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                <title>monetary - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>monetary RSS Feed</description>
                
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                <title>आरबीआई मौद्रिक नीति से पहले बाजार में रौनक : सेंसेक्स 74,629.94 पर खुला, इन शेयरों में दिखेगी तेजी</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नीतिगत दरों की घोषणा से पहले घरेलू शेयर बाजार मजबूती के साथ खुले। सेंसेक्स करीब 100 अंक चढ़कर 74,629 पर खुला, जबकि निफ्टी ने 23,478 पर शुरुआत की। गवर्नर की घोषणा से पहले ऑटो, बैंकिंग, आईटी और फार्मा शेयरों में शानदार तेजी देखी जा रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/market-opened-in-green-sensex-opened-at-7462994-these-stocks/article-156043"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/share-market3.png" alt=""></a><br /><p>मुंबई। रिजर्व बैंक के रेपो तथा अन्य नीतिगत दरों पर बयान से पहले घरेलू शेयर बाजार शुक्रवार को बढ़त के साथ खुले। बीएसई का सेंसेक्स 99.93 अंक की तेजी के साथ 74,629.94 अंक पर खुला। खबर लिखे जाते समय यह 164.59 अंक (0.22 प्रतिशत) ऊपर 74,524.60 अंक पर था। रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की तीन दिवसीय बैठक पूरी होने के बाद आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा आज सुबह 10 बजे नीतिगत दरों तथा विषयों पर समिति की ओर से बयान जारी करेंगे।</p>
<p>धातु को छोड़कर अन्य सभी सेक्टरों में अभी लिवाली चल रही है। ऑटो, बैंकिंग, वित्त, आईटी, फार्मा, स्वास्थ्य, टिकाऊ उपभोक्ता उत्पाद और रसायन समेत सभी समूहों के सूचकांकों में अच्छी तेजी है। निवेशकों की नजर उनके बयान पर बनी हुई है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी-50 सूचकांक 62.40 अंक चढ़कर 23,478.95 अंक पर खुला। खबर लिखे जाते समय यह 40.20 अंक यानी 0.17 प्रतिशत की मजबूती के साथ 23,456.75 अंक पर रहा।</p>
<p>सेंसेक्स की कंपनियों में फिलहाल टेक महिंद्रा, बजाज फाइनेंस, महिंद्रा एंड महिंद्रा, बजाज फिनसर्व, सन फार्मा और इंफोसिस के शेयर ऊपर हैं। टाटा स्टील, ट्रेंट, इंडिगो, रिलायंस इंडस्ट्रीज, कोटक महिंद्रा बैंक और पावरग्रिड में इस समय बिकवाली चल रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>बिजनेस</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 11:07:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>नई मौद्रिक नीति में महंगाई नियंत्रण को प्राथमिकता</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी नई मौद्रिक नीति में महंगाई नियंत्रण को प्राथमिकता दी गई है, जो कि पूर्व में घोषित मौद्रिक नीति की तुलना में विपरीत दिशा प्रदान करती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/inflation-is-priority-in-new-monetary-policy/article-9601"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/bank-copy.jpg" alt=""></a><br /><p>भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी नई मौद्रिक नीति में महंगाई नियंत्रण को प्राथमिकता