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                <title>breathing - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>सांसों पर संकट, थर्मल की बूढ़ी इकाइयां शहर को बना रही बीमार</title>
                                    <description><![CDATA[चिमनियों से उठता धुआँ थर्मल प्लांट के 4-5 किमी क्षेत्र तक शहर की हवा को प्रदूषित कर रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/breathing-crisis--the-aging-thermal-power-plant-units-are-making-the-city-sick/article-142152"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/(1200-x-600-px)-(2)10.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शिक्षा नगरी के नाम से पहचाने जाने वाले कोटा की आबो-हवा अब जहरीली होती जा रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह कोटा थर्मल पावर प्लांट की वे बूढ़ी इकाइयां हैं, जो अपनी तय उम्र पूरी कर चुकी हैं, लेकिन आज भी धड़ल्ले से चलाई जा रही हैं। 1983 में स्थापित थर्मल की यूनिट1 और यूनिट 2 अपनी निर्धारित अवधि से करीब 10 साल ज्यादा समय निकाल चुकी हैं । इसके बावजूद इनसे निकलने वाला धुआं, राख और गर्म पानी शहरवासियों की सांसों और चंबल नदी दोनों के लिए बड़ा खतरा बन गया है। चंबल किनारे बसें लोगों का कहना है कि थर्मल से 4 से 5 किलोमीटर की परिधि तक सीधा असर दिख रहा है। हवा में घुले सूक्ष्म कण सांसों के जरिए शरीर में जा रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि लोगों ने सफेद कपड़े पहनना तक बंद कर दिया है,क्योंकि छत पर कपड़े सुखाने पर कुछ ही देर में उन पर राख जम जाती है। चिमनियों से उठता धुआं दिनभर शहर की हवा को दूषित कर रहा है।अवधी पार कर चुकी इकाइयों का असर अब युवाओं पर भी साफ दिखने लगा है।</p>
<p><strong>कम उम्र  सांस, आंख और त्वचा की समस्याएं</strong><br />किशोरपुरा क्षेत्र की 35 वर्षीय रिंकू कंवर बताती हैं, सीढ़ियां चढ़ते ही सांस फूलने लगती है। पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। डॉक्टर कहते हैं कि हवा में मौजूद प्रदूषक तत्व इसकी बड़ी वजह हो सकते हैं। ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं, जहां कम उम्र के लोग भी सांस, आंख और त्वचा संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं। थर्मल से निकलने वाला प्रदूषण केवल हवा तक सीमित नहीं है। संयंत्र से छोड़ा जा रहा गर्म और दूषित पानी सीधे चंबल नदी में मिलाया जा रहा है। पर्यावरणविदों का कहना है कि इससे नदी का तापमान बढ़ रहा है, जिसका सीधा असर जलीय जीवों और चंबल की जैव विविधता पर पड़ रहा है। मगर प्रशासन और थर्मल प्रबंधन इस गंभीर मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है।</p>
<p><strong>बड़ा सवाल फ्लू गैस डी-सल्फराइजेशन (एफजीडी) प्लांट नहीं</strong><br />नियमों के अनुसार थर्मल में यह प्लांट लगना चाहिए था, ताकि सल्फर डाइआॅक्साइड जैसे जहरीले गैसों का उत्सर्जन कम हो सके। लेकिन आज तक यह प्लांट पूरी तरह तैयार नहीं हो पाया। नतीजा यह है कि शहर की सांसों में जहर लगातार घुलता जा रहा है। किशोरपुरा, शिवपुरा, पाटनपोल, साबरमती कॉलोनी, केथूनीपोल, शक्ति नगर, दादाबादी, श्रीनाथपुरम से लेकर सकतपुरा और नांता तक राख का फैलाव देखा जा रहा है। स्थानीय लोग बताते हैं कि रात में खुले में सोना तो दूर, दिन में घरों की खिड़कियां खोलना भी मुश्किल है। इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आ रही।</p>
