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                <title>tigers - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>टाइगर से चीते तक के खून से सने हाईवे और रेलवे ट्रेक, जंगल में तीन तरफ से मौत का जाल</title>
                                    <description><![CDATA[रफ़्तार की बली चढ़ रहे शेड्यूल - 1 के वन्यजीव:  मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व के वन्यजीवों को ट्रक और ट्रेनो ने रौंदा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/highways-and-railway-tracks-stained-with-the-blood-of-animals-from-tigers-to-cheetahs--a-death-trap-surrounding-the-forest-on-three-sides/article-136384"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/etws-(1200-x-600-px)-(16).png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा और रामगढ़ टाइगर रिजर्व से गुजरते नेशनल हाइवे और रेलवे ट्रेक वन्यजीवों की अकाल मौत का कारण बन रहे हैं। भोजन-पानी की तलाश में जंगल से बाहर निकलते ही बेजुबान जानवर सड़कों पर तेज रफ्तार ट्रकों और पटरियों पर दौड़ती ट्रेनों की चपेट में आ रहे हैं। हालात इतने भयावह हैं कि बीते पांच वर्षों में यहां 51 से ज्यादा वन्यजीव अकाल मौत का शिकार हो चुके हैं। इतना ही नहीं, लापरवाही का आलम यह है कि हाल ही में मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से निकले चीते की बारां जिले से गुजर रहे आगरा-मुंबई हाइवे के शिवपुरी लिंक रोड पर अज्ञात कार की टक्कर से दर्दनाक मौत हो गई। इसके बावजूद बेजुबान वन्यजीवों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कागजों से आगे नहीं बढ़ पाए। जबकि, अकाल मृत्यु के शिकार हुए वन्यजीवों में अधिकतर शेड्यूल वन श्रेणी के हैं। इन वन्यजीवों को भी सुरक्षा का उतना ही अधिकार प्राप्त है, जितना टाइगर को। इसके बावजूद वन अधिकारियों द्वारा इनकी सुरक्षा में कोताही बरती जा रही है।</p>
<p><strong>51 से ज्यादा वन्यजीवों को ट्रेन-ट्रकों ने कुचला</strong><br />मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व में वर्ष 2019 से 2025 तक टाइगर, पैंथर, भालू व मगरमच्छ, हायना सहित 50 से ज्यादा वन्यजीवों की सड़क व रेल दुर्घटनाओं में दर्दनाक मौत हो चुकी है। वहीं, वन्यजीव विभाग के अधीन सेंचुरी में भी वन्यजीव सुरक्षित नहीं है। यहां वर्ष 2023 व 24 में मगरमच्छ व मादा नील गाय को हाइवे पर बेलगाम दौड़ते भारी वाहन कुचल गए। बेजुबानों की दर्दनाक मौत के बावजूद वन अधकारियों द्वारा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए। अकाल मृत्यु में सर्वाधिक संख्या पैंथर की है।</p>
<p><strong>इधर, ट्रेन से कटा टाइगर, उधर कार ने कुचला चीता</strong><br />मुकंदरा टाइगर रिजर्व के दरा रेंज से गुजर रही रेलवे ट्रेक वन्यजीवों के लिए मौत का ट्रैक बनती जा रही है। वर्ष 2003 में रणथम्भौर से चलकर मुकुंदरा आया ब्रोकन टेल टाइगर की ट्रेन की टक्कर से मौत हो गई थी। वहीं, हाल ही में एनक्लोजर से बाहर निकली कनकटी भी कुछ मिनटों के लिए दरा रेलवे ट्रेक पर आ गई थी। इसके बाद वह पूरी रात ट्रेक के पास झाड़ियों में बैठी रही। जिससे उसकी जान को खतरा था। इधर, आठ दिन पहले गत 7 दिसम्बर को बारां जिले से गुजर रहे आगरा-मुंबई हाइवे के शिवपुरी लिंक रोड पर कूनो नेशनल पार्क से आया चीते को कार कुचल गई। इससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।</p>
<p><strong>11 केवी लाइन गिरी, करंट से लेपर्ड परिवार खत्म</strong><br />मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व के बीच डाबी के डसालिया वनखंड से गुजर रही 11 केवी बिजली का तार टूटकर गिर गया। करंट की चपेट में आने से लेपर्ड का पूरा परिवार खत्म हो गया। यहां नर व मादा लेपर्ड के साथ दो शावकों की भी मौत हो गई थी। वहीं, 4 नेवलों की भी करंट की चपेट में आने से मुत्यु हो गई। इसी तरह 12 दिसम्बर 2023 को नेशनल हाइवे 148-डी पर अज्ञात भारी वाहन ने 1 वर्षीय मादा पैंथर को रौंद दिया।</p>
<p><strong>ट्रेन की टक्कर से भालू के हो गए दो टुकड़े</strong><br />12 जनवरी 2020 को मुकुंदरा में दिल्ली-मुंबई रेलवे लाइन पर ट्रेन से कटकर 12 वर्षीय नर भालू की दर्दनाक मौत हो गई थी। ट्रेन की रफ्तार से भालू के शरीर के दो टुकड़े हो गए थे। यह दुर्घटना कमलपुरा स्टेशन के पास रेलवे लाइन पर डॉट के मोखे के ऊपर हुआ था।</p>
<p><strong>यह वन्यजीव हुए अकाल मौत के शिकार</strong><br /><strong>मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व :</strong> ब्रोकन टेल टाइगर, पैंथर, नर व मादा भालू, जरख, सियार, मगरमच्छ, मादा नील गाय, सांभर, चीतल, मोर, जंगली बिल्ली सहित अनेक जानवरों की ट्रेन व भारी वाहनों की टक्कर से मौत हो गई। इनमें से अधिकतर जानवरों की मौत पटरी पार करते हुए ट्रेन की चपेट में आने से हुई है।<br /><strong>रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व :</strong> पैंथर, जंगली सूअर, नर व मादा नील गाय (बच्चा), मोर, मादा सांभर, सियार, चीतल शामिल हैं। यह तो वो एनीमल हैं, जिनकी मौत रिकॉर्ड में दर्ज हैं, इसके अलावा कई एनीमल तो ऐसे हैं, जिनकी मौत का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है।<br /><strong>वाइल्ड लाइफ कोटा : </strong>वन्यजीव विभाग के अधीन अभयारणयों से मगरमच्छ व मादा नील गाय की मौत हुई है। यहां जंगलों से सटकर निकल रहे नेशनल, स्टेट व मेगा हाइवे गुजर रहे हैं। जिन्हें पार करते हुए मौत के शिकार हो गए।</p>
<p><strong>आंकड़ों में देखिए, ट्रेन से पैंथरों की दर्दनाक मौत</strong><br />- 5 मार्च 2023 को रामगढ़ टाइगर रिजर्व में भीमलत के पास बूंदी-चित्तौड़गढ़ रेलवे लाइन पर नर पैंथर की ट्रेन की चपेट में आने से मौत हो गई थी।<br />- 22 जनवरी 2021 को भीमलत के पास जालंधरी-श्रीनगर स्टेशन के बीच मादा पैंथर ट्रेन की चपेट में आ गई थी। जिससे उसका दम टूट गया।<br />- 11 मार्च 2021 को भीमलत के जंगलों में सीताकुंड वनक्षेत्र के जैतपुरा बांध के पास नर पैंथर की मौत हो गई।<br />- 30 अक्टूबर 2019 को भारी वाहन ने 7 माह के पैंथर शावक को हाइवे पर कुचल दिया।<br />-15 दिसम्बर 2025 : कोटा चित्तौड़ नेशनल हाइवे पर अज्ञात वाहन ने 4 वर्षीय मादा पैंथर को कुचल दिया। स्थिति नाजुक बनी हुई है।</p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />रामगढ़ टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों के लिए पर्याप्त भोजन-पानी की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में जंगल से बाहर निकलने पर रेलवे ट्रैक पार करते वक्त ट्रेन या हाइवे पार करते समय भारी वाहनों की चपेट में आने से जान गंवा बैठते हैं। बिजौलिया से करोंदी टोल के पास भालू की दुर्घटना में मौत होती रहती है। कई जगह से रिजर्व की दीवारें टूटी हुई हैं। यहां प्रोपर गश्त नहीं होती। जिसकी वजह से वनकर्मियों को वन्यजीवों की मौत का पता ही नहीं लग पाता। इनका मुखबिर तंत्र भी कमजोर है। फोरस्ट अधिकारियों को स्थानीय लोगों को साथ लेकर बेजुबानों की जान बचाने के प्रयास करना चाहिए।<br /><strong>-विट्ठल सनाढ्य, वन्यजीव विशेषज्ञ बूंदी</strong></p>
