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                <title>raj kaj - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>जानें राज काज में क्या है खास </title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान दिवस को लेकर अटारी वाले भाई साहब ने ऐसा जादू किया कि सामने वाले भाई लोग भी समझ नहीं पा रहे कि इसकी काट क्या है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj/article-109200"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/rajkaj.png" alt=""></a><br /><p><strong>अक्ल, उम्र और भचीड़ :</strong></p>
<p>राजस्थान दिवस को लेकर अटारी वाले भाई साहब ने ऐसा जादू किया कि सामने वाले भाई लोग भी समझ नहीं पा रहे कि इसकी काट क्या है। दरबार के सलाहकारों ने भजनजी को पूरी गोपनीयता बरतने की सलाह दी थी। चार लोगों के सिवाय किसी को हवा तक भी नहीं थी कि भाई साहब राजस्थान दिवस को सप्ताह भर मनाने का ऐलान कर विरोधियों का मुंह बंद करने के लिए यह पासा फेंकेंगे। अब दिल्ली दरबार के सामने भी पूंछरी के बालाजी के भक्त की तारीफ करने के अलावा कोई चारा भी तो नहीं है। अब गुप्तचरों को कौन समझाए कि अक्ल उम्र से नहीं, बल्कि भचीड़ खाने से आती है और इसमें भजनलाल जी का कोई सानी नहीं है। तभी तो हाथ वाले भाई लोग टीवी पर बोलते रहे और अटारी वाले भाई साहब ने चुपचाप धरातल पर असर दिखा दिया।</p>
<p><strong>चर्चा में राजयोग :</strong></p>
<p>सूबे में इन दिनों राजयोग को लेकर चर्चा जोरों पर है। हो भी क्यों न, मामला इमेज एण्ड स्टेटस से ताल्लुकात जो रखता है। राजयोग को लेकर भगवा वाले भाई लोगों का दिन का चैन और रातों की नींद उड़ी हुई है। कइयों के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें साफ दिखाई देने लगी हैं। बेचारों ने राजयोग के लिए कई तरह के पापड़ भी बेले थे। कई देवी-देवताओं के धेवरे ढोकने के साथ ही सवामणी तक बोली थी। और तो और जयपुर से दिल्ली तक भी कई बार सड़कें नापी थी। कुछ होता, उससे पहले ही दिल्ली वाले के एक फरमान ने सारा खेल बिगाड़ दिया। अब पंडितों ने भी कहना शुरू कर दिया कि बेचारों के नसीब में राजयोग ही नहीं लिखा तो पंचांग भी क्या कर लेगा।</p>
<p><strong>पॉलिटिक्स-ए-डिलिमिटेशन :</strong></p>
<p>सूबे में कभी खुशी-कभी गम में पॉलिटिक्स नहीं हो, यह कतई संभव नहीं है। हमारे नेताओं का आफरा भी तब तक नहीं उतरता है, जब तक अपने हिसाब से राजनीति की रोटियां नहीं सेंक लेते। अब देखो न डिलिमिटेशन की चर्चाओं के दौरान रोटियां बांटने के दौरान फोटो खींचने को लेकर ही रंगाई-छपाई के लिए फेमस सांगा बाबा की मारवाड़ की नगरी में नेताओं के बीच दो-दो हाथ हो गए। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि दो-दो हाथ होकर ही मामला सुलट जाता तो ठीक होता, लेकिन अब उनके आकाओं के बीच जो शब्द बाण चल रहे हैं, उससे ही पॉलिटिक्स का पता चल रहा है। अब बेचारे उन छुटभैये नेताओं के हाल कोई नहीं पूछ रहा, जिनके माथे फूटने से चेहरों पर खून की लकीरें पड़ी थीं।</p>
<p><strong>असर फोटो खिंचवाने का :</strong></p>
<p>एक सप्ताह पहले भगवा वाले एक छुटभैये नेताजी ने फोटो क्या खिंचवा ली, अपने घर में क्लेश करवा लिया। अब बेचारे नेताजी को थोड़े ही पता था कि उनके बड़े नेताजी की पहुंच उनके चूल्हे तक है। बड़ी चौपड़ से आगे वाली राम के नाम से बनी एक और चौपड़ के आसपास इन दिनों फोटो खिंचवाने की होड़ सी मची हुई है। नेताजी ने भी एक पोस्टर के साथ फोटो खिंचवाकर कारिन्दे के हाथों अपने सगे-सम्बधियों के पास पहुंचाने को भेज दिया। लेकिन दूसरे दिन अखबारों में छपी छुटभैये की फोटो देख नेताजी का पारा आसमान पर चढ़ गया।  अब बेचारा पुरानी बस्ती में रहने वाला छुटभैया नेता अपने आका की लाल आंखों का शिकार होने के साथ ही सात दिन से होमलॉक में ही कैद है।</p>
<p><strong>जरूरत मनोबल बढ़ाने की :</strong></p>
<p>पब्लिसिटी की जंग के बीच एक गु्रप ऐसा भी है, जो हर चीज पर अपनी पैनी नजर गड़ाए हुए है। इस गु्रप में गुणी लोग ज्यादा हैं, जिनका ताल्लुकात  सिर्फ पब्लिक से है। गुणीजनों ने राज को राय तो सही दी है, मगर उस पर अमल कराने के लिए मुंह खोलने की हिम्मत किसी भी रत्न में नहीं है। गुणीजनों की राय है कि युद्ध के मैदान में सेना को सम्मानित नहीं किया जाता, बल्कि उनका मनोबल बढ़ाया जाता है। एक शक्ति का सम्मान करने से दूसरी ताकतें डायवर्ट होती है। एक-दूसरे को नीचा दिखाने की जंग में भी योद्धाओं के मनोबल बढ़ाने की जरूरत है।</p>
<p><strong>-एल. एल. शर्मा</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 31 Mar 2025 13:10:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जानें राज काज में क्या है खास </title>
                                    <description><![CDATA[सूबे की सबसे बड़ी पंचायत के सरपंच साहब इन दिनों काफी पीड़ा में है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj%C2%A0/article-108472"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/rajkaj.png" alt=""></a><br /><p><strong>पीड़ा में सरपंच :</strong></p>
<p>सूबे की सबसे बड़ी पंचायत के सरपंच साहब इन दिनों काफी पीड़ा में है। उनकी पीड़ा को न तो इधर वाले समझ पा रहे है और न उधर वाले। उनको राज के रत्नों से काफी उम्मीदें हैं, लेकिन वे खरा नहीं उतर पा रहे और सबसे ज्यादा उछलकूद भी वो ही करते हैं। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में चर्चा करते हैं कि सरपंच साहब सबसे ज्यादा पीड़ित तो अपनों से हैं, जो उनके मनमाफिक नहीं करने से आरोप लगाने में कोई चूक नहीं करते हैं। आसन से बंधे अजयमेरु वाले भाई साहब को चिंता है कि राज की सबसे ज्यादा फजीहत ही रत्न करवा रहे हैं। उनकी वजह से राज को सात दिन में दो बार सलेक्ट कमेटी का सहारा लेना पड़ा। इसके पीछे का राज समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।</p>
<p><strong>बहाना नेतागीरी चमकाने का :</strong></p>
<p>नेताओं का जवाब नहीं है, जब भी मौका मिलता है, अपनी नेतागीरी चमकाने में कतई पीछे नहीं रहते। नेतागीरी चमकाने के चक्कर में वे न तो समय देखते हैं और नहीं जगह। अब देखो न, हार्ड कोर क्रिमनल्स और सांप्रदायिक तनाव के फेर में फंसी बेचारी जनता घर में नजरबंद होकर रोजाना माला जप रही है और हमारे सूबे के खादी वाले भाई लोग हैं कि फोटो खिंचवाने के चक्कर में एक-दूसरे के कोहनी मार कर आगे बढ़ रहे हैं। पिंकसिटी में शनि और रवि को एक नेताजी ने अपनी नेतागीरी चमकाने के लिए हाथ-पैरों तक की परवाह नहीं की और खबरनवीशों को देख दौड़ कर अनाप सनाप करने में भी कोई देर नहीं की। अब बेचारा खाकी वाला वह कारिन्दा भी मंद-मंद मुस्करा रहा था, जिसके जिम्मे लॉ एण्ड ऑर्डर संभालने का जिम्मा था। अब उसको यह थोड़े ही पता था कि नेतागीरी के लिए यह सबकुछ तो करना पड़ता है।</p>
