<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://dainiknavajyoti.com/importance/tag-13068" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Dainik Navajyoti Rising Rajasthan RSS Feed Generator</generator>
                <title>importance - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
                <link>https://dainiknavajyoti.com/tag/13068/rss</link>
                <description>importance RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>मातृभाषा का महत्व और अस्तित्व की रक्षा</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है। ]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/importance-and-survival-of-mother-tongue/article-144033"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/1200-x-600-px)24.png" alt=""></a><br /><p>21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है। वास्तव में यह दिवस दुनिया भर में भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देने के साथ ही साथ विभिन्न मातृभाषाओं के संरक्षण के महत्व को समझाने के लिए समर्पित है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह दिवस मातृभाषाओं के संरक्षण और संवर्धन को बढ़ावा देने, भाषाई विविधता और बहुभाषावाद को प्रोत्साहित करने,शिक्षा में मातृभाषा के महत्व को उजागर करने तथा लुप्त होती भाषाओं के प्रति जागरूकता फैलाने के क्रम में मनाया जाता है। मातृभाषा केवल संचार का ही माध्यम नहीं होती है, बल्कि यह व्यक्ति की पहचान, उसकी सनातन संस्कृति, परंपराओं और सोच का मुख्य आधार होती है। नेल्सन मंडेला का यह मानना था कि यदि आप किसी व्यक्ति से उस भाषा में बात करते हैं जिसे वह समझता है, तो वह उसके दिमाग में जाती है। यदि आप उससे उसकी मातृभाषा में बात करते हैं, तो वह उसके दिल तक पहुंचती है। यदि हम मातृभाषा के महत्व की बात करें तो मातृभाषा का महत्व अत्यंत व्यापक और गहरा होता है, क्योंकि यही भाषा व्यक्ति के जीवन की पहली सीख, भावनाओं की अभिव्यक्ति और सोचने समझने का आधार बनती है।</p>
<p><strong>मातृभाषा का संरक्षण : </strong></p>
<p>मातृभाषा के माध्यम से बच्चे दुनिया को आसानी से समझते हैं, इसलिए शुरुआती शिक्षा यदि अपनी भाषा में मिले तो ज्ञान अधिक प्रभावी ढंग से ग्रहण होता है और आत्मविश्वास भी बढ़ता है। यह भाषा व्यक्ति को उसकी संस्कृति, परंपराओं और पहचान से जोड़ती है तथा सामाजिक संबंधों को मजबूत बनाती है। मातृभाषा का संरक्षण केवल एक भाषा को बचाना नहीं, बल्कि पूरी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखना है और यही भी कारण है कि यूनेस्को सहित विश्व भर की संस्थाएं मातृभाषाओं के संरक्षण और उपयोग पर विशेष जोर देती हैं। आज बच्चे अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं तो उनकी समझ, रचनात्मकता और आत्मविश्वास अधिक मजबूत होता है। बहरहाल, यदि हम यहां पर इस दिवस के इतिहास की बात करें तो इस दिवस की शुरुआत यूनेस्को ने वर्ष 1999 में की थी और वर्ष 2000 से इसे वैश्विक स्तर पर मनाया जाने लगा। हर वर्ष इस दिवस की एक थीम रखी जाती है और अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस और इस साल की थीम क्रमशः सतत विकास के लिए भाषाओं को महत्वपूर्ण बनाएं, तथा बहुभाषी शिक्षा पर युवाओं की आवाज़,वर्ष 2026 की थीम रखी गई है। इस साल यानी कि वर्ष 2026 की थीम का मतलब यह है कि शिक्षा प्रणाली में कई भाषाओं, विशेष रूप से मातृभाषा, के महत्व को लेकर युवाओं के विचारों, उनके अनुभवों तथा विभिन्न सुझावों को महत्व दिया जाए।</p>
<p><strong>संयुक्त राष्ट्र के अनुसार :</strong></p>
