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                <title>death anniversary - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>death anniversary RSS Feed</description>
                
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                <title>पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर दिग्गजों ने दी श्रद्धांजलि, PM मोदी बोले- असाधारण राजनेता थे अटल जी</title>
                                    <description><![CDATA[राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित देश के शीर्ष नेताओं ने पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर उनके समाधि स्थल 'सदैव अटल' पहुंचकर पुष्पांजलि अर्पित की। नेताओं ने उन्हें दूरदर्शी राजनेता बताते हुए राष्ट्र सेवा और सुशासन में उनके योगदान को याद किया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/veterans-paid-tribute-to-former-pm-atal-bihari-vajpayee-on/article-163034"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-08/modi2.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष नितिन नवीन सहित विभिन्न नेताओं ने रविवार को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि के मौके पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। द्रोपदी मुर्मु, राधाकृष्णन, मोदी, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, नवीन और दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा सहित तमाम नेता आज वाजपेयी के स्मृतिस्थल 'सदैव अटल' पहुंचे और उन्हें पुष्पांजलि अर्पित की।</p>
<p>इस मौके पर वाजपेयी के स्मृतिस्थल 'सदैव अटल' प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया। गौरतलब है कि पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी का निधन 16 अगस्त 2018 में हुआ था। मोदी ने वाजपेयी की पुण्यतिथि के मौके पर उन्हें एक 'असाधारण राजनेता' बताया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "अद्भुत दूरदर्शिता वाले एक असाधारण राजनेता के तौर पर उन्होंने अपना जीवन देश की सेवा में समर्पित कर दिया। उनके विचारों और प्रयासों ने कई पीढ़ियों को प्रेरित किया और उनके नेतृत्व ने हमारे देश को मज़बूत बनाया। सुशासन और जन-कल्याण पर उनका ज़ोर हमेशा हमारा मार्गदर्शन करता रहेगा।"</p>
<p>राजनाथ सिंह ने सोशल मीडिया एक्स पर वाजपेयी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए लिखा, "अटल बिहारी वाजपेयी जी की पुण्यतिथि पर मैं उन्हें कोटि-कोटि नमन और विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। अटल जी ने अपने विचारों और कार्यों से भारतीय लोकतंत्र को समृद्ध किया। उन्होंने जीवन भर 'राष्ट्र सर्वोपरि' की भावना के साथ काम किया। उनके लिए राजनीति का मूल उद्देश्य राष्ट्रहित और जनसेवा था।" उन्होंने कहा, "अटल जी के नेतृत्व में भारत ने रणनीतिक शक्ति, आर्थिक विकास और बुनियादी ढांचे के क्षेत्रों में नयी ऊंचाइयां हासिल कीं। उन्होंने देश को मजबूत बनाने, उसमें आत्मविश्वास जगाने और विकास को नई दिशा देने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका व्यक्तित्व, उनके आदर्श और राष्ट्र सेवा का उनका संकल्प हम सभी को सदैव प्रेरित करते रहेंगे।"</p>
<p>वहीं, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वाजपेयी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए एक्स पर लिखा, "पूर्व प्रधानमंत्री, भाजपा के संस्थापक एवं भारत रत्न से सम्मानित अटल बिहारी वाजपेयी जी की पुण्यतिथि पर मैं उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। अटल जी एक ऐसे देशभक्त राजनेता थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्र की सेवा में समर्पित कर दिया। एक ओर जहाँ उन्होंने परमाणु परीक्षणों और कारगिल युद्ध के माध्यम से भारत की शक्ति से पूरी दुनिया को अवगत कराया, वहीं दूसरी ओर उनकी मूल्यों पर आधारित राजनीति ने पहली बार 'अंत्योदय' और सुशासन के विज़न को धरातल पर उतारा। अटल जी का विराट व्यक्तित्व और नेतृत्व सदैव हर भाजपा कार्यकर्ता को राष्ट्र-निर्माण के लिए प्रेरित करता रहेगा।"</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 16 Aug 2026 11:16:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राहुल गांधी, सीएम योगी सहित कई दिग्गजों ने दी &quot;भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर&quot; को 38वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि, कहा सामाजिक न्याय के लिए उनका आजीवन संघर्ष, हमेशा हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा </title>
                                    <description><![CDATA[मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और नीतीश कुमार ने भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर की 38वीं पुण्यतिथि पर उन्हें नमन किया। राहुल गांधी ने भी उन्हें सामाजिक न्याय का प्रबल समर्थक बताते हुए श्रद्धांजलि दी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/many-stalwarts-including-rahul-gandhi-cm-yogi-paid-tribute-to/article-143510"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/kapoori-takur.png" alt=""></a><br /><p>लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, सामाजिक न्याय के पुरोधा और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की 38वीं पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है। सीएम योगी ने उन्हें नमन करते हुए कहा कि शोषित-वंचितों के सशक्तीकरण और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता सदैव प्रेरणास्पद रहेगी। जननायक कर्पूरी ठाकुर ने सामाजिक न्याय को व्यवहारिक धरातल पर उतारने का कार्य किया और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को मुख्यधारा से जोडऩे के लिए आजीवन संघर्ष किया।    </p>
<p>उधर, 17 फरवरी को उनकी 38वीं पुण्यतिथि के अवसर पर बिहार की राजनीति में भी एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कर्पूरी ठाकुर को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके आदर्शों को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया है। वहीं राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की ओर से भी इस अवसर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। राजद ने पटना के ऐतिहासिक बापू सभागार में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया है, जिसमें पार्टी के वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता भाग ले रहे हैं।</p>