<p><strong>इशारों ही इशारों में :</strong></p>
<p>इशारों ही इशारों में बहुत कुछ हो जाता है, लेकिन जब इशारा गलत दिशा में हो जाता है, तो मामला बिगड़े बिना नहीं रहता। अब देखो ना संडे को बड़ी चौपड़ वाले खाकी के ऑफिस में बैठने वाले साहब को क्या पता था कि भगवा वाले नेताजी के इशारे पर चलने से हाथ वाले दो-दो हाथ करने में न आगा सोचेंगे और नहीं पीछा। जब हाथ वाले नेताजी को पता चला कि खाकी वाले साहब गुजरे जमाने में नेतागीरी कर चुके छुटभैया के इशारे पर बहुत कुछ काम कर रहे हैं, तो उनकी आंखों का रंग तो बदलना ही था। नीली आंखों वाले नेताजी की आंखों का रंग बदलकर लाल होते देख खाकी वाले साहब ने भी हाथ जोड़ने में ही अपनी भलाई समझी।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी :</strong></p>
<p>सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा--मोटा नहीं, कुर्सी के सपने देखने वालों से ताल्लुकात रखता है। जुमला है कि जब से सूबे में सोशियल बोर्डों में अपॉइंटमेंट की मनाही हुई है, तब से कई भाई लोगों की नींद उड़ी हुई है। अब उनको नवरात्रों का बेसब्री से इंतजार है, ताकि रोजाना अलग अलग माताओं को प्रसाद चढाकर मनसा पूरी करने की अरदास कर सके।</p>
<p><strong>-एल. एल. शर्मा </strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 24 Mar 2025 11:33:36 +0530</pubDate>
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                <title>जानें राज काज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में होली पर लोगों ने तरह-तरह के रंगों का प्रयोग किया। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj/article-107684"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/rajkaj.png" alt=""></a><br /><p><strong>रंगों की राजनीति के बहाने :</strong></p>
<p>सूबे में होली पर लोगों ने तरह-तरह के रंगों का प्रयोग किया। किसी ने गुलाल-अबीर लगाई, तो किसी ने पक्का रंग, लेकिन एक-दूसरे को रंगने में कोई कमी नहीं छोड़ी। सियासत का चेहरा और मोहरा बने इन रंगों से कोई भी वर्ग अछूता नहीं रहा। राजनीति के रंगरेजों ने भगवा, नीला, हरा, पीला, गुलाबी और लाल रंगों के बहाने एक-दूसरे पर भड़ास निकालने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। सबसे ज्यादा भड़ास हाथ वाले भाई लोगों ने निकाली। उन्होंने न तो रात देखी और नहीं दिन। एक दशक से रंग और रंगों की राजनीति में माहिर भगवा वाले भाई लोगों ने भी रंगों की आड़ में जो कुछ मैसेज देना था, दिल खोलकर दिया। अटारी वाले भाई साहब ने तो रंगों की आड़ में जो मैसेज दिया, उसको समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।</p>
<p><strong>गले पड़े नेताजी :</strong></p>
<p>बड़ी चौपड़ पर पान की दुकान करने वाले भाई साहब के ग्रह नक्षत्र इन दिनों ठीक नहीं हैं। सो आफत भी बिन बुलाए गले पड़ रही है। अब देखो न शुक्रवार  की सुबह कुछ लोगों के साथ नेताजी के घर जा धमके। भाई साहब को आस थी कि चुनावों में वोट के बदले वोटर्स को बोतल का स्वाद चखाने वाले नेताजी अपने वोटर्स को होली का प्रसाद बांटेंगे। लेकिन नेताजी के तेवर देखकर उनके पैरों तले की जमीन खिसक गई। भाई साहब की हालत तो उस समय पतली हो गई, जब चुनावों में धर्म भाई बनाने वाले नेताजी ने पहचानने तक से ना में गर्दन हिला दी।</p>
<p><strong>चर्चा में धरती के भगवान :</strong></p>
<p>आज हम बात करेंगे, धरती के भगवानों की। वो भगवान, जिनके गिरेबान पर हर कोई हाथ डालते समय न आगा देखता है और नहीं पीछा। उनके सफेद कोट पर काला दाग लगाने में खादी वाले भी कोई कसर नहीं छोड़ते। छुटभैया नेता भी इमरजेंसी में पहुंचते ही अपने आका को फोन मिलाकर जबरदस्ती डॉक्टर साहब के कान के लगा देते हैं। कभी-कभी न्याय के तराजू वाले भी तोलने में चूक कर बैठते हैं, लेकिन कोरोना के खौफ के बाद  राज और उसका काज करने वालों को पता लग गया कि वास्तव में डॉक्टर भगवान का रूप होता है। तभी तो खादी वाले भाई लोग भी सात सौ दिन से भगवान से भी ज्यादा गुणगान कर रहे हैं।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी :</strong></p>
<p>सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि काले रंग की थार कारों को लेकर है। जुमले की चर्चा भी कमिश्नरेट से लेकर पीएचक्यू तक है। जुमला है कि लहराती काले रंग की थार को देख खाकी वाले भाई लोग भी पीछे हटने में ही अपनी भलाई समझते हैं। पता नहीं थार में किस साहबजादे से सामना हो जाए, जो फीता उतरवाने से कम धमकी नहीं देते हैं।  </p>
<p><strong>एल. एल. शर्मा</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Mar 2025 12:25:59 +0530</pubDate>
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                            </item>
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                <title>जानें राज काज में क्या है खास </title>
                                    <description><![CDATA[इन दिनों राज के रत्न के गुस्से को लेकर भगवा वाले भाई लोगों में काफी चर्चा है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj%C2%A0/article-107040"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/rajkaj.png" alt=""></a><br /><p><strong>साहब का गुस्सा या खीझ :</strong></p>
<p>इन दिनों राज के रत्न के गुस्से को लेकर भगवा वाले भाई लोगों में काफी चर्चा है। रत्न भी न तो वक्त देखते हैं और नहीं स्थान, अपने खास वर्कर्स पर भी खीझ निकालने में कोई कंजूसी नहीं बरत रहे। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वाले के ठिकाने को सालों से ढोकते आ रहे बुजुर्ग भाई साहब ने अपने तजुर्बे के आधार पर खुलासा किया तो, दूसरे भाई लोगों की भी समझ में आ गया। भाई साहब ने बताया कि जब राज के रत्न के साथ साये की तरह लगे रहोगे, तो उनको गुस्सा आना लाजिमी है। अब देखो न गुरुवार को सूर्यनगरी में एमपी वाले मेहमानों से होटल में मिलने गए भाई साहब को अकेले में बात करने तक का मौका ही नहीं मिला। कभी राठौड़ साहब, तो कभी चौधरी जी और जोशी जी में से कोई न कोई साये की तरह चिपका ही रहा। एकबारगी तो राज के रत्न का माथा ठनक भी गया था, मगर वक्त की नजाकत को देखते हुए चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी।</p>
<p><strong>अग्नि परीक्षा राज की :</strong></p>
