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                <title>culture - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>राहुल गांधी, खड़गे ने दी नवरोज पर देशवासियों को शुभकामनाएं, एकता और समृद्धि का दिया संदेश</title>
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                        <![CDATA[कांग्रेस नेता राहुल गांधी और अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने नवरोज के अवसर पर देशवासियों को शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने इस पर्व को नई शुरुआत, समृद्धि और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक बताया। पारसी नववर्ष के इस मौके पर नेताओं ने अंधकार पर प्रकाश की विजय और साझा विरासत को मजबूत करने का आह्वान किया।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/rahul-gandhi-kharge-wished-the-countrymen-on-navroz-and-gave/article-147178"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/rahul-gandhi4.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने नवरोज के अवसर पर देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए आशा, समृद्धि और सामाजिक सछ्वाव का संदेश दिया। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर नवरोज मुबारक कहते हुए कामना की कि यह पर्व सभी के जीवन में उम्मीद, खुशियां और समृद्धि लेकर आए। उनका संदेश व्यापक रूप से साझा किया गया और इसमें त्योहार की समावेशी भावना झलकती है।</p>
<p>वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने भी देशवासियों को नवरोज की बधाई देते हुए इसे नवीनीकरण, आशा और नयी शुरुआत का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि यह पर्व शांति, खुशहाली और सामाजिक एकता का संदेश देता है। खड़गे ने कामना की कि यह अवसर सभी के जीवन में सुख, स्वास्थ्य और आपसी सछ्वाव लेकर आए।</p>
<p>नवरोज, जिसे कुछ संस्कृतियों में नौरोज या नौरूज भी कहा जाता है, नवरोज के रूप में पारसी समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला नववर्ष है। यह पर्व वसंत ऋतु के आगमन, नवीकरण और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक माना जाता है। भारत में पारसी समुदाय अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के लिए जाना जाता है और देश के सामाजिक, औद्योगिक एवं सांस्कृतिक विकास में उसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ऐसे त्योहार न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक हैं, बल्कि साझा विरासत और एकता के संदेश को भी मजबूत करते हैं।</p>
<p>राजनीतिक नेताओं द्वारा इस तरह के अवसरों पर शुभकामनाएं देना देश की विविधता में एकता की परंपरा को दर्शाता है, जहां हर समुदाय के त्योहारों को समान सम्मान दिया जाता है।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Mar 2026 15:07:51 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur NM]]>
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                <title>राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने कहा,  हर मास-एक उपवास आत्मसंयम और स्वास्थ्य की जीवन साधना, आचार्य प्रसन्न सागर के सान्निध्य में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा भी हुए शामिल</title>
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                        <![CDATA[राज्यपाल हरिभाऊ बागडे और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने आचार्य प्रसन्न सागर जी से आशीर्वाद लिया। ‘हर माह-एक उपवास’ अभियान को आध्यात्मिक, स्वास्थ्यवर्धक और लोकमंगलकारी बताया गया।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/governor-haribhau-bagde-said-every-month-one-fast-a/article-142306"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/11-(700-x-400-px)-(630-x-400-px)-(3)7.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने शनिवार को अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज के सानिध्य में पहुंचकर उनका आशीर्वाद लिया। इस अवसर पर उन्होंने आचार्य श्री की प्रेरणा से चलाए जा रहे श्हर मास-एक उपवास जैसे लोकमंगलकारी प्रकल्प को जीवन साधना बताते हुए इसकी सराहना की। राज्यपाल ने कहा कि उपवास न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी है। राज्यपाल बागडे ने भारत की प्राचीन संयम परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि आत्मसंयम, नागरिक स्वास्थ्य और अध्यात्म से जुड़ा यह अभियान समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देता है।</p>
<p><strong>मुख्यमंत्री ने लिया आशीर्वाद</strong></p>
<p>इसी क्रम में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा भी आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी के सानिध्य में आयोजित हर माह-एक उपवास कार्यक्रम में शामिल हुए। मुख्यमंत्री ने आचार्य श्री से आत्मीय भेंट कर आशीर्वाद प्राप्त किया। उन्होंने कहा कि संतों और मुनियों का समाज को आध्यात्मिक दिशा देने में अहम योगदान है </p>
<p><strong>कविओं ने बांधा समां</strong></p>
<p>इस मौके पर हुए कवि सम्मेलन में विनीत चौहान सहित अन्य कविओं ने अपनी कविताओं से लोगों का जमकर मनोरंजन किया। </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 08 Feb 2026 10:36:59 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur NM]]>
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                <title>31 जनवरी को होगी भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक, 22 अरब देशों की होगी भागीदारी, इन मुद्दों पर चर्चा संभव</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[भारत शनिवार को भारत-अरब विदेश मंत्रियों की दूसरी बैठक की मेजबानी करेगा। 22 अरब देशों की भागीदारी से सहयोग, ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में साझेदारी मजबूत होने की उम्मीद।]]>
