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                <title>बॉर्डर से बुकशेल्फ़ तक: कश्मीर के आदिवासी इतिहास की खिड़की है डॉ. सुहील रसूल मीर की किताबें</title>
                                    <description><![CDATA[समाजशास्त्री डॉ. सुहील रसूल मीर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की जनजातियों की लुप्तप्राय संस्कृति को किताबों के माध्यम से सहेज रहे हैं। उनका शोध क्षेत्र के बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य को उजागर करता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/dr-suhail-rasool-mirs-books-are-the-window-to-the/article-143415"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/1200-x-600-px)-(21).png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। आदिवासी समुदाय के समृद्ध रीति-रिवाजों, संस्कृति और उनके जीवन के विभिन्न आयामों को नजदीकी से जानने वाले तथा कश्मीर में सीमा के पास पले-बढ़े लेखक और समाजशास्त्री डॉ. सुहील रसूल मीर का कहना है कि ऐसे समय में जब यह इलाका बदलाव के दौर से गुजर रहा है तो ऐसे में इस तरह का दस्तावेजीकरण बहुत जरूरी है।</p>
<p>डॉ. मीर का कहना है मैं सीमा के पास एक शहर में रहता हूं, लेकिन आदिवासी समुदायों की खास संस्कृति, जीवनशैली और उनके जीवन के हालात ने मेरे लिखने के तरीके और दुनिया को देखने के नजरिए को बनाया है। उन्होंने बताया कि कैसे भूगोल और जिन्दगी के अनुभवों ने उनकी पढ़ाई की दिशा को प्रभावित किया। डॉ. मीर ने पिछले 12 सालों में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के आदिवासी इलाकों में एथनोग्राफिक फील्डवर्क में खुद को पूरी तरह से झोंक दिया है। उनके अध्ययन ने जनजातियों, सीमा के इलाकों और जातीयता के समाजशास्त्र के बीच एक खास जगह बनायी है। </p>
<p>उनके काम में वॉयसेज अक्रॉस द पीर पंजाल, द हैंडबुक ऑफ दर्द आर्यन्स, और कल्चरल इनसाइक्लोपीडिया ऑफ दर्द-ट्राइब जैसे महत्वपूर्ण एथनोग्राफिक योगदान शामिल हैं। ये किताबें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में आदिवासी जनजातियों के इतिहास, संस्कृति और जीवित परंपराओं को कागज पर उतारने का काम करती हैं। </p>
<p>उन्होंने यूनी के साथ खास बातचीत में कहा, मेरे शोध ने मुझे आदिवासी समुदायों से जोड़ा, जिसने मुझे आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।  मेरे शोध के दौरान अनोखी आदिवासी संस्कृति के साथ लगातार जुड़ाव और अनुभव ने मेरी कहानी कहने की कला पर असर डाला। खासकर संवेदनशील या टकराव वाले विषयों पर काम करते समय समाजशास्त्रीय समझ मुझे भावनाओं और यथार्थवाद के बीच तालमेल बिठाने के लिए संतुलन देती है। </p>
<p>कश्मीर से एक लेखक के तौर पर अपनी जगह बनाने में मुश्किलें आईं, लेकिन डॉ. मीर ने हिम्मत नहीं हारी। वह बताते हैं, मुझे जरूर मुश्किलें आती हैं। अनुसंधान के प्रति मेरा जोश और लगन मुझे आगे बढऩे में मदद करता है। उन्होंने अपने विषय के प्रति झुकाव के बारे में कहा, इन आदिवासियों के लोक और अनदेखे सामाजिक-सांस्कृतिक अनुभवों से मेरा जुड़ाव मुझे इन विषयों की पड़ताल करने के लिए प्रेरित करता है। उनका मानना है कि ऐसे समय में जब यह इलाका बदलाव के दौर से गुजर रहा है, इस तरह का दस्तावेजीकरण बहुत जरूरी है। </p>
<p>उन्होंने कहा कि उनके शोध का मकसद, सभी पढऩे वालों को जम्मू और लद्दाख की शानदार अलग-अलग तरह की चीजों को अपनाने का मौका देना है। उम्मीद है कि मेरी किताबें आने वाली पीढिय़ों के लिए जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की देसी संस्कृतियों को दस्तावेजों में उतारने में मदद करेंगी, जिसका मकसद पुरानी सांस्कृतिक विरासत को बचाकर रखना और उसकी झलक दिखाना है।किसी लड़ाई-झगड़े वाले इलाके से लिखने के साथ अपनी जिम्मेदारियां जुड़ी होती है। एक शोधकर्ता के तौर पर, मैं अपने लोगों की असली हालत को समझने के लिए मजबूर महसूस करता हूं और अपनी लिखाई के जरिए, मैं सिर्फ उसे दिखाने की कोशिश कर रहा हूं। मेरे सारे शोध अनुभव और अध्ययन पर आधारित है। मैं सिर्फ वही बताता हूं जो अभी आदिवासी समाज में हो रहा है। इसके साथ ही अनुभव से जुड़ी कहानियां और तथ्य भी पेश करता हूं। </p>
<p>उन्होंने कहा, समाजशास्त्र विषय का शोधकर्ता होने के नाते मेरा पहला काम पूर्वाग्रहों को खत्म करना है। इतिहास इस बात का गवाह है कि साहित्य ने देशों और सभ्यता पर असर डाला है और यह सिर्फ लेखकों की ईमानदार कोशिशों की वजह से है कि सच को बचाने की विरासत अभी भी बनी हुई है। डॉ मीर अभी कश्मीर थ्रू विलेजेस : फ्रॉम पास्ट टू प्रेजेंट किताब पर काम कर रहे हैं, जो कश्मीरी गांवों की एक मानव जाति विज्ञान से संबंधित यात्रा है। उन्होंने बताया कि इस काम का मकसद कश्मीरी परंपराओं और अलग-अलग तरह के लोगों के माहौल और इतिहास की वृहदता और विविधता को दिखाना है।</p>
<p>उनके मुताबिक, कश्मीर के गांवों में, कश्मीर की असली झलक मिल सकती है और यह परियोजना सामाजिक-सांस्कृतिक और मानव विज्ञान नजरिए से सदियों पुरानी कश्मीरी विरासत को फिर से देखने की कोशिश करती है। डॉ. मीर नये प्रयोगों के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा, मैं अपने शोध में नए तरीके आजमाने की कोशिश करूंगा। अकादमिक क्षेत्र में नयापन अपेक्षित और सराहनीय है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 Feb 2026 17:55:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>स्वामी बालमुकुंदाचार्य ने कहा-संस्कृत केवल भाषा ही नहीं बल्कि भारत की जीवन दृष्टि भी है, जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस समारोह को किया संबोधित</title>
                                    <description><![CDATA[हवामहल विधायक स्वामी बालमुकुंदाचार्य ने कहा कि संस्कृत भारतीय जीवन-दृष्टि और सांस्कृतिक चेतना का आधार है, जिसे संरक्षित कर शोध, तकनीक और आधुनिक शिक्षा से जोड़ना आवश्यक है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/swami-balmukundacharya-said-sanskrit-is-not-only-a-language/article-142317"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/11-(700-x-400-px)-(630-x-400-px)-(10)5.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। हवामहल विधानसभा क्षेत्र के विधायक स्वामी बालमुकुंदाचार्य ने कहा है कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की जीवन-दृष्टि, ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक चेतना का मूल स्रोत है। सनातन संस्कृति की आधारशिला संस्कृत भाषा है बालमुकुंदाचार्य शनिवार को  जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस समारोह को संबोधित कर रहे थे। </p>