<p>सूबे के पंडितों का भी कोई मुकाबला नहीं। न समय देखते हैं और न माहौल। जहां मर्जी हो पंचांग खोलकर बिना पूछे ही सामने वालों का भाग्य बताना शुरू कर देते हैं। अब देखो न पिछले दिनों लालकोठी श्मशान घाट में परिचित की अंतिम यात्रा में शामिल होने आए राज के एक रत्न का भविष्य बताकर माथे पर पसीना ला दिया। हद तो उस समय हो गई, जब तीये की बैठक में भी राज के रत्न का सामना उसी पंडितजी से हो गया। राज के रत्न ने  भी कन्नी काटने में ही अपनी भलाई समझी। पंडितजी ने भविष्यवाणी की है कि मरु प्रदेश की जन्मपत्री के अनुसार राज को इकॉनॉमी एण्ड हेल्थ की दृष्टि से अग्नि परीक्षा से गुजरना है।</p>
<p><strong>तलाश अदद टीम की :</strong></p>
<p>सूबे में राज को एक ऐसी टीम की तलाश है, जो अदब के साथ काज करने में माहिर हो। चर्चा है कि इसके लिए पुराने घोड़ों की तलाश कर उनका मन भी टटोला जा रहा है। कुछेक ने ना में गर्दन हिलाई तो दो-चार ने वक्त की नजाकत को भांप दो हफ्ते का वक्त मांग लिया। इस काम में जुटी टीम के लीडर की सोच भी बड़ी गजब की है। उनकी राय है कि नालायक बट काबिल हो तो चलेगा, केवल ईमानदारी के तमगे से सुस्ती से कतई पार पड़ने वाली नहीं है। उनके तर्क से हम भी सौ फीसदी सहमत हैं।</p>
<p><strong>ब्यूरोक्रेसी वेट एण्ड वाच मोड पर :</strong></p>
<p>जब से पड़ोसी सूबे मध्यप्रदेश में पॉलिटिकल उथल-पुथल मची है, तभी से सूबे के ब्यूरोक्रेट्स भी कुछ अलग ही मोड पर हैं। आधे से ज्यादा अफसर वेट एण्ड वाच मोड पर चल रहे हैं। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में अपने हिसाब से जोड़-बाकी में जुटे हैं। कुछ बड़े साहब लोग ज्यादा ही समझदार हैं, जो राज के दोनों ठिकानों से सौ कदम दूरी बना कर रखने में ही अपनी भलाई समझते हैं। बॉडी लैंग्वेज से फ्यूचर बताने में माहिर नॉर्थ इंडिया की धरती के एक लाल ने तो बड़े ठिकाने पर हाजिरी लगा कर मैसेज भी दे दिया कि बजट घोषणाओं को पूरा करने में माथा लगाओ, फालतू की बातों में कुछ नहीं रखा। अब वेट एण्ड वाच करने वाले साहब लोगों को कौन समझाए कि राजा कोई भी हो, उनको तो कारिन्दों के रूप में ही काम करना है।</p>
<p><strong>चर्चा खाने पीने की :</strong></p>
<p>चर्चा तो चर्चा ही होती है, कब और कहां, किस सब्जेक्ट को लेकर हो जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। अब देखो न पंचायत की बैठक के पहले दिन ही बातों ही बातों में खाने-पीने तक की चर्चा हो गई। मेल मिलाप और रामा श्यामा के बीच नेता ने भाई साहब को देखते ही पूछ लिया कि कल आपकी झलक तो दिखाई दी थी, पर खाने-पीने के वक्त नजर नहीं आए। भाई साहब भी कहां चूकने वाले थे, सो अपने ही अंदाज में बोले पड़े कि खाने-पीने वाला ही होता, तो आपके साथ ही होता। अब अगल-बगल वालों के सामने एक-दूसरे का मुंह देखने के सिवाय कोई चारा भी नहीं था, चूंकि मामला उनकी समझ के बाहर था। लेकिन समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।</p>
<p><strong>तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा :</strong></p>
<p>कहते हैं कि जहां तिगड़ी बैठती है, काम के बिगड़ने के चांस कुछ ज्यादा ही होते हैं। सूबे की तिगड़ी भी आजकल चर्चा में है। राज की कड़ी से कड़ी जोड़ने के दावे में रोड़ा बनी इस तिगड़ी के किरदार भी जोरदार हैं। एक दिल्ली में है, तो दूसरा सूबे के दरबार में। तीसरे भाई साहब पड़ोसी सूबे में डेपुटेशन पर हैं। तीनों के सुर और दिशाएं अलग-अलग होने के साथ मन में फेर भी है। तिगड़ी से कइयों का जायका बिगड़ा हुआ है। इससे राज भी चिंतित है। कारण भी साफ है कि रात दिन एक करने के बाद भी भाई साहबों की वजह से विकास का मैसेज नहीं जा पा रहा है।</p>
<p><strong>- एल. एल. शर्मा </strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं।)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 10 Mar 2025 12:05:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>जानें राज काज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में इन दिनों एक कहावत की चर्चा जोरों पर है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj/article-106185"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/rajkaj.png" alt=""></a><br /><p><strong>करे कोई, भरे कोई :</strong></p>
<p>सूबे में इन दिनों एक कहावत की चर्चा जोरों पर है। चर्चा भी छोटी-मोटी नहीं, बल्कि सदियों पुरानी है और पूर्वजों ने अपने अनुभव के आधार पर ठोक बजाकर बनाई है। सो करे कोई और भरे कोई वाली यह कहावत आज भी सटीक बैठती है। अब देखो ना, पिछले दिनों सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में जो कुछ हुआ, उसके पीछे हाथ किसी और का ही था, लेकिन बेचारे अलवर के गांव वाले भाई साहब को हाथा जोड़ी करने के साथ माफी तक मांगनी पड़ गई। दोनों दलों के नेताओं की मूछों के सवाल के फेर में हुए हंगामे से नुकसान सिर्फ पब्लिक को भुगतना पड़ा।</p>
<p><strong>शूज कंपनियों की बढ़ती सक्रियता :</strong></p>
<p>सूबे में अचानक कई शूज  कंपनियां अचानक सक्रिय हो गईं। उनके एमआर सेशन वाले भी दिन-रात भाग दौड़ में जुटे हैं। शूज  कंपनियों की सक्रियता अचानक बढ़ी, तो कइयों के कान खड़े हो गए, लेकिन माजरा उनकी समझ में नहीं आया। हमने भी सूंघा-सांघी की तो पता चला कि जब से सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में शूज चर्चा में आए हैं, तब से कंपनियों को आस है कि पता नहीं कब उनकी कंपनी का शूज फेमस हो जाए। तभी तो कंपनियों के एमआर इस जुगाड़ में हैं कि लक्ष्मणगढ़ वाले गोविन्द जी और डूंगरपुर वाले गणेश जी भाई साहब के पैरों में साम, दाम, दण्ड और भेद से उनकी ही कंपनी के शूज शोभा बढाएं। पता नहीं, उनको, कब और किस पर फेंकना पड़ जाए।</p>
<p><strong>फेंक रहे हैं, व्यंग्यों से भरी पिचकारी :</strong></p>
<p>होली का त्योहार हो और हाथ वाले भाई लोग एक दूसरे पर पिचकारी नहीं छोड़ें, यह असंभव है। अब देखो ना राज के रत्न एक-दूसरे को रंग में करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे। उन्होंने पूरे साल ही जब भी मौका मिला व्यंग्यों से भरे रंग की पिचकारियों से एक-दूसरे को खूब रंगा। कुछेक भाई लोगों को रंग नहीं मिला, तो क्रूड ऑयल से भरे गुब्बारे से भी काम चलाया। कई बार तो बड़ी चौपड़ का रंग फीका पड़ता दिखा, तो दिल्ली वाला रंग भी डाला गया। लाल रंग से भरी एक बाल्टी सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर रखी है, जिसमें से पिचकारियों में रंग भर कर दो नंबर साहब थमा रहे हैं। तो पीले रंग वाली बाल्टी सिविल लाईन्स में पेड़ से टंगी है, जिसमें अटारी वाले भाई साहब पीला रंग भर रहे हैं। राज के रत्न भी कम नहीं हैं। उनको इस बार की होली का बेसब्री से इंतजार है, क्योंकि इस बार राज के कई रत्न बाल्टी और पिचकारी दोनों ही बदलने के मूड में हैं। चूंकि बेचारे पूरे साल दो नावों में सवारी करते-करते अपने ही घुटने टेढ़े करवा बैठे। अब बुरा ना मानो होली है की आड़ में वे अपने मन की कसर पूरी करके दम लेंगे।</p>
