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                <title>tracks - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>टाइगर से चीते तक के खून से सने हाईवे और रेलवे ट्रेक, जंगल में तीन तरफ से मौत का जाल</title>
                                    <description><![CDATA[रफ़्तार की बली चढ़ रहे शेड्यूल - 1 के वन्यजीव:  मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व के वन्यजीवों को ट्रक और ट्रेनो ने रौंदा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/highways-and-railway-tracks-stained-with-the-blood-of-animals-from-tigers-to-cheetahs--a-death-trap-surrounding-the-forest-on-three-sides/article-136384"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/etws-(1200-x-600-px)-(16).png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा और रामगढ़ टाइगर रिजर्व से गुजरते नेशनल हाइवे और रेलवे ट्रेक वन्यजीवों की अकाल मौत का कारण बन रहे हैं। भोजन-पानी की तलाश में जंगल से बाहर निकलते ही बेजुबान जानवर सड़कों पर तेज रफ्तार ट्रकों और पटरियों पर दौड़ती ट्रेनों की चपेट में आ रहे हैं। हालात इतने भयावह हैं कि बीते पांच वर्षों में यहां 51 से ज्यादा वन्यजीव अकाल मौत का शिकार हो चुके हैं। इतना ही नहीं, लापरवाही का आलम यह है कि हाल ही में मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से निकले चीते की बारां जिले से गुजर रहे आगरा-मुंबई हाइवे के शिवपुरी लिंक रोड पर अज्ञात कार की टक्कर से दर्दनाक मौत हो गई। इसके बावजूद बेजुबान वन्यजीवों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कागजों से आगे नहीं बढ़ पाए। जबकि, अकाल मृत्यु के शिकार हुए वन्यजीवों में अधिकतर शेड्यूल वन श्रेणी के हैं। इन वन्यजीवों को भी सुरक्षा का उतना ही अधिकार प्राप्त है, जितना टाइगर को। इसके बावजूद वन अधिकारियों द्वारा इनकी सुरक्षा में कोताही बरती जा रही है।</p>
<p><strong>51 से ज्यादा वन्यजीवों को ट्रेन-ट्रकों ने कुचला</strong><br />मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व में वर्ष 2019 से 2025 तक टाइगर, पैंथर, भालू व मगरमच्छ, हायना सहित 50 से ज्यादा वन्यजीवों की सड़क व रेल दुर्घटनाओं में दर्दनाक मौत हो चुकी है। वहीं, वन्यजीव विभाग के अधीन सेंचुरी में भी वन्यजीव सुरक्षित नहीं है। यहां वर्ष 2023 व 24 में मगरमच्छ व मादा नील गाय को हाइवे पर बेलगाम दौड़ते भारी वाहन कुचल गए। बेजुबानों की दर्दनाक मौत के बावजूद वन अधकारियों द्वारा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए। अकाल मृत्यु में सर्वाधिक संख्या पैंथर की है।</p>
<p><strong>इधर, ट्रेन से कटा टाइगर, उधर कार ने कुचला चीता</strong><br />मुकंदरा टाइगर रिजर्व के दरा रेंज से गुजर रही रेलवे ट्रेक वन्यजीवों के लिए मौत का ट्रैक बनती जा रही है। वर्ष 2003 में रणथम्भौर से चलकर मुकुंदरा आया ब्रोकन टेल टाइगर की ट्रेन की टक्कर से मौत हो गई थी। वहीं, हाल ही में एनक्लोजर से बाहर निकली कनकटी भी कुछ मिनटों के लिए दरा रेलवे ट्रेक पर आ गई थी। इसके बाद वह पूरी रात ट्रेक के पास झाड़ियों में बैठी रही। जिससे उसकी जान को खतरा था। इधर, आठ दिन पहले गत 7 दिसम्बर को बारां जिले से गुजर रहे आगरा-मुंबई हाइवे के शिवपुरी लिंक रोड पर कूनो नेशनल पार्क से आया चीते को कार कुचल गई। इससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।</p>
