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                <title>Population - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>चीन की घटती आबादी और बढ़ती तकनीकी ताकत: भारत के लिए चुनौती</title>
                                    <description><![CDATA[चीन की सरकार ने टेक्नोलॉजी और शिक्षा को एक साथ जोड़ा वहां कई कंपनियों में रोबोट 24 घंटे काम करते है ।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/china%E2%80%99s-declining-population-and-rising-technological-prowess--a-challenge-for-india/article-149954"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/1200-x-600-px)16.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। चीन की जनसंख्या में लगातार गिरावट आ रही है, लेकिन यह उसके लिए कमजोरी नहीं बल्कि एक नई ताकत बनती जा रही है। पहले बड़ी आबादी को आर्थिक शक्ति माना जाता था, वहीं अब चीन तकनीक और ऑटोमेशन के जरिए इस कमी को पूरा कर रहा है। चीन ने समय रहते समझ लिया कि भविष्य मशीनों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का है, इसलिए वह तेजी से रोबोटिक्स और आधुनिक तकनीकों में निवेश कर रहा है। चीन को आबादी कम होने से काम देने की कोई दिक्कत नहीं है। चीन की कई बड़ी कंपनियों में रोबोट 24 घंटे, सातों दिन काम कर रहे हैं जब कि एक इंसान 8 घंटे ही काम करता है। शियोमी कंपनी में 50% रोबोट काम कर रहे हैंं। इससे उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ जाती है और लागत भी कम होती है। जनसंख्या कम होने के बावजूद चीन को श्रमिकों की कमी महसूस नहीं हो रही ।</p>
<p><strong>तकनीक के दम पर अमेरिका को चुनौती</strong><br />चीन की सरकार ने टेक्नोलॉजी और शिक्षा को एक साथ जोड़ा है। “Made in China 2025” जैसी नीतियों के तहत AI, 5G, रोबोटिक्स और सेमीकंडक्टर में भारी निवेश किया गया है, कंपनियों को सब्सिडी, जमीन और टैक्स में राहत दी जाती है। फैसले तेजी से लागू किए जाते हैं। इसी रणनीति का हिस्सा है कि बच्चों को स्कूल से ही STEM, कोडिंग, रोबोटिक्स और डिजिटल टेक्नोलॉजी में प्रशिक्षित किया जाता है, ताकि भविष्य के इंजीनियर और टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट तैयार हों और देश की तकनीकी ताकत और मजबूत हो।</p>
<p><strong>भारत के सामने बढ़ती जनसंख्या एक चुनौती</strong><br />भारत की जनसंख्या अभी अगले 20 वर्षों तक बढ़ती रहेगी। इससे रोजगार, संसाधन और विकास को लेकर दबाव बना रहेगा। एक बड़ी चुनौती यह भी होगी कि सरकार रोजगार दे या तकनीक में निवेश करे, क्योंकि एआई और रोबोटिक्स के बढ़ने से पारंपरिक नौकरियां कम हो सकती हैं। ऐसे में भारत के सामने दोहरी चुनौती है—जनसंख्या का प्रबंधन और तकनीकी विकास में तेजी। यदि सही संतुलन नहीं बनाया गया, तो चीन से मुकाबला करना भविष्य में और भी कठिन हो सकता है। ऐसे में क्या भारत रोजगार, संसाधनों , टेक्नोलॉजी और विकास के बीच सही संतुलन बना पाएगा, या भविष्य में चीन से मुकाबला करना मुश्किल हो जाएगा? इस विषय पर शहर के प्रबुद्ध लोगों की राय ली गई।</p>
<p>चीन के लोग “नेशन फर्स्ट” को रख कर काम करते हैं, इसलिए वे तकनीक और जनसंख्या नियंत्रण में आगे हैं। युवाओं को कौशल विकास और रोजगार के प्रति जागरूक करना होगा। नई तकनीकों से तो रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। हम जिम्मेदारी, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति की भावना अपनाएँ तभी हम आगे बढ़ सकते हैं।<br /><strong>- प्रदीप दाधीच, निदेशक पार्श्वनाथ ग्रुप</strong></p>
<p>चीन से मुकाबला चुनौतीपूर्ण होगा वहां लोग बहुत मेहनती हैं। भारतीय भी मेहनती है, लेकिन नई पीढ़ी मोबाइल की लत में फंसी हुई है । भारत में भी चीन जैसी योजनाबद्ध और प्रगतिशील व्यवस्था हो, तो हम चीन को पीछे छोड़ सकते हैं। हमें अपनी नई पीढ़ी को सही दिशा में लगाना और संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना होगा।<br /><strong>-महेश गुप्ता, निदेशक, शिवज्योति स्कूल</strong></p>
<p>भारत का तकनीकी और आर्थिक विकास पहले भी चुनौतीपूर्ण रहा है ,भविष्य में भी रहेगा। सुधार की सबसे बड़ी जरूरत शिक्षा व्यवस्था में है। चीन की तरह वोकेशनल प्रशिक्षण पर जोर दिया जाए, तो लोगों को कौशल आधारित बनाया जा सकता है। भारत में प्रतिभाशाली छात्र विदेश चले जाते हैं, जबकि चीन में उच्च शिक्षा लेकर लोग देश के विकास में योगदान देते हैं।<br /><strong>-डॉ. अजीत धाकड़, डायरेक्टर धाकड़ हॉस्पिटल, कुन्हाड़ी</strong></p>
<p>भारत में जनसंख्या के लिहाज से मुकाबला कठिन है। सख्त जनसंख्या नियंत्रण और मजबूत शिक्षा आवश्यक हैं। इससे तकनीक और विकास में सुधार होगा। युवाओं में जिम्मेदारी की भावना जागृत करनी होगी। मोबाइल और सोशल मीडिया में व्यस्त युवा सही कौशल नहीं सीख पाते। उच्च शिक्षा के बाद कई छात्र विदेश चले जाते हैं, जो देश के लिए चिंता का विषय है।<br /><strong>-प्रसन्न माहेश्वरी, ओनर, फूड टाउन बाय माहेश्वरी</strong></p>
<p>भारत में भी एआई और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में तेजी से विकास हो रहा है, और हमारा युवा निश्चित रूप से आगे बढ़ने की क्षमता रखता है। चुनौतियां बहुत हैं। भारत में भी एडवांस लर्निंग कोर्सेज और ऐसे इंस्टीट्यूट खुलने चाहिए जिससे नई तकनीकों का ज्ञान मिल सके और युवा भविष्य के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो सकें।<br /><strong>-देवेंद्र कौर नरूला, प्रिंसिपल, किड्स कैसल स्कूल</strong></p>
<p>हमारे यहाँ नीतियों में अधिक लचीलापन होने के कारण उनका सही पालन नहीं हो पाता, निष्पक्षता प्रभावित होती है। सभी के लिए समान अवसर उपलब्ध हों, तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। हमारे आईआईटी जैसे संस्थानों के छात्र प्रतिभाशाली हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त संसाधन और सुविधाएँ नहीं मिल पातीं। निरंतर प्रयासों से ही हम भविष्य में चीन की बराबरी कर सकते हैं।<br /><strong>-डॉ. प्रियदर्शना जैन, प्राचार्य जैन दिवाकर कमला महाविद्यालय</strong></p>
<p>भारत की जनसंख्या बोझ नहीं, बल्कि सबसे बड़ा संसाधन बन सकती है। सही दिशा, शिक्षा और प्रशिक्षण से इसे ताकत में बदला जा सकता है। भारतीयों की प्रतिभा दुनिया भर में साबित है, “मेक इन इंडिया” जैसे प्रयासों के साथ इनक्यूबेशन नवाचार और कौशल विकास बढ़ाने से देश आत्मनिर्भर बन सकता है। सबसे बड़ी चुनौती मानसिकता की है,हमें खुद पर और देश पर भरोसा करना होगा।<br /><strong>- सीए ख्याति भंडारी,सीआईसीएएसए अध्यक्ष, आईसीएआई की कोटा शाखा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 11:40:04 +0530</pubDate>
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                <title>जनसंख्या और पर्यावरण में ट्रेड-ऑफ नीति बनाना जरूरी, 2060 तक 20 से 30 करोड़ बढ़ेगी जनसंख्या</title>
                                    <description><![CDATA[जनसंख्या बढ़ेगी तो प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा और पर्यावरण प्रभावित होगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/a-trade-off-policy-between-population-and-the-environment-is-essential/article-142560"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/(12200-x-600-px)-(7)1.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरण के बीच संतुलन आज की सबसे बड़ी वैश्विक चुनौतियों में से एक बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार, भारत की जनसंख्या आने वाले 30-40 वर्षों में लगभग 150 करोड़ से बढ़कर 170 करोड़ (1.5 अरब से 1.7 अरब) तक पहुँच सकती है, आने वाले 30-40 वर्षों में भारत की जनसंख्या में लगभग 20 से 30 करोड़ की वृद्धि होगी। यह वृद्धि तब हो रही है जब फर्टिलिटी रेट और प्रतिस्थापन दर, (रिप्लेसमेंट रेट) दोनों में गिरावट आ चुकी है। इसके बावजूद जनसंख्या का बढ़ना डेमोग्राफिक इनरशिया का परिणाम है, जिसके बाद जनसंख्या स्थिर होने की संभावना है। जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरणीय दबाव के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए ट्रेड-ऑफ अनिवार्य हो गया है। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ेगी, मानवीय आवश्यकताएँ  जैसे पानी, भोजन, ऊर्जा और आवास भी बढ़ेंगी, जो प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। इन संसाधनों की अत्यधिक खपत पर्यावरण पर दबाव डालती है। इसलिए, हमें यह तय करना होगा कि संसाधनों का उपयोग कितनी सीमा तक करें, ताकि पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखा जा सके। भविष्य में इंसान को इस संतुलन को बनाए रखने के लिए कठोर ट्रेड-आॅफ करने होंगे।</p>