<p><strong>मार रहे हैं कंडे और उछाल रहे हैं कीचड़ :</strong></p>
<p>इस बार राज के एक रत्न को होली भारी पड़ रही है। रत्न भी छोटे-मोटे नहीं बल्कि राजधानी वाले जिले की विधानसभा के इलाकों से ताल्लुकात रखते हैं और गाड़ी-घोड़े वाले महकमें के मुखिया हैं। जब से होली का डांडा रोपण हुआ है, तब से ही उनको गली मसखरे भी घेर कर मार रहे हैं कंडे-गोबर और उछाल रहे हैं कीचड़। उनकी किश्ती भी वहां डूब रही है, जहां पानी ही कम है। पूरे फाल्गुन के महीने में वे अपनों के ही निशाने पर हैं। रंगे हाथों पकड़ने वाले साहब लोगों ने उनके महकमें में कार्रवाई क्या की वे तो सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में भी पक्ष-विपक्ष के सदस्यों की पिचकारियों से निकली बौछारों के निशाने पर ही रहे। होली के रंगीलों की मानें तो उनकी खेमेबंदी की आदत की वजह से यार-दोस्त कीचड़ उछालने में कोई कमी नहीं छोड़ते।</p>
<p><strong>बढ़े होली के रंगीले, घटे बहरूपिए :</strong></p>
<p>होली का त्योहार हो और रंगीलों तथा बहरूपियों की चर्चा न हो, तो एक-दूसरे पर रंग फेंकने में मजा ही नहीं आता। सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में भी फाल्गुन के महीने में रंगीलों और बहरूपियों को लेकर चर्चा हुए बिना नहीं रहती। सत्ता पक्ष के सदस्यों में भी खुसरफुसर है कि सामने वालों में से किसी को रंगीला बनाना इस बार कतई आसान नहीं है, सो अपनों में से ही किसी एक को उपाधि देने में ही भलाई है। अपनों में बहरूपियों की तो वैसे ही कमी नहीं है, जो हर रोज कोई न कोई नया स्वांग दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। पंचायत में चर्चा है कि इस बार होली के रंगीलों की संख्या कुछ ज्यादा ही बढ़ी है।</p>
<p><strong>एल. एल. शर्मा </strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Mar 2025 12:41:16 +0530</pubDate>
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                <title>जानें राज काज में क्या है खास </title>
                                    <description><![CDATA[राज का काज करने वालों में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj%C2%A0/article-104560"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/rajkaj.png" alt=""></a><br /><p><strong>मीटिंग, सीटिंग एण्ड ईटिंग :</strong></p>
<p>सचिवालय में इन दिनों मीटिंग, सीटिंग और ईटिंग का जुमला जोरों पर है। जुमला है कि इस बार भी ब्यूरोक्रैसी रोड मैप तैयार करने में बड़ा दिल रख रही है। इतिहास भी गवाह है कि हर कोई बड़ा साहब राज को नई योजनाएं देकर जाता है, जिनसे सूबे की तकदीर तक बदलती है। राज का काज करने वाले बतियाते हैं कि गुजरे जमाने में ब्यूरोक्रैसी ने मरु प्रदेश को तीस जिला-तीस काम, अपना गांव-अपनी योजना और अन्त्योदय जैसी नई योजनाएं दी हैं, जो पड़ोसी सूबों के लिए रोल मॉडल भी बनी है। इस बार भी बड़े साहब ने सीटिंग और ईटिंग से दूर रह कर रोड मैप बनाने में दिन रात खपाए हैं, तो सूबे को कुछ नई योजना देंगे, जो दूसरों के लिए रोल मॉडल बनेगी।</p>
<p><strong>रहस्य वौल्यूम बढ़ने का :</strong></p>
<p>सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में जोर से बोलने को लेकर काफी खुसरफुसर है। नापक्ष के साथ ही हांपक्ष लॉबी में भी इसके रहस्य को लेकर काफी उत्सुकता बनी हुई थी। जोर से बोलने वाले नापक्ष के सदस्य नहीं बल्कि राज के दो रत्न हैं। दोनों ही आगे की लाइन में अगल-बगल में रहते हैं। दोनों का बौलते-बोलते इतना बढ़ जाता है कि अगल-बगल और आगे-पीछे बैठने वाले भी इधर-उधर देखने लगते हैं। जब राज के तीसरे रत्न ने रहस्य उजागर किया तो पंचों की जिज्ञासा शांत हुई। रहस्य हमें भी पता चला तो हम भी आपको बताय देते हैं। दोनों रत्नों के पिछले कुछ दिनों से कम सुनने की बीमारी हो गई। सो दोनों ने अपने कानों में श्रवण यंत्र लगा लिए। एक का यंत्र तो इतना छोटा है कि सामने वालों को दिखाई तक नहीं देता। लेकिन हाथों के फटकारे से कई बार निकल कर गिर जाने से स्वत: ही उनका वौल्यूम तेज हो जाता है।</p>
<p><strong>चर्चा में रूम :</strong></p>
<p>राज के ठिकाने सचिवालय में इन दिनों दो रूम काफी चर्चा में हैं। ओल्ड बिल्डिंग में दूजी दिशा के पहले और दूसरे चौक में भूतल पर बने इन रूम्स को लेकर चर्चाएं तो सालों से चलती आ रही हैं, मगर इस बार कुछ ज्यादा है। चर्चा है कि इस रूम  में जो भी बैठा, उसका कभी बाल भी बांका नहीं हुआ। इससे 50 कदम आगे एक और रूम है, जो सिर दर्द वाले ठिकाने के नाम से फेमस है। इसमें जो भी मंत्री बैठा, उसने दुबारा सदन में कदम नहीं रखा। बनाने वाले ने तो इसमें रेस्ट रूम अलग से बनवाया था, मगर एक मिनट भी चैन से नहीं बैठ पाया। राज का काज करने वाले भी हमेशा सीएमओ की टेढ़ी नजर के शिकार रहे। बिना सिर पैर की इन चर्चाओं के बीच इस रूम में पगफेरा करने वाले बड़े साहब पर अब सबकी नजरें टिकी हैं कि वे अपना वैभव कितना बरकरार रख पाएंगे।  </p>
<p><strong>चुप्पी के मायने :</strong></p>
<p>राज के रत्न भले ही कुछ भी दावे करें, लेकिन कई मामलों में उनका चुप रहना भी खलता है। पिछले दिनों सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में भी रत्नों ने अपने ही पंचों के तीखे तेवरों को देख चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी। अटारी वाले भाई साहब की गैर मौजूदगी में उनकी मजबूरी चाहे कुछ भी रही हो, लेकिन राज का काज करने वालों को नया काम मिल गया। लंच केबिनों में चर्चा है कि पंचों की आस पूरी नहीं होने से उनका मुंह सूजा हुआ है, चूंकि वोटर्स के बीच तो उनको ही जाना पड़ता है। अब बेचारे कब तक बहाने बनाते रहें।</p>
<p><strong>कमाल जापानी तेल का :</strong></p>
<p>तेल तो तेल ही होता है, चाहे वह इंडिया में बना हो या फिर जापान में। लेकिन इंडिया में अपने तेल को भुलाकर जापानी तेल को लेकर माथापच्ची हो, यह समझ के बाहर की बात है। राज का काज करने वाले भी इस जापानी तेल को लेकर उलझन में हैं। पहले तो खाकी वाले भाई लोग ही जापानी तेल के चक्कर में कागज काले करते थे, लेकिन अब तो खादी वाले भी पता लगाने में जुटे हैं कि तेल को लेकर मचे बवाल के पीछे का राज क्या है। बवाल को थामने के लिए डॉक्टरों के महकमें वाले भाई साहब ने कदम बढाए तो उनका भी माथा खराब हुए बिना नहीं रहा। भाई साहब ने एक महीने पहले नाड़ी देख कर इलाज करने वाले भाई लोगों से जापानी तेल का फार्मूला पूछा तो पता चला कि साहब लोग तो पहले से रात-दिन इस तेल की तासीर जानने में जुटे हैं। आयुर्वेद वाले साहब तो पता नहीं कब रिपोर्ट सौंपेंगे, लेकिन हम बताय देते हैं कि यह औषधि है, जो अरंडी के तेल की तर्ज पर काम करता है।  </p>
<p><strong>एक जुमला यह भी :</strong></p>
<p>राज का काज करने वालों में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि कमीशन को लेकर है। जुमला है कि दिल्ली दरबार ने प्लानिंग कमीशन तो खत्म कर दिया, मगर प्लानिंग में कमीशन नॉन-स्टॉप जारी है। अब देखो ना एमपी-एमएलए लैड में डीआरडीए के साहब लोगों का कमीशन से इतना मोह है कि उसके बिना पैन का ढक्कन तक नहीं खुलता। और तो और जिस दिन नहीं मिलता, उनका हाजमा तक बिगड़ जाता है। कमीशन के फेर में पिंकसिटी के एक युवा नेताजी की मालाएं तक सूख गईं। बेचारे को आज तक समझ में नहीं आया कि आखिर यह कमीशन क्या बला है।</p>
<p><strong>एल. एल. शर्मा </strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Feb 2025 12:06:08 +0530</pubDate>
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                <title>जानें राज काज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में भगवा वाले भाई लोगों की नजरें एक बार फिर दिल्ली की तरफ टिकी हुई हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj/article-103761"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/rajkaj.png" alt=""></a><br /><p><strong>अब नजरें दिल्ली की तरफ :</strong></p>
<p>सूबे में भगवा वाले भाई लोगों की नजरें एक बार फिर दिल्ली की तरफ टिकी हुई हैं। नजरें टिकने का कारण भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि न्यू नेशनल प्रेसीडेंट है, जो जल्द मिलने वाला है। इसके लिए दौड़ में पहले कइयों के नाम आए, मगर सब ठण्डे बस्ते में चले गए। अब जो नया नाम आया है, उसको लेकर मरु प्रदेश के भाई लोग काफी उत्साहित हैं। बीकाणा वालों के तो पैर जमीं पर भी नहीं टिक रहे। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर चर्चा है कि अगर गुजराती बंधुओं की जोड़ी ने अपनी चलाई, तो मेष राशि वाले भाई साहब की लॉटरी लग सकती है, जिनकी आड़ में गले की फांस बने बाबा साहेब वाले मसले को ठण्डा करने में कोई जोर नहीं लगाना पडेÞगा। चूंकि भाई साहब को साइकिल से लेकर कलेक्टरी चलाने तक का अनुभव है।</p>
<p><strong>रंग बदला, पर शांति नहीं :</strong></p>
<p>सूबे की सबसे बड़ी पंचायत के सरपंच साहब ने शांति के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। बडी उम्मीदों के साथ पंचायत का रंग तक बदलवाया था, पर मामला उलटा हो गया। और तो और जिन अपनों से ज्यादा उम्मीदें थी, वो ही विपक्ष का रोल निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे और वो ही उछलकूद करने में आगे हैं। आसन के बांईं तरफ बैठने वाले भाई लोग भी अपना काम होते देख मुंह बंद कर चटकारे ले रहे हैं। अब भाई साहब को कौन समझाए कि दिल्ली वालों की नजरों में आने के लिए कई पापड़ बेलने पडते हैं, जिसमें बात बात पर उछलना भी शामिल है। नहीं मानो तो आजमा कर देख लो, आसन की रूलिंग से सबसे पहले पेट में  दर्द उन्हीं लोगों के होता है।</p>
<p><strong>सिर्फ गजक का सहारा :</strong></p>
<p>समय किसी का एक सा नहीं होता, कब बदल जाए, पता ही नहीं चलता। नेताओं के साथ ही ब्यूरोक्रेट्स का भी समय बदले बिना नहीं रहता। राज से पटरी बैठ जाए, तो रोजाना मिठाई खाए बिना पार नहीं पडती और नहीं बैठे तो फिर उपर वाला ही मालिक है। अब देखो ना, इन दिनों एक मोहतरमा की राज से पटरी नहीं बैठी, तो उनको सचिवालय से बाहर कर दिया। उनसे ज्यादा पॉवर भी सैकण्ड लेवल वाले साहब के पास है। अब मैडम आने वाले को गजक खिलाकर टाइम पास करने में ही अपनी भलाई समझती है। मैडम के भी समझ में आ गया कि समय बडा बलवान है, समय-समय की बात कोई समय दिन बडा और कोई समय रात।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी :</strong></p>
<p>सूबे इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमले से कई भाई लोगों का हाजमा तक बिगड़ा हुआ है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि रिसफलिंग को लेकर है। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने के साथ इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के आॅफिस में भी जुमले की चर्चा हुए बिना नहीं रहती। जुमला है कि रिसफलिंग से पहले रिव्यू तो होगा, लेकिन एक नंबर का नहीं बल्कि दो से 24 नंबर तक होगा। चूंकि दिल्ली वालों का आईबी तंत्र इतना मजबूत है कि फोर्थ परसन को पता लगने पहले बात वहां तक पहुंचे बिना नहीं रहती। </p>
<p><strong>एल. एल. शर्मा</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 10 Feb 2025 12:12:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>जानें राज काज में क्या हैं खास </title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में अब सत्ता और संगठन में मंगल ही मंगल है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj%C2%A0/article-101359"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/rajkaj.png" alt=""></a><br /><p><strong>अब मंगल ही मंगल :</strong></p>
<p>सूबे में अब सत्ता और संगठन में मंगल ही मंगल है। मलमास हटते ही मंगलकामनाएं करने वालों की संख्या में भी चार गुणा बढोतरी हो गई है। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि मलमास खत्म होने के इंतजार में बैठे भाई लोग भी दिन में सपने देख रहे हैं। अब इनको कौन समझाए कि सत्ता और संगठन के फेरबदल में भी वही होगा, जो एक साल पहले राज का मुखिया चुनने में हुआ था। यानी सबकुछ दिल्ली से तय होगा। जिसकी दिल्ली वालों से दिल लगी है, वो ही फायदे में रहेंगे, बाकी समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।</p>
<p><strong>इंतजार भीमाष्टमी का :</strong></p>
<p>भगवा वाले भाई लोगों को भीमाष्टमी का बेसब्री से इंतजार है। उनका इंतजार भी लाजिमी है, चूंकि मामला 25 साल के इंतजार से ताल्लुकात जो रखता है। भाई लोगों की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा हुआ है। भीमाष्टमी भी अगले महीने की पांच तारीख को है। उस दिन लालकिले वाली नगरी की सरकार के लिए वोटिंग होगी और भगवा वाले भाई लोगों की इस इलेक्शन को साम, दाम, दण्ड और भेद से फतह करने की मंसा है, ताकि ढाई दशक बाद झण्डारोहण का सपना पूरा हो सके। पहले 15 साल शीला जी और बाद में 10 साल केजरीवाल जी ने मौका जो नहीं दिया।</p>