<p>जब भी फोरेस्ट की तरफ से रेलवे ट्रैक के आसपास वन्यजीव के मूवमेंट की जानकारी मिलती है तो ट्रेनों की स्पीड कम कर दी जाती है। पटरियों के पास व पीछे की ओर क्रेश बेरियर वॉल बनाई गई है। हालांकि, कुछ जगहों पर छुटी हुई है। लेकिन, मथूरा से नागदा तक क्रेश बेरियर वॉल का काम चल रहा है।<br /><strong>-सौरभ जैन, सीनियर डीसीएम रेलवे कोटा</strong></p>
<p>वाइल्ड लाइफ में नए प्रोजेक्ट पर कई कंडीशन लगाते हैं, जिसमें एलीवेटेड रोड व टनल बने, अंडर पास बने। वहीं, लोकल सर्विस रोड की मरम्मत की मंजूरी के दौरान अधिक ब्रेकर बनवाते हैं, जिससे वाहनों की गति कम रहे और वन्यजीव को सड़क पार करने को समय मिल सके। इसके अलावा जहां कहीं इस तरह की घटनाएं होती है तो उसके संबंध में हाई आॅथोरिटी से बात कर उचित उपाए करवाएंगे।<br /><strong>-सुगनाराम जाट, सीसीएफ मुकुंदरा टाइगर रिजर्व</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Dec 2025 16:53:01 +0530</pubDate>
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                <title>बाघ बचे तो जंगलों की सांस बचेगी</title>
                                    <description><![CDATA[प्रकृति का संतुलन बनाए रखने वाले जीवों में बाघ एक ऐसा जीव है, जो न सिर्फ शक्ति और सौंदर्य का प्रतीक है, बल्कि पारिस्थितिकीय तंत्र में एक निर्णायक भूमिका भी निभाता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/if-the-tiger-survives-the-breath-of-the-forests-will/article-121970"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/ne1ws.png" alt=""></a><br /><p>प्रकृति का संतुलन बनाए रखने वाले जीवों में बाघ एक ऐसा जीव है, जो न सिर्फ शक्ति और सौंदर्य का प्रतीक है, बल्कि पारिस्थितिकीय तंत्र में एक निर्णायक भूमिका भी निभाता है। हर वर्ष 29 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस मनाकर हम इस विलुप्त होते वनराज की चिंता को वैश्विक मंच पर उठाते हैं। बाघ, जिसे अंग्रेजी में टाइगर कहा जाता है, अपनी चाल-ढ़ाल, दहाड़ और शिकार करने की कुशलता के लिए जाना जाता है। उसकी उपस्थिति जंगल को जीवंत बनाती है। हालांकि, जंगल का राजा शेर कहलाता है, परंतु व्यवहारिक रूप से बाघ की ताकत, चपलता और शिकार पर पकड़ कहीं अधिक प्रभावशाली है। पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी संस्थाओं और वैज्ञानिकों की चिंता इस बात को लेकर है कि बाघ लगातार विलुप्ति की ओर बढ़ रहे हैं। इसके पीछे सबसे बड़े कारण हैं,जंगलों की अंधाधुंध कटाई, प्राकृतिक आवास का नष्ट होना, अवैध शिकार, वन्यजीवों का व्यापार और बाघों का मानव से टकराव।</p>
<p><strong>जैव विविधता :</strong></p>
<p>बाघ न केवल एक प्रजाति है, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र का शीर्ष शिकारी है। यदि यह कड़ी टूटती है, तो जैव विविधता की पूरी शृंखला प्रभावित होती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2010 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में एक टाइगर समिट आयोजित किया गया, जिसमें 13 बाघ रेंज वाले देशों ने बाघों की संख्या 2022 तक दोगुना करने का संकल्प लिया था। भारत के लिए यह दिन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि दुनिया के कुल बाघों में से लगभग 70 प्रतिशत बाघ भारत में पाए जाते हैं।</p>
<p>रणथंभौर में पहले ही कुछ बाघों द्वारा मानव पर हमले हो चुके हैं, जिससे स्थानीय नागरिकों और श्रद्धालुओं में भय का माहौल बना है। ऐसे में वन विभाग द्वारा कुछ बाघों को अन्य टाइगर रिजर्व जैसे रामगढ़ विषधारी, मुकुंदरा हिल्स, करौली-धौलपुर और रणथंभौर बाघ परियोजना द्वितीय में स्थानांतरित करने की योजना बनाई गई है। लेकिन इन स्थानों को पहले प्राकृतिक वास के रूप में सक्षम बनाना आवश्यक है। इसके लिए केवलादेव नेशनल पार्क से चीतलों को लाकर इन क्षेत्रों में शिकार आधार बढ़ाया जा रहा है।</p>
<p><strong>बाघ संरक्षण :</strong></p>
<p>राजस्थान का सरिस्का टाइगर रिजर्व अलवर , जो बाघ संरक्षण की दुनिया में पुनर्जन्म का प्रतीक है। 2004 में यहां सभी बाघ समाप्त हो चुके थे। लेकिन 2008 में बाघों को पुन: बसाने का सफल प्रयोग किया गया। वैश्विक स्तर पर, जहां भारत, नेपाल और थाईलैंड में बाघों की संख्या में उत्साहजनक बढ़ोतरी हुई है, वहीं कंबोडिया, लाओस और वियतनाम जैसे देशों में बाघ लगभग विलुप्त हो चुके हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया में अवैध शिकार, वन्यजीव व्यापार और प्राकृतिक आवास की कमी बाघों के अस्तित्व पर भारी पड़ रही है। बाघों को बचाने का काम केवल सरकार या वन विभाग का नहीं है। इसमें आम नागरिकों, स्थानीय समुदायों, किसानों, युवाओं और पर्यावरण प्रेमियों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। स्कूलों, सोशल मीडिया और संस्थानों में जागरूकता फैलाकर हम बाघों के प्रति एक संवेदनशील सोच विकसित कर सकते हैं।</p>
<p><strong>चिंता का विषय :</strong></p>
<p>सवाई माधोपुर की रणथम्भौर बाघ परियोजना में बढ़ती बाघों की संख्या न वन्य जीव प्रेमियों व पर्यावरणविदों के लिए, बल्कि खुद वन विभाग के लिए चिंता का विषय बन चुकी है। यदि वयस्क बाघों में कुछ को जल्द ही अन्य अभयारण्यों में स्थानांतरित नहीं किया गया, तो अधिकार क्षेत्र को लेकर बाघों में खूनी टकराव हो सकता है। इसके अलावा इस बात की भी गहरी आशंका है कि बढ़ती संख्या से पैदा होने वाली अकुलाहट के चलते कुछ बाघ रणथम्भौर अभयारण्य की सीमा को लांघकर आबादी वाले क्षेत्रों की ओर उन्मुख हो जाएं। पर्यावरणविदों और वन्य जीव प्रेमियों के लिए ये दोनों ही आशंकाएं घोर चिंताजनक हैं।</p>
<p><strong>महत्वपूर्ण उपलब्धि :</strong></p>
