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                <title>शहर में हर घंटे हो रही एक गाय की मौत, दिन में पांच से ज्यादा हो रही वाहनों से चोटिल </title>
                                    <description><![CDATA[जानकारी के अनुसार वर्तमान में शहर में रोजाना करीब 20 से 22 गायों की मौत हो रही है।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/one-cow-is-dying-every-hour-in-the-city--more-than-five-are-getting-injured-by-vehicles-every-day/article-92808"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-10/4427rtrer-(7)7.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। हिन्दू धर्म में जिसे माता के रूप में पूजा जाता है। उसके दूध को अमृत समझा जाता है। उसी गाय की इन दिनों दुर्दशा हो रही है। हालत यह है कि देखरेख के अभाव में अधिकतर गाय लावारिस हालत में सड़कों पर घूमती देखी जा सकती है। जिससे पॉलिथीन युक्त खाद्य पदार्थ खाने से बीमार होने और हादसों में घायल होने से शहर में हर घंटे एक गाय की मौत हो रही है। सड़कों पर खड़े रहने से हर चार घंटे में एक गाय घायल हो रही है। घायल गाय का कोई धणी धोरी नहीं है। कोई उन्हें अस्पताल तक नहीं पहुंचाता।</p>
<p>जो लोग गाय को पाल भी रहे है तो उनमें से अधिकतर लोग सुबह-शाम दूध निकालने के बाद उन्हें सड़कों पर चरने के लिए छोड़ देते है। जिससे वे या तो हादसों का शिकार हो रही है या फिर पॉलिथीन में फेके जा रहे खाद्य पदार्थ खाने से बीमार हो रही है। वहीं दूध नहीं देने वाली गायों को तो कोई पाल भी नहीं रहा। उन्हें लावारिस हालत में छोड़ा जा रहा है। जिन्हें नगर निगम की गौशाला में रखा जा रहा है। वहां बीमार व घायल गायों की मौत हो रही है। जानकारी के अनुसार वर्तमान में शहर में रोजाना करीब 20 से 22 गायों की मौत हो रही है। यानि हर एक घंटे में एक गाय की मौत हो रही है। इसी तरह पांच से ज्यादा गायं हर दिन घायल हो रही हैं।  </p>
<p><strong>गाय पूजनीय, उसकी सुरक्षा होनी चाहिए</strong><br />न्यू गोपाल विहार निवासी मेघना सक्सेना ने बताया कि घर में खाना बनाते समय सबसे पहली रोटी गाय के नाम की निकाली जाती है। घर के दरवाजे पर आने वाली गाय को रोटी खिलाते है। घर नहीं आने पर पहले उसे रोटी खिलाने के बाद ही खाना खाते है। समय-समय पर गायों को चारा डालते है। ऐसे में उन गायों की सुरक्षा व देखभाल होनी चाहिए।  तलवंडी निवासी राजेश गुप्ता ने बताया कि गाय के दूध देने तक तो लोग उसकी सेवा व खानपान अच्छा रखते है। दूध देना बंद करने पर उसे लावारिस छोड़ देते है। जिससे उन्हें सड़कों पर पड़ी चीजे ही खानी पड़ रही है। ऐसे में पॉलिथीन में खाद्य सामग्री होने से वह उस समेत खा रही है। जिससे उनकी मौत अधिक हो रही है। ऐसे में गायों की रक्षा के लिए खाद्य पदार्थ को पॉलिथीन में डालना बंद करना होगा।  </p>