<p>जननायक कर्पूरी ठाकुर की राजनीतिक विरासत को लेकर बिहार की सियासत में एक बार फिर बयानबाजी और श्रेय लेने की होड़ देखने को मिल रही है। सामाजिक न्याय की राजनीति के प्रतीक माने जाने वाले कर्पूरी ठाकुर आज भी विभिन्न दलों के लिए प्रेरणा और राजनीतिक विमर्श का केंद्र बने हुए हैं।</p>
<p>लोक सभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सोमवार को बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दी और उन्हें सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के अधिकारों के पुरजोर समर्थक के रूप में याद किया। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, कर्पूरी ठाकुर की पुण्यतिथि पर, हम उन्हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देते हैं। वंचितों और दबे-कुचले लोगों के अधिकारों के लिए उनकी लड़ाई, और सामाजिक न्याय के लिए उनका आजीवन संघर्ष, हमेशा हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा। </p>
<p>जन नायक के नाम से पहचाने गये ठाकुर एक प्रमुख समाजवादी नेता थे और उन्होंने दो बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। उन्हें 1970 के दशक के अंत में राज्य में प्रगतिशील आरक्षण नीतियों को लागू करने का श्रेय दिया जाता है, जिसका उद्देश्य सरकारी नौकरियों और शिक्षा में पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व में सुधार करना था। उनके कार्यकाल और राजनीतिक विरासत का भारत में सामाजिक न्याय और सकारात्मक कार्रवाई के बारे में बातचीत पर गहरा असर पड़ा है। </p>
<p>सन् 1924 में जन्मे ठाकुर साधारण परिवार से आए थे और आजादी के आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल थे। दशकों से, वे अपनी सादी जीवनशैली और गरीबों, पिछड़े वर्गों और दूसरे हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए पक्के इरादे के लिए जाने जाते थे। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Feb 2026 14:33:54 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>साहित्य जगत में शोक: वरिष्ठ आलोचक कवि राजेन्द्र कुमार का निधन, 84 साल की उम्र में ली अंतिम सांस</title>
                                    <description><![CDATA[इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं प्रख्यात आलोचक प्रो. राजेंद्र कुमार का 84 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने अपनी इच्छानुसार देहदान किया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/senior-critic-poet-rajendra-kumar-passed-away-breathed-his-last/article-139844"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/professor-rajendra-kumar-dies.png" alt=""></a><br /><p>प्रयागराज। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भूतपूर्व प्रोफेसर ,वरिष्ठ आलोचक व कवि राजेंद्र कुमार का गुरुवार को ह्रदयगति रुकने के कारण निधन हो गया। वह 84 वर्ष के थे। उन्होंने कमला नेहरू अस्पताल के आईसीयू में अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से कैंसर से पीड़ित थे और जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे थे। राजेंद्र कुमार का जन्म 24 जुलाई 1943 को कानपुर में  हुआ था। प्रो. राजेंद्र कुमार इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष रहे। उन्होंने 2001 से 2003 तक विभागाध्यक्ष के रूप में सेवाएं भी दीं थी। वह 2005 में रिटायर्ड हो गए थे। शिक्षा की दृष्टि से उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। प्रो. राजेन्द्र कुमार कानपुर से रसायनशास्त्र में और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए किया था। उन्होंने वरिष्ठ आलोचक डॉ. रघुवंश के निर्देशन में डीफिल उपाधि भी प्राप्त की थी।</p>
<p>राजेंद्र कुमार एक गंभीर, लोकप्रिय अध्यापक, साहित्यिक अभिभावक और अदम्य जिजीविषा के धनी व्यक्तित्व थे। उनके चर्चित काव्य संग्रहों में ऋण गुणा ऋण, लोहा लक्कड़, हर कोशिश है एक बगावत और उदासी का ध्रुपद शामिल हैं। वहीं प्रतिबद्धता के बावजूद, कविता समय असमय, आलोचना आसपास, कथार्थ और यथार्थ तथा शब्द घड़ी में समय जैसी आलोचनात्मक कृतियां हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण धरोहर हैं। उन्होंने अभिप्राय नामक साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन किया था। और बहुवचन पत्रिका के आठ अंकों का संपादन भी किया था। </p>
<p>प्रो .राजेंद्र कुमार जी ने देहदान की लिखित इच्छा व्यक्त की थी। उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए उनका पार्थिव शरीर आज मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज को सुपुर्द किया गया। अंतिम यात्रा उनके निजी आवास 12 बी/1, बंद रोड, एलनगंज से पूर्वाह्न 11 बजे शुरु हुयी और मेडिकल कॉलेज मे जाकर समाप्त हो गयी।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 16 Jan 2026 17:43:53 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>पूर्व मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर की पुण्यतिथि पर कांग्रेसजनों ने अर्पित की पुष्पांजलि </title>
                                    <description><![CDATA[पूर्व मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर की पुण्यतिथि पर बुधवार को पीसीसी मुख्यालय पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन हुआ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/congressmen-paid-floral-tributes-on-the-death-anniversary-of-former/article-118491"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-06/447.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। पूर्व मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर की पुण्यतिथि पर बुधवार को पीसीसी मुख्यालय पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस अवसर पर पीसीसी संगठन महासचिव ललित तूनवाल, सचिव अयूब खान, वंदना माथुर, पीसीसी सदस्य शरीफ खान, मंजू शर्मा, राजेंद्र शर्मा, हफीज जयपुरी जय किशन, इकबाल, शकुंतला शर्मा, दीपक धीर,  सत्येंद्र सिंह जादौन, राजेंद्र पांडे  सहित तमाम कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने माथुर के चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Jun 2025 15:46:11 +0530</pubDate>