<p>उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा को संरक्षित करना और भावी पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने त्रिवेणी महाराज के संकल्प के अनुरूप वैदिक परंपरा को आगे बढ़ाना, प्राचीन नक्षत्र व्यवस्था, अश्वमेघ यज्ञ परंपरा तथा प्राचीन ग्रंथों और लेखों के संरक्षण एवं प्रचार का कार्य आज के समय में अत्यंत आवश्यक है। </p>
<p>मुख्य अतिथि के रूप में हरिद्वार स्थित उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमाकांत पांडेय ने कहा कि संस्कृत विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान परंपरा के संवाहक हैं। आवश्यकता है कि संस्कृत को शोध, तकनीक और आधुनिक विषयों से जोड़ते हुए वैश्विक मंच पर स्थापित किया जाए, ताकि इसकी सार्वकालिक उपयोगिता सिद्ध हो सके। कुलपति प्रो.मदनमोहन झा ने कहा कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल शास्त्रों का अध्ययन नहीं, बल्कि संस्कृत ज्ञान को समकालीन संदर्भों से जोड़कर समाजोपयोगी बनाना है। संस्कृत शिक्षा के माध्यम से नैतिकता, अनुशासन और समन्वय की भावना विकसित होती है, जो राष्टÑ निर्माण में सहायक है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 08 Feb 2026 12:30:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>एक साल में बढ़ी 3500 से ज्यादा देसी विदेशी परिंदों की संख्या,ईको सिस्टम में पक्षियों की भूमिका पर बढ़ रहे शोध</title>
                                    <description><![CDATA[गत वर्ष की जनवरी के मुकाबले इस वर्ष सेंसेस में काउंट हुए 300 से ज्यादा प्रजातियों के पक्षी।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-number-of-native-and-migratory-birds-increased-by-more-than-3500-in-one-year--research-on-the-role-of-birds-in-the-ecosystem-is-increasing/article-141087"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/3322.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा के वेटलैंड्स अब सिर्फ जलस्रोत ही नहीं, बल्कि पक्षी संरक्षण और जैव विविधता की पहचान बन रहे हैं। मिड विंटर वाटर फोल पॉपुलेशन एस्टिमेशन के तहत जनवरी 2025 और जनवरी 2026 के तुलनात्मक अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। शहर के तीन प्रमुख वेटलैंड (तालाब) पर एक साल में ही 3500 से ज्यादा देसी - विदेशी परिंदों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह बढ़ोतरी न सिर्फ पर्यावरण के लिए शुभ संकेत है, बल्कि कोटा को पक्षी अनुसंधान के नए केंद्र के रूप में भी स्थापित कर रही है।</p>
<p><strong>एक साल में ही 8000 से 11,500 बढ़ी पक्षियों की संख्या</strong><br />शहर के तीन प्रमुख वेटलैंड उम्मेदगंज पक्षी विहार,अभेड़ा व जोहरा बाई का तालाब पर जनवरी 2025 में हुए मिड विंटर वाटर फोल पापुलेशन ऐस्टमिशन हुआ था। जिसमें यहां 150 प्रजातियों के 8000 देसी विदेशी पक्षी काउंट हुए थे। जबकि, इस वर्ष 17 व 18 जनवरी को हुए सेंसस में 300 से ज्यादा प्रजातियों के 11,500 परिंदे काउंट हुए हैं, जो पिछले वर्ष की अपेक्षा उल्लेखनीय बढ़ोतरी है। इनमें स्थानीय प्रजातियों के साथ-साथ साइबेरिया, मध्य एशिया और यूरोप से आने वाले प्रवासी पक्षी भी बड़ी संख्या में शामिल हैं।</p>
<p><strong>अनुसंधान का केंद्र बने शहरी वेटलैंड</strong><br />शहर के वेटलैंड अनुसंधान का केंद्र बन रहे हैं। दुनियाभर से हर साल हजारों की तादाद में परिंदे प्रवास पर आ रहे हैं। जिनमें से कई पक्षी तो ऐसे हैं, जो पिछले पांच सालों में पहली बार नजर आ रहे हैं। वन्यजीव विभाग की ओर से शहरी सीमा के वेटलैंड्स को पक्षियों के अनुकूल हैबीटाट के रूप में विकसित किए गए हैं। इसी का नतीजा है कि पिछले दिनों हुई गणना में विभिन्न 345 प्रजातियों के 11500 पक्षी काउंट किए गए। जबकि, यह संख्या मात्र उम्मेदगंज पक्षी विहार सहित तीन वेटलैंड की है। जबकि, शहरी क्षेत्र में दो दर्जन से अधिक वेटलैंड हैं। जहां बड़ी संख्या में पक्षियों का प्रवास रहता है।</p>
<p><strong>परिदों की पसंद बना अभेडा तालाब, 7000 पक्षियों का बसेरा</strong><br />वन्यजीव विभाग कोटा के अधीन अभेडा तालाब तालाब पक्षियों की पहली पसंद बना हुआ है। गत 18 जनवरी को हुए मिड विंटर वाटर फोल पापुलेशन सेंसस में यहां 135 प्रजातियों के 7000 पक्षी काउंट हुए हैं। वहीं जोहरा बाई का तालाब में 70 प्रजातियों के 1500 परिंदे काउंट हुए हैं। जबकि वर्ष 2025 में इन दोनों जगहों से लगभग चार हजार से ज्यादा पक्षी नजर आए थे।</p>
<p><strong>इस बार उम्मेदगंज में पक्षियों की 50 प्रजाती ज्यादा बढ़ी</strong><br />उम्मेदगंज पक्षी विहार में गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष पक्षियों की 50 प्रजाति ज्यादा बढ़ी है। पिछले साल यहां 90 प्रजातियों के 3000 पक्षी काउंट किए गए थे जबकि इस वर्ष 18 जनवरी को 140 प्रजातियों के 3000 से ज्यादा पक्षी मिले हैं । इसकी मुख्य वजह वाइल्ड लाइफ डिपार्टमेंट की ओर से करवाए डवलपमेंट कार्य हैं। अवैध फिशिंग, अतिक्रमण व संदिग्ध घुसपैठ पर पूर्णत: प्रतिबंध लगाए जाना है। साथ ही पेड़ों की अवैध कटाई रुकने से पक्षियों का हैबीटाट न केवल सुरक्षित हुआ बल्कि भोजन की भी पर्याप्त उपलब्धता हो गई। पक्षियों के लिए तालाब में पर्याप्त मछलियां होने व अवैध गतिविधियां थमने से परिंदों का कुनबा आबाद हो गया।</p>
<p><strong>यह वेटलैंड बन रहे बर्ड्स वॉचिंग का डेस्टिनेशन</strong><br />डीएफओ अनुराग भटनागर कहते हैं, उम्मेदगंज पक्षी विहार, अभेड़ा तालाब, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क, सालकिया व जोहराबाई का तालाब, किशोर सागर, गैपरानाथ, गरड़िया महादेव सहित शहर के विभिन्न वेटलैंड वर्ड वॉचिंग का डेस्टिनेशन बन चुके हैं। यहां की फिजा विभिन्न प्रजातियों के देसी-विदेशी पक्षियों की चहचहाट से गुलजार रहती है। कोटा विश्वविद्यालय, महाविद्यालयों व कई शिक्षण संस्थानों से विद्यार्थी और स्कॉलर्स ईको सिस्टम में पक्षियों की भूमिका, उनके व्यवहार, हैबीटाट, विशेषताएं, सिमटते वनों व वेटलैंड से पक्षियों पर पड़ने वाले नकारात्मक असर पर शोध कर रहे हैं।</p>