<p><strong>वर्तमान में क्षमता से अधिक गौवंश से बढ़ा आंकड़ा</strong><br />नगर निगम कोटा दक्षिण गौशाला समिति के अध्यक्ष जितेन्द्र सिंह ने बताया कि वर्तमान में जिला कलक्टर के निर्देश पर नगर निगम कोटा उत्तर व दक्षिण की ओर से घेरे डालकर गौवंश को पकड़ा जा रहा है। जिन्हें पहले कायन हाउस में रख रहे हैं। वहां से कैटल वेन से उन्हें बंधा धर्मपुरा स्थित गौशाला में पहुंचाया जा रहा है।   रोजाना करीब 80 से 100 गौवंश को गौशाला में लाया जा रहा है। सिंह ने बताया कि गौशाला में गायों की क्षमता करीब एक से डेढ़ हजार है। लेकिन वहां वर्तमान में 27 सौ से अधिक गौवंश है। ऐसे में यहां बीमार व कमजोर गायों को सांड द्वारा व पुरानी गायों द्वारा मारने से उनकी मौत हो रही है। कुछ दिन पहले जहां गायों की मौत का आंकड़ा कम हो गया था। वह फिर से बढ़कर रोजाना 10 से अधिक हो गया है। गायों की मौत का अधिकतर कारण उनके बीमार व कमजोर हालत में आना है। जिससे वे बैठक ले लेती है। उसके बाद दोबारा उठ नहीं पाती और उनकी मौत हो जाती है। लम्पी रोग से भी कई गायों की मौत हुई है। </p>
<p><strong>पहले सौ-सौ मरती थी अब कम हुई है संख्या</strong><br />नगर निगम के मुर्दा मवेशी उठाने वाले संवेदक बाबू भाई का कहना है कि शहर में पहले से गायों की मौत की संख्या कम हुई है। पहले जहां रोजाना 80 से 100 गायों तक की मौत हो रही थी। वहीं अब इनकी संख्या कम हुई है। बरसात में यह संख्या बढ़ जाती है। वर्तमान में निगम की गौशाला व शहर में अन्य स्थानों पर मिलाकर कुल 20 से 22 गायों की मौत हो रही है। निजमें गाय, बछड़े, शामिल हैं। उन्होंने बताया कि पहले सड़कों पर लावारिस गाय अधिक रहती थी। लेकिन देव नारायण योजना बनने से अधिकतर वहां शिफ्ट हो गई है। वहां  उनकी देखभाल होने व खाना अच्छा मिलने से मृत्युदर कम हुई है। गायों के हादसों के मामले भी अधिकतर हाइवे पर ही होते है। जिनमें गायों की मौत होती है। </p>
<p><strong>व्यवस्था सुधरने से कम हुई मृत्युदर</strong><br />नगर निगम कोटा दक्षिण के उपायुक्त व गौशाला प्रभारी महावीर सिंह सिसोदिया ने बताया कि निगम की गौशाला में पहले से व्यवस्थाओं में काफी सुधार किया गया है। भूसा, चारा, चापड़ के अलावा साफ सफाई व छाया पानी की भी व्यववस्था सुधरी है। बीमार पशुओं के लिए चिकित्सा व उपचार की सुविधा भी की है। लेकिन जो अधिक बीमार व बैठक लेने के बाद उठ नहीं पाती उनकी मौत होना तो स्वाभाविक है। </p>
<p><strong>हादसों में घायल का उपचार कर पहुंचाते हैं गौशाला</strong><br />शहर में अधिकतर गायों की मौत का कारण बीमार व कमजोर हालत होना है। वैसे शहर में घायल गाय की सूचना पर उन्हें वाहन के माध्यम से पशु चिकित्सालय लाया जाता है। यहां से उपचार करके उन्हें कायन हाउस व गौशाला में पहुंचा जाता है। पहले घायल गायों की संख्या अधिक रहती थी लेकिन अब यह कम हुई है। <br /><strong>- डॉ. अखिलेश पांडे, उप निदेशक पशु चिकित्सालय  मोखापाड़ा </strong></p>
<p><strong>लम्पी से नहीं हुई कोई मौत</strong><br />शहर में पशुओं में लम्पी रोग फिर से आया है। वर्तमान में अब तक कुल 108 पशु इसकी चपेट में आ चुके है। जिनमें से 60 ठीक हो चुके है। लम्पी की चपेट में आने वाले अधिकतर बढ़डे है। इनकी संख्या कम होने से पहले निगम के किशोरपुरा स्थित कायन हाउस में आईसोलेशन सेंटर बनाया था। संख्या बढ़ने पर बंधा धर्मपुरा गौशाला में भी एक सेंटर बनाया है। शहर में इस बार लम्पी से एक भी गाय की मौत नहीं हुई है। यह इस बार उतना अधिक खतरनाक भी नहीं है। <br /><strong>- डॉ. चम्पालाल मीणा, संयुक्त निदेशक, पशु पालन विभाग </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 11 Oct 2024 15:54:45 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>लिवर फेलियर का बड़ा कारण हेपेटाइटिस: साइलेंट किलर से सालाना 10 लाख लोगों की हो रही मौत</title>