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                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/india-arab-foreign-ministers-meeting-will-be-held-on-january-31/article-141149"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/500-px)-(2)4.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। भारत शनिवार को यहां भारत-अरब विदेश मंत्रियों की दूसरी बैठक की मेजबानी करेगा जिसमें सभी 22 अरब देशों के प्रतिनिधि भाग लेंगे। विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को यहां बताया कि इस बैठक की सह-अध्यक्षता भारत और संयुक्त अरब अमीरात करेंगे। इसमें अरब लीग के सदस्य देशों के विदेश मंत्री तथा अरब लीग के महासचिव भाग लेंगे।</p>
<p>दोनों पक्षों की दूसरी बैठक दस वर्षों के अंतराल के बाद हो रही है। पहली बैठक 2016 में बहरीन में हुई थी। पहली बैठक के दौरान मंत्रियों ने सहयोग के पाँच प्राथमिक क्षेत्रों-अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, शिक्षा, मीडिया और संस्कृति-की पहचान की थी तथा इन क्षेत्रों में विभिन्न गतिविधियों का प्रस्ताव रखा था। आगामी बैठक से मौजूदा सहयोग को आगे बढ़ाने और भारत-अरब साझेदारी को और अधिक सुदृढ़ एवं व्यापक बनाने की अपेक्षा है।</p>
<p>भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक भारत और अरब देशों के बीच साझेदारी को आगे बढ़ाने वाली सर्वोच्च संस्थागत व्यवस्था है। इस साझेदारी को मार्च 2002 में औपचारिक रूप दिया गया, जब भारत और अरब लीग के बीच संवाद प्रक्रिया को संस्थागत स्वरूप देने के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। इसके बाद दिसंबर 2008 में तत्कालीन अरब लीग महासचिव अमर मूसा की भारत यात्रा के दौरान अरब-भारत सहयोग मंच की स्थापना के लिए एक सहयोग ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए, जिसे 2013 में इसकी संरचनात्मक व्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से संशोधित किया गया। भारत, 22 सदस्य देशों वाले पैन-अरब संगठन अरब लीग में पर्यवेक्षक है।</p>
<p>यह पहली बार होगा जब भारत भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक की मेजबानी करेगा। इस बैठक में सभी 22 अरब देशों की भागीदारी होगी, जिनका प्रतिनिधित्व विदेश मंत्रियों, अन्य मंत्रियों, राज्य मंत्रियों, वरिष्ठ अधिकारियों तथा अरब लीग सचिवालय द्वारा किया जाएगा। बैठक से पहले शुक्रवार को भारत-अरब वरिष्ठ अधिकारियों की चौथी बैठक होगी।</p>]]>
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                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 29 Jan 2026 11:43:31 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 में कार्तिकेय वाजपेयी पेश करेंगे अपना पहला उपन्यास ‘द अनबिकमिंग’</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में कार्तिकेय वाजपेयी के प्रथम उपन्यास ‘द अनबिकमिंग’ पर विशेष सत्र होगा, जिसमें पहचान, आत्मचिंतन और प्रामाणिकता पर संवाद किया जाएगा।]]>
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                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/karthikeya-vajpayee-will-present-his-first-novel-the-unbecoming-at/article-139357"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/jlf.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक आयोजनों में शुमार जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल, कार्तिकेय वाजपेयी की पहली पुस्तक ‘द अनबिकमिंग’ परएक विशेष सत्र में प्रस्तुत करेगा। यह सत्र वाजपेयी की जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में पहली उपस्थिति होगी, जिसमें उनके उपन्यास को अंतरराष्ट्रीय पाठकों, लेखकों और विचारकों के सामने औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया जाएगा। इस बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार संजय पुगलिया शामिल होंगे और सत्र का संचालन पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया की प्रकाशन निदेशक मिली ऐश्वर्या करेंगी।</p>
<p>‘द अनबिकमिंग’ अपनी आत्ममंथनकारी शैली और दार्शनिक दृष्टि के लिए चर्चा में है। उपन्यास में पहचान, महत्वाकांक्षा और आत्मिक स्पष्टता जैसे प्रश्नों को गहराई से टटोला गया है। महामहिमदलाई लामा की प्रस्तावना से सुसज्जित यह पुस्तक ध्यान, खेल और आत्म-चिंतन की लंबी साधना का परिणाम है और भारतीय कथा साहित्य में एक नए विचारशील स्वर को सामने लाती है।</p>
<p>जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में वाजपेयी उन अनुभवों और विचारों को साझा करेंगे, जिनसे इस पुस्तक की रचना संभव हुई। चर्चा के केंद्र में मार्गदर्शन, अपेक्षाएँ और विरासत में मिली पहचान को पीछे छोड़कर प्रामाणिकता की खोज जैसे विषय होंगे। संजय पुगलिया इस बातचीत को सांस्कृतिक और सार्वजनिक जीवन के व्यापक परिप्रेक्ष्य से जोड़ेंगे।</p>
<p>पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया द्वारा प्रकाशितद अनबिकमिंगसिद्धार्थ, एक प्रसिद्ध क्रिकेटर, और उसके गुरु अजय के बीच विकसित होते रिश्ते की कहानी है। यह कथा बाहरी सफलता और आंतरिक संतोष के बीच के तनाव को उजागर करती है और आधुनिक जीवन में स्थिरता और जागरूकता की परिवर्तनकारी भूमिका पर विचार करती है।</p>
<p>अपने उपन्यास के बारे में लेखक कार्तिकेय वाजपेयी ने कहा,“द अनबिकमिंग’ एक लंबी आत्म-परीक्षा और ध्यान की यात्रा से उपजा है। इसे जयपुर लिटरेचरफेस्टिवल  में प्रस्तुत करना—जहाँ संवाद स्वाभाविक है और जिज्ञासा को सम्मान मिलता है—ऐसा महसूस होता है मानो यह पुस्तक अपने स्वाभाविक पाठकों के बीच घर लौट आई हो,ऐसे साहित्यिक महाकुंभ में अपनी किताब पर संवाद करने को मैं उत्सुक हूँ।”</p>
<p>दिल्ली-स्थित वकील, पूर्व राज्य-स्तरीय क्रिकेटर और विभिन्न ध्यान साधनाओं के अनुभवी अभ्यासकर्ता वाजपेयी ने अपने जीवन के अनुभवों से इस कृति को आकार दिया है। ‘द अनबिकमिंग’ उनका प्रथम उपन्यास है, जो आत्म-चिंतन और जागरूकता पर केंद्रित एक नए, चिंतनशील साहित्यिक स्वर के आगमन का संकेत देता है।</p>