<p><strong>यह पक्षी आए नजर</strong><br />वन्य जीव विभाग के सहायक वन संरक्षक पंकज कुमार ने बताया कि मिड विंटर वॉटर फॉल सेंसस के तहत जोहराबाई तालाब पर अच्छी तादाद में बार हेडेड गूज नजर आए है । गणना में लगभग 70 प्रजातियों के 1500 पक्षी देखे गए वही, अभेडा तालाब में 135 प्रजातियों के लगभग 7000 पक्षी देखे गए। पक्षी गणना में बार हेडेड गूज, ग्रे लेग गूज, नॉर्दन सावलर, गेडवेल, वुड सेंड पाइपर, ग्रीन सेंड पाइपर, स्पून बिल, मार्स हैरियर, कॉमन स्टर्लिंग, रोजी स्टर्लिंग, ग्रीन सेंक, रेड सेंक, व्हाइट वेगटेल, कैनरी फ्लाई केचर, लिटिल रिंग फ्लोवर ,कॉटन पिग्मी गीज, व्हाइट आई, बजार्ड, ग्रेटर स्पॉटेड ईगल, इंपीरियल ईगल, ब्लू थ्रोट, स्केली ब्रेस्टड मुनिया, रेड मुनिया, क्रेस्टेड लार्क, कॉमरेंट, ई ग्रेट, सहित अन्य प्रजातियों के पक्षी नजर आए। वहीं उम्मीदगंज में 140 प्रजातियों के लगभग 3000 पक्षी नजर आए । जिसमें कॉमन पोचार्ड, टफ्टेड पोचार्ड, ग्रीन सेंक, रेड सेंक, व्हाइट वेगटेल, कैनरी फ्लाई केचर, लिटिल रिंग फ्लोवर , मार्स हैरियर, बजार्ड, भुटेड़ ईगल सहित अन्य प्रजातियों के पक्षी नजर आए।</p>
<p><strong>यूरोप से कजाकिस्तान से आते हैं पक्षी</strong><br />नेचर प्रमोटर ए एच जेडी ने बताया कि कोटा के विभिन्न इलाकों में स्थित वैटलैंड पर इन दिनों देसी विदेशी पक्षियों का कलरव गूंज रहा है। आलनिया, उम्मेदगंज, अभेड़ा, उद्पुरिया, बरधा डेम, गिरधरपुरा, बोराबांस का तालाब, सोखिया तालाब, किशोर सागर तालाब, उम्मेदगंज, अभेड़ा सहित कई इलाके परिंदों की चहचहाट से गुलजार हो रहे हैं। यह पक्षी यूरोप, सेंट्रल एशिया, साइबेरिया, हिमालय, उत्तरी अमेरिका, यूरोपियन व एशियाई देशों से आते हैं। उन्होंने बताया कि सर्दी के मौसम में हिमालय पार से विदेशी पक्षी माइग्रेशन में फीडिंग और ब्रीडिंग के लिए यहां आते है तथा सर्दी के बाद यथास्थान के लिए रवाना हो जाते है।</p>
<p>आर्दभूमि (वेटलैंड) पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह जीव जंतुओं के आवास होते हैं। प्रवासी पक्षियों के भी रहने के अनुकूल होते हैं। इनके लुप्त होने से पारिस्थितिकी तंत्र से ईको सिस्टम को नुकसान हो सकता है। इसलिए इसका संरक्षण जरूरी है। इस बार तीनों वेटलैंड पर पिछले पिछले साल के मुकाबले इस साल 3500 से ज्यादा पक्षियों की संख्या में इजाफा हुआ है। हाल ही में हुए सेंसस में कुल 345 प्रजातियों के 11 हजार 500 बर्ड्स काउंट हुए हैं। उम्मीदगंज पक्षी विहार में अतिक्रमण, संदिग्ध घुसपैठ और अवैध फिशिंग रोकी है। जिससे पक्षियों को पर्याप्त भोजन मिलने लगा है।<br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वाइल्ड लाइफ कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Jan 2026 16:30:04 +0530</pubDate>
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                <title>चूहों पर शोध अध्ययन करेगा चीन : नर और मादा चूहों को ले जाएंगे यान से अंतरिक्ष स्टेशन, व्यवहार पर पड़ने वाले असर का होगा अध्ययन </title>
                                    <description><![CDATA[उसके अनुकूल उनमें क्या परिवर्तन हुए। प्रवक्ता ने बताया कि अंतरिक्ष में अपने प्रवास के दौरान चालक दल 27 नये वैज्ञानिक शोध करेगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/china-will-conduct-research-on-rats-male-and-female-rats/article-130973"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/6622-copy159.jpg" alt=""></a><br /><p>जिक्वान। चीन अपने अंतरिक्ष स्टेशन तियांगोंग पर चूहों पर वैज्ञानिक शोध करेगा। चीन की अंतरिक्ष एजेंसी चाईना मैन्ड स्पेस स्पेस एजेंसी (सीएमएसए) ने बताया कि 2 नर और 2 मादा चूहों को शेनझोउ-21 अंतरिक्ष यान से अंतरिक्ष स्टेशन ले जाया जाएगा और उन पर  शोध  किया जाएगा। शेनझोउ-21 को  शुक्रवार रात 11:44 बजे  उत्तर-पश्चिम चीन के जिउक्वान उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र से प्रक्षेपित किया जाएगा। इस यान से अंतरिक्ष यात्री झांग लू, वू फी और झांग होंगझांग रवाना होंगे।</p>
<p>सीएमएसए के प्रवक्ता झांग जिंगबो ने शेनझोउ-21 के उड़ान भरने से एक दिन पहले संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा कि यह पहली बार है, जब चीन चूहों पर अंतरिक्ष में प्रयोग करने जा रहा है। कक्षा में सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण जैसी अंतरिक्ष की स्थितियों का इन चूहों के व्यवहार पर पड़ने वाले असर का अध्ययन किया जाएगा। झांग ने कहा कि बाद में चूहों को अन्य अंतरिक्ष यान से वापस पृथ्वी पर लाया जाएगा। यहां पृथ्वी पर उन पर फिर से वैज्ञानिक शोध किया जाएगा कि अंतरिक्ष वातावरण में चूहों के विभिन्न ऊतकों और अंगों पर क्या प्रभाव पड़ा और उसके अनुकूल उनमें क्या परिवर्तन हुए। प्रवक्ता ने बताया कि अंतरिक्ष में अपने प्रवास के दौरान चालक दल 27 नये वैज्ञानिक शोध करेगा।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Oct 2025 15:29:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आरटीयू : अनुसंधान की दौड़ में छात्रों से पिछड़ी छात्राएं, आंकड़ों से हुआ खुलासा</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान तकनीकी विवि के दीक्षांत समारोह में इस बार गोल्ड में भी आगे रहे छात्र]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/rtu--girls-lagging-behind-boys-in-the-race-of-research/article-108821"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-03/rtu-anusandhan-ki-daud-mein-chhatron-se-pichhade-chhatraen..kota-news-27.03.2025.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। तकनीकी शिक्षा में अनुसंधान की दौड़ में छात्राएं पिछड़ रही हैं, जबकि छात्रों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। वहीं, स्वर्ण पदक पाने वालों में भी इस बार बालिकाएं पीछे रह गई। यह खुलासा वर्ष 2024 से 2025 तक हुए दीक्षांत समारोह के आंकड़ों से हुआ है।  दरअसल, राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में सत्र 2022 से 2024 तक पीएचडी उपाधि पाने वालों में छात्रों की संख्या अधिक रही। जबकि, छात्राओं की संख्या 50% से भी कम रही।  शिक्षाविदें ने अनुसंधान के क्षेत्र में घटती बालिकाओं की संख्या पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने इसके कारणों को खोज समाधान की आवश्यकता पर बल दिया।</p>
<p><strong>पिछले 3 सालोंं में 58 छात्र व 25 छात्राओं ने पीएचडी</strong><br />आरटीयू में वर्ष 2024 में हुए दीक्षांत समारोह में विद्यार्थियों को सत्र 2022 व 23 की डिग्रियां वितरित की गई थी। जिसमें दोनों वर्षों को मिलाकर कुल 47 विद्यार्थियों को पीएचडी डिग्री अवॉर्ड हुई थी। जिसमें छात्रों की संख्या 34 तथा छात्राएं मात्र 13 ही रहीं। वहीं, हाल ही में 25 मार्च को हुए दीक्षांत में कुल 36 विद्यार्थियों ने शोध उपाधि प्राप्त की। इसमें भी लड़कों की संख्या लड़कियों के मुकाबले 50% प्रतिशत ज्यादा रही। इस तरह पिछले तीन वर्षों में 58 बालकों ने महत्वपूर्ण विषयों पर शोध कार्य पूरा किया। वहीं, अनुसंधान के क्षेत्र में छात्राओं की भागीदारी मात्र 25 प्रतिशत रही। </p>