                                    <description><![CDATA[एक लाख लोग लीवर सिरोसिस और कैंसर से मरते हैं जो मुख्यतया हेपेटाइटिस बी वायरस से होता है। इसीलिए विशेषज्ञों का मानना है कि यह जरूरी है कि हेपेटाइटिस का समय पर निदान होने के साथ इसका इलाज करवाना चाहिए]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/10-lakh-people-are-dying-every-year-due-to-silent/article-66600"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/photo-(3)1.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जयपुर। देश में लिवर से जुड़ी गंभीर समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। लिवर संबंधित बीमारियों के मामले बढ़ने साथ ही इससे होने वाली मौतों का आंकड़ा भी बढ़ रहा है। आंकड़ों के अनुसार भारत में सालाना दस लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हेपेटाइटिस बी और सी के कारण लिवर की बीमारियों से हो जाती है। एक लाख लोग लीवर सिरोसिस और कैंसर से मरते हैं जो मुख्यतया हेपेटाइटिस बी वायरस से होता है। इसीलिए विशेषज्ञों का मानना है कि यह जरूरी है कि हेपेटाइटिस का समय पर निदान होने के साथ इसका इलाज करवाना चाहिए जिससे इसे गंभीर होने से बचाया जा सके। अत्यधिक जटिल स्थिति में लिवर ट्रांसप्लांट ही विकल्प बचता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>90 प्रतिशत लोगों को पता नहीं चलते लक्षण</strong><br />सीनियर गेस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट डॉ. एसएस शर्मा ने बताया कि हेपेटाइटिस के पांच प्रकार ए, बी, सी, डी और ई होते हैं। इनमें सबसे खतरनाक बी और सी हैं। बी व सी से संक्रमित 90 फीसदी से अधिक लोगों को पता ही नहीं होता कि उन्हें यह बीमारी है। लंबे समय तक उनके अंदर बीमारी के लक्षण सामान्य मानकर अनदेखा किया जाता रहता है। इसीलिए इसे साइलेंट किलर भी माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong> लिवर कैंसर का बड़ा कारण</strong><br />डॉ. शर्मा ने बताया कि बी और सी श्रेणी घातक हैं और लिवर पर असर करते हैं। इससे लिवर कैंसर भी हो सकता है। हेपेटाइटिस सी का बड़ा कारण शराब सेवन भी है। शराब का ज्यादा सेवन हेपेटाइटिस सी से पीड़ित लोगों के अंगों में रेशेदार तंतुओं का तेजी से बनने वाली बीमारी फााइब्रोसिस कर देती है। हेपेटाइटिस से बचाव के लिए वैक्सीन लगवाए जा सकते हैं। एचआईवी, टीबी और मलेरिया तीनों रोगों के मरीजों को एक साथ जोड़ लें तो भी उनसे ज्यादा लोग हेपेटाइटिस से पीड़ित हैं। लिवर कैंसर के 80 फीसदी केस क्रॉनिक हेपेटाइटिस बी व सी के कारण सामने आते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jan 2024 10:01:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हर रोज 10 से 12 गायों की गौशाला में मौत</title>