<p>इस थीम का उद्देश्य यह बताना है कि जब बच्चों को शुरुआती शिक्षा,विशेषकर प्राथमिक शिक्षा उनकी अपनी भाषा में मिलती है तो उनकी समझ बेहतर होती है, उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और सीखने में रुचि भी अधिक रहती है। साथ ही, युवाओं को अपनी भाषाई पहचान और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए प्रेरित करना भी इसका लक्ष्य है। वास्तव में आज के समय में शिक्षा नीतियों और व्यवस्थाओं में युवाओं की भागीदारी बहुत ही जरूरी है, क्योंकि वही भविष्य के समाज का निर्माण करते हैं। इसी सोच को बढ़ावा देने के लिए यूनेस्को हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के माध्यम से जागरूकता फैलाता है। मातृभाषा के संरक्षण और संवर्धन को लेकर आज वैश्विक और स्थानीय स्तर पर गहरी चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि किसी भी समाज की संस्कृति, स्मृति और पहचान की संवाहक होती है। जब एक मातृभाषा दम तोड़ती है, तो उसके साथ सदियों का पारंपरिक ज्ञान और अद्वितीय विश्वदृष्टि भी लुप्त हो जाती है।इस क्रम में संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, हर दो सप्ताह में एक भाषा विलुप्त हो जाती है और विश्व एक पूरी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत खो देता है।</p>
<p><strong>विशेषज्ञों का अनुमान है :</strong></p>
<p>यूनेस्को के ही अनुसार, विश्व की लगभग 6,000 से अधिक भाषाओं में से करीब 43 प्रतिशत लुप्तप्राय की श्रेणी में हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि संरक्षण के ठोस प्रयास नहीं किए गए, तो इस सदी के अंत तक दुनिया की आधी भाषाएं गायब हो सकती हैं। यदि हम यहां पर भारत की स्थिति की बात करें तो एक सर्वे के अनुसार, पिछले 50 वर्षों में भारत ने अपनी लगभग 250 भाषाएं खो दी हैं। भारत में वर्तमान में लगभग 196 भाषाएं ऐसी हैं, जिन्हें यूनेस्को ने असुरक्षित माना है। यह चिंताजनक बात है कि आज के समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़त बनाने की होड़ में अंग्रेजी जैसी भाषाओं का प्रभुत्व बढ़ रहा है। भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है, जिससे उन्हें प्रशासनिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक संरक्षण मिलता है। यह भाषाई विविधता की रक्षा का एक मजबूत आधार है। आज भाषाओं को सांस्कृतिक और साहित्यिक प्रोत्साहन दिया जा रहा है।लोकभाषाओं और बोलियों के उत्सव भी आयोजित किए जाते हैं, साहित्य सर्जन पुरस्कारों की भी व्यवस्था हमारे यहां है। अंत में यही कहूंगा कि मातृभाषा का संरक्षण केवल सरकार या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह एक व्यक्तिगत और सामाजिक कर्तव्य भी है।</p>
<p><strong>-सुनील कुमार महला</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/importance-and-survival-of-mother-tongue/article-144033</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/opinion/importance-and-survival-of-mother-tongue/article-144033</guid>
                <pubDate>Sat, 21 Feb 2026 12:35:22 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2026-02/1200-x-600-px%2924.png"                         length="505153"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Jaipur KD]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मां का दूध : जीवन का पहला अमृत</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[भारतीय संस्कृति में मां को देवी का दर्जा दिया गया है।]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/mothers-milk-first-nectar-of-life/article-122706"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-08/1ne1ws11.png" alt=""></a><br /><p>भारतीय संस्कृति में मां को देवी का दर्जा दिया गया है और मां के दूध को अमृत माना गया है। प्रत्येक वर्ष अगस्त माह के प्रथम सप्ताह में मनाया जाने वाला विश्व स्तनपान सप्ताह इसी महत्वपूर्ण संदेश को घर-घर तक पहुंचाने का एक सार्थक प्रयास है। भारत जैसे विकासशील देश में, जहां आज भी शिशु मृत्यु दर चिंता का विषय है, वहां स्तनपान के प्रति जागरूकता लाना न केवल आवश्यक है बल्कि अत्यंत महत्वपूर्ण भी है। हमारे देश की यह विडंबना है कि जिस परंपरा को हमारे पूर्वजों ने सदियों से अपनाया है, आज उसी को लेकर हमें जागरूकता अभियान चलाना पड़ रहा है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने अपनी सबसे बहुमूल्य विरासत को खोने का खतरा मोल ले लिया है।</p>
<p><strong>मां का दूध सर्वोत्तम :</strong></p>