<p><strong>अनुसंधान से ही समाज में क्रांतिकारी बदलाव संभव</strong><br />किसी भी क्षेत्र की प्रगति शौध व अनुसंधान पर निर्भर करती है, जो मानव जीवन की तमाम चुनौतियों को आसान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में छात्राओं की संख्या कम होना चिंताजनक है। हालांकि,  बालिकाओं ने भी तकनीकी शिक्षा में विभिन्न जटिल मुद्दों पर शोध कर बेहतर टेक्नोलॉजी विकसित कर मानव जीवन आसान बनाया। हालांकि, वर्ष 2021 से पहले शोध कार्यों में बालिकाओं की भागीदारी ज्यादा थी। </p>
<p><strong>इस बार गोल्ड मेडल में भी पिछड़ी</strong><br />गत वर्ष आरटीयू के दीक्षांत समारोह में बीटेक, एमटेक, बी आर्क, एमबीए सहित अन्य संकाय में स्वर्ण पदक हासिल करने में छात्राएं अव्वल रहीं थी लेकिन इस बार  मंगलवार को हुए समारोह में छात्राएं पिछड़ गई और छात्र आगे निकल गए। बता दें, इस बार विभिन्न संकायों में सर्वोच्चय अंक हासिल करने वाले सत्र 2024 के 20 विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक दिए गए। जिसमें 11 छात्र व 9 छात्राएं शामिल रहीं। इसी तरह सत्र 2022 में 24 प्रतिभाओं में से 13 छात्र व 11 छात्राओं को स्वर्ण पदक मिला था। वहीं, सत्र 2023 में कुल 10 स्टूडेंट्स में से 9 बालक व 11 बालिकाओं ने गोल्ड मेडल पर कब्जा जमाया था। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br /> ऐसा नहीं है, पिछले सालों के दीक्षांत समारोह का रिकॉर्ड देखें तो पता चलता है, स्वर्ण पदक पाने वालों में कभी छात्र आगे रहे हैं तो कभी छात्राएं। इसका मतलब यह नहीं की उच्च शिक्षा में बालिकाओं की संख्या कम हो रही हो, बल्कि छात्राएं प्रतिस्पर्द्धा की दौड़ में लगातार आगे निकल रहीं हैं। यही वजह है, ओवरआॅल उच्च शिक्षा के ग्राफ में बालिकाओं का नामांकन दर बढ़ा है, जो महिला सशक्तिकरण का जीता जागता उदारहण है। देश के विकास में नारी शक्ति अपनी अहम भूमिका निभा रहीं हैं। <br /><strong>-प्रो. एसके सिंह, कुलपति राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 27 Mar 2025 15:59:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>अनुसंधान के क्षेत्र में विश्व में गहरी छाप छोड़ रहा अपना आरटीयू, राज्यपाल ने होनहार शौधार्थियों को उपाधियों से किया सम्मानित </title>
                                    <description><![CDATA[आरटीयू के 14वें दीक्षांत समारोह में रिसचर्स को मिला सम्मान। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/rtu-is-leaving-a-deep-mark-in-the-world-in-the-field-of-research/article-108711"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-03/news-(4)19.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय क्वालिटी एजुकेशन के दम पर देश-दुनिया में टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अपना लौहा मनवा रहा है। यहां के विद्यार्थियों ने डेटा मॉडल्स, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, क्रिप्टोग्राफिक तकनीक से लेकर टेक्सटाइल कम्पोजिट्स सहित सॉफ्टवेयर डवलपमेंट के क्षेत्रों में अनुसंधान से नई टेक्नोलॉजी का विकास कर जीवन की चुनौतियों को आसान बना रहे हैं। उनकी रिसर्च, सुनहरा भविष्य की परिकल्पना साकार कर रही है। साथ ही लोगों के रोजमर्रा के काम आसान होंगे। वहीं, बिजनेस को ग्रोथ दिलाने से लेकर आमजन को साइबर फ्रॉड से बचाने के लिए कई अनुसंधान किए जा रहे हैं।  आरटीयू के 14वें दीक्षांत समारोह में राज्यपाल ने ऐसे होनहार शौधार्थियों को उपाधियों से सम्मानित किया है। पेश है खबर के प्रमुख अंश...</p>
<p><strong>मेटल को टेक्सटाइल कम्पोजिट्स से किया रिप्लेस</strong><br />भीलवाड़ा के एमएलवी टेक्सटाइल इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. अरविंद वशिष्ट ने टेक्सटाइल कम्पोजिट्स पर शोध किया। उन्होंने अपनी रिसर्च से मेटल (धातु) को टेक्सटाइल कम्पोजिट्स से रिप्लेस किया। इसके लिए उन्होंने चार तरह के कम्पोजिट्स ग्लास, ब्लास्ट, जूट, लीनन का उपयोग कर स्ट्रेक्चर कम्पोजिट तैयार किया। यह किसी भी मेटल का रिप्लेसमेंट है। इससे धातु का वजन आधा हो जाएगा और लाइफ भी बढ़ जाएगी।  डॉ. वशिष्ट ने बताया कि इसे यूं समझ सकते हैं, पवन चक्की में तीन ब्लेड लगी होती है, जिसका वजन करीब 2 हजार किलो होता है, प्रत्येक ब्लेड का वजन 600 किलो होता है, क्योंकि वह स्टील की बनी होती है। अब इसे टेक्सटाइल कंपोजिट से बनाया जा सकता है, ऐसे में  एक ब्लेड का वजन 600 से 300 किलो ही रह जाएगा। इसका फायदा यह होगा कि वजन में हल्की होने से पवन चक्की तेज गति से चलेगी, जिससे बिजली का उत्पादन भी ज्यादा होगा और मजबूत होने से लाइफ भी बढ़ेगी। टेक्सटाइल कंपोजिट्स का उपयोग कंट्रक्शन, वाहन, स्पोर्ट्स सहित विभिन्न क्षेत्रों में कर सकते हैं। </p>
<p><strong>फेक रिव्यू की पहचान कर धोखाधड़ी से बचाएगा बिग डेटा</strong><br />जोधपुर इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रोफेसर राजेंद्र पुरोहित ने कम्प्यूटर साइंस में पीएचडी की है। उन्होंने अपनी रिसर्च में ऐसी तकनीक विकसित की है जो लोगों को इंटरनेट पर फेक रिव्यूज के झांसे में आने से बचाएगा। डॉ. पुरोहित ने बताया कि वर्तमान दौर में ऑनलाइन खरीदारी का चलन तेजी से बढ़ रहा है। जिसके चलते इन वेबसाइड्स पर घटिया प्रोडेक्ट का भी अच्छा रिव्यू आने से लोग उस प्रोडेक्ट को खरीदकर अनजाने में धोखाधड़ी का शिकार हो जाते हैं। वहीं, दूसरा पहलु भी है, अच्छे प्रोडेक्ट की घटिया रिव्यू पढ़ने से उपभोक्ताओं के मन में उस प्रोडेक्ट के प्रति नाकारात्मकता बढ़ जाती है, जिससे संबंधित कम्पनी को लॉस होता है। ऐसे में बिग डेटा एनालिसिस के जरिए हम फेक रिव्यू को पहचान पाएंगे और साइबर क्राइम का शिकार होने से बच सकेंगे। </p>