                                    <description><![CDATA[गौ सेवकों का कहना है कि नगर निगम की और से गायों को पर्याप्त खाना और इलाज मुहैया नहीं कराने से उनकी मौत हो रही है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/every-day-10-to-12-cows-die-in-the-cowshed/article-51104"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-07/har-roz-10-se-12-gaayo-ki-gausahala-me-maut...kota-news-07-07-2023.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। नगर निगम की और से संचालित बंधा धर्मपुरा स्थित गौशाला में गौवंश के मरने का सिलसिला अनवरत जारी है। गौशाला में शहर में पकड़ लाई गई बीमार और प्लास्टिक खाई हुई प्रतिदिन 10 -12 गाये काल का ग्रास बन रही है। इसके पीछे नगर निगम के अधिकारियों का कहना है। गायों पेट में तीस से चालीस किलो प्लास्टिक है। यहां चारा और पानी की सुविधा होने से गाए भरपेट खाना खा रही जिससे उनका चारा पच नहीं रहा है। ऐसे रात के समय गाय बैठ जाती है तो फिर उठ नहीं पाती है उसकी मौत हो जाती है। गौ सेवकों का कहना है कि नगर निगम की और से गायों को पर्याप्त खाना और इलाज मुहैया नहीं कराने से उनकी मौत हो रही है। </p>
<p><strong>क्षमता से अधिक हैं पशु</strong><br />नगर निगम की बंधा धर्मपुरा स्थित गौशाला में जहां वर्तमान में करीब 3 हजार से अधिक गौवंश है। क्षमता से अधिक गौवंश होने से वहां गायों को घूमने और फिरने की पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती है। दूसरा स्वस्थ्य और बीमार गायों को एक साथ रखा जाता है। जिससे स्वस्थ्य गाये भी बीमार हो रही है। वहां सभी गौवंश को बरसात से बचने के लिए पूरे शेड तक बने हुए नहीं हैं। ऐसे में बरसात होते ही अधिकतर गाय, बैल व बछड़े उससे बचने के लिए शेड की तरफ भागते हैं। शेड की संख्या कम होने से उसमें सीमित ही गौवंश आ पा रहे हैं। जिससे वे एक दूसरे को धक्का देकर बचने का प्रयास कर रही हैं। ऐसे में उनके चोटिल होने के साथ ही गिरने से मौत हो रही है। </p>
<p><strong>पशु चिकित्सालय नहीं होने से समय पर नहीं मिलता इलाज</strong><br />नगर निगम कोटा दक्षिण की गौशाला समिति के अध्यक्ष जितेन्द्र सिंह ने बताया कि गायों को पर्याप्त खाना पानी दिया जा रहा है। लेकिन गौशाला में प्लास्टिक खाई हुई गाए ज्यादा है। यहां खाना ज्यादा खाने के बाद गाये पानी पीती है और उनका पेट फूलने लगता है। पेट प्लास्टिक होने से उनकी पाचन क्षमता पहले से कमजोर हो चुकी है। ऐसे में उनके पेट फूल जाता है रात को खाना पचाने के लिए बैठती है तो फिर उठ ही नहीं पाती है उनकी मौत हो जाती है। गौशाला में रोज कभी 5 तो कभी 7 और अधिकतम 12 -14 गायों की ही मौत होती है।  बंधा धर्मपुरा गौशाला के पास पास पशु चिकित्सालय नहीं खुलेगा तब गायों की मौत को रोक पाना मुश्किल हम गायों की देखभाल कर सकते है इलाज के लिए तो डॉक्टर और कंम्पाउडर की जरूरत होती है। रात में गाये बैठती है तो सुबह उठती ही नहीं है। मौत हो जाती है। जब यहां 10 से 12 डॉक्टर और20 कम्पाउंटर वाला पशु चिकित्सालय नहीं खुलेगा गायों की मौत नहीं रोक पाएंगे। अधिकांश मौत रात के समय होती है। ऐसे 24 घंटे वाला अस्पताल की जरूरत है। </p>
<p><strong>दिन में स्वस्थ्य दिखती रात में हो जाती बीमार</strong><br />गौशाला में अधिकांश बीमार गाये आ रही है। उनके पेट में 25 से 30 किलो प्लास्टिक होता है। उनकी जांच और इलाज के लिए यहां पर्याप्त डॉक्टर और कंम्पाउंडर नहीं है। दिन में गाये स्वस्थ्य दिखती है। एक एक गाय को आधा आधा किलो आहार तो तौल कर नहीं खिला सकते है। गाये आवश्यकता से अधिक भूसा चारा खा जाती उसके बाद पानी पीते ही उनका अर्जीण होने लगता है। रात में जो गाय बैठती सुबह मरी मिलती है। गौशाला के कर्मचारी अनवृत गायों को उठाते लेकिन वो इतनी कमजोर होती है कि एक बार बैठ गई तो फिर नहीं उठती है। </p>