<p><strong>ट्रेड-ऑफ कैसे करना होगा?</strong><br />- जनसंख्या बढ़ने के साथ आवास की मांग भी बढ़ेगी। इसके लिए शहरीकरण की प्रक्रिया तेज होगी, लेकिन इस प्रक्रिया में वृक्षों की कटाई और भूमि का अत्यधिक उपयोग हो सकता है। इस समस्या का समाधान वर्टिकल कंस्ट्रक्शन और ग्रीन बिल्डिंग जैसे उपायों में है। इस तरह, कम जमीन में अधिक लोग समा सकते हैं और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया जा सकता है।<br />- बढ़ती जनसंख्या के लिए अधिक खाद्य उत्पादन की आवश्यकता होगी, जिसके लिए अधिक रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक इस्तेमाल किए जाएंगे। हालांकि, इनका अत्यधिक उपयोग मिट्टी की उर्वरता को कम कर सकता है और जल स्रोतों को प्रदूषित कर सकता है। इसका हल जैविक खेती औरड्रिप इरिगेशन और इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट, जो भूमि और जल पर दबाव कम करने में मदद करते हैं।<br />- बढ़ती जनसंख्या के साथ जल और ऊर्जा की मांग भी बढ़ेगी। जल संकट से निपटने के लिए वर्षा जल संचयन और जल पुनर्चक्रण की प्रणालियाँ अपनाई जा सकती हैं। आबादी बढ़ने के साथ बिजली की माँग तेजी से बढ़ेगी जिसे पूरा करने के लिए कोयले पर पूरी तरह निर्भर रहना पर्यावरण के लिए नुकसानदेह होगा।<br />सोलर एनर्जी को बढ़ावा देकर इस दबाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इससे कोयले का उपयोग पूरी तरह खत्म तो नहीं होगा, लेकिन प्रदूषण और पर्यावरणीय दबाव को संतुलित करते हुए ऊर्जा की बढ़ती मांग के साथ एक व्यावहारिक ट्रेड-ऑफ संभव होगा।<br />- औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण प्रदूषण बढ़ेगा, जो जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य समस्याएँ और पारिस्थितिकी तंत्र की हानि का कारण बनेगा। इस समस्या से निपटने के लिए हरित प्रौद्योगिकी और सतत कचरा प्रबंधन के उपायों को अपनाना आवश्यक होगा। कचरे का पुनर्चक्रण, कचरा पृथक्करण, और प्लास्टिक मुक्त समाज की दिशा में कदम बढ़ाने से प्रदूषण को कम किया जा सकता है।<br />- जनवरों के संरक्षण के लिए ट्रेड-ऑफ करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि मानव विकास और जैव विविधता के बीच संतुलन जरूरी है। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ेगी, शहरीकरण और खेती के लिए भूमि का उपयोग बढ़ेगा, जिससे जानवरों के आवास नष्ट होंगे। इसके लिए, सतत शहरीकरण और वन संरक्षण क्षेत्रों का विस्तार आवश्यक है। कृषि भूमि बढ़ाने से भी जानवरों को खतरा होता है, इसलिए जैविक खेती और स्मार्ट कृषि प्रौद्योगिकियाँ अपनानी चाहिए, जो भूमि की उर्वरता और जानवरों के आवास दोनों को संरक्षित करें। साथ ही, जंगली जानवरों के लिए वाइल्डलाइफ कॉरिडोर बनाए जाएं ताकि वे मानव बस्तियों से दूर रहें।</p>
<p><strong>ट्रेड-ऑफ कहाँ तक कर सकते हैं?</strong><br />जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरणीय दबाव को ध्यान में रखते हुए, हमें विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। वर्तमान में प्रदूषण और संसाधनों का संकट गहरा है, और बढ़ती जनसंख्या इसे और कठिन बना देगी। इसलिए, जनसंख्या नियंत्रण ही समाधान है। सरकार को स्पष्ट और सख्त ट्रेड-ऑफ पॉलिसी बनानी होगी, जो मानवीय आवश्यकताओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन तय करे। संसाधन सीमित हैं, और हमें ट्रेड-आॅफ तब तक करना होगा जब तक हम प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक शोषण और जैव विविधता को नष्ट न करें। इसके लिए तकनीकी नवाचार और हरित प्रौद्योगिकियों को अपनाना जरूरी होगा, ताकि हम सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ सकें। बढ़ती जनसंख्या और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए क्या ट्रेड आॅफ करना पड़ेगा? इस विषय पर लोगों की राय को जाना।</p>
<p>तेजी से बढ़ती आबादी और विकास के नाम पर हो रहे अनियंत्रित निर्माण कार्य पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। आबादी बढ़ने के साथ जंगलों, वन भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है, जिससे पर्यावरणीय असंतुलन गहराता जा रहा है। आने वाले समय में 170 करोड़ की आबादी को खाद्य सुरक्षा देना एक बड़ी चुनौती होगी। जब 170 करोड़ होंगे तब पर्यावरण का सिर्फ शब्द ही बचेगा पर्यावरण नहीं बचेगा।निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाला सीमेंट, बजरी, गिट्टी, बिटुमिन और खनिज पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। सड़क निर्माण, शहरी विस्तार और औद्योगिक विकास के कारण इन संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है। इसके साथ ही वन भूमि पर हो रहा अवैध खनन पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। हालांकि वैधानिक खनन के लिए नियम और मानक तय हैं, लेकिन अवैध खनन इन सभी नियमों को दरकिनार कर देता है। लीगल और इललीगल माइनिंग के बीच का अंतर पर्यावरण को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा रहा है। केवल ट्रेड-ऑफ नीति से समस्या का समाधान संभव नहीं है, क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों की अपनी सीमाएं हैं।यदि सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण को लेकर समय रहते सख्त और प्रभावी निर्णय नहीं लिए, तो भविष्य में हालात और भी गंभीर हो सकते हैं।<br /><strong>-तपेश्वर सिंह भाटी, पर्यावरणविद एवं वन्य जीव विशेषज्ञ</strong></p>
<p>जल, जंगल और जमीन का संरक्षण नहीं हुआ तो आने वाले वर्षों में, विशेष रूप से 2050 तक, यह हमारे लिए एक बड़ी चुनौती बन जाएगा। सस्टेनेबिलिटी का अर्थ है प्राकृतिक संसाधनों का ऐसा उपयोग करना कि वे हमारी भावी पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रहें। यदि वर्तमान में हम सस्टेनेबिलिटी को ध्यान में रखकर जल, जंगल और जमीन का उपयोग नहीं करेंगे, तो बढ़ती जनसंख्या के साथ प्राकृतिक संसाधनों में भारी गिरावट आएगी। डिजिटल एरा एक्सपोनेंशियली आगे ग्रोथ कर रहा है, जिससे तकनीक पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है। इसके परिणामस्वरूप ई-वेस्ट में वृद्धि हो रही है, जो पर्यावरण को गंभीर रूप से प्रदूषित कर रहा है। यह हमारे सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। सरकार को अभी से ट्रेड-ऑफ पॉलिसी लागू करनी होगी। साथ ही भावी पीढ़ियों को पानी, बिजली बचाने और अनावश्यक डिजिटल उपयोग से बचने की समझ देना अत्यंत आवश्यक है।<br /><strong>- प्रो. रीना दाधीच, कंप्यूटर विज्ञान विभाग, कोटा विश्वविद्यालय</strong></p>
<p>जनसंख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है कि अब हमें हर स्तर पर ट्रेड-ऑफ करना पड़ेगा। आज लोगों का व्यवहार ऐसा हो गया है कि वे यह सोचे बिना चीजें मंगाते जा रहे हैं कि वे वास्तव में आवश्यक हैं या नहीं। यदि हम जरूरत पर रुकना सीखें, तो यह उपभोग चक्र कहीं न कहीं धीमा हो सकता है। तकनीकी उत्पादों का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, लेकिन अंतत: वे रीसायकल नहीं होते और कचरे में बदलकर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं। इसलिए टिकाऊ और लंबे समय तक उपयोग होने वाली वस्तुओं को अपनाना जरूरी है। नई-नई चीजें बार-बार मंगाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, जिससे पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यदि हम आवश्यकता के अनुसार ही उपयोग करें, तो ओवरऑल कंजम्पशन अधिक विचारशील होगा। इसके लिए हमें जीवन की गति को थोड़ा धीमा करना होगा और अपनी वास्तविक जरूरतों को समझना पड़ेगा।<br /><strong>-डॉ. रचना पटेल,आई सर्जन, राजस्थान आई हॉस्पिटल</strong></p>
<p>पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने के लिए लोगों को अपनी आदतों में परिवर्तन लाना अत्यंत आवश्यक है। आज लोग घरों के सामने, नालियों में कूड़ा डालते हैं और सड़कों पर चारा फेंकते हैं। जंगलों की कटाई लगातार बढ़ रही है और पहाड़ों को बचाना भी जरूरी हो गया है। भावी पीढ़ियों के लिए प्रकृति का संरक्षण करना हम सभी की जिम्मेदारी है। पानी, बिजली और जंगलों का दुरुपयोग हो रहा है, जिससे पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है। वायु प्रदूषण के कारण बीमारियाँ बढ़ रही हैं और औद्योगिक प्रदूषण गंभीर समस्या बन चुका है। कई उद्योग जहरीली गैसें हवा में छोड़ रहे हैं, जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। उद्योगों का कचरा नदियों और नालों में मिलाया जा रहा है, जिससे तालाब और नदियाँ गंदी हो रही हैं। औद्योगिक अपशिष्ट जल का रीसायकल होना चाहिए। पौधारोपण केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि पौधों को बचाना जरूरी है। प्लास्टिक थैलियों का उपयोग बंद होना चाहिए। इन सभी समस्याओं के समाधान के लिए समाज की मानसिकता में परिवर्तन बेहद आवश्यक है।<br /><strong>- डॉ. सुषमा आहूजा,लायंस इंटरनेशनल, संभागीय अध्यक्ष</strong></p>
<p>संसाधान सीमित है ऐसे में ट्रेड ऑफ करना पड़ेगा। साथ ही बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण भी जरूरी होगा। सरकार को सीमित संसाधनों को बढ़ाने के लिए भी प्रयास करना होगा। संसाधनों का पुनर्चक्रण और संरक्षण करने पर भी जोर देना होगा। बढ़ती जनसंख्या के बावजूद अगर संसाधनों का समझदारी से उपयोग किया जाए तो पर्यावरण पर कम दबाव पड़ेगा।<br /><strong>-सचिन मंगल, सीए</strong></p>
<p>जनसंख्या पर नियंत्रण करना अब अनिवार्य हो गया है। लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण जंगल तेजी से समाप्त हो रहे हैं, इसलिए वनों की कटाई को रोकने पर विशेष ध्यान देना होगा। प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव भविष्य को चुनौतीपूर्ण बना रहा है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्ष और अधिक कठिन होंगे। जनसंख्या नियंत्रण के लिए चीन जैसी सख्त और प्रभावी नीति लाने की आवश्यकता है, जिससे जनता जागरूक हो और इस विषय की गंभीरता को समझ सके। ऐसी नीति बनाई जानी चाहिए जो समाज को जिम्मेदारी का एहसास कराए और संतुलित विकास को बढ़ावा दे। तभी हम पर्यावरण, संसाधनों और भविष्य की पीढ़ियों को सुरक्षित रख पाएंगे।<br /><strong>- लोकेश शर्मा, बिजनैसमैन</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Tue, 10 Feb 2026 12:04:52 +0530</pubDate>
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                <title>बीस लाख की आबादी, चार लाख वाहन सड़कों पर हर साल बढ़ रहे 25 से 30 हजार वाहन</title>
                                    <description><![CDATA[जाम में घुटता हाड़ौती शहर, एक माह में ही बढ़ गए 2 से 3 हजार वाहन। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/2-million-population--400-000-vehicles-on-the-roads--25-000-to-30-000-vehicles-increasing-every-year/article-131416"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-11/ews-(6)4.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शिक्षा नगरी के नाम से प्रसिद्ध कोटा अब प्रदूषण नगरी बनती जा रही है। स्थिति यह है कि कोटा में 15.50 लाख मतदाता है। लगभग बीस लाख की जनसंख्या है। ऐसे हालात में अकेले वाहनों की संख्या वर्तमान में चार लाख से ज्यादा है। चार लाख वाहन वर्तमान में सड़कों पर दौड़ रहे हैं। यह स्थिति हर वर्ष बदल जाती है अर्थात प्रतिवर्ष शहर की सड़कों पर 25 से 30 हजार वाहन बढ़ जाते हैं।  जिससे वायुमंडल लगातार दूषित होता जा रहा है। आबादी के साथ-साथ वाहनों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। परिवहन विभाग के अनुसार, वर्तमान में कोटा में चार लाख से अधिक वाहन पंजीकृत हैं। इनमें 15 से 25 हजार वाहन ऐसे हैं जो 15 साल से ज्यादा पुराने हैं और प्रदूषण के सबसे बड़े कारण बन चुके हैं। इन वाहनों से निकलने वाला धुआं न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है बल्कि लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा बन गया है। आरटीओ अधिकारी मनीष कुमार शर्मा ने बताया कि शहर की सड़कों पर 2 लाख 65 हजार 548 टू-व्हीलर, 58 हजार 126 कारें, 7,678 भारी वाहन और 7,308 थ्री-व्हीलर दौड़ रहे हैं। पुराने वाहन जिनका पुन: पंजीकरण नहीं हुआ, वे प्रदूषण फैलाने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।</p>
<p><strong>कोटा का आसमां अब धुएं की चादर</strong><br />बढ़ता प्रदूषण, धुआं, जाम और बीमारियां अब चिंता का विषय बन चुकी हैं। वहीं अब हाड़ौती शहर के आसमां पर अब धुएं की चादर छाने लगी है। कोटा की सड़कों पर दौड़ती यह रफ्तार, शहर की बढ़ती तरक्की का प्रतीक जरूर है, लेकिन इसके साथ यदि समय रहते प्रशासन और आमजन दोनों ने मिलकर ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वर्षों में में लिपटा रहेगा स्वच्छता को ग्रहण लगने के साथ घर-घर में बीमारियां बढ़ेगी।</p>
<p><strong>रफ्तार से बढ़ रहे वाहन, पंजीकरण जारी</strong><br />कोटा परिवहन विभाग के अनुसारअकेले 2024 में  नॉन ट्रांसपोर्ट में टू व्हीलर 16716 रजिस्टर्ड हुए थे जबकि 2025 में 12650 हुए है । इसमें भी सितंबर तक गिरावट रही। वहीं चौपहिया वाहनों में 21490 वाहन  रजिस्ट्रर्ड हुए तथा 2025 में 17670 ही हुए थे। दीपावली के दौरान 2024 में जहां 700 से अधिक वाहन रजिस्टर्ड हुए थे, वहीं इस वर्ष 2025 में 1000 से 1500 नए वाहन अतिरिक्त बिके हैं। केवल हाड़ौती क्षेत्र की बात करें तो दीपावली के दौरान ही 2 से 3 हजार नए वाहन बिक चुके हैं, जिनका पंजीकरण अब भी प्रक्रिया में है। वाहन विक्रेताओं का कहना है कि शहर में बढ़ती क्रय शक्ति और सुविधा की चाह के कारण लोग व्यक्तिगत वाहन खरीदने को प्राथमिकता दे रहे हैं, लेकिन यही प्रवृत्ति कोटा जैसे शिक्षण एवं औद्योगिक शहर की सड़कों पर जाम और प्रदूषण की बड़ी वजह बन चुकी है।</p>
<p><strong>फैक्ट फाइल अप्रेल-सितंबर (2024-25)</strong><br /><strong>ट्रांसपोर्ट</strong><br />थ्री व्हीलर    1556    703<br />टू व्हीलर    15    10<br />चौपहिया वाहन    592    648<br />कुल    2163    1361</p>
<p><strong>नॉन ट्रांसपोर्ट</strong><br />टू व्हीलर    16716    12650<br />चौपहिया वाहन    4774    17670<br />कुल    21490    17670<br />बूंदी, बारां, झालावाड</p>
<p><strong>ट्रांसपोर्ट</strong><br />थ्री व्हीलर    2130    1278<br />टू व्हीलर    16    10<br />चौपहिया वाहन    1462    1572<br />कुल    3608    2870</p>
<p><strong>नॉन ट्रांसपोर्ट</strong><br />टू व्हीलर    44918    35679<br />चौपहिया वाहन    12657    12790<br />कुल    57575    48479</p>
<p><strong>ये है एक्टिव वाहन</strong><br />2 व्हीलर    265548<br />4 व्हीलर प्राइवेट    56824<br />4 व्हीलर टैक्सी    1302<br />बस    513<br />भार वाहन    7165<br />थ्री व्हीलर    7308</p>
<p><strong>एक्सपर्ट व्यू</strong><br /><strong>टू व्हीलर वाहनों का बढ़ा दबाव, शाम को जाम</strong><br />शहर की सड़कों पर टू व्हीलर वाहनों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। वर्तमान में 2,65,548 टू व्हीलर सड़कों पर दौड़ रहे हैं, जो अन्य वाहनों से कहीं अधिक हैं। टैक्सी के मुकाबले निजी कारों की संख्या में भी तेजी से इजाफा देखा जा रहा है। शाम के समय शहर की प्रमुख सड़कों पर जाम लगना अब आम बात बन चुकी है। आरटीओ विभाग समय-समय पर पुराने व मानकों से बाहर चल रहे वाहनों के खिलाफ अभियान चलाकर कार्रवाई करता है। विभाग का पूरा प्रयास रहता है कि कोई भी वाहन बिना निर्धारित मापदंडों के सड़क पर न उतरे। यदि लापरवाही पाई जाती है तो सख्त कार्रवाई की जाती है। उन्होंने बताया कि अप्रैल से सितंबर 2025 के बीच वाहनों की संख्या में पिछले वर्ष की तुलना में गिरावट दर्ज की गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में वाहनों के उपयोग में भी वृद्धि हुई है।<br /><strong>-मनीष कुमार शर्मा, आरटीओ, परिवहन कार्यालय, कोटा</strong></p>
<p><strong>जाम और प्रदूषण से सांस के मरीजों के लिए खतरा</strong><br />पेट्रोलियम पदार्थों से निकलने वाली मोनोआॅक्साइड, सल्फर आॅक्साइड जैसी गैसें सांस और हृदय रोगियों के लिए खतरनाक हैं। अस्थमा, सीओपीडी या क्रॉनिक बीमारियों से ग्रस्त लोगों में यह प्रदूषण सूजन और पल्मोनरी हाइपर रेस्पॉन्सिवनेस जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। बार-बार जाम में फंसने वाले लोग अधिक प्रभावित होते हैं और लंबे समय तक दवाइयों पर निर्भर रहना पड़ता है। प्रदूषण के बढ़ते स्तर से श्वांस संबंधी बीमारियों की आशंका भी बढ़ गई है।<br /><strong>-डॉ. निर्मल शर्मा, वरिष्ठ चिकित्सक, यूनिट हेड, मेडिकल कॉलेज, कोटा</strong></p>
<p>इस बार एक्यूआई शहर के कोटड़ी इलाके में 900 तक पहुंच गया था। शुक्र मनाइए बरसात हो गई वरना हालात बेकाबू जैसे हो सकते थे। प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ने से अस्पतालों में मरीजों की भीड़ बढ़ रही है। श्वांस और फैंफड़ों की तकलीफ लोगों में लगातार बढ़ रही है। वाहन प्रदूषण इसमें एक बड़ा कारण उभर कर आ रहा है। शहर के सभी लोगों को इस पर ध्यान देने की जरूरत है।<br /><strong>- डॉ. केवल कृष्ण डंग, श्वास रोग विशेषज्ञ  </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 04 Nov 2025 16:33:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>कम होती आबादी से परेशान जापान : सबसे ज्यादा आबादी वाले शहरों की लिस्ट में शीर्ष पर आए शहर ने चौंकाया, जानें दुनिया के टॉप -10 शहर </title>
                                    <description><![CDATA[हालांकि टॉप-10 में चीन और भारत के दो-दो शहरों ने अपनी जगह बनाई है। आइए जानते हैं कि मौजूदा साल यानी 2025 में सबसे ज्यादा आबादी वाले दुनिया के शीर्ष-10 शहर कौन से हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/japan-troubled-by-low-population-top-10-cities-of-the/article-128568"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/111-(4)2.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार फिलहाल वैश्विक जनसंख्या 8.2 अरब है, जो 2050 तक बढ़कर 9.7 अरब हो जाएगी। भारत और चीन इस समय दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश हैं। वहीं जापान कई वर्षों से अपनी घटती आबादी से परेशान है। ऐसे में सबसे ज्यादा आबादी वाले शहरों की लिस्ट में शीर्ष पर आया शहर चौंका सकता है। हालांकि टॉप-10 में चीन और भारत के दो-दो शहरों ने अपनी जगह बनाई है। आइए जानते हैं कि मौजूदा साल यानी 2025 में सबसे ज्यादा आबादी वाले दुनिया के शीर्ष-10 शहर कौन से हैं।</p>
<p><strong>टोक्यो लिस्ट में सबसे ऊपर</strong><br />साल 2025 में दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला शहर जापान की राजधानी टोक्यो है। टोक्यो की आबादी 37 मिलियन (3.7 करोड़) है। हालांकि जापान का ग्रोथ रेट बीते साल के मुकाबले घटा है। इसके बावजूद टोक्यो दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर बना हुआ है।</p>
<p><strong>दिल्ली नंबर 2 पर मौजूद</strong><br />भारत की राजधानी दिल्ली 34 मिलियन (3.4 करोड़) निवासियों के साथ दूसरे स्थान पर है। दिल्ली की जनसंख्या में 2.54 की ग्रोथ देखी गई है। दिल्ली ने बीते साल भी इस लिस्ट में दूसरे नंबर को ही पाया था। दिल्ली दुनिया के तेजी से बढ़ते शहरों में जगह बनाए हुए है।</p>
<p><strong>चीन का शंघाई तीसरे नंबर पर</strong><br />चीन का शंघाई बाद 30 मिलियन (3 करोड़ से ज्यादा ) निवासियों के साथ शंघाई तीसरे स्थान पर है। चीन के इस शहर में भी जनसंख्या में करीब 2 फीसदी की ग्रोथ दर्ज की गई है। शंघाई के तेजी से बढ़ने में ग्रामीण आबादी का शहर की ओर पलायन भी एक बड़ी वजह है।</p>
