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                <title>transplant - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>सावधान मौत की चौखट पर ले जा रही कबूतरों से दोस्ती</title>
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                        <![CDATA[लंग्स ट्रांसप्लांट तक की आ जाती है नौबत ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/be-careful--friendship-with-pigeons-is-taking-you-to-the-threshold-of-death/article-124057"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-08/1ne1ws-(3)37.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। धर्म व आस्था के नाम पर यदि, आप कबूतरों को दाना डाल रहे हैं तो सावधान हो जाइए, क्योंकि, कबूतर अब संदेशा नहीं, मौत का फरमान लाता  है। कबूतरों के पंखों की फड़फड़ाहट व बीट में जानलेवा बैक्टेरिया होते हैं, जो हवा के साथ शरीर में प्रवेश करते हैं और फेफड़ों में मधुमक्खी के छत्ते जैसे स्थायी जाले और फाइब्रोसिस के खड्ढ़े बना देता है। इस पर दवाएं भी असर नहीं करती। ऐसी स्थिति में जान बचाने का एकमात्र विकल्प लंग्स ट्रांसप्लांट ही होता है, जो अत्यधिक महंगा होने के कारण हर किसी के लिए संभव नहीं होता।  शांत और मासूम लगने वाले यह कबूतर स्वास्थ्य के लिए कितने खतरनाक हैं, पढ़िए रिपोर्ट के प्रमुख अंश...</p>
<p><strong>कबूतरों की बीट से बढ़ रही घातक बीमारियां </strong><br /><strong>केस 1-10 साल की बच्ची के फेफड़े हुए खराब </strong><br />कबूतर के सम्पर्क में रहने से बोरखेड़ा क्षेत्र के आदित्य आवास कॉलोनी निवासी 10 वर्षीय बालिका के दोनों फेफड़े खराब हो गए थे। सांस में तकलीफ व कमजोरी होने पर डॉक्टरों को दिखाया तो पता चला कि फेफड़ों की झिल्ली में राई जैसे दाने बन गए और निमोनिया विकसित हो गया। सीटी स्कैन और नसों की एंजियोग्राफी  कराने पर पता चला कि उसे हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस हुआ था। </p>
<p><strong>केस 2 - कबूतरों से दूरी बनाई तो बची जान</strong><br />सीनियर चेस्ट फिजिशियन डॉ. केवल कृष्ण डंग ने बताया कि शहर की 73 वर्षीय एक महिला सालभर से सूखी खांसी और सांस की तकलीफ के साथ दिखाने आई थीं। उनके बेडरूम की बालकनी में कबूतरों का घोंसला था। एचआरसीटी  से बीमारी का शुरूआत चरण में पता चला। उन्हें तुरंत कबूतरों से दूरी व दवा लेने की सलाह दी। आज वह बिना ऑक्सीजन सपोर्ट के 200 मीटर चल पाती हैं।</p>
<p><strong>केस 3- महिला को लंग्स ट्रांसप्लांट कराना पड़ा</strong><br />नवंबर 2023 में दिल्ली निवासी एक 53 वर्षीय महिला को कबूतरों की सूखी बीट के संपर्क में आने से फेफड़ों की गंभीर बीमारी हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस हो गई। यह बीमारी इतनी गंभीर थी कि फेफड़ों ने काम करना बंद कर दिया। बाद में महिला को लंग्स ट्रांसप्लांट तक कराना पड़ा। </p>
<p><strong>यह रखें सावधानी </strong><br />- कबूतरों को घरों की छत, बालकनी पर दाना डालने से बचें। <br />- रिहायशी इलाकों से दूर खुले मैदान में दूर से दाना डाल सकते हैं।<br />- कमरों के आसपास कबूतरों के घोंसलें नहीं बनने दें। साफ-सफाई रखें।<br />- यदि लगातार खांसी या सांस की तकलीफ हो तो चिकित्सकीय जांच कराएं।<br />- छतों पर बीट को साफ करते वक्त हाथों में दस्ताने व मुंह माक्स पहनें। </p>
<p><strong>शहर में कहां-कहां कबूतरों को डाले जा रहे दाने </strong><br />- शहर में कबूतरों को दाने डालने का सबसे प्रमुख स्थान कोटा बैराज की पुलिया है। जहां हजारों लोग कबूतरों को दाना डालने आते हैं।<br />- किशोर सागर की पाल, आॅक्सीजोन पार्क, सेवन वंडर, सीवी गार्डन, पार्क, बहुमंजिला इमारतों के कैम्पस, पर्यटन स्थलों पर भी लोग कबूतरों को दाना डाल रहे हैं। </p>
<p><strong>एक्सपर्ट व्यू </strong><br />कबूतर की बीट और उसके पंख में थर्मोफिलिक एक्टिनोमाइ साइटिस सहित अन्य कीटाणु होते हैं, जो फेफड़ों पर बुरा असर डालते हैं। जो लोग कबूतर पालते हैं या जिनकी बालकनी, रोशनदान में कबूतर आते हैं, उन्हें एलर्जी का न्यूमोनिया होने का खतरा अधिक रहता है। जिसे हाइपरसेंसेटिव न्यूमोनाइटिस कहते हैं। यह रोग फेफड़ों की झिल्ली और श्वास नलियां खराब करता है। जिससे सांस में तकलीफ और खांसी होती है। अगर इसका तुरंत पता नहीं लगाया जाए तो फेफड़े खत्म हो सकते हैं। शरुआती दौर में खांसी बुखार जैसे लक्षण होते हैं, जो टीबी जैसे लगते हैं। भारत में बच्चों में यह बीमारी नहीं के बराबर होती है। लेकिन गत वर्ष 10 वर्षीय बच्ची का जो केस आया, वो मैंने अपने कॅरिअर में पहला मामला देखा।<br /><strong>-डॉ. केवल कृष्ण डंग, सीनियर चेस्ट फिजिशियन </strong></p>
<p><strong>कबूतर 100 किलो जहर पैदा करता है</strong><br />कबूतरों को दाना डालना न केवल स्वास्थ्य के लिए घातक है बल्कि ईको सिस्टम को भी बर्बाद करना जैसा है। फिडिंग और ब्रिडिंग से इनकी संख्या में लगातार बढ़ रही है। जिससे गौरेया, चिड़ियाएं, कोयल सहित कई छोटे पक्षी लुप्त होते जा रहे हैं। एक साल में एक कबूतर करीब 100 किलो बीट करता है, जो इंसानों के लिए जहर है। दाना डालने से नुकसान कर रहे हैं। वन्यजीव विभाग की ओर से कैपटेविटी एनिमल स्पोंसरशिप स्कीम चला रखी है। यहां चिड़ियाघर में मौजूद वन्यजीवों का भरण-पोषण कर दान-पुण्य कर सकते हैं। <br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग</strong></p>
<p> </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 19 Aug 2025 15:17:57 +0530</pubDate>
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                <title>महात्मा गांधी अस्पताल ने एक दिन में 6 स्वैप किडनी ट्रांसप्लांट कर रोगियों को दी नई जिन्दगी </title>
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                        <![CDATA[डॉ. सूरज गोदारा ने बताया कि  यहॉं  कैडेवर, लिविंग डोनर, एबीओ इंकॉम्पिटिबल तथा स्वैप तकनीक से किडनी ट्रांसप्लांट किए जा रहे हैं।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/mahatma-gandhi-hospital-gave-new-life-to-patients-by-transplanting-6-swap-kidneys-in-a-day/article-49666"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-06/630-400-size-(7)12.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। सीतापुरा स्थित महात्मा गांधी अस्पताल, जयपुर के किडनी प्रत्यारोपण विशेषज्ञों ने हाल ही में एक दिन में 6 रोगियों में स्वैप किडनी प्रत्यारोपण कर राज्य में इतिहास रचा है। खास बात यह है कि इन सभी रोगियों को उसी ब्लड ग्रुप का मैचिंग डोनर नहीं मिल पा रहा था।  ऐसे में किडनी प्रत्यारोपण नहीं हो पा रहा था। एक अस्पताल में एक दिन में एक साथ छह स्वैप किडनी प्रत्यारोपण करने का देश के चिकित्सा इतिहास में बहुत ही कम उल्लेख मिला है। किडनी ट्रांसप्लांट यूनिट के निदेशक तथा विख्यात यूरोलोजिस्ट प्रो. डॉ. टी सी सदासुखी तथा राजस्थान के जाने-माने गुर्दा रोग विशेषज्ञ व महात्मा गांधी अस्पताल में नेफ्रेलोजी हैड प्रो. डॉ. सूरज गोदारा ने बताया कि डोनर किडनी देने को तैयार हो और ब्लड ग्रुप मैच नहीं हो तो यह बडी निराशाजनक स्थिति होती है। स्वैप किडनी डोनेशन के जरिये रोगियों को उपचारित किया जा रहा है। स्वैप किडनी ट्रांसप्लांट उसी स्थिति में हो सकता है जबकि कई रोगी तथा डोनर्स वेटिंग में हों। महात्मा गांधी अस्पताल में राज्य के सर्वाधिक किडनी प्रत्यारोपण किये गये है। अब यह संख्या 1600 से अधिक हो गई है। हाल ही में किए गए सभी   ऑपरेशन विगत 8 मई,2023 को हुए। इसमें 4 सर्जन्स ने 4 ऑपरेशन थियेटर्स में, सुबह 8 बजे ऑपरेशन शुरू किये थे जो करीब 12 घण्टे चले तथा रात 8 बजे तक पूरे हो सके थे। गहन चिकित्सा इकाई में उन्हें संक्रमणमुक्त वातावरण में रखा गया तथा 10 दिन की रिकवरी के बाद छुट्टी दे दी गई। अभी किये गये फॉलो-अप में सभी रोगी जिनमें किडनी प्रत्यारोपित की गई तथा सभी डोनर्स पूरी तरह ठीक हैं तथा शीघ्र ही वे सामान्य दिनचर्या में लौट आये हैं। <br /><br />डॉ. सूरज गोदारा ने बताया कि  यहॉं  कैडेवर, लिविंग डोनर, एबीओ इंकॉम्पिटिबल तथा स्वैप तकनीक से किडनी ट्रांसप्लांट किए जा रहे हैं।<br />उन्होंने बताया कि पहले मामले में बहरोड निवासी निशांत का ब्लड ग्रुप बी-पॉजीटिव था जबकि उसकी डोनर माता ललता देवी का ब्लड ग्रुप ओ-पॉजिटिव था। एंटीबॉडीज के कारण ट्रांसप्लांट में समस्या आ रही थी। ऐसे में उन्हें स्वैप डोनर सरिता यादव की किडनी लगाई गई।  दूसरे मामले में श्रीगंगानगर निवासी किडनी रोगी रजनी शर्मा का ब्लड ग्रुप एबी-पॉजीटिव था जबकि उनके पति गौरी शंकर का ब्लड ग्रुप बी पॉजिटिव था। ऐसे में एंटीबॉडीज के कारण उनका किडनी ट्रांसप्लांट नहीं हो पा रहा था। स्वैप ट्रांसप्लांट के जरिये उन्हें मैचिंग स्वैप डोनर मुन्नी देवी की किडनी लगाई गई। तीसरे मामले में रोगी उषा शाक्य जयपुर की रहने वाली थीं उनका ब्लड ग्रुप बी पॉजिटिव था जबकि उनके डोनर रमेश चंद का ब्लड ग्रुप ए-पॉजिटिव था। ऐसे में अलग ब्लड ग्रुप के कारण उनका भी किडनी ट्रांसप्लांट नहीं हो पा रहा था। उन्हें स्वैप डोनर ललता देवी मीना की किडनी लगाई गई।चौथे मामले में झुंझुनू निवासी प्रीति सोनी का ब्लड ग्रुप ए-पॉजिटिव था जबकि उनके डोनर उनकी माता मुन्नी देवी का ब्लड ग्रुप बी-पॉजिटिव था। उन्हें स्वैप डोनर रमेश चंद की किडनी प्रत्यारोपित की गई। पॉंचवा केस भी कुछ ऐसा ही था जिसमें डीडवाना निवासी महिपालसिंह का ब्लड ग्रुप बी पॉजिटिव था जबकि उनकी डोनर माता स्वरूप कंवर का ब्लड ग्रुप ए पॉजिटिव था। ऐसे में उन्हें स्वैप डोनर गौरीशंकर शर्मा की किडनी लगाई गई। छठे मामले में मैनपुरी, यूपी के रहने वाले दिनेश यादव का ब्लड ग्रुप ए पॉजिटिव था जबकि उनकी डोनर पत्नी सरिता का ब्लड ग्रुप बी पॉजिटिव था। मैचिंग ब्लड ग्रुप नहीं होने की वजह से वे बहुत दिनों से मैचिंग डोनर का इंतजार कर रहे थे। ऐसे में स्वैप डोनेर स्वरूप कंवर की किडनी लगाई।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 22 Jun 2023 13:26:07 +0530</pubDate>
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                <title>राज्य का पहला इमरजेंसी लिवर ट्रांसप्लाण्ट रहा सफल, बचाई रोगी की जान</title>
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                        <![CDATA[सीतापुरा स्थित महात्मा गांधी अस्पताल की डॉक्टर्स टीम को एक और चमत्कारिक सफलता मिली है। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/states-first-emergency-liver-transplant-was-successful-patients-life-was/article-11890"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/cfds-copy.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। सीतापुरा स्थित महात्मा गांधी अस्पताल की डॉक्टर्स टीम को एक और चमत्कारिक सफलता मिली है। हाल ही में अस्पताल की लिवर ट्रांसप्लांट टीम ने एक्यूट लिवर फेलियर की आपात स्थिति में झालावाड़ की 50 वर्षीय महिला का लिवर ट्रांसप्लांट किया है। लिवर ट्रासप्लाण्ट विभाग के डाइरेक्टर तथा मुख्य लिवर ट्रांसप्लान्ट सर्जन डॉ. नैमिश मेहता ने बताया कि यह राज्य में आपातकालीन लिवर ट्रांसप्लाण्ट का यह पहला मामला है। यह ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा है। रोगी कालीबाई तथा डोनर राजेश अब स्वस्थ हैं। महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइन्सेज एण्ड टैक्नोलोजी जयपुर के एमेरिटस चयरपर्सन डॉ. एमएल स्वर्णकार ने बताया कि महात्मा गांधी अस्पताल राज्य का प्रमुख लिवर ट्रांसप्लाण्ट सेंटर है जहां अब तक 26 लिवर प्रत्यारोपण हो चुके हैं। अस्पताल द्वारा अंगदान तथा अंग प्रत्यारोपण के लिए अहम प्रयास किये जा रह है। समाज में अंगदान खासकर लिंकिंग डॉगर डोनेशन के लिए सभी अस्पतालों, स्वयंसेवी संगठनों को आगे आना चाहिए। चेयर पसंन डा विकास स्वर्णकार ने बताया कि यदि समय पर अंगदान किया जाये तो हर साल सैकड़ों जरूरतमंद रोगियों की जान बचाई जा सकती है। महात्मा गाधी अस्पताल जयपुर में यह लिवर प्रत्यारोपण राजस्थान गवर्नमेंट है। स्कीम के तहत किया गया जिसमें रोगी को कैशलेस उपचार दिया गया।</p>
<p>डॉ. नैमिश मेहता ने बताया कि ड्रग साइड इफेक्ट के कारण रोगी को लियर फेलियर की स्थिति का सामना करना पड़ा। अस्पताल पहुंचते ही रोगी को पेंटीलेटर की मदद की जरूरत पड़ी। उसके दिमाग पर सूजन का गंभीर खतरा भी था। ऐसी स्थिति में 80-85 प्रतिशत रोगी जान चा देते हैं। रोगी की जान बचाने का एकमात्र विकल्प लिवर प्रत्यारोपण था। इसकी सबसे बड़ी समस्या यह थी कि घर वालों को अचानक हुए लिवर फेलियर की जानलेवा स्थिति का आभास भी नहीं होता है और वे इतनी बड़ी सर्जरी के लिए तैयार नहीं हो पाते हैं। हिमेटोलोजिस्ट डॉ करण कुमार ने परिवार की फासिलिंग कर गंभीरता के बारे में बताया। तब इनके तीनों बेटा लिवर डोनेशन की इच्छा व्यक्त की। जांचों में बेटे राजेश को लिवर डोनेशन के लिए उपयुक्त पाया गया। ट्रांसप्लाण्ट सम्बन्धित दस्तावेज तैयार कर स्टेट ऑथराइजेशन कमेटी से स्वीकृति ली गई।</p>
<p>आपात स्थिति में देर रात ऑपरेशन शुरू हुआ जो बारह घण्टे तक चला। एक साथ दो ऑपरेशन थियेटर्स में ऑपरेशन हुए। पहले में लिवर डोनर के लिवर का एक हिस्सा निकाला गया। दूसरे ऑपरेशन थियेटर में महिला का खराब हुआ लिवर निकाला गया तथा डोनेशन से प्राप्त लिवर का हिस्सा प्रत्यारोपित किया गया। खास बात यह है कि अस्पताल में भर्ती होते समय भी रोगी वेंटीलेटर पर था। डोनर की जाँच तथा ट्रांसप्लाण्ट सम्बन्धित डॉक्यूमेंटेशन तथा सरकारी अनुमति में भी लगभग आठ से दस दिन का समय लग जाता है। इस आपात सर्जरी में महज एक दिन में सारी प्रक्रिया पूरी की गई। दोनों ही ऑपरेशन सफल रहे हैं। डोनर का लिवर पहले की तरह दो माह में सामान्य आकार ले लेगा।</p>
<p>टीम में डॉ. नैमिश मेहता,  डॉ. विनय कपूर, डॉ. अजय शर्मा, डॉ. आर पी चौबे, डॉ. आनन्द नागर, डॉ शाश्वत सरीन, डॉ. विनय महला, डॉ. अरविन्दो कुमार दास तथा हिपेटोलोजिस्ट डॉ. विवेक आनन्द सारस्वत तथा डॉ करण कुमार तथा निश्चेतना विशेषज्ञ डॉ. गणेश निमझे तथा डॉ. गोयल तथा ट्रांसप्लान्ट कोर्डिनेटर आर्यन माथुर प्रमुख सहयोगी रहे।<br /><br /><br /></p>]]>
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                                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jun 2022 13:18:51 +0530</pubDate>
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                <title>कोटा में पहली बार सफल किडनी ट्रांसप्लांट</title>
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                        <![CDATA[मेडिकल कॉलेज कोटा में बुधवार को पहली बार किडनी ट्रांसप्लांट किया गया जो सफल रहा। एक मां ने अपने बेटे को किड़नी दी। कोटा के 16 डॉक्टरों की टीम ने करीब पांच घंटे से अधिक समय में किडनी ट्रांसप्लांट किया।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/first-successful-kidney-transplant-in-kota/article-9622"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/safal-kidney-transplant.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। मेडिकल कॉलेज कोटा में बुधवार को पहली बार किडनी ट्रांसप्लांट किया गया जो सफल रहा। एक मां ने अपने बेटे को किड़नी दी। कोटा के 16 डॉक्टरों की टीम ने करीब पांच घंटे से अधिक समय में किडनी ट्रांसप्लांट किया। इसके साथ ही कोटा मेडिकल कॉलेज की उपलब्धियों में एक नया अध्याय जुड़ गया।  <br /><br />बूंदी जिले के नैनवा निवासी 40 वर्षीय गुमान सिंह की दोनों किड़नी खराब थी। उसे किडनी की जरूरत थी। इसके लिए कई लोगों से सम्पर्क किया। लेकिन उसकी मां की किडनी उससे मैच हुई। इसके बाद करीब 6 माह तक वह मेडिकल कॉलेज कोटा में भर्ती रहा। इस दौरान उसकी व उसकी मां की सभी जांचें की गई। सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद बुधवार को जयपुर के दो डॉक्टरों की मौजूदगी में कोटा के डॉक्टरों ने पहला सफल किडनी ट्रांसप्लांट किया।  बुधवार को गुमान सिंह की मां की किडनी आॅपरेशन में करीब दो घंटे से अधिक और गुमान सिंह के आॅपरेशन में करीब 3 घंटे से अधिक समय लगा। <br /><br />मेडिकल कॉलेज कोटा के प्राचार्य डॉ. विजय सरदाना ने बताया कि किडनी प्रत्यारोपण के लिए चिकित्सा मानकों के अनुरूप आवश्यक प्रक्रिया अपनाई गई । जिसमें किडनी दान करने वाले व्यक्ति की सभी  आवश्यक  जांचे करवाई गई। रोगी को उसकी माँ ने अपनी किड्नी दान की जो सफलतार्पूक सम्पन्न हुई। इससे पहले दान करने वाले का ब्लड टेस्ट, एचएलए टेस्ट का मिलान किया गया, जो सभी सामान्य पाए गए। उन्होंने बताया कि किडनी प्रत्यारोपण के लिए स्टेट लेवल ओथरिजेशन कमेटी से स्वीकृति भी प्राप्त की गई है। सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज जयपुर से बेकअप के लिए यूरोलोजी विभाग से डॉ. एस.एस यादव व डॉ. अनुपमा गुप्ता उपस्थित रही। उन्होंने बताया कि मेडिकल कॉलेज कोटा की टीम से यूरोलोजी विभाग से डॉ. निलेश जैन, डॉ. शैलेंद्र गोयल, डॉ अंकुर, डॉ. शिव शंकर  और  नेफ्रÞोलोजी विभाग से डॉ विकास खंडेलिया  व  अनेस्थेसिया विभाग से डॉ. एस.