<p><strong>1100 गौवंश को किया शिफ्ट</strong><br />जितेन्द्र सिंह ने बताया कि गौशाला में कुछ समय पहले तक 4 हजार से अधिक गौवंश हो गया था। जिसे रखने की जगह तक नहीं थी। ऐसे में गौवंश की मृत्यु दर अधिक हो रही थी। जिला कलक्टर के निर्देश पर जिले की अन्य गौशालाओं को गौवंश शिफ्ट करने के निर्देश दिए गए थे। जिसकी पालना में वर्तमान में करीब 1100 गौवंश को अन्य निजी गौशालाओं में शिफ्ट कर दिया है।<br /><strong>- नगर निगम की गौशाला है या मौत शाला</strong></p>
<p>कोटा नगर निगम कोटा दक्षिण वैसे तो गौशाला को लेकर बड़े बड़े दावे करता हुआ आ रहा है पर सच्चाई कुछ और ही नजर आ रही है अव्यवस्थाओ का आलम ऐसा है की हर तरह गंदगी के साथ मरी हुई गाय नजर आ रही है व्यवस्था बनाने की बजाय अव्यवस्था ज्यादा फैलती हुई नजर आ रही है गायों को पोषाहार का कही कोई नामोनिशान नहीं है रोजाना 20 से 25 गायों की रोजाना मृत्यु हो रही है कारण सिर्फ सूखा भूसा ही खिलाना है। <br /><strong>- सुरेंद्र राठौर, पार्षद नगर निगम कोटा</strong></p>
<p>गौशाला में गायों की पूरी देखभाल की जा रही है। प्लास्टिक खाई हुई और बीमार गायों की ही मौत हो रही है। गायों को डॉक्टर को दिखाकर इलाज भी कराया जा रहा है। <br /><strong>- दिनेश शर्मा, प्रभारी गौशाला, नगर निगम कोटा दक्षिण  </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 07 Jul 2023 19:35:20 +0530</pubDate>
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                <title>ईआरसीपी को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा नहीं मिलने से दम तोड़ रहा केवलादेव पक्षी अभयारण्य : रामनिवास</title>
                                    <description><![CDATA[रामनिवास मीना ने कहा है, कि ईआरसीपी को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा नहीं मिलने से देश भर में प्रसिद्ध भरतपुर का केवलादेव घना पक्षी अभयारण्य दम तोड रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/karauli/keoladeo-bird-sanctuary-ramniwas-dying-due-to-not-getting-national/article-29468"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-11/12-todabhim-04.jpg" alt=""></a><br /><p>भरतपुर/टोडाभीम। पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना किसान संघर्ष समिति के प्रदेशाध्यक्ष भामाशाह रामनिवास मीना ने कहा है, कि ईआरसीपी को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा नहीं मिलने से देश भर में प्रसिद्ध भरतपुर का केवलादेव घना पक्षी अभयारण्य दम तोड रहा है। इस बारे में सरकार को गंभीरता से मंथन करना चाहिए। सरकार का यही रवैया रहा तो उत्तरी-पूर्वी राजस्थान की प्राकृतिक धरोहरों का अस्तित्व संकट में पड जाएगा। </p>