<p><strong>बांग्लादेश की राजधानी ढाका</strong><br />बांग्लादेश की राजधानी ढाका ना सिर्फ दक्षिण एशिया बल्कि पूरी दुनिया के सबसे तेजी से विकसित होते शहरों में से एक है। ढाका में दिल्ली से भी ज्यादा ग्रोथ जनसंख्या की बढ़ोतरी में दिखी है। ढाका 2 करोड़, 46 लाख की आबादी के साथ दुनिया का चौथा बड़ा शहर है।</p>
<p><strong>काहिरा भी शीर्ष 5 में शामिल</strong><br />मिस्र की राजधानी काहिरा को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से दुनिया से सबसे महत्वपूर्ण शहरों में गिना जाता है। काहिरा आबादी के लिहाज से भी दुनिया के शीर्ष पांच देशों में शुमार है। काहिरा की जनसंख्या 1.99 फीसदी की ग्रोथ के साथ इस समय 2 करोड़, 30 लाख है।</p>
<p><strong>ब्राजील के शहर का भी नाम</strong><br />ब्राजील का साओ पाउलो 22 मिलियन से ज्यादा (2 करोड़, 29 लाख) की आबादी के साथ छठवें नंबर पर है। साओ पाउलो ने आबादी की ग्रोथ 0.80 फीसदी रही है। यह शहर लैटिन अमेरिका का एक प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र और यह स्मारकों और संग्रहालयों का घर है।</p>
<p><strong>मेक्सिको सिटी सातवें नंबर पर</strong><br />मेक्सिको सिटी ना सिर्फ मेक्सिको बल्कि दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक है। मेक्सिको सिटी की आबादी 2 करोड़, 27 लाख (22.7 मिलियन) है। इस शहर की जनसंख्या की ग्रोथ 1.10 फीसदी है। मेक्सिको सिटी उत्तरी अमेरिका में स्थित मेक्सिको की राजधानी है।</p>
<p><strong>चीन की राजधानी बीजिंग</strong><br />चीन की राजधानी बीजिंग आबादी के लिहाज से दुनिया का आठवां बड़ा शहर है। बीजिंग की आबादी 2 करोड़, 25 लाख है। इस शहर में जनसंख्या का ग्रोथ 1.84 प्रतिशत है। बीजिंग दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से है। साथ ही हालिया दशकों में तेजी से बढ़ते शहरों में शामिल है।</p>
<p><strong>मुंबई दुनिया में नौवें नंबर पर</strong><br />दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाले शहरों में मुंबई का भी नाम है। भारत की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले मुंबई की आबादी 1.92 फीसदी ग्रोथ के साथ 2 करोड़, 20 लाख है। मुंबई हिन्दी सिनेमा के घर के तौर पर भी जाना जाता है। मुंबई की आबादी हालिया वर्षों में बहुत तेजी से बढ़ रही है।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Oct 2025 12:54:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>शहरों से लुप्त कागा, ढूंढने से भी नहीं मिल रहा कौवा</title>
                                    <description><![CDATA[एयर कंडीशनर की गर्म हवा के कारण टेम्पे्रचर में बढ़ोतरी, बिजली के तारों का जाल फैल रहा।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/crows-are-disappearing-from-cities--and-even-searching-for-them-is-impossible/article-127433"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/_4500-px)20.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। घर की मुंडेर पर बैठकर मेहमान के आने की सूचना देने वाला कागा अब कांव-कांव नहीं करता। आसमान में परवाज भरती उड़ान भी दिखाई नहीं देती। पर्यावरण का अहम हिस्सा माने जाने वाला कौवा शहरी क्षेत्र में इस कदर लुप्त हो गया है कि ढूंढने से भी दिखाई नहीं देते। हालांकि जंगल व दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में नजर आते हैं, लेकिन, संख्या में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। कौवों की लगातार घटती संख्या को लेकर पर्यावरणविद भी चिंतित हैं। उनका कहना है कि वर्तमान में सरंक्षण को लेकर कोई उपाय नहीं किया तो यह प्रजाति लुप्त हो जाएगी। हालांकि, वन विभाग की ओर से भी इस पक्षी के लुप्त होने के कारणों को खोजने के लिए आज तक कोई रिसर्च नहीं की गई। वहीं, इनके संरक्षण के लिए भी कोई कदम नहीं उठाए गए। नवज्योति ने विशेषज्ञों से बात कर इनके लुप्त होने के कारण व संरक्षण के लिए सुझाव जाने। पेश है रिपोर्ट के प्रमुख अंश...</p>
<p><strong>पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव</strong><br />परिस्थितिकी तंत्र में तेजी से बदलाव, जलवायु परिवर्तन एवं शहरों में बढ़ता प्रदूषण कौवे, गौरेया जैसे पक्षियों के अस्तित्व को विलुप्ती की कगार पर पहुंचाने के लिए जिम्मेदार हैं।  शहरों में मोबाइल टावरों से बढ़ता रेडिएशन भी बड़ा कारण हो सकता है। <br /><strong>- रवि कुमार, बायोलॉजिस्ट</strong></p>
<p><strong>रिसर्च करवाकर खोजे जाएं कारण</strong><br />शहरीकरण के नाम पर ऊंचे पेड़ों की अंधाधुंद कटाई कौवों के पलायन का मुख्य कारण है। इससे न केवल हैबीटॉट खत्म हुआ बल्कि ब्रिडिंग भी प्रभावित हो गई। वंश वृद्धि नहीं होने से इनकी संख्या में बढ़ोतरी नहीं हो सकी। वहीं, वायु व ध्वनी प्रदूषण के कारण बचे-कुछ कौवें माइग्रेट कर जंगलों व दूरस्थ ग्रामीण इलाकों की ओर रुख कर गए। इस तरह शहर में इनकी संख्या नगण्य हो गई। <br /><strong>-डॉ. अंशु शर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर, पक्षी विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>रहवास उजड़ा, खाद्यय शृंखला हुई बर्बाद</strong><br />मिट्टी में मौजूद कीड़े-मकौड़े कौओं का भोजन होेते थे, लेकिन किसानों द्वारा पेस्टीसाइड का अत्यधिक उपयोग से कीड़े-मकोड़े नष्ट हो गए। जिससे फूड चैन टूट गई। बरगद, पीपल, नीम जैसे ऊंचे पेड़ों की कटाई होने से रहवास खत्म हो गया। एयर कंडीशनर की गर्म हवा के कारण टेम्पे्रचर में बढ़ोतरी, बिजली के तारों का जाल फैल रहा। वहीं, शहरों में कबूतरों ने कौवों को रिप्लेस कर दिया है।  <br /><strong>-डॉ. नीरजा श्रीवास्तव, प्रोफेसर एवं वन पारिस्थितिकी विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>अज्ञात बीमारी बनी काल, कोविड़ में भी हुई थी मौत</strong><br />वर्ष 1995 से 2000 के बीच ऐसी बीमारी आई थी, जिसकी वजह से कौए व गौरेया का वजूद लगभग समाप्त हो गया था। हालांकि, वर्ष 2010 के बाद इनकी संख्या में इजाफा हुआ लेकिन, कोरोना के दौरान फिर से अज्ञात बीमारी की चपेट में आने से हाड़ौती क्षेत्र में कौवों की मौत हुई थी। पेड़-पौधों की अंधाधुन कटाई जिम्मेदार है। क्योंकि, खेतों में फसलों के दाने खाने व पानी पीने के चलते प्रजनन क्षमता प्रभावित हुई। वर्तमान में अभेड़ा, उम्मेदगंज, दौलतगंज, बोराबांस, गरडिया व गेपरनाथ महादेव मंदिर वन क्षेत्रों में कौवों नजर आते हैं।  <br /><strong>- एएच जैदी, नेचर प्रमोटर</strong></p>
<p><strong>कोयल व रॉक पीजन की बढ़ती तादाद बड़ी वजह</strong><br />शहरी क्षेत्र में कौवों के लुप्त होने के कई कारण हैं। इनमें प्रमुख ब्रिडिंग में कमी होना है। जिसकी बड़ी वजह कोयल है। शहरी क्षेत्र में कोयल की तादाद लगातार बढ़ रही है। यह कभी घौंसला नहीं बनाती। अपना अंडा कौवों घौंसले में देती हैं और उनके अंडों को नीचे गिराकर नष्ट कर देती हैं। अंडे एक रंग व साइज के होने से मादा कौवा, कोयल के अंडे को ही अपना समझ सहेजती रहती है। नतीजन, वंश वृद्धि रुक जाती है। वहीं, परम्परागत भोजन की कमी से यह डम्पिंग यार्ड में मृत मवेशियों पर निर्भर रहने लगे हैं। इनके संरक्षण के लिए वन विभाग को सर्वे करवाना चाहिए ताकि, कौवों की संख्या पता लग सके।  <br /><strong>-प्रो. अनिल छंगाणी, डीन पर्यावरण विज्ञान विभाग, बीकानेर विवि </strong></p>
<p><strong>प्राकृतिक आवास उजड़े, भोजन की उपलब्धता घटी </strong><br /> कौवों की घटती संख्या के लिए कई कारण जिम्मेदार हैं। कौएं ऊंचे पेड़ों पर घौंसले बनाते हैं, जिनका विकास के नाम पर सफाया हो गया। खेतों में विषैले रसायनों का उपयोग भी जिम्मेदार है। <br /><strong>-हर्षित शर्मा, बर्ड्स रिसर्चर</strong></p>
<p><strong>नष्ट हुआ हैबीटाट, फूड चैन टूटने से घटी  </strong><br />कौवा महत्वपूर्ण पक्षी है। इनकी वजह से कई तरह की बीमारियों पर कंट्रोल रहता है। छिपकली, गिरगिट व कीड़े-मकोड़ों के मरने के बाद उसमें कई तरह के बैक्टेरिया उत्पन्न होते हैं, जो वातावरण में फैले रहते हैं, कोवों के नहीं होने से बीमारियां, वायरस फैलने का खतरा बना रहता है। इनके लुप्त होने के पीछे मुख्य कारण पेड़-पौधे खत्म होना है। इनकी जगह पर कंक्रीट के जंगल खड़े हो गए। यह ऊंचे पेड़ों पर अंडे देते हैं, जो अब शहरीकरण की भेंट चढ़ गए। अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क, उम्मेदगंज पक्षी विहार, भैंसरोडगढ़ व शेरगढ़ सेंचुरी में पक्षियों व वन्यप्राणियों के संरक्षण के उपाए किए हैं। साथ ही कारणों की खोज के लिए रिसर्च भी करवा रहे हैं। <br /><strong>-अनुराग भटनागर, उपवन संरक्षक वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>
<p><strong>कबूतरों ने ले ली कौवों की जगह </strong><br />बंदरों व जंगली कबूतरों का कौवों के हैबीटाट क्षेत्र में सेंध लगाना प्रमुख कारण है। कौवें ऊंचे पेड़ों पर अंडे देते हैं लेकिन बंदरों की उछलकूद के कारण घौंसलों से अंडे गिरकर नष्ट हो जाते हैं। वहीं, रॉक  पिजन की बढ़ती संख्या से रहवास खत्म हो गए। इन्हें बसाने के लिए शहरी क्षेत्र में छोटे-छोटे जंगल विकसित करने होंगे, जहां मानव दखल पर पूर्णत: प्रतिबंध हो और ग्रासलैंड-वैटलैंड डवलप किए जाएं। जहां कौवे अपने आप को सुरक्षित महसूस कर सके। <br /><strong>-डॉ. अखिलेश पांडे, वरिष्ठ वन्यजीव चिकित्सक</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 20 Sep 2025 17:27:43 +0530</pubDate>