दी गई है, जो कि पूर्व में घोषित मौद्रिक नीति की तुलना में विपरीत दिशा प्रदान करती है। देश में कोरोना काल के अंतर्गत घोषित मौद्रिक नीति में यथास्थिति बनाए रखने को महत्व दिया गया था तथा महत्वपूर्ण दरें जैसे रेपो दर, रिवर्स रेपो व नकद कोष अनुपात में परिवर्तन नहीं किया गया, ताकि ऋणों पर ब्याज दरें संतुलित व युक्तिसंगत बनी रहे तथा ऋण लेने की लागत नहीं बढ़े,ऋण उठाव क्षमता आर्थिक रिकवरी को बढ़ाने में मददगार बने। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए रेपो दर 4 प्रतिशत रिवर्स रेपो दर को 3.6 प्रतिशत तथा नगद कोष अनुपात को 4 प्रतिशत रखा गया था, लेकिन हाल ही हुए घोषित मौद्रिक नीति अचानक 0.4 प्रतिशत वृद्धि की गई तथा नगद कोष अनुपात भी 0.5 प्रतिशत से बढ़ा दिया गया है। यह अनुमान से अधिक है इसका वास्तविक असर 6 से 8 माह के अंतराल में नजर आएगा। रेपो दर वह दर होती है जिस पर केंद्रीय बैंक वाणिज्यिक बैंकों को पैसा उधार देता है जिसका प्रत्यक्ष संबंध ऋणों की लागत से होता है चाहे वह ऋण किसी भी क्षेत्र के लिए लिया गया हो। यदि यह दर बढ़ती है तो कृषि, उद्योग, व्यापारी, उपभोक्ता आदि सभी ऋणों की ब्याज दर बढ़ जाती है तथा उधार लेने की लागत बढ़ जाती है। वाणिज्यिक बैंक इस रेपो दर के आधार पर प्राइम लेंडिंग ब्याज दर निर्धारित करती हैं, जो कि निश्चित रूप से बढ़ जाती है। नगद कोष अनुपात बढ़ता है तो बैंकों की तरलता प्रभावित होती है तथा उन्हें अधिक नगद कोष बैंक में रखने होते हैं तथा आय कुछ भी नहीं होती है। वर्तमान मौद्रिक नीति हुए परिवर्तनों से ग्रह, वाहन आदि के लिए लिए गए ऋणों पर अधिक ब्याज आएगा तथा एमआई में वृद्धि होगी एवं भविष्य में उपभोक्ताओं को ऋण लेना महंगा हो जाएगा तथा ऋण उठाव क्षमता कम होगी। क्रेडिट कार्ड महंगा हो जाएगा। यह अनुमान लगाया गया है कि 15 वर्षों के लिए एक करोड़ के लिए गए गृह ऋण पर प्रति माह ईएमआई में 2176 रुपए की वृद्धि हो जाएगी।</p>
<p>विश्व में ब्याज दरों में वृद्धि हो रही है विश्व के देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा आदि देशों में 0.25 से 1 प्रतिशत या अधिक की ब्याज दर में वृद्धि की गई है। महंगी मौद्रिक एवं ऋण नीति की आवश्यकता इसलिए हो गई है ताकि विश्व में महंगाई को नियंत्रित किया जा सकें तथा मांग पर नियंत्रण हो। अभी रूस यूक्रेन युद्ध का कोई भी हल नहीं निकला है इसका दुष्प्रभाव खाद्य एवं कच्चे तेल की बढ़ती हुई कीमतों के रूप में आ रहा है। आपूर्ति में बाधा उत्पन्न हो रही है ।अंतरराष्ट्रीय भुगतान अटक गए हैं। माल वाहन एवं बीमा जोखिम लागतों लगातार बढ़ गई है। लॉजिस्टिक लागत में तेजी से वृद्धि हुई है, जो कि लगभग 20 प्रतिशत या अधिक हो गई है, तो विश्व में लगातार इस मुल्य वृद्धि का दबाव बढ़ता जा रहा है। माल की आपूर्ति में व्यवधान उम्पन्न होने तथा महंगा आयात होने से देश में मांग पूर्ति असंतुलन पैदा होता है जिसका सीधा संबंध लागत एवं मूल्य वृद्धि से है।</p>