<p><strong>प्रभाव जो देखे जा रहे</strong><br />-5 किमी तक राख और धुएं का फैलाव।<br />-सफेद कपड़ों पर जम रही काली परत।<br />-आंख और स्वांस के रोगियों को बढ रही परेशानी।<br />-थर्मल के गर्म पानी को सीधे नदी में मिलाने से चंबल की जैव विविधता पर भी संकट बढ़ रहा है, थर्मल से डिस्चार्ज पानी के साथ आॅयल की मात्रा भी नदी में आती है, कुछ महीने पहले भी किशोरपुरा की तरफ काफी सारी मरी मछिलयां पानी पर पडी़ हुई देखी गई थी ।</p>
<p><strong>एक्सपर्ट व्यू</strong><br />थर्मल से निकलने वाले धुएं में कईं प्रकार के टॉक्सिस औैर पार्टिकल होते है दमा ,फेफड़ों से सम्बन्धित बिमारी वाले रोगियों में यह गम्भीर समस्याएं पैदा कर सकता है।<br /><strong>- डॉ. राजेश ताखर,  श्वास व एलर्जी रोग विशेषज्ञ</strong></p>
<p>अवधी पार कर चुकी थर्मल इकाइयों को चलाना बेहद खतरनाक है। बिना ट्रीटमेंन्ट प्लांट के सल्फर और पार्टिकुलेट मैटर सीधे हवा में जा रहे हैं। इससे श्वसन रोगों का खतरा कई गुना बढ़ सकता है। साथ ही गर्म पानी नदी में छोड़ने से पानी में आक्सीजन की कमी हो जाती है। जलीय जीवों के विकास में बाधा तो होती ही साथ ही कई अन्य बुरे प्रभाव भी जन्म लेने लगते है यह पर्यावरणीय अपराध की श्रेणी में आता है। कोटा की आबो-हवा और चंबल की सेहत अब निर्णायक मोड़ पर है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को चुकाना पड़ेगा।<br /><strong>-अनिल रावत, सेवानिवृत्त वैज्ञानिक, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड</strong></p>
<p>हमारे यहां पर जिला प्रदूषण बोर्ड की टीम द्वारा समय समय पर सेम्पलिंग करवायी जाती है, जिसकी रिपोर्ट भी आगे जाती है।<br /><strong>-शिखा अग्रवाल, मुख्य अभियन्ता कोटा थर्मल</strong></p>
<p>चम्बल के पानी और हवा की सेम्पिलंग करने के लिये हमारी टीमें लगातार जाती रहती है। जिसकी अपडेट पोर्टल पर डाल दी जाती है ।<br /><strong>-योग्यता सिंह, क्षेत्रीय अधिकारी जिला प्रदूषण बोर्ड, कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Feb 2026 14:54:17 +0530</pubDate>
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                <title>महिला ने सिलाई करते वक्त दांतों के बीच फंसाई सुई, सांस लेने से पेट में गई</title>
                                    <description><![CDATA[हली बार ऐसा हुआ है जब कोई सुई या पिन जैसी चीज दूरबीन के जरिए लीवर से निकाली गई हो।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/doctors-at-sms-hospital-have-removed-a-needle-stuck-in-the-intestine-and-liver-of-a-woman-with-a-telescopic-method--woman-stuck-needle-between-teeth-while-sewing--went-into-stomach-due-to-breathing/article-6295"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/27.jpg" alt=""></a><br /><p> जयपुर। एसएमएस अस्पताल के चिकित्सकों ने एक महिला की आंत और लिवर में फंसी सुई को दूरबीन पद्धति से निकाला है। एक 25 वर्षीय महिला को सिलाई करते समय मुंह में दांतों के बीच सुई फंसाना महंगा पड़ गया। सांस लेने के दौरान सुई महिला के पेट में चली गई। दो-तीन दिन इंतजार करने और पेट दर्द सहने के बाद आखिर में महिला ने एसएमएस में आकर डॉक्टर को दिखाया, जहां महिला का दूरबीन पद्धति से ऑपरेशन करके सुई को लीवर से निकाला गया। पहली बार ऐसा हुआ है जब कोई सुई या पिन जैसी चीज दूरबीन के जरिए लीवर से निकाली गई हो। इसमें बड़ी बात ये है कि सुई इस कदर फंसी हुई थी कि एक बार तो वह निकलते समय टूट गई और उसका बड़ा हिस्सा फंस गया, लेकिन कुछ देर बाद दोबारा उसे निकाला गया। <br /><br /><strong>ऐसे चली प्रक्रिया</strong><br />एसएमएस हॉस्पिटल में जनरल सर्जन और सीनियर प्रोफेसर डॉ. ऋचा जैन ने बताया कि गंगानगर की रहने वाली 25 साल की महिला सिलाई का काम कर रही थी। उसने मुंह में दांतों के बीच सुई फंसा रखी थी। जब उसने सांस ली तो अचानक सुई पेट में चली गई। अस्पताल आने के बाद जब एक्सरे कराया गया तो सुई पहले आंतों में दिखी। मरीज को भर्ती किए 10 दिन हो गए थे। इस दौरान सोनोग्राफी, एंडोस्कॉपी, एक्सरे, सीटी स्कैन समेत कई जांचे बार-बार करवानी पड़ी। हमने एक बार तो मरीज को वापस घर भेजने का फैसला किया, लेकिन आखिरी बार जब सोनोग्राफी की तो लीवर के अंदर सुई डिटेक्ट हुई।