<p>यह सत्र एक आत्मीय और रोचक संवाद के रूप में सामने आएगा, जो श्रोताओं को ऐसी पुस्तक से परिचित कराएगा जो उपलब्धि और ‘और अधिक बनने’ की निरंतर दौड़ पर ठहरकर प्रश्न करती है। यह संवाद पाठकों को ‘जो पहले से है, उसी में लौटने’ की संवेदनशील और गहरी यात्रा का आमंत्रण देगा।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 12 Jan 2026 18:25:02 +0530</pubDate>
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                <title>राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का संदेश: हस्तशिल्प कलाएं देश की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा</title>
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                        <![CDATA[राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार समारोह में कहा कि हस्तशिल्प देश की सांस्कृतिक पहचान और आजीविका का प्रमुख माध्यम है। यह क्षेत्र 32 लाख लोगों को रोजगार देता है, जिनमें 68% महिलाएं शामिल हैं। उन्होंने जीआई टैग, ओडीओपी और टिकाऊ विकास में हस्तशिल्प की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/president-draupadi-murmus-message-handicraft-arts-are-part-of-the/article-135441"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/dropadi-murmu-on-factionccc.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा है कि हस्तशिल्प कलाएं न केवल देश की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं बल्कि आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी हैं। उन्होंने कहा कि  हस्तशिल्प क्षेत्र युवा उद्यमियों और डिजाइनरों को उद्यम स्थापित करने के लिए उत्कृष्ट अवसर भी प्रदान करता है। मुर्मु ने मंगलवार को यहां वर्ष 2023 और 2024 के लिए राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार प्रदान किए।   </p>
<p>इस अवसर पर उन्होंने कहा कि कला अतीत की स्मृतियों, वर्तमान के अनुभवों और भविष्य की आकांक्षाओं को प्रतिबिम्बित करती है। प्राचीन काल से ही मनुष्य चित्रकला या मूर्तिकला के माध्यम से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करता रहा है। कला लोगों को संस्कृति से जोड़ती है। कला लोगों को एक-दूसरे से भी जोड़ती है। </p>
<p>राष्ट्रपति ने कहा, हमारी सदियों पुरानी हस्तशिल्प परंपरा के जीवंत और संरक्षित रहने का श्रेय, पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे कारीगरों की प्रतिबद्धता को जाता है। हमारे कारीगरों ने अपनी कला और परंपरा को समय के साथ ढाला है और साथ ही मूल भावना को भी जीवित रखा है। उन्होंने अपनी प्रत्येक कलात्मक रचना में देश की मिट्टी की खुशबू को संजोकर रखा है। मुर्मू ने कहा कि हस्तशिल्प न केवल सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं, बल्कि आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी हैं। यह क्षेत्र देश में 32 लाख से ज़्यादा लोगों को रोज़गार देता है। उल्लेखनीय है कि हस्तशिल्प से रोज़गार और आय प्राप्त करने वाले ज़्यादातर लोग ग्रामीण या दूरदराज के इलाकों में रहते हैं। यह क्षेत्र रोज़गार और आय का विकेंद्रीकरण करके समावेशी विकास को बढ़ावा देता है।</p>
<p><strong>कमजोर वर्ग को बढ़ावा देता है हस्तशिल्प</strong></p>
<p>राष्ट्रपति ने कहा कि सामाजिक सशक्तिकरण के लिए हस्तशिल्प को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र पारंपरिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लोगों को सहायता प्रदान करता रहा है। हस्तशिल्प न केवल कारीगरों को आजीविका का साधन प्रदान करता है, बल्कि उनकी कला उन्हें समाज में पहचान और सम्मान भी दिलाती है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में कार्यरत कार्यबल में 68 प्रतिशत महिलाओं की हिस्सेदारी है और इस क्षेत्र के विकास से महिला सशक्तिकरण को भी बल मिलेगा। </p>
<p>राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि हस्तशिल्प उद्योग की सबसे बड़ी ताकत प्राकृतिक और स्थानीय संसाधनों पर इसकी निर्भरता है। यह उद्योग पर्यावरण के अनुकूल है और इसमें कार्बन उत्सर्जन कम होता है। आज, दुनिया भर में पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ जीवनशैली की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है। ऐसे में, यह क्षेत्र स्थायित्व में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। राष्ट्रपति ने जीआई टैग द्वारा दुनिया भर में भारतीय हस्तशिल्प उत्पादों की पहचान को मज़बूत करने की उपलब्धियों पर खुशी व्यक्त की। </p>
<p>उन्होंने सभी हितधारकों से अपने अनूे उत्पादों के लिए जीआई टैग प्राप्त करने की दिशा में काम करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि जीआई टैग उनके उत्पादों को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करेगा और राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी विश्वसनीयता को बढ़ाएगा। </p>
<p>उन्होंने इस बात पर बल दिया कि एक ज़लिा एक उत्पाद (ओडीओपी) पहल हमारे क्षेत्रीय हस्तशिल्प उत्पादों की अंतर्राष्ट्रीय पहचान को भी मज़बूत कर रही है। मुर्मू ने कहा कि हमारे कारीगरों के पीढ़ी दर पीढ़ी संचित ज्ञान, समर्पण और कड़ी मेहनत के बल पर, भारतीय हस्तशिल्प उत्पादों की दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बनी है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारतीय हस्तशिल्प की मांग में वृद्धि की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र युवा उद्यमियों और डिज़ाइनरों को उद्यम स्थापित करने के बेहतरीन अवसर प्रदान करता है।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Dec 2025 12:16:21 +0530</pubDate>
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                <title>डे 2 राउंड-अप: जयगढ़ हेरिटेज फेस्टिवल 2025 ने जयपुर में अपने सांस्कृतिक संवाद को विस्तार दिया</title>
