<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://dainiknavajyoti.com/chambal/tag-12533" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Dainik Navajyoti Rising Rajasthan RSS Feed Generator</generator>
                <title>chambal - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
                <link>https://dainiknavajyoti.com/tag/12533/rss</link>
                <description>chambal RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>जर्जर नहरों के सहारे हाड़ौती के खेतों को सीचने की कवायद, जानें पूरा मामला </title>
                                    <description>
                        <![CDATA[सेफ्टी वाल जर्जर होकर टूटे नहरों में बहता पानी अब सड़कों पर बहने लगा है।
]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/efforts-to-irrigate-hadoti-s-fields-using-dilapidated-canals/article-144809"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/1200-x-60-px)20.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। सरकारी दावों में भले ही चम्बल की नहरों की मरम्मत के नाम पर लाख दावे किए जाए, लेकिन नहरों के जर्जर हालात प्रशासनिक फिक्र की असली कहानी बयां कर रहे है । नहर के तलहटी में जमा गाद ओैर झाड़ झंझाड़ नहरों को कमजोर कर रहे है वहीं नहरों में बहने वाले पानी के प्रवाह को भी कम कर रहे है। नतीजतन नहरें पूरी क्षमता से पानी का वहन नहीं कर पा रही है। कोटा से बूंदी ब्रांच के सेफ्टी वाल जर्जर होकर टूट गए है ऐसे में नहरों में बहता पानी अब सड़कों पर बहने लगा है।</p>
<p><strong>जर्जर नहरों से टेल तक पानी</strong><br />कोटा बैराज और इसकी नहरों का निर्माण कार्य 1954 में शुरू हुआ था और यह 1960 में बनकर तैयार हुई। 178 किलोमीटर लम्बी नगर बूंदी जिले के लिए वरदान की तरह काम करती है। 65 साल पुरानी इस नहर को राजस्थान के बूंदी जिले की कृषि भूमि को सींचने के लिए बनाई गई है। अंधेड़, दौलाडा,ओकारपुरा, खटकड, रायता, लालपुरा कुआंरती माटुंदा तक के नहरी तंत्र की हालत यह है कि यहां खेतों मे पानी रिसने के कारण सैकडों बीघा खेत उसर हो रहे है। ऐसे में कम क्षमता के बहाव के चलते पूरे क्षेत्र मुख्यरूप से टेल तक समय पर पानी पहुंचने की आसार कम ही है।</p>
<p><strong>28 से ज्यादा जगह गिरी दीवारें</strong><br />नान्ता से बल्लोप हाईवे तक दोनो और की सुरक्षा दीवारें 65 से ज्यादा जगह पर टूटी हुई है। नान्ता से पत्थर मण्डी रोड़ पुलिया तक ही नहर की दीवारें 28 से ज्यादा जगह पर टूट चुकी है। नान्ता थाना के सामने जाकर तो इनका हाल और भी बुरा हो जाता है। यहां पर पहले ही दीवारों की ऊचांई डेढ से एक फीट तक ही रह जाती है। ऊपर से जर्जर और टूटी हुुई दीवारों से वाहन चालकों सहित जानवरों और पैदल चालकोें के लिए भी गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।</p>
<p>बूंदी नहर के दोनों और की दीवारें जगह जगह टूटी पड़ी है। नान्ता से सगस जी मोखा तक दायी तरफ 3 जगह तो बायीं तरफ 8 से ज्यादा जगह पर बडे बडे हिस्से टूटकर नहर में ही गिर चुके है। इसके आगे यहां से सुखाडिया व महर्षि नवल योजना नहर के दायीं तरफ 4 तो बायीं तरफ 8 जगह दीवारें पूरी तरह टूट चुकी है। नान्ता थाने से पत्थर मण्ड़ी तक करीब 8 ये ज्यादा जगह खतरनाक स्थिति बनी हुई है।</p>
<p><strong>अभी के दिनों में यह अक्सर होता है</strong><br />नहर प्रशासन का कहना है कि अभी गर्मी के शुरूआत के समय नगर के तले में उगी काई जिसे खांजी भी कहते है, वह फूल जाती है। जिसके कारण पानी का गेज बढ़ाने पर पानी बाहर आने लग जाता है, यह पूरे समय नहीं रहता है। केवल होली तक यह परेशानी रहेगी।</p>
<p><strong>1300 क्यूसेक में ही उफनने लगी नहरें</strong><br />नहर में अधिकतम 1500 क्यूसेक क्षमता तक का पानी का प्रवाह करने की क्षमता है, यानि इतनी क्षमता तक भी नहरों का पानी नहर में ही बहने के लिएनहरी तत्र की डिजाइन की गई है, लेकिन अभी 1300 क्यूसेक क्षमता के दबाब में ही पानी छोड़ा जा रहा है। फिर भी नहरी दीवारों से रिसता पानी सड़कों पर लगातार बह रहा है ।</p>
<p><strong>लाइनिंग और स्थानीय रूप से मरम्मत</strong><br />सीएडी के अधिकारियों ने बताया कि समय-समय पर नहर की दीवारों मे होने वाले रिसाव और सुराखों को रोकने के लिए सीएडी प्रशासन मरम्मत का कार्य करवाता रहता है। अभी इन दीवारों की मरम्मत का कार्य सीएडी और सकतपुरा की तरफ फवकऊढ द्वारा किया गया था।</p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />कल ही मामला दिखवाते है। जैसी भी आवश्यकता होगी उसे पूरा करवाया जाएगा।<br /><strong>कुशल कोठारी,अति. क्षेत्रीय आयक्त सीएडी</strong></p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/efforts-to-irrigate-hadoti-s-fields-using-dilapidated-canals/article-144809</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/efforts-to-irrigate-hadoti-s-fields-using-dilapidated-canals/article-144809</guid>
                <pubDate>Fri, 27 Feb 2026 14:33:18 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2026-02/1200-x-60-px%2920.png"                         length="968193"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[kota]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>करीब छह माह से नहीं बह रही चम्बल माता से जलधारा</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[रिवर फ्रंट के आकर्षणों में से एक आकर्षण हैं मूर्ति से बहती जलधारा।]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-stream-from-chambal-mata-has-not-flowed-for-nearly-six-months/article-134668"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/1200-x-600-px)-(2)11.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । एक तरफ तो शहर को पर्यटन नगरी के रूप में विकसित किया जा रहा है। जहां देश विदेश से पर्यटकों को लाकर यहां के पर्यटन स्थलों को दिखाने के दावे किए जा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ यहां के पर्यटन स्थलों की सुध तक नहीं ली जा रही है। जिसका नजीता है चम्बल रिवर फ्रंट। रिवर फ्रंट पर बैराज साइड पर लगी चम्बल माता की विशाल मूर्ति से पिछले करीब 6 माह से जल धारा तक नहीं बह रही है। जिससे वहां आने वाले बाहरी पर्यटक ही नहीं स्थानीय लोग भी उस मनोरम दृश्य को देखने से वंचित हो रहे हैं। रिवर फ्रंट के आकर्षणों में से एक आकर्षण हैं मूर्ति से बहती जलधारा। लेकिन वहां आने वालों को काफी समय से यह जलधारा बहती हुई नजर ही नहीं आ रही है।रिवर फ्रंट घूमने गए लोगों का कहना है कि वीडियो व रील में तो चम्बल माता से जलधारा बहती हुई दिखती है। लेकिन जब वहां मौके पर गए तो जलधारा नजर ही नहीं आई। जिससे वहां जाकर भी निराशा ही मिली।</p>
<p><strong>धीरे-धीरे गायब हो रहे व्यू कटर</strong><br />रिवर फ्रंट बनने के बाद तत्कालीन नगर विकास न्यास की ओर से बैराज के समानांतर पुल पर रिवर फ्रंट व बैराज साइड दोनों तरफ व्यू कटर लगाए गए हैं। जिससे पुल से गुजरने वाले वाहन चालक अंदर की तरफ नहीं देख सके। साथ ही वाहन चालकों को वहां रूकने से जाम की स्थिति भी नहीं बने। जबकि जब व्यू कटर नहीं लगे थे तब वहां पुल पर जाम की स्थिति बनी रहती थी।लेकिन हालत यह है कि वर्तमान में बैराज साइड से व्यू कटर धीरे-धीरे गायब हो रहे है। बैराज से सकतपुरा की तरफ जाते समय कहीं एक-दो तो कहीं आधा दर्जन से अधिक व्यू कटर टुकड़ों में गायब हो रहे हैं। शुरूआत में यह एक दो जगह से गायब हुए थे वहीं अब इनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।</p>
<p>लोगों का कहना है कि कुछ लोगों ने बरसात के समय बैराज के गेट खुलने पर उनके पानी को देखने के लिए कुछ जगह से व्यू कटर तोड़े थे। लेकिन केडीए अधिकारियों की अनदेखी से उन्हें सही नहीं किया गया। जिससे अब यह अधिक जगह से गायब हो गए हैं। जिससे वहां काफी जगह हो गई है। ऐसे में वहां से किसी के झांकने पर गिरकर हादसा होने का खतरा बना हुआ है।</p>
<p>इधर होटल फैडरेशन आॅफ राजस्थान कोटा संभाग के अध्यक्ष अशोक माहेश्वरी ने बताया कि उन्होंने पर्यटन विभाग व केडीए अधिकारियों के साथ गत दिनों रिवर फ्रंट का अवलोकन किया था। इस दौरान वहां जो भी कमियां नजर आई उन्हें दुरुस्त करने के लिए कहा था। जिससे टूर एंड ट्रेवल मार्ट में आने वालों को अच्छा नजारा दिख सके। चम्बल माता की जलधारा को भी फिर से शुरू करने के लिए कहा है। अधिकारियों ने शीघ्र ही उसे चालू करने की बात कही है।</p>
<p><strong>पानी बंद होने पर सही करवाए जा रहे पम्प</strong><br />केडीए के सहायक अभियंता(विद्युत) ललित मीणा ने बताया कि चम्बल माता की मूर्ति में ऊपर तक पानी पहुंचाने के लिए जो मोटर व पम्प लगे हुए हैं वह चम्बल नदी में अंदर की तरफ है। हालांकि वहां चार दीवारी बनाई हुई है। लेकिन बरसात के समय में बैराज के गेट खोलने से पानी की आवक अधिक हो गई थी। जिससे वे पम्प पानी में अधिक डूब गए। पानी के साथ बहकर आई मिट्टी पम्प में जम गई थी। जिससे मोटर व पम्प बंद होने से मृूर्ति से जलधारा बंद हो गई थी। लेकिन अब गेट बंद होने व पानी कम होने से पम्प को निकालकर साफ कराया जा रहा है। शीघ्र ही फिर से जलधारा बहती नजर आएगी।</p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-stream-from-chambal-mata-has-not-flowed-for-nearly-six-months/article-134668</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-stream-from-chambal-mata-has-not-flowed-for-nearly-six-months/article-134668</guid>