<p>महंगाई को नियंत्रित करने में मौद्रिक एवं वित्तीय नीति की भूमिका प्रधान मानी जाती है, लेकिन समस्या यह है कि इनमें परस्पर समन्वय का अभाव पाया जाता है। अनेक अवसरों पर यह नीति परस्पर विरोधी हो जाती है, तो मूल्य वृद्धि के प्रभाव बढ़ जाते हैं। मौद्रिक नीति से ब्याज दर प्रभावित होती है चाहे जमा दर हो या उधार दर हो। एक तरफ  यदि ऋण दर बढ़ेगी, तो बैंकों को स्थाई जमा पर ब्याज दर को भी बढ़ाना होगा। देश में 5 वर्ष की स्थाई जमा पर ब्याज दर में 0.5 प्रतिशत तक की वृद्धि हो जाएगी। यदि स्थाई जमा पर ब्याज दर बढ़ती है तो भविष्य निधि पर देय ब्याज भी बढ़ जाती है तथा सभी प्रकार की बचत योजनाओं पर ब्याज का भार बढ़ जाता है। स्थाई बचत करने वालों की आय बढ़ जाती है, लेकिन सरकार पर सार्वजनिक ऋणों पर ब्याज का भार बढ़ जाता है। भारत में महंगाई नियंत्रण को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। मौद्रिक नीति उत्पादन लागत से बढ़ाएगी। ऐसे में वित्तीय नीति, जो कि केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा घोषित की जाती है तथा जिसका संबंध कर, व्यय एवं ऋण तथा बजट नीति से होता है। देश में पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस, खाधान्न एवं खाद्य पदार्थ, दूध, फल एवं सब्जियां, दालें, खाद्य तेल आदि अत्यधिक संवेदनशील वस्तु में मानी जाती है, जो कि महंगाई को बढ़ाती है तथा उपभोक्ताओं की जेब पर अतिरिक्त भार डालती है। कोरोना काल में असंगठित मजदूरों के रोजगार छिन गए हैं, उस सीमा तक रोजगार सृजन नहीं हो पाया है।</p>
<p>आज भारत में आयातित कच्चा तेल महंगा होने से पेट्रोल एवं डीजल, रसोई गैस आदि के दाम बढ़ रहे हैं लेकिन दूसरा पक्ष उत्पाद एवं वैट दरें हैं, जो कि कम करने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री का कहना है कि केंद्र ने पेट्रोल एवं डीजल के दाम कम किए, लेकिन अनेक राज्यों ने केंद्र की नीति का अनुपालन नहीं किया तो उपभोक्ताओं को उचित लाभ नहीं मिल पाया। कृषि क्षेत्र में आयातित उर्वरक के मूल्य में बढ़ रहे हैं, उर्वरकों के आयात की लागत बढ़ रही है तथा उर्वरकों पर सरकारी सब्सिडी का भार बढ़ रहा है। इंडोनेशिया ने पाम आयल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है, जो कि देश में पाम आयल के आयात को बाधित करेगा। ऐसे में मौद्रिक एवं वित्तीय नीति यह दूसरे के पूरक बनकर महंगाई को नियंत्रित करें तथा ब्याज दरों के घटने के साथ-साथ जीएसटी दरों में अपेक्षा के अनुरूप बदलाव की आवश्यकता है।   </p>
<p><strong>- डॉ. सुभाष गंगवाल</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 May 2022 11:38:46 +0530</pubDate>
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                <title>देश की नई मौद्रिक नीति एवं मूल्य वृद्धि</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मौद्रिक नीति के अंतर्गत कोई भी नीतिगत ब्याज दरों में परिवर्तन नहीं किया गया है और यथास्थिति वादी दृष्टिकोण को अपनाते हुए कोरोना काल में घोषित नीति को ही लागू किया गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/country-s-new-monetary-policy-and-price-hike/article-4564"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-02/rbi.jpg" alt=""></a><br /><p>भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मौद्रिक नीति के अंतर्गत कोई भी नीतिगत ब्याज दरों में परिवर्तन नहीं किया गया है और यथास्थिति वादी