<p><strong>सौलर से बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाई  </strong><br />निजी कम्पनी में सीनियर मैनेजर भारत दुबे ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में सौलर ऊर्जा में पीएचडी की। शोध का टॉपिक एनालिसिस आॅफ सौलर पीवी सिस्टम फॉर मैक्सिमम पॉवर एक्सट्रैक्शन एंड एफिसिएंट यूटिलाइजेशन रहा। दुबे ने बताया कि सौलर ऊर्जा का किस तरह ज्यादा से ज्यादा उपयोग किया जा सकता है, उसकी क्षमता में और अधिक सुधार कैसे किया जा सकता है, इस पर शौध किया।  उन्होंने बताया कि सौलर के जो मॉड्यूल्स होते हैं वो 25 डिग्री तापमान और 1000 वॉट पर मीटर आॅफ रेडियस के लिए बने होते हैं। जिनके टेम्प्रेचर लगभग टेस्ट लैब में ही होता है। ऐसे में उन मॉड्यूल्स को परीक्षण के बाद फिल्ड में ले जाते हैं तो स्थिति विपरित होती है, जो कि हमारी रेडियस 1000 मीटर से भी ऊपर या नीेचे भी हो सकता है और तापमान भी 40 से 50 डिग्री तक भी हो सकता है। ऐसे में सामने आया कि हमारे जो मॉड्यूल्स हैं वो निर्धारित तापमान पर काम नहीं करता है तो उसकी क्षमता घट जाती है। ऐसे में सौलर प्लांट के मॉड्यूल विपरीत परिस्थितियों में भी अच्छा काम करें और बिजली की उत्पादन क्षमता बढ़े, इसको लेकर रियल टाइम प्रयोग किए और विभिन्न मोडल्स बनाए। हमने डिफरेंट टेक्नोलॉजी के दो मॉड्यूल्स लिए और टेस्ट किए तो क्षमता में काफी अंतर पाया गया। इसके बाद इस उपकरण में कूलिंग सिस्टम लगाया। इसके लिए मॉडल्स में साइंटिफिक अरेंजमेंट कर मॉड्यूल्स में फैन लगाकर सौलर से बिजली उत्पादन की क्षमता का आंकलन किया। जिसका बेहतर रिजल्ट मिला। इसके बाद और सुधार के लिए वाटर सिस्टम का भी प्रयोग किया तो पाया कि मॉड्यूल्स की क्षमता और अधिक बढ़ गई। इन सब के लिए पहले तो मॉडल्स बनाए और फिर प्रयोग किए गए। दुबे ने अपना शोध डॉ. अशोक शर्मा, डॉ. सीमा अग्रवाल व डीन अकेडमिक अफेयर डॉ. डीके पलवलिया के मार्गदर्शन में पूर्ण किया। उनका रिसर्च वर्क नेशनल व इंटरनेशनल जर्नल में भी पब्लिश  हो चुका है। साथ ही एक बुक चेप्टर भी एक्सेप्ट हुआ है।</p>
<p><strong>क्रिप्टोग्राफिक तकनीक से मल्टीमडिया डेटा किया सुरक्षित</strong><br />हेमंत साहू ने आरटीयू से कम्प्यूटर साइंस एप्लीकेशन में पीएचडी की। उनका शौध अ नावेल एप्रोच फॉर एम्पलीमेंटेशन ऑफ सिक्योरिटी एंड प्राइवेसी फॉर मल्टीमीडिया थिंग्स पर आधारित था। हेमंत ने अपनी रिसर्च से मल्टीमीडिया डेटा की सुरक्षा, गोपनियता, लीक व चोरी होने से बचाने के लिए तकनीक इजाद की। जिसकी मदद से एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजे जाने वाले फोटो, वीडियो, ऑडियो सहित अन्य डेटा को सुरक्षित कर दिया है। हेमंत बताते हैं, वर्तमान में मोबाइल मल्टीमीडिया का चलन तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में डेटा लीक होना, गोपनियता  भंग, चोरी होने का खतरा भी बढ़ गया है। ऐसे में अपनी रिसर्च में एन्क्रिप्शन एंड डिक्रिप्शन तकनीक विकसित की है, जिससे जिससे भेजने वाला और प्राप्त करने वाले के बीच डेटा को तीसरा कोई न तो पढ़ पाएगा और न ही देख पाएगा। डाटा भेजते वक्त एन्क्रिप्शन मोड़ पर रहेगा, जिससे डाटा लॉक हो जाता है, प्राप्तकर्ता भी उस डेटा को पढ़ने के लिए सुरक्षा-की से ही लॉक खोल पाएगा। इस तरह से मल्टीमीडिया डेटा की गोपनियता बनी रहेगी और कोई चोरी या लीक नहीं कर पाएगा।  </p>
<p><strong>सौर ऊर्जा से बिजली बनाने की क्षमता 30 से 95% बढ़ेगी</strong><br />राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय में अस्टिेंट प्रोफेसर सुनीता चाहर ने इाईब्रिड कॉम्बिनेशन ऑफ सौलर एंड विंड एनर्जी पर पीएचडी की। उन्होंने अपनी रिसर्च में ऐसा कंट्रोल सिस्टम डवलप किया है जो सौर ऊर्जा से बिजली बनाने की क्षमता को तीन गुना अधिक बड़ा देगा। डॉ. चाहर कहती हैं, सूर्य से अब तक सौलर धूप से 30% ही एनर्जी जनरेट करता है लेकिन इस रिसच में विकसित की गई तकनीक से बिजली का उत्पादन तीन गुना 95% तक बढ़ जाएगी। वहीं, दो या दो से अधिक सौलर पैनल को एक ही कंट्रोलर से कंट्रोल किया जा सकता है। जबकि, अभी तक हर एक सौलर के लिए एक कंट्रोलर लगाना पड़ता था, जो महंगा होता है। इस तकनीक से उपभोक्ता को आर्थिक भार से निजात मिलेगी। वहीं, सौलर पैनल की लाइफ भी बढ़ जाएगी। यदि, मौसम खराब हो जाए तो भी सौलर के बिजली उत्पादन करने की क्षमता पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। क्योंकि, इसको इसी तरीके से डिजाइन किया है कि यह अपनी क्षमता के अनुसार बिजली उत्पादन करता रहेगा। सुनीता को इस रिसर्च के लिए यंग रिसर्च अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। इस रिसर्च में प्रोफसर एसडी पुरोहित का विशेष सहयोग रहा। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 26 Mar 2025 16:01:00 +0530</pubDate>
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                <title>पृथ्वी की धुरी में तेजी से हो रहा बदलाव, 20 साल में ही 31.5 इंच खिसकी</title>
                                    <description><![CDATA[ ये रिसर्च कहती है कि भूजल के बहुत ज्यादा दोहन से धरती की धुरी करीब 80 सेंटीमीटर यानी 31.5 इंच तक झुक गई है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/earths-axis-is-changing-rapidly-it-has-shifted-315-inches/article-95925"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/257rtrer-(2)8.png" alt=""></a><br /><p>वॉशिंगटन। एक नई रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। ये रिसर्च कहती है कि भूजल के बहुत ज्यादा दोहन से धरती की धुरी करीब 80 सेंटीमीटर यानी 31.5 इंच तक झुक गई है। पृथ्वी सिर्फ दो दशक (1993 से 2010 के बीच) में 80 सेंटीमीटर पूर्व की ओर झुकी है। रिसर्च कहती है कि 1993 से 2010 के बीच तकरीबन 2,150 गीगाटन भूजल निकाला गया था। इसका एक नुकसान ये भी हुआ कि पानी का ज्यादातर हिस्सा बहकर महासागरों में पहुंचा, जिससे समुद्र का स्तर बढ़ा।</p>
<p>इस रिसर्च को जर्नल जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में पब्लिश किया गया है। एक्सपर्ट ने पाया है कि धरती से बहुत ज्यादा पानी का निकाला जाना ना सिर्फ पृथ्वी का घूर्णन बदलता है, बल्कि समुद्र के जलस्तर में भी वृद्धि करता है। पॉपुलर मैकेनिक्स के अनुसार, पृथ्वी के झुकाव में यह बदलाव समुद्र के जलस्तर में 0.24 इंच की वृद्धि के बराबर है।</p>
<p><strong>पृथ्वी की धुरी कैसे बदलती है</strong><br />सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी के कीवॉन सियो ने कहा कि पृथ्वी का घूर्णन ध्रुव वास्तव में बहुत बदलता है। रिसर्च दिखाती है कि जलवायु संबंधी कारणों में भूजल का पुनर्वितरण वास्तव में घूर्णन ध्रुव के झुकाव पर सबसे बड़ा प्रभाव डालता है। पानी इधर-उधर होता है तो पृथ्वी का घूमना बदलता है। पृथ्वी का झुकाव द्रव्यमान के वितरण से प्रभावित होता है। एकस्पर्ट का कहना है कि ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका से ग्लेशियरों और ध्रुवीय बर्फ की चादरों के पिघलने से इस पुनर्वितरण में अहम होता है। बर्फ पिघलती है तो पानी भूमध्य रेखा की ओर बहता है, जिससे पृथ्वी का संतुलन बदल जाता है और उसका अक्ष स्थानांतरित हो जाता है। यह प्रक्रिया कुछ वैसी ही है जैसे किसी फिगर स्केटर के हाथ बाहर की ओर फैलाने पर उसका घुमाव धीमा हो जाता है।</p>