                <pubDate>Thu, 04 Dec 2025 15:29:06 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2025-12/1200-x-600-px%29-%282%2911.png"                         length="959209"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[kota]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>असर खबर का - रक्षा बंधन से पहले हो चम्बल पुलिया समेत क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत </title>
                                    <description>
                        <![CDATA[पेचवर्क ऐसा हो कि सड़क अगली बारिश  में फिर से नहीं टूटे]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of-the-news---damaged-roads-including-chambal-culvert-should-be-repaired-before-raksha-bandhan/article-122905"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-08/oer-(2)2.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । जिला कलक्टर पीयूष समारिया बुधवार को शहर के दौरे पर निकले और बारिश के कारण क्षतिग्रस्त हुई शहर की मुख्य सड़कों  व चौराहों का निरीक्षण किया। उन्होंने शहर के मुख्य चौराहों व चंबल की नई पुलिया पर अत्यधिक क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत रक्षाबंधन से पहले करने के निर्देश केडीए अधिकारियों को दिए। जिला कलक्टर सबसे पहले नयापुरा स्थित विवेकानन्द सर्किल पहुंचे और सर्किल के आसपास क्षतिग्रस्त सड़क ठीक करने के निर्देश दिए। इसके बाद े सीधे कुन्हाड़ी पेट्रोल पंप चौराहा पहुंचे और वहां चौराहे के आसपास उखड़ी हुई सड़क दो दिन में सही कराने के निर्देश केडीए अधिकारियों को दिए। उन्होंने कहा कि सर्किल पर  गड्ढ़े  व ऊबड़-खाबड़ सड़कों से दोपहिया  व  चार पहिया वाहन चालकों को परेशानी होती है। जहां बार-बार गड्ढे पड़ने और सड़क उखड़ने की शिकायत आ रही है वहां ढलान और सड़क का अलाइनमेंट चेक करने के बाद सीसी पेचवर्क किया जाए। उन्होंने डिफेक्ट लायबिलिटी पीरियड की सड़कों की मरम्मत संबंधित ठेकेदार से कराने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि मरम्मत ऐसी हो कि पेचवर्क लंबे समय तक चलें। कुन्हाड़ी सर्किल से जिला कलक्टर चम्बल की नई पुलिया होते हुए वापस नयापुरा की तरफ पहुंचे। इस दौरान उन्होंने क्षतिग्रस्त पुलिया की हालत देखी और केडीए अधिकारियों को उसे तुरंत सही करवाने के निर्देश दिए। जिला कलक्टर ने क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत कार्य में गुणवत्तापूर्ण सामग्री का उपयोग करने, ढलान का ध्यान रखने और रोड कट कर क्वालिटी पेचवर्क करने के निर्देश दिए ताकि रिपेयर की हुई सड़क अगली बारिश में फिर से नहीं टूटे।</p>
<p><strong>नवज्योति ने किया था मामला प्रकाशित</strong><br />गौरतलब है कि बरसात के कारण चम्बल की नई पुलिया की बदहाली का मामला दैनिक नव’योति ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था। समाचार पत्र में 4 जुलाई को पेज 7 पर‘ चम्बल पुलिया  को बारिश दे गई गड्ढ़ों के जख्म’ शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया था।  जिसमें पुलिया की बदहाली व उसके गड्ढ़ों के कारण बरसात में होने वाले हादसों के बारे में जानकारी दी थी। उस मामले को जिला कलक्टर ने गम्भीरता से लिया और स्वयं मौका निरीक्षण कर अधिकारियों को उसकी रक्षा बंधन से पहले दो दिन में मरम्मत करवाने के निर्देश दिए। </p>
<p><strong>फव्वारा चलता है या नहीं</strong><br />जिला कलक्टर ने जेडीबी कॉलेज के सामने सर्किल स्थित फव्वारा देखा और केडीए अधिकारियों को पूछा कि यह चलता है या नहीं? उन्होंने सर्किल पर घास की कटिंग कराने और सौंदर्यीकरण करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि यह सर्किल अच्छी लोकेशन पर बना हुआ है। इसकी अच्छी देखभाल की जाए।  नार्काेटिक्स कंट्रोल ब्यूरो आॅफिस के सामने क्षतिग्रस्त सड़क  व स्पीड ब्रेकर की मरम्मत शीघ्र कराने के निर्देश  अधिकारियों को दिए। समारिया ने कहा कि केडीए, नगर निगम  व पीएचईडी अधिकारियों की एक संयुक्त टीम उन सड़कों का चिन्हीकरण करे। दौरे में केडीए आयुक्त हरफूल सिंह यादव, निदेशक अभियांत्रिकी रविन्द्र माथुर सहित अन्य अभियंता साथ रहे।</p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of-the-news---damaged-roads-including-chambal-culvert-should-be-repaired-before-raksha-bandhan/article-122905</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of-the-news---damaged-roads-including-chambal-culvert-should-be-repaired-before-raksha-bandhan/article-122905</guid>
                <pubDate>Thu, 07 Aug 2025 12:40:52 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2025-08/oer-%282%292.png"                         length="544684"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[kota]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>5 साल में पहली बार 612 एनटीयू लेवल पर पहुंची टर्बिडिटी</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[घरों में पहुंचा मटमेला पानी लेकिन बैक्टीरिया मुक्त। 
]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/turbidity-reached-612-ntu-level-for-the-first-time-in-5-years/article-119425"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/rt112roer-(2)5.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। राणा सागर व जवाहर सागर डेम के गेट खोले जाने से चंबल में टर्बिडिटी (गंदलापन) का लेवल 612 एनटीयू लेवल तक पहुंच गया। जिससे शहर की जलापूर्ति गड़बड़ा गई। अत्यधिक मात्रा में पानी में मिट्टी आने से अकेलगढ़, मिनी अकेलगढ़-सकतपुरा और श्रीनाथपुरम फिल्टर प्लांट से जल शोधन उत्पादन 50%  कम हो गया। ऐसे में शहर में प्रतिदिन होने वाली 51.50 करोड़ लीटर पानी की सप्लाई घटकर 26 करोड़ लीटर ही रह गई। हालांकि, जलदाय विभाग के अधिकारी गुरुवार को दिनभर स्थिति नियंत्रित करने में जुटे रहे। शाम 4.30 बजे के बाद से टर्बिडिटी घटकर 3.50 से 400 एनटीयू पहुंच गया था। ऐसे में शुक्रवार सुबह तक जलापूर्ति समान्य होने की उम्मीद जताई जा रही है। इधर, राणा सागर के गेट खुलने पर टर्बिडिटी 612 एनटीयू आंकड़ा पिछले 5 साल में पहली बार बढ़ा है।</p>
<p><strong>तड़के 453 तो दोपहर को 612 एनटीयू पहुंची टर्बिडिटी </strong><br />अधिशाषी अभियंता नगर खंड प्रथम प्रकाशवीर नथानी ने बताया कि बुधवार तक स्थिति समान्य थी लेकिन गुरुवार को राणा सागर व जवाहर सागर बांध के गेट खोले जाने पर तड़के पांच बजे चंबल में टर्बिडिटी का लेवल अत्यधिक मात्रा में बढ़ गया। इस वक्त टर्बिडिटी का लेवल 453 एनटीयू था। जिसका असर शहर के मुख्य जल शोधन केंद्र अकलेगढ़ पर पड़ा। इससे शुद्ध पेयजल उत्पादन क्षमता लगभग 50% कम हो गई है। हालांकि, लोगों को पानी के लिए परेशान न होना पड़े, इसके लिए लगातार 24 घंटे प्रयास किए जा रहे हैं। </p>
<p><strong>घरों में आया पीला-चिकना पानी</strong><br />चंबल में अचानक टर्बिडिटी का लेवल बढ़ने से जल उत्पादन केंद्रों की जलशोधन प्रक्रिया गंभीर रूप से प्रभावित हुई। जिसके कारण घरों में मटमेला पानी आया। बजरंग नगर निवासी सत्येंद्र राजावत, आकाशवाणी के फिरोज अहमद, सरस्वती कॉलोनी के फयाज खान व लोकेश मेहरा ने बताया कि सुबह नलों में गंदा पानी आया। पानी में चिकनापन था। पीने के पानी के लिए भी परेशान हो गए। </p>
<p><strong>प्लांट के फिल्टर बेड हो रहे चौक</strong><br />चंबल में अत्यधिक मिट्टी आने से जल शोधन केंद्रों के फिल्टर बेड चौक हो रहे हैं। जिन्हें बार-बार साफ करने के लिए प्लांट बंद करना पड़ रहा। ऐसे में दो से तीन घंटे के अंतराल में एक-एक फीडर पर जलापूर्ति करनी पड़ी। विज्ञान नगर, तलवंडी व महावीर नगर फीडर पर गुरुवार सुबह 10.30 बजे सप्लाई की गई। इसके बाद दोपहर 1 बजे से दादाबाड़ी फीडर पर सप्लाई की गई। </p>
<p><strong>42 फिल्टर बेड, साफ करने में खर्च हुआ 6.30 लाख  लीटर पानी</strong><br />अधिकारियों के अनुसार, जल शोधन केंद्र पर कुल 42 फिल्टर बेड हैं। जिनमें रॉ वाटर को ट्रीटमेंट डोज देकर फिल्टर किया जाता है। लेकिन, गुरुवार को पानी में अधिक मात्रा में मिट्टी आने से फिल्टर बेड चौक हो गए। पानी छन भी नहीं पा रहा था।  जिन्हें साफ करने के लिए 3 से 4 बार फिल्टर बेड साफ करने पड़े। इसकी सफाई के लिए भी पानी की आवश्यकता होती है। प्रत्येक बेड की सफाई के लिए औसतन 10 से 15 हजार लीटर पानी खर्च होता है। ऐसे में 42 बेड की एक बार सफाई करने पर ही 6.30 लाख लीटर पानी खर्च हो रहा है। टर्बिडिटी का लेवल देखते हुए इस पानी को दोबारा रिसाइकिलिंग भी करना संभव नहीं होता। ऐसे में लाखों लीटर पानी को फिर से चंबल में बहाना पड़ता है। </p>