दृष्टिकोण को अपनाते हुए कोरोना काल में घोषित नीति को ही लागू किया गया है। संभावना व्यक्त की जा रही थी कि विश्व के विकसित देशों में मूल्य वृद्धि जनित मुद्रास्फीति ब्याज दरों पर प्रभाव पड़ा है तथा मूल्य वृद्धि को रोकने के लिए अमेरिका का फेडरल रिजर्व बैंक ब्याज दर में वृद्धि का नीतिगत निर्णय ले सकता है। इस संबंध में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर का मानना है कि विश्व के दूसरे विकसित देशों की तुलना में भारत में मूल्य वृद्धि के प्रभाव एवं कारणों में अंतर है। भारत में मूल्य वृद्धि के कारण विकसित देशों की तुलना में अलग है। विश्व के देशों में विश्व खाद्य संगठन के अनुसार खाद्य मूल्य वृद्धि लगभग 30 प्रतिशत है, जबकि भारत में खाद्य मूल्य वृद्धि 6.5 प्रतिशत है। अमेरिका में कार मूल्य वृद्धि का कारण है लेकिन भारत में नहीं है। यूरोपीय देशों में ट्रकों को चलाने के लिए ड्राइवर की उपलब्धता मूल्य वृद्धि का कारण है लेकिन भारत में नहीं है। ऐसी स्थिति में मूल्य वृद्धि की संभावनाओं एवं जोखिम का विशेषण करके एवं आमिकान जैसे कोरोना के पड़ने वाले प्रभावों को ध्यान में रखते हुए ही यथावत एवं समायोजित मौद्रिक नीति घोषित की गई है तथा मौद्रिक नीति समिति की भी यही सिफारिश है।</p>
<p><br />मौद्रिक नीति के अंतर्गत विकास एवं मूल्य स्थिरता एक महत्वपूर्ण चुनौती है। आर्थिक सर्वेक्षण के अंतर्गत वर्ष 2022-23 के लिए 8 से 8.5 प्रतिशत आर्थिक विकास दर में वृद्धि का अनुमान लगाया गया था, जबकि भारतीय रिजर्व बैंक ने विकास दर वृद्धि का अनुमान 7.8 प्रतिशत लगाया है। इसी तरह से खुदरा मुद्रा प्रसार 5.3 प्रतिशत घटकर वर्ष 2023 में 4.5 प्रतिशत रह जाएगा। वर्तमान खुदरा मुद्रा मूल्य सूचकांक लगभग 6 प्रतिशत है, जबकि थोक मूल्य सूचकांक 12 से 13 प्रतिशत तक है। खुदरा मूल्य एवं थोक मूल्य सूचकांक में अंतर का कारण कर माना जाता है जिसको कि खुदरा मूल्य सूचकांक की गणना में सम्मिलित नहीं किया जाता है। मौद्रिक नीति प्रतिवेदन में विकास दर में कमी का अनुमान है, लेकिन मुद्रास्फीति नियंत्रित सीमा में 4 से 6 प्रतिशत के मध्य रहेगी। देश में विकास दर में वृद्धि भी आवश्यक है तथा महंगाई पर नियंत्रण भी। देश के गरीब, निर्धन एवं आमजन को विकास भी प्रभावित करता है तथा महंगाई भी। यदि विकास दर बढ़ती है तो रोजगार, आय एवं उत्पादन स्तर बढ़ता है, लेकिन महंगाई बढ़ती है तो आमजन का जेब खर्च बढ़ता है। लेकिन मूल्य वृद्धि का लाभ उद्योगपतियों, व्यापारियों, दलालों एवं कंपनियों की जेबों में तो जाता है, लेकिन गरीब की जेब तो खाली हो जाती है। इसका सीधा सा कारण भारत में मजदूरी की दरें तेजी से नहीं बढ़ती है तथा न्यूनतम मजदूरी अधिनियम सरकारी एवं संगठित क्षेत्रों पर तो लागू होता है लेकिन असंगठित एवं निजी क्षेत्र पर नहीं।</p>