<p><strong>तबादले बने गले की फांस :</strong></p>
<p>सूबे में पिछले दिनों बम्पर तबादले क्या हुए, राज का काज करने वालों के गले की फांस बन गए। उनका दिन का चैन और रातों की नींद गायब हो गई। पहले तबादला कराने वालों ने नाक में दम रखा, तो अब अपने खास लोगों के कैंसिल कराने वालों ने हालत खराब कर रखी है। भारती भवन में बैठे भाई साहबों की पहले से ही आंखें लाल हैं। जोर आजमाइश के फेर में फंसी बदलियों में ब्यूरोक्रेट्स की दशा इधर पड़े तो खाई और उधर पडे तो कुआं वाली हो गई। बेचारों को रात रात भर जाग कर लिस्टें बनाने के बाद भी कोई जस नहीं है। अब उनको कौन समझाए कि बडेÞ लोगों के पीछे चलोगे, तो लात भी खानी पड़ेगी।</p>
<p><strong>भूत ए आरक्षण :</strong></p>
<p>आजकल आरक्षण के भूत ने सबको परेशान कर रखा है। भूत की चपेट में आए लोगों का दिन का चैन और रात की नींद गायब है। हर कोई इससे छुटकारा पाने के लिए टोने टोटकों का सहारा ले रहा है। कुछ भाई लोग तो तांत्रिकों से झाड़ फूंक भी करवा रहे हैं। सबसे ज्यादा चिंता में वो लोग हैं, जिन्होंने 15 साल पहले राज के नुमाइंदों के रूप में अपनी चिड़ियां बिठाई थी। कोटा और बीकानेर वाले भाई साहबों के सान्निध्य में गठित समिति के लोग भी तह में जाने की कोशिश में है। वे राज का काज करने वालों का मुंह खुलवाने के अथक प्रयास में हैं, लेकिन काज करने वालों के पास रटा रटाया एक जवाब है कि हमने तो वो ही किया है, जो ऊपर से आदेश मिला था। माथा लगाने में कोई भलाई भी नजर नहीं आ रही थी। खासा कोठी के ऊंचे कमरों में चर्चा है कि ऐसे तो आरक्षण का भूत निकालना मुश्किल है।</p>
<p><strong>डिजायर बनाम सुशासन :</strong></p>
<p>पिछले कुछ दिनों से सूबे में डिजायर बनाम सुशासन पर बहस जोरों पर है। अटारी वाले भाई साहब के सुशासन के दावे में डिजायर सिस्टम रोड़ा बना हुआ है। राज का काज करने वाले इसकी काट की तलाश में जुटे हैं, पर वे सफल नहीं हो पा रहे हैं। अब वे लंच केबिन में डिजायर करने में अव्वल नेताओं की चर्चा में व्यस्त हैं। सबसे ऊपर गुलाबीनगर वाले भाई साहब का नाम है। खाकी वालों पर रौब मारने में सफल रहे इन भाई साहब ने चार गामाओं को मलाईदार थानों में लगवा कर ही दम लिया। मुकदमों को इधर उधर कराने वालों की सूची में परशुराम के दो वंशज सबसे ऊपर हैं। टालू प्रवृत्ति वाले अफसर पहले से ही कमर कसे हुए हैं।</p>
<p><strong>एल. एल. शर्मा</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Jan 2025 10:56:22 +0530</pubDate>
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                <title>जाने राज-काज में क्या हैं खास </title>
                                    <description><![CDATA[राज का काज करने वाले भी चिंता में हैं, लेकिन बेचारे राम के डर से अपनी जुबान नहीं खोल पा रहे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-politics/article-99061"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/rajkaj.png" alt=""></a><br /><p><strong>कमाल के हैं ब्यूरोक्रैट्स</strong><br />हमारे सूबे के ब्यूरोक्रैट्स भी कमाल के हैं और राज के खास हों, तो फिर कहना ही क्या। मरु प्रदेश में राज की मंशा को भांपने वाले ब्यूरोक्रैट्स की संख्या भी उंगलियों पर है, बाकी अपने काम से काम रखते हैं। अब देखो न, पहले वाले राज के खास रहे तुला राशि वाले साहब ने अपनी राय से जिलों की संख्या 50 करवा कर वाहवाही लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। तो इस राज में मेष राशि वाले साहब जोड़-बाकी और गुणा-भाग कर 9 घटवा कर सुर्खियों में हैं। अब राज के हिसाब से रिजल्ट देने वाले ब्यूरोक्रेट्स के पॉवर को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।</p>
<p><strong>इंतजार मलमास खत्म होने का</strong><br />भगवा वाले भाई लोगों को मलमास खत्म होने का बेसब्री से इंतजार है। हो भी क्या न, कई भाई साहबों की लॉटरी जो लगने वाली है। सबसे ज्यादा दशा उन भाई साहबों की खराब है, जिनका मिनिस्टरी में रिपोर्ट कार्ड खराब है। उनकी रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा हुआ है। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि मलमास के बाद छबड़ा, मालवीयनगर, बाली, केकड़ी और चित्तौड़गढ वाले भाई साहबों के चौघड़िया बदल सकते हैं। बाकी किस पर राहु और केतु का असर होगा, यह तो अटारी वाले भाई साहब से ज्यादा कोई नहीं जानता, लेकिन राजनीति में जो होता है, वह दिखता नहीं और जो दिखता है, वह होता नहीं।</p>
<p><strong>ऊहापोह में भाई साहब</strong><br />सूबे में भगवा वाली पार्टी के भाई लोग इन दिनों ऊहापोह की स्थिति में हैं। ऊहापोह में भी सबसे ज्यादा पार्टी के सदर हैं, जो न तो नई टीम बना पा रहे हैं और नहीं पुरानों को हटा पा रहे हैं। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा के ठिकाने पर आने वाले हार्ड कोर्ड वर्कर्स में चर्चा है कि दिल्ली वालों ने तो सीएम और स्टेट प्रेंसीडेंट बदल कर अपना मैसेज दे दिया, लेकिन सूबे में सब कुछ आमेर वाले भाई साहब की टीम के पुराने मेम्बर ही चल रहे हैं। अब इन हार्ड कोर वर्कर्स को कौन समझाए कि सुमेरपुर वाले भाई साहब भी वो ही करेंगे, जो हाईकमान की पर्ची में लिखा होगा।</p>
<p><strong>खत्म होता डेमोक्रेटिक प्रोसेस</strong><br />भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में खत्म होते डेमोक्रेटिक प्रोसेस को लेकर हार्ड कोर वर्कर्स दुबले हो रहे हैं। संगठन की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर दोनों तरफ उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर आने वाले वर्कर्स में चर्चा है कि पार्टी के राजकुमार ने यूथ कांग्रेस के इलेक्शन की आड़ में शुरू की थी, पर उनकी भी पार नहीं पड़ी। राज का काज करने वाले भी चिंता में हैं, लेकिन बेचारे राम के डर से अपनी जुबान नहीं खोल पा रहे।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि आजादी के साल बना शिक्षा के सबसे बड़े केन्द्र से ताल्लुक रखता है। जुमला है कि आरयू में इन दिनों नौ रत्नों का बोलबाला है। साठ पार वाले रत्न भी अपनी आभा से परीक्षा और लेखा तक का काम संभाल रहे हैं। इनमें से एक तो बारहताड़ी भी देख चुके हैं, लेकिन ऊपर वालों के भरोसेमंद हैं। अब जब ऊपर वाले ही राजी हैं, तो दूसरों को माथा लगाना भी बेकार है। अब ऊपर वाले राजी क्यों हैँ, वो समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।</p>