<p><strong>11 केवी लाइन गिरी, करंट से लेपर्ड परिवार खत्म</strong><br />मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व के बीच डाबी के डसालिया वनखंड से गुजर रही 11 केवी बिजली का तार टूटकर गिर गया। करंट की चपेट में आने से लेपर्ड का पूरा परिवार खत्म हो गया। यहां नर व मादा लेपर्ड के साथ दो शावकों की भी मौत हो गई थी। वहीं, 4 नेवलों की भी करंट की चपेट में आने से मुत्यु हो गई। इसी तरह 12 दिसम्बर 2023 को नेशनल हाइवे 148-डी पर अज्ञात भारी वाहन ने 1 वर्षीय मादा पैंथर को रौंद दिया।</p>
<p><strong>ट्रेन की टक्कर से भालू के हो गए दो टुकड़े</strong><br />12 जनवरी 2020 को मुकुंदरा में दिल्ली-मुंबई रेलवे लाइन पर ट्रेन से कटकर 12 वर्षीय नर भालू की दर्दनाक मौत हो गई थी। ट्रेन की रफ्तार से भालू के शरीर के दो टुकड़े हो गए थे। यह दुर्घटना कमलपुरा स्टेशन के पास रेलवे लाइन पर डॉट के मोखे के ऊपर हुआ था।</p>
<p><strong>यह वन्यजीव हुए अकाल मौत के शिकार</strong><br /><strong>मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व :</strong> ब्रोकन टेल टाइगर, पैंथर, नर व मादा भालू, जरख, सियार, मगरमच्छ, मादा नील गाय, सांभर, चीतल, मोर, जंगली बिल्ली सहित अनेक जानवरों की ट्रेन व भारी वाहनों की टक्कर से मौत हो गई। इनमें से अधिकतर जानवरों की मौत पटरी पार करते हुए ट्रेन की चपेट में आने से हुई है।<br /><strong>रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व :</strong> पैंथर, जंगली सूअर, नर व मादा नील गाय (बच्चा), मोर, मादा सांभर, सियार, चीतल शामिल हैं। यह तो वो एनीमल हैं, जिनकी मौत रिकॉर्ड में दर्ज हैं, इसके अलावा कई एनीमल तो ऐसे हैं, जिनकी मौत का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है।<br /><strong>वाइल्ड लाइफ कोटा : </strong>वन्यजीव विभाग के अधीन अभयारणयों से मगरमच्छ व मादा नील गाय की मौत हुई है। यहां जंगलों से सटकर निकल रहे नेशनल, स्टेट व मेगा हाइवे गुजर रहे हैं। जिन्हें पार करते हुए मौत के शिकार हो गए।</p>
<p><strong>आंकड़ों में देखिए, ट्रेन से पैंथरों की दर्दनाक मौत</strong><br />- 5 मार्च 2023 को रामगढ़ टाइगर रिजर्व में भीमलत के पास बूंदी-चित्तौड़गढ़ रेलवे लाइन पर नर पैंथर की ट्रेन की चपेट में आने से मौत हो गई थी।<br />- 22 जनवरी 2021 को भीमलत के पास जालंधरी-श्रीनगर स्टेशन के बीच मादा पैंथर ट्रेन की चपेट में आ गई थी। जिससे उसका दम टूट गया।<br />- 11 मार्च 2021 को भीमलत के जंगलों में सीताकुंड वनक्षेत्र के जैतपुरा बांध के पास नर पैंथर की मौत हो गई।<br />- 30 अक्टूबर 2019 को भारी वाहन ने 7 माह के पैंथर शावक को हाइवे पर कुचल दिया।<br />-15 दिसम्बर 2025 : कोटा चित्तौड़ नेशनल हाइवे पर अज्ञात वाहन ने 4 वर्षीय मादा पैंथर को कुचल दिया। स्थिति नाजुक बनी हुई है।</p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />रामगढ़ टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों के लिए पर्याप्त भोजन-पानी की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में जंगल से बाहर निकलने पर रेलवे ट्रैक पार करते वक्त ट्रेन या हाइवे पार करते समय भारी वाहनों की चपेट में आने से जान गंवा बैठते हैं। बिजौलिया से करोंदी टोल के पास भालू की दुर्घटना में मौत होती रहती है। कई जगह से रिजर्व की दीवारें टूटी हुई हैं। यहां प्रोपर गश्त नहीं होती। जिसकी वजह से वनकर्मियों को वन्यजीवों की मौत का पता ही नहीं लग पाता। इनका मुखबिर तंत्र भी कमजोर है। फोरस्ट अधिकारियों को स्थानीय लोगों को साथ लेकर बेजुबानों की जान बचाने के प्रयास करना चाहिए।<br /><strong>-विट्ठल सनाढ्य, वन्यजीव विशेषज्ञ बूंदी</strong></p>