<p><strong>दिनभर यूं घटा-बड़ा टर्बिडिटी का लेवल</strong><br />एक्सईएन नथानी बताते हैं, राणा सागर व जवाहर सागर का गेट खुलने से चंबल के कैचमेंट एरिया की मिट्टी भी बहकर नदी में आ गई। बुधवार सुबह तक 53 एनटीयू टर्बिडिटी थी, जो बांधों के गेट खुलने के साथ-साथ बढ़ती गई लेकिन स्थिति काबू में थी। गुरुवार तड़के 5 बजे अचानक 450 एनटीयू (पानी में मिट्टी की मात्रा) टर्बिडिटी बढ़ गई। ऐसे में सुबह 9.30 बजे तक फिल्टर प्लांट बंद करना पड़ा। बेड की सफाई व पम्पों का मेंटिनेंस कर साढ़े 10 बजे नए कोटा के तीन इलाकों का एक फीडर पर सप्लाई शुरू की। इसके बाद दोपहर 1 बजे टर्बिडिटी का लेवल 612 एनटीयू पर पहुंच गया। ऐसे में मुसीबत बढ़ती रही। लेकिन दोपहर बाद जैसे-जैसे बांधों के गेट बंद होते गए वैसे वैसे टर्बिडिटी का लेवल डाउन होता गया। शाम  4.30 बजे के बाद से पानी में मिट्टी की मात्रा कम होती गई। रात 9.30 बजे तक टर्बिडिटी का लेवल 3.50 से 400 के बीच रहा। </p>
<p><strong>कहीं सुबह तो कहीं दोपहर को सुचारू हुई जलापूर्ति</strong><br />मंगलवार देर रात हुई बारशि व कोटा बैराज के आठ गेट खोलकर की गई पानी की निकासी से शहर के कुछ हिस्सों में गुरुवार को पानी की सप्लाई करीब 8 घंटे तक बाधित रही।  एक्सईएन नथानी ने बताया कि सुबह जो सप्लाई 5.30 पर शुरू होनी थी पर डर्बिटिडी के कारण कुछ फीडर पर 10.30 बजे तो कुछ फीडर पर दोपहर 1 से 2 के बीच सप्लाई शुरू हुई,जो रात तक जारी रही। </p>
<p><strong>5 साल में पहली बार 612 एनटीयू पहुंचा टर्बिडिटी लेवल</strong><br />उन्होंने बताया कि राणा प्रताप सागर बांध के गेट खुलने पर गुरुवार को टर्बिडिटी का जो लेवल बढ़ा है, वह पिछले पांच साल में पहली बार देखने को मिला है। इससे पहले राणा सागर बांध के गेट खुलने पर टर्बिडिटी 600 के पार नहीं पहुंची। लेकिन, गांधी सागर के गेट खुलने पर टर्बिडिटी  का लेवल 700 से 1000 एनटीयू तक पहुंच जाता है। ऐसी स्थिति में जल शोधन करना बहुत मुश्किल हो जाता है।</p>
<p><strong>पानी शुद्ध छोड़ा, फिर घरों में मटमेला पानी, यह है कारण</strong><br />अधिकारियों के अनुसार, जल शोधन केंद्रों से प्रत्येक चरण में शुद्ध पानी ही सप्लाई किया गया है। इसके बावजूद घरों में मटमेला पानी आया तो उसका कारण  यह है कि केंद्रों से जुड़ी सप्लाई पाइप लाइनों में मिट्टी की परत जमी रहती है। ऐसे में जल शुद्ध पानी प्रेशर से छोड़ा जाता है तो पाइपों में जमी मिट्टी भी बहकर चली जाती है। जब घरों के नलों को पहली बार खोला जाता है तो थोड़ी देर मटमेला पानी आता है लेकिन कुछ देर बाद ही साफ पानी की आपूर्ति हो जाती है।  </p>
<p><strong>इन इलाकों में आई परेशानी</strong><br />अधिशाषी अभियंता नगर खंड द्वितीय श्याम माहेश्वरी ने बताया कि 130 एमएलडी जल शोधन संयत्र सकतपुरा से जलापूर्ति किए जाने वाले क्षेत्र नदी पार सम्पूर्ण सकतपुरा, नान्ता, बालिता, सम्पूर्ण कुन्हाडी, बड़गांव जोन, सम्पूर्ण बून्दी रोड़ क्षेत्र, शम्भूपुरा जोन, नयाखेड़ा, नयापुरा, सिविल लाइन्स, लाडपुरा, खाईरोड़, खण्ड गांवड़ी, दोस्तपुरा, आर्मी क्षेत्र, खेड़लीफाटक, नालारोड़, जनकपुरी, गुरूद्वारा रोड़, भीमगंजमण्डी, डडवाड़ा, सम्पूर्ण स्टेशन क्षेत्र, कैलाशपुरी जोन, भदाना जोन, काला तालाब जोन, सोगरिया जोन, आकाशवाणी कॉलोनी, सरस्वती कॉलोनी, पुलिस लाइन रोड की समस्त कॉलोनियां, आरके नगर, शिव नगर, बोरखेड़ा जोन, बारां रोड, नया नोहरा जोन, चन्द्रेसल जोन, रोटेदा, रायपुरा जोन के उपभोक्ताओं से अपील की है कि जल की गुणवत्ता में सुधार नहीं होने तक आवश्यक मात्रा में पेयजल का संग्रहण करके रखें।</p>
<p>अल सुबह से दोपहर तक टर्बिडिटी बढ़ जाने से जल शोधन गंभीर रूप से प्रभावित हुई। शाम से टर्बिडिटी  का लेवल घटा है। शुक्रवार सुबह तक जलापूर्ति समान्य होने की संभावना है। यदि, टर्बिडिटी  का लेवल नहीं घटता है तो सुबह-शाम की पारी में एक समय जलापूर्ति की जाएगी। वहीं, अकेलगढ़ प्लांट पर मॉनिटरिंग के लिए सोमवार से रविवार तक सभी जेईएन की ड्यूटी लगा दी गई है। घरों में मटमेला पानी आ सकता है लेकिन वह पानी पूरी तरह से शुद्ध होने के साथ बैक्ट्रेरिया मुक्त है। जलापूर्ति समान्य करने के हरसंभव प्रयास जारी हैं। ऐसे समय में शहरवासी जल संग्रहण करके रखें।   <br /><strong>- प्रकाशवीर नथानी, एक्सईएन जलदाय विभाग </strong></p>
<p> </p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/turbidity-reached-612-ntu-level-for-the-first-time-in-5-years/article-119425</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/turbidity-reached-612-ntu-level-for-the-first-time-in-5-years/article-119425</guid>
                <pubDate>Fri, 04 Jul 2025 15:23:40 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2025-07/rt112roer-%282%295.png"                         length="526367"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[kota]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चंबल की गहराई से खींचते हैं पानी, 2 किमी दूर होता फिल्टर, तब घरों में पहुंचता है अमृत</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[पानी को शुद्ध बनाने में बड़ी मेहनत लगती है, पानी का मोल समझें।
]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/water-is-drawn-from-the-depth-of-chambal--it-is-filtered-2-km-away--then-amrit-reaches-homes/article-113308"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-05/news-(2)9.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। चंबल से घर तक पानी का सफर आसान नहीं है। इसके पीछे जलदाय विभाग का पूरा मैकेनिज्म काम करता है। चंबल के पानी को पीने योग्य बनाने फिर घरों तक पहुंचाने के लिए चार प्रक्रियाएं अपनानी पड़ती है। जिसमें नदी से पानी उठाना, फिल्टर प्लांट तक पहुंचाना, प्लांट पर पानी को शुद्ध करना, गुणवत्ता परखना, मिनरल्स, आयरन, कैल्शियम सहित अन्य खनीज पदार्थ की जांच कर सप्लाई करना शामिल है। विशालकाय मशीनों के बीच 24 घंटे कर्मचारियों की हाड़तोड़ मेहनत, अथक परिश्रम और अधिकारियों का सुपरविजन, पानी की राह आसान बनाता है। दैनिक नवज्योति में पढ़िए, चंबल से घर तक पानी का सफर....</p>
<p><strong>चंबल से फिल्टर प्लांट तक यूं पहुंचता पानी</strong><br />चंबल नदी से पानी उठाने से लेकर दो किमी दूर फिल्टर प्लांट तक पहुंचाने के लिए तीन विशालकाय पम्प हाउस बने हैं, हर पम्प हाउस की नदी से पानी उठाने की क्षमता अलग-अलग होती है, जो इस प्रकार है। <br /></p>
<p><strong>आरयूआईडीपी पम्प हाउस :</strong> इस पम्पहाउस में 715 होर्स पावर के 4 पम्प चंबल से पानी खींचने के लिए लगे होते हैं। इनमें से 3 पम्प वर्किंग में और 1 स्टैंड बाय में रखा जाता है, जिसे जरूरत होने पर चला लिया जाता है। इस पम्प हाउस से 130 एमएलडी यानी 1300 लाख लीटर रॉ वाटर नदी से उठाया जाता है। <br /><strong>- वर्ल्डबैंक पम्प हाउस : </strong>इसमें 375 होर्स पावर के 4 पम्प लगे होते हैं। जिनमें 3 पम्प वर्किंग में और 1 एक्सट्रा में रहता है। जिसे जरूरत के मुताबिक यूज किया जाता है। इस पम्प हाउस से 100 एमएलडी यानी 1 हजार लाख लीटर पानी चंबल से उठाया जाता है। <br /><strong>- ओल्ड पम्प हाउस : </strong>इस पम्पहाउस में नदी से पानी खींचने के लिए 300 होर्स पावर के 4 पम्प लगे होते हैं। इससे 40 एमएलडी यानी 400 लाख लीटर पानी लिया जाता है। यह तीनों पम्प हाउस 24 घंटे लगातार चलते हैं। </p>
<p><strong>पहली प्रक्रिया : नदी से 30 करोड़ लीटर रॉ वाटर उठाना</strong><br />अकेलगढ़ पम्प हाउस के एईएन विमल नागर ने  बताया कि चंबल की कराइयों में नदी से पानी उठाने के लिए तीन पम्प हाउस बने हुए हैं। जिनमें आरयूआईडीपी, वर्ल्डबैंक और ओल्ड पम्प हाउस शामिल हैं। इन पम्पहाउस में विशालकाय मशीनों से तीन बड़ी-बड़ी पाइप लाइनें जुड़ी हैं। जिनके माध्यम से 28 से 30 एमएलडी पानी उठाया जाता है। इसके बाद पम्पहाउस से करीब 2 किमी दूर फिल्टर प्लांट में शुद्धिकरण के लिए भेज दिया जाता है। </p>
<p><strong>दूसरी प्रक्रिया : क्लोरिनेशन पानी से गंदगी दूर करना</strong><br />आरयूआईडीपी, वर्ल्डबैंक और ओल्ड पम्प हाउस को मिलाकर कुल 2100 लाख लीटर अशुद्ध पानी को फिल्टर करने के लिए रिसिविंग चेम्बर में पहुंचाया जाता है, जिसमें क्लोरिन मिलाकर पानी में जमा गंदगी को दूर किया जाता है। हालांकि, बरसात के दिनों में टरबिर्टी बढ़ने से पानी में एलम, ब्लिचिंग, चूना और क्लोरिन मिलाकर शुद्ध किया जाता है। इससे पानी में जमा गंदगी नीचे बैठ जाती है और साफ पानी विभिन्न पाइपलाइनों के जरिए इनलेंट से जुड़े 6 क्लेरिफायर में पहुंचता है। जहां पानी को फिर से शुद्ध करने के लिए प्री-क्लोरिनेशन की जाती है। प्रत्येक क्लेरिफायर चेम्बर 350 लाख लीटर क्षमता का होता है। चेम्बर में आए पानी में एलम और ब्लिचिंग मिलाकर डोजिंग की जाती है। जिससे पानी में मौजूद अशुद्धियां जैसे, काई, मिटटी, बारिक कंकड, रेत आदि नीचे बैठ जाते हैं और शुद्ध पानी पाइप लाइनों के जरिए आगे मैन चेनल में पहुंच जाता है। इस प्रक्रिया में करीब 45 से 50 मिनट लगते हैं।</p>
<p><strong>तीसरी प्रक्रिया : पोस्ट क्लोरिनेशन यानी फिल्टर प्रक्रिया </strong><br />दूसरी प्रक्रिया में पानी शुद्ध होने के बाद तीसरी प्रक्रिया में फिर से पानी को फिल्टर किया जाता है। इसके लिए पोस्ट क्लोरिनेशन अपनाई जाती है। इनलेट के क्लेरिफायर से पानी अंडरग्राउंड पाइपलाइनों के जरिए सीधे मुख्य चैनल में लाया जाता है। इस चैनल को 64-64 एलडी के तीन फिल्टर यूनिट में बांटा गया है और यह तीनों यूनिटें 12 बेड से जुड़ी होती है। प्रत्येक बेड में तीन फिल्टर लेयर होती है। जिसमें पहली लेयर में कंकड, दूसरी में मोटी रेत, काई और तीसरी लेयर में बारीक रेत व अन्य पार्टिकल्स को पानी से अलग किया जाता है। प्रत्येक बेड से एक और चेम्बर जुड़ा होता है। जिसमें आखिरी बार पानी में क्लोरिन मिलाकर पानी को फिर से शुद्ध किया जाता है। इसके बाद पानी का सैंपल लिया जाता है, जिसमें क्लोरिनेशन की जांच की जाती है, यदि इसमें क्लोरिन की मात्रा कम पाई जाती है तो फिर से पोस्ट क्लोरिनेशन करके पूर्ति की जाती है। </p>
<p><strong>चौथी प्रक्रिया : टेस्टिंग के बाद ही पानी सप्लाई </strong><br />तीसरी प्रक्रिया में पानी पूरी तरह से पीने योग्य हो जाता है। लेकिन, शहर में सप्लाई से पहले पानी की गुणवत्ता परखी जाती है। इसके लिए पानी के सैंपल लैब भिजवाए जाते हैं। जहां, सीनियर कैमिस्ट पानी में टीडीएस, प्लोराइड, टरबिटी, हार्डनेस, पीएच वैल्यू, मिनरल्स सहित अन्य पैरामीटर की बारीकी से जांच करते हैं। पानी की क्वालिटी निर्धारित मापदंड पर खरी उतरने के बाद 106 लाख लीटर व 65 लाख लीटर क्षमता के सीडब्ल्यूआर (स्वच्छ जलाशय) में पानी छोड़ा जाता है। यहां केंद्रीयकृत पम्प बना हुआ है, जिसमें सभी जॉन वाइज अलग-अलग पम्प लगे होते हैं, जिसके माध्यम से घरों तक पानी की सप्लाई की जाती है।   </p>
<p><strong>रोज खर्च होते 11 लाख रूपए</strong><br />अकेलगढ़ से प्रतिदिन 280 से 300 एमएलडी यानी 28 से 30 करोड़ लीटर पानी सप्लाई किया जाता है। जिसे शुद्ध करने से लेकर सप्लाई करने तक में प्रतिदिन सरकार 11 लाख रुपए खर्च करती है। इसमें सरकारी कर्मचारी, अधिकारी, ठेकाकर्मी, कैमिकल्स, मशीनों का मेंटिनेंस सहित आॅपरेशन एंड मेंटिनेंस का खर्चा शामिल होता है।<br /><strong>- विमल नागर, एईएन, अकेलगढ़ पम्प हाउस</strong></p>
<p><strong>पानी को अमृत समझें</strong><br />जलदाय विभाग का मूल उद्देश्य हर व्यक्ति को शुद्ध पानी उपलब्ध कराना है। जिसके लिए हर कर्मचारी-अधिकारी कृत संकल्पित है। पानी को शुद्ध बनाने में बड़ी मेहनत लगती है। शहरवासी पानी का मोल समझना चाहिए ताकि आने वाली अपनी पीढ़ियों के लिए अमृतरूपी पानी बचाएं।<br /><strong>- प्रकाशवीर नथानी, एक्सईएन जलदाय विभाग कोटा </strong></p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/water-is-drawn-from-the-depth-of-chambal--it-is-filtered-2-km-away--then-amrit-reaches-homes/article-113308</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/water-is-drawn-from-the-depth-of-chambal--it-is-filtered-2-km-away--then-amrit-reaches-homes/article-113308</guid>
                <pubDate>Wed, 07 May 2025 16:35:32 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2025-05/news-%282%299.png"                         length="472373"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[kota]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नल घुमाओ और पानी, आसां नहीं जलवीरों की कहानी...</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[जान दांव पर लगा 15 लाख लोगों का जीवन बचा रहे जल कर्मचारी।
]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/turn-the-tap-and-get-water--the-story-of-water-warriors-is-not-easy/article-112314"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/rtrer-(5)8.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। जंगल की घनघोर काली रात, सन्नाटों को चीर दिल दहलाती पम्प मशीनों की भयानक गड़गड़ाहट, खौफ का आभास कराती झाड़ियों में छिपे अनजान खतरों की सरसराहट, चंबल की कराइयों में गूंजती जंगली जानवरों की डरावनी आवाज, पग-पग पर सरीसृप से जान का जोखिम, यह किसी फिल्म का क्लाइमेक्स नहीं बल्कि घरों तक पानी पहुंचाने वाले जलवीरों की संघर्ष और चुनौतियों से भरी कहानी है...., पेश है खास रिपोर्ट.....। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक न जाने कितनी बार हम पानी का इस्तेमाल करते हैं। क्या पानी तक हमारी पहुंच इतनी आसान है कि नल खोलो और प्यास बुझा लो, बिलकुल नहीं..., इसके पीछे 200 से ज्यादा जल कर्मचारियों का अथाह संघर्ष है, जिसे हम महसूस तक नहीं करते। यह महज जल कर्मचारी नहीं बल्कि जलवीर हैं, जो राष्टÑीय चंबल घड़ियाल सेंचुरी के घने जंगलों में जंगली जानवरों के बीच पूरी रात आंखों में काट हर दिन अपनी जान दांव पर लगाते हैं, तब जाकर आप और हम तक पानी पहुंचता है। दैनिक नवज्योति की खास रिपोर्ट में पढ़िए पानी की अनछुई कहानी....।</p>
<p><strong>दिनरात जुटते 200 कर्मचारी तब मिलता पानी </strong><br />शहर की आबादी करीब 15 लाख है। जिन्हें 24 घंटे शुद्ध पानी उपलब्ध कराने के लिए अकेलगढ़ और मिनी अकेलगढ़ पम्प हाउस पर करीब 200 कर्मचारी तैनात हैं, जो 8-8 घंटे की तीन शिफ्ट में दिन-रात डटे रहते हैं। यहां तीन पम्प स्टेशन हैं, जो चंबल की कराइयों में लगे हैं। जिनसे पम्प हाउस, कंट्रोल रूम, फिल्टर प्लांट जुड़े हैं, जो आपस में काफी दूरी पर हैं। ऐसे में जल शोधन की प्रक्रिया के दौरान पानी का सैंपल लेने, 24 घंटे मशीनों की रीडिंग, बिजली का वोल्टेज, पानी का प्रेशर, टेस्टिंग सहित अन्य कार्यों के लिए कर्मचारियों को अलग-अलग सयंत्रों में आना-जाना पड़ता है। ऐसे में जंगली जानवरों व सरीसृपों से जान का खतरा बना रहता है, तब जाकर शहरवासियों को पानी मिलता है। </p>
<p><strong>प्री क्लोरिनेशन से सप्लाई तक का  संघर्ष</strong><br />चंबल से घरों तक पानी पहुंचाने के पीछे कर्मचारियों को प्री-क्लोरिनेशन से सप्लाई तक चार प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। यहां आरयूआईडीपी, वर्ल्डबैंक और ओल्ड पम्प हाउस को मिलाकर कुल 320 एमएलडी अशुद्ध पानी को फिल्टर करने के लिए इनलेट में पहुंचाया जाता है। जिसे शुद्ध करने के लिए प्री-क्लोरिनेशन की जाती है। इसके बाद पोस्ट क्लोरिनेशन यानी फिल्टर प्रक्रिया अपनाई जाती है। जिसमें बारीक रेत, मिट्टी व अन्य पार्टिकल्स को पानी से शुद्ध किया जाता है। इसके बाद पानी की गुणवत्ता जांचने के लिए लैब में शुद्ध पानी के सैंपल भेजे जाते हैं।  जहां, सीनियर कैमिस्ट पानी में टीडीएस, प्लोराइड, मिनरल्स सहित अन्य पैरामीटर की बारिकी से जांच करते हैं। पानी की क्वालिटी निर्धारित मापदंड पर खरी उतरने के बाद ही घरों तक पानी की सप्लाई की जाती है। इन प्रक्रियाओं को पूरा करने में कर्मचारियों व अधिकारियों संघर्ष व मेहनत लगती है। </p>
<p><strong>जंगल में हर रात डरावनी, खतरे में रहती जान </strong><br />रावतभाटा रोड स्थित अकेलगढ़ पम्प हाउस राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल सेंचुरी में है और सकतपुरा मिनी अकेलगढ़ ईको सेंसेटिव जोन है। दोनों ही पम्प हाउस घने जंगलों से घिरे हैं। जहां हिंसक वन्यजीव पैंथर, भालू, जरख, हायना, भेड़िया व मगरमच्छ, अजगर, कोबरा सहित अन्य जहरीले जीव-जंतुओं की भरमार है। जंगल की काली रात के सन्नाटे को चीरती पम्प मशीनों की भयानक आवाजों के बीच कर्मचारी हर घंटे प्लांट से कंट्रोल रूम तक पानी की रीडिंग व सैंपल देने के लिए 1 से डेढ़ किमी का रास्ता तय करते हैं।</p>
<p><strong>छुट्टी के दिन भी करते हैं काम </strong><br />सरकारी दफ्तरों में शनिवार व रविवार को अवकाश होता है लेकिन अकेलगढ़ फिल्टर प्लांट व पम्प हाउस में कर्मचारी तीनों शिफ्टों में काम करते हैं। यहां छोटे-बड़े मिलाकर करीब 35 पम्प हैं। जिनके माध्यम से अशुद्ध पानी को फिल्टर कर शुद्ध किया जाता है। इसके लिए ब्लिचिंग, एलम व क्लोरिन के साथ पानी की डोजिंग की जाती है। वहीं, अधिकारी भी दिन में तीन बार शहर की सप्लाई से जुड़े सेंट्रल वायर रिजर्व लाइनों व कंट्रोलरूम पर रिडिंग की मॉनिटरिंग करते हैं। </p>
<p>जब पूरा शहर नींद की आगोश में रहता है, तब घने जंगलों में कर्मचारी पूरी रात जगते हैं। चंबल से पानी लिफ्ट से फिल्टर करने तक अथाह मेहनत, संघर्ष और करोड़ों रुपयों का संसाधन लगता है। कई बार परिस्थितियां विपरीत रहती है, फिर भी तमाम चुनौतियां व बाधाएं पार कर जलकर्मी पानी पहुंचाने को तत्पर रहते हैं। शहरवासियों से आग्रह है कि वह पानी का मोल समझे और अमृत को व्यर्थ होने से बचाएं ताकि भीषण गर्मी में अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक पानी पहुंच सके।<br /><strong>- डीएन व्यास, एडिशनल चीफ इंजीनियर जलदाय विभाग </strong></p>
<p>अकेलगढ़ व सकतपुरा फिल्टर प्लांट को मिलाकर करीब 200 कर्मचारी तैनात हैं, जो 24 घंटे शहरवासियों को शुद्ध पानी देने के लिए जुटे रहते हैं। अवकाश के दिन भी बिना शिकायत अपना फर्ज निभा रहे हैं। पानी की सप्लाई नियमित रूप से सुचारू रखना आसान काम नहीं है। शहरवासियों को जल का महत्व समझना चाहिए। घरों में नियमित पानी की सप्लाई कर्मचारियों की हाड़तोड़ मेहनत का नतीजा है। लोग पानी का मोल समझे और सद्ुपयोग करें। <br /><strong>- प्रकाशवीर नथानी, एक्सईएन जलदाय विभाग </strong></p>
<p>चंबल से घरों तक पानी की पहुंच आसान नहीं है। इसमें दिन-रात का संघर्ष जुड़ा है। कभी ट्रांसफॉर्मर खराब हो जाते तो कभी मोटर जल जाती, जिससे जल शोधन प्रभावित हो जाता। वहीं, कई बार पम्प हाउस में तकनीकी खराबी से परिस्थितियां विपरीत हो जाती है, लेकिन दृढ़ प्रतिबद्धता से बंधे कर्मचारी बिना शिकायत अपना कर्तव्य निभाने को मुस्तैद रहते हैं। <br /><strong>- विमल नागर, एईएन अकेलगढ़ पम्प हाउस </strong></p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/turn-the-tap-and-get-water--the-story-of-water-warriors-is-not-easy/article-112314</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/turn-the-tap-and-get-water--the-story-of-water-warriors-is-not-easy/article-112314</guid>
                <pubDate>Mon, 28 Apr 2025 17:47:21 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2025-04/rtrer-%285%298.png"                         length="494010"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[kota]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चंबल की कराइयों में आबाद हो रही वल्चर की दुनिया</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[वल्चर की विभिन्न प्रजातियों की संख्या में हो रहा इजाफा]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-world-of-vultures-is-getting-populated-in-the-ravines-of-chambal/article-104178"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/257rtrer55.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। दुनिया में भले ही लोंग बिल्ड वल्चर खतरे की श्रेणी में हो लेकिन चंबल की कराईयों के बीच इनकी आबादी फल-फूल रही है। प्राकृतिक आवास अनुकूल होने से साउथ ईस्ट एशिया की सबसे बड़ी ब्रिडिंग कॉलोनी बनती जा रही है। मोटे अनुमान के तौर पर चंबल में इस समय 150 से 200 के करीब इंडियन वल्चर है। करीब 50 की संख्या में व्हाइट रुम्पेड वल्चर की संख्या है। गिद्दों की यह प्रजाति चंबल पर नेस्टिंग करती है। हाड़ौती में किंग वल्चर की संख्या भी करीब डेढ़ से दो दर्जन के बीच है।  </p>
<p><strong>दो सौ से ज्यादा पक्षियों का कलरव</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व में विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों की करीब 250 से ज्यादा प्रजातियां हैं। इनमें क्रेसअ‍ेड सरपेंट, ईगल, शॉर्ट टोड,पैराडाइज फ्लाई केचर, सारस क्रेन, स्टोक बिल किंग फिशर, कलर्ड स्कोप्स आउलग्रीन पीजन, गोल्एन ओरिओल,बैबलर,गागरोनी तोता, टुईंया तोता, एलेक जेन्डेरियन पैराकीट, रूडी शेल्डक, वाइट पैलिकन, ग्रेट फलेमिंगो, नोर्दन शावलर, नोर्दन पिंटटेल, बार एडेड गूज, ग्रेलेक गूज, गारगेनी टील समेत पक्षियों की कई प्रजातियां हैं।</p>
<p><strong>मुकुंदरा की गौद में पल रहे वन्यजीव</strong><br />मुकुन्दरा हिल्स को 9 अप्रेल 2013 को टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। यह करीब 760 वर्ग किमी में चार जिलों कोटा, बूंदी, झालावाड़ व चित्तौडगढ़़ में फैला है। करीब 417 वर्ग किमी कोर और 342 वर्ग किमी बफर जोन है। इसमें मुकुन्दरा राष्ट्रीय उद्यान, दरा अभयारण्य, जवाहर सागर व चंबल घडिाल अभयारण्य का कुछ भाग शामिल है।</p>
<p><strong>विरासत से भरा टाइगर रिजर्व</strong><br />प्राकृतिक छटा के साथ मुकुन्दरा विरासत से भरा पड़ा है। रिजर्व में 12वीं शताब्दी का गागरोन किला, 17वीं शताब्दी का अबली मीणी का महल, पुरातात्विक सर्वे के अनुसार 8वीं-9वीं शताब्दी का बाडोली मंदिर समूह, भैंसरोडगढ़ फोर्ट, 19वीं शताब्दी का रावठा महल, शिकारगाह समेत कई ऐतिहासिक व रियासतकालीन इमारतें, गेपरनाथ, गरड़िया  महादेव मंदिर भी है, जो कला-संस्कृति व प्राचीन वैभव को दर्शाते हैं।</p>
<p><strong>औषधीय पौधों की भरमार </strong><br />जेडीबी कॉलेज में वनस्पति विभाग की प्रोफेसर पूनम जायसवाल ने बताया कि मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में शुष्क, पतझड़ी वन, पहाड़ियां नदी, घाटियों के बीच तेंदू, पलाश, बरगद, पीपल, महुआ, बेल, अमलताश, जामुन, नीम, इमली, अर्जुन, कदम, सेमल और आंवले के घने वृक्ष हैं। साथ ही पादक विविधता अधिक मात्रा में है। यहां औषधीय पौधों की भरमार है।</p>
<p><strong>दुर्लभ वन्यजीव का घर टाइगर रिजर्व  </strong><br />चम्बल नदी किनारे बघेरे, भालू, भेड़िए, चीतल, सांभर, चिंकारा, नीलगाय, काले हरिन, दुर्लभ स्याहगोह, निशाचर सिविट केट और रेटल जैसे दुर्लभ वन्यजीव भी देखने को मिलेंगे। इसके अलावा, चीतल, भालू, पैंथर सांभर, जंगली बिल्ली, सियार, जरख, लंगूर, नेवला, झाउ चूहा, जंगली खरगोश, गिल्हरी, चिंटीखोर यानी पैंगोलिन, सिही जंगली चूहा सहित कई वन्यजीव हैं।</p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-world-of-vultures-is-getting-populated-in-the-ravines-of-chambal/article-104178</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-world-of-vultures-is-getting-populated-in-the-ravines-of-chambal/article-104178</guid>
                <pubDate>Thu, 13 Feb 2025 16:53:18 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2025-02/257rtrer55.png"                         length="558241"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[kota]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>असर खबर का- चंबल हैंगिंग ब्रिज की मरम्मत का काम हुआ शुरू</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[क्षतिग्रस्त हुई सड़क को समतल कर नवीनीकरण किया जा रहा है। 
]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/effect-of-news---repair-work-of-chambal-hanging-bridge-started/article-103740"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/257rtrer-(1)26.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। चंबल हैंगिंग ब्रिज की सड़कों की मरम्मत का काम शनिवार से शुरू हो गया है। दैनिक नवज्योति में खबर प्रकाशित होने के बाद एनएचएआई हरकत में आई और हाइवे पर हो रहे गड्ढ़ों को भरने व कुछ जगहों पर नई सड़क बनाने का काम शुरू करवा दिया गया है। उबड़-खाबड़ जगहों को समतल किया जा रहा है। डामरीकरण किया जा रहा है। वहीं, सड़क की सफाई भी शुरू हो गई है। आईआरबी इंफ्रास्ट्रेक्चर प्राइवेट लिमिटेड के डीजीएम राजेश लोनकर ने बताया कि चंबल हैंगिंग ब्रिज पर सड़क निर्माण कार्य शुरू कर दिया है। दो-तीन माह में 28 किमी हाइवे की पूरी सड़क नई बनवा दी जाएगी।  हाल ही में हैंगिंग ब्रिज टोल प्लाजा से थोड़े आगे जयपुर बूंदी से कोटा की ओर आने वाली सड़क पर नई सड़क बनाई है। वाहन चालकों की सुविधाओं का ध्यान रखा जा रहा है। इधर, एनएचएआई के प्रोजेक्ट मैनेजर संदीप अग्रवाल ने बताया कि हाइवे की सड़क मरम्मत का काम शुरू हो गया है। क्षतिग्रस्त हुई सड़क को समतल कर नवीनीकरण किया जा रहा है। </p>
<p><strong>नवज्योति का जताया आभार</strong><br />फल-थोक सब्जीमंडी के व्यापारी हर्षित गोयल, राजेश कुमार, धीरज सौलंकी ने धानमंडी-एयरपोर्ट लिंक  रोड की दशा सुधरवाने पर नवज्योति का आभार जताया। उन्होंने बताया कि करीब एक साल से लिंक रोड बदहाल हो रहा था। गड्ढ़ों के कारण मंडी में आने वाली गाड़ियों से माल गिर जाता था। वहीं, वाहनों का मेंटिनेंस बढ़ने से परेशानी हो रही थी। केडीए अधिकारियों से कई बार शिकायत करने के बावजूद समाधान नहीं हो रहा था लेकिन नवज्योति ने शुक्रवार को खबर प्रकाशित कर ज्वलंत समस्या से निजात दिलाई। </p>
<p><strong>इधर, धानमंडी-एयरपोर्ट लिंक रोड के गड्ढ़े भरे</strong><br />दैनिक नवज्योति में शुक्रवार को सड़कें भी आम और खास...शीर्षक से समाचार प्रकाशित होने के बाद केडीए भी हरकत में आ गया और शनिवार को पेचवर्क कर गड्ढ़े भर दिए गए। साथ ही क्षतिग्रस्त हो रही सड़क की मरम्मत भी कर दी है। जिससे वाहन चालकों को आवागमन में सुविधा हो गई। </p>
<p><strong>सड़क से हटे मिट्टी के ढेर, धूल से मिली निजात</strong><br />लिंक रोड पर सड़क किनारे मिट्टी के ढेर लगे हुए थे। जिससे वाहनों के गुजरने के दौरान धूल के गुबार उड़ते थे। ऐसे में केडीए ने मिट्टी हटवाकर सड़क की सफाई करवा दी है। इससे वाहन चालकों को आवागमन में काफी राहत मिली। </p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/effect-of-news---repair-work-of-chambal-hanging-bridge-started/article-103740</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/effect-of-news---repair-work-of-chambal-hanging-bridge-started/article-103740</guid>
                <pubDate>Mon, 10 Feb 2025 15:37:28 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2025-02/257rtrer-%281%2926.png"                         length="447297"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[kota]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चंबल के बूढ़े बांधों को फिर जवानी का इंतजार</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[एक साल पहले ही स्वीक़ृत हो चुका बजट।
]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-old-dams-of-chambal-are-waiting-for-you-again/article-96454"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/257rtrer-(5)1.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। चंबल नदी पर स्थित तीनों बांधों की मरम्मत के लिए करोड़ों रुपए का बजट करीब एक साल पहले स्वीकृत हो चुका है, लेकिन इन बांधों की मरम्मत के लिए संवेदक कंपनियां साहस नहीं जुटा पा रही हैं। हालात ऐसे हैं कि तीन बार टेंडर करने के बावजूद कोई भी कंपनी उसमें भाग लेने ही नहीं पहुंची। चंबल वैली प्रोजेक्ट के तहत राणा प्रताप सागर (आरपीएस), जवाहर सागर (जेएस) बांध और कोटा बैराज के जीर्णोद्धार का काम होना है। इसके लिए वर्ल्ड बैंक से डैम रिहैबिलिटेशन इंप्रूवमेंट प्रोजेक्ट (ड्रिप) के तहत राशि भी स्वीकृत हो गई थी, लेकिन पहले जरूरी प्रक्रियाओं में समय लग गया और बाद में संवेदक मरम्मत के लिए हिम्मत नहीं जुटा पाए। इसके चलते अब इसके जीर्णोद्धार की राशि का बजट बढ़ाया गया है। यह राशि लाखों में नहीं करोड़ों में बढ़ गई है। पहले जहां पर तीनों डैम का काम 182.78 करोड़ में होना था, अब यह राशि 53.45 करोड़ रुपए बढ़ाई गई है, जिसके तहत 236.23 करोड़ रुपए में रिनोवेशन का काम करवाया जाना प्रस्तावित किया है।</p>
<p><strong>उम्रदराज बांध, इसलिए आ रही दिक्कत   </strong><br />विभागीय अधिकारियों के अनुसार कोटा बैराज, बूंदी के जवाहर सागर और रावतभाटा के राणा प्रताप सागर करीब 60 से 65 साल पुराने बने हुए हैं। हाइड्रो मैकेनिकल वर्क में पुराने गेट व स्लूज गेट बदलने हैं। इस तरह के काम करने वाले संवेदकों को बुलाकर बातचीत भी की गई और उन्हें पूरे काम के संबंध में समझाया भी गया है। बैठक में संवेदकों की क्वेरीज को भी बताया गया, इसके बावजूद कोई संवेदक नहीं आया है। नए निर्माण कार्यों के लिए तो संवेदक आगे आ जाते हैं, लेकिन पुराने बांधों की मेंटेनेंस के काम के लिए काफी दिक्कत आती है, संवेदक इसलिए भी सामने नहीं आ रहे हैं। क्योंकि बांध में पानी काफी भरा रहता है और इस दौरान ही गेट और अन्य उपकरणों की मेंटेनेंस होनी है, जो हर कोई नहीं कर सकता है।</p>
<p><strong>फैक्ट फाइल</strong><br /><strong>3 साल में आया 53.45 करोड़ का अंतर</strong><br /><strong>बांध                        पूर्व मेें स्वीकृत राशि       वर्तमान राशि        राशि में अंतर</strong><br />कोटा बैराज                      44.26                        72.1                 27.84<br />राणाप्रताप सागर              65.72                        85.45               19.73<br />जवाहर सागर                   72.8                         78.68                 5.88<br />कुल राशि                       182.76                       36.23                 3.46</p>
<p><strong>तीन बार निविदा निकाली, फिर भी हाथ रहे खाली</strong><br />जल संसाधन विभाग के अधिकारियों के अनुसार तीनों बांधों की मरम्मत के लिए जल संसाधन विभाग ने 14 अगस्त 2023 को निविदा जारी की थी, लेकिन किसी भी संवेदक फर्म ने इसमें टेंडर नहीं डाले। इसके बाद 28 सितंबर 2023 को एक बार फिर निविदा जारी की गई थी, इसमें भी यही हालात रहे। इसके बाद विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लग गई थी, जिसके चलते निविदा जारी नहीं कर पाए। आचार संहिता हटते ही 22 दिसंबर 2023 को दोबारा निविदा जारी कर दी गई थी। हालांकि इसमें हाइड्रो मैकेनिक के लिए कोई नहीं आया, दो फर्म सिविल वर्क के लिए पार्टिसिपेट करने आई, लेकिन इन कार्यों को करने के लिए अनुभव उनके पास नहीं था। साथ ही जिन मापदंड के जरिए बांधों में काम होना है। उसके अनुरूप वो सक्षम नहीं पाए गए थे, ऐसे में वो डिसक्वालीफाई हो गए थे। </p>
<p><strong>कोटा बैराज के गेट बदलने से बढ़ी राशि  </strong><br />जल संसाधन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि तीन बार निविदाएं आमंत्रित करने के बाद भी संवेदक इसमें रुचि नहीं दिखा रहे थे। ऐसे में सेंटर वाटर कमीशन ने संवेदकों को बुलाकर बातचीत की थी। इसके बाद उन्होंने दरों को कम बताया। साथ ही यह भी कहा था कि यह नए बांध नहीं है, पुराने बांध के रिनोवेशन का काम है, इसलिए इसमें ज्यादा पैसा लगेगा। ऐसे में ज्यादातर राशि कोटा बैराज में बढ़ी है। पहले इसके 19 गेटों का मेटलाइजेशन करने का कार्य होना था, लेकिन अब गेटों को ही बदलने का निर्णय किया गया है। इसके चलते नई बीएसआर की वजह से भी राशि बढ़ी है। इसके अलावा अन्य दोनों बांधों के कार्यो में कुछ बदलाव होने से राशि में इजाफा करना पड़ा है। </p>
<p><strong>रोबोटिक अंडरग्राउंड वॉटर सर्वे में मिली थी खामियां</strong><br />ड्रिप योजना से पैसा मिलने की उम्मीद के पहले राज्य सरकार ने जल संसाधन विभाग के चंबल नदी के तीनों बांध का अंडरवाटर सर्वे करवाया था। इसमें रोबोट के जरिए अंडर ग्राउंड वाटर वीडियोग्राफी करवाई गई थी, जिसके अंदर डैम बॉडी की पूरी पिक्चर रोबोट ने ली थी, उनका पूरा एसेसमेंट बनाकर सर्वे करने वाली कंपनी ने रिपोर्ट दी थी। इसमें कोटा बैराज, जवाहर सागर बांध और राणा प्रताप सागर बांध की बॉडी के स्ट्रक्चर में खामियां सामने नहीं आई हैं। जिनके लिए भी अब काम किया जाएगा। इसके अलावा बांधों के दरवाजों का हेल्थ असेसमेंट अल्ट्रासाउंड तकनीक व मशीनरी के जरिए करवाया गया था, जिसमें कई गेट को बदलने और दुरुस्त करने का पैसा पास हुआ था।</p>
<p>नए बांध के लिए संवेदक को काम करना आसान होता है, लेकिन पुराने बांधों की मरम्मत के काम दिक्कत रहती है। यह कार्य पानी के अन्दर करना होता है, जो हर किसी के लिए संभव नहीं है। इसलिए कोई संवेदक नहीं आया है। अब देश के बड़ी संवेदकों से इस सम्बंध में सम्पर्क किया जा रहा है। अभी वित्त विभाग से रिवाइज बजट की फाइल स्वीकृत होने का इंतजार है।<br /><strong>- संजय कुमार सिंह, अधिशासी अभियंता, जल संसाधन विभाग कोटा</strong></p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-old-dams-of-chambal-are-waiting-for-you-again/article-96454</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-old-dams-of-chambal-are-waiting-for-you-again/article-96454</guid>
                <pubDate>Mon, 02 Dec 2024 15:18:51 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-12/257rtrer-%285%291.png"                         length="519597"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[kota]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई, बीच में मगरमच्छ से भरी चंद्रलोही आई</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[हाल ही में बुजुर्ग पर हमला कर चबा दिया था हाथ।
]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/on-one-side-there-was-a-well-and-on-the/article-95848"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/257rtrer-(4)5.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। एक तरफ कुआ तो दूसरी तरफ खाई...यह कहावत इन दिनों चंद्रलोही नदी के किनारों पर बसी कॉलोनियों के बाशिंदों पर चरितार्थ हो रही है। नदी के एक तरफ आबादी क्षेत्र हैं तो दूसरी तरफ खेत हैं और बीच से मगरमच्छों से भरी चंद्रलोही है। नदी किनारे सुरक्षा दीवार या फेंसिंग नहीं होने से मगरमच्छ खेतों व कॉलोनियों में घुसकर लोगों पर हमले कर रहे हैं। इससे इंसान व वन्यजीवों के बीच टकराव होने से संघर्ष बढ़ गया। हाल ही में बुजुर्ग पर हुए मगरमच्छ के हमले के बाद भी वन विभाग नहीं चेता। दरअसल, सुरक्षा दीवार के अभाव में मगरमच्छ खेतों में पहुंच जाते हैं। पूर्व में धोरों पर फसल धोते समय मगरमच्छ एक किसान पर जानलेवा हमला कर चुका है। इसके बावजूद विभाग न तो लोगों की जिंदगी और न ही वन्यजीव के संरक्षण के प्रति गंभीर है। </p>
<p><strong>सर्दी आते ही किनारों पर डेरा</strong><br />नेचर प्रमोटर जैदी ने बताया कि सर्दी आने के साथ ही ये किनारे पर आ जाते हैं। हाथीखेड़ा, मानसगांव  में एक साथ 10 से 12 मगरमच्छों का झुंड देखा जा सकता है। नदी के बीच-बीच में जहां पानी सूख जाता है, वहीं आकर बैठ जाते हैं। दिनभर धूप सेकते हैं। कई बार तो ये बस्ती की ओर भी रुख कर लेते हैं। </p>
<p><strong>श्रद्धालुओं पर हमले का रहता खतरा</strong><br />वन्यजीव प्रेमी शेख जुनैद ने बताया कि चन्द्रलोई नदी मानस गांव के पास चंबल में मिल जाती है, लेकिन इससे पहले करीब 15 से 16 किमी में मगरमच्छों की तादात काफी ज्यादा है। रायपुरा, राजपुरा, देवलीअरब, जग्गनाथपुरा, बोरखंडी हाथीखेड़ा, अर्जुनपुरा में इन्हें बड़ी तादाद में देखा जा सकता है। हालांकि यहां मगरमच्छों की गिनती कभी नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि चन्द्रेसल गांव में प्राचीन मठ है,जिसमें शिव मंदिर है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। जबकि, मठ के पास नदी किनारों पर  मगरमच्छों का मूवमेंट बना रहता है। ऐसे में श्रद्धालुओं पर हमले का खतरा बना रहता है। </p>
<p><strong>हर साल 80 से ज्यादा मगरमच्छों का रेस्क्यू</strong><br />वन विभाग के रेस्क्यू टीम के सदस्य वीरेंद्र सिंह बताते हैं, साल में करीब 70 से 80 मगरमच्छों का आबादी क्षेत्रों से रेस्क्यू किया जाता है। शहर के विभिन्न रिहायशी इलाकों में आए दिन मगरमच्छ के आने के मामले सामने आ रहे हैं। एक ही दिन में बोरखेड़ा व स्टेशन क्षेत्र के भदाना इलाके में तीन-तीन मगरमच्छों का रेस्क्यू किया गया। बोरखेड़ा क्षेत्र में तो आए दिन कॉलोनियों में मगरमच्छों की मौजूदगी बनी रहती है।  </p>
<p><strong>चंद्रलोही किनारे बसे इन गांवों को खतरा </strong><br />ग्रामीण दीनदयाल शर्मा, पंकज गौतम ने बताया कि चंद्रलोही केबल नगर के उपरी क्षेत्र मंदिरगढ़ से शुरू हो रही है। नदी के दोनों किनारों पर कई गांव बसे हैं। जिनमें काला तलाब, खेडली पांड्या, मांदलिया, केबल नगर, मवासा, जामपुरा, नगपुरा, भीमपुरा, कैथून, संजय नगर, चैनपुरा, जालीखेड़ा, आरामपुरा, खेड़ारसूलपुर, भोजपुरा, रामराजपुरा, अर्जुनपुरा, बोरखंडी, हाथीखेड़ा, जगदीशपुरा व मानसगांव होते हुए चंबल नदी में मिल जाती है। तार फेंसिंग नहीं होने से इन इलाकों में हर पल अनहोनी का डर सताता है।  </p>
<p><strong>सैंकड़ों मगरमच्छ से भरी चंद्रलोही  </strong><br />चंद्रलोही की कोख में सैंकड़ों मगरमच्छ पनप रहे हैं, जो जगह-जगह पानी के बीच चट्टानों पर झुंड के रूप में धूप सेंकते नजर आ रहे हैं। नदी में 5 से 12 फीट लंबे मगरमच्छ मौजूद हैं। जिनसे अनहोनी का डर बना रहता है। क्योंकि, नदी किनारे खेती-बाड़ी है, जहां काम करने वाले किसानों को हादसे का डर सताता है। क्षेत्रवासियों ने पूर्व में भी नदी किनारों पर तार फेंसिंग करवाने की मांग की थी लेकिन प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया। पूर्व में कई हादसे भी हो चुके हैं। </p>
<p><strong>खेतों में जाने से लगता डर </strong><br />नदी के आसपास बसे क्षेत्रवासियो में मगरमच्छों का खौफ है। किसान खेतों में जाने से डरते हैं। लोगों ने नदी में नहाना व सब्जियां धोना भी बंद कर दिया है।  हाल ही में हुई घटना के अलावा पूर्व में भी मगरमच्छ के हमले की कई जानलेवा घटनाएं  हो चुकी हैं। इसके बावजूद विभाग द्वारा सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए गए। जिम्मेदारों की लापरवाही से मगरमच्छ व इंसानों के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो रही है।</p>
<p><strong>बालक व किसान का पैर खा गया मगरमच्छ</strong><br />नेचर प्रमोटर जैदी ने बताया कि गत वर्षों में एक महिला  नदी के घाट पर कपड़े धो रही थी। उसका बच्चा पास में ही खेल रहा था। इसी दौरान नदी से निकला मगरमच्छ ने बालक पर हमला कर नदी में ले गया। जिससे उसकी मौत हो गई। वहीं, फसल धोते समय किसान का पैर मगरमच्छ खा गया। उसे नदी में खींचने लगा लेकिन किसान ने पेड़ को पकड़ शोर मचाया। आसपास के खेतों में काम कर रहे अन्य किसान मौके पर पहुंचे तो वह नदी में चला गया। लेकिन, किसान का एक पैर पूरा शरीर से अलग हो गया। इसके अलावा मवेशियों को भी शिकार बना चुका है।</p>
<p>- नदी व नाले किनारे चारों तरफ चेन फेंसिंग कर इंसान व वन्यजीवों के बीच टकराव रोका जाए।  <br />- वन विभाग को लोगों के बीच जागरूकता फैलानी चाहिए। <br />- शहर में ज्यादा से ज्यादा हेल्पलाइन नम्बर बांटना चाहिए। <br />- एक से ज्यादा क्रोकोडाइल रेस्क्यू टीम बनाई जाए। <br />- वन्यजीव विभाग रेस्क्यू के दौरान मगरमच्छों पर टेगिंग जरूर करवाएं। <br />- नहर व नालों में मृत जीव-जंतु, जानवर, मटन-चिकन के अवशेष व खाद्य सामग्री न फेंकी जाएं। <br />- जब मगरमच्छों को भोजन नहीं मिलेगा तो वह आबादी क्षेत्रों से सटे नहर-नालों में नहीं आएंगे। <br />- इनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखा जाए। <br />- रायपुरा नाले से मगरमच्छों को सावनभादो डेम में शिफ्ट किया जाए। <br />- इनके संरक्षण व भोजन की नियमित व्यवस्था हो। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />शहरी सीमा में चंद्रेसल नदी किनारे चैन फेंसिंग के प्रस्ताव भेजे गए हैं, हालांकि स्वीकृति नहीं मिली है। लोगों को जागरूक करने के लिए नदी किनारे संकेतक व चेतावनी बोर्ड लगवाए जाएंगे। <br /><strong>- अपूर्व कृष्ण श्रीवास्तव, उप वन संरक्षक, कोटा वन मंडल  </strong></p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/on-one-side-there-was-a-well-and-on-the/article-95848</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/on-one-side-there-was-a-well-and-on-the/article-95848</guid>
                <pubDate>Mon, 25 Nov 2024 16:48:48 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-11/257rtrer-%284%295.png"                         length="584919"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[kota]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विदेशों से कोटा पहुंचे वल्चर, चम्बल बनी आशियाना </title>
                                    <description>
                        <![CDATA[हर साल दुनियाभर से प्रवास पर आते हैं गिद्ध। 
]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/vultures-reached-kota-from-foreign-countries--chambal-became-their-home/article-95845"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/257rtrer-(1)7.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। दुनिया के कई देशों से वचर्ल्स कोटा में दस्तक दे चुके हैं। चंबल की कराइयों में विभिन्न प्रजातियों के गिद्धों  की दुनियां आबाद हो रही है। मुकुंदरा की वादियों में आशियाना बसाया है। कोटा से रावतभाटा के जंगलों व चंबल की कराइयों में विभिन्न प्रजातियों के करीब 1200 से ज्यादा वल्चर नजर आ रहे हैं।  वहीं, हिमालयन ग्रिफॉन, यूरेशियन ग्रिफॉन और सिनेरियस वल्चर विश्व के 19 देशों से मुकुंदरा में प्रवास पर आए हैं। </p>
<p><strong>हवा में बैक्टेरिया फैलने से रोकता है वल्चर</strong><br />बड्स रिसर्चर हर्षित कहते हैं, वल्चर्स का झुंड मृत जानवर के शरीर को मात्र 20 से 25 मिनट में ही चट कर जाते हैं। जिससे मृत जानवरों के अवशेष से बैक्टेरिया हवा में फैल नहीं पाते। यही वजह है कि जंगलों में दुर्गंध नहीं होती। पारिस्थितिक तंत्र में गिद्दों की भूमिका अहम है। </p>
<p><strong>इन देशों से कोटा आए वल्चर</strong><br />जैदी बताते हैं, विश्व के 19 देशों से तीन प्रजातियों के वल्चर मुकुंदरा में प्रवास पर आए हैं। जिनमें हिमालयन ग्रिफॉन, यूरेशियन ग्रिफॉन और सिनेरियस शामिल हैं। यह वल्चर चीन, साइबेरिया, उत्तरी अमेरिका, यूरोप, इटली, मंगोल, इंडोनेशिया, उज्बेकिस्तान, आस्ट्रिया, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, स्वट्जरलैंड व कोरिया, अफगानिस्तान, कजाकिस्तान, अजरबेजान सहित कई देशों से आए हैं। इन देशों में बर्फबारी के कारण सर्दी तेज होने से खुद को बचाने व भोजन की तलाश में प्रवास पर आते हैं। </p>
<p><strong>इंसानों को एंथ्रेक्स वायरस से बचाता है गिद्ध</strong><br />पक्षी विशेषज्ञ डॉ. अंशु शर्मा ने बताया कि गिद्दोें को प्राकृतिक सफाईकर्मी कहा जाता है। इनके पेट में शक्तिशाली एसिड होता है, जो हड्डियों के साथ हैजे और ऐंथ्रैक्स जैसे जीवाणुओं को नष्ट कर देता है। ये जीवाणु इंसानों के लिए जानलेवा होता है। एक गिद्ध सालभर में करीब 120 किलो मांस खा सकता है। उनके झुंड को मृत जानवर के एक शव को निपटाने में महज 20 से 25 मिनट लगते हैं। उनका पाचन तंत्र मांस को पचाकर अच्छी खाद बनाता है, यानी वे मिट्टी में पोषक तत्व भी छोड़ते हैं।</p>
<p><strong>दो सौ से ज्यादा पक्षियों का गूंजता कलरव</strong><br />पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार, मुकुन्दरा हिल्स में पक्षी की दौ सौ से ज्यादा प्रजातियां है। इनमें क्रेसअ‍ेड सरपेंट, ईगल, शॉर्ट टोड,पैराडाइज फ्लाई केचर, सारस क्रेन, स्टोक बिल किंग फिशर, कलर्ड स्कोप्स आउलग्रीन पीजन, गोल्एन ओरिओल, बैबलर, गागरोनी तोता, टुईंया तोता, एलेक जेन्डेरियन पैराकीट, रूडी शेल्डक, वाइट पैलिकन, ग्रेट फलेमिंगो, नोर्दन शावलर, नोर्दन पिंटटेल, बार एडेड गूज, ग्रेलेक गूज, गारगेनी टील समेत कई प्रजातियों के पक्षियों का कलरव गूंजता है। मुकुंदरा, जैव विविधता से भरपूर होने के साथ बायोडायवरसिटी पक्षियों के अनुकूल है।</p>
<p><strong>मुकुंदरा में पाई जाती है वल्चर की 4 प्रजातियां</strong><br />बर्ड्स रिसर्चर हर्षित शर्मा का कहना है, मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में वल्चर्स की 4 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें इंडियन लॉन्ग बिल्ड वल्चर, इजिप्शियन वल्चर, किंग वल्चर, व्हाइट बेक्ड वल्चर शामिल हैं, जो स्थानीय हैं। वहीं, विदेशों से आने वाले वल्चर्स में तीन प्रजाति शामिल हैं। जिनमें  हिमालयन ग्रिफॉन वल्चर, यूरेशियन ग्रिफॉन और सिनेरियस ग्रिफॉन वल्चर्स यूरोपियन देशों से प्रवास पर आए हैं, जो मार्च माह तक रहते हैं। स्थानीय वल्चर की संख्या में अपेक्षाकृत इजाफा हुआ है। </p>