<p>पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना किसान संघर्ष समिति के प्रदेशाध्यक्ष रामनिवास मीना संघर्ष समिति के महामंत्री भरतसिंह डागुर, प्रदेश मीडिया प्रभारी दीनदयाल सारस्वत व अन्य पदाधिकारियों के साथ शनिवार को भरतपुर के केवलादेव पक्षी अभयारण्य पहुंचे और पानी के अभाव में अभयारण्य के हालातों से साक्षात हुए। अभयारण्य के हालात जानने के बाद प्रदेशाध्यक्ष मीना ने कहा कि ईआरसीपी में पूर्वी राजस्थान के जो 13 जिले शामिल हैं, उनमें भरतपुर भी प्रमुख रूप से सम्मलित है। घना पक्षी अभयारण्य में पानी का अभाव होने से साइबेरियन सारस सहित कई अन्य प्रजातियों के पक्षियों ने भी आना बंद कर दिया है। इसके साथ अभयारण्य में मात्र बारिश के दिनों में ही हरियाली रहती है। ऐसे में अभयारण्य के प्रति सरकार की अनदेखी का रवैया ऐसा ही रहा तो देश की प्रमुख प्राकृतिक धरोहरों में शामिल घना पक्षी अभयारण्य का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। प्रदेशाध्यक्ष मीना ने कहा कि सरकार को घना में पर्याप्त पानी उपलब्ध कराने के लिए ईआरसीपी को राष्ट्रीय परियोजना घोषित करना चाहिए।</p>
<p>चंबल का पानी नहरों के माध्यम से भरतपुर तक आएगा तो घना पक्षी अभयारण्य को नया जीवन मिलेगा। प्रदेशाध्यक्ष मीना के साथ उपस्थित प्रदेश महामंत्री भरतसिंह डागुर एवं प्रदेश मीडिया प्रभारी दीनदयाल सारस्वत ने भी कहा कि ईआरसीपी प्रदेश के 13 जिलों के किसानों की उन्नति का अहम रास्ता है। इसके साथ ही प्राकृतिक धरोहरों का संरक्षण देने का भी बडा माध्यम है। इसे समझते हुए केन्द्र सरकार को ईआरसीपी को राष्ट्रीय परियोजना घोषित करने का कार्य शीघ्र करना चाहिए। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>करौली</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 13 Nov 2022 11:52:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तंबाकू मुक्त राजस्थान की तैयारी, झुंझुनूं से होगी शुरुआत</title>
                                    <description><![CDATA[जानलेवा तंबाकू :     हर साल 77 हजार की हो रही है मौत, प्रदेश की 24.7 फीसदी आबादी तंबाकू का सेवन कर रही, जयपुर के एसएमएस अस्पताल में ही 15 हजार तंबाकू सेवन से कैंसर ग्रसित होकर आ रहे,  40 फीसदी कैंसर मरीज ऐसे जिन्होंने कभी ना कभी तंबाकू का सेवन किया है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/preparation-for-tobacco-free-rajasthan-will-start-from-jhunjhunu--4-1--of-children-in-the-age-group-of-13-to-15-years-are-also-consuming--deadly-tobacco--77-thousand-are-dying-every-year--24-7--of-the-state-s-population-is-consuming-tobacco/article-5372"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/tobacco.jpg" alt=""></a><br /><p> जयपुर। नशे से मुक्त करने की कड़ी में चिकित्सा विभाग ने राजस्थान को तंबाकू मुक्त प्रदेश बनाने की कवायद शुरू की है। इसके लिए पहले चरण में सौ दिवसीस प्लान तैयार किया है। खास बात यह है कि इस मुहिम में जिलों के कलेक्टर से लेकर सबसे छोटी हेल्थ वर्कर्स माने जाने वाली आशा सहयोगिनियों तक को लगाया जाएगा। ग्राम पंचायतों में तंबाकू मुक्ति के प्रस्ताव पारित कराए जाएंगे। इसकी शुरुआत झुंझुनूं जिले की 46 ग्राम पंचायतों से होने जा रही है। चिकित्सा मंत्री परसादी लाल मीणा की अध्यक्षता में इसे लेकर पहली बैठक हुई है। इसमें एनएचएम डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी ने तंबाकू मुक्त राजस्थान बनाने का अपना सौ दिवसीय प्लान रखा है। झुंझुनूं के नवलगढ़ ब्लॉक की 46 ग्राम पंचायतों के प्रधान दिनेश सुंडा सबसे पहले इसके लिए आगे आए हैं। जिले के तंबाकू नियंत्रण प्रकोष्ठ ने मुक्ति के लिए अपनी योजना भी बताई है। अभियान में जिला कलेक्टर, एसडीएम, चिकित्सा विभाग के सभी क्षेत्रीय अफसरों को जिम्मा दिया जाएगा। गुरुवार को प्रदेशभर के अधिकारियों की बैठक भी होगी। जागरूकता के लिए अभियान भी चलेंगे।  <br /><br /><span style="background-color:#ffff99;color:#ff0000;"><strong>यूं चलेगा अभियान</strong></span><br />चिकित्सा विभाग स्थानीय प्रशासन के सहयोग से पंचायत स्तर के जनप्रतिनिधियों को इसके लिए तैयार करेगा। पंचायत में प्रस्ताव पास करवाएगा। इसके बाद यहां पंचायत तंबाकू मुक्त कर अपने अन्य सदस्यों, ग्रामीण इलाकों में वे सरकारी मदद से लोगों के तंबाकू छोड़ने के संकल्प पत्र भरवाएंगे। नशा मुक्ति केन्द्रों में आदतन लोगों को लत छुड़वाने के लिए चिकित्सा सेवा भी दिलवाएंगे। <br /><br /><span style="background-color:#ffff99;color:#ff0000;"><strong>फिर शुरू होगा महीने में आखिरी दिन प्रतिबंध</strong></span><br />दो साल पहले प्रदेश में महीने के अंतिम दिन तंबाकू के बेचान पर प्रतिबंध से एकबारगी इसकी शुरुआत हुई थी, लेकिन बाद में अभियान बंद हो गया। इसे भी फिर से व्यापार मंडलों की मदद से शुरू किया जा रहा है। <br /><br /><span style="background-color:#ffff99;color:#ff0000;"><strong>कोटपा एक्ट से भी होगी सख्ती</strong></span><br />तंबाकू के सार्वजनिक स्थल, दफ्तरों, स्कूलों के पास इत्यादि तय जगहों पर तंबाकू के सेवन पर कोटपा एक्ट के तहत सख्त कार्रवाई होगी। प्रतिबंधित क्षेत्रों में सेवन करने वालों पर दो सौ रुपए का जुर्माना लगेगा।<br /><br />अभियान के शुरुआती सौ दिन की कार्य योजना तैयार है। पंचायतों में प्रस्ताव पास करवाएंगे। स्कूलों में बच्चों को जागरूक करेंगे। नशा मुक्ति केन्द्रों का भी उपयोग होगा। -<strong>डॉ. एसएन धौलपुरिया, नोडल अफसर, तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 03 Mar 2022 10:26:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रदेश में हर साल 2,886 प्रसूताएं तोड़ रही हैं दम</title>
                                    <description><![CDATA[नवजात को कोख में नौ महीने पालकर जिदंगी देने वाली 8 प्रसूताएं राजस्थान में रोजाना प्रसव के दौरान दम तोड़ रही हैं। हर साल प्रदेश में करीब 17.60 लाख महिलाएं बच्चों को जन्म देती हैं, जिनमें प्रति एक लाख प्रसूताओं पर 164 की मौत हो जाती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B9%E0%A4%B0-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2-2-886-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%82-%E0%A4%A4%E0%A5%8B%E0%A4%A1%E0%A4%BC-%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%A6%E0%A4%AE/article-4219"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-01/prasuta.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। प्रदेश में 2,886 प्रसूताएं हर साल बच्चे को जन्म देने या प्रसव के दौरान मर रही हैं। हालांकि प्रदेश में 2003 के मुकाबले यह संख्या आधी हो चुकी है, लेकिन अभी भी प्रसूताओं की चिकित्सकीय केयर पर उनके परिजन को जागरूक करने की जरुरत है। वहीं दूसरी ओर चिकित्सा विभाग की मेटरनिटी हेल्थ की स्कीमों, जागरूकता अभियान को जमीनी स्तर पर और मजबूत करने की आवश्यकता है।