<p>जब भी फोरेस्ट की तरफ से रेलवे ट्रैक के आसपास वन्यजीव के मूवमेंट की जानकारी मिलती है तो ट्रेनों की स्पीड कम कर दी जाती है। पटरियों के पास व पीछे की ओर क्रेश बेरियर वॉल बनाई गई है। हालांकि, कुछ जगहों पर छुटी हुई है। लेकिन, मथूरा से नागदा तक क्रेश बेरियर वॉल का काम चल रहा है।<br /><strong>-सौरभ जैन, सीनियर डीसीएम रेलवे कोटा</strong></p>
<p>वाइल्ड लाइफ में नए प्रोजेक्ट पर कई कंडीशन लगाते हैं, जिसमें एलीवेटेड रोड व टनल बने, अंडर पास बने। वहीं, लोकल सर्विस रोड की मरम्मत की मंजूरी के दौरान अधिक ब्रेकर बनवाते हैं, जिससे वाहनों की गति कम रहे और वन्यजीव को सड़क पार करने को समय मिल सके। इसके अलावा जहां कहीं इस तरह की घटनाएं होती है तो उसके संबंध में हाई आॅथोरिटी से बात कर उचित उपाए करवाएंगे।<br /><strong>-सुगनाराम जाट, सीसीएफ मुकुंदरा टाइगर रिजर्व</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Dec 2025 16:53:01 +0530</pubDate>
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                <title>स्वाद की रेलगाड़ी: जहां टेबल पर रेल की पटरियां और परोसने के लिए पौने दो लाख रुपए का इंजन</title>
                                    <description><![CDATA[जोधपुर में एक रेस्टोरेंट ऐसा है जहां पर टेबल तक खाना कोई वेटर नहीं लाता बल्कि पटरियों के माध्यम से ट्रेन से पहुंचता है। रह गए ना दंग! पर सच यही है। जोधपुर में नगर निगम कार्यालय के पास ये स्वाद की रेलगाड़ी नजर आने लग जाती है। यह रेस्टोरेंट पूरी तरह से वेजिटेरियन है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jodhpur/the-train-of-taste-where-rail-tracks-on-the-table/article-13149"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/jod.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>जोधपुर।</strong> जोधपुर में एक रेस्टोरेंट ऐसा है जहां पर टेबल तक खाना कोई वेटर नहीं लाता बल्कि पटरियों के माध्यम से ट्रेन से पहुंचता है। रह गए ना दंग! पर सच यही है। जोधपुर में नगर निगम कार्यालय के पास ये स्वाद की रेलगाड़ी नजर आने लग जाती है। यह रेस्टोरेंट पूरी तरह से वेजिटेरियन है। ये रेस्टोरेंट ट्रेन थीम पर बना है। इसमें ग्राहकों के लिए कुसिर्या भी चेयरकार नुमा है। सामने टेबल है जिस पर रेल की पटरियां बनी है। ग्राहकों को खाना परोसने के लिए एक टॉय ट्रेन गुजरती है। इस ट्रेन के जरिए किचन से खाना ग्राहकों की टेबल पर भेजा जाता है। <br />इसका कॉन्सेप्ट प्लान किया जयपुर के अनिकेश वर्मा व उनके मित्र हिमांशु ने। जिन्होने पहले इसकी शुरूआत जयपुर से की फिर धीरे-धीरे जोधपुर और बाद में कोटा में भी इस तरह का रेस्टोरेंट प्लान किया। जो लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है।</p>
<p><strong>छाछ टॉवर भी बना हुआ आकर्षक :</strong> ट्रेन रेस्टोरेंट के साथ-साथ हाल ही में यहां पर एक नया कॉन्सेप्ट भी प्लान किया है। जिसका नाम है छाछ टॉवर।बीयर टॉवर आपने सुना होगा, मगर इसको जिस तरह से छाछ टॉवर में कन्वर्ट किया है वो हर किसी के लिए काफी आकर्षक बना हुआ है। इस छाछ टॉवर में एक नल दिया हुआ है जिसको ऑन करते ही आप उसमें से छाछ निकालकर पी सकते हैं और यह दिखने में काफी आकर्षक भी लगता है। <br /><br /><strong>ऑर्डर देते ही रेल की सिटी सुनाई देती है</strong><br />कस्टमर के खाना आर्डर करने के बाद उनका ऑर्डर किचन में तैयार होता है फिर टॉय ट्रेन में कस्टमर का आर्डर रखकर रिमोट के जरिये ट्रेन को ग्राहक की टेबल तक भेजा जाता है। कस्टमर अपना भोजन निकालकर सर्व कर लेता है। उसके बाद ट्रेन वापस किचन के लिए रवाना हो जाती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जोधपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Jun 2022 13:52:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>पगड़ी ही राजमुकुट, पटरियां ही मेरा सिंहासन: त्रिभुवन</title>