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                        <![CDATA[जयगढ़ हेरिटेज फेस्टिवल 2025 के अंतिम दिन इतिहास, कला और संगीत की समृद्ध प्रस्तुतियां हुईं। पंडित मोहन श्याम शर्मा की प्रस्तुति, चित्रकला-संवाद, राजनीतिक चर्चा और लोक-संगीत कार्यशालाओं ने दर्शकों को राजस्थान की विरासत से जोड़ा।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/day-2-round-up-jaigarh-heritage-festival-2025-expands-its-cultural/article-135079"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/jaigarh-news.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर।जयगढ़ हेरिटेज फेस्टिवल 2025 के दूसरे और अंतिम दिन 7 दिसम्बर की शुरुआत जयगढ़ की भव्य पृष्ठभूमि में इतिहास, कला, संगीत और विचारों की गंभीर चर्चाओं से हुई। पहले दिन के शानदार सफ़र को आगे बढ़ाते हुए, फेस्टिवल ने अपनी समृद्ध चर्चाओं और प्रस्तुतियों के ज़रिए आए हुए विरासत-प्रेमियों, विद्वानों, कलाकारों और आगंतुकों को प्रभावित किया।</p>
<p>सुबह की शुरुआत विचारशील वातावरण में हुई, जब दागर आर्काइव्स म्यूज़ियम के सहयोग से पंडित मोहन श्याम शर्मा ने प्रस्तुति दी, जिसने दिन की शुरुआत को शांत और स्थिर बनाया। इसके बाद जयपुर दरबार में चित्रकला और फोटोग्राफी सत्र में डॉ. गाइल्स टिलॉटसन ने डॉ. मृणालिनी वेंकटेस्वरन से बातचीत की और जयपुर की राजसी विरासत के दृश्य एवं कलात्मक दस्तावेज़ीकरण पर महत्वपूर्ण जानकारियाँ साझा कीं।</p>
<p>दोपहर के सत्रों में राजस्थान और उपमहाद्वीप : राजनीति, राज्यव्यवस्था और युद्धकला के माध्यम से इतिहास और राजनीतिक आख्यानों की चर्चा हुई, जिसमें डॉ. रीमा हूजा, डॉ. जिज्ञासा मीणा और डॉ. पंकज झा ने डॉ. अभिमन्यु सिंह अर्हा से संवाद किया।</p>
<p>इसी बीच आगंतुकों ने चुग्गे खान के साथ लयपूर्ण खड़ताल कार्यशाला में भाग लिया और शहज़ाद तथा सक़ील खान की सुरीली प्रस्तुतियों का आनंद लिया, जो राजस्थान के जीवंत लोक-संगीत की परम्पराओं को आगे बढ़ा रहे हैं। दर्शकों ने सौमिक दत्ता की वन साइज फ़िट्स ऑल जैसी प्रस्तुतियों के ज़रिए समकालीन सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को भी जाना।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Dec 2025 18:14:11 +0530</pubDate>
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                <title>पर्यटक होंगे प्रदेश की सतरंगी संस्कृति से रू-ब-रू : श्री पुष्कर पशु मेले का आगाज 22 से, 7 नवम्बर को होगा समापन, पशुपालकों को आने का न्योता</title>
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                        <![CDATA[पशुपालन विभाग 22 अक्टूबर से 7 नवम्बर तक होने वाले श्री पुष्कर पशु मेले की तैयारियों में जुट गया है।]]>
                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/ajmer/tourists-will-be-the-beginning-of-the-states-colorful-culture/article-128695"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/111-(3)2.png" alt=""></a><br /><p>अजमेर। पशुपालन विभाग 22 अक्टूबर से 7 नवम्बर तक होने वाले श्री पुष्कर पशु मेले की तैयारियों में जुट गया है। मेले में आने वाले पर्यटकों एवं श्रद्धालुओं को प्रदेश की सतरंगी संस्कृति से रूबरू कराने के लिए प्रदेश के पशुपालकों को परिवार सहित मेले में आने का न्योता दे रहा है। जिससे कि निकट भविष्य में मेले में पर्यटकों की संख्या को बढ़ाया जा सके। पुष्कर मेला, पशु मेले के नाम से विख्यात है, वहीं इसका धार्मिक महत्व भी है। हर साल मेले में लाखों की संख्या में श्रद्धालु, पर्यटक और पशुपालक आते हैं। जो मेले के दौरान आयोजित होने वाले विभिन्न आयोजनों का हिस्सा बनते हैं, वहीं धार्मिक रीति-रिवाजों की रस्म अदा करते हैं। लेकिन बीते कई सालों से मेले में पशुओं की संख्या लगातार घटती जा रही है। जिससे पशु मेले का वजूद संकट में आ गया है। इसीलिए विभाग अब अधिक से अधिक पशुपालकों को मेले से जोड़ने के प्रयास कर रहा है। यही कारण है कि मेले में प्रदेश के पशुपालकों को परिवार सहित मेले में आने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है। मेले में पशुपालकों को रियायती दर पर रसद सामग्री व खाने के पैकेट उपलब्ध होंगे। जिससे उन पर आर्थिक भार नहीं पड़ेगा।</p>
<p><strong>सोशल मीडिया पर मेले का प्रचार : </strong></p>
<p>विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. सुनील घीया ने बताया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग कर मेले के प्रचार-प्रसार और पशुपालकों को परिवार सहित मेले में आने का निमंत्रण दिया जा रहा है। यह कार्य फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सएप पर पोस्ट के माध्यम से किया जा रहा है। साथ ही अधिकारी पशुपालकों के ग्रुप में भी पोस्ट के माध्यम से उन्हें मेले में अधिक से अधिक संख्या में आने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।</p>
<p><strong>झलकेगी सांस्कृतिक विविधता :</strong></p>
<p>डॉ. घीया ने बताया कि इस प्रयास से मेले में जहां पशुओं की संख्या बढ़ेगी, वहीं यहां आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों को एक जगह पर ही राजस्थान की संस्कृति, सभ्यता, रहन-सहन, खानपान सहित सांस्कृतिक विविधता देखने को मिलेगी। जिससे निकट भविष्य में मेले में इनकी संख्या भी बढ़ेगी।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>अजमेर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Oct 2025 12:44:17 +0530</pubDate>
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                <title>संस्कृति, संवाद और संस्कारों की जीवंत पाठशाला है रामलीला मंचन, दशहरा मैदान में राघवेन्द्र कला संस्थान कर रहा रामलीला का मंचन</title>
