप्रतिनिधियों तक को नहीं पता</strong><br />जनता क्लिनिक के प्रचार प्रसार का हाल यह है कि इनके प्रति किसी भी प्रकार के रूट मेंपिंग तक विभाग के पास मौजूद नहीं है। सम्बन्धित मदर पीएचसी के प्रभारी चिकित्सकों ने तो यहां के रजिस्टरों में विजिट तक दर्ज नहीं हे, यहीं हाल आम नागरिको ने भी बयान किया कि हमें तो अभी तक पता ही नहीं कि हमारे यहां भी कोई क्लिनिक है। जनप्रतिनिधियों को भी इन केंद्रों की स्थिति की जानकारी नहीं है। गोवर्धनपुरा वार्ड-20 की पार्षद इति शर्मा (पूर्व ) ने कहा कि सरकार बनने के बाद इस विषय में उनसे कोई संवाद तक नहीं किया गया, और उन्हें यह तक नहीं पता कि उनके क्षेत्र में जनता क्लिनिक किस जगह और किस स्थिति में चल रहा है।</p>
<p><strong>नोडल अधिकारी ने कहा सभी 40 जगह डॉक्टर</strong><br />उधर विभाग नोड़ल अधिकारी डिप्टी सीएमएचओ घनश्याम मीणा का दावा है कि सभी 40 केंद्रों पर डॉक्टर लगाए जा चुके हैं। उनहोनें कहा कि एजेन्सी की ओर से हमे लेटर में बताया गया कि सभी जगह डॉक्टर लगे हुये है कहीं भी जगह खाली नहीं केवल बाकि दो स्टाफ की लिस्ट अभी नहीं आयी है। लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट इस दावे से बिल्कुल उलट तस्वीर दिखाती है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होने के बावजूद अब तक किसी प्रकार की सख्त कार्रवाई नहीं हुई है। सवाल यह है कि जब प्रत्येक केंद्र पर करीब 1.45 लाख रुपए प्रतिमाह स्टाफ पर खर्च किए जा रहे हैं, तो फिर जमीन पर स्टाफ ओर सुविधाएं क्यों नहीं दिखाई दे रही हैं। स्पष्ट है कि सिर्फ नाम बदलकर जनता क्लिनिक को ह्यआरोग्य मंदिरह्ण बना देने से स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार नहीं होगा। जब तक नियमित निरीक्षण, जवाबदेही और सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ये केंद्र आम लोगों के लिए राहत नहीं बल्कि निराशा का कारण बने रहेंगे ।</p>
<p><strong>जमीनी जांच में सामने आए तथ्य</strong><br />- 20 दिन में कई आरोग्य मंदिरों का भौतिक सत्यापन<br />-अधिकांश केंद्रों पर पूरा स्टाफ नहीं मिला<br />-दो केंद्रों पर निरीक्षण के दौरान ताले<br />-कई जगह डॉक्टर महीनों से नदारद<br />-गंदगी और अव्यवस्था, सफाई कर्मचारी तक नहीं<br />-अटेंडेंस के लिए फोटो अपलोड, मौके पर स्टाफ गायब</p>
<p><strong>प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का मजबूत होना बेहद जरूरी</strong><br />सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार शहरी क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। यदि इन केंद्रों पर नियमित डॉक्टर और स्टाफ उपलब्ध नहीं होगा तो छोटे-छोटे रोग भी गंभीर बन सकते हैं और मरीजों का बोझ सीधे बड़े अस्पतालों पर बढ़ेगा। इसलिए प्रशासन को इन केंद्रों की नियमित मॉनिटरिंग और जवाबदेही तय करनी चाहिए।</p>
<p><strong>यूँ बोले जिम्मेदार अधिकारी</strong><br />हमने एजेंसी से रिपोर्ट मांगी है। उनके अनुसार सभी 40 केंद्रों पर डॉक्टर लगा दिए गए हैं। इससे ज्यादा जानकारी अभी नहीं दी जा सकती।<br /><strong>- डॉ. घनश्याम मीणा, नोडल अधिकारी, आयुष्मान आरोग्य मंदिर, डिप्टी सीएमएचओ कोटा।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 15:04:05 +0530</pubDate>
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                <title>एक लाख से अधिक संस्थाएं रजिस्टर्ड, इनकी अपडेट जानकारी से विभाग भी है अनजान</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम के तहत पंजीकरण के बाद कानूनी कार्रवाई का विभाग के पास भी नहीं अधिकार]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/61d7dd3d0411f/article-3851"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-01/sahkarita-vibhag.jpg" alt=""></a><br /><p> जयपुर। प्रदेश में राजस्थान सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत होने वाली संस्थाओं की संख्या तो एक लाख के पार हैं, लेकिन इन संस्थाओं की कार्यशैली और मौजूदा अपडेट जानकारी रजिस्ट्रेशन करने वाले महकमे के पास भी नहीं है। कानून में जांच से लेकर रजिस्ट्रेशन रद्द करने के अधिकार नहीं होने के कारण सहकारिता विभाग ने भी इन संस्थाओं की तरफ देखना तो दूर, इनके बारे में किसी तरह की जानकारी भी अपडेट नहीं की है। साथ ही रजिस्टर्ड संस्थाओं की स्वयं की कोई वेबसाइट भी नहीं है ताकि आमजन एनजीओ के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकें। दरअसल, राजस्थान सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1958 के तहत विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाली स्वयं सेवी संस्थाओं का रजिस्ट्रेशन किया जाता है। इस रजिस्ट्रेशन की वर्ष 2017 तक ऑफलाइन प्रक्रिया थी, लेकिन 2017 के बाद ऑनलाइन प्रक्रिया शुरू की गई। ऑफलाइन रजिस्टर्ड संस्थाओं के दस्तावेज आज भी रद्दी के ढेर के बराबर है, उनका डिजिटलाइजेशन करने की कई बार योजना बनी, लेकिन परिणाम ना के बराबर रहे। वहीं दूसरी ओर 2017 के बाद ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन वाली संस्थाओं की जानकारी जरुर अपडेट मिल जाती है। इसमें भी जो संस्थाएं मृत प्राय: हो चुकी है, उनके बारे में विभाग के स्तर पर भी जानकारी जुटाना मुश्किल है। अर्थात जो संस्थाएं जिन उदेश्यों के लिए बनी उन संस्थाओं में अगर नियमित कार्यकलाप हो रहे है तो जरूर अपडेट जानकारी मिल जाती है, लेकिन जिनका कोई अपडेट नहीं है, उनके बारे में किसी तरह की जानकारी मिलना संभव नहीं है। विभाग में करीब एक लाख से अधिक संस्थाएं रजिस्टर्ड है, लेकिन इसमें से 70 फीसदी संस्थाएं अकेले जयपुर शहर में रजिस्टर्ड हुई है।<br /> <br /> <strong>मिलते-जुलते नामों पर रोक</strong><br /> संस्थाओं के नामकरण में कई तरह की आपत्तियों के बाद विभाग स्तर पर तय किया गया कि राष्ट्रीय सरकारी व अर्द्धसरकारी संस्थाओं से मिलते-जुलते नाम नहीं रखे जा सकेंगे। अर्थात राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग की आपत्ति पर संस्थाओं के नाम में इससे मिलते जुलते शब्दों का उपयोग नहीं नहीं तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से पोषित संस्थाओं से मिलते जुलते नाम का उपयोग नहीं करने के संबंध में रजिस्ट्रार की ओर से आदेश जारी कर 2010 में रोक लगाई गई।</p>
<p><br /> शिकायतों की जांच पर लगाई रोक : संस्थाओं के क्रियाकलापों के संबंध में शिकायत प्राप्त होने पर उनकी जांच के संबंध में रजिस्ट्रार की ओर से 19 नवंबर, 2020 को जारी परिपत्र में स्पष्ट किया गया अधिनियम में जांच करने अथवा इस क्रम में किसी प्रकार की शास्ति आरोपित करने का किसी प्रकार का प्रावधान नहीं है। ऐसे में सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियिम में पंजीकृत संस्थाओं के क्रियाकलापों में हस्तक्षेप से दूर रहने के निर्देश दिए गए।</p>
<p><br /> <strong>पुरानी संस्थाओं के संबंध में व्यवस्था:</strong><br /> अधिनियम के अन्तर्गत पूर्व में पंजीकृत समस्त संस्थाओं के लिए व्यवस्था की गई है कि धारा 12 एवं धारा 12क के अन्तर्गत सभी प्रकार के संशोधन संबंधी आवेदन ऑनलाइन ही किए जा सकेंगे तथा धारा 19 के अन्तर्गत रजिस्ट्रार संस्थाएं से दस्तावेजों की प्रतियां प्राप्त करने एवं प्रमाणित प्रति जारी करने संबंधी कार्रवाई ही ऑनलाइन ही की जाएगी।</p>
<p><br /> <strong>ऑडिट की प्रक्रिया भी अधूरी:</strong><br /> विभाग की ओर से पंजीकृत सभी संस्थाओं की आॅडिट की प्रक्रिया को शत प्रतिशत करने के दावे किए गए, लेकिन यह प्रक्रिया धरातल पर नहीं उतर पा रही है। इसे लेकर भी संस्थाओं में कई तरह की फर्जीवाड़े की शिकायतें सामने आती हैं। विभाग इसके लिए अपने ऑडिटर्स से ही काम को पूरा करवाने की तैयारी कर रहा है।</p>
<p><strong><br /> ट्रस्ट केवल देवस्थान में रजिस्टर्ड:</strong><br /> वहीं दूसरी ओर ट्रस्ट के नाम से संस्था का रजिस्ट्रेशन देवस्थान विभाग में होता है। इसमें संस्था के नाम के साथ ट्रस्ट और प्रन्यास शब्द उपयोग होता है, जबकि ट्रेड से संबंधित संस्थाएं श्रम व कंपनी एक्ट से संबंधित कंपनी रजिस्ट्रार के यहां संस्था का रजिस्ट्रेशन होता है। इनकी संख्या भी हजारों के पार है। <br /> <br /> सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियिम के तहत जो ऑफलाइन संस्थाएं रजिस्टर्ड हुई हैं, उनके दस्तावेजों को ऑनलाइन अपलोड किया जाएगा। ऑनलाइन रजिस्टर्ड संस्थाओं के बारे में पूरी जानकारी संबंधित कार्यालय में मिल जाती है। अब नए सिरे से इन संस्थाओं को लेकर कानूनी प्रावधान किए जाने पर विचार किया जा रहा है। -<strong>विवेकानंद यादव, ज्वाइंट रजिस्ट्रार (नियम) सहकारिता विभाग</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 07 Jan 2022 12:42:50 +0530</pubDate>
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