<p>रणथम्भौर बाघ परियोजना में वयस्क बाघों की संख्या अब 90 से ऊपर पहुंच चुकी है, जो कि वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक बहुत महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा सकती है। वर्तमान में इस बाघ परियोजना में बाघ शावकों की संख्या लगभग पंद्रह तक पहुंच जाना जाहिर करता है कि बाघ परियोजना में वन विभाग द्वारा पिछले कई वर्षो में हैबिटैट एवं वन्यजीव सम्बन्धी कार्यों के परिणाम अनुमान से भी अधिक सफल रहे हैं। वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह बहुत जरूरी है कि रणथम्भौर बाघ परियोजना द्वितीय, करौली में भी ऐसे कार्य कराए जाएं, जिससे रणथम्भौर बाघ परियोजना से बहार जाने वाले बाघों को एक निरंतर प्राकृतिक वास मिल सके। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की समस्या तथा परधि क्षेत्र में बाघों की सुरक्षा एक साथ हल हो सकती हैं। बाघ सिर्फ एक जानवर नहीं, वह प्रकृति का प्रहरी है। अगर बाघ बचेंगे, तो जंगल बचेंगे, जंगल बचेंगे, तो पानी, हवा और जीवन बचेगा। अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस हमें हर वर्ष यह याद दिलाता है कि जंगलों की यह दहाड़ एक दिन खामोश न हो जाए। हम सबका साझा दायित्व है, हर जंगल में गूंजती रहे बाघ की दहाड़, हर पीढ़ी देखे प्रकृति का यह अद्भुत उपहार।</p>
<p><strong>-प्रकाश चंद्र शर्मा</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 29 Jul 2025 12:58:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
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                <title>मुकुंदरा ना इंसानों के काम का रहा ना बाघ ही बस पाए</title>
                                    <description><![CDATA[परियोजना की घोषणा होने के तुरंत बाद आनन फानन में यहां पर सारी तैयारियां की गई, और तीन बाघ यहां पर रणथंभौर से लाकर छोड़े गए ।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jhalawar/mukundra-was-neither-useful-to-humans-nor-tigers-could-settle-here/article-95947"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/257rtrer-(1)10.png" alt=""></a><br /><p> झालावाड़। झालावाड़ और कोटा जिले के मध्य फैली सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना, मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व, इन दोनों के बदली आंसू बहा रही है। परियोजना में ना तो बाघ रह रहे हैं ना हीं इंसान। परियोजना की घोषणा लगभग 7 साल पहले हुई थी, जब तत्कालीन सीएम द्वारा इस परियोजना में गहरी रुचि दिखते हुए इसको जमीन पर उतारने की तैयारी की गई। परियोजना की घोषणा होने के तुरंत बाद आनन फानन में यहां पर सारी तैयारियां की गई, और तीन बाघ यहां पर रणथंभौर से लाकर छोड़े गए जबकि एक बाघ खुद चलता हुआ यहां आ पहुंचा। कुछ दिनों बाद बाघों के एक जोड़े ने दो शावकों को जन्म दिया, इस प्रकार से देखते ही देखते यहां बाघों का कुनबा बढ़कर की 6 की संख्या तक जा पहुंचा। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि सरकार ने पूरा मामले में जल्दबाजी की और बिना पूरी तैयारी के यहां बाघों को छोड़ दिया। जबकि परियोजना के सबसे संपन्न क्षेत्र दरा के घाटी गांव से लेकर मशालपुरा गांव तक लोगों का विस्थापन नहीं हो पाया था, यहां लोग आज भी रह रहे हैं।</p>
<p>सूत्र बताते हैं कि बाघों की मौजूदगी मनुष्यों को रास नहीं आई तथा दोनों एक दूसरे के लिए खतरा बनते रहे और अंत में चार बाघ मौत के मुंह में समा गए, जबकि दो बाघों का रेस्क्यू करके यहां से ले जाया गया। जिसमें से भी एक बाघिन की बाद में मौत हो गई। अब यहां बार-बार बाघ छोड़े जाने की बात उठती आई है, लेकिन हालात आज भी नहीं बदले हैं। परियोजना क्षेत्र में आज भी काफी लोग निवास कर रहे हैं, जो मुआवजा कम होने की बात कह कर यहां से निकलना नहीं चाहते। अधिकांश लोग इलाका छोड़कर जा चुके हैं लेकिन जो लोग यहां पर रह रहे हैं उनका साफ तौर पर कहना है कि जो मुआवजा सरकार द्वारा उनको दिया जा रहा है वह पर्याप्त नहीं है। लोग कहते हैं कि उनकी जमीनें यहां पर बहुत ज्यादा है, ऐसे में मुआवजा राशि उनके लिए कम पड़ रही है। वह स्पेशल पैकेज की मांग करते हैं या सरकार से मुआवजा बड़ा कर दिए जाने की मांग कर रहे हैं। लेकिन पूरे मामले के चलते परियोजना आगे नहीं बढ़ पा रही है और हालात ऐसे हो गए हैं कि ना तो यह इलाका बाघों के काम आ रहा है ना ही इंसानों के। बस्तियां उजड़ गई है लेकिन बाघ भी नहीं बस पाए हैं। <br />   <br />परियोजना के मशालपुरा गांव में लगभग 7 परिवार इस वक्त रह रहे हैं, जो साफ तौर पर कहते हैं कि उनको मुआवजा पर्याप्त नहीं मिल रहा है। उनका कहना है कि 15 लाख रुपए प्रत्येक व्यक्ति के हिसाब से सरकार ने मुआवजा दिया है, ऐसे में जिन लोगों की यहां जमीन नहीं थी वह 15-15 लाख रुपए लेकर चले गए, लेकिन जो अब यहां बचे हैं उनकी काफी जमीन यहां पर हैं, ऐसे में उनके नुकसान की पूर्ति 15 लाख रुपए से नहीं हो सकती, इसलिए वह यहां से नहीं जाएंगे। लोगों को आरोप है कि वोट डालने के लिए सरकार 18 साल के व्यक्ति को बालिग मानती है जबकि टाइगर रिजर्व में मुआवजे के लिए आयु सीमा 21 वर्ष रखी गई, ऐसे में कई परिवारों को काफी नुकसान हो रहा है और वह यहां से जाना नहीं चाहते। माना जाता है खुद का फैसलाटाइगर रिजर्व परियोजना में सरकार के पास ऐसा कोई नियम नहीं है कि वह वहां रहने वाले लोगों को जबरदस्ती बाहर निकाल सकें। पूरा मामला स्वैच्छिक है यदि व्यक्ति अपनी मर्जी से जाना चाहता है तभी वह यहां से जाएगा और उसको मुआवजा मिलेगा, लेकिन जो व्यक्ति वहां मर्जी से रहना चाहते हैं उनको वहां से निकला नहीं जा सकता, ऐसे में यहां रहने वाले लोगों पर सरकार और प्रशासन का कोई अंकुश नहीं है और वह इनको यहां से नहीं हटा पा रहे हैं, तथा यहां रहने वाले लोगों का साफ कहना है कि उन्हें स्पेशल पैकेज या स्पेशल मुआवजा जब तक नहीं मिलेगा तब तक वह यहां से नहीं जाएंगे, ऐसे में टाइगर रिजर्व परियोजना पर तलवार लटकी हुई है, क्योंकि बाघ और इंसान एक बार यहां पर साथ रहे तो बाघ खत्म हो गए थे,अब दोबारा अगर यहां बाघों को छोड़ा जाता है तो वह एक तरह का जोखिम लेना ही कहलाएगा।</p>
<p><strong>इनका कहना है </strong><br />परियोजना क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीणों से कैंप लगाकर बातचीत की गई थी तथा आगे भी कैंप आयोजित करके उनसे समझाइश की जा रही है, कुछ लोग वहां से जाने को राजी हो गए हैं लेकिन कुछ वहां से जाना नहीं चाहते, प्रशासन के स्तर पर लगातार प्रयास कर रहे हैं तथा उनकी मांगों से सरकार को भी अवगत करवाया जा रहा है। <br /><strong>- अजय सिंह राठौड़, जिला कलेक्टर, झालावाड़।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>झालावाड़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 26 Nov 2024 16:26:25 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>दोगलापन : विकास ही नहीं लापता बाघों को खोजने में भी मुकुंदरा दरकिनार</title>