<p><strong>तीन दर्जन से ज्यादा नजर आए अंडे </strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी के अनुसार, गरडिया महादेव, गेपरनाथ, भैंसरोडगढ़, जवाहर सागर व राणा प्रताप सागर के आईलैंड, गिरधरपुरा , बोराबांस सहित चंबल की कराइयों में लोंग बिल्ड वल्चर अधिक संख्या में नजर आने लगे हैं। आॅक्टूबर माह से नेस्टिंग शुरू हो जाती है। इन जगहों पर तीन दर्जन से अधिक गिद्दों के अंडे नजर आने लगे हैं। यह अपने घौंसले चट्टानों के बीच दरारों व पेड़ों पर बनाते हैं। एक महीने बाद अंडों से चूजे बाहर आएंगे। ऐसे में इनकी संख्या बढ़ना प्रकृति के जीवन चक्र के लिए अच्छे संकेत माने जाते हैं। </p>
<p><strong>मुकुंदरा में 1500 से ज्यादा संख्या </strong><br />पक्षी विशेषज्ञ डॉ. अंशु शर्मा ने बताया कि मुकुंदरा  के जंगलों में सबसे ज्यादा संख्या इजिप्शियन वल्चर की है। यह वल्चर प्रजातियों में सबसे छोटे कद का होता है। अनंतपुरा व अभेड़ा डम्पिंग यार्ड व बोराबांस के इलाकों में ज्यादा नजर आते हैं। कोटा से रावतभाटा तक इनकी संख्या करीब 1200 है। वहीं, लोंग बिल्ड वल्चर 500 से 600 तथा वाइट रेम्पर्ड 200 से 250 के बीच संख्या में है। वहीं, किंग वल्चर सबसे कम देखने को मिलते हैं। </p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/vultures-reached-kota-from-foreign-countries--chambal-became-their-home/article-95845</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/vultures-reached-kota-from-foreign-countries--chambal-became-their-home/article-95845</guid>
                <pubDate>Mon, 25 Nov 2024 15:31:28 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-11/257rtrer-%281%297.png"                         length="521100"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[kota]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अभेड़ा महल चमका, जीवंत हुआ राजसी वैभव</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[झूले लगे, पार्क में लौटी बच्चों की रौनक। 
]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/abheda-mahal-shines--royal-splendor-comes-alive/article-95259"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/27rtrer-(5)2.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कला, संस्कृति और प्रकृति के अनूठे संगम के बीच चंबल की गोद में बसा अभेड़ा महल का राजसी वैभव फिर से जीवंत हो उठा है।  महल का कलात्मक स्वरूप और एतिहासिक धरोहर  नवज्योति के प्रयासों से चमक उठी है। महल की दीवारों पर राजसी वैभव, युद्ध नजारे, जंग के मैदान में दौड़ते घोड़े-हाथी और भाले लेकर चल रहे सैनिकों का पराक्रम से रुबरू कराती चित्रकारिता में झलकता कोटा का गौरवशाली इतिहास पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। करीब 18 साल बाद फिर से अपने मूल स्वरूप में लौटा अभेड़ा महल को देख पर्यटक आनंदित हो रहे हैं। दरअसल, ऐतिहासिक धरोहर अभेड़ा महल की दुर्दशा को लेकर दैनिक नवज्योति ने लगातार खबरें प्रकाशित कर केडीए का ध्यान सौंदर्यीकरण की ओर आकर्षित किया था। इसके बाद केडीए प्रशासन ने न केवल महल का सौंदर्यीकरण करवाया बल्कि बरसों से टूटे झूले भी लगवा दिए। लेकिन, रानी महल में बूंदी शैली की कलात्मक पेंटिंग अशोभनीय कमेंट्स से घिरी हुई है, जो परिवार के साथ आने वाले पर्यटकों को शर्मसार कर रही है। इस ओर भी ध्यान देने की जरूरत है। </p>
<p><strong>महल के आंगन में लौटी रौनक</strong><br />अभेड़ा महल में रविवार को बड़ी संख्या में पर्यटक परिवार संग घूमने आए। महल का आंगन वर्षों बाद बच्चों से गुलजार रहा। यहां लगे झूलों पर बच्चों की भीड़ लगी रही। उन्होंने सिलीप पट्टी व झूलों का लुफ्त उठाया। साथ ही परिसर में साफ-सफाई, गार्डन   में पौधों का मेंटिनेंस व बोटिंग पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहे। </p>
<p><strong>18 साल बाद चमका अभेड़ा महल</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि केडीए ने साढ़े तीन करोड़ की लागत से वर्ष 2003 में अभेड़ा महल का जीर्णोंद्धार शुरू किया था, जो तीन साल बाद 2006 में पूरा हुआ। रिनोवेशन के तहत भवन की मरम्मत, रंग-रोशन, सुलभ कॉम्पलेक्स, मुगल गार्डन, रानी महल की मरम्मत व नक्काशी, झरोखे, तालाब, बाहरी दीवारों पर राज दरबार की सवारी जुलूस व राजसी वैभव को प्रदर्शित करती पेटिंग्स सहित कई कार्य करवाए थे। वहीं, बच्चों के लिए झूले भी लगवाए थे। करीब 18 साल बाद फिर से महल का सौंदर्यीकरण हुआ है। हालांकि, महल की दीवारों का रंग-रोगन बीच-बीच में होता रहा।</p>
<p><strong>बिजली पोल पर रंग-रोगन, कनेक्शन चालू नहीं</strong><br />बोरखेड़ा निवासी पर्यटक अजय कुशवाह, राकेश नामा, सुरेंद्र प्रजापति ने बताया कि महल के अंदर लगे बिजली के पोल पर रंग-रोगन तो कर दिया लेकिन कनेक्शन चालू नहीं है। शाम पांच बजे के बाद से अंधेरा होने लगता है लेकिन लाइटें चालू नहीं होती। वहीं, फाउंटेशन लगा हुआ है, जो अब तक चालू नहीं किया गया। हालांकि, झूले, महल का सौंदर्यीकरण होने से काफी अच्छा लगा। </p>
<p><strong>रानी महल: दीवारों पर अशोभनीय कमेंट  </strong><br />जैदी बताते हैं, नवज्योति के प्रयास रंग लाए हैं। केडीए द्वारा महल का सौंदर्यीकरण करवाया, जो तारीफे काबिल है लेकिन कुछ विकास कार्य अधूरे छोड़ दिए हैं, जिसे भी पूरे किए जाना जरूरी है। रानी महल में दीवारों पर राजसी वैभव को प्रदर्शित करते कलात्मक चित्रों पर लोगों ने अपने नाम और अभद्र कमेंट लिखकर खराब कर दिए हैं। जबकि, महल देखने आने वाले पर्यटकों से टिकट लिया जाता है लेकिन मॉनिटरिंग नहीं की जाती। जिसका फायदा प्रेमी युगल व अन्य शरारती तत्व उठाते हैं और दीवारों पर नाम व कमेंट लिख धरोहर को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वहीं, परिवार के साथ आने वाले पर्यटकों को शर्मिंदगी महसूस करनी पड़ती है। </p>
<p><strong>नवज्योति ने उठाया था मामला</strong><br />अभेड़ा महल की दुर्दशा को लेकर दैनिक नवज्योति ने लगातार खबरें प्रकाशित की थी। शहर के पर्यावरणविद्, इतिहासकार, विरासत प्रेमियों व कलाकारों ने नवज्योति के माध्यम से केडीए, पर्यटन विभाग व जिला प्रशासन से ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण की मांग उठाई थी। नवज्योति के लगातार प्रयासोें के बाद अभेड़ा महल फिर से अपने गौरवशाली वैभव से चमक उठा है। उन्होंने दैनिक नवज्योति का लगातार प्रयास के लिए आभार जताया। </p>
<p><strong>क्या बोले पर्यटक </strong><br />विस्तार योजना विज्ञान नगर निवासी शैलेंद्र आहुजा, पंकज चौहान, शाहबाज पठान, रिंकू आलम ने बताया कि पिछले साल अभेड़ा महल आए थे तब दीवारें व शाही दरबार की पेंटिग बदहाल थी। तालाब व कुंड कमल जड़ों से अटे हुए थे। काफी समय बाद  महल की तस्वीर बदली है। सौंदर्यीकरण होने से महल चमक उठा है। परिसर में भी साफ सफाई पहले से बेहतर हो गई।  केशवपुरा निवासी कैलाश साहू, लक्ष्मी कुमारी, सुचिता, उदयराज का कहना है, रानी महल के कमरों व तिबारियों में हो रही पेंटिंग्स पर लोगों ने अशोभनीय कमेंट लिखे हुए हैं, जो बहुत गलत है। कोटा-बूंदी शैली की पेंटिग्स व विरासत को खराब कर रहे हैं। परिवार के साथ जाते हैं, ऐसे में इन कमेंट्स को देख शर्मिंदगी महसूस होती है। केडीए प्रशासन को जल्द से जल्द दीवारों का रंग रोगन करवाकर हटाना चाहिए और खराब हो रही पेंटिंग्स को फिर से बनवाकर जीवंत करनी चाहिए।</p>
<p><strong>रानी महल की दीवारें पान-गुटखों की पीक से लाल</strong><br />विरासत प्रेमी रिंकेश अग्रवाल ने बताया कि अभेड़ा महल बहुत ही खूबसूरत है। यहां मॉनिटरिंग की कमी है। देखरेख के अभाव में रानी महल की दीवारें व झरोखों को पान-गुटखों की पीक से बदरंग हो रहे हैं। वहीं, शरारती तत्वों ने कोटा-बूंदी शैली की पेंटिंग्स खराब कर  दी है। केडीए प्रशासन को टिकट दर में बढ़ोतरी कर पर्याप्त गार्ड की व्यवस्था करनी चाहिए। साथ ही मॉनिटरिंग बढ़ानी चाहिए ताकि, शरारती तत्वों पर निगरानी रखी जा सके। </p>
<p>सौंदर्यीकरण होने से महल फिर से चमक उठा है। रानी महल के अंदर की दीवारें व कोटा-बूंदी शैली की पेंटिंग्स पर लिखे कमेंट का मामला संज्ञान में आया है। जिसे तुरंत दुरुस्त करवाया जाएगा। <br /><strong>- पंकज सिसोदिया, जेईएन केडीए </strong></p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/abheda-mahal-shines--royal-splendor-comes-alive/article-95259</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/abheda-mahal-shines--royal-splendor-comes-alive/article-95259</guid>
                <pubDate>Mon, 18 Nov 2024 16:46:16 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-11/27rtrer-%285%292.png"                         length="447786"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[kota]]>
                    </dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        