सी दुलारा, डॉ. सीएल  खेड़िया और रेजिडेंट डॉ. द्वारा किड़नी ट्रांसप्लांट का सफलतार्पूक आॅपरेशन किया गया। <br /><br /><strong>संभागीय आयुक्त ने चिकित्सकीय टीम को दी बधाई</strong><br />न्यू मेडिकल कॉलेज के सुपरस्पेश्यलिटी चिकित्सालय में कोटा संभाग का पहला किडनी ट्रांसप्लांट का आॅपरेशन सफलतार्पूक करने पर बधाई दी।संभागीय आयुक्त दीपक नन्दी ने  मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. विजय सरदाना, सुपरस्पेश्यलिटी चिकित्सालय के अधीक्षक डॉ. निलेश जैन और  उनकी पूरी टीम को प्रशस्ति पत्र जारी कर बधाई और शुभकामनाएं दी है । <br /><br /><strong>जुलाई 2021 में मिली थी स्वीकृति</strong><br />मेडिकल कॉलेज कोटा को किडनी प्रत्यारोपण की स्वीकृति 30 जुलाई 2021 को प्राप्त हुई थी। जिसमें आवश्यक सुविधाओं व उपकरणों का विस्तार किया गया। करीब 7 करोड़ रुपए की लागत से किडनी ट्रांसप्लांट यूनिट स्थापित की गई थी। यहां पूर्व में 22 अप्रैल को पहला किडनी ट्रांसप्लांट होना था। लेकिन उस समय डॉक्टरों की टीम जयपुर से कोटा नहीं आ सकी थी। जिससे ट्रांसप्लांट को टालना पड़ा था।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 May 2022 15:57:55 +0530</pubDate>
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                <title>ट्रांसप्लांट और कॉकलियर इम्प्लांट भी अब चिंरजीवी बीमा योजना में शामिल</title>
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                        <![CDATA[प्रदेश में चिरंजीवी बीमा योजना में अब ऑर्गन ट्रांसप्लांट, बोन मेरो ट्रांसप्लांट और कॉकलियर इम्प्लांट जैसी बीमारियों के महंगे इलाज के पैकेजे भी शामिल हो गए हैं।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/jaipur-news--health-news--transplant-and-cochlear-implant-also-now-included-in-chiranjeevi-bima-yojana/article-7875"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/chiranjeevi-yojana-.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। प्रदेश में चिरंजीवी बीमा योजना में अब ऑर्गन ट्रांसप्लांट, बोन मेरो ट्रांसप्लांट और कॉकलियर इम्प्लांट जैसी बीमारियों के महंगे इलाज के पैकेजे भी शामिल हो गए हैं। इसके बाद बीमित लोग दस लाख रुपए तक का इससे जुड़ा इलाज बीमा राशि से मुफ्त ले सकेंगे। चिकित्सा मंत्री परसादी लाल मीणा ने कहा कि ऐसी बीमारियों का महंगा इलाज भी अब नि:शुल्क मिल सकेगा। बीमा में कॉकलियरइम्प्लांट के 5, बॉन मेरो ट्रांसप्लांट के 9, लीवर ट्रांसप्लांट में 8, हार्ट ट्रांसप्लांट में 7 पैकेजेज जोड़े गए हैं। योजना के पात्र लाभार्थी तो है परंतु योजना में रजिस्ट्रेशन नही हुआ है, उनको इलाज की आवश्यकता होने पर जिला कलेक्टर की अनुशंषा पर योजना से जुड़े निजी अस्पतालों में भी नि:शुल्क इलाज मिलेगा। इनकी योजना में बीमा अवधि 30 अप्रैल को समाप्त हो रही है वे सभी एक मई से पहले 850 रुपए प्रीमियम जमा करवाकर अगले एक साल के लिए योजना में अपने परिवार का पंजीकरण करवा सकते हैं। इसके बाद योजना का लाभ तीन महीने बाद अगस्त माह से मिल पाएगा। योजना से अब तक 11 लाख से अधिक लोगों को 1400 करोड़ रुपए से अधिक राशि का नि:शुल्क उपचार प्रदान किया गया है। योजना से अब तक प्रदेश के 807 सरकारी तथा 755 निजी अस्पताल जुड़ चुके हैं।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 14 Apr 2022 10:41:22 +0530</pubDate>
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                <title>जयपुर में धड़केगा गुड़गांव निवासी 25 वर्षीय युवक का दिल</title>
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                        <![CDATA[प्रदेश के 10वा हार्ट ट्रांसप्लांट की  तैयारी हुई शुरू      ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/jaipur--heart-of-25-year-old-youth-resident-of-gurgaon-will-beat-in-jaipur--air-ambulance-from-private-hospital-in-gurgaon-to-eternal-hospital-jaipur-heart-came--preparation-for-the-state-s-10th-heart-transplant-started/article-6940"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/untitled-design-(3).jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। प्रदेश की राजधानी जयपुर एक बार फिर चिकित्सा के क्षेत्र में इतिहास रचने की तैयारी कर रही है। दरअसल जयपुर के जवाहर सर्किल स्थित एक निजी अस्पताल में गुड़गांव से एयर एम्बुलेंस के जरिए 25 वर्षीय ब्रेन डेडयुवक का हार्ट आया है। जिसे अस्पताल में जरूरत मंद मरीज को लगाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।</p>
<p><br /> 25 साल के भूपेंद्र गुड़गांव में सड़क दुर्घटना से ब्रेन डेड हो गए थे। ऐसे में जयपुर के इटर्नल हॉस्पिटल में हार्ट को आज सुबह भेजा गया है। राजस्थान में पहली बार एयर एम्बुलेंस से ट्रांसप्लांट के लिए जयपुर आया है। इससे पहले जयपुर से हार्ट अन्य शहरों में भेजा गया था। इसके लिये ट्रैफिक पुलिस जयपुर ने ग्रीन कॉरिडोर बना सिर्फ 3 मिनिट में T2 व्हीकल गेट से EHCC हॉस्पिटल में हार्ट पहुंचाया। सीनियर कार्डियक सर्जन डॉ. अजीत बाना के नेतृत्व में अब अस्पताल में हार्ट  ट्रांसप्लांट हुआ।</p>]]>
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                                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 29 Mar 2022 14:13:10 +0530</pubDate>
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                <title>प्रदेश में 8वां हार्ट ट्रांसप्लांट : मर कर भी 4 लोगों को जिंदगी दे गया सुनील, ब्रेन डेड मरीज के परिजनों की सहमति से हुआ अंगदान</title>
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                        <![CDATA[प्रदेश में 8वां हार्ट ट्रांसप्लांट हुआ, लेकिन यह संभव हुआ सीकर के लाल सुनील साई के कारण। सुनील साई ने मरने के बाद भी अमर होते हुए चार लोगों की नई जिंदगी दी है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/8th-transplant-in-state/article-4755"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-02/46546546546559.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। प्रदेश में 8वां हार्ट ट्रांसप्लांट हुआ, लेकिन यह संभव हुआ सीकर के लाल सुनील साई के कारण। सुनील साई ने मरने के बाद भी अमर होते हुए चार लोगों की नई जिंदगी दी है। सीकर में खेती का काम कर के लौटते समय एक अज्ञात कार ने सुनील की गाड़ी को टक्कर मार दी थी। टक्कर इतनी भीषण थी सुनील गंभीर घायल हो गया। सुनील को सीकर के एसके अस्पताल में भर्ती कराया, गया जहां हालत गंभीर होने पर उन्हें जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में भर्ती करवाया गया।</p>
<p>सुनील साई अपने पीछे अपनी पत्नी अनीता देवी व बच्चे को छोड़ गये। परिजनों व गांव वालों के अनुसार सुनील साई हमेशा ही मदद के लिए तत्पर रहते थे और कभी भी किसी को मदद के लिए मना नहीं करते थे। सवाई मानसिंह अस्पताल में चिकित्सकों के अथक प्रयासों के बावजूद भी सुनील को बचाना संभव नहीं हो पाया तथा ब्रेन डैड घोषित कर दिया गया। सवाई मानसिंह अस्पताल के चिकित्सकों डॉ. देवेन्द्र पुरोहित, डॉ. चित्रा सिंह तथा ट्रांसप्लांट कोर्डिनेटर्स की समझाइश के बाद सुनील के परिजनों ने मानवहित में निर्णय लेते हुए अंगदान करने का साहसिक फैसला लिया।राजस्थान में कार्यरत स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाईजेशन द्वारा हृदय को जयपुर स्थित ईटरनल हार्ट केयर सेंटर तथा लिवर को जयपुर स्थित मनीपाल अस्पताल व दोनो किडनियों को सवाई मानसिंह अस्पताल जयपुर में आवंटित किया गया। इटरनल हॉस्पिटल में एक मरीज को हार्ट ट्रांसप्लांट किया गया।<br /> <br /> <br /> </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 21 Feb 2022 12:30:15 +0530</pubDate>
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                <title>स्टेम प्रत्यारोपण के बाद एचआईवी से स्वस्थ होने वाली पहली महिला</title>
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                        <![CDATA[ल्यूकेमिया से ग्रस्त अमेरिका की एक महिला स्टेम सेल प्रत्यारोपण के बाद एचआईवी से स्वस्थ होने वाली विश्व की तीसरी मरीज एवं पहली महिला बन गयी है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/transplant-of-stem/article-4552"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-02/46546546546535.jpg" alt=""></a><br /><p>वाशिंगटन। ल्यूकेमिया से ग्रस्त अमेरिका की एक महिला स्टेम सेल प्रत्यारोपण के बाद एचआईवी से स्वस्थ होने वाली विश्व की तीसरी मरीज एवं पहली महिला बन गयी है। इस मरीज के मामले को डेनवर में एक चिकित्सा सम्मेलन में पेश किया गया। यह पहली बार है कि इस पद्धति को एचआईवी के लिए एक कार्यात्मक इलाज के तौर पर प्रयोग किया गया है। <br /> शोधकर्ताओं ने बताया कि महिला में एक ऐसे व्यक्ति के स्टेम सेल (गर्भनाल) का प्रत्यारोपण किया गया, जो इस वायरस का स्वाभाविक प्रतिरोधी था। इसके बाद से उसे एचआइवी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी की भी जरूरत नहीं पड़ी। वह एचआईवी से स्वस्थ है तथा इससे मुक्ति पाने वाली वह दुनिया की पहली महिला और तीसरी मरीज बन गयी है।</p>
<p>वैज्ञानिकों के अनुसार चयनित प्रतिरोपित कोशिकाओं में एक विशिष्ट आनुवंशिक उत्परिवर्तन है, जिसका कारण वे एचआईवी वायरस से संक्रमित नहीं हो सकते। इसके परिणामस्वरूप प्राप्तकर्ताओं की प्रतिरक्षा प्रणाली एचआईवी के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर सकती है। पहली बार स्टेम सेल प्रत्यारोपण 2007 में किया गया था। टिमोथी एचआईवी से स्वस्थ होने वाले पहले व्यक्ति थे। दूसरे मरीज एडम कैस्टिलेजो थे। ल्यूकेमिया एक प्रकार का कैंसर है, जो अस्थि मज्जा में खून का निर्माण करने वाली कोशिकाओं में उत्पन्न होता है। इससे पहले एक श्वेत और एक अश्वेत पुरुष में स्टेम सेल का प्रत्यारोपण हो चुका है, जिनका अक्सर अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण में प्रयोग किया जाता है।<br /> </p>]]>
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                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 17 Feb 2022 12:12:01 +0530</pubDate>
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