                                    <description><![CDATA[5 साल से लापता है मुकुंदरा का बाघ एमटी-1 व 2 शावक ।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/hypocrisy--mukundra-is-ignored-not-only-in-development-but-also-in-finding-the-missing-tigers/article-95844"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/257rtrer-(3)4.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के साथ हर मोर्चे पर सौतेला व्यवहार किया जाता रहा है। बाघों की शिफ्टिंग हो या विकास कार्य सभी में मुकुंदरा को उपेक्षित रखा गया। लेकिन अब लापता बाघों को खोजने में भी एमएचटीआर को दरकिनार कर दिया गया। दरअसल, रणथम्भौर से पिछले एक साल में14 बाघ लापता हो गए तो उन्हें खोजने के लिए प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक ने जांच कमेटी गठित कर दी। लेकिन, मुकुंदरा का बाघ एमटी-1 व 2 शावक पिछले पांच साल से लापता हैं, जिन्हें ढूंढने तक का प्रयास नहीं किया जा रहा। तीन सदस्यीय जांच कमेटी न सिर्फ रणथम्भौर के लापता बाघों को खोज रही बल्कि टाइगर मॉनिटरिंग के समस्त रिकॉर्ड को भी खंगाल रही। वहीं, रणथम्भौर प्रशासन ने उन्हें ढूंढने के अब तक क्या प्रयास किए, अधिकारियों व कर्मचारियों की लापरवाही की भी जांच कर रही है। लेकिन, मुकुंदरा के 82 वर्ग किमी के एनक्लोजर से बाघ एमटी-1 अचानक गायब हो जाता है, जिसका कहीं सुराग नहीं मिलता फिर भी तत्कालीन अधिकारियों की लापरवाही की जांच करना तक मुनासिब नहीं समझा। वन्यजीव विशेषज्ञों का मत है कि वन विभाग का टॉप मैनेजमेंट ही मुकुंदरा को पनपने नहीं देना चाहता। </p>
<p><strong>5 साल से लापता बाघ एमटी-1 व शावक </strong><br />मुकुंदरा टाइगर रिजर्व की दरा रैंज में 82 हैक्टेयर के एनक्लोजर से बाघ एमटी-1 19 अगस्त 2020 के बाद से अचानक गायब हो गया। जिसको ढूंढने के सार्थक प्रयास नहीं किए गए। वहीं, इससे पहले 3 अगस्त 2020 को बाघिन एमटी-2 का एक शावक लापता हो गया। इसके अगले ही महीने 22 मई को एमटी-4 का शावक भी गायब हो गया। जिनका आज तक कोई सुराग नहीं लगा। हालांकि, वन अधिकारी दबी जुबान से बाघ एमटी-1 व दोनों शावकों के मृत मान रहे हैं लेकिन अधिकारिक रूप से घोषणा नहीं कर रहे। ऐसे में आज भी यह बाघ व शावक वन विभाग के कागजों में जिंदा है।</p>
<p><strong>रेडियोकॉलर की बैट्री खराब थी फिर भी नहीं बदली</strong><br />वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक बाघ एमटी-1 के गले में लगे रेडियोकॉलर की बैट्री खराब हो चुकी थी। जिसकी जानकारी तत्कालीन डीएफओ सहित क्षेत्रिय वन अधिकारियों को थी। इसके बावजूद उसकी बैट्री नहीं बदली गई। वहीं, दरा रैंज में करोड़ों का ई-सर्विलांस सिस्टम भी लगा हुआ है, जो 24 घंटे जंगल की निगरानी, बाघ का मूवमेंट व अवैध गतिविधियों पर नजर रखने और तत्काल अधिकारियों को सूचना देने का काम करता है। इसके बावजूद बाघ अचानक एनक्लोजर से गायब हो जाता है और अत्याधुनिक संसाधन होने के बावजूद किसी को भी पता नहीं लगता। जबकि, टाइगर मॉनिटरिंग व ट्रैकिंग के लिए टीमें भी गठित थी। इसमें तत्कालीन अधिकारियों की घोर लापरवाही उजागर हुई, इसके बावजूद उनकी भूमिका की न तो जांच हुई और न ही लापरवाही बरतने वाले दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई। </p>
<p><strong>3 करोड़ का सर्विलांस, 20 कैमरा टावर फिर भी टाइगर गायब </strong><br />मुकुंदरा टाइगर रिर्जव 6 रेंजों में बांटा गया है। जिसमें दरा, जवाहर सागर, कोलीपुरा, रावंठा, बोराबांस व गागरोन रेंज शामिल है। टाइगर रिजर्व की निगरानी के लिए 3 करोड़ का ई-सर्विलांस एंड एंटी पोचिंग सिस्टम, 20 कैमरा टावर और 200 से ज्यादा कैमरा ट्रैप लगे हुए हैं। दरा रेंज में ही सर्विलांस लगा है, जिससे सभी रेंजों में लगे कैमरा टावर जुड़े हैं। इसकी मॉनीटरिंग डीओआईटी डिपार्टमेंट करता है। इसके लिए यहां सेंटलाइज कमाण्ड सेंटर बना हुआ है। जिससे 24 घंटे जंगल की एक-एक गतिविधियों पर नजर रखी जाती है। सभी कैमरे टावर नाइट विजन हैं। अत्याघुनिक तकनीक से लैस होने के बावजूद टाइगर व शावकों का लापता होना और खोज नहीं पाना, वन विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल है। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />हर महीने टाइगर एमटी-1 व दोनों शावकों के लापता होने की रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को भेजी जाती है। हमारे स्तर पर बाघ व शावक को ढूंढने का प्रयास किया जा रहा है। <br /><strong>- रामकरण खैरवा, संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक, वन विभाग </strong></p>
<p>इस संबंध में प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक से बात की जा सकती है।<br /><strong>- मूथू एस, डीएफओ, मुकुंदरा टाइगर रिजर्व</strong></p>
<p><strong>क्या कहते हैं वन्यजीव प्रेमी</strong><br />82 वर्ग किमी के एनक्लोजर से अचानक बाघ एमटी-1 के  लापता होना निश्चित रूप से तत्कालिन अधिकारियों की घोर लापरवाही है। वह जानते थे कि एमटी-1 शिकार हो चुका है। इसलिए, अपनी लापरवाही छिपाने के लिए उसे कागजों में लापता बताकर जिंदा दर्शाते रहे। इसके बाद पदस्थापित होने वाले अधिकारियों ने भी यही परिपाटी चलाई। वर्तमान में भी इसे लापता ही दर्शाया जा रहा है।  ऐसे में रणथम्भौर की तर्ज पर एमटी-1 के लापता होने की जांच की जानी चाहिए। वन विभाग के टॉप मैनेजमेंट को मुकुंदरा के प्रति दोहरा रवैया नहीं अपनाना चाहिए। <br /><strong>- तपेश्वर सिंह भाटी, मुकुंदरा एवं पर्यावरण समिति अध्यक्ष</strong></p>
<p>वैसे तो एमटी-1 जीवित नहीं है। यह बात वन अधिकारी भी मानते हैं। यदि, उनकी नजर में बाघ एमटी-1 व दोनों शावक लापता हैं तो उन्हें ढूंढने के लिए रणथम्भौर की तरह जांच कमेटी गठित करनी चाहिए। उन्हें खोजने का प्रयास न करना ही जीवित न होने का प्रमाण दर्शाता है। वन अधिकारियों की कथनी-करनी में स्पष्ट अंतर नजर आता है, लेकिन टॉप मैनेजमेंट को नजर नहीं आना, समझ से परे है। <br /><strong>- एएच जैदी, नेचर प्रमोटर</strong></p>
<p>वन विभाग के पास अत्याधुनिक संसाधन होने के बावजूद बाघ तलाश न पाना अधिकारियों की घोर लापरवाही का नतीजा है। उनकी कार्य क्षमता, कार्य कुशलता, कार्य के प्रति गंभीरता पर सवाल उठता है। वन अधिकारी काम को बोझ समझने की प्रवृति के आदि हो चुके हैं। ऐसे में विभाग को अधिकारियों द्वारा करवाए गए कार्यों की प्रति वर्ष मूल्यांकन करवाना चाहिए ताकि उनकी वर्क परफॉर्मेंस का पता लग सके। रणथम्भौर के अलावा मुकुंदरा व सरिस्का से भी टाइगर लापता है, उन्हें भी खोजने के प्रयास करना चाहिए। यदि, नहीं तो उन्हें मृत घोषित करें और इसके जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई अमल में लाई जाए।<br /><strong>- बाबू लाल जाजू, प्रदेश प्रभारी, पीपुल फॉर एनीमल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 Nov 2024 16:03:33 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>झुमरी से जल्द मिलेगी खुशखबरी; बाघ का जोड़ा लाने में भालू की भी अहम भूमिका</title>
                                    <description><![CDATA[नाहरगढ़ जैविक उद्यान के वरिष्ठ वन्यजीव चिकित्सक डॉ. अरविंद माथुर ने बताया कि यहां झुमरी के खानपान का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/good-news-will-soon-be-received-from-jhumri-bear-also/article-93171"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-10/630400-size-(6)14.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। नाहरगढ़ जैविक उद्यान में विभिन्न प्रजातियों के वन्यजीव रहवास कर रहे हैं। इनमें से कइयों में सफल प्रजनन भी हो रहा है। बाघिन रानी और शेरनी तारा के बाद अब यहां रह रही मादा भालू झुमरी के भी नवम्बर तक बच्चे देने की संभावना जताई जा रही है। झुमरी को नर भालू शम्भू के साथ जोड़ा बनाकर रखा गया था। इससे पहले झुमरी साल 2020 और 2022 बच्चों को जन्म दे चुकी है।</p>
<p>इसका एक बच्चा नर भालू गणेश कोटा के अभेड़ा जैविक उद्यान में पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। वहीं जयपुर स्थित नाहरगढ़ जैविक उद्यान में करीब 21 साल का नर भालू शंभू, करीब 13 साल की मादा भालू झुमरी और 2 साल की कावेरी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है। </p>
<p>नाहरगढ़ जैविक उद्यान के वरिष्ठ वन्यजीव चिकित्सक डॉ. अरविंद माथुर ने बताया कि यहां झुमरी के खानपान का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। इसे सीजनल फू्रट्स, शहद देने के साथ ही जल्द अण्डे देने भी शुरू किए जाएंगे। इसके अतिरिक्त आवश्यक मिनरल, कैल्शियम और सप्लीमेंट्स दिए जा रहे हैं। अभी झुमरी को नर भालु शंभू से अलग दूसरे पिंजरे में रखा जा रहा है।</p>
<p><strong>बाघ के जोड़े के बदले में दिया गया भालू भी  </strong><br />पिछले माह के दौरान नागपुर से बाघ गुलाब और बाघिन चमेली को यहां लाया गया था। इनके एक्सचेंज कार्यक्रम में भालुओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। इस दौरान नर भालू कार्तिकेय, एक जोड़ा जरख और एक जोड़ा भेड़िए का दिया गया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 16 Oct 2024 11:02:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बाघों की नगरी में रॉयल रणथंभौर इंटरनेशनल टाइगर वीक का आयोजन</title>
                                    <description><![CDATA[विश्व प्रसिद्ध वाइल्ड लाइफ फिल्म मेकर सुबैया नल्ला मुत्थु की फिल्माई डॉक्यूमेंट्री को देखकर सभी ने बाघों की जिंदगी को करीब से देखा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/royal-ranthambore-international-tiger-week-organized-in-the-city-of/article-83291"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/t.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। बाघों की आबादी की जब भी बात आती है तो दुनिया की नजर भारत की तरफ  मुड़ जाती है। भारत के मूल में जीव संरक्षण के संस्कार है यही कारण है कि दुनियाभर में बाघों की आबादी के 70 फीसदी बाघों को हम यहां सुरक्षित रख पाए है।</p>
<p>बाघों की दुनिया को सुंदर और सुरक्षित बनाने और इस मुहिम को उत्सव की तरह मनाने के उद्देश्य से आनंद भारद्वाज, नवरोज डी धोंडी और सुनील मंगल ने स्थापित संस्था लिव 4 फ्रीडम की ओर से आयोजित रॉयल रणथंभौर इंटरनेशनल टाइगर वीक के तीसरे संस्करण में विशेषज्ञों ने विभिन्न विषयों पर विचार रखे। कार्यक्रम में 7 कैटेगिरी में अवार्ड दिए गए। इसी के साथ बाघ व पर्यावरण संरक्षण में बेहतरीन काम करने वाली शख्सियतों को सम्मानित किया गया।</p>
<p>विश्व प्रसिद्ध वाइल्ड लाइफ फिल्म मेकर सुबैया नल्ला मुत्थु की फिल्माई डॉक्यूमेंट्री को देखकर सभी ने बाघों की जिंदगी को करीब से देखा। स्कूली बच्चों ने भी कार्यक्रम में हिस्सा लिया। पर्यावरण प्रेमियों ने टाइगर सफारी का लुत्फ भी उठाया। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Jul 2024 11:19:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>टाइगर की एंट्री से हिंडोली के विकास को लगेंगे चार चांद</title>
                                    <description><![CDATA[वन एवं वन्य जीव सुरक्षा संरक्षण के लिए कई प्रकार की संरचनाओं के लिए कार्य किया जा रहे हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bundi/tiger-s-entry-will-boost-development-of-hindoli/article-60628"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-10/tiger-ki-entry-s-hindoli-k-vikas-me-lgenge-char-chand...hindoli,-bundi-news...27-10-2023.jpg" alt=""></a><br /><p>हिंडोली। हिंडोली के रामगढ़ विषधारी अभयारण्य में वन विभाग भी टाइगरों के मन माफिक बफर जोन बनाकर उनको लुभाने का कार्य कर रहा है। बफर जोन में जिस दिन टाइगर की एंट्री होगी। उसी दिन से हिंडोली के विकास में चार चांद लगने शुरू हो जाएंगे। हिंडोली वन क्षेत्र कालदा और बूंदी वन क्षेत्र के कुछ हिस्सों को जोड़कर बसोली रेंज का गठन वन विभाग करने जा रहा है। इसके प्रस्ताव राज्य सरकार को भेज दिए गए हैं और वन विभाग टाइगर बसाने की जुगत में लगा हुआ है। इसके लिए वन विभाग ने बसोली गांव के नजदीक राष्ट्रीय राजमार्ग 148 डी पर भवन निर्माण का काम भी शुरू कर दिया है। कालदा वन क्षेत्र में इंसानी दखल और जानवरों पर प्रतिबंध लगेगा।</p>
<p><strong>वन एवं वन्य जीव सुरक्षा की संरचना</strong><br />हिंडोली रेंजर दीपक जासू ने बताया कि वन एवं वन्य जीव सुरक्षा संरक्षण के लिए कई प्रकार की संरचनाओं के लिए कार्य किया जा रहे हैं। जैसे प्राकृतिक जल स्रोत, वॉच टावर, फोर्स ट्रैकिंग के लिए रास्तों का निर्माण, चेक पोस्ट, वैरियर, वन्यजीवों की आग से सुरक्षा आदि का विशेष ध्यान दिया जा रहा है।</p>
<p><strong>रामगढ़ विषधारी अभयारण्य टाइगर के लिए पसंदीदा जगह</strong><br />ज्ञात रहे कि रामगढ़ विषधारी अभ्यारण में रणथंभौर अभयारण्य से टाइगर आकर सुकून महसूस कर रहे हैं। कई बार टाइगर तलवास वन क्षेत्र और रामगढ़ महल के आसपास घूम कर वापस भी जा चुके हैं लेकिन अब आने वाले टाइगर रामगढ़ विषधारी अभयारण्य में अपना बसेरा बना रहे हैं। इसी के अनुरूप वन विभाग भी टाइगरों के मन माफिक बफर जोन बनाकर उनको लुभाने का कार्य कर रहा है। कालदा वन क्षेत्र रामगढ़ विषधारी अभयारण का हिस्सा है।  इस जंगल में कई जंगली जानवर निवास करते हैं। वन विभाग वापस इस जंगल को टाइगरों के लिए आबाद  करने पर कमर कस चुका है। कालदा वन क्षेत्र के बफर जोन में जिस दिन टाइगर की एंट्री होगी। उसी दिन से हिंडोली के विकास में चार चांद लगने शुरू हो जाएंगे क्योंकि बसोली और कालदा हिंडोली उपखंड क्षेत्र के हिस्से हैं। पर्यटक आने जाने से कई नए बिजनेस के द्वारा भी खुल सकेंगे।</p>