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                <title>ऋषि कपूर को उनकी पहली फिल्म मेरा नाम जोकर के लिए मिला था बेस्ट चाइल्ड आर्टिस्ट का नेशनल अवॉर्ड </title>
                                    <description><![CDATA[वर्ष 1970 में प्रदर्शित इस फिल्म में ऋषि कपूर ने 14 वर्षीय लड़के की भूमिका निभाई जो अपनी शिक्षिका से प्रेम करने लगता है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/movie-fun/my-name-rishi-received-the-national-award-for-best-child/article-112551"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/rtrer-(4)11.png" alt=""></a><br /><p>मुंबई। बॉलीवुड में अपने सदाबहार अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने वाले ऋषि कपूर को उनकी पहली फिल्म मेरा नाम जोकर के लिए बेस्ट चाइल्ड आर्टिस्ट का नेशनल अवॉर्ड मिला था। चार सितंबर 1952 को मुंबई में जन्में ऋषि कपूर को अभिनय की कला विरासत में मिली। उनके पिता राज कपूर फिल्म इंडस्ट्री के जाने माने अभिनेता और निर्माता-निर्देशक थे। घर में फिल्मी माहौल रहने के कारण ऋषि कपूर का रूझान फिल्मों की ओर हो गया और वह भी अभिनेता बनने के ख्वाब देखने लगे। ऋषि कपूर ने अपने सिने करियर की शुरूआत अपने पिता की निर्मित फिल्म मेरा नाम जोकर से की। वर्ष 1970 में प्रदर्शित इस फिल्म में ऋषि कपूर ने 14 वर्षीय लड़के की भूमिका निभाई जो अपनी शिक्षिका से प्रेम करने लगता है। अपनी इस भूमिका को ऋषि कपूर ने इस तरह निभाया कि दर्शक भावविभोर हो गये।</p>
<p>फिल्म मेरा नाम जोकर के लिए ऋषि को बेस्ट चाइल्ड आर्टिस्ट का नेशनल अवॉर्ड मिला था। इससे जुड़ा एक किस्सा उन्होंने अपनी ऑटोबायोग्राफी खुल्लम खुल्ला में बताते हुए कहा था,'जब मैं मुंबई लौटा तो मेरे पिता ने उस अवॉर्ड के साथ मुझे अपने दादा जी पृथ्वीराज कपूर के पास भेजा। मेरे दादा जी ने वो मेडल अपने हाथ में लिया और उनकी आंखें भर आईं। उन्होंने मेरे माथे को चूमा और कहा, राज ने मेरा कर्जा उतार दिया। फिल्म मेरा नाम जोकर से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा है। जब राज कपूर ने ऋषि कपूर को फिल्म मेरा नाम जोकर में अपने बचपन का रोल दिया तो वे स्कूल में पढ़ा करते थे।फिल्म में काम करने के दौरान ऋषि स्कूल नहीं जा पाते थे और ये बात उनके टीचर्स को बिल्कुल पसंद नहीं थी।आखिर एक दिन ऐसा आया जब स्कूलवालों ने ऋषि कपूर को स्कूल से निकाल दिया।</p>
<p>जब ये बात राज कपूर को पता चली तो उन्होंने काफी मशक्कत के बाद स्कूल में फिर से ऋषि कपूर का एडमिशन करवाया। फिल्म मेरा नाम जाकर भारतीय सिनेमा इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है लेकिन उन दिनों फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नकार दी गयी थी। इस फिल्म को पूरा करने में काफी समय लगा था। बताया जाता है कि राज कपूर को अपनी पत्नी के गहने भी बेचने पड़े थे। राजकपूर पर काफी कर्ज हो गया था।राज कपूर ने कर्ज से बाहर निकलने के लिये कम बजट की फिल्म बॉबी बनाने का निर्णय लिया। टीनएज प्रेम कथा पर आधारित वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म बॉबी के लिये राजकपूर ने अपने बेटे ऋषि कपूर और 16 साल की डिंपल कपाड़िया को चुना था। बतौर अभिनेत्री डिेपल कपाड़यिा की भी यह पहली ही फिल्म थी। बेहतरीन गीत-संगीत और अभिनय से सजी इस फिल्म की जबरदस्त कामयाबी ने न सिर्फ डिेंपल कपाड़यिा बल्कि ऋषि कपूर को भी शोहरत की बुंलदियों पर पहुंचा दिया। राज कपूर पर चढ़ा कर्ज भी उतर गया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मूवी-मस्ती</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 30 Apr 2025 15:56:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>Death Anniversary: गायक बनने से पहले कई फ़िल्मों में बने नायक, फ़िल्म आराधना के गीतों से हुए प्रसिद्ध किशोर दा</title>
                                    <description><![CDATA[महान अभिनेता एवं गायक के.एल.सहगल के गानों से प्रभावित किशोर कुमार उनकी ही तरह गायक बनना चाहते थे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/movie-fun/death-anniversary-before-becoming-a-singer-kishore-da-who-became/article-92965"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-10/630400-size-(9)4.png" alt=""></a><br /><p>मुंबई। जिंदगी के अनजाने सफर से बेहद प्यार करने वाले हिन्दी सिने जगत के महान पार्श्वगायक किशोर कुमार का नजरिया उनके गाये इन पंक्तियों में समाया हुआ है।</p>
<p>बीच राह में दिलबर बिछड़ जाये कहीं हम अगर</p>
<p>और सूनी सी लगे तुम्हें जीवन की ये डगर</p>
<p>हम लौट आयेगें तुम यूंही बुलाते रहना</p>
<p>कभी अलविदा ना कहना...</p>
<p>मध्यप्रदेश के खंडवा में 04 अगस्त 1929 को मध्यवर्गीय बंगाली परिवार में अधिवक्ता कुंजी लाल गांगुली के घर जब सबसे छोटे बालक ने जन्म लिया तो कौन जानता था कि आगे चलकर यह बालक अपने देश और परिवार का नाम रौशन करेगा। भाई बहनों में सबसे छोटे नटखट आभास कुमार गांगुली उर्फ किशोर कुमार का रूझान बचपन से ही पिता के पेशे वकालत की तरफ न होकर संगीत की ओर था।</p>
<p>महान अभिनेता एवं गायक के.एल.सहगल के गानों से प्रभावित किशोर कुमार उनकी ही तरह गायक बनना चाहते थे। सहगल से मिलने की चाह लिये किशोर कुमार 18 वर्ष की उम्र मे मुंबई पहुंचे लेकिन उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पायी। उस समय तक उनके बड़े भाई अशोक कुमार बतौर अभिनेता अपनी पहचान बना चुके थे। अशोक कुमार चाहते थे कि किशोर नायक के रूप मे अपनी पहचान बनाये लेकिन खुद किशोर कुमार को अदाकारी की बजाय पाश्र्व गायक बनने की चाह थी। उन्होंने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा हालांकि कभी किसी से नहीं ली थी। बालीवुड में अशोक कुमार की पहचान के कारण उन्हें बतौर अभिनेता काम मिल रहा था।</p>
<p>अपनी इच्छा के विपरीत किशोर कुमार ने अभिनय करना जारी रखा। जिन फिल्मों में वह बतौर कलाकार काम किया करते थे उन्हें उस फिल्म में गाने का भी मौका मिल जाया करता था। किशोर कुमार की आवाज सहगल से काफी हद तक मेल खाती थी। बतौर गायक सबसे पहले उन्हें वर्ष 1948 में बाम्बे टाकीज की फिल्म जिद्दी में सहगल के अंदाज मे हीं अभिनेता देवानंद के लिये 'मरने की दुआएं क्यूं मांगू'  गाने का मौका मिला।किशोर कुमार ने वर्ष 1951 में बतौर मुख्य अभिनेता फिल्म आन्दोलन से अपने करियर की शुरूआत की लेकिन इस फिल्म से दर्शकों के बीच वह अपनी पहचान नहीं बना सके। वर्ष 1953 मे प्रदर्शित फिल्म लड़की बतौर अभिनेता उनके कैरियर की पहली हिट फिल्म थी। इसके बाद अभिनेता के रूप में भी किशोर कुमार ने अपनी फिल्मों के जरिये दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया।</p>
<p>किशोर कुमार ने 1964 में फिल्म 'दूर गगन की छांव में' के जरिये निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखने के बाद हम दो डाकू, दूर का राही, बढ़ती का नाम दाढ़ी, शाबास डैडी, दूर वादियों में कहीं, चलती का नाम ज़िंदगी और ममता की छांव में जैसी कई फिल्मों का निर्देशन भी किया। निर्देशन के अलावा उन्होंने कई फिल्मों में संगीत भी दिया जिनमें झुमरू, दूर गगन की छांव में, दूर का राही, जमीन आसमान और ममता की छांव में जैसी फिल्में शामिल है। बतौर निर्माता किशोर कुमार ने दूर गगन की छांव में और दूर का राही जैसी फिल्में भी बनायीं।</p>
<p> किशोर कुमार को अपने कैरियर में वह दौर भी देखना पड़ा जब उन्हें फिल्मों में काम ही नहीं मिलता था। तब वह स्टेज पर कार्यक्रम पेश करके अपना जीवन यापन करने को मजबूर थे। बंबई में आयोजित एक ऐसे ही एक स्टेज कार्यक्रम के दौरान संगीतकार ओ.पी.नैयर ने जब उनका गाना सुना तो उन्होंने भावविह्लल होकर कहा 'महान प्रतिभाएं तो अक्सर जन्म लेती रहती हैं लेकिन किशोर कुमार जैसा पार्श्वगायक हजार वर्ष में केवल एक ही बार जन्म लेता है।' उनके इस कथन का उनके साथ बैठी पाश्र्वगायिका आशा भोंसले ने भी सर्मथन किया।</p>
<p>वर्ष 1969 में निर्माता निर्देशक शक्ति सामंत की फिल्म आराधना के जरिये किशोर कुमार गायकी के दुनिया के बेताज बादशाह बने लेकिन दिलचस्प बात यह है कि फिल्म के आरंभ के समय संगीतकार सचिन देव वर्मन चाहते थे कि सभी गाने किसी एक गायक से न गवाकर दो गायकों से गवाएं जाएं। बाद में सचिन देव वर्मन की बीमारी के कारण फिल्म आराधना में उनके पुत्र आर.डी.बर्मन ने संगीत दिया। इस फिल्म के लिए 'मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू' और 'रूप तेरा मस्ताना' गाना किशोर कुमार ने गाया, जो बेहद पसंद किया गया। रूप तेरा मस्ताना गाने के लिये किशोर कुमार को बतौर गायक पहला फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। इसके साथ ही फिल्म आराधना के जरिये वह उन ऊंचाइयों पर पहुंच गये जिनके लिये वह सपनों के शहर मुंबई आये थे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मूवी-मस्ती</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 13 Oct 2024 17:02:18 +0530</pubDate>
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                <title>Death Anniversary: निजी जिंदगी में बेहद संवेदनशील इंसान थे मुकेश</title>
                                    <description><![CDATA[मुकेश ने अपने तीन दशक के सिने कैरियर मे 200 से भी ज्यादा फिल्मों के लिये गीत गाये।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/movie-fun/death-anniversary-mukesh-was-a-very-sensitive-person-in-his/article-88666"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-08/mukesh1.png" alt=""></a><br /><p>मुंबई। दर्द भरे नगमों के बेताज बादशाह मुकेश के गाये गीतों मे जहां संवेदनशीलता दिखाई देती है, वहीं निजी जिंदगी में भी वह बेहद संवेदनशील इंसान थे और दूसरों के दुख.दर्द को अपना समझकर उसे दूर करने का प्रयास करते थे।</p>
<p>इस संबंध में एक वाकया है कि एक बार एक लड़की बीमार हो गई। उसने अपनी मां से कहा कि यदि मुकेश उन्हें कोई गाना गाकर सुनाएं तो वह ठीक हो सकती है। मां ने जवाब दिया कि मुकेश बहुत बड़े गायक हैं। भला उनके पास तुम्हारे लिए कहां समय है। यदि वह आते भी हैं तो इसके लिए काफी पैसे लेंगे। तब उसके डॉक्टर ने मुकेश को उस लडकी की बीमारी के बारे में बताया।</p>
<p>मुकेश तुरंत लड़की से मिलने अस्पताल गए और उसके गाना गाकर सुनाया और इसके लिए उन्होंने कोई पैसा भी नहीं लिया। लड़की को खुश देखकर मुकेश ने कहा कि यह लड़की जितनी खुश है उससे ज्यादा खुशी मुझे मिली है।</p>
<p>मुकेश चंद माथुर का जन्म 22 जुलाई 1923 को दिल्ली में हुआ था। उनके पिता लाला जोरावर चंद माथुर एक इंजीनियर थे और वह चाहते थे कि मुकेश उनके नक्शे कदम पर चलें, लेकिन वह अपने जमाने के प्रसिद्ध गायक अभिनेता कुंदनलाल सहगल के प्रशंसक थे और उन्हीं की तरह गायक अभिनेता बनने का ख्वाब देखा करते थे।मुकेश ने दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद स्कूल छोड़ दिया और दिल्ली लोक निर्माण विभाग में सहायक सर्वेयर की नौकरी कर ली। जहां उन्होंने सात महीने तक काम किया। इसी दौरान अपनी बहन की शादी में गीत गाते समय उनके दूर के रिश्तेदार मशहूर अभिनेता मोतीलाल ने उनकी आवाज सुनी और प्रभावित होकर वह उन्हें 1940 में वह मुंबई ले आए और उन्हें अपने साथ रखकर पंडित जगन्नाथ प्रसाद से संगीत सिखाने का भी प्रबंध किया।</p>
<p>इसी दौरान मुकेश को एक हिन्दी फिल्म निर्दोष (1941) में अभिनेता बनने का मौका मिल गया जिसमें उन्होंने अभिनेता-गायक के रूप में संगीतकार अशोक घोष के निर्देशन में अपना पहला गीत..दिल ही बुझा हुआ हो तो..भी गाया। हालांकि, यह फिल्म टिकट खिड़की पर बुरी तरह से नकार दी गयी। इसके बाद मुकेश ने दुख-सुख, आदाब अर्ज जैसी कुछ और फिल्मों में भी काम किया लेकिन पहचान बनाने में कामयाब नहीं हो सके। मोतीलाल प्रसिद्ध संगीतकार अनिल विश्वास के पास मुकेश को लेकर गये और उनसे अनुरोध किया कि वह अपनी फिल्म में मुकेश से कोई गीत गवाएं। वर्ष 1945 में प्रदर्शित फिल्म 'पहली नजर' में अनिल विश्वास के संगीत निर्देशन में दिल जलता है तो जलने दे..गीत के बाद मुकेश कुछ हद तक अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गये।</p>
<p>मुकेश ने इस गीत को सहगल की शैली में ही गाया था। सहगल ने जब यह गीत सुना तो उन्होंने कहा था..अजीब बात है मुझे याद नहीं आता कि मैंने कभी यह गीत गाया है। इसी गीत को सुनने के बाद सहगल ने मुकेश को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। सहगल की गायकी के अंदाज से प्रभावित रहने के कारण अपनी शुरूआती दौर की फिल्मों में मुकेश सहगल के अंदाज मे ही गीत गाया करते थे लेकिन वर्ष 1948 मे नौशाद के संगीत निर्देशन में फिल्म (अंदाज) के बाद मुकेश ने गायकी का अपना अलग अंदाज बनाया।</p>
<p>मुकेश के दिल में यह ख्वाहिश थी कि वह गायक के साथ साथ अभिनेता के रूप मे भी अपनी पहचान बनाये। बतौर अभिनेता वर्ष 1953 में प्रदर्शित माशूका और वर्ष 1956 में प्रदर्शित फिल्म अनुराग की विफलता के बाद उन्होने पुन: गाने की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया ।इसके बाद वर्ष 1958 मे प्रदर्शित फिल्म यहूदी के गाने ये मेरा दीवानापन है की कामयाबी के बाद मुकेश को एक बार फिर से बतौर गायक अपनी पहचान मिली। इसके बाद मुकेश ने एक से बढ़कर एक गीत गाकर श्रोताओ को भाव विभोर कर दिया ।</p>
<p>मुकेश ने अपने तीन दशक के सिने कैरियर मे 200 से भी ज्यादा फिल्मों के लिये गीत गाये। गायक मुकेश को उनके गाये गीतो के लिये चार बार फिल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायक के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा वर्ष 1974 मे प्रदर्शित (रजनी गंधा ( के गाने (कई बार यूहीं देखा) के लिये मुकेश राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किये गये। राजकपूर की फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम के गाने..चंचल निर्मल शीतल की रिकार्डिंग पूरी करने के बाद वह अमरीका में एक कंसर्ट में भाग लेने के लिए चले गए जहां 27 अगस्त 1976 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया । उनके अनन्य मित्र राजकपूर को जब उनकी मौत की खबर मिली तो उनके मुंह से बरबस निकल गया मुकेश के जाने से मेरी आवाज और आत्मा..दोनों चली गई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मूवी-मस्ती</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 26 Aug 2024 12:57:14 +0530</pubDate>
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                <title>Death Anniversary: बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार थे राजेश खन्ना</title>
                                    <description><![CDATA[अपने रोमांस के जादू से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने वाले किंग ऑफ रोमांस 18 जुलाई 2012 को इस दुनिया को अलविदा कह गये।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/movie-fun/death-anniversary-rajesh-khanna-was-the-first-superstar-of-bollywood/article-85087"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/111u1rer-(23).png" alt=""></a><br /><p>मुंबई। हिंदी फिल्म जगत में अपने अभिनय से लोगों को दीवाना बनाने वाले अभिनेता तो कई हुए और दर्शकों ने उन्हें स्टार कलाकार माना पर सत्तर के दशक में राजेश खन्ना पहले ऐसे अभिनेता के तौर पर अवतरित हुए जिन्हें दर्शको ने 'सुपर स्टार' की उपाधि दी।</p>
<p>पंजाब के अमृतसर में 29 दिसंबर 1942 को जन्में जतिन खन्ना उर्फ राजेश खन्ना का बचपन के दिनों से ही रूझान फिल्मों की और था और वह अभिनेता बनना चाहते थे हांलाकि उनके पिता इस बात के सत खिलाफ थे। राजेश खन्ना अपने करियर के शुरूआती दौर में रंगमंच से जुड़े और बाद में यूनाईटेड प्रोड्यूसर ऐसोसियिशेन द्वारा आयोजित ऑल इंडिया टैलेंट कान्टेस्ट में उन्होंने भाग लिया। जिसमें वह प्रथम चुने गये। राजेश खन्ना ने अपने सिने करियर की शुरूआत 1966 में चेतन आंनद की फिल्म 'आखिरी खत' से की। वर्ष 1966 से 1969 तक राजेश खन्ना फिल्म इंडस्ट्री मे अपनी जगह बनाने के लिये संघर्ष करते रहे।</p>
<p>राजेश खन्ना के अभिनय का सितारा निर्माता-निर्देशक शक्ति सामंत की क्लासिकल फिल्म 'अराधना' से चमका। बेहतरीन गीत-संगीत और अभिनय से सजी इस फिल्म की गोल्डन जुबली कामयाबी ने राजेश खन्ना को 'स्टार' के रूप में स्थापित कर दिया। फिल्म 'अराधना' की सफलता के बाद अभिनेता राजेश खन्ना शक्ति सामंत के प्रिय अभिनेता बन गये। बाद में उन्होंने राजेश खन्ना को कई फिल्मों में काम करने का मौका दिया। इनमें'कटी पतंग, अमर प्रेम, अनुराग, अजनबी,अनुरोध और आवाज आदि शामिल है।</p>
<p> फिल्म अराधना की सफलता के बाद राजेश खन्ना की छवि रोमांटिक हीरो के रूप में बन गयी। इस फिल्म के बाद निर्माता निर्देशकों ने अधिकतर फिल्मों में उनकी रूमानी छवि को भुनाया। निर्माताओं ने उन्हें एक कहानी के नायक के तौर पर पेश किया। जो प्रेम प्रसंग पर आधारित फिल्में होती थी। सत्तर के दशक में राजेश खन्ना लोकप्रियता के शिखर पर जा पहुंचे और उन्हें हिंदी फिल्म जगत के पहले सुपरस्टार होने का गौरव प्राप्त हुआ। यूं तो उनके अभिनय के कायल सभी थे, लेकिन खासतौर पर टीनएज लड़कियों के बीच उनका क्रेज कुछ ज्यादा ही दिखाई दिया। एक बार का वाकया है जब राजेश खन्ना बीमार पड़े तो दिल्ली के कॉलेज की कुछ लड़कियों ने उनके पोस्टर पर बर्फ की थैली रखी, जिससे उनका बुखार जल्द उतर जाये। इतना ही नहीं लड़कियां उनकी इस कदर दीवानी थी कि उन्हें अपने खून से प्रेम पत्र लिखा करती थी और उससे ही अपनी मांग भर लिया करती थी।<br /> <br />70 के दशक में राजेश खन्ना पर यह आरोप लगने लगे कि वह केवल रूमानी भूमिका ही निभा सकते है। राजेश खन्ना को इस छवि से बाहर निकालने में निर्माता-निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी ने मदद की और उन्हें लेकर 1972 में फिल्म 'बावर्ची' जैसी हास्य से भरपूर फिल्म का निर्माण किया और सबको आश्चर्यचकित कर दिया। 1972 में ही प्रदर्शित फिल्म 'आनंद' में राजेश खन्ना के अभिनय का नया रंग देखने को मिला। ऋषिकेश मुखर्जी निदेर्शित इस फिल्म में राजेश खन्ना बिल्कुल नये अंदाज में देखे गये। फिल्म के एक दृश्य में राजेश खन्ना का बोला गया यह संवाद 'बाबूमोशाय, हम सब रंगमंच की कठपुतलियां है, जिसकी डोर ऊपर वाले की उंगलियों से बंधी हुई है, कौन कब किसकी डोर जाये ये कोई नहीं बता सकता।' उन दिनों सिने दर्शको के बीच काफी लोकप्रिय हुआ था और आज भी सिने दर्शक उसे नहीं भूल पाये।</p>
<p>1969 से 1976 के बीच कामयाबी के सुनहरे दौर में राजेश खन्ना ने जिन फिल्मों में काम किया उनमें अधिकांश फिल्में हिट साबित हुयी, लेकिन अमिताभ बच्चन के आगमन के बाद परदे पर रोमांस का जादू जगाने वाले इस अभिनेता से दर्शकों ने मुंह मोड़ लिया और उनकी फिल्में असफल होने लगी। अभिनय मे आयी एकरूपता से बचने और स्वयं को चरित्र अभिनेता के रूप मे भी स्थापित करने के लिये और दर्शकों का प्यार फिर से पाने के लिये राजेश खन्ना ने अस्सी के दशक से खुद को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इसमें 1980 मे प्रदर्शित फिल्म 'रेडरोज' खास तौर पर उल्लेखनीय है। इस फिल्म में राजेश खन्ना ने नेगेटिव किरदार निभाकर दर्शकों को रोमांचित कर दिया।</p>
<p>1985 में प्रदर्शित फिल्म 'अलग अलग' के जरिये राजेश खन्ना ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख दिया। राजेश खन्ना के सिने करियर में उनकी जोड़ी अभिनेत्री मुमताज और शर्मिला टैगोर के साथ काफी पसंद की गयी। राजेश खन्ना को उनके सिने कैरियर में तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार से समानित किया गया। फिल्मों में अनेक भूमिकाएं निभाने के बाद राजेश खन्ना ने समाज सेवा के लिए राजनीति में भी कदम रखा और वर्ष 1991 में कांग्रेस के टिकट पर नयी दिल्ली की लोकसभा सीट से चुने गए । राजेश खन्ना अपने चार दशक लंबे सिने करियर में लगभग 125 फिल्मों में काम किया। राजेश खन्ना अपने चार दशक लंबे सिने करियर में लगभग 125 फिल्मों में काम किया। अपने रोमांस के जादू से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने वाले किंग ऑफ रोमांस 18 जुलाई 2012 को इस दुनिया को अलविदा कह गये।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मूवी-मस्ती</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jul 2024 14:25:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>समावेशी पत्रकारिता के प्रतीक कप्तान साहब</title>
                                    <description><![CDATA[कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी अपने लेखन में हमेशा निष्पक्ष, सच्चे और एक ईमानदार लोकतांत्रिक परंपरा के लेखक थे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/captain-saheb-symbol-of-inclusive-journalism/article-83107"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-12/durga-prasad-chaudhary1.png" alt=""></a><br /><p>कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी जंगे आजादी के सिपाही थे। उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से आजादी के संदेश को आमजन तक पहुंचाने के साथ राष्ट्र के निर्माण में भी विशेष योगदान दिया। कप्तान साहब ने प्रदेश की हिन्दी पत्रकारिता के गौरव को बढ़ाने के लिये जीवनपर्यन्त सेवाएं दीं, जो सदैव अविस्मरणीय रहेंगी। वे इतिहास पुरुष थे जिनकी सेवाओं को सदैव याद किया जाएगा। उनके द्वारा स्थापित परंपराओं का निर्वहन नवज्योति परिवार आज भी कर रहा है।</p>
<p>कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी अपने लेखन में हमेशा निष्पक्ष, सच्चे और एक ईमानदार लोकतांत्रिक परंपरा के लेखक थे। कप्तान साहब ने 1982 में स्थापित किसान संघ, अजमेर के संरक्षक के रूप में किसानों के उत्थान के लिए भी सराहनीय कार्य किया। सामाजिक कुरीतियों के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए अजमेर जिले के 700 गांवों में किसान सभा का आयोजन किया। उनका दृढ़ विश्वास था कि अगर इस देश में भूख, गरीबी, अस्पृश्यता और अन्य सामाजिक बुराइयां बनी रहीं तो एक स्वतंत्र भारत अर्थहीन होगा। उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में प्रगतिशील और आधुनिक भारत के अपने दृष्टिकोण और आदर्श के लिए अथक प्रयास किया। कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी साहब देशभक्ति के दीवाने थे।  कप्तान साहब का जन्म 18 दिसंबर 1906 को नीम का थाना जिला सीकर के जाने- माने अग्रवाल परिवार में हुआ था। चौधरी साहब स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार और समाजसेवी थे। उनके बड़े भाई प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे। कप्तान साहब 1925 से 1947 तक स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल रहे और 1930 से 1945 तक वे सेवादल के कप्तान रहे,इसलिए बाद में दुर्गाप्रसाद चौधरी साहब को कप्तान के रूप में जाना गया।</p>
<p>दैनिक नवज्योति भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए शुरू की गई थी और बाद में इस अखबार ने स्वतंत्रता आंदोलन की मशाल के रूप में काम किया। कप्तान साहब तीन वर्ष तक जेल में रहे। कप्तान साहब देशभक्ति दीवाने थे और भारत- चीन युद्ध के दौरान वे समाचार कवरेज करने के लिए असम में मैकमोहन रेखा पर गए थे। </p>
<p><strong>जन जागरूकता बढ़ाने में अहम भूमिका </strong><br />कप्तान साहब ने लोगों में स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई में लड़ने के लिए जन जागरूकता बढ़ाने और जगाने में मीडिया ने अहम भूमिका निभाई। पत्रकारों, समाज सुधारकों और स्वतंत्रता सेनानियों ने मीडिया और लिखित शब्द की ताकत को पहचाना और उन्होंने इसे स्वतंत्रता, राष्ट्रवाद और देशभक्ति के सार के बारे में प्रचार करने के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया। उन अखबारों में नवज्योति प्रमुख समाचार पत्रों में से एक था जिन्होंने मिशनरी पत्रकारिता के माध्यम से कप्तान साहब के नेतृत्व में राजस्थान में स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  कप्तान साहब आज के मीडिया की दुर्दशा के बारे में चिंतित थे। वह कहते थे कि पत्रकारों के रूप में, हमें एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक समाज में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मिशन के लिए, लोगों को सूचित करने और राष्ट्रीय विकास और रचनात्मक संवाद के लिए आपसी समझ का मार्गदर्शन करने की शक्ति सौंपी गई है। </p>
<p>दुर्गाप्रसाद चौधरी जीवंत लोकतंत्र के सच्चे, समर्पित और ईमानदार पत्रकार थे।  यह सच में कहा गया है कि पत्रकारिता कभी खामोश नहीं हो सकती। यही इसका सबसे बड़ा गुण और सबसे बड़ा दोष है। कप्तान साहब पत्रकारिता की इस कहावत के सही मायने में सच्चे प्रतिनिधि थे। इस मुखरता के कारण वह कभी चुप नहीं बैठे। इस कारण कप्तान साहब न तो सरकारों से कभी कोई लाभ लिया और न ही कोई अपेक्षा की। कप्तान  साहब भारत के पहले प्रधानमंत्री और आधुनिक भारत के निर्माता स्वर्गीय पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे सिद्धांतों में विश्वास रखते थे- कि पत्रकारिता ही लोकतंत्र को कायम रखती है और सच्चे मीडिया के माध्यम से जनतंत्र को मजबूती से जीवंत रूप में बनाए रखा जा सकता है।</p>
<p><strong>गांधी के सान्निध्य में भी रहे कप्तान साहब</strong><br />नवज्योति केवल अखबार नहीं है अपितु राजस्थान के इतिहास का ऐसा रोजनामचा है जिसके माध्यम से राजपूताना में हुए आजादी के संघर्ष और राजस्थान के गठन से लेकर अब तक के सारे घटनाक्रमों को पढ़ा देखा व समझा जा सकता है। गांधीवादी विचारों से ओतप्रोत कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी को महात्मा गांधी के सान्निध्य में भी रहने का अवसर मिला। उन्होंने आजादी के लिये अजमेर व आसपास के क्षेत्र में लगातार सत्याग्रह किया। डूंगरपुर,  बांसवाड़ा, अजमेर, भीलवाड़ा जैसे क्षेत्रों में माणिक्य लाल वर्मा के साथ  रहकर  किसानों, समाज के कमजोर वर्ग और आदिवासियों को संगठित किया,  उनके कल्याण के साथ उनमें जनचेतना का संचार किया। कप्तान साहब ने कई बार जेल यातनाएं भी सहीं। उन्होंने वर्ष 1936 में अजमेर से नवज्योति को साप्ताहिक रूप में प्रकाशित किया,जो वर्ष 1948 में दैनिक के रूप में प्रकाशित होने लगा। आर्थिक संकटों और सरकारी दबावों के बावजूद वे निर्भीकता से इस समाचार पत्र को प्रकाशित करते रहे। </p>
<p><strong>-डा. कमलेश मीना</strong><br /><strong>सहायक क्षेत्रीय निदेशक इग्नू,पटना<br /></strong><strong>(ये लेखक के अपने विचार है)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 29 Jun 2024 11:32:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>पिता यश जौहर की पुण्यतिथि पर उन्हें याद कर भावुक हुये करण जौहर</title>
                                    <description><![CDATA[करण जौहर ने अपने पिता यश जौहर की 20वीं पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए इंस्टाग्राम पर कई सारी तस्वीरें और एक नोट शेयर किया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/movie-fun/karan-johar-gets-emotional-remembering-his-father-yash-johar-on/article-82777"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-06/u1rer-(7)1.png" alt=""></a><br /><p>मुंबई। बॉलीवुड फिल्मकार करण जौहर अपने पिता यश जौहर की पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हें याद कर भावुक हो गये।</p>
<p>करण जौहर ने अपने पिता यश जौहर की 20वीं पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए इंस्टाग्राम पर कई सारी तस्वीरें और एक नोट शेयर किया है। करण जौहर ने नोट में लिखा, मैं विश्वास नहीं कर सकता कि आपको गए हुए 20 साल हो गए। मेरे को इस बात का सबसे बड़ा डर था। दो अगस्त 2003 को आपने मुझे बताया कि आपको ट्यूमर है। मेरा सबसे बुरा सपना मुझे देख रहा था और फिर भी उनके बच्चे के रूप में यह मेरा कर्तव्य था कि मैं पॉजिटिव रहूं और विश्वास बनाए रखूं। लेकिन भीतर की आवाज की सबसे बुरी बात ये है कि वो कभी गलत नहीं होते। इस घटना के 10 महीने बाद वो हमें छोड़कर चले गए। लेकिन उनकी गुडविल का हमें बहुत फायदा मिला। मैं सबसे दृढ़, आत्मीय और निस्वार्थ व्यक्ति का बेटा होने पर बहुत गर्व करता हूं। उन्होंने अपने रिश्तों को हर चीज से ऊपर रखा और प्यार की एक विरासत छोड़ी है जिसे मैं और मेरी मां आज भी जी रहे हैं। लव यू पापा।</p>
<p>गौरतलब है कि 26 जून 2004 में यश जौहर की कैंसर से मौत हो गई थी। उन्होंने दोस्ताना, दुनिया, अग्निपथ, गुमराह, डुप्लीकेट,कुछ कुछ होता है, कभी खुशी कभी गम और कल हो न हो जैसी बेहतरीन फिल्में बनायी थी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मूवी-मस्ती</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 26 Jun 2024 12:48:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>तीन रूपये लेकर मायानगरी मुंबई में अपने सपनों को साकार करने पहुंचे थे महबूब खान</title>
                                    <description><![CDATA[ वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म, मदर इंडिया, महबूब खान की सर्वाधिक सफल फिल्मों में शुमार की जाती है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/movie-fun/mehboob-khan-had-come-to-mayanagari-mumbai-with-three-rupees/article-79671"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-05/t121rer.png" alt=""></a><br /><p>मुंबई। हिन्दी सिनेमा जगत के युगपुरूष महबूब खान बतौर अभिनेता अपने सपने को साकार करने के लिये जेब में मात्र तीन रुपये लेकर दोबारा मायानगरी मुंबई पहुंच गये थे।</p>
<p>09 सितम्बर 1907 को गुजरात के बिलिमोरा में पुलिस कॉन्स्टेबल के घर जन्में महबूब खान को बचपन से ही फिल्म इंडस्ट्री की दुनिया बेहद पसंद थी। वह बचपन से ही अभिनेता बनना चाहते थे, लेकिन उनके पिता इसके खिलाफ थे। अपने सपनों को पूरा करने के लिए महबूब खान 16 साल की उम्र में ही मुंबई भाग गए थे, लेकिन वहां उन्हें सफलता नहीं मिली, जिसकी जानकारी मिलने के बाद उनके पिता ने उन्हें घर बुलवाकर उनकी शादी रचा दी, जिससे वह दोबारा घर से नहीं भाग सके। इस बीच महबूब खान मुंबई जाने का फिर से ख्याल आया और जेब में पड़े तीन रुपये लेकर वह मुंबई निकल पड़े।</p>
<p>भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा के लिये महबूब खान का अभिनेता के रूप में चयन किया गया था, लेकिन फिल्म निर्माण के समय आर्देशिर ईरानी ने महसूस किया कि फिल्म की सफलता के लिए नये कलाकार को मौका देने के बजाय किसी स्थापित अभिनेता को यह भूमिका देना सही रहेगा। बाद में उन्होंने महबूब खान की जगह मास्टर वि_ल को इस फिल्म में काम करने का अवसर दिया। महबूब खान ने अपने सिने कैरियर की शुरूआत 1927 में प्रदर्शित फिल्म अ़लीबाबा एंड फोर्टी थीफस़ से अभिनेता के रूप में की। इस फिल्म में उन्होंने चालीस चोरों में से एक चोर की भूमिका निभायी थी।</p>
<p>इसके बाद महबूब खान सागर मूवीटोन से जुड़ गये और कई फिल्मों में सहायक अभिनेता के रूप में काम किया। वर्ष 1935 में उन्हें .जजमेंट आफ अल्लाह फिल्म के निर्देशन का मौका मिला। अरब और रोम के बीच युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित यह फिल्म दर्शको को काफी पसंद आई। महबूब खान को 1936 में मनमोहन और 1937 में जागीरदार फिल्म को निर्देशित करने का मौका मिला, लेकिन ये दोनो फिल्में टिकट खिड़की पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा सकीं। वर्ष 1937 में उनकी एक ही रास्ता प्रदर्शित हुयी। सामाजिक पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म दर्शको को काफी पसंद आई।इस फिल्म की सफलता के बाद वह निर्देशक के रूप में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गये।</p>