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                        <![CDATA[कलाकारों के जीवंत अभिनय से लोगों को मिल रही संस्कृति से जुड़ने की सीख।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/ramlila-is-a-vibrant-school-of-culture--dialogue-and-values--raghavendra-kala-sansthan-is-staging-ramlila-at-dussehra-maidan/article-128242"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(6)10.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। भारतीय संस्कृति और परंपरा की आत्मा यदि कहीं सजीव होकर प्रकट होती है तो वह है रामलीला मंचन। यह केवल धार्मिक आयोजन भर नहीं, बल्कि समाज को संस्कार, मयार्दा और जीवन मूल्यों से जोड़ने वाला सशक्त माध्यम है। रामलीला मंचन की दुनिया में निर्देशक बृजराज गौतम का नाम एक जाना-पहचाना चेहरा है। उन्होंने बताया कि वे पिछले 40 साल से निर्देशन कर रहे है जिसमें उन्होंने रामलीला में नारद, रावण और दशरथ जैसे अहम किरदार निभाए हैं। खासतौर पर रावण का किरदार उन्होंने लगातार 35 वर्षों तक किया है। गौतम मानते हैं कि दशरथ, राम और रावण जैसे रोल दर्शकों की निगाहों का केंद्र होते हैं। वे संवाद लिखते समय हमेशा यही ध्यान रखा कि दर्शकों तक कुरीतियों, व्याभिचार और गंदी आदतों के खिलाफ संदेश पहुंचे। साथ ही नैतिकता और भारतीय संस्कृति का परिचय भी मिले। श्रीराम का किरदार निभा रहे वैभव गौतम ने बताया कि  बदलते दौर में जब परिवारों में विघटन, राग-द्वेष और आपसी दूरी बढ़ रही है, तब राघवेंद्र कला संस्थान इन मंचनों के जरिए लोगों को पुन: भारतीयता और परिवारिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य कर रहा है। दैनिक नवज्योति से विशेष बातचीत करते हुए बताया कि इस मंचन के दौरान किस तरह अपने अंदर महानयकों का भाव उतारते है तथा किस तरह से जीवंत कलाकारों के लिए मेहनत करनी पड़ती है। पेश है मुख्य अंश:</p>
<p><strong>24 वर्षों से श्रीराम का अभिनय कर रहे वैभव गौतम</strong><br />वैभव गौतम का रामलीला से जुड़ाव बचपन से रहा है। तीन वर्ष की उम्र में मंच पर कदम रखने वाले गौतम ने छोटे-राम, लक्ष्मण, वानर और राक्षस जैसे किरदार निभाए। मात्र 11 साल की उम्र में उन्हें भरत की भूमिका मिली और पिछले 24 वर्षों से वे श्रीराम का अभिनय कर रहे हैं। मेडिकल क्षेत्र से जुड़े होने के बावजूद वे राम के सौम्य, धैर्यवान और करुणामयी स्वभाव को मंच पर उतारने के लिए विशेष अभ्यास करते हैं। लक्ष्मण शक्ति प्रसंग में उनके वास्तविक आंसू बहते हैं। उनके अनुसार, राम का अभिनय केवल भूमिका नहीं, बल्कि जीवन का अनुशासन है।</p>
<p><strong>विरंचि दाधीच निभा रहे हनुमान का किरदार</strong><br />विरंचि दाधीच पिछले चार वर्षों से रामलीला में हनुमान का सशक्त किरदार निभा रहे हैं। मात्र पांच वर्ष की आयु से रामलीला से जुड़ाव होने के बावजूद वे नियमित रूप से सुंदरकांड का पाठ और हनुमान चरित्र से जुड़ी पुस्तकों का अध्ययन करते हैं। राजकीय सेवा में कार्यरत होने के बावजूद हर वर्ष दो माह का समय रामलीला के लिए निकालते हैं। उनका कहना है कि मंच पर हनुमान बनकर सेवा करना उनके लिए गर्व और सौभाग्य की बात है।</p>
<p><strong>ऋषिराज गौतम 8 साल से लक्ष्मण का किरदार कर रहे है</strong><br />राघवेंद्र कला संस्थान से करीब 30 वर्षों से जुड़े ऋषिराज गौतम अपने पिता की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।  वे पिछले 8 साल से रामलीला में लक्ष्मण का किरदार निभा रहे हैं। चरित्र की भक्ति और संयम बनाए रखने के लिए नौ दिन लहसुन-प्याज का सेवन नहीं करते और योगा व जिम से फिट रहते हैं। उनके बच्चे भी रामलीला में अभिनय कर चुके हैं।</p>
<p><strong>40 साल से रामलीला में बृजराज गौतम</strong><br />निर्देशक और कलाकार बृजराज गौतम पिछले 40 वर्षों से रामलीला में नारद, रावण और दशरथ जैसे किरदार निभा रहे हैं। उनका मानना है कि रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज सुधार और नैतिक मूल्यों का संदेश है। गौतम के अनुसार दशरथ का जीवन आदर्श है—उन्होंने प्रेम के बावजूद राम को गुरुकुल और विश्वामित्र के पास भेजा तथा वचन पालन के लिए अपना सुख त्याग दिया। वे कहते हैं कि हर पात्र, चाहे राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, हनुमान या रावण ही क्यों न हो, जीवन में चरित्र निर्माण, संस्कार, संबंध और आचरण की सीख देता है।</p>
<p><strong>अश्वथामा दाधीच: 35 वर्षों से रावण का जीवंत अभिनय</strong><br />अश्वथामा दाधीच पिछले 35 वर्षों से रामलीला संस्था से जुड़े हैं और पिछले आठ वर्षों से रावण की भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने अंगद, विश्वामित्र, दशरथ जैसे कई प्रमुख किरदार भी निभाए हैं, लेकिन रावण का किरदार उन्हें सबसे चुनौतीपूर्ण लगता है। इसके लिए उन्होंने रामचरित मानस, वाल्मीकि रामायण और रावण संहिता का गहन अध्ययन किया। 20 किलो अतिरिक्त वेशभूषा, प्रभावी बॉडी लैंग्वेज और दमदार आवाज के अभ्यास से उनका अभिनय दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। अश्वथामा मानते हैं कि वे रावण की तरह विद्या के क्षेत्र में संतुलित और समर्पित रहने का प्रयास करते हैं। वे संस्कृत के ज्ञाता भी हैं।</p>
<p><strong>पवन दोसाया: अभिनय से मेकअप तक का सफर</strong><br />राघवेंद्र कला संस्थान से 1988 से जुड़े पवन दोसाया ने पेंटिंग और मेकअप के माध्यम से कला जगत में पहचान बनाई। अब तक 30 फिल्मों और 1500 एलबम में उनका योगदान रहा है। वे संस्थान में बाली, जयंत, काल्यादेव और विदूषक जैसे किरदार निभा रहे हैं।  बाली, सुग्रीव का भाई है जो उसे भगा देता है। जयंत, श्रीराम की परीक्षा लेने के लिए कौआ का रूप धारण करता है। वहीं विदूषक केवल जोकर नहीं होते बल्कि राजा के सलाहकार माने जाते हैं, जो हंसी-मजाक में भी बड़ी और गंभीर बातें कह देते हैं।</p>
<p><strong>गोविंद तिवारी: 35 वर्षों से शिव, केवट और परशुराम</strong><br />गोविंद तिवारी ने मंच पर विभिन्न पौराणिक पात्र निभाए हैं। शिव और केवट में संगीत प्रधानता है, जबकि परशुराम में वीर रस का अभिनय। वे पात्र को पूरे समर्पण और मन से जीवंत करते हैं।</p>
<p><strong>रंगलाल मेहरा : रामलीला मंचन से समाज सुधार का संदेश</strong><br />राघवेन्द्र कला संस्था के महासचिव रंगलाल मेहरा पिछले 25 वर्षों से समाज को संस्कृति और परंपरा से जोड़ने का काम कर रहे हैं। उनके अनुसार रामलीला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज सुधार का माध्यम है। निषाद, जनक, विभीषण और मारीच जैसे पात्रों के माध्यम से दर्शकों तक संस्कार और जीवन मूल्य पहुँचते हैं।</p>
<p><strong>दीपक शर्मा: रामलीला से जीवन मूल्य</strong><br />दीपक शर्मा पिछले छह वर्षों से मेघनाथ, मारीच, शतानंद और धावल जैसे प्रमुख पात्र निभा रहे हैं। उनका कहना है कि रामलीला ने उन्हें जीवन शैली को ढालने और सांस्कृतिक मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा दी।</p>
<p><strong>संतोष कुमार जैन: संस्कार और परंपरा से जुड़ाव</strong><br />राघवेंद्र कला संस्थान से 12 वर्षों से जुड़े संतोष कुमार जैन ने बताया कि संस्था से जुड़कर उन्होंने कई महत्वपूर्ण किरदार निभाए हैं। उन्होंने गुरु वशिष्ठ, विश्वामित्र और सुग्रीव जैसे पात्र निभाए। उनके बच्चे भी मंच से जुड़े हैं। उनकी 16 वर्षीय बेटी पिछले तीन वर्षों से रामलीला में सक्रिय है और गौरीमाता, छोटी सीता, राक्षसी, शबरी और अग्निदेव जैसे विभिन्न किरदार निभा चुकी है।</p>
<p><strong>मुक्ता कुलश्रेष्ठ: कौशल्या और शबरी से मिली पहचान</strong><br />वर्ष 2006 से महिलाओं की भागीदारी की पहल के साथ जुड़ी मुक्ता कुलश्रेष्ठ ने मां कौशल्या और शबरी के रूप में दर्शकों के बीच खास पहचान बनाई। उनके अनुसार ऐसे पवित्र पात्रों को निभाना आस्था और संस्कारों को दृढ़ करता है।</p>
<p><strong>उमेश जोशी 15 वर्षों से निभा रहे कुम्भकर्ण का किरदार </strong><br />रामलीला मंचन में कुम्भकर्ण का पात्र हमेशा दर्शकों को रोमांचित करता है। राघवेन्द्र कला संस्थान से जुड़े उमेश जोशी पिछले 15 वर्षों से इस चुनौतीपूर्ण भूमिका को निभा रहे हैं। जोशी ने बताया कि कुम्भकर्ण का रोल आसान नहीं होता। खरार्टों की आवाज निकालना और मदमस्त हाथी की चाल में चलना काफी कठिन है। लेकिन जब दर्शक तालियां बजाते हैं तो सारी मेहनत सफल हो जाती है। उन्होंने हंसते हुए कहा कि अब तो लोग मुझे आॅफिस में भी कुम्भकर्ण कहकर बुलाने लगे हैं। रामलीला से जुड़े इस अनुभव को वह अपने जीवन का अनमोल हिस्सा मानते हैं।</p>
<p><strong>40 वर्षों से रामलीला में विदूषक बनकर हंसा रहे भुवनेश जोशी </strong><br />भुवनेश जोशी पिछले चार दशकों से रामलीला मंचन में विदूषक की भूमिका निभा रहे हैं। उनका कहना है कि लोगों को रुलाना या डराना आसान होता है, लेकिन हंसाना सबसे कठिन कार्य है। इसी चुनौती को उन्होंने जीवन का हिस्सा बना लिया। जोशी बताते हैं कि उनका पात्र जोकरनुमा होता है, जिसे देखकर और आवाज सुनकर दर्शक उत्साहित हो जाते हैं। लंबे समय से लगातार इस भूमिका को निभाते हुए वे आज भी दर्शकों के चेहरों पर मुस्कान बिखेर रहे हैं। हमारा मुख्य उद्देश्य है इस मंचन के माध्यम से संस्कृति अऔर परम्परा को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखना है, वहीं समाज में सभी परिवारों को संस्कारों से जोड़ना है। </p>]]>
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                                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Sep 2025 16:31:49 +0530</pubDate>
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                <title>रामलीला संस्कृति, आस्था और चरित्र-निर्माण का मंच</title>
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                        <![CDATA[भारतवर्ष की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं में रामलीला का एक विशिष्ट स्थान है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/ramlila-culture-platform-of-faith-and-character-building/article-127966"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/nnndd.png" alt=""></a><br /><p>भारतवर्ष की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं में रामलीला का एक विशिष्ट स्थान है। यह मात्र एक नाट्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि हमारी सनातन विरासत, धार्मिक चेतना, और नैतिक मूल्यों का जीवंत मंचन है। रामलीला, महान भारतीय महाकाव्य ह्णरामायणह्ण का वार्षिक नाट्य-रूपांतरण है, जो नवरात्रि से विजयादशमी तक देशभर में बड़े ही श्रद्धा, उत्साह और भव्यता के साथ आयोजित की जाती है। यह आयोजन न केवल प्रभु श्रीराम के जीवन की घटनाओं को मंच पर प्रस्तुत करता है, बल्कि समाज को धर्म, साहस, करुणा, त्याग और कर्तव्य की शिक्षा भी देता है। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों को न केवल उनकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती है, बल्कि उनके जीवन में नैतिकता और आध्यात्मिकता के बीज भी बोती है। रामलीला एक धार्मिक अनुष्ठान की भांति होती है, जिसमें भाग लेने वाले कलाकारों से लेकर उसे देखने वाले दर्शक तक, सभी किसी न किसी रूप में आध्यात्मिक रूपांतरण का अनुभव करते हैं।</p>
<p><strong>गूढ़ नैतिक संदेश है :</strong></p>
<p>यह प्रस्तुति केवल एक कथा नहीं होती, यह एक शास्त्रीय दर्शन का जीवंत अनुभव है, जो जीवन में धर्म और मर्यादा के आदर्शों को स्थापित करता है। राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान, भरत, रावण, विभीषण आदि पात्रों की भूमिका में छिपे गूढ़ संदेश आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने हजारों वर्ष पूर्व थे। रामलीला के प्रत्येक दृश्य के पीछे कोई न कोई गूढ़ नैतिक संदेश छिपा होता है। श्रीराम धर्म, सत्य, त्याग और मर्यादा के प्रतीक हैं। उनका जीवन सिखाता है कि कठिनतम परिस्थितियों में भी धर्म का पालन ही सच्चा मार्ग है। माता सीता की पवित्रता, धैर्य और समर्पण महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं। हनुमान की नि:स्वार्थ भक्ति, सेवा और बलिदान युवाओं को संकल्पबद्ध जीवन की प्रेरणा देता है। भरत का त्याग,लक्ष्मण की सेवा और विभीषण की विवेकशीलता,ये सभी आदर्श चरित्र हमें सिखाते हैं कि नैतिकता, कर्तव्य और भाईचारा किसी भी समाज की रीढ़ होते हैं। रामलीला हमें यह सिखाती है कि सत्ता में रहते हुए भी नम्रता और विनम्रता बनाए रखना कितना आवश्यक है। रावण जैसे विद्वान का पतन केवल अहंकार और अधर्म के कारण होता है।</p>
<p><strong>जीवन का नैतिक पाठ :</strong></p>