<p>हिंडोली रेंजर डॉक्टर दीपक जासू  ने बताया कि हिंडोली वन क्षेत्र के कालदा और बूंदी वन क्षेत्र को मिलाकर आरवीटीआर के लिए बफर जोन में बसौली रेंज का गठन किया है। इसके लिए सात-आठ माह पहले राज्य सरकार को प्रस्ताव भिजवाए  जा चुके हैं। इसके साथ ही भवन का निर्माण भी शुरू कर दिया गया है।</p>
<p>रेंजर डॉक्टर दीपक जासू ने बताया कि कालदा वन क्षेत्र बहुत ही घना और प्राकृतिक दृष्टि से बहुत ही शांत और रमणीक स्थान है। इस जंगल में कालका माता मंदिर और दुवार्सा महादेव का स्थान होने से इंसान और जानवरों का दखल बहुत ज्यादा है। आने वाले समय में इंसानी और जानवरों के दखल को कम किया जाएगा। जिससे वन्य जीवन और टाइगर को किसी प्रकार की समस्या नहीं हो।    </p>
<p><strong>इनका कहना है </strong><br />हिंडोली और बूंदी वन क्षेत्र को मिलाकर अलग से आर. वी. टी. आर. के बफर जोन के लिए बसोली रेंज का गठन करने से कालदा जंगल सुरक्षित रखने एवं वन्य जीव सुरक्षा के लिहाज से वरदान साबित होगा। <br /><strong>- डॉ दीपक जासु, रेंजर हिंडोली</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बूंदी</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Oct 2023 17:50:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सफेद बाघों की कब्रगाह बना नाहरगढ़ जैविक उद्यान</title>
                                    <description><![CDATA[नाहरगढ़ जैविक उद्यान सफेद बाघ-बाघिन के लिए कब्रगाह साबित हो रहा है। यहां अब तक तीन बाघ-बाघिन लाए गए, जिससे पर्यटकों की रुचि बढ़ी, लेकिन सभी की मौत हो गई। प्रदेश में एक मात्र सफेद बाघ चीनू ने रविवार को 12 बजकर, 18 मिनट पर दम तोड़ दिया। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/nahargarh-biological-park-became-the-graveyard-of-white-tigers/article-14059"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-07/white-tiger-new.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>जयपुर।</strong> नाहरगढ़ जैविक उद्यान सफेद बाघ-बाघिन के लिए कब्रगाह साबित हो रहा है। यहां अब तक तीन बाघ-बाघिन लाए गए, जिससे पर्यटकों की रुचि बढ़ी, लेकिन सभी की मौत हो गई। प्रदेश में एक मात्र सफेद बाघ चीनू ने रविवार को 12 बजकर, 18 मिनट पर दम तोड़ दिया। चीनू के शुरुआती लक्षण लेप्टोस्पायरोसिस के लगे, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कार्डियक अरेस्ट से मौत होना आया है। वन विभाग ने मेडिकल बोर्ड बनाकर उसका पोस्टमार्टम कराया और बाद में उसका अन्तिम संस्कार किया।</p>
<p><strong>बीमार था चीनू</strong><br />सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सफेद बाघ चीनू दो जुलाई से बीमारी के चलते कभी आधा तो कभी एक किलो ही डाइट ले रहा था। 5 जुलाई से इनसे खाना बंद कर दिया था, केवल सूप और पानी पी रहा था।</p>
<p><br /><strong>मॉनिटरिंग की कमी से हो रही मौतें</strong><br />विशेषज्ञों का मानना है कि अप्रशिक्षित वन्यजीव चिकित्सक, प्रशासनिक लापरवाही और मॉनिटरिंग की कमी ने नाहरगढ़ जैविक उद्यान में आए दुर्लभ सफेद बाघ जीवित नहीं बचे। जब सफेद बाघ राजा में लेप्टोस्पायरोसिस मिलने की बात सामने आई थी, उस समय भी उसे कोई स्पेशल ट्रीटमेंट नहीं दिया। ऐसा ही सीता के समय हुआ था।</p>
<p><strong>पिंजरे में केवल हाइब्रीड शेरनी, प्योर एशियाटिक सफारी में   </strong><br />नाहरगढ़ जैविक उद्यान में बिग कैट्स की बात करें तो अब बाघ नाहर, शिवाजी, बाघिन रंभा, महक और रानी बचे हैं। यहां एक हाइब्रीड शेरनी सुहासिनी पिंजरे में डिस्प्लेड है। इसके अतिरिक्त विजिटर्स को प्योर एशियाटिक लॉयन केवल लॉयन सफारी में ही देखने को मिलेंगे। यहां शेर त्रिपुर, शेरनी तारा और सृष्टि रहवास कर रहे हैं, जिन्हें रोटेशन के आधार पर सफारी में छोड़ा जाता है।</p>
<p>नाहरगढ़ जैविक उद्यान में इससे पूर्व भी दो सफेद बाघ-बाघिन की मौत हो चुकी है। दिल्ली जू एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत सफेद बाघिन सीता को 2013 में जयपुर चिड़ियाघर लाया गया था और इसका जोड़ा सफेद बाघ राजा के साथ बनाया गया। नाहरगढ़ जैविक उद्यान बनाए जाने के बाद सभी वन्यजीवों का यहां शिफ्ट कर दिया। इनकी वंश बढ़ोतरी होती, उससे पहले ही सफेद बाघिन सीता की 27 सितंबर, 2019 को केनाइन डिस्टेंपर से मौत हो गई। सफेद बाघ राजा ने भी 4 अगस्त, 2020 को लेप्टोस्पायरोसिस से दम तोड़ दिया।</p>
<p>19 सितम्बर, 2019 को शेरनी सुजैन की कैनाइन डिस्टेंपर से मृत्यु<br />21 सितम्बर, 2019 को नौ माह की शावक बाघिन रिद्धि की कैनाइन डिस्टेंपर से मृत्यु<br />9 जून, 2020 को 18 माह के शावक बाघ रुद्र की लेप्टोस्पायरोसिस से मृत्यु<br />11 जून, 2020 को लेप्टोस्पायरोसिस से शेर सिद्धार्थ की मृत्यु<br />18 अक्टूबर, 2020 को कॉर्डियक अरेस्ट से शेर कैलाश की मृत्यु<br />3 नवम्बर, 2020 को लेप्टोस्पायरोसिस से शेर तेजस की मृत्यु<br />12 दिसम्बर, 2020 को शेरनी तारा के शावक की कमजोरी से मृत्यु</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 Jul 2022 16:12:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रणथंभौर नेशनल पार्क में एक माह में तीन टाइगर मिले मृत</title>
                                    <description><![CDATA[ रणथंभौर टाइगर रिजर्व अब टाइगरों के लिए महफू ज नहीं लग रहा है। यहां पिछले एक महीने में तीन बाघों की मौत हो चुकी है। जबकि पिछले एक साल में रणथंभौर में आधा दर्जन बाघों की मौत हुई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/sawai-madhopur/three-tigers-found-dead-in-one-month-in-ranthambore-national/article-11596"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/131.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>सवाई माधोपुर।</strong> बाघों का घर कहे जाने वाला रणथंभौर टाइगर रिजर्व अब टाइगरों के लिए महफू ज नहीं लग रहा है। यहां पिछले एक महीने में तीन बाघों की मौत हो चुकी है। जबकि पिछले एक साल में रणथंभौर में आधा दर्जन बाघों की मौत हुई है। प्रदेश में रणथंभौर बाघों की संख्या में एक नम्बर पर है तो यह बाघों के गायब होने और मौत होने में भी एक नम्बर पर है। वन विभाग टाइगरों की मौत के पीछे टेरेटोरियल फाइट का कारण बता रहा है।<br /> वन विभाग से मिली जानकारी के आंकड़ों में यह खुलासा हुआ है।</p>
<p><span style="color:#ff0000;"><strong> 23 दिनों में तीन बाघ बाघिन की मौत</strong></span></p>