<p><strong>धरती के झुकने पर क्यों ध्यान दिया जाना चाहिए?</strong><br />भूजल पृथ्वी की सतह के नीचे मिट्टी के छिद्रों और चट्टानों की दरारों में जमा पानी है, जो हाइड्रोलॉजिकल साइकिल का हिस्सा बनता है। यह बारिश से जमीन में रिसकर भूमिगत जलभृतों को फिर से भर देता है। ये जलभृत महत्वपूर्ण मीठे पानी के भंडार के रूप में काम करते हैं। इससे पीने का पानी, सिंचाई और औद्योगिक जरूरतों के लिए पानी मिलता है। धरती की धुरी का बदलना मानवीय पैमाने पर महत्वहीन लग सकता है लेकिन भूगर्भीय समय के पैमाने पर इस तरह के बदलाव उल्लेखनीय पर्यावरणीय परिणाम पैदा कर सकते हैं। पानी का पुनर्वितरण विभिन्न क्षेत्रों में समुद्र के स्तर में परिवर्तन को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित कर सकता है। यह ग्रह की आंतरिक प्रणालियों को भी प्रभावित करता है, जिसमें इसका चुंबकीय क्षेत्र भी शामिल है, जो हमें हानिकारक सौर विकिरण से बचाता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>शिक्षा जगत</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 26 Nov 2024 11:35:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>रिसर्च में फिसड्डी एसएमएस मेडिकल कॉलेज</title>
                                    <description><![CDATA[ केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय की ओर से मेडिकल शिक्षा में बेहतरीन सेवाओं, रिसर्च सहित अन्य मापदंडों के आधार पर हर साल देश के मेडिकल कॉलेज की नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क(एनआईआरएफ) रैंकिंग दी जाती है। सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज इस 2023 की रैंकिंग में 46 वें नंबर पर है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/sms-medical-college-lags-behind-in-research/article-81879"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-12/sms.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। जयपुर के सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज में सालों पहले रिटायर हुए प्रोफेसर के भरोसे रिसर्च प्रोजेक्ट मंजूर करने का जिम्मा दे रखा है। ऐसे में उत्तर भारत के बड़े मेडिकल कॉलेजों में शुमार मेडिकल कॉलेज रिसर्च में फिसड्डी हो गया है। मेडिकल रिसर्च में देश के टॉप 10 तो छोड, शुरुआती तीन दर्जन मेडिकल कॉलेजों में भी इसका नाम शामिल नहीं है। यहीं नहीं देश के प्राइवेट मेडिकल कॉलेज भी एसएमएस से कई गुना ज्यादा रिसर्च प्रोजेक्ट लेकर काम कर रहे हैं। एसएमएस मेडिकल कॉलेज में रिसर्च प्रोजेक्ट्स को मंजूरी देने के लिए रिटायर प्रोफेसर डॉ. शशि सिंघवी को एथिकल कमेटी का चेयरमैन बना रखा है। कमेटी में अन्य अहम पदों पर भी रिटायर मेडिकल प्रोफेसरों को लगा रखा है। जिनमें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के रूप में डॉ. आरके सुरेखा भी हैं। दोनों ही 8-9 साल पहले मेडिकल कॉलेज से रिटायर हो चुके हैं। हर 2-3 सालों में एथिकल कमेटी के 33 फीसदी सदस्य बदले जाते हैं, लेकिन कमेटी में इनकी मौजूदगी बरकरार है। </p>
<p><strong>रिसर्च में देश के तीन दर्जन मेडिकल कॉलेजों में भी नाम शामिल नहीं</strong><br />बेरुखी के चलते एन आई आर एफ में 46 वीं रैंक पर<br />केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय की ओर से मेडिकल शिक्षा में बेहतरीन सेवाओं, रिसर्च सहित अन्य मापदंडों के आधार पर हर साल देश के मेडिकल कॉलेज की नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क(एनआईआरएफ) रैंकिंग दी जाती है। सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज इस 2023 की रैंकिंग में 46 वें नंबर पर है। जबकि उनसे पहले सीमित संसाधनों के बावजूद आधा दर्जन से ज्यादा प्राइवेट मेडिकल कॉलेज रैंकिंग में इससे पहले हैं।  5 साल में कभी भी टॉप-25 में भी शामिल नहीं हुआ। 2018 में तो कॉलेज रैंकिंग की दौड़ में ही शामिल नहीं था।</p>
<p><strong>तीन साल में जितना काम, प्राइवेट में उससे कई गुना ज्यादा एक साल में हुआ</strong><br />सवाईमानसिंह मेडिकल कॉलेज में पिछले तीन साल 2019-20 में 12, 2020-21 में 19 और 2021-22 में 45 स्पोंसर्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स लिए। यानि कुल 76 रिसर्च प्रोजेक्ट्स पर काम हुआ। जबकि रैंकिंग में हमसे आगे चल रहे कर्नाटक के कस्तूरबा मेडिकल कॉलेज (9 वीं रैंक) ने तीन साल में 678, पुणे के डॉ.डीवाई पाटिल विद्यापीठ(15 वीं रैंक) ने 99,  बंगलुरू के सेंट जॉन मेडिकल कॉलेज(19 वीं रैंक) ने 700 , दिल्ली के इंस्टीट्यूट आॅफ लीवर एंड बाइलेरी साइंस (23 वीं रैंक) ने 125, मैसूर के जेएसएस मेडिकल कॉलेज (37 वीं रैंक) ने 166 और बंगलुरू के एमएस रमाह मेडिकल कॉलेज (43 वीं रैंक) ने 122 प्रोजेक्ट्स हाथ में लेकर उन्हें पूरा किया। एसएमएस मेडिकल कॉलेज ने 5 साल में केवल 137 रिसर्च प्रोजेक्ट्स पर ही काम किया।  </p>
<p>सवाईमानसिंह मेडिकल कॉलेज में पिछले तीन साल 2019-20 में 12, 2020-21 में 19 और 2021-22 में 45 स्पोंसर्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स लिए। यानि कुल 76 रिसर्च प्रोजेक्ट्स पर काम हुआ। जबकि रैंकिंग में हमसे आगे चल रहे कर्नाटक के कस्तूरबा मेडिकल कॉलेज (9 वीं रैंक) ने तीन साल में 678, पुणे के डॉ.डीवाई पाटिल विद्यापीठ(15 वीं रैंक) ने 99,  बंगलुरू के सेंट जॉन मेडिकल कॉलेज(19 वीं रैंक) ने 700 , दिल्ली के इंस्टीट्यूट आॅफ लीवर एंड बाइलेरी साइंस (23 वीं रैंक) ने 125, मैसूर के जेएसएस मेडिकल कॉलेज (37 वीं रैंक) ने 166 और बंगलुरू के एमएस रमाह मेडिकल कॉलेज (43 वीं रैंक) ने 122 प्रोजेक्ट्स हाथ में लेकर उन्हें पूरा किया। एसएमएस मेडिकल कॉलेज ने 5 साल में केवल 137 रिसर्च प्रोजेक्ट्स पर ही काम किया।  </p>
<p><strong>लाइलाज मरीजों के ठीक होने की उम्मीद भी टूटी है, करोड़ों का फंड भी नहीं आ सका</strong><br />केन्द्र के डीसीजीआई यानी ड्रग कंट्रोलर जनरल आॅफ इंडिया के जरिये नई दवाओं पर रिसर्च को बड़ी शोध कंपनियां प्रोजेक्ट्स को रिसर्च के लिए अप्रूवल कराती है। फिर प्रोजेक्ट्स पर काम के लिए मेडिकल कॉलेजों को इन्हें सामान्य दवाइयों से ठीक ना होने वाले मरीजों पर उपयोग के लिए पेशकश करती है। एथिकल कमेटी इसकी मंजूरी के लिए एथोरिटी होती है। मंजूरी पर दवाइयां लाइलाज मरीजों के इलाज में काम आती है। दवा कितनी कारगर रही, उसकी रिपोर्ट तैयार होती है। कंपनी एवज में करोड़ों की इन महंगी दवाइयों के साथ बड़ी राशि कॉलेज को फंडिंग भी करती है। प्रोजेक्ट्स नहीं लेने से  लाइलाज मरीजों के ठीक होने की उम्मीद और करोड़ों का फंड भी कॉलेज को नहीं आ सका है। </p>