<p><br />महंगाई को रोकने एवं विकास दर में वृद्धि का उपाय यह है कि ब्याज दरें संतुलित एवं स्थिर रहे। मौद्रिक नीति में उल्लेखित बैंक दर, रेपो दर एवं रिवर्स रेपो दर साख की लागत को प्रभावित करती है तथा बचत पर मिलने वाले ब्याज दर से भी इस संबंध है। यदि उपभोग को बढ़ाना है तो ब्याज दर कम होनी चाहिए ताकि मांग में उठाव पैदा हो। मांग का उपभोग स्तर पूर्व कोरोना काल के स्तर पर आए। देश में रियलिटी एवं कंस्ट्रक्शन क्षेत्र, होटल एवं पर्यटन व्यवसाय, आॅटोमोबाइल क्षेत्र इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद आदि कोरोना से सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। इन उत्पादों में लगी कंपनियों एवं थोक व खुदरा व्यापारियों को अत्यधिक नुकसान का सामना करना पड़ा है। यदि ब्याज दरें बढ़ती है तो उपभोक्ता ऋण महंगे हो जाते हैं तथा बड़ी लागत को उपभोक्ता तक लादने में उत्पादक व व्यापारी शत-प्रतिशत सफल नहीं हो पाते हैं।उपभोक्ता वस्तुओं में हुई मूल्य वृद्धि में कर नीति एवं साख की लागत का अत्यधिक प्रभाव होता है, जो कि आपूर्ति बाधा उत्पन्न करता है। ऐसे में साख की उठाव क्षमता को बनाए रखना एवं बढ़ाना है। देश में मांग के साथ-साथ पूर्ति बाधाएं भी मूल्य वृद्धि का कारण बन जाती है जो कि लॉजिस्टिक लागत को बढ़ाती है। देश में लॉजिस्टिक लागत अत्यधिक है, जो कि 15 से 20 प्रतिशत तक है, जबकि चीन में मात्र 4 से 5 प्रतिशत है । यह भी कारण है कि दुनिया के देशों में चीन सस्ता उत्पाद बेचने में सफल हो जाता है।</p>
<p><br />देश में आगामी समय में संभावित सामान्य मानसून, निर्यात बढ़ोतरी, नए बजट में पूंजीगत व्यय में वृद्धि तथा इंफ्रास्ट्रक्चर प्राथमिकता वृद्धि की दृष्टि से मूल्य राहत प्रदान होने की संभावनाएं है, लेकिन देश में खाद्य एवं ऊर्जा मूल्य वृद्धि पर कोई नियंत्रण नहीं है। खाद्य उत्पादों के मूल्य तेजी से बढ़ते हैं तो मूल्य सूचकांक भी बढ़ता है जिसके लिए आयात एक विकल्प है। देश में दालों एवं खाद्य तेल के संबंध में यह बात लागू होती है। दूसरी समस्या खनिज तेल के अंतरराष्टÑीय मूल्य में तेजी से वृद्धि है, जो कि दिसंबर 2021 में 69 डालर प्रति बैरल था जो कि अभी 94 प्रति बैरल हो गया है तथा रूस यूक्रेन के युद्ध एवं रूस व अमेरिकी देशों की खनिज तेल उत्पादन की भावी नीति मूल्य वृद्धि का कारण बनने की संभावना है। अभी देश में पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं तो पेट्रोल एवं डीजल के दाम तेल कंपनियों ने नहीं बढ़ाए हैं चुनाव बाद तेजी से बढ़ेंगे। यहां पर अर्थ नीति असफल है, राजनीति नहीं। </p>
<p><strong>  -डॉ. सुभाष गंगवाल<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong><br /><br /><span style="background-color:#ffff99;"><span style="color:#ff0000;"><strong>अर्थचक्र</strong></span></span><br />महंगाई को रोकने एवं विकास दर में वृद्धि का उपाय यह है कि ब्याज दरें संतुलित एवं स्थिर रहे। मौद्रिक नीति में उल्लेखित बैंक दर, रेपो दर एवं रिवर्स रेपो दर साख की लागत को प्रभावित करती है तथा बचत पर मिलने वाले ब्याज दर से भी इस संबंध है। यदि उपभोग को बढ़ाना है तो ब्याज दर कम होनी चाहिए ताकि मांग में उठाव पैदा हो। मांग का उपभोग स्तर पूर्व कोरोना काल के स्तर पर आए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/country-s-new-monetary-policy-and-price-hike/article-4564</link>
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                <pubDate>Thu, 17 Feb 2022 14:27:19 +0530</pubDate>
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