<p>रणथम्भौर में 23 दिनों में तीन बाघ बाघिन की मौत हो चुकी है। जबकि पिछले एक साल यानी जून 2021 से जून 2022 तक की बात की जाए तो ये आंकड़ा बढ़कर दुगना यानी 6 तक पहुंच जाता है। पिछले एक माह से भी कम समय में महज 23 दिनों में तीन बाघ बाघिन की मौत हो चुकी है और यदि पिछले एक साल यानी जून 2021 से जून 2022 तक की बात की जाए तो ये आंकड़ा बढ़कर दुगना यानी 6 तक पहुंच जाता है। 1 अप्रैल 2021 को गंधार देह में बाघिन टी-60 के शावक का शव मिला था। साल 2021 के मई माह में तांबाखान वन क्षेत्र में बाघिन टी 102 के शावक का शव मिला था। 6 जुलाई 2021 को खंडार रेंज में पानी में बाघ टी-65 का शव मिला। 13 मई 2022 को जामोदा के नाले में बाघिन टी 61 का शव मिला।</p>
<p><span style="color:#ff0000;"><strong> बाघों का कुनबा लगातार बढ़ा</strong></span></p>
<p>24 मई 2022 को खंडार रेंज में बाघिन टी-69 के मादा शावक का शव मिला। 5 जून 2022 को आरओपीटी रेंज में बाघ टी 34 का शव मिला है। इन सभी बाघों की मौत का कारण वन विभाग की ओर से टेरोटोरियल बताई है। इस मामले को लेकर रणथंभौर टाइगर रिजर्व के डीएफ ओ महेन्द्र शर्मा का कहना है कि रणथम्भौर में संरक्षण के लिए बेहतरीन काम किए जा रहे हैं। जिससे बाघों का कुनबा लगातार बढ़ रहा है। जहां तक बाघों की मौत का सवाल है तो रणथम्भौर में वर्तमान में क्षमता से अधिक बाघ-बाघिन है। ऐसे में कभी कभी बाघों में इलाके को लेकर संघर्ष हो जाता है। पिछले एक साल में जितने बाघों की मौत हुई है उससे ज्यादा बाघ बाघिन भी रणथम्भौर को मिले हैं। जहां तक बाघ टी 34 की मौत का सवाल है तो वह उम्र दराज बाघ था। बाघ के साथ संघर्ष में सम्भवत: इसकी मौत हुई है।</p>
<p><br /><span style="color:#ff0000;"><strong>सुल्तान ने दिया शावकों को जन्म</strong></span></p>
<p>रणथंभौर नेशनल पार्क के सूत्रों के अनुसार मिश्र द्वारा से घुसते ही राइट साइड में दूरबीन से बाघिन के साथ दो शावक दिखाई दिए हैं। लेकिन वन विभाग के फोटो ट्रैप कैमरे में बाघिन की फोटो कैद नहीं हुई है। इसके चलते वन अधिकारियों ने बाघिन के मां बनने की पुष्टि नहीं की है। वन्य जीव विशेषज्ञों के अनुसार बाघिन की शारीरिक संरचना को देखते हुए उसके मां बनने की संभावना जताई जा रही है। वन विभाग के मुताबिक बाघिन-107 सुल्ताना के नाम से प्रसिद्ध है। पहली बार बाघिन अपने दो नए शावकों के साथ 8 नवम्बर 2020 में अमरेश्वर वन क्षेÞत्र केमरा ट्रैप हुई थी। सुल्ताना का संभवतया यह दूसरा प्रसव है। फि लहाल एतिहात के तौर पर वन विभाग ने बाघिन के इलाके की मॉनिटरिंग बढ़ा दी है। जिससे बाघिन और शावकों की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके।<br /><br /></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                            <category>सवाई माधोपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Jun 2022 13:03:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> रणथंभौर में बाघों का बढ़ा कुनबा:  आपसी संघर्ष नहीं ले रहा थमने का नाम </title>
                                    <description><![CDATA[सवाई माधोपुर। स्वछंद विचरण करते बाघों की अठखेलियों को लेकर विश्व पटल पर अपनी अलग पहचान बना चुके राजस्थान के सवाई माधोपुर में स्थित रणथंभौर नेशनल पार्क में लगातार बढ़ रही बाघों की संख्या वनाधिकारियों के लिए चिंता का सबब बनती जा रही है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/sawai-madhopur/-draft--add-your-titlewildlife--continuous-increase---number---tigers---ranthambore/article-10601"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/tiger2.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>सवाई माधोपुर।</strong> स्वछंद विचरण करते बाघों की अठखेलियों को लेकर विश्व पटल पर अपनी अलग पहचान बना चुके राजस्थान के सवाई माधोपुर में स्थित रणथंभौर नेशनल पार्क में लगातार बढ़ रही बाघों की संख्या वनाधिकारियों के लिए चिंता का सबब बनती जा रही है। रणथंभौर में वन विभाग की मॉनिटरिंग एंव उनके लाख प्रयासों के बावजूद टेरेटरी को लेकर आये दिन बाघों के बीच आपसी संघर्ष थमने का नाम नही ले रहा, जिसके चलते रणथंभौर के वनाधिकारी भी चिंतित है।</p>
<p><strong>रणथंभौर में लगातार बढ़ती बाघों की संख्या</strong> <br />आपको बता दें कि रणथंभौर बाघों की अठखेलियों को लेकर देश ही नही अपितु विदेशों में भी अपनी एक अलग ही पहचान बना चुका है, सरकार के प्रयास एवं वन विभाग की अथक मेहनत के चलते रणथंभौर में लगातार बाघों की संख्या में वृद्धि हो रही है, लेकिन अब रणथंभौर में लगातार बढ़ती बाघों की संख्या वनाधिकारियों के लिए चिंता का सबब भी बनती जा रही है। 1300 स्कवायर किलोमीटर से भी अधिक क्षेत्र में फैले रणथंभौर नेशनल पार्क में वर्तमान में तकरीबन 78 बाघ बाघिन एवं शावक है। जिसके चलते यहाँ बाघों के लिए जगह कम पड़ने लगी है, ऐसे में टेरेटरी को लेकर आये दिन रणथंभौर में बाघों के बीच आपसी संघर्ष होता रहता है, जिसमे कई मर्तबा जहां बाघ बाघिन घायल हो जाते है वही कई बार उनकी मौत भी हो जाती है। जैसा कि 24 मई को खंडार रेंज में एक बाघिन के शावक की मौत हो गई थी, रणथंभौर के सीसीएफ सेडूराम यादव की माने तो टाईगर टेरोटिरियल बिहेवियर का एनिमल है, जिसके चलते टेरेटरी को लेकर इनमें आपसी संघर्ष होता रहता है। सीसीएफ के मुताबिक रणथंभौर में बाघ एंव बाघिन का रेसो वन प्लस वन का है, रणथंभौर में बढ़ती बाघों की संख्या के मध्यनजर सरकार एंव वन विभाग द्वारा रणथंभौर का क्षेत्रफल बढ़ाने का भी प्रयास किया जा रहा है। सीसीएफ का कहना है कि रामगढ़ विषधारी अभ्यारण एंव कैलादेवी कॉरिडोर को डवलप किया जाएगा।ताकि टाईगर को आवश्यता के मुताबिक प्रयाप्त जगह मिल सके, दोनों इलाके डवलप होने के बाद टाईगर को पयार्वास के लिए पर्याप्त जगह मिल जायेगी तो टाईगर के बीच होने वाला आपसी टकराव भी समाप्त हो जाएगा।</p>
<p><strong>सैलानियों</strong><strong> का तांता</strong></p>
<p>बाघों की अठेखेलिया देखने के लिए रणथंभौर में वर्ष भर सैलानियों का तांता लगा रहता है ,लेकिन रणथंभौर में बढ़ती बाघों की संख्या के चलते आये दिन बाघों के बीच होने वाली आपसी मुठभेड़ वन विभाग के अधिकारियों के लिए बड़ी चिंता का विषय है। रणथंभौर में अधिकतर बाघ बाघिन रणथंभौर के कोर एरिया में विचरण करते है, ऐसे में पर्यटन गतिविधिया में यही अधिक है, रणथंभौर के बाहरी इलाके में कम ही टाईगर है जो विचरण करते है। सीसीएफ की माने तो कैलादेवी कॉरिडोर एरिया में अभी 43 गांव ऐसे है जिन्हें विस्तापित किया जाना है, इन 43 गाँवो को विस्तापित करना बड़ा कठिन कार्य है और जब तक ये गांव विस्तापित नही होंगे तब तक रणथंभौर के बाघों को पर्याप्त जगह नही मिल पाएगी। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>सवाई माधोपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 May 2022 16:53:26 +0530</pubDate>
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                <title>बाघिन के लिए दो बाघों में होता है संघर्ष </title>
                                    <description><![CDATA[रणथम्भौर बाघ परियोजना में नर और मादा बाघ का लिंगानुपात गड़बड़ा गया है। रणथम्भौर में बाघ और बाघिन का लिंगानुपात अनुपात 1, 1.3 है, जबकि एक बाघ के साथ तीन से चार बाघिन होनी चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/jaipur--sawaimadhopur--struggle-between-2-tigers-for-tigress/article-8540"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/tiger--copy.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर/ सवाईमाधोपुर। रणथम्भौर बाघ परियोजना में नर और मादा बाघ का लिंगानुपात गड़बड़ा गया है। रणथम्भौर में बाघ और बाघिन का लिंगानुपात अनुपात 1, 1.3 है, जबकि एक बाघ के साथ तीन से चार बाघिन होनी चाहिए। एक नर बाघ, मादा बाघिन को अपने साथ अपनी टेरेटरी में रखने के लिए दूसरे नर बाघ से टकरा जाता है। सूत्रों के अनुसार बाघ परियोजना से बड़ी संख्या में बाघों के पलायन करने का एक बड़ा कारण यह भी है कि वहां पर एक बाघ के पीछे एक ही बाघिन है, जबकि आदर्श स्थिति है कि एक बाघ के साथ तीन या चार बाघिन होनी चाहिए।</p>
<p>वन मंत्री ने बताया कि बाघ परियोजना में 23 नर बाघ और 30 मादा बाघिन है। वर्तमान में नर एवं मादा बाघ का अनुपात 1,1.3 हो गया है, जो असामान्य है। अनेक शोधों में खुलासा हुआ है कि एक बाघ की टेरेटरी काफी बड़ी होती है, जिसमें बाघिन तो रह सकती है, लेकिन कोई दूसरा बाघ उसमें विचरण नहीं कर सकता है। ऐसे में टेरेटरी और बाघिन के लिए दो बाघों में संघर्ष होता है और नर बाघ जंगल छोड़कर कहीं दूर चला जाता है।</p>
<p><strong>राज्य में सर्वाधिक बाघ रणथम्भौर बाघ परियोजना में</strong></p>
<p>बाघ परियोजना की स्थापना 1973 में हुई थी। बाघ परियोजना में वर्ष 2019 में 66, 2020 में 68 और 2021 में 81 हो गई है।</p>
<p>लिंगानुपात गड़बड़ाना ठीक नहीं माना जाता है। <br /><strong>- डॉ. डीएन पाण्डेय, प्रधान मुख्य वन संरक्षक,राजस्थान सरकार</strong></p>
<p>आमतौर पर एक बाघ के साथ तीन या चार बाघिन होनी चाहिए। यदि बाघिन की संख्या कम है तो बाघों में बाघिन को लेकर बाघों में टकराव होता है, जिससे बाघ जंगल छोड़ देते है। <br />- <strong>राजपाल सिंह, प्रख्यात बाघ विशेषज्ञ,जयपुर</strong> <br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 Apr 2022 11:55:27 +0530</pubDate>
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                <title>केयर टेकर से भालू, शेर-बाघ करते हैं दोस्ताना व्यवहार</title>
                                    <description><![CDATA[नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में 26 प्रजातियों के 280 वन्यजीव रहवास कर रहे हैं। इन्हें देखने के लिए इस मौसम में औसतन 700 से 800 विजिटर्स प्रति दिन आ रहे हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/bears--lions-and-tigers-behave-friendly-with-care-taker/article-7282"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/care-takers-copy.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में 26 प्रजातियों के 280 वन्यजीव रहवास कर रहे हैं। इन्हें देखने के लिए इस मौसम में औसतन 700 से 800 विजिटर्स प्रति दिन आ रहे हैं। वन्यजीवों के खानपान, उनकी एक्टिविटीज, समय पर दवाई देने सहित अन्य कार्य केयर टेकरों के जिम्मे रहती है। अधिकारियों का कहना है कि गर्मी अधिक होने से विजिटर्स की संख्या में कम है। यह संख्या डेढ़ हजार तक भी पहुंच जाती है।</p>
<p><strong>देवानन्द</strong><br />ये 28 साल से वन्यजीवों की देखरेख का कार्य कर रहे हैं। इनके पास दो मादा और एक नर शेर की देखरेख का जिम्मा है। जैसे ही देवानन्द की गाड़ी रेस्टिंग शेल्टर के पास आती है, शेर त्रिपुर, शेरनी तारा और सृष्टि की गतिविधि में परिवर्तन देखने को मिलता है। साथ ही इनमें सफारी में छोड़े जाने की उत्सुकता रहती है। देवानन्द उनके रहन-सहन, खान-पान और समय पर आवश्यक दवाई देने का ध्यान रखते हैं। इनकी एक आवाज पर तीनों शेर जाली के पास आकर अच्छा रेस्पांस देते हैं, लेकिन जैसे ही डॉक्टर उनके पास जाते हैं त्रिपुर को कोरोना के समय जांचों के लिए लगाए इंजेक्शनों की याद आ जाती है और वह गुर्राने लग जाता है। वहीं देवानन्द के आते ही विद्यार्थी जैसे बनकर सामने बैठ जाता है।</p>
<p>सुरेन्द्र सिंह<br />ये 6 साल से वन्यजीवों की सार-संभाल कर रहे हैं। सुरेन्द्र 2 भेड़िए, 4 जरख (हाइना) और 20 सियार (जैकोल) की देखरेख करते हैं। इन्हें इन वन्यजीवों के खाने का समय और तरीका बारीकी से पता है। वे बताते हैं कि ये सुबह खाना खाने के बाद शाम को ही खाते हैं। किसी दिन ये कम खाते हैं तो हमें टेंशन हो जाती है कि आज इन्होंने कम क्यों खाया है। इसके अतिरिक्त कभी-कभी टाइगर और पैंथर की भी देखभाल करते हैं।</p>
<p><strong>भंवर सिंह आमला</strong><br />ये 6 चिंकारा, 18 सांभर, 26 चीतल, 14 ब्लैकबग, <br />4 चौसिंघा, 4 सिक्का डियर, 7 हॉक डियर, 3 बारहसिंघा, 3 सेही और 2 जंगली सूअरों की देखरेख करते हैं। इनके खानपान सहित समय पर दवाइयां देने का जिम्मा इनका ही है। जब भी रंजका, खीरा सहित अन्य खाद्य सामग्री लेकर एन्क्लोजर के करीब पहुंचते हैं तो सभी एक लाइन में खड़े हो जाते हैं, मानों अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।</p>
<p><strong>गोपाल लाल मीना</strong><br />ये नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में 6 साल से वन्यजीवों की देखभाल कर रहे हैं। इनके एक बार आवाज देने पर मादा भालू झुमरी, बच्चा गणेश और एक नर भालू एन्क्लोजर की ओर दौड़ पड़ते हैं। बच्चा गणेश थोड़ा नटखट है, लेकिन सबका चहेता है। जैसे ही शहद की बोतल लेकर आते हैं, वैसे ही सबसे आगे आकर खड़ा हो जाता है। गोपाल का कहना है कि गर्मी के मौसम में भालू फू्रट आइसक्रीम बड़े चाव से खाते हैं। इसके अतिरिक्त ये 1 लॉयन, 8 मगरमच्छ, 9 घड़ियाल, 4 डेजर्ट फॉक्स, 5 इंडियन फॉक्स, 3 ऐमू, 3 पॉम सिवेट की देखरेख करते हैं।</p>
<p><strong>मोहम्मद सादिक</strong><br />ये दो साल से 5 टाइगर और 4 पैंथर की देखरेख का जिम्मा संभाल रहे हैं। आलम ये है कि सादिक की आवाज सुनकर पैंथर कृष्णा रेस्टिंग शेल्टर की जाली के पास आ जाता है। वहीं जैसे ही खाने का समय होता है वैसे ही बाघिन चीनू, रानी और रंभा अपनी दाहड़ से बताते हैं कि भूख लग रही है। सादिक का कहना है कि बाघिन रानी को खाने में लैग पीस और मुर्गा पसंद है। बाघ नाहर को खाने में लैग पीस और सफेद बाघ चीनू को बोटी मांस ज्यादा पसंद है। <br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 Apr 2022 09:54:29 +0530</pubDate>
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