<br /> <strong><br /> रैफरल परिवहन की मजबूती नहीं</strong><br /> चौबीसों घंटे दुर्गम और दूरस्थ डिलेवरी पाइंट पर रैफरल सिस्टम के लिए परिवहन की व्यवस्था भी नहीं है। ऐसे में प्रसूता की हालत बिगड़ने पर उच्च अस्पतालों में परिवहन में देरी भी मौत का एक कारण है।  <br /> <br />                                 <span style="background-color:#ffff99;"><span style="color:#ff0000;"><span style="font-size:larger;"><strong>प्रसूताओं की मौतें क्यों?</strong></span></span></span><br /> <strong>44.7%महिलाएं प्रसव पूर्व अस्पताल नहीं जाती</strong><br /> नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक राजस्थान में 44.7 फीसदी प्रसूताएं ऐसी हैं जो प्रसव पूर्व जांच और चिकित्सकीय परामर्श को अस्पताल ही नहीं जाती हैं। गंभीर बात यह है कि गांवों में प्रसूताएं इसे लेकर ज्यादा लापरवाह हैं। शहरों में 39.4 फीसदी और गांवों में 46.1 फीसदी गर्भधारण करने के बाद प्रसव पूर्व जांच नहीं करातीं हैं। इसके चलते उनके शारारिक पोषण, गर्भ से जुड़ी जटिलताओं का पता ही नहीं चलता।<br /> <br /> <strong>46%  में खून-पोषण की कमी</strong><br /> प्रदेश में 46.3 फीसदी महिलाएं गर्भवती होने के दौरान एनीमिक यानी खून की कमी से जूझ रही होती है। गांवों में ऐसी गर्भवती महिलाओं की संख्या 47.5 और शहरों में 41.4 फीसदी है। खून की कमी, कुपोषण, गर्भधारण के बाद जांचें और जटिलताएं ही मौत का बड़ा कारण होती है। वहीं 24 फीसदी गर्भवती महिलाएं तो आयरन की गोलियां भी खून की कमी पूरी करने के लिए नहीं लेती है।<br /> <strong><br /> सिजेरियन डिलेवरी में सुविधाओं का अभाव</strong><br /> प्रदेश में 10.4 फीसदी महिलाओं की सालाना सिजेरियन डिलेवरी होती है। सभी अस्पतालों में डिलेवरी की सुविधा, विशेषज्ञ डॉक्टर ना होने से प्रसव पीड़ा के दौरान रैफर करने की स्थिति बनती है तो जान सांसत में आ जाती है।<br /> <strong><br /> चार डिलेवरी केन्द्रों में से औसतन एक पर ही स्त्रीरोग विशेषज्ञ</strong><br /> प्रसूताओं की डिलेवरी के लिए पीएचसी स्तर तक करीब 2 हजार सरकारी अस्पताल में सुविधा हैं, लेकिन स्त्री रोग विशेषज्ञ केवल मात्र 550 ही हैं। यानी चार अस्पतालों में से एक पर ही स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर है। मौतों को और कम करने के लिए कम से कम एक अस्पताल में एक स्त्री रोग विशेषज्ञ की जरुरत है। प्रसूताओं की समय पर जांच-चिकित्सा मिले इसलिए हर नाम पीएम मातृत्व सुरक्षा अभियान के लिए विभाग को प्राइवेट चिकित्सक हॉयर करने पड़ते हैं।<br /> <br /> प्रसूताओं की मौतों को रोकने के लिए हाल ही में समीक्षा बैठक की है। सभी को बचाने के हर संभव प्रयास होते हैं।<br /> -<strong>आशुतोष ए.टी.पेडनेकर, शासन सचिव, चिकित्सा</strong><br /> <br /> प्रसूता का एनीमिक होना, प्रसव पूर्व जांच ना कराने से व्याप्त जटिलताओं का पता न लगना ही मौतों का बड़ा कारण है। गर्भवती को प्रसव पूर्व जांचे और चिकित्सकीय परामर्श लेने से काफी हद तक मौतें रोकी जा सकती है।<br /> -<strong>डॉ.विमला जैन, पूर्व अधीक्षक, महिला चिकित्सालय, जयपुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 29 Jan 2022 13:16:10 +0530</pubDate>
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