<p>रिसर्च प्रोजेक्ट्स ज्यादा आएं, इसका प्रयास करेंगे। जल्द एथिकल कमेटी को भी पुर्नगठित करेंगे। एक सेंट्रल कमेटी भी गठित करने की योजना है ताकि रिसर्च वर्क की मोनिटरिंग भी हो सके। रिसर्च प्रोजेक्ट्स से आने वाले पैसे को कॉलेज के वैलफेयर में भी खर्च करेंगे।<br />- डॉ.दीपक माहेश्वरी, प्रिंसिपल, एसएमएस मेडिकल कॉलेज। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Jun 2024 10:07:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Rajasthan University बनेगा सेमीकंडक्टर रिसर्च का हब</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान विश्वविद्यालय एवं सीएसआईआर सीईईआरआई, पिलानी के मध्य समझौता ज्ञापन]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/rajasthan-university-will-become-hub-of-semiconductor-research/article-78366"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/rajasthan-university.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। शोध एवं अनुसन्धान के क्षेत्र में देश के अग्रणी केंद्रीय संस्थान सीएसआईआर सीईईआरआई, पिलानी एवं राजस्थान के सबसे पुराने एवं प्रसिद्ध विश्वविद्यालय, राजस्थान विश्वविद्यालय ने साझा अनुबंध कर भौतिकी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में सेमीकंडक्टर अनुसन्धान, प्रशिक्षण व दक्षता को बढ़ावा देने हेतु विभिन्न नेशनल स्किल डेवलपमेंट कोर्स प्रारंभ करने का निर्णय लिया है। जयपुर में ये कोर्स देश के युवाओं को रोजगार देने हेतु कौशल विकास विकसित करने पर केंद्रित होगा। सीएसआईआर सीईईआरआई, पिलानी अपने सामाजिक वैज्ञानिक दायित्व निर्वहन हेतु देश के उत्तम शिक्षण संस्थानों के साथ निरन्तर ऐसे प्रयास करता रहता है। राज्य के राजधानी में राजस्थान विश्वविद्यालय के कारण  उद्योग एवं तकनीक शिक्षा की अपार सम्भावनाओ  को धरातल पर लाने में ये कदम मील का पत्थर साबित होगा। दोनों संस्थाए इस हेतु क्रेडिट, सर्टिफिकेट, डिप्लोमा, फैकल्टी प्रशिक्षण आदि कोर्स प्रारम्भ करने जा रही है। जयपुर को सेमीकंडक्टर हब बनाने हेतु राजस्थान विश्वविद्यालय व सीएसआईआर सीईईआरआई, पिलानी द्वारा लाखों कुशल जनशक्ति विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं क्योकि सेमीकंडक्टर का उपयोग सभी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में होता है जो एग्रोटेक, बायो टेक, बायोफिजिक्स, जियोलॉजी आदि क्षेत्रों में काम में लिए जाते है।<br />यह अनुबंध सीएसआईआर सीईईआरआई, पिलानी - पिलानी के निदेशक डॉ पी. सी. पंचारिया एवं राजस्थान विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर अल्पना कटेजा की उपस्थिति के दौरान संपन्न हुआ। समझौता ज्ञापन पर सीएसआईआर सीईईआरआई, पिलानी - पिलानी  की तरफ से वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर विजय चटर्जी तथा राजस्थान विश्वविद्यालय की तरफ से रजिस्ट्रार अवधेश कुमार ने हस्ताक्षर किए।<br />इस समझौते के तहत दोनों संस्थाओं के वैज्ञानिक एवं अकादमिक स्टाफ की अदला-बदली,  ऐम. टेक.,  ऐम. एस. तथा पीएच. डी. विद्यार्थियों का संयुक्त शोध निर्देशन, संयुक्त  परियोजनाओं पर कार्य तथा संयुक्त कॉन्फ्रेंस तथा विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन आदि विषय पर बल रहेगा। <br />महाराजा महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो एस एन डोलिया ने अवगत कराया कि भारत के माननीय प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2021 में इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन को मंजूरी प्रदान की थी जिसके तहत अर्धचालक उत्पादन पैकेजिंग तथा यूनिट डिजाइन के तहत 76000 करोड रुपए स्वीकृत किए गए थे। <br />सिरी पिलानी तथा राजस्थान विश्वविद्यालय के मध्य यह समझौता माननीय प्रधानमंत्री के स्वदेशी तकनीक के उत्पादन के दूरगामी दृष्टिकोण को सफल करने में सहायक सिद्ध होगा।<br />कार्यक्रम के दौरान सीडीपीई के निदेशक प्रो एस के गुप्ता, प्राणिशास्त्र विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विनोद कुमारी, विज्ञान भारती राजस्थान के सचिव डॉ मेघेन्दर् शर्मा जी, सीएसआईआर सीईईआरआई, पिलानी पिलानी के वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक डॉ अशोक चौहान एवं डॉ साईं के वड्डाड़ी उपस्थित रहे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 May 2024 18:19:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>विकसित हो शोध की मौलिक संस्कृति</title>
                                    <description><![CDATA[शिक्षा असल में सांस्कृतिक प्रक्रिया है। यह शक्ति का स्रोत, समाजीकरण का माध्यम एवं शोषण से मुक्ति का प्रमुख मार्ग है। इसलिए यह आवश्यक है कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में शोध की आधुनिक चुनौतियों को स्वीकार करते हुए भी हम आगे बढ़ें। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/fundamental-culture-of-research-should-develop/article-78296"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-05/t21rer45.png" alt=""></a><br /><p>कुछ समय पहले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, तेलंगाना और राजस्थान के अलावा पूर्वोत्तर  क्षेत्र, जम्मू और कश्मीर और लद्दाख के विश्वविद्यालयों में नए एवं उभरते क्षेत्रों में शोध एवं अनुसंधान क्षेत्र में कार्य करने के एक विशेष अभियान के अंतर्गत विश्वविद्यालय अनुसंधान उत्सव का आयोजन किया गया था। उद्देश्य यह था कि राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और मिशनों से जुड़े संभावित उच्च प्रभाव, अंत: विषयक अनुसंधान के लिए विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया जा सके। इस उत्सव के अंतर्गत तकनीकी दृष्टि से स्टार्ट-अप और रोजगार क्षेत्रों में तो कुछ नया कार्य हुआ भी है, परन्तु वैचारिक लिहाज से विश्वविद्यालयों में अभी भी शोध की मौलिक परम्पराओं पर बहुत अधिक कार्य हो नहीं पाया है।  <br />रोजगारोन्मुखी शिक्षा के साथ कौशल विकास के प्रयास जरूरी है परन्तु इतना ही जरूरी यह भी है कि शोध की मौलिक संस्कृति से जुड़ा पर्यावरण हमारे यहां विकसित किया जाए। कोई राष्ट्र आर्थिक रूप से सुदृढ़ तभी होगा जब वहां विचारों की मौलिकता के क्षेत्र में निंरतर नया कार्य हो। यह समय सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का है। जिस गति से नवीनतम क्षेत्रों में कार्य हो रहा है, यह जरूरी है कि शिक्षण संस्थानों में अब केवल पाठ्यपुस्तकों पर ही विद्यार्थी निर्भर नहीं रहे। वे अपने आपको समय-संदर्भों से युक्त करते हुए नवीनतम क्षेत्रों के साथ अतीत के संदर्भो से जुड़े रहेंगे तभी व्यावहारिक रूप में भविष्य की चुनौतियों का सामना कर पाएंगें। युगीन संदर्भों में शिक्षा का प्रसार इस प्रकार से हो कि विद्यार्थियों में मौलिक सोचने की शक्ति विकसित हो। समर्थ शिक्षा का मूल आधार यही है कि उससे व्यक्ति रूढ़ियों से मुक्त हो। रूढ़ियों से मुक्ति मौलिक दृष्टि और चिंतन की नवीन सोच ही दे सकती है।<br />शिक्षा असल में सांस्कृतिक प्रक्रिया है। यह शक्ति का स्रोत, समाजीकरण का माध्यम एवं शोषण से मुक्ति का प्रमुख मार्ग है। इसलिए यह आवश्यक है कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में शोध की आधुनिक चुनौतियों को स्वीकार करते हुए भी हम आगे बढ़ें। हमारे यहां शोध की जो एक परिपाटी बन गई है, वह यह है कि कुछ पुस्तकों को एकत्र कर उनसे एक और पुस्तक तैयार कर उसे शोध ग्रंथ रूप में प्रस्तुत कर दिया जाए। पर सवाल यह है कि इस तरह के शोध से मिलने वाली डिग्री क्या विद्यार्थी को भविष्य में कोई मुकाम दिला सकती है? शोध और अनुसंधान वही उपादेयी होता है जिसमें नवीन किसी विचार या धारणा को पुष्ट किया जाए। यही नहीं, शोध सर्वथा नवीन विषय के साथ समयानुकूल, उपयोगी और मौलिक स्थापना लिए होगा तभी उसका लाभ विद्यार्थी ही नहीं राष्ट्र को भी प्रभावी रूप में मिल सकता है।<br />जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें शोध की मौलिक संभावना नहीं हो। विश्वविद्यालयों में जितने भी विषय पढ़ाए जाते हैं, उनमें चाहे वह प्रबंध हो, विज्ञान हो, मानविकी हो या फिर तकनीकी क्षेत्र सभी के अंतर्गत उसके अपने स्थानीय क्षेत्र, परम्परा और पर्यावरणीय सरोकार होते हैं। उन सरोकारों की गहराई में जाते हुए अपने शोध को भारतीय और वैश्विक संदर्भों से जोड़कर कार्य किया जाता है तो उससे बहुत कुछ नया निष्कर्ष निकाला जा सकता है।<br />कभी सुप्रसिद्ध लेखक अनुपम मिश्र ने राजस्थान, बूंदेलखंड, मध्यप्रदेश और अन्य क्षेत्रों की जल-संस्कृति पर बहुत महत्वपूर्ण शोध कर लेखन कार्य किया था। उन्होंने तालाबों के नाम के साथ स्थानों के जुड़े संदर्भों के महत्वपूर्ण तथ्य अपनी बेहद लोकप्रिय रही पुस्तक आज भी खरे हैं तालाब में दिए हैं। कैसे हम किसी एक संदर्भ की गहराई में जाएं तो किस्से-कहानियों का ही नहीं स्थानों से जुड़ी परम्पराओं के भी महती स्रोत हम एकत्र कर सकते हैं, उनकी यह पुस्तक इसका अनुपम उदाहरण है। उन्होंने इसमें एक स्थान पर गांवों के साथ लगे सर नाम को रेखांकित करते हुए लिखा है कि मलकीसर, उदयरामसर, हुसनसर आदि बहुत से गांवों के नाम के साथ सर इसलिए जुड़ा है कि सर का अर्थ तालाब होतरा है। वहां इसकी संस्कृति पोषित हुई है। ऐसे ही तालाबों के निर्माण में रही भामाशाहों की भूमिका, जल-संस्कृति के लिए किए गए कार्यों के लोगों से बातचीत कर, उनसे मिलकर उन्होंने अनूठे संदर्भ अपने लिखे में उजागर किए है। अनुपम मिश्र की पुस्तक कोई शोध ग्रंथ नहीं है पर शोध की संस्कृति कैसी हो, इसे एक तरह से समझाती है। मूल बात है, मौलिक दृष्टि की। जो कुछ हमारे आस-पास है, उसको देखते-परखते सूक्ष्म दृष्टि के पर्यवेक्षण की। शोध की अकादमिक गुणवत्ता एवं सामाजिक उपयोगिता, दोनों दृष्टियों से प्रभावी बनाने की इसी संदर्भ में आज अधिक जरूरत है। यह होता है तो उसका लाभ सभी क्षेत्रों में स्वाभाविक ही मिलेगा।<br /><strong>-डॉ. अरुणा व्यास</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार है)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/fundamental-culture-of-research-should-develop/article-78296</link>
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                <pubDate>Fri, 17 May 2024 10:23:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>सीआरआरआई के प्रतिनिधियों ने किया दौरा, बीआरटीएस कॉरिडोर हटाने का निर्णय अनुसंधान के बाद</title>
                                    <description><![CDATA[ सोमवार को केन्द्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान के चीफ साइंटिस्ट डॉ. एस वेलमुर्गन के नेतृत्व में अन्य सदस्यों ने बीआरटीएस कॉरिडोर का दौरा भी किया]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/decision-to-remove-brts-corridor-after-research/article-77021"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-05/t21rer-(1)18.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जयपुर। शहरी यातायात को सुविधाजनक बनाने के लिए मानसरोवर, सीकर रोड में बनाए गए बस रेपिड ट्रांजिट सिस्टम (बीआरटीएस) कॉरिडोर को हटान या रखने का निर्णय केन्द्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई) अथवा अन्य किसी ऐजेंसी से सर्वे रिपोर्ट के बाद किया जाएगा। सर्वे की रिपोर्ट आने के बाद ही बीआरटीएस कॉरिडोर पर राज्य सरकार निर्णय लेगी। इसके लिए सोमवार को केन्द्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान के चीफ साइंटिस्ट डॉ. एस वेलमुर्गन के नेतृत्व में अन्य सदस्यों ने बीआरटीएस कॉरिडोर का दौरा भी किया। कॉरिडोर में किन-किन मुद्दों को शामिल किया जाएगा इसको लेकर सीआरआरआई जल्द ही जयपुर विकास प्राधिकरण के अधिकारियों से वार्ता करने के बाद सर्वे के दौरान कितना पैसा लिया जाएगा इसका प्रस्ताव भेजा जाएगा। गौरतलब है कि जेडीए ट्रैफिक कंट्रोल की गत माह जेडीए में बैठक में बीआरटीएस को हटाने एवं ट्रैफिक संचालन के लिए कॉरिडोर की स्टडी कराने का निर्णय लिया था। दिल्ली एवं भोपाल में भी बीआरटीएस हटाने से पूर्व भी इसी तरह स्टडी कराई थी और बीआरटीएस कॉरिडोर हटाने का निर्णय लिया था। </p>
<p style="text-align:justify;"><strong>170 करोड़ की लागत से बना था बीआरटीएस कॉरिडोर</strong><br />बीआरटीएस कॉरिडोर से सार्वजनिक परिवहन सेवा की बसों का संचालन कर आमजन को सुविधा उपलब्ध कराने के लिए जेएनएनयूआरएम के तहत 170 करोड़ की लागत से वर्ष 2008 में करीब 16 किलोमीटर का बीआरटीएस कॉरिडोर न्यू सांगानेर एवं सीकर रोड पर बनाया गया था। इसमें न्यू सांगानेर रोड पर करीब 9 किमी एवं सीकर रोड पर 7.1 किमी लंबाई में कॉरