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                <title>law minister - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>अर्जुन राम मेघवाल बनें कानून मंत्री, रिजिजू अब संभालेंगे भू-विज्ञान मंत्रालय की जिम्मेदारी</title>
                                    <description><![CDATA[किरेन रिजिजू को अब भू-विज्ञान मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई है।  मेघवाल को कानून राज्य मंत्री के तौर पर स्वतंत्र प्रभार दिया गया है। गौरतलब है कि मेघवाल पहले से ही संस्कृति मंत्रालय में राज्यमंत्री के पद पर हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/arjun-ram-meghwal-becomes-law-minister-rijiju-will-now-handle/article-45870"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-05/arjun.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। मोदी कैबिनेट में फेरबदल करते हुए किरेन रिजिजू को कानून मंत्री पद से हटा दिया गया है। उनकी जगह राजस्थान के बीकानेर से सांसद अर्जुन राम मेघवाल को कानून मंत्री बनाया गया है। वहीं किरेन रिजिजू को अब भू-विज्ञान मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई है।  मेघवाल को कानून राज्य मंत्री के तौर पर स्वतंत्र प्रभार दिया गया है। गौरतलब है कि मेघवाल पहले से ही संस्कृति मंत्रालय में राज्यमंत्री के पद पर हैं।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि किरेन रिजिजू ने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया था कि न्यायाधीश अपना आधा समय न्याय देने के बजाय यह तय करने में लगाते हैं कि किसे न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जाए, क्योंकि उन्होंने कॉलेजियम प्रणाली को "अपारदर्शी" करार दिया और भारतीय चयन प्रणाली को "अपारदर्शी" बताया था। राष्‍ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने पीएम नरेंद्र मोदी की सलाह पर रिजिजू को पृथ्‍वी विज्ञान मंत्रालय का जिम्‍मा दिया है।</p>
<p><strong>कौन हैं मेघवाल</strong><br />अर्जुन राम मेघवाल, राजस्थान के बीकानेर से सांसद हैं। उन्हें अब मोदी कैबिनेट में कानून मंत्री बनाया गया है। 69 वर्षीय सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और चूरू के जिला कलेक्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं। मेघवाल पहले से ही संस्कृति मंत्रालय में राज्यमंत्री के पद पर हैं। वह ऐसे नेता हैं जिन्होंने अपनी पहचान और सादगी को हमेशा महत्व दिया है। वह हमेशा राजस्थान की पगड़ी को सिर पर लगाए रखते हैं। घवाल का बचपन काफी संघर्ष भरा रहा है। किशमीदेसर गांव के एक पारंपरिक बुनकर परिवार में उनका जन्म हुआ था। पढ़ाई के साथ-साथ वह बचपन से अपने पिता की बुनकरी में मदद करते थे।<br />  </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 May 2023 11:04:20 +0530</pubDate>
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                <title>कांग्रेस के हालात</title>
                                    <description><![CDATA[अश्विनी कुमार से पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह, अमरिंदर सिंह जैसे बहुत से बड़े नेता कांग्र्रेस से किनारा कर चुके हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/620f8bbf6a645/article-4623"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-02/congress_new.jpg" alt=""></a><br /><p>कांग्रेस छोड़कर जाने वाले बड़े नेताओं में मनमोहन सरकार में कानून मंत्री और अनेक बड़े पदों पर सुशाभित अश्विनी कुमार का नाम भी जुड़ गया है। अश्विनी कुमार से पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह, अमरिंदर सिंह जैसे बहुत से बड़े नेता कांग्र्रेस से किनारा कर चुके हैं। पंजाब चुनाव से कुछ दिन पहले अश्विनी कुमार का पार्टी छोड़ना इसलिए महत्वपूर्ण और अलग है, क्योंकि वह सोनिया गांधी और परिवार के बेहद निकट थे। जी-23 के नाम से संगठित कांग्र्रेस नेताओं का भी उन्होंने विरोध किया था, लेकिन इतने नेताओं के पार्टी छोड़ने के बाद भी राहुल गांधी या वर्तमान कांग्र्रेस की कार्यशैली में बदलाव आने की संभावना नहीं है। कांग्र्रेस लगातार जनाधार खो रही है और अपने पुराने और अनुभवी नेताओं को भी। अश्विनी कुमार ने पार्टी से इस्तीफा देते हुए परोक्ष रूप से टिप्पणी की है कि राहुल गांधी राष्ट्रीय स्तर के नेता के दौर पर देश के जनमानस को स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी में प्रतिभाशाली व वरिष्ठ नेताओं का कोई महत्व नहीं रह गया है। इसका एक तरह से सीधा मतलब यही निकलता है कि केवल परिवार के चाटुकारों का वर्चस्व है। अश्विनी कुमार चार दशक से अधिक समय तक पार्टी से जुड़े रहे हैं और विभिन्न पदों पर रहकर सत्ता का सुख लेते रहे हैं, लेकिन अब जब वैसा पुराना सुख नहीं मिल रहा है, तो फिर सुख प्राप्ति की चाह में पार्टी को छोड़ने को मजबूर हुए हैं। पार्टी से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने अपने आगे के कदम के बारे में कोई संकेत नहीं दिया है। बहरहाल, अश्विनी कुमार स्वयं कोई बड़े जनाधार वाले नेता नहीं हैं। पंजाब में वह नगर पालिका तक का चुनाव भी नहीं जीत पाए हैं। पार्टी छोड़कर जाने वाले एक-दो नेताओं को छोड़कर लगभग सभी नेता गांधी परिवार के करीबी बनकर कांग्र्रेस की सत्ता में बार-बार सत्ता का सुख लेते रहे हैं। अब कांग्र्रेस सत्ता में नहीं है तो कांग्र्रेस के नेता अपने नए राजनीतिक सुख की खातिर पार्टी छोड़कर चले गए हैं। दरअसल यह कांग्र्रेस का इतिहास रहा है कि समय-समय पर इसका साथ ऐसे नेता छोड़ते रहे हैं जिन्हें सिर्फ सत्ता की राजनीति से ही मोह होता है। कांग्र्रेस कई बार टूटी है तो फिर सशक्त रूप से खड़ी भी हुई है। लेकिन तत्कालीन केन्द्रीय नेतृत्व भी सशक्त था। लेकिन आज कांग्र्रेस जैसी राष्ट्रीय स्तर की बड़ी पार्टी की हालत दयनीय है। जनाधार का दायरा काफी घटा है। ऐसे में राष्ट्रीय नेतृत्व को सारे हालात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और पलायन के कारणों पर गहन विचार करना चाहिए। गंभीर आत्म मंथन व पार्टी के काया कल्प की सख्त जरूरत हो चली है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/620f8bbf6a645/article-4623</link>
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                <pubDate>Fri, 18 Feb 2022 17:51:32 +0530</pubDate>
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