<p>भारत में स्तनपान की परंपरा सदियों पुरानी है और हमारे धर्मग्रंथों में भी मां के दूध की महत्ता का विस्तृत वर्णन मिलता है। आयुर्वेद में तो स्पष्ट रूप से कहा गया है कि नवजात शिशु के लिए मां का दूध सर्वोत्तम आहार है। महर्षि चरक और सुश्रुत ने अपने ग्रंथों में इसका वैज्ञानिक आधार भी दिया है। परंतु आज की स्थिति यह है कि आधुनिकता की दौड़ में कहीं न कहीं हम इस प्राचीन ज्ञान को भूलते जा रहे हैं। बाजार में उपलब्ध कृत्रिम दूध के आकर्षक विज्ञापन और पश्चिमी जीवनशैली की नकल के कारण कई माताएं स्तनपान के महत्व को समझ नहीं पा रहीं। यह एक गंभीर सामाजिक समस्या है जिसका समाधान तत्काल आवश्यक है।</p>
<p><strong>सभी पोषक तत्व मौजूद :</strong></p>
<p>हमें समझना होगा कि विज्ञान और तकनीक की प्रगति के बावजूद प्रकृति द्वारा दिया गया यह उपहार अभी भी अतुलनीय है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार मां का दूध नवजात शिशु के लिए सबसे उत्तम और संपूर्ण आहार है। इसमें वे सभी पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जो एक शिशु के समुचित विकास के लिए आवश्यक हैं। मां के दूध में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन और खनिज लवण सही अनुपात में पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें एंटीबॉडी भी होते हैं, जो शिशु को विभिन्न संक्रमणों से बचाते हैं। यही कारण है कि स्तनपान करने वाले बच्चे कम बीमार पड़ते हैं और उनका शारीरिक व मानसिक विकास बेहतर होता है। मां का दूध न केवल शिशु को पूर्ण पोषण प्रदान करता है, बल्कि उसे कुपोषण से भी बचाता है।</p>
<p><strong>ठोस कदम उठाएं :</strong></p>
<p>अतिसार या दस्त भारतीय शिशुओं में होने वाली एक आम समस्या है और स्वच्छता की कमी तथा दूषित पानी के कारण यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। भारत में हर साल हजारों बच्चे डायरिया के कारण अपनी जान गंवाते हैं, जो कि एक राष्ट्रीय त्रासदी है। मां का दूध पूर्णत: स्वच्छ और जीवाणु रहित होता है तथा इसमें प्राकृतिक रूप से संक्रमण रोधी तत्व पाए जाते हैं जो शिशु को अतिसार जैसी बीमारियों से बचाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्तनपान करने वाले बच्चों में दस्त की समस्या कम देखी जाती है। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे नकारा नहीं जा सकता। यदि हम केवल स्तनपान को बढ़ावा देकर भी हजारों बच्चों की जान बचा सकते हैं तो यह हमारा नैतिक दायित्व बनता है कि हम इस दिशा में ठोस कदम उठाएं।</p>
<p><strong>जन्म के तुरंत बाद :</strong></p>
<p>यूनिसेफ के अनुसार यदि सभी शिशुओं को केवल स्तनपान कराया जाए, तो प्रतिवर्ष लाखों शिशुओं की जान बचाई जा सकती है। यह कोई छोटा आंकड़ा नहीं है बल्कि करोड़ों परिवारों की खुशी का सवाल है। हमें समझना होगा कि शिशु मृत्यु दर कम करना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारतीय बाल रोग विशेषज्ञों की स्पष्ट सलाह है कि शिशु को जन्म के तुरंत बाद से छह माह तक केवल मां का दूध देना चाहिए। इस दौरान पानी तक की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि मां के दूध में पर्याप्त मात्रा में पानी होता है। छह माह के बाद स्तनपान जारी रखते हुए ऊपरी आहार शुरू करना चाहिए और दो साल तक स्तनपान जारी रखने की सलाह दी जाती है। परंतु भारतीय समाज में अभी भी कई भ्रांतियां प्रचलित हैं। कुछ माताएं सोचती हैं कि पहले कुछ दिनों का गाढ़ा पीला दूध हानिकारक होता है, जबकि यह कोलोस्ट्रम शिशु के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।</p>
<p><strong>भावनात्मक जुड़ाव :</strong></p>
<p>चिकित्सा अनुसंधान बताते हैं कि स्तनपान कराने वाली माताओं में स्तन कैंसर और डिम्बग्रंथि के कैंसर का जोखिम कम हो जाता है। इसके अलावा यह मां और बच्चे के बीच भावनात्मक जुड़ाव बढ़ाता है, जो बच्चे के मानसिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह परिवार की आर्थिक स्थिति पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है क्योंकि कृत्रिम दूध खरीदने की आवश्यकता नहीं होती। सरकार को स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए व्यापक और प्रभावी कार्यक्रम चलाने चाहिए। प्रकृति ने मां के दूध के रूप में शिशु के लिए सबसे उत्तम आहार का प्रावधान किया है। हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस प्राकृतिक वरदान का सदुपयोग करें और आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ बनाने में अपना योगदान दें।</p>