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                <title>राजस्थान में तेजी से बढ़ता शहरीकरण : विकास या चुनौती...?, बढ़ती आबादी, गांव-शहर में आधी-आधी</title>
                                    <description><![CDATA[ देश-दुनियां में शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है, इससे राजस्थान भी अछूता नहीं है। गांवों से आने वाला हर व्यक्ति विकास की चाह और सुविधा के लिए शहरों की ओर बढ़ रहा हैं]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/rapid-urbanization-development-or-challenge-in-rajasthan-has-increased-population/article-108358"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-03/news-(1)31.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। देश-दुनियां में शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है, इससे राजस्थान भी अछूता नहीं है। गांवों से आने वाला हर व्यक्ति विकास की चाह और सुविधा के लिए शहरों की ओर बढ़ रहा हैं। 1961 में राज्य की कुल आबादी में 16.28 प्रतिशत शहरी थी, वो 2021 तक बढ़कर 26.33 प्रतिशत हो गई है। मौटे अनुमान के तौर पर 2050 तक शहरों में रहने वाली आबादी 50 फीसदी होगी। शहरों में बढ़ता दबाव आधारभूत ढांचे को भी खोखला कर रहा है, नगर नियोजन की प्लानिंग के अभाव में शहरों का बेतरतीब विस्तार हो रहा हैं। प्रदेश के कोटा, जयपुर, अजमेर, जोधपुर, बीकानेर ऐसे शहर हैं, जहां शहरीकरण पिछले तीन दशक में तेजी से बढ़ा है। जबकि जालौर, प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, बाड़मेर और डूंगरपुर सबसे कम शहरीकरण वाले जिले हैं।</p>
<p><strong>माइग्रेशन के मुख्य कारण</strong><br />जनगणना 2011 में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में पुरूष मुख्यत: रोजगार के अवसरों के लिए और महिलाएं मुख्यत: वैवाहिक कारणों से ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन कर रही हैं। जनगणना 2011 के अनुसार राष्टÑीय स्तर पर 794 लाख व्यक्तियों और राजस्थान में 32 लाख व्यक्तियों ने ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन किया, जो अखिल भारतीय स्तर के ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन करने वाले व्यक्तियों का चार प्रतिशत हैं।</p>
<p><strong>राजस्थान में शहरीकरण की वर्तमान स्थिति</strong><br />वर्ष 2001 में राजस्थान की कुल आबादी 565 लाख थी, जिसमें पुरूष 294 लाख और महिला 271 लाख थी। वर्ष 2031 में संभावित 872 लाख, जिसमें पुरूष 444 लाख और महिलाएं 428 लाख होने का अनुमान हैं। शहरीकरण की प्रवृत्ति राजस्थान में भी राष्टÑीय स्तर के समान बढ़ रही है। भारत की कुल जनसंख्या में शहरी जनसंख्या की हिस्सेदारी वर्ष 1961 में 17.97 से बढ़कर वर्ष 2011 में 31.14 प्रतिशत हो गई। इसी तरह राजस्थान की कुल जनसंख्या में शहरी जनसंख्या की हिस्सेदारी में वृद्धि प्रवृत्ति देखी जा सकती है, जो वर्ष 1961 में 16.28 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2011 में 24.87 प्रतिशत हो गर्इं।</p>
<p><strong>सरकार की भावी योजना</strong><br />प्रदेश के छोटे-बडेÞ शहरों के सुनियोजित विकास को लेकर मास्टर प्लान, जोनल डवलपमेंट प्लान तैयार किए जा रहे हैं, ताकि उनमें आधारभूत ढ़ांचे को मजबूत करने की दिशा में पहले ही प्रावधान किया जा सके। 300 से अधिक शहरों मेंं इस दिशा में काम किया जा रहा है, जिन शहरों में मास्टर प्लान की अवधि समाप्त हो गई हैं, उनमें अब तीस साल के लिए प्लान तैयार किए जा रहे हैं। इसके आधार पर भी हर तरह के विकास की योजना को मूर्त रूप देने का खाका तैयार होगा। केन्द्र और राज्य सरकार की संयुक्त शहरी विकास की योजनाओं के जरिए भी इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जा रहा हैं।</p>
<p><strong>गांवों से पलायन क्यों...</strong><br />एक्सपर्ट के अनुसार गांवों में रोजगार के अवसर नहीं मिलने, अच्छी शिक्षा पाने के लिए लोग गांवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र की मुख्य आजीविका कृषि और पशुपालन गिरते भू-जल स्तर के कारण धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। इससे गांवों में रोजगार के कोई साधन नहीं है। औद्योगिक क्षेत्र भी गांवों की बजाय शहरों में ही विकसित हो रहे हैं। ऐसे में लोग शहरों की ओर रूख करते हैं और फिर वहीं पर अपना बसेरा भी बनाने लगते हैं।</p>
<p><strong>शहरीकरण से उत्पन्न प्रमुख समस्याएं</strong><br /><strong>जल संकट:</strong> राजस्थान के बडे जिलों में पानी की उपलब्धता पर संकट<br />परिवहन और ट्रैफिक जाम अव्यवस्थित शहरी परिवहन प्रणाली</p>
<p><strong>आवास संकट: </strong>महंगे घर और बढ़ती स्लम बस्तियां</p>
<p><strong>वायु प्रदूषण:</strong> औद्योगीकरण और वाहनों संख्या बढ़ने से समस्या</p>
<p><strong>शहरी अपराध दर में वृद्धि:</strong> सामाजिक असमानता और बेरोजगारी का असर<br />राजस्थान के जिली में शहरी लिंगानुपात की स्थिति</p>
<p><strong>राजस्थान की शहरी जनसंख्या लाख में</strong><br />वर्ष    महिला    पुरूष    कुल<br />2001    62    70    132<br />2011    81    89    170<br />2021    100    109    209<br />2031    116    126    242<br />(अनुमानित)</p>
<p><strong>राजस्थान में सर्वाधिक और न्यूनतम शहरी लिंगानुपात वाले जिले</strong></p>
<p>जिला    लिंगानुपात<br />टोंक          985<br />बांसवाड़ा         964<br />प्रतापगढ़         963<br />डूंगरपुर         951<br />राजसमंद         948<br />जिला         लिंगानुपात<br />जैसलमेर         807<br />धौलपुर        864<br />अलवर          872<br />गंगानगर         878<br />भरतपुर        887</p>
<p>नगरीय विकास एवं स्वायत्त शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा से बातचीत...</p>
<p><strong>सवाल-शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है, क्या योजना है?</strong><br /><strong>जवाब:</strong> मनमर्जी से शहरों का विस्तार नहीं हो, इसके लिए शहरों के प्लान तैयार किए जा रहे हैं।</p>
<p><strong>सवाल-शहरीकरण बढ़ने के क्या कारण है?</strong><br /><strong>जवाब-</strong>गांवों में पहले आजीविका के साधन थे, शहरों में नहीं आते थे, अब वो खत्म हो गए।</p>
<p><strong>सवाल-सरकार गांवों में रोजगार की व्यवस्था क्यों नहीं करती?</strong><br /><strong>जवाब- </strong>गांवों में जैसे-जैसे कृषि घाटे का सौदा बनी, लोगों ने शहरों की ओर रूख कर लिया।</p>
<p><strong>सवाल-आधारभूत ढ़ांचा कैसे मजबूत करेंगे?</strong><br /><strong>जवाब-</strong>शहरों में आवास, पानी, रोजगार के साथ ही सुनियोजित विकास के लिए योजनाएं लागू की जा रही हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 23 Mar 2025 10:52:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारतीय क्यों अपने देश से पलायन करते हैं...</title>
                                    <description><![CDATA[आर्थिक अवसरों में असमानता, उच्च बेरोजगारी दर और कम औसत वेतन के कारण  विदेश में भारतीय माइग्रेट कर जाते है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/why-indians-migrate-from-their-country/article-107794"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-03/257rtrer74.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। भारत आबादी के मामले में चीन को पीछे करके सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन गया है। जिससे दुनियाभर में बड़े पैमाने पर भारतीय प्रवासियों की साल दर साल संख्या बढ़ती जा रही है। दुनिया के करीब सभी देशों में भारतीय प्रवासी है। वर्ष 2024 की संयुक्त राष्ट्र वर्ल्ड माइग्रेशन रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया में सबसे बड़ी संख्या में अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों का स्थान है जो लगभग 18 मिलियन तक पहुंच चुका है। सबसे ज्यादा भारतीय प्रवासी यूएसए में है। यहां कुल 5.4 मिलियन लोग जो देश की 345 मिलियन की कुल आबादी का करीब 1.6 %  है। इनमें से करीब 2 मिलियन लोग एनआरआई है तो वहीं करीब 3.3 मिलियन लोग ऐसे है। जिन्होंने अमेरिका की नागरिकता ले ली है। दूसरी तरफ देखे तो साल 2023 में 2.16 लाख भारतीयों ने नागरिकता छोड़कर विदेश का रुख किया। 2022 में यह आंकड़ा 2.25 लाख था। आश्चर्य होगा कि दुनिया में  ऐसे देश भी हैं जहां के नागरिक अपने देश को छोड़ कर  जाना ही नहीं चाहते हैं। ये देश हैं यूएई, जापान, जर्मनी, संयुक्त राज्य अमेरिका ऑस्ट्रेलिया, डेनमार्क,फिनलैंड, स्वीडन, ऑस्ट्रिया और नीदरलैंड के लोग अपने उच्च गुणवत्ता वाले जीवन स्तर के कारण अपने देश में ही  रहना पसंद करते हैं। इन देशों के लोगों की तुलना में भारतीय अक्सर बड़ी संख्या में अपना देश छोड़ते हैं। आर्थिक अवसरों में असमानता, उच्च बेरोजगारी दर और कम औसत वेतन के कारण  विदेश में भारतीय माइग्रेट कर जाते है जबकि यूएई, जापान और जर्मनी जैसे देश स्थिर अर्थव्यवस्था और अच्छी नौकरी की संभावनाएं प्रदान करते हैं, जिससे इन देशों के नागरिकों को अपना देश छोड़ने के लिए कम प्रोत्साहन मिलता है।</p>
<p><strong>यूएई में सबसे कम प्रवासी दर</strong><br />एक अध्ययन से पता चला है कि दुनिया भर में यूएई में सबसे कम प्रवासी दर है। यूएई की 99.37 प्रतिशत आबादी ने देश के उच्च जीवन स्तर से प्रभावित होकर देश के भीतर ही रहना चुना वहीं जापान इस मामले में दूसरे स्थान पर है, जहां 98.95 प्रतिशत लोग रहना चुनते हैं। यह वरीयता जापान के मजबूत सांस्कृतिक संबंधों, जीवन की अनुकूल गुणवत्ता और रैंकिंग में देशों के बीच सबसे कम रहने की लागत से प्रभावित है। जर्मन लोग अपनी मातृभूमि में रहना पसंद कर रहे हैं, क्योंकि वहां खुशी का स्तर सूची में तीसरा सबसे ऊंचा है और जीवन की उच्च गुणवत्ता प्रदान करता है। भारतीय लोग कई वजहों से अपना देश छोड़ते हैं। भारत की आबादी बहुत बड़ी है, जिसका एक बड़ा हिस्सा गरीबी में रहता है, जिससे विदेश में बेहतर नौकरी के अवसर और उच्च वेतन बहुत आकर्षित करते हैं। सुविधाओं से भरे जीवन की चाहत भारतीयों को विदेश लेकर जाती है और नागरिकता छोड़ने के लिए प्रेरित करती है। कई भारतीय छात्रों को घर लौटने के बाद नौकरी ढूंढना कठिन लगता है, यही कारण है कि वे उस देश में जहां वह पढ़ रहे है वहां के स्थायी निवासी के लिए आवेदन करते हैं।   </p>
<p><strong>सबसे ज्यादा इन देशों में बसते हैं भारतीय </strong><br />विदेश में बसने के लिए सबसे ज्यादा भारतीय जिन देशों को चुनते हैं उनमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। सबसे ज्यादा भारतीय पलायन करके यही बसते हैं। यहां स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग अच्छा है। बच्चों की पढ़ाई बेहतर होती है। सुविधाएंं ज्यादा हैं और जिंदगी आसान है।</p>
<p><strong>भारतीयों के नागरिकता छोड़ने के कुछ कारण </strong><br />बेहतर शिक्षा, नौकरी के अवसर, मेडिकल सुविधाएं, निवेश के अनुकूल माहौल, विदेशों में अच्छी सैलरी, काम का बेहतर माहौल,  बेहतर रहन-सहन, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा, जलवायु और प्रदूषण जैसी जीवनशैली की समस्याएं हैं। भारत में दोहरी नागरिकता का प्रावधान न होना भी पलायन की बड़ी वजह है। कई देश टैक्स में कई तरह की राहत देते हैं, कारोबार करने के लिए कई तरह की सुविधाएं देते हैं। हेनले पासपोर्ट इंडेक्स 2024 की रिपोर्ट में भारतीय पासपोर्ट 82वें पायदान पर है। भारतीय पासपोर्ट से 58 देशों में वीजा फ्री एंट्री मिलती है, दुनिया के कई देशों का पासपोर्ट भारत के मुकाबले कहीं अधिक मजबूत है जैसे- अमेरिकी पासपोर्ट से 186 देश और ब्रिटिश पासपोर्ट से 190 देशों में वीजा फ्री एंट्री मिलती है। वहीं, फ्रांस से 192, संयुक्त अरब अमीरात से 185, ऑस्ट्रेलिया के पासपोर्ट से 189 देश में बिना वीजा के जा सकते हैं। यही वजह है कि बेहतर कारोबार के लिए भारतीय विदेश पहुंचते हैं। यही वजह है कि विकसित देशों में मिल रही सुविधाएं भारतीयों को अपनी ओर खींचती हैं।</p>
<p>इन देशों की क्वालिटी ऑफ लाइफ बहुत अच्छी है।  पर कैपिटा इनकम हमारे देश से ज्यादा है। हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर बहुत अच्छा है। काफी सर्विसेज वहां सरकार उपलब्ध कराती है। भारत से बाहर जाने का मुख्य कारण डॉलर और रूपए में अंतर है। वहां जाकर कमाई बढ़ जाती है वह उन्हें आकर्षित करता है। दुबई में टैक्स में स्वतंत्रता है। भारत में घर, कार खरीदो तो काफी टैक्स देना पड़ता है।<br /><strong>- डॉ. हर्ष गोयल, कैंसर रोग विशेषज्ञ, कोटा</strong></p>
<p>इन देशों के लोगों को अपने देश से प्यार है। जो कुछ कमाया, जिस मिट्टी से कमाया सब कुछ उसे ही मानते हैं। भारत में जनता को स्वयं अपने देश व अपने काम के प्रति जागरूक होना चाहिए।  इजराइल से सीखना चाहिए कि जब देश पर संकट आया  तो अपने देश के लिए पूरी दुनिया में बसे इजरायली लोग वापिस आकर अपने देश की सुरक्षा में लगे हैं। ऐसी भावना भारत के व्यक्तियों को भी दिखनी चााहिए तभी देश मजबूत होगा और पलायन रूकेगा। भारत में अपार संभावनाएं है पर थोड़ा-सा पैसा कमा कर यहां के लोग बाहर बसने की अपनी इच्छा शक्ति को रोक नहीं पा रहे है। सरकार को भी इस तरफ ध्यान देना चाहिए। कि ऐसा क्योंं हो रहा हैं?<br /><strong>- महावीर प्रसाद नायक, डायरेक्टर, धनलक्ष्मी प्रोपर्टी ग्रुप</strong></p>
<p>पैसा कमाने और बेहतर जीवन यापन के लिए अनेक भारतीय विदेश में जाकर बसते है। भारत छोड़ने के पीछे पैसा सबसे बड़ा कारण है। हालांकि इतनी आवश्यकता नहीं हैं। यदि उन्हें देश में ही उनकी काबिलियत के हिसाब से अवसर मिलें तो शायद प्रतिभाएं पलायन नहीं करेगी। ये देश  हर तरह से विकसित और उन्नत देश है। वहां सभी सुविधाएं है। अर्थव्यवस्था मजबूत है, शिक्षा की गुणवत्ता अच्छी है जर्मनी में विश्व के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय और शिक्षा संस्थान हैं। अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं हैं, सुरक्षित देश हैं। इसलिए वह वहां  रहने में सहज महसूस करते हैं। यही कारण है कि वह देश नहीं छोड़ पाते है। <br /><strong>- लक्ष्मीकांत माहेश्वरी, प्रोपराइटर एल.के.कंस्ट्रक्शन</strong></p>
<p> भारत में आबादी इतनी ज्यादा है। यहां के लोग उच्च शिक्षित और योग्य हो जाते है कि उन्हें जॉब के अवसर उतने नहीं मिलते जितने मिलने चाहिए। उनके लिए देश से बाहर जाना मजबूरी हो जाती है। आना तो वापिस देश में चाहते हैं लेकिन उनकी योग्यता के अनुसार जॉब नहीं मिल पाता । पॉपुलेशन भारत में ज्यादा है जॉब सीमित रहेगी। इन देशों  में आबादी बहुत कम है। जॉब भी है। वहां लोग ईजी गोइंग लाइफ जीते है। भारत में क्वालीफाइड लोगों के लिए सरकारी जॉब कम हो गया है। प्राइवेट जॉब में भी लिमिटेशन हैं। देश छोड़ना उनकी दिली इच्छा नहीं होती मजबूरी हो जाती है।<br /><strong>- एस. के. विजय, सीए</strong></p>
<p>इन देशों  में नागरिकों को सब सुविधाएं मिल रही हैं, जितने शिक्षित हैं उसके हिसाब से कमाई कर रहे हैं। उनकी सरकार पूरी सुविधा देती है। हमारे देश में बच्चों को उतनी सुविधा नहीं मिलती है, इसलिए बच्चे बाहर जाने को तैयार हो जाते हैं। जर्मनी, जापान, यूएई हो वहां का रहन सहन, आबोहवा बहुत अच्छी है। यहां प्रदूषित है वहां  प्रदूषण मुक्त रहता है। हमारे यहां भी सरकार लोगों की आवश्यकताओं व अपेक्षाओं को पूरा करने की कोशिश करती हैं लेकिन यह हो नहीं पाता क्योंकि वहां की आबादी में और भारत की आबादी में बहुत अंतर है। इन देशों में क्वालिटी आफ लाइफ है इसलिए उनलोगों को  उनके देश से बाहर जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती । <br /><strong>- चारू जैन, अध्यक्ष इनरव्हील क्लब कोटा</strong></p>
<p>शिक्षा के प्रति जागरुकता वहां  बहुत ज्यादा है । भारत में इस चीज की कमी है।  वहां  शिक्षा का खर्चा सरकार उठाती है। हमारे यहां  यह सुविधा नहीं है।  हमारे यहां चाहे कितने भी उच्च शिक्षित हो जाए सैलरी का पैकेज कम होता है। वहां मल्टीनेशनल कंपनियां बहुत अच्छी है जिनमें बहुत अच्छे अमाउंट में पैसा दिया जाता है।  वहां रेजीडेंशियल फ्री होता है। वहां के लोग अपना काम खुद करते है जिससे खर्चे कम हो जाते है। उनके देश  में किसी चीज की कमी नहीं है  इसलिए वह अपना देश नहीं छोड़ते है।<br /><strong>- डॉ. सेहबा खान, फिजियोथेरेपिस्ट</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Mar 2025 15:47:07 +0530</pubDate>
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                <title>चंबल की कराइयों में आबाद हो रही वल्चर की दुनिया</title>
                                    <description><![CDATA[वल्चर की विभिन्न प्रजातियों की संख्या में हो रहा इजाफा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-world-of-vultures-is-getting-populated-in-the-ravines-of-chambal/article-104178"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/257rtrer55.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। दुनिया में भले ही लोंग बिल्ड वल्चर खतरे की श्रेणी में हो लेकिन चंबल की कराईयों के बीच इनकी आबादी फल-फूल रही है। प्राकृतिक आवास अनुकूल होने से साउथ ईस्ट एशिया की सबसे बड़ी ब्रिडिंग कॉलोनी बनती जा रही है। मोटे अनुमान के तौर पर चंबल में इस समय 150 से 200 के करीब इंडियन वल्चर है। करीब 50 की संख्या में व्हाइट रुम्पेड वल्चर की संख्या है। गिद्दों की यह प्रजाति चंबल पर नेस्टिंग करती है। हाड़ौती में किंग वल्चर की संख्या भी करीब डेढ़ से दो दर्जन के बीच है।  </p>
<p><strong>दो सौ से ज्यादा पक्षियों का कलरव</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व में विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों की करीब 250 से ज्यादा प्रजातियां हैं। इनमें क्रेसअ‍ेड सरपेंट, ईगल, शॉर्ट टोड,पैराडाइज फ्लाई केचर, सारस क्रेन, स्टोक बिल किंग फिशर, कलर्ड स्कोप्स आउलग्रीन पीजन, गोल्एन ओरिओल,बैबलर,गागरोनी तोता, टुईंया तोता, एलेक जेन्डेरियन पैराकीट, रूडी शेल्डक, वाइट पैलिकन, ग्रेट फलेमिंगो, नोर्दन शावलर, नोर्दन पिंटटेल, बार एडेड गूज, ग्रेलेक गूज, गारगेनी टील समेत पक्षियों की कई प्रजातियां हैं।</p>
<p><strong>मुकुंदरा की गौद में पल रहे वन्यजीव</strong><br />मुकुन्दरा हिल्स को 9 अप्रेल 2013 को टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। यह करीब 760 वर्ग किमी में चार जिलों कोटा, बूंदी, झालावाड़ व चित्तौडगढ़़ में फैला है। करीब 417 वर्ग किमी कोर और 342 वर्ग किमी बफर जोन है। इसमें मुकुन्दरा राष्ट्रीय उद्यान, दरा अभयारण्य, जवाहर सागर व चंबल घडिाल अभयारण्य का कुछ भाग शामिल है।</p>
<p><strong>विरासत से भरा टाइगर रिजर्व</strong><br />प्राकृतिक छटा के साथ मुकुन्दरा विरासत से भरा पड़ा है। रिजर्व में 12वीं शताब्दी का गागरोन किला, 17वीं शताब्दी का अबली मीणी का महल, पुरातात्विक सर्वे के अनुसार 8वीं-9वीं शताब्दी का बाडोली मंदिर समूह, भैंसरोडगढ़ फोर्ट, 19वीं शताब्दी का रावठा महल, शिकारगाह समेत कई ऐतिहासिक व रियासतकालीन इमारतें, गेपरनाथ, गरड़िया  महादेव मंदिर भी है, जो कला-संस्कृति व प्राचीन वैभव को दर्शाते हैं।</p>
<p><strong>औषधीय पौधों की भरमार </strong><br />जेडीबी कॉलेज में वनस्पति विभाग की प्रोफेसर पूनम जायसवाल ने बताया कि मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में शुष्क, पतझड़ी वन, पहाड़ियां नदी, घाटियों के बीच तेंदू, पलाश, बरगद, पीपल, महुआ, बेल, अमलताश, जामुन, नीम, इमली, अर्जुन, कदम, सेमल और आंवले के घने वृक्ष हैं। साथ ही पादक विविधता अधिक मात्रा में है। यहां औषधीय पौधों की भरमार है।</p>
<p><strong>दुर्लभ वन्यजीव का घर टाइगर रिजर्व  </strong><br />चम्बल नदी किनारे बघेरे, भालू, भेड़िए, चीतल, सांभर, चिंकारा, नीलगाय, काले हरिन, दुर्लभ स्याहगोह, निशाचर सिविट केट और रेटल जैसे दुर्लभ वन्यजीव भी देखने को मिलेंगे। इसके अलावा, चीतल, भालू, पैंथर सांभर, जंगली बिल्ली, सियार, जरख, लंगूर, नेवला, झाउ चूहा, जंगली खरगोश, गिल्हरी, चिंटीखोर यानी पैंगोलिन, सिही जंगली चूहा सहित कई वन्यजीव हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 13 Feb 2025 16:53:18 +0530</pubDate>
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                <title>12 साल बाद भी बाघों से आबाद नहीं हो सका मुकुंदरा </title>
                                    <description><![CDATA[एक दशक से उपेक्षा का दंश झेल रहा एमएचटीआर ।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/mukundra-could-not-be-populated-with-tigers-even-after-12-years/article-86193"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/118.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। टाइगर रिजर्व घोषित होने के 12 साल बाद भी मुकुंदरा आबाद नहीं हो सका। जबकि, रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व 2 साल में ही 5 बाघों से आबाद हो गया। अफसरों की निष्क्रियता से मुकुंदरा अब तक 7 टाइगर खो चुका है। वर्तमान में दो बाघ के भरोसे अपना वजूद बचाने को जूझ रहा है। हैरानी की बात यह है, एनटीसीए से मुकुंदरा में दो बाघिन और एक बाघ लाने की परमिशन मिल चुकी है, इसके बावजूद वन अधिकारी एक साल बाद भी नहीं ला सके। विशेषज्ञों का तर्क है, मुकुंदरा में अब तक जो अधिकारी रहे उनमें जंगल को पनपाने की इच्छा शक्ति का अभाव रहा है। जिसका नतीजा यह रहा वर्ष 2020 में बाघों की मौत सिलसिला शुरू हुआ, जो 5 बाघों की मौत के साथ थमा। इसी बीच मुकुंदरा का पहला टाइगर एमटी-1 जंगल से अचानक कहीं गायब हो गया। जिसका आज तक कोई सुराग नहीं लग सका।</p>
<p><strong>एक साल में ही 5 बाघों की मौत, 1 लापता</strong><br />मुकुंदरा में वर्ष 2020 में बाघों की मौत का सिलसिला शुरू हुआ। बाघ एमटी-1 दरा के 82 हैक्टेयर एनक्लोजर से 20 अगस्त 2020 को अचानक गायब हो गया। जिसका आज तक पता नहीं चल सका। विभाग उसे अब भी लापता मान रहा है। जबकि, विशेषज्ञों के अनुसार वह जिंदा नहीं है। इसी तरह बाघ एमटी-3 की 23 जुलाई 2020 को बीमारी के कारण मौत हो गई। इसके बाद 12 दिन बाद 3 अगस्त को बाघिन एमटी-2 की भी मौत हो गई। जबकि, 6 माह पहले ही उसने 2 शावकों को जन्म दिया था, जो भी अकाल मृत्यु का शिकार हो गए। इस तरह एक ही वर्ष में 6 बाघ मुकुंदरा ने खो दिए। </p>
<p><strong>रिजर्व बनने के 5 साल बाद मिला पहला टाइगर</strong><br />9 अप्रेल 2013 को टाइगर रिजर्व घोषित किए जाने के बाद मुकुंदरा को पहला टाइगर मिलने में ही 5 साल लगे थे। वर्ष 2018 में बाघ एमटी-1 को रामगढ़ से शिफ्ट किया गया था। इन पांच सालों में अधिकारियों ने बाघ लाने की कोशिश नहीं की। जब एमटी-1 खुद रणथम्भौर से निकलकर रामगढ़ पहुंचा तो ट्रैंकुलाइज कर एमएचटीआर में छोड़ा गया था। जबकि, इसके ठीक उलट जुलाई 2022 में रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व नोटिफाइड हुआ और इसी वर्ष में बाघ आरवीटीआर-1 के लिए बाघिन आरवीटीआर-2 को शिफ्ट कर दिया गया। बाघ लाने की यह फुर्ति मुकुंदरा के लिए नहीं की गई।</p>
<p><strong>रिलोकेट के लिए बने अलग टीम</strong><br />गांवों को रीलोकेट करने का काम डीसीएफ के पास रहता है, लेकिन उनके पास पहले से ही रिजर्व के कई काम होते हैं, जिससे गांवों के रिलोकेशन के काम में देरी हो जाती है। इसके लिए पूरी अलग टीम सरकार को बनानी चाहिए। जिससे लोगों का रिलोकेशन जल्द से जल्द हो सके। साथ ही ग्रामीणों के साथ चौपाल लगाकर सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश होनी चाहिए।<br /><strong>- रवि नागर, वाइल्ड लाइफ रिसर्चर</strong></p>
<p><strong>राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव</strong><br />मुकुंदरा के आबाद न होने में राजनेतिक इच्छा शक्ति का अभाव है। वर्ष 2020 के बाद से बाघों को बसाने की गति मंद पड़ गई। वहीं, स्टाफ को टाइगर मॉनिटरिंग के लिए गुर सिखाने की आवश्यकता है। सरिस्का और रणथंभौर से मुकुंदरा के स्टाफ को ट्रेनिंग दिलाने की जरूरत है, ताकि टाइगर रिजर्व की बेसिक नॉलेज मिल सके।<br /><strong>- तपेशवर सिंह भाटी, अध्यक्ष पर्यावरण एवं मुकुंदरा समिति</strong></p>
<p><strong>रामगढ़ की तरह हो बाघ बसाने की फुर्ति</strong><br />मुकुंदरा के पिछड़ने में वन अधिकारियों में इच्छाशक्ति का अभाव भी जिम्मेदार है। यहां 12 साल बाद भी 2 बाघ से ज्यादा नहीं हो सके। जबकि, इसके ठीक उलट रामगढ़ में दो साल में ही बाघों का कुनबा 5 हो गया। वहां एक बाघ पर दो बाघिन है और मुकुंदरा में एक ही है। जबकि, दूसरी बाघिन को लाने की हरी झंडी मिल चुकी है, इसके बावजूद एक साल से टाइग्रेस नहीं ला सके।                     <br /><strong>- देवव्रत सिंह हाड़ा, अध्यक्ष पगमार्क फाउंडेशन</strong></p>
<p><strong>यह रही कमियां</strong><br /><strong>टाइगर व प्रेबेस लाने में देरी </strong><br />मुकुंदरा में बाघों को बसाने में त्वरित कार्यवाही का अभाव रहा है। जब सरिस्का टाइगर विहीन हो गया था, तब उसे आबाद करने के लिए एक ही साल में 5 से 7 बाघ शिफ्ट किए थे और यहां एनटीसीए से दो बाघिन और एक बाघ लाने की परमिशन मिले 1 साल बीत गया फिर भी बाघ-बाघिन नहीं लाए। वहीं, भरतपुर से 500 चीतल लाने थे, जो पांच साल में भी पूरे नहीं ला पाए।  एमटी-5 का जोड़ा बनाने के लिए अनमैच्योर ढाई साल की बाघिन ले आए।     <br /><strong>- दौलत सिंह, वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट  </strong></p>
<p><strong>12 सालों में भी विस्थापित नहीं हुए गांव</strong><br />मुकुंदरा में बसे गांवों का विस्थापन में लेट लतीफी भी मुख्य कारण है। जंगल में 14 गांव बसे हैं। जिसमें से अब तक करीब 4 गांवों का ही विस्थापन हो सका। 10 गांवों में अब भी आबादी  है। जिनके मवेशी जंगल चराई करते हैं, जिससे बाघ का हैबीटॉट डिर्स्टब होता है। वहीं, इंसानी दखल भी बढ़ रहा है।            <br /><strong>- एएच जैदी, नेचर प्रमोटर</strong></p>
<p><strong>इनका कहना</strong><br />मुकुंदरा को आबाद करने के प्रयास जारी हैं। एनटीसीए से एक बाघ और दो बाघिन लाने की परमिशन मिल चुकी है। जल्द ही एक और बाघिन लाई जाएगी। तैयारियां पूरी कर ली गई है। मुकुंदरा आदर्श स्थिति में है। यहां वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास हैल्दी और सुरक्षित है। प्रेबेस भी पर्याप्त है। <br /><strong>- अभिमन्यू सहारण, डीएफओ, मुकुंदरा टाइगर रिजर्व</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jul 2024 16:02:47 +0530</pubDate>
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                <title>रिपोर्ट में खुलासा, 170 करोड़ पहुंच जाएगी भारत की आबादी</title>
                                    <description><![CDATA[भारत उस समय दुनिया में जनसंख्या के मामले में सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। रिपोर्ट में कहा गया कि 50-60 वर्षों में दुनिया की आबादी बढ़ने की संभावना है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/report-reveals-india-population-will-reach-170-carores/article-84507"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/populatin---copy.png" alt=""></a><br /><p>वॉशिंगटन। भारत की आबादी को लेकर एक रिपोर्ट जारी की गई है। रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि अगर भारत की आबादी इसी तरह बढ़ेगी, तो 2060 के दशक तक भारत की जनसंख्या करीब 170 करोड़ तक पहुंच जाएगी। हालांकि इस समय भारत की आबादी 141.72 करोड़ है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि इसके बाद जनसंख्या में गिरावट आएगी। रिपोर्ट के अनुसार आबादी में 12 प्रतिशत की गिरावट आने का अनुमान व्यक्त किया गया है। </p>
<p>भारत उस समय दुनिया में जनसंख्या के मामले में सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। रिपोर्ट में कहा गया कि 50-60 वर्षों में दुनिया की आबादी बढ़ने की संभावना है। यह 2080 के दशक में लगभग 1030 करोड़ तक पहुंच जाएगी। इस समय दुनिया की आबादी 820 करोड़ है। आबादी बढ़ने के बाद दुनिया में गिरावट शुरू हो जाएगी। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jul 2024 15:52:05 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>दुनिया का सबसे बड़ा उड़ान भरने वाला पक्षी लुप्त होने के कगार पर</title>
                                    <description><![CDATA[अब सारस की कम होती तादाद और सिमटते आवास पर्यावरण प्रेमियों के लिए चिंता का विषय बन गए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-world-s-largest-flying-bird-is-on-the-verge-of-extinction/article-79514"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-05/duniya-ka-sbse-bada-udan-bharane-wala-pakshe-lupt-hone-ke-kagar-par...kota-news-27.05.2024.jpg" alt=""></a><br /><p>क ोटा। उड़ान भरने वाला दुनिया का सबसे बड़ा पक्षी सारस लुप्त होने की कगार पर खड़ा है। सारस पक्षियों का कुनबा दिनों-दिन घटता जा रहा है। दो दशक पहले तक कोटा संभाग में अपने कलरव से लोगों को आकर्षित करने वाले सारस अब चुनिंदा जलाशयों तक सिमट कर रह गए। जल स्रोतों पर अतिक्रमण, अवैध मतस्य आखेट, इंसानी दखल और कमजोर मानसून के चलते बदली परिस्थितियों से सारस के प्राकृतिक आवास नष्ट हो गए। गोड़ावण व गिद्धों पर पहले ही लुप्त होने का संकट गहरा रहा है, अब सारस की कम होती तादाद और सिमटते आवास पर्यावरण प्रेमियों के लिए चिंता का विषय बन गए। हालांकि, 25 साल बाद कोटा शहर में एक साथ एक ही जगह पर 50 से ज्यादा सारस नजर आए हैं। ऐसे में पक्षी प्रेमियों ने वन विभाग से इनके संरक्षण के लिए कार्य योजना बनाने की मांग उठाई है।</p>
<p><strong>साल दर साल यूं घटी संख्या</strong><br />जैदी ने बताया कि आलनिया में वर्ष 2000 से पहले 92 सारस को पूरे तालाब में देखा गया था। चम्बल के मानस गांव में पहले बीच में टापू था, जिस पर ककड़ी की खेती होती थी। उन्हीं के बीच और दूसरे किनारे पर वर्ष 2001 में 84 सारस को देखा था। उस समय वाइल्ड लाइफ देहरादून के डॉ. वीसी चौधरी भी मेरे साथ थे, जो सारस का झुंड देख खुशी जाहिर की थी लेकिन साल दर साल इनकी संख्या में तेजी से गिरावट होती गई।  </p>
<p><strong>30 से 40 साल होती है उम्र</strong><br />पक्षी विशेषज्ञ डॉ. सुरभि बतातीं हैं, पक्षियों में सारस की उम्र काफी लंबी होती है। यह पक्षी 30 से 40 साल तक जिंदा रहता है। 300 फीट ऊंचाई तक उड़ान भरता है। पानी में झाड़ियां या पेड़-पौधें के बीच घौंसला बनाते हैं, ताकि श्वान सहित अन्य जानवरों से बचा सके। </p>
<p><strong>5 सालों में नहीं बना एक भी घौंसला</strong><br />हाड़ौती नेचुरल सोसाइटी के सदस्य पिछले 34 वर्षो से इस पक्षी पर अध्ययन कर रहे हंै। सूर सागर से उम्मेदगंज तक कम से कम 6 घोसले बनते थे, वहां पिछले 5 वर्षों में एक भी नहीं बना। वर्तमान में  वर्षा कम होने के कारण अधिकतर तालाब सुख गए। गामछ के आसपास के खेतों में अवैध पम्प चल रहे हैं। वर्ष 2001 में यहां 40 से अधिक सारस का जमावड़ा नजर आया था। क्योंकि, उस समय आलनिया बांध में पानी था और पेठा कास्त भी बहुत कम थी। लेकिन वर्तमान में जल दोहन के कारण तालाब ही सूख गए। प्राकृतिक आवास नष्ट हो गए।</p>
<p><strong>वर्ष 2000 के बाद लगातार घटी संख्या</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी बताते हैं, वर्ष 2000 के बाद सारस पक्षियों की संख्या में लगातार गिरावट आई है। पिछले 25 साल पहले कोटा के जलाशयों में जितने सारस दिखाई देते थे, उतने अब नहीं दिखते। पिछले 32 वर्षों से अध्ययन रहा हूं, पहले आसपास के जलाशयों में इनके मेले लगे होते थे। युवा सारस अपने लिए जोड़े बनाते, इनकी कोल और डांस देखने को मिलता था। लेकिन अब हर वेटलैंड पर अतिक्रमण, पानी की मोटरों से जल दोहन, अवैध मतत्य आखेट, इंसानी दखल के चलते इनका प्राकृतिक आवास नष्ट होने लगा है, जो इनकी घटती संख्या के लिए जिम्मेदार है।</p>
<p><strong>दो दशक बाद नजर आए 52 सारस</strong><br />पक्षी विशेषज्ञ डॉ. सुरभि श्रीवास्तव कहतीं हैं, 25 साल बाद यह पहला मौका है, जब सारस एक ही जगह एक साथ 52 की संख्या में नजर आए। रंगपुर इलाके के खेतों में पिछले महीने देखा गया था। गंगाईचा गांव के पास चंबल नदी में इनका बसेरा है। यहा खेतों में सारस (क्रेन) की अठखेलियां पक्षी प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहती है। सुबह जल्दी खेतों में ये दाना चुगने आते हैं और इसके बाद वापस गंगाईचा गांव स्थित चंबल नदी पर चले जाते है। यहां पर पर्याप्त भोजन-पानी की उपलब्धता और समृद्ध जैव विविधता सारस के अनुकूल है। इसलिए यहां सारस आते रहते हैं। अप्रैल से जून तक यही रहते हैं। पिछले कई सालों से सारस की संख्या कम होती जा रही है, जो चिंता का विषय है।</p>
<p><strong>प्राकृतिक आवास नष्ट होना ही सबसे बड़ा कारण</strong><br />बर्ड्स रिसर्चर हर्षित शर्मा कहते हैं, सारस पर संकट के बादल छाने लगे हंै। सारस के रहवास इलाके, जलाशयों के पास मानवीय दखल, खेतों में कीटनाशकों के अधिक इस्तेमाल, अवैध खनन, अतिक्रमण, तालाबों में अवैध मतस्य आखेट से इनका प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है। जिससे यह हालात बन रहे हैं। जबकि, यह किसानों का दोस्त होता है। कीड़े-मकोड़े खाकर फसलों को बचाता है। पिछले कुछ वर्षों से पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ का खमियाजा इंसानों के साथ जीव-जंतुओं पर भी देखा जा सकता है। खेतों में कीटनाशक का उपयोग, पानी की कमी और करंट के तार भी पक्षियों की मौत के कारण बन रहे हैं। इन्हें सुरक्षित रखने के लिए वेटलैंड को बचाना जरूरी है।</p>
<p>वन्यजीव विभाग की जहां भी वनभूमि है, वहां पक्षियों के लिए वेटलैंड विकसित किए जा रहे हैं। उम्मेदगंज पक्षी विहार में तो हम चावल की फसल भी करेंगे, ताकि सारस को भोजन की उपलब्धता हो सके। वहीं, अवैध गतिविधियों पर लगाम लगा दी गई है। यहां तालाब में पानी व मछलियां पर्याप्त होने से प्राकृतिक आवास डवलप हो रहा है। पक्षियों की संख्या में इजाफा हो रहा है। इनके संरक्षण के लिए सुरक्षित रहवास की कार्य योजना पर लगातार कार्य जारी है।<br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ, वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>
<p><strong>संरक्षण के सुझाव</strong><br />पक्षी प्रेमियों ने सारस के संरक्षण के लिए विभिन्न सुझाव दिए हैं। <br />-वेटलैंड को अतिक्रमण से बचाएं।<br />-जिन इलाकों में आबादी वहां कंट्रेक्शन होने से रोका जाए।<br />-तालाबों में भू-जल दोहन के लिए लगी मोटरें बंद करवाई जाए।<br />-अवैध मतस्य आखेट, अवैध खनन, अवैध गतिविधियां रोकी जाए। <br />-वन विभाग द्वारा वेटलैंड पर चावल, मक्का, ज्वार की फसल करें ताकि इन्हें आसानी से भोजन मिल सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 May 2024 14:50:00 +0530</pubDate>
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                <title>आजमपुर में पेयजल संकट, नहीं बुझ रही प्यास  </title>
                                    <description><![CDATA[कई बार तो ग्रामीणों को पानी की समस्या से ग्रसित होकर आसपास के गांवों से कुएं -बोरवेल व हैण्डपम्प से पानी लाने को मजबूर होना पड रहा है। एक तरफ तो बढ़ती गर्मी ने सितम ढा रखा है।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/baran/drinking-water-crisis-in-azampur--thirst-not-quenched/article-77839"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-05/12.png" alt=""></a><br /><p>रायपुर।  ग्राम पंचायत दुबलिया का गांव आजमपुर के ग्रामीणों को पेयजल के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है। महिलाओं को सुबह से पीने के पानी के लिए काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीणों को दूर दराज से हैण्डपम्प व कुएं से पानी लाना पड़ रहा है। गांव की आबादी 2 हजार है।  जानकारी अनुसार ग्राम पंचायत दुबालिया के गांव आजमपुर में 6 माह पूर्व टंकी का निर्माण तो करवा दिया लेकिन गागरिन पेयजल पाइपलाइन से टंकी का कनेक्शन नहीं करने से ग्रामीणों को पेयजल सुविधा नहीं मिल पा रही है, जिस कारण से ग्रामीणों को पानी की समस्या से जुझना पड़ रहा है। कई बार तो ग्रामीणों को पानी की समस्या से ग्रसित होकर आसपास के गांवों से कुएं -बोरवेल व हैण्डपम्प से पानी लाने को मजबूर होना पड रहा है। एक तरफ तो बढ़ती गर्मी ने सितम ढा रखा है, वहीं दूसरी ओर पेयजल व्यवस्था ठप होने से ग्रामीणों को भीषण गर्मी में पानी के लिए तरसना पड़ रहा है। </p>
<p><strong>इनका कहना है..</strong><br />पीने के पानी के लिए ग्रामीणों को इधर-उधर भटकना पड़ रहा है। कई बार अधिकारियों को पेयजल समस्या से अवगत करवाया लेकिन पानी की समस्या का समाधान नहीं हुआ। <br /><strong>-पप्पू बैरागी, ग्रामीण </strong></p>
<p>गांव में भीषण गर्मी में पानी की टंकी शोपीस बनी हुई है, ग्रामीणों को पानी के लिए तरसना पड़ रहा है। <br /><strong>- बालचंद डांगी, ग्रामीण  </strong></p>
<p>6 माह से टंकी का निर्माण हो चुका है लेकिन गागरीन पेयजल पाइपलाइन से फजर टंकी को नहीं जोड़ने से इस टंकी का ग्रामीणों को गर्मी में लाभ नहीं मिल रहा है। गांव की महिलाओं को पेयजल के लिए काफी परेशानी झेलनी पड़ रही है। इस संबंध में अधिकारी को कई बार अवगत करा चुके हैं लेकिन टंकी में पेयजल का पाइप लाइन कनेक्शन नहीं हुआ है। <br /><strong>- दयाराम डांगी, सरपंच </strong> </p>
<p>आजमपुर की पेयजल टंकी को फेब्रिकेशन टीम के आने के बाद एक सप्ताह में पेयजल पाइपलाइन को जोड़ दिया जाएगा। जिसके पेयजल की समस्या नहीं रहेगी।  <br /><strong>-दीपक झा,जेजेएम, प्रोजेक्ट अधीक्षण अभियंता  </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बारां</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 May 2024 16:39:08 +0530</pubDate>
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