<p>रामलीला का प्रभाव केवल धार्मिक या आध्यात्मिक स्तर तक सीमित नहीं है,यह सामाजिक समरसता और सामूहिक चेतना का भी माध्यम है। गांव, कस्बे और शहर हर स्थान पर जब रामलीला होती है, तो पूरा समाज एक साथ जुड़ता है। बच्चे अपने जीवन का पहला नैतिक पाठ यहीं से सीखते हैं। युवा वर्ग सेवा, अनुशासन और सहभागिता के गुण अपनाते हैं। अपनी परंपरा से जुड़ाव और संतोष की अनुभूति होती है। सामाजिक वर्गों में भेदभाव मिटता है, क्योंकि मंचन और आयोजन में हर जाति, वर्ग और आयु के लोग मिलकर भाग लेते हैं। रामलीला इस तरह एक जीवंत पाठशाला बन जाती है, जहां नैतिकता,सदाचार, करुणा और कर्तव्य का शिक्षण स्वत: ही होता है। हालांकि, बीते कुछ दशकों में भौतिकवाद और डिजिटल युग की बढ़ती चकाचौंध ने सांस्कृतिक परंपराओं को गहराई से प्रभावित किया है। मोबाइल,इंटरनेट,ओटीटी प्लेटफॉर्म और टेलीविजन जैसे मनोरंजन के आधुनिक साधनों ने सामूहिक आयोजनों की जगह लेना शुरू कर दिया है।</p>
<p><strong>परंपरा से अनभिज्ञ :</strong></p>
<p>इसका प्रभाव यह हुआ है कि युवा वर्ग की रामलीला में रुचि कम होने लगी है। दर्शकों की संख्या में कमी आई है। मंचन की गुणवत्ता और गंभीरता पर भी असर पड़ा है। स्थानीय समितियों को आर्थिक और तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इस महान परंपरा से अनभिज्ञ रह जाएंगी। यह केवल एक सांस्कृतिक क्षति नहीं होगी, बल्कि हमारी नैतिक और आध्यात्मिक जड़ों को भी कमजोर करेगी। रामलीला की प्रासंगिकता बनाए रखने और उसे पुनर्जीवित करने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है। समाज, शैक्षणिक संस्थान और प्रशासन मिलकर कुछ उपायों पर कार्य कर सकते हैं। विद्यालयों और महाविद्यालयों में ह्णरामायणह्ण और ह्णरामलीलाह्ण के सांस्कृतिक व नैतिक पक्षों पर विशेष नाटक, सेमिनार और प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएं। रामलीला मंचन में बच्चों और युवाओं को भूमिकाओं, पृष्ठभूमि सज्जा, निर्देशन और आयोजन के प्रबंधन में सक्रिय रूप से जोड़ा जाए।</p>
<p><strong>परंपरा ग्लोबल स्तर तक :</strong></p>
<p>सोशल मीडिया, यूट्यूब और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से रामलीला के लाइव प्रसारण और झलकियां प्रसारित की जाएं, ताकि यह परंपरा ग्लोबल स्तर तक पहुंचे और प्रवासी भारतीय भी इससे जुड़ सकें। रामलीला केवल एक वार्षिक उत्सव नहीं है, यह हमारी ह्णसंस्कृति, आस्था और मूल्यों का जीवंत मंचह्ण है। यह आयोजन न केवल हमें हमारे धार्मिक इतिहास से जोड़ता है, बल्कि आज के समाज को नैतिकता, त्याग और धर्म के आदर्शों की याद दिलाता है। आज जब समाज दिशाहीनता, नैतिक पतन और आत्मकेन्द्रित जीवनशैली की ओर बढ़ रहा है,रामलीला जैसे आयोजनों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। यह समय की पुकार है कि हम इस परंपरा को केवल बचाएं ही नहीं, बल्कि उसमें नवाचार और उत्साह का संचार करें। यदि समाज, शिक्षा जगत और शासनकृतीनों मिलकर प्रयास करें, तो निश्चित ही रामलीला की लौ आने वाली पीढ़ियों के अंत:करण को आलोकित करती रहेगी। यह हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर को सुरक्षित रखते हुए, आने वाले कल को एक आदर्श दिशा प्रदान करेगी।</p>
<p><strong>-राजेंद्र कुमार शर्मा</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Sep 2025 12:46:37 +0530</pubDate>
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                <title>भारतीय मूल्यों और संस्कृति के राजदूत हैं विदेशों में पढ़ने वाले भारतीय विद्यार्थी, घर से दूर रहने के बावजूद देश की परंपराओं से मजबूती से है जुड़े : बिड़ला</title>
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                        <![CDATA[भारत में चिकित्सा अनुसंधान एवं शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से हो रहे विकास से विद्यार्थियों के लिए शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों में काम करने के ढेरों अवसर उपलब्ध हैं।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/the-ambassadors-of-indian-values-%E2%80%8B%E2%80%8Band-culture-are-the-indian/article-110143"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-11/om-birla.jpg" alt=""></a><br /><p>ताशकंद। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने विदेशों में पढ़ने वाले भारतीय विद्यार्थियों को भारतीय मूल्यों और संस्कृति का राजदूत है और कहा कि घर से हजारों मील दूर रहने के बावजूद वे देश की परंपराओं से मजबूती से जुड़े हुए हैं और मेजबान देशों में सक्रिय रूप से उनका प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। उज्बेकिस्तान की चार दिवसीय दौरे पर पहुंचे बिड़ला ने समरकंद मेडिकल यूनिवर्सिटी में भारतीय विद्यार्थियों से बातचीत के दौरान ये बातें कहीं। बिड़ला इस समय अंतर संसदीय संघ (आईपीयू) की 150वीं बैठक भारतीय संसदीय शिष्टमंडल (आईपीडी) का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्होंने नए भारत को अवसरों की भूमि बताते हुए कहा कि मौजूदा समय में भारत में हर क्षेत्र में तेजी से सुधार हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि आयुष्मान भारत जैसी राष्ट्रीय पहल से पूरे देश के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में प्रचुर अवसर उपलब्ध हुए हैं। आयुष्मान भारत के नेटवर्क में सरकारी अस्पतालों के साथ ही निजी अस्पतालों के जुड़ने से इस योजना में विदेशों में पढ़े (एफएमजी) डॉक्टरों के लिए बहुमूल्य अनुभव प्राप्त करने और देश की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में योगदान करने के अपार अवसर मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि भारत में चिकित्सा अनुसंधान एवं शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से हो रहे विकास से विद्यार्थियों के लिए शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों में काम करने के ढेरों अवसर उपलब्ध हैं।</p>
