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                <title>interference - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>भारतीय विदेश मंत्रालय की पाकिस्तान को दो टूक: खुद का रिकॉर्ड खराब, भारत के आंतरिक मामलों में बोलने का नहीं है अधिकार</title>
                                    <description><![CDATA[विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की टिप्पणी को भारत के आंतरिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप करार दिया। प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के खराब ट्रैक रिकॉर्ड वाले देश को दूसरों को उपदेश देने का कोई अधिकार नहीं है। यह बयान कट्टरता से प्रेरित एक सुनियोजित राजनीतिक हमला है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/indian-foreign-ministry-bluntly-spoils-its-own-record-on-pakistan/article-157631"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-06/india2.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति की टिप्पणी को भारत के आंतरिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप करार देते हुए कहा है कि जिस देश का खुद का मानव अधिकार का रिकॉर्ड खराब है उसे दूसरों को उपदेश नहीं देना चाहिए। विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भारत में मुस्लिम धार्मिक स्थलों को लेकर की गयी पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की टिप्पणी पर शनिवार देर रात सख्त प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उसे सिरे से खारिज कर दिया।</p>
<p>जायसवाल ने कहा , “भारत पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा की गयी अनावश्यक टिप्पणियों को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करता है। किसी भी स्थिति में भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है।“ उन्होंने कहा कि ये टिप्पणियाँ विशेष रूप से हास्यास्पद हैं, क्योंकि मानवाधिकारों के मामले में पाकिस्तान का अपना रिकॉर्ड अत्यंत खराब रहा है, जो वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय है। विभिन्न धर्मों के अल्पसंख्यकों को व्यवस्थित रूप से निशाना बनाने और उनका उत्पीड़न करने का पाकिस्तान का लंबा इतिहास है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि इस वास्तविकता को देखते हुए पाकिस्तान के राष्ट्रपति की टिप्पणियों को केवल एक सुनियोजित राजनीतिक हमले के रूप में ही देखा जा सकता है, जो पाकिस्तान की कट्टरता और घृणा पर आधारित राष्ट्रीय नीतियों से प्रेरित है।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 21 Jun 2026 14:23:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>स्कूल-कॉलेजों के विवादास्पद मुद्दों में राजनीतिक हस्तक्षेप कितना सही?</title>
                                    <description><![CDATA[ किसी भी शिक्षण संस्थान में जब धार्मिक और राजनीतिक मुद्दों की घुसपैठ होने लगती है तो वह अपने उद्देश्य शिक्षा से भटकने लगते हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/how-right-is-the-political-interference-in-the-controversial-issues-of-schools-and-colleges/article-5168"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-02/school_college_politics.gif" alt=""></a><br /><p>पिछले कुछ वर्षों में देश के शिक्षण संस्थान नकारात्मक खबरों की वजह से चर्चा का विषय बन रहे हैं। किसी भी शिक्षण संस्थान में जब धार्मिक और राजनीतिक मुद्दों की घुसपैठ होने लगती है तो वह अपने उद्देश्य शिक्षा से भटकने लगते हैं। देश के शिक्षण संस्थानों में भविष्य तैयार होता है। यहां विवादों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। जिस प्रकार का वातावरण विद्यार्थियों को शिक्षण संस्थानों में मिलेगा उनकी विचाराधारा और नजरिया वैसा ही बनता चला जाएगा। किसी भी स्कूल-कॉलेज-विश्वविद्यालय के नियम और अनुशासन होते हैं। यदि वहां कोई भी इश्यू उठता है तो वह उनका आंतरिक मामला होता है और उसे अकेडमिक इश्यू की तरह देखा जाना चाहिए ना कि राजनीतिक दृष्टि से। शिक्षण संस्थानों की नींव अनुशासन होती है। यहां विद्यार्थियों को विकसित सोच वाला व्यक्तित्व प्रदान किया जाता है। विद्यार्थी शिक्षा प्राप्ति के उद्देश्य से यहां प्रवेश करते हैं। इन संस्थानों में विद्यार्थी निरंतर सीखने की अवस्था से गुजर रहे होते हैं। उनका लक्ष्य शिक्षा प्राप्त करना होना चाहिए। जब भी किसी स्कूल-कॉलेज या विश्वविद्यालय में संवेदनशील मुद्दें उठते हैं तो वहां के शिक्षक अपने विद्यार्थियों की समस्या का समाधान करने में सक्षम होते हैं। शिक्षक, अपने विद्यार्थी को बेहतर समझते हैं और उनकी समस्याओं को आसानी से समझकर सुलझा सकते हैं, बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के। वैसे भी गुरु यानी शिक्षक को भगवान से ऊंचा दर्जा दिया गया है। वह विद्यार्थियों का मार्ग प्रशस्त करते हैं। उन्हें अंधेरे से उजाले की ओर शिक्षा के माध्यम से लेकर जाते हैं। तभी कहा गया है-‘गुरु गोविंद दोऊ खडेÞ काके लागूं पाए, बलिहारी गुरु आपणे गोविंद दियो बताय।’ इसलिए अकेडमिक इश्यू को राजनीतिक रंग देने के बजाय शिक्षण संस्थानों व उनके शिक्षकों को यह पावर दी जानी चाहिए कि किसी भी तरह का संवेदनशील मुद्दा यदि उनके संस्थान में उठता है तो वह उसे अपने स्तर पर सुलझाए ना कि उसमें राजनीतिक दखलंदाजी हो। इसके लिए एक कमेटी गठित की जा सकती है जिसमें उस शिक्षण संस्थान के ही सदस्य हों। वह चर्चा करके स्थानीय स्तर पर ही समाधान निकालने का प्रयास करें। जिससे विद्यार्थियों की पढ़ाई भी प्रभावित ना हो। यह उनका आंतरिक मामला ही रहे, राजनीतिक मुद्दा नहीं बनने पाए। यदि फिर भी नहीं सुलझा पाते हैं तो कोर्ट फैसला करें। क्योंकि जब संवेदनशील मुद्दे शिक्षण संस्थानों में उठते हैं वह राजनीतिक गलियारों या देश में सुर्खियां बनते हैं। तब भी कोर्ट की शरण ली जाती है। स्कूल स्तर के लिए शिक्षा बोर्ड, कॉलेज के लिए विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय के लिए यूजीसी को फैसला करना चाहिए। यदि कमेटी स्कूल, कॉलेज व विश्वविद्यालय स्तर पर बनेगी तो इस तरह के मुद्दे परिसर के अंदर ही रहेंगे, कैम्पस से बाहर नहीं आएंगे। इससे ना तो राजनीतिक हस्तक्षेप होगा और ना ही देश में तनाव का माहौल बन सकेगा।</p>
<p><span style="background-color:#ffff99;color:#ff0000;"><strong>नरेन्द्र चौधरी</strong></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 28 Feb 2022 11:48:54 +0530</pubDate>
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