<br /><br /><strong>आंत में छेद करते हुए लीवर में गई</strong><br />दो दिन प्रोसेस किया तो देखा महिला के आंतों में फंसी सुई आंतों में छेद करके लीवर में बुरी तरह फंस गई थी। कई जांचे और गेस्ट्रो सर्जरी विभाग के डॉक्टर्स से सलाह लेने के बाद महिला का ऑपरेशन किया गया। उसके बाद सुई को बाहर निकाला गया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 17 Mar 2022 12:31:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
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                <title>नींद में ही मौत का कारण बन सकता ऑब्सट्रेक्टिव स्लीप एपनिया</title>
                                    <description><![CDATA[
संगीतकार बप्पी लहरी की इसी बीमारी से हुई है मौत]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/obstructive-sleep-apnea-can-cause-death-in-sleep--musician-bappi-lahiri-has-died-of-this-disease--osa-is-a-sleep-disorder--frequently-stops-breathing/article-4611"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-02/sleep-apnia-2.new.jpg" alt=""></a><br /><p> जयपुर। मोटापा वैसे तो कई बीमारियों की जड़ है और कई बार जानलेवा भी हो सकता है। इन दिनों एक ऐसी बीमारी की चर्चा है जो कि मोटे लोगों में ज्यादा देखी जाती है, इसका नाम है आॅब्सट्रेक्टिव स्लीप एपनिया (ओएसए)। रिपोर्ट्स के मुताबिक संगीतकार और गायक बप्पी लहरी का इसी बीमारी के कारण निधन हुआ है। चिकित्सकों की मानें तो मोटे लोगों को इसकी सही जानकारी न होने के कारण अक्सर इलाज नहीं हो पाता। स्थिति गंभीर होने के बाद इसके कारण हाइपरटेंशन, हार्टअटैक, स्ट्रोक, अनियमित धड़कन, डायबिटीज एवं कार्डियोमायोपैथी जैसी बीमारियां हो सकती हैं जो मरीज के लिए जानलेवा भी साबित हो सकती है। <br /><br />नारायणा हॉस्पिटल की पल्मनोलॉजिस्ट और निंद्रा रोग विशेषज्ञ डॉ. शिवानी स्वामी ने बताया कि यह नींद से संबंधित एक ब्रीदिंग डिस्आॅर्डर है, इससे सोते समय श्वास बार-बार रुकती है। इस बीमारी में व्यक्ति की श्वास नींद में ही रुक जाती है और उसे पता भी नहीं चलता है। यह दिक्कत 10 सेकंड्स या उससे अधिक समय तक हो सकती है। इससे खून में आॅक्सीजन की कमी होने लगती है। ऐसा होने पर दिमाग सक्रिय हो जाता है और आपको कुछ सेकेंड्स के लिए जगाता है ताकि आप अपने वायुमार्ग को खोल सकें। समस्या बढ़ने पर मरीज रात में कई बार उठता है और गला सूखना, बाथरूम जाना, खर्राटे बंद होने के बाद वापस चालू होने जैसे लक्षण भी आ सकते हैं। <br /><strong><br />जा सकती है जान </strong><br />ओएसए में गले की मांसपेशियां नींद के दौरान ढीली पड़ जाती हैं और एयर फ्लो में रुकावट डालती हैं। इसकी वजह से मरीज तेज-तेज खर्राटे लेता है। सांस लेने में रुकावट देर तक रहने पर खून में आॅक्सीजन का स्तर कम होने लगता है और मरीज की मौत हो सकती है।</p>
<p><br /><strong>संभव है इलाज</strong><br />इस बीमारी का इलाज संभव है। इसमें एक ऐसे डिवाइस का इस्तेमाल किया जाता है जो सोते समय आपके वायुमार्ग को खुला रखता है। एक और तरीका है जिसमें एक माउथपीस के जरिए निचले जबड़े पर दबाव डाला जाता है। कुछ मामलों में इसकी सर्जरी भी करनी पड़ती है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 18 Feb 2022 16:10:42 +0530</pubDate>
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