<p><strong>भारत ने हमेशा उत्कृष्ट चिकित्सक तैयार किए</strong><br />लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि भारत सरकार दुनिया के हर कोने में रह रहे भारतीयों की बराबर चिंता करती है। उन्होंने कहा कि सरकार प्रवासी भारतीय विद्यार्थियों की सहायता और सहयोग के लिए तत्पर है। उन्होंने कहा कि मदद पोर्टल जैसी पहलों और विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से सरकार यह सुनिश्चित करती है कि भारतीय विद्यार्थियों को उनकी शिक्षा, सुरक्षा और करियर की संभावनाओं में कोई बाधा न आए। उन्होंने कहा कि भारतीय डॉक्टरों की वैश्विक पहचान है और आपको इस परंपरा को आगे बढ़ाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत ने हमेशा उत्कृष्ट चिकित्सक तैयार किए हैं और भारतीय विद्यार्थी अपने ज्ञान और कौशल से पूरी दुनिया की स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त करेंगे। बिड़ला ने कहा कि विद्यार्थियों का वैश्विक अनुभव उनके मेडिकल करियर में और अधिक सफलता का मार्ग प्रशस्त करेगा।</p>
<p><strong>भारत और जॉर्जिया के बीच घनिष्ठ सांस्कृतिक संबंध</strong><br />लोकसभा अध्यक्ष ने ताशकंद में अंतर-संसदीय संघ की 150वीं बैठक के मौके पर जॉर्जिया की संसद के अध्यक्ष शाल्वा पापुआश्विली से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने संसदीय परंपराओं को मजबूत करने तथा व्यापार, पर्यटन और नवाचार में सहयोग बढ़ाने पर विचार रखे। उन्होंने बहुपक्षीय मंचों पर भारत के समर्थन और जॉर्जिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लोगों की सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करने के लिए जॉर्जिया की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत और जॉर्जिया के बीच घनिष्ठ सांस्कृतिक संबंध हैं। उन्होंने युवाओं के आदान-प्रदान कार्यक्रमों, डिजिटल सहयोग और दोनों देशों के लोगों के बीच संबंधों को और मजबूत करने का आह्वान किया।<br /><br /></p>]]>
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                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 09 Apr 2025 10:47:30 +0530</pubDate>
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                <title>Spiritual Walk : मंदिरों की संस्कृति की तरफ लौटने का आह्वान </title>
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                        <![CDATA[डॉ. मुकेश गुप्ता ने कहा-प्रकृति और संस्कृति का गहरा संबंध है। पुराने पेड़ों की सार संभाल के साथ ही नए पौधे लगाने चाहिए। ]]>
                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/spiritual-walk-calls-to-return-to-the-culture-of-temples%C2%A0/article-83990"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/1.jpg" alt=""></a><br /><p>जयुपर। देश के एकमात्र जयपुर के बड़ी चौपड़ पर स्थित श्री ब्रज निधि मंदिर में स्प्रिचुअल वॉक का आयोजन हुआ। इस दौरान मंदिरों की संस्कृति और सनातन धर्म की ओर वापस लौटने पर जोर दिया गया। योग गुरु ढाका राम सापकोटा ने कहा- मंदिरों में चलने वाली गुरुकुल व्यवस्था बंद हो गई है। उनकी जगह पश्चिमी स्कूली पद्धति ने ले ली। नई पीढ़ी को मंदिरों की संस्कृति की तरफ लौटना होगा।</p>
<p>डॉ. सुनील दंढ ने कहा-लोग अपने पुराने संस्कारों को भूलते जा रहे, जिन्हें फिर से अपनाना होगा। वहीं डॉ. मुकेश गुप्ता ने कहा-प्रकृति और संस्कृति का गहरा संबंध है। पुराने पेड़ों की सार संभाल के साथ ही नए पौधे लगाने चाहिए। </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Jul 2024 17:02:00 +0530</pubDate>
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                <title>वैदिक मूल्यों से ही संचालित होती हमारी संस्कृति संस्कार और विज्ञान: राज्यपाल कलराज मिश्र</title>
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                        <![CDATA[जगतगुरु निर्म्बाक पीठाधीश्वर श्रीजी श्यामशरण आचार्य श्री ने कहा कि निर्म्बाक भूमि ने देश व समाज के रक्षा के लिए सदा अपना सर्वोच्च दिया है। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/ajmer/ajmer--our-culture--culture-and-science-is-governed-by-vedic-values--governor-kalraj-mishra/article-6990"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/rajasthan-governor-.jpg" alt=""></a><br /><p>मदनगंज-किशनगढ़। हमारी सनातन संस्कृति, संस्कार व विज्ञान का संचालन वैदिक मूल्यों से ही होता है। सुरक्षा, सहयोग व सहिष्णुता हमारी संस्कृति के मूल आधार है। जब तक नैतिक मूल्यों का समागम इसमें होता रहेगा, हमारी संस्कृति संस्कारमय होकर वैज्ञानिक प्रमाणिकता के साथ खिलती रहेगी। यह विचार राज्यपाल कलराज मिश्र ने मंगलवार को आर के कम्यूनिटी सेंटर में हिन्दू आध्यात्मिक व सेवा संस्थान के तत्वावधान में तीन दिवसीय कार्यशाला के समापन सत्र में व्यक्त किए। इस दौरान जगतगुरु निर्म्बाक पीठाधीश्वर श्रीजी श्यामशरण आचार्य श्री ने कहा कि निर्म्बाक भूमि ने देश व समाज के रक्षा के लिए सदा अपना सर्वोच्च दिया है। जब जब सनातन संस्कृति, संस्कार पर कोई आंच आएगी, तब तब निर्म्बाक पीठ अलग हटकर राष्ट्रहित व धर्मोरक्षण के क्षेत्र में अपना सर्वोच्च करेगी। श्रीजी के उद्बोधन के बीच पूरा परिसर भारत माता की जय और वंदेमातरम से गूंज रहा था। केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति आनंद भालेराव ने कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाओं की आवश्यकता वर्तमान में सर्वाधिक है।</p>
<p><br />इन्हें किया सम्मानित: समापन पर कार्यशाला में श्रेष्ठ कार्य करने वाले का राज्यपाल मिश्र ने स्मृति चिन्ह देकर व शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। केईएन विजयराघवन तमिलनाडु, प्रो. उमेश दास उड़ीसा, प्रो. विनोद शर्मा, डॉ. शुभम मिश्र, डॉ. आशीष शर्मा, पंडित आशीष रतावा, जितेश पारीक सहित बीस से अधिक प्रतिभागी व आचार्य श्री को राज्यपाल मिश्र सहित जगतगुरु श्रीजी महाराज ने दुपट्टा पहनाकर स्वागत किया।</p>]]>
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                <pubDate>Wed, 30 Mar 2022 13:31:09 +0530</pubDate>
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