<p>एल.एल. शर्मा<br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Dec 2024 11:14:55 +0530</pubDate>
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                <title>जानें राज-काज में क्या है खास </title>
                                    <description><![CDATA[कुर्सी के सपने देखने वाले भगवा रंग के कुर्ते धारण कर कई देवरे ढोक आए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-politics/article-96430"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-01/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>बदला कुर्तों का रंग</strong><br />सूबे में इन दिनों कुछ नेताओं के अचानक कुर्तों का रंग बदलने को लेकर काफी कानाफूसी हो रही है। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा के ठिकाने पर भगवाधारी रंग के कुर्ते पहन कर आने वालों की संख्या में हुए इजाफे को लेकर हार्डकोर वर्कर भी चटकारे लेने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि संभावित कैबिनेट रिसफलिंग की खुसरफुसर का इन नेताओं पर असर कुछ ज्यादा ही हो रहा है। कुर्सी के सपने देखने वाले भगवा रंग के कुर्ते धारण कर कई देवरे ढोक आए। और तो और बड़े साधु-संतों तक की सेवा पूजा करने लगे हैं। अब इन भाई लोगों को कौन समझाए कि सियार के उतावलेपन से बेर नहीं पकते।</p>
<p><strong>नहीं मिल रहा तोड़</strong><br />हाथ वाले कुछ भाई लोग अंदरखाने काफी परेशान हैं। न वो ठीक से सो पा रहे हैं और न ठीक से खा पा रहे हैं। उनकी रातों की नींद और दिन का चैन गायब है। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर भी उनकी चर्चा हुए बिना नहीं रहती। अब देखो न, भाई लोगों ने आलाकमान के कान भरकर जोधपुर वाले भाई साहब को दूर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सूबे में हार का ठीकरा भी भाई साहब के सिर पर फोड़ने के लिए दिल्ली दरबार में कई बार माथा भी टेका। लेकिन वर्कर हैं कि भाई साहब को भूल ही नहीं पा रहे, कोई दूसरा नेता उनके गले ही नहीं उतर रहा। अब देखो न सूबे की उप चुनावी जंग में हार के बाद कुछ नेताओं ने भी भाई साहब से किनारा कर लिया, लेकिन पिछले दिनों भाई-बहिन के पिंकसिटी के पगफेरे के दिन वर्कर्स ने जो किया, उससे कई नेताओं की नींद उड़ी हुई है। अब वो भाई का तोड़ निकालने के लिए पसीने बहा रहे हैं, लेकिन बेचारों की पार ही नहीं पड़ रही। भाई साहब ने भी मंच के बजाय नीचे बैठकर नाराजगी जताने में कतई कंजूसी नहीं की।</p>
<p><strong>बदले बदले से साहब</strong><br />आजकल शेखावाटी से ताल्लुक रखने वाले साहब का मूड पता नहीं कब खराब हो जाए। कुछ बदले-बदले नजर आ रहे हैं। उनके बदले स्वभाव से उनके नजदीकी लोग भी चिंतित हैं। राज का काज करने वाले भी खुसर फुसर कर रहे हैं। कई सालों से साथ निभा रहे साथी भी सोच में डूबे हैं। कुछेक ने तो इधर उधर से सूंघ कर कारणों का भी पता लगा लिया। उनसे हर किसी का मूड खराब होना लाजमी है। राज में चार नंबर की कुर्सी पर बैठे भाई साहब के खास काम नहीं हो रहे। वो फाइल पर कुछ लिखकर भेजते हैं, तो सीएमओ में अटक जाती है। और तो और खुद के गढ़ में राज का काज करने वाले भी परवाह नहीं कर अपने हिसाब से फैसले कर रहे हैं।  सब कुछ ऊपर ही ऊपर हो रहा है।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />इन दिनों सूबे में एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा मोटा नहीं बल्कि नेशनल लेवल की पॉलिटिक्स को लेकर है। इसकी चर्चा से भगवा और हाथ वालों के ठिकाने भी अछूते नहीं है। जुमला है कि पीसीसी के मुखिया की ओर से इन दिनों मोदी और शाह की जोड़ी पर चलाए जा रहे शब्द बाणों के मायने चाहे कुछ भी निकालें, लेकिन उन्होंने महाराष्ट्र वाले शरदजी और वेस्ट बंगाल वाली ममता जी को रेस में कई मील पीछे छोड़ दिया। तभी तो पीएमओ में उनकी हर खबर पर विशेष टिप्पणी होने के साथ नमोजी को भी बचाव में बोलना पड़ता है।<br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>-एलएल शर्मा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 Dec 2024 11:44:06 +0530</pubDate>
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                <title>जाने राज-काज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[स टांग खिंचाई का इलाज करने दिल्ली वालों ने सबसे बड़े वैध को भी भेजा, लेकिन वह भी नब्ज टटोलने में कामयाब नहीं हो पाए। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj/article-22494"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-09/46546546576.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>पोस्टर पॉलिटिक्स से बढ़ी चिन्ता</strong><br />सूबे में भगवा का राज आएगा या नहीं यह तो पता नहीं, लेकिन उनको मिले शुभ संकेतों के बाद से ही राज की कुर्सी के सपने देखने वालों में टांग खिंचाई जोरों पर है। हो भी क्यूं ना मामला, राज की कुर्सी से ताल्लुक जो रखता है। इस टांग खिंचाई का इलाज करने दिल्ली वालों ने सबसे बड़े वैध को भी भेजा, लेकिन वह भी नब्ज टटोलने में कामयाब नहीं हो पाए। अब देखो ना शनि को सूर्यनगरी में हुई पोस्टर पॉलिटिक्स से आलाकमान तक के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें दिखाई देने लगी हैं। चिन्ता भी होना लाजमी था, चूंकि नंबर वन कुर्सी के दावेदारों ने अपने-अपने होर्डिंग्स में एक-दूसरे की फोटो से परहेज जो किया।</p>
<p><strong>चर्चा में जूते</strong><br />सूबे में इन दिनों नेताओं के साथ जूते भी चर्चाओं में हैं। जनता का जूता कब किस नेता पर खुल जाए, यह पता नहीं चल पाता। जूते का असर इक्कीसवीं सदी के नेताओं पर कितना पड़ता है, यह तो कहा नहीं जा सकता। लेकिन जूता बनाने वाली कंपनियों की कमाई पर इसका जरूर असर पड़ता है। कंपनी वाले पेटेंट कराने के लिए दौड़धूप भी करते हैं। जूते-जूते में फर्क होता है। नेता जब आपस में शब्द बाणों से एक दूसरे पर जूते मार रहे हैं, तो जनता अब हकीकत में उठाने लगी है। जूते उठाने या फिर फेंकने की परम्परा नई नहीं है। यह सिलसिला प्रथम विश्व युद्ध से ही शुरू हो गया था। उस समय जनता ने राजा- महाराजाओं के खिलाफ जूता उठाया तो उनको राज छोड़ना ही पड़ा। अब नेताओं पर सरे आम जूते फेंके जा रहे हैं। राज करने वालों में चर्चा है कि आने वाले समय में जो नेता ज्यादा जूते खाएगा, वो सबसे अच्छा राजनेता साबित होगा। चूंकि जनता इतनी सयानी है कि वह नेताओं के लखणों के आधार पर ही जूता मारेगी।</p>
<p><strong>आपे से बाहर </strong><br />सूबे की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी के एक साहब ने अपनी औकात क्या दिखाई, उनकी बिरादरी के लोगों के मुंह शर्म से झुक गए। साहब ने भी आगा पीछा नहीं सोचा और आसोज की भरी दुपहरी में तपने के बाद शाम को ढाणी में यौवन देख आपा खो बैठे। अब उनके संगी साथियों का तर्क है कि यह कोई नई बात नहीं है, हमारे यहां तो यह रिवाज सा बन गया। सूची सौपेंगे तो आंकड़ा सैकड़ा पार कर जाएगा। मामला आजादी के साल अस्तित्व में आई यूनिवर्सिटी से जो जुड़ा है।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि भगवा वालों को लेकर है। जुमला भी फ्यूचर लीडर से ताल्लुक रखता है। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर भी इस जुमले को लेकर काफी खुसरफुसर है। ठिकाने पर हर कोई आने वालों को चटकारे लेकर सुनाया जा रहा है। जुमला है कि भगवा वालों के एक खेमे ने तीनों खेमों की नींद उड़ा रखी है। तीनों खेमों के वर्कर अंदरखाने ही एक्शन प्लान बनाने में पसीने बहा रहे हैं, लेकिन कोई न कोई खामी चट्टान बन कर सामने खड़ी हो जाती है। जबकि एक खेमा ऐसा है, जो खुलकर मैडम के फेवर में है और पूरी ताकत के साथ पसीना भी बहा रहा हैं। वर्कर्स के साथ पब्लिक भी ऐसी दीवानी है कि मैडम जहां भी जाती है, अपने आप उमड़ जाती है। पब्लिक की इस दीवानगी को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।</p>
<p><strong>- एलएल शर्मा</strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 12 Sep 2022 10:37:19 +0530</pubDate>
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                <title>देखे राज काज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में जब से झीलों की नगरी उदयपुर में आतंकवादी हादसा हुआ है, जब से पब्लिक रात-दिन आईबी वालो को कोस रही है। कोसे भी क्यों नहीं, 12 साल से गुप्तचरों को हवा तक नहीं लगी कि झीलों की नगरी से तार पड़ोसी देश पाक तक जुड़ चुके हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/what-is-special-in-raj-kaj/article-13563"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-07/46546546515.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>गुप्तचर हुए फेल</strong></p>
<p>सूबे में जब से झीलों की नगरी उदयपुर में आतंकवादी हादसा हुआ है, जब से पब्लिक रात-दिन आईबी वालो को कोस रही है। कोसे भी क्यों नहीं, 12 साल से गुप्तचरों को हवा तक नहीं लगी कि झीलों की नगरी से तार पड़ोसी देश पाक तक जुड़ चुके हैं। अब कौन समझाए कि अब पहले वाले न तो गुप्तचर रहे और न ही उनको सूचना देने वाले। अब पब्लिक को कौन समझाए कि बेचारे आईबी वाले भी अखबारनवीसों तक सीमित रह गए, जो देर रात तक अखबारों के दफ्तरों में फोन लगा कर पहले ही पूछ लेते हैं कि खास क्या है। गुप्तचरों को तो खुद के कामों से ही फुर्सत नहीं है, सूंघासांघी के लिए डे-नाइट टाइम देना पड़ता है, तब जाकर क्लू मिलता है।</p>
<p><strong>नजरें एनआईए पर</strong><br />इन दिनों सूबे में एनआईए की चर्चा जोरों पर है, हो भी क्यों ना, एनआईए वालों का पगफेरा कुछ ज्यादा ही है। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि पहले सीबीआई और बाद में ईडी वाले भी लोगों की जुबान पर थे। दोनों का दखल भी बढ़ा, लेकिन मरु प्रदेश में एसआईटी वालों ने उनकी पार नहीं पड़ने दी, तो दिल्ली वालों ने एनआईए की आड़ लेकर तोड़ निकाल लिया। चर्चा है कि सूबे में पहला मामला दर्ज करने वाली एनआईए अपना करिश्मा दिखाए बिना नहीं रहेगी, चूंकि मामले इंडिया की अस्मत से जुड़े हुए हैं।</p>
<p><strong>फेसबुक-पेय पदार्थ और रेप</strong><br />सूबे में खाकी वाले भाई लोगों का दिन का चैन और रातों की नींद उड़ी हुई है। उड़े भी क्यों नहीं, रेप के मामले जो बढ़ते जा रहे हैं। पीएचक्यू में झण्डे के नीचे बैठने वाले भाई के भी समझ में नहीं आ रहा कि आखिर मामला क्या है। अब खाकी वालों को कौन समझाए कि फेसबुक से दोस्ती के बाद हुई मुलाकात अपना गुल खिलाए बिना नहीं रहती। तभी तो घर से सैकड़ों मील दूर पेय पदार्थ का सेवन होता है, जो अपना असर दिखाता है और अंधे प्यार का नशा उतरने पर ही पता चलता है कि कुछ तो गड़बड़ हुआ है। अब खाकी वालों को भी फेसबुक से दोस्ती करने वालों के लिए नई विंग खोल कर नींद सोने में ही फायदा है।</p>
<p><strong>इंतजार अगस्त क्रांति का</strong><br />भगवा वालों के एक खेमे के भाई लोगों के इन दिनों जमीन पर पैर ही नहीं टिक रहे। राज का काज करने वाले भी चुपचाप इसकी टोह लेने के लिए इधर-उधर सूंघासांघी कर रहे हैं। उत्साहित खेमे को नौ अगस्त की क्रांति का बेसब्री से इंतजार है। अभी से वे एक-दूसरे को बधाइयां देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। सुबह-शाम सिर्फ एक ही रट लगाए बैठे हैं कि बस अगस्त का इंतजार करो, सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में सूबे के सदर वाली कुर्सी पर ताजपोशी होने वाली है। लेकिन भवन में रोजाना आने वाले भाई लोगों का सवाल है कि आखिर यह कैसे संभव है।</p>
<p><strong>एक्सक्ल्युड बनाम इनक्ल्युड</strong><br />इन दिनों सूबे में एक्सक्ल्युड और इनक्ल्युड को लेकर काफी चर्चा है। इससे इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने के साथ ही सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में भगवा वालों का मंदिर भी अछूता नहीं है। राज का काज करने वाले अपने हिसाब से चर्चा में मशगूल है। जो भाई लोग इन शब्दों का अर्थ नहीं समझ पा रहे, वो अपने गुरुओं की शरण में हैं। पीसीसी में चर्चा है कि भगवा वाले इनक्ल्युड में कुछ ज्यादा ही विश्वास करते हैं, वो सबसे पहले अपने ही लोगों को घर का रास्ता दिखाने में माहिर हंै। भगवा वालों के ठिकाने के साथ भारती भवन में चिंतन बैठकों में हाथ वालों के इनक्ल्युड फार्मूले को लेकर बहस छिड़ी हुई है। चर्चा है कि भगवा वाले इनक्ल्युड फार्मूले से उन लोगों को गले लगा रहे हैं, जिनके पूर्वजों को किसी न किसी बहाने लगा दिया गया था। चर्चा में दम भी है, जोधपुर, अलवर और जयपुर के मामले जो सामने हैं।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />ब्यूरोक्रेसी में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। हो भी क्यों ना, मामला राज के मूड से जुड़ा है। जब से जोधपुर वाले अशोक जी  की नजरेंं महिलाओं की योजनाओं पर टिकी हैं, तब से ब्यूरोक्रेसी में एस्टीम भी बढ़ा है। सत्ता के साथ संगठन वालों का मुंह खुलने से असर साफ दिखने लगा है। -<strong>एल.एल शर्मा, पत्रकार</strong></p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Mon, 04 Jul 2022 13:09:44 +0530</pubDate>
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