                                    <description><![CDATA[पगड़ीधारी और लाठी वाला कद्दावर किसान सा दिखता आदमी और वह भी अंग्रेजी की किताब पढ़े और धोती भी खांटी अंदाज में बांधे तो सहसा आकर्षण का विषय ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/jaipur---editorial--turban-is-the-crown--the-tracks-are-my-throne--kirori-bainsla/article-7151"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/colonel-baisala.jpg" alt=""></a><br /><p>गुर्जर आंदोलन के दिनों से पहले की बात है। मैं भारतीय जनता पार्टी की बीट देखता था और वह पगड़ीधारी कई बार इस पार्टी के ऑफिस में कभी-कभार दिखता था। लेकिन एक दिन मैं उनकी तरफ सहसा खिंचा चला गया जब उस शख्स के सामने एक किताब दिखी। यह नेपोलियन की बायोग्राफी थी। किताब फिलिप ड्वायर की लिखी ‘नेपोलियन : दॅ पाथ टु पावर’ थी। एक पगड़ीधारी और लाठी वाला कद्दावर किसान सा दिखता आदमी और वह भी अंग्रेजी की किताब पढ़े और धोती भी खांटी अंदाज में बांधे तो सहसा आकर्षण का विषय हो ही जाता है। यह जिज्ञासा मेरी आधुनिक परिवेश की उस कुंठा से उपजती है कि आखिर कोई धोती-पगड़ी वाला ठेठ ग्रामीण किसान कैसे अंग्रेजी की बेहतरीन पुस्तक पढ़ सकता है। उन्होंने बताया था कि युवा नेपोलियन उनका नायक है और वे उन्हें सेना के शुरुआती समय से ही पढ़ते रहे हैं। कर्नल किरोड़ी सिंह बैसला से यह पहली मुलाकात थी। उस संक्षिप्त सी मुलाकात में उन्होंने जो बताया, वह उनके मानीखेज व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ कहता था। प्रजा की, देश की और शासन की बातें।</p>
<p><br />खेत का खलिहान हमारा सिंहासन है, वाले दर्शन को मानने वाले किरोड़ीसिंह इस प्रदेश की ऐसी शख्सियतों में एक हैं, जिन्होंने आंदोलन को भिक्षा और दयनीयता से निकालकर आत्मसम्मान से इतना लबरेज बनाया कि राजसिंहासन उनके सामने बार-बार झुके। वे फिराक गोरखपुरी की पंक्तियों ‘सूरज-चांद अंगड़ाई लेंगे और तारे अपनी गति बदलेंगे’ वाले दर्शन को अपने भीतर बसाए हुए आंदोलनकारी थे। उन्होंने अपने तपेतपाए सैनिक जीवन के अनुभवों को जनआंदोलनों से जोड़ा और एक नई इबारत लिखी। जो अफसर और राजनेता अपने घर आए लोगों को निरीह बनाकर रखते हैं और उनसे मिलने का समय तक नहीं देते, उन्हें बैसला ने लोकतंत्र की लोकशक्ति का नया पाठ पढ़ाया। जो आम आदमी को मिलने का समय नहीं देते हैं, घर और दफ्तर के बाहर दिनों चक्कर लगवाते हैं और मिलें तो दुत्कार कर भगा देते हैं, उन अफसरों को उन्होंने याचक की मुद्रा में लाकर आम लोगों के बीच रेल की पटरियों पर बुला लिया। इस सदी के महान कवि विनोद कुमार शुक्ल का कहना है कि एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर। नदी जैसे लोगों से मिलने मैं नदी के किनारे चला जाऊंगा। कुछ तैरूंगा और डूब जाऊंगा। बैसला ने अपनी तरह के आंदोलन को जीवंत किया और बताया कि लोक की ताकत क्या होती है। उन्होंने सत्ता की उफनती मदमाती नदी को रेल की पटरियों पर बुलवाया और कहा कि इसमें पहले डूबो तो तैरने की बात बाद में सोचना। बैसला के भीतर गोल्ड्सवर्थी के सीजर की परंपरा के किस्सों की अनुगूंज थी। उन्होंने युवा नेपोलियन की जीवनी पढ़ी और चर्चा करके छोड़ दी हो, ऐसा नहीं था। उन्होंने उसे अपने भीतर उतारा। नेपोलियन ने महज तीस साल में सत्ता को अपने हाथ में करके असंभव को संभव कर दिखाया था। बैसला के लिए भी आंदोलन न तो सुगम था और न अपरिहार्य; लेकिन उन्होंने राजस्थान के शासन तंत्र और प्रशासन तंत्र के भीतर के मिथकों को एक-एक कर कुचल दिया। वे एक जोशीले नेता थे और उनका जुनून जिस उम्र में उभरा, वह इस प्रदेश के युवा नेताओं के लिए बहुत ही रश्क करने वाला है। बैसला एक गहरे आंदोलनकारी थे। अपने समय के राजनेताओं के बारे में उनका दृष्टिकोण हैरानीजनक तटस्थ और परिपक्व था। उन्होंने तड़ीबाज राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के छक्के छुड़ाए और अपनी शर्तों पर नए नियम और नए कायदे-कानून बनवाए। नए रंग और नए ढंग बनवाए। उनकी ताकत का आलम यह था कि अपने आंदोलन वाले इलाकों के कई जिलों में वे कलेक्टरों और जिला स्तरीय अधिकारियों की बैठकें लिया करते थे और राज्य सरकार ने इसके लिए बाकायदा एक आदेश निकाला था। भले उनका यह समय कम रहा; लेकिन जितना भी रहा, वह ऐसा था कि समाज के लोगों को लगता था ‘अब पाप कटेगा, संताप हटेगा और जीवन बदलेगा।’ बैसला ने अपने तरीके के आंदोलनों से अपनी एक अलग छवि गढ़ी। युवा नेपोलियन की कामयाबियों को अपने भीतर बसाते हुए बैसला ने राजस्थान के आधुनिक आंदोलनों के इतिहास में अपने आपको एक आकर्षक और नए दृष्टिकोण वाले नेता के रूप में स्थापित किया। हम देखते हैं कि प्राय: सभी आंदोलनकारी हर समय सिस्टम को ‘अब्यूज’ करते हैं, लेकिन बैसला ने ‘अब्यूज’ करने के बजाय बहुत नफासत से उसकी मरम्मत की और उसे ‘यूज’ भी किया। राजस्थान में आंदोलनों के अथाह कुएं, झरने, नदियां और बावड़ियां हैं; लेकिन एक गहरी सूखी नदी से अथाह जल हासिल कर लेने वाला अंदाज सिर्फ उन्हीं के पास था। उन्हें न कोई मुख्यमंत्री झुका पाया और न कोई सुप्रीम पावर। यह उन्होंने जन आंदोलनों से हासिल किया थौं; लेकिन जैसे ही वे राजनीति में गए, प्रदेश के लोक हृदय के क्षितिज पर दमकते उनके व्यक्तित्व ने अपनी दुर्लभ आभा को खो दिया।<br />बैसला के व्यक्तित्व की एक अनूठी प्रतिमा लोगों के हृदय में बनी हुई है। उनके आंदोलनों को लेकर सहमतियां-असहमतियां बनी रहेंगीैं;  लेकिन उनके आंदोलन ने पिरामिड की सी उम्र पाई है। जन आंदोलनों के सामने सरकारें बल्लियां लगाती हैं, शूल बिछाती हंै और तरह-तरह के मुकदमे दर्ज करती हैं; लेकिन बैसला ने रेल की पटरियों पर बैठकर सत्ता के शक्ति केंद्रों के तौर-तरीकों को बुलबुले की हैसियत में ला दिया। सरकारी तंत्र और राजसत्ता में बैठे राजनेता महीनों-वर्षों तक शांतिपूर्वक चलने वाले धरनों-प्रदर्शनों पर ध्यान नहीं देते हैं। यह हर दिन हर सरकार और हर विचार में देखने वाला सच है। लेकिन बैसला ने सिद्ध किया कि नवोदित तृणों के स्पर्श से भी सरकारों और प्रशासन तंत्र की रीढ़ को हिलाया जा सकता है और वह भी लोकतांत्रिक सभ्यता के खंडहरों में जनआंदोलनों की परंपरा के धराशायी होकर सिसकने के करुण समय में। <br />          <strong>  -त्रिभुवन </strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong><br /><br /><span style="color:#ff0000;">उन्होंने अपने तपेतपाए सैनिक जीवन के अनुभवों को जनआंदोलनों</span> से जोड़ा और एक नई इबारत लिखी। जो अफसर और राजनेता अपने घर-दफ्तर आए लोगों को निरीह बनाकर रखते हैं और उनसे मिलने का समय तक नहीं देते, उन्हें बैसला ने लोकतंत्र की लोकशक्ति का नया पाठ पढ़ाया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Apr 2022 14:14:32 +0530</pubDate>
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                <title>खिलाड़ियों के लिए आत्मघाती बने एथलेटिक ट्रेक को बदलने, अधूरे खेल भवन का निर्माण फिर शुरू करने और प्रशिक्षकों की नई भर्ती की उम्मीद</title>
                                    <description><![CDATA[खेल विभाग और राजस्थान खेल परिषद में चल रहा है मंथन]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/khel/%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A5%9C%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%8F%E0%A4%A5%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%9F%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%95-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%AC%E0%A4%A6%E0%A4%B2%E0%A4%A8%E0%A5%87--%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%96%E0%A5%87%E0%A4%B2-%E0%A4%AD%E0%A4%B5%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A3-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B0-%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%82-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A4%88-%E0%A4%AD%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%89%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A6/article-4096"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-01/9.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजस्थान सरकार के नये साल के बजट से पहले खेल विभाग और राजस्थान खेल परिषद ने भी मंथन शुरू कर दिया है। खेल परिषद की कुछ महती योजनाओं को लेकर विगत दिनों खेलमंत्री अशोक चांदना और परिषद के अध्यक्ष के स्तर पर चर्चाएं हुईं ताकि इन योजनाओं के लिए अतिरिक्त बजट आवंटन की मांग लेकर सरकार के साथ बजट पूर्व बैठक में अपना पक्ष रखा जा सके। राजस्थान खेल परिषद के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार खेल विभाग को बजट में राजस्थान खेल परिषद में प्रशिक्षकों की नई भर्ती, खिलाड़ियों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर का जिम बनाने, खेल उपकरणों की खरीद के लिए अतिरिक्त  राशि आवंटित करने, खस्ता हाल बन चुके एथलेटिक ट्रैक को बदलने और खेल भवन के अधूरे निर्माण कार्य को पूरा करने के लिए अतिरिक्त राशि के आवंटन की उम्मीद है। <br /> <strong><br /> पांच साल में पूरा नहीं हुआ खेल भवन</strong><br /> सरकार ने 2016-17 के बजट में एसएमएस स्टेडियम में खिलाड़ियों के ठहरने के लिए बहुमंजिला खेल भवन के निर्माण की घोषणा की और इसके लिए 10 करोड़ और साज-सज्जा के लिए तीन करोड़ रुपए का राशि आवंटित की गई लेकिन भवन का कार्य अभी तक पूरा नहीं हो सका है। पैसा नहीं होने की वजह से खेल परिषद ठेकेदार को भुगतान नहीं कर सकी और कार्य बीच में ही रुक गया। <br /> <strong><br /> रिक्त हैं खेल अधिकारी और प्रशिक्षकों के 86 पद</strong><br /> राजस्थान खेल परिषद में खेल अधिकारी और प्रशिक्षकों के 183 पद स्वीकृत हैं लेकिन इनमें से 86 पद रिक्त पड़े हैं। खेल परिषद में प्रशिक्षकों की सीधी भर्ती 2012 में हुई लेकिन इसके बाद दस साल के भीतर खेल अधिकारी और प्रशिक्षक सेवानिवृत होते गए लेकिन उनके स्थान पर नए प्रशिक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई। प्रशिक्षकों के अभाव में प्रदेशभर में प्रशिक्षण कार्य प्रभावित हो रहा है। <br /> <br /> खिलाड़ियों के लिए घातक बन गया है एथलेटिक ट्रैक<br /> सवाई मानसिंह स्टेडियम के सिंथेटिक एथलेटिक ट्रैक को बने करीब डेढ़ दशक बीत चुका है। ट्रैक के हालात अब इतने खराब हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक की तैयारी के लिए आने वाले खिलाड़ी इस टैÑक पर घातक चोट का शिकार भी बन सकते हैं। ट्रैक कई जगह से उखड़ गया है और कई जगह पर असमतल हो गया है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि बजट में इसे बदलने के लिए प्रावधान किया जाए।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Thu, 20 Jan 2022 18:11:34 +0530</pubDate>
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