<p>वर्ष 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण फिल्म इंडस्ट्री को काफी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा। इस दौरान सागर मूवीटोन की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर हो गयी और वह बंद हो गयी। इसके बाद महबूब खान अपने सहयोगियों के साथ नेशनल स्टूडियों चले गये। जहां उन्होंने औरत, बहन और रोटी जैसी फिल्मों का निर्देशन किया। कुछ समय तक नेशनल स्टूडियों में काम करने के बाद महबूब खान को महसूस हुआ कि उनकी विचारधारा और कंपनी की विचारधारा में भिन्नता है। इसे देखते हुये उन्होंने नेशनल स्टूडियों को अलविदा कह दिया और महबूब खान प्रोडक्शन लिमिटेड की स्थापना की, जिसके बैनर तले उन्होंने नजमा, तकदीर और हूमायूं जैसी फिल्मों का निर्माण किया।</p>
<p>वर्ष 1946 मे प्रदर्शित फिल्म अनमोल घड़ी महबूब खान की सुपरहिट फिल्मों में शुमार की जाती है। इस फिल्म से जुड़ा रोचक तथ्य यह है कि महबूब खान फिल्म को संगीतमय बनाना चाहते थे। इसी उद्देश्य से उन्होंने नूरजहां सुरैय्या और अभिनेता सुरेन्द्र का चयन किया, जो अभिनय के साथ ही गीत गाने में भी सक्षम थे। फिल्म की सफलता से महबूब खान का निर्णय सही साबित हुआ। नौशाद के संगीत से सजे आवाज दे कहां है। आजा मेरी बर्बाद मोहब्बत के सहारे और जवां है मोहब्बत, जैसे गीत श्रोताओं के बीच आज भी लोकप्रिय है। वर्ष 1949 में प्रदर्शित फिल्म, अंदाज महबूब खान की महत्वपूर्ण फिल्मों में शामिल है। प्रेम त्रिकोण पर बनी दिलीप कुमार, राज कपूर और नर्गिस अभिनीत यह फिल्म क्लासिक फिल्मों में शुमार की जाती है। इस फिल्म में दिलीप कुमार और राजकपूर ने पहली और आखिरी बार एक साथ काम किया था।</p>
<p>वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म आन महबूब खान की एक और महत्वपूर्ण फिल्म साबित हुयी। इस फिल्म की  खास बात यह थी कि यह हिंदुस्तान में बनी पहली टेक्नीकलर फिल्म थी। और इसे काफी खर्च के साथ वृहत पैमाने पर  बनाया  गया था। दिलीप कुमार, प्रेमनाथ और नादिरा की मुख्य भूमिका वाली इस फिल्म से जुड़ा एक रोचक तथ्य यह भी है कि भारत में बनी यह पहली फिल्म थी, जो पूरे विश्व में एक साथ प्रदर्शित की गयी। आन की सफलता के बाद महबूब खान ने अमर फिल्म का निर्माण किया। बलात्कार जैसे संवेदनशील विषय बनी इस फिल्म में दिलीप कुमार, मधुबाला और निम्मी ने मुख्य निभाई। हालंकि फिल्म व्यावसायिक तौर पर सफल नहीं हुयी लेकिन महबूब खान  इसे अपनी एक महत्वपूर्ण फिल्म मानते थे। वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म, मदर इंडिया, महबूब खान की सर्वाधिक सफल फिल्मों में शुमार की जाती है। महबूब खान ने मदर इंडिया से पहले भी इसी कहानी पर 1939 मे औरत फिल्म का निर्माण किया था और वह इस फिल्म का नाम भी औरत ही रखना चाहते थे। लेकिन नरगिस के कहने पर उन्होंने इसका मदर इंडिया जैसा विशुद्व अंग्रेजी नाम रखा। फिल्म की सफलता से उनका यह सुझाव सही साबित हुआ।</p>
<p>वर्ष 1962 में प्रदर्शित फिल्म सन ऑफ इंडिया, महबूब खान के सिने करियर की अंतिम फिल्म साबित हुयी। बड़े बजट से बनी यह फिल्म टिकट खिड़की पर बुरी तरह नकार दी गयी। हांलाकि नौशाद के संगीतबद्ध फिल्म के गीत नन्हा मुन्ना राही हूं। और तुझे दिल ढूंढ रहा है। श्रोताओं के बीच आज भी तन्मयता के साथ सुने जाते है। अपने जीवन के आखिरी दौर में महबूब खान 16वीं शताब्दी की कवयित्री हब्बा खातून की जिंदगी पर एक फिल्म बनाना चाहते थे, लेकिन उनका यह ख्वाब अधूरा ही रह गया। अपनी फिल्मों से दर्शको के बीच खास पहचान बनाने वाले महान फिल्मकार 28 मई 1964 को इस दुनिया से रूखसत हो गये।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मूवी-मस्ती</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 May 2024 16:23:19 +0530</pubDate>
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                <title>पंडित नेहरू की पुण्यतिथि पर सोनिया, खड़गे, राहुल ने किया नमन</title>
                                    <description><![CDATA[नेहरू को उदधृत करते हुए खड़गे ने कहा कि  हम नहीं चाहते कि हमारे देश में कुछ लोग बहुत बड़े अमीर हों और अधिकतर लोग गरीब हों। आज भी कांग्रेस पार्टी उसी 'न्याय' के रास्ते पर चल रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/sonia-kharge-rahul-pay-tribute-to-pandit-nehru-on-his/article-79491"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-05/t21rer-(11)6.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे तथा पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को उनकी 60वीं पुण्यतिथि पर नमन करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।</p>
<p>गांधी और खडगे ने सुबह पंडित नेहरू के समाधि स्थल 'शांति वन' जाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि अपने कुशल नेतृत्व तथा सशक्त निर्णय से आधुनिक भारत की नींव रखने वाले पंडित नेहरू को शत्त-शत्त नमन।</p>
<p>खडगे के कहा कि आधुनिक भारत के शिल्पकार, भारत को वैज्ञानिक, आर्थिक, औद्योगिक तथा विभिन्न क्षेत्रों में आगे ले जाने वाले, लोकतंत्र के समर्पित प्रहरी, स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री एव हमारे प्रेरणास्रोत, पंडित जवाहरलाल नेहरू जी के अतुलनीय योगदान के बिना भारत का इतिहास अधूरा है। 'हिन्द के जवाहर' को पुण्यतिथि पर हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।</p>
<p>देश उन्नत, प्रगति तथा एकता के लिए नेहरू को उदधृत करते हुए उन्होंने कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, देश की रक्षा, देश की उन्नति, देश की एकता ये हम सबका राष्ट्रीय धर्म है। ये हम अलग अलग धर्म पर चलें, अलग- अलग प्रदेश में रहें, अलग भाषा बोलें, पर उससे कोई दीवार हमारे बीच खड़ी नहीं होनी चाहिए। सब लोगों को उन्नति में बराबर का मौका मिलना चाहिए। हम नहीं चाहते कि हमारे देश में कुछ लोग बहुत बड़े अमीर हों और अधिकतर लोग गरीब हों। आज भी कांग्रेस पार्टी उसी 'न्याय' के रास्ते पर चल रही है।</p>
<p>गांधी ने कहा कि आधुनिक भारत के शिल्पकार, देश के प्रथम प्रधानमंत्री, पंडित जवाहरलाल नेहरू जी की पुण्यतिथि पर उन्हें सादर नमन। एक दूरदर्शी व्यक्ति के रूप में उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन-स्वतंत्रता आंदोलन, लोकतंत्र स्थापन, धर्मनिरपेक्षता और संविधान की नींव रखते हुए भारत निर्माण के लिए समर्पित किया। उनके मूल्य सदैव हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 May 2024 13:16:21 +0530</pubDate>
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