<p><strong>-देवेन्द्रराज सुथार</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/mothers-milk-first-nectar-of-life/article-122706</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/opinion/mothers-milk-first-nectar-of-life/article-122706</guid>
                <pubDate>Tue, 05 Aug 2025 11:53:33 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2025-08/1ne1ws11.png"                         length="227531"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Jaipur KD]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हमारे जीवन में पिता का योगदान और महत्व </title>
                                    <description>
                        <![CDATA[पिता हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। फादर्स डे पिता का सम्मान करने का दिन है। एक पिता का रिश्ता बहुत ही गहरा होता है और यह दिन इस रिश्ते को और मजबूत करता है। फादर्स डे हमें पिता के प्रति अपने प्यार, प्रशंसा कृतज्ञता को व्यक्त करने का अवसर देता है। यह दिन दुनिया भर में पिता के बलिदानों की सराहना करता है। ]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/father-s-contribution-and-importance-in-our-life/article-12546"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/k-2.jpg" alt=""></a><br /><p>पिता हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। फादर्स डे पिता का सम्मान करने का दिन है। एक पिता का रिश्ता बहुत ही गहरा होता है और यह दिन इस रिश्ते को और मजबूत करता है। फादर्स डे हमें पिता के प्रति अपने प्यार, प्रशंसा कृतज्ञता को व्यक्त करने का अवसर देता है। यह दिन दुनिया भर में पिता के बलिदानों की सराहना करता है। हालांकि हर रोज उनके लिए खास माना जाता है ,लेकिन यह दिन उनके लिए की गई सारी मेहनत को संजोने के लिए बहुत खास है। यह दिन उस प्यार को मनाता है जो एक व्यक्ति अपने पिता के प्रति महसूस करता है। पिता का महत्व शब्दों से परे है क्योंकि पिता वह व्यक्ति है जो अपने बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के लिए अथक प्रयास करता है ।</p>
<p>ऐसे सभी पिताओं की भावना का सम्मान करने के लिए हर साल फादर्स डे के रूप में एक विशेष दिन मनाया जाता है ताकि समाज में पिताओं के प्रयासों और योगदान को याद किया जा सके।  यह दिन हमें अपने पिता को उनके सभी बिना शर्त प्यार, स्रेह, योगदान और बलिदानों के लिए धन्यवाद व्यक्त करने का अवसर देता है। हमें अपने पिता को सम्मान देने और धन्यवाद कहने का बहुत बड़ा मौका देता है फादर्स डे, इसलिए इस दिन हर बच्चे को पूरे मन से अपने पिता के प्रति अपना प्यार का इजहार और अपने पिता के लिए अपनी कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए। फादर्स डे का मुख्य उद्देश्य पिता का सम्मान और उनके योगदान को याद कराना हैं।</p>
<p><strong><span style="color:#99cc00;">पहले गुरु</span>:</strong> माता-पिता इंसान  के पहले गुरु या शिक्षक होते हैं जहां माता अपने बच्चों को मान मर्यादा सिखाती हैं। वही पिता अपने बच्चों को बाहरी दुनिया से अवगत कराता है और उन्हें बाहरी संसार में कैसे जीना है, किसी व्यक्ति की पहचान करना और करियर से जुड़ी कई अन्य चीजों के बारे में उन्हें बताते हैं।</p>
<p><strong><span style="color:#99cc00;">पिता का प्यार</span>:</strong> एक पिता अपने बच्चे के लिए और उसके उज्जवल भविष्य के लिए कड़ी मेहनत करता है वह खुद अपनी इच्छाओं का त्याग कर अपने बच्चों की इच्छाओं की पूर्ति करने के बारे में सोचता है।</p>
<p><br /><strong><span style="color:#99cc00;">पिता की डांट</span> :</strong> पिता की डांट के पीछे छुपी आपकी भलाई और आपके प्रति उनका प्यार शायद ही आपको दिखाई देता है परंतु पिता अपने बच्चों को इसलिए डांटता है ताकि वे किसी गलत रास्ते ना निकल जाए जिससे उसके भविष्य को सवारने में दिक्कतें आए। पिता की डांट में आपको वह प्यार और चिंता भी दिखनी चाहिए जो वे आपके लिए करते हैं।</p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/father-s-contribution-and-importance-in-our-life/article-12546</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/opinion/father-s-contribution-and-importance-in-our-life/article-12546</guid>
                <pubDate>Sat, 18 Jun 2022 16:17:50 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2022-06/k-2.jpg"                         length="56957"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Jaipur]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>महाशिवरात्रि व्रत का वैज्ञानिक महत्व</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[हर साल फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है, ये दिन महादेव और माता पार्वती की विशेष पूजा का दिन माना गया है।]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/scientific-importance-of-mahashivratri-fast/article-5230"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/shiv-parvati.jpg" alt=""></a><br /><p>हर साल फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है, ये दिन महादेव और माता पार्वती की विशेष पूजा का दिन माना गया है। महाशिवरात्रि यानी शिव और शक्ति  की आराधना का दिन। इस दिन शिव को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखा जाता है। शिव की पूजा और भक्ति करने से ही कष्ट दूर हो जाते हैं।  सच्चे मन से शिव भक्ति करने वाले भक्तों पर उनकी कृपा हमेशा बनी रहती है।<br /><br /><strong>तन का शुद्धीकरण</strong> <br />व्रत रखने से तन का शुद्धीकरण होता है। व्रत रखने से रक्त शुद्ध होता है। आतों की सफाई होती है। पेट को आराम मिलता है। उत्सर्जन तंत्र और पाचन तंत्र, दोनों ही अपनी अशुद्धियों से छुटकारा पाते हैं। कई रोगों से मुक्ति मिलती है। श्वसन तंत्र ठीक होता है। उपवास रखने से कलोस्ट्रोल के स्तर कम होता है। व्रत से स्मरण शक्ति बढ़ती है। दिमाक स्वस्थ रहता है।  </p>
<p><br /><strong>ठोस वैज्ञानिक आधार</strong><br /> सनातन धर्म और उसके पर्वों का ठोस वैज्ञानिक आधार है। वैज्ञानिक दृष्टि से महाशिवरात्रि पर्व भी अतिमहत्व का है। महाशिवरात्रि की रात्रि विशेष होती है। दरअसल इस रात्रि पृथ्वी का उत्तरी गोलार्द्ध इस तरह अवस्थित होता है कि मनुष्य के अंदर की ऊर्जा प्राकृतिक तौर पर ऊपर की तरफ  जाने लगती है। अर्थात प्रकृति स्वयं मनुष्य को उसके आध्यात्मिक शिखर तक जाने का मार्ग सुगम करती है। महाशिवरात्रि की रात्रि में जागरण करने एवं रीढ़ की हड्डी सीधी करके ध्यान मुद्रा में बैठने की बात बताई गई है।</p>
<p><br /><strong>सबसे बड़ा वैज्ञानिक</strong><br />महाशिवरात्रि पर्व पर भगवान शिव की पूजा की जाती है। भगवान शिव को सबसे बड़ा वैज्ञानिक कहा गया है। समस्त प्रकार के तंत्र, मंत्र, यंत्र, ज्योतिष, ग्रह, नक्षत्र के जनक भगवान शिव ही हैं। इसलिए शिव के पास हर समस्या का समाधान हैं। इसी तरह प्रत्येक मंदिर में शिवलिंग स्थापित होता है। शिवलिंग ऊर्जा का एक पिंड है, जो गोल, लम्बा व वृत्ताकार होता है। शिवलिंग ब्रह्माण्डीय शक्ति को सोखता है।</p>
<p><br /><strong>व्याधियों का निवारण</strong><br />रुद्राभिषेक, जलाभिषेक, भस्म आरती,भांग -धतूरा और बेल पत्र आदि चढ़ाकर भक्त उस ऊर्जा को अपने में ग्रहण करता है। इससे मन व विचारों में शुद्धता तथा शारीरिक व्याधियों का निवारण स्वाभाविक है। शिवरात्रि के पश्चात ग्रीष्मऋतु का आगमन भी प्रारंभ हो जाता है। मनुष्य गर्मी के प्रभाव से बचने के लिए अपनी चेतना को शिव को समर्पित कर देता है। इससे मनुष्य तमाम तरह की व्याधियों से मुक्त हो जाता है। वैसे भी विज्ञान ध्यान ऊर्जा को विशेष महत्व देता है।<br /><br /></p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/scientific-importance-of-mahashivratri-fast/article-5230</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/scientific-importance-of-mahashivratri-fast/article-5230</guid>
                <pubDate>Tue, 01 Mar 2022 13:30:39 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2022-03/shiv-parvati.jpg"                         length="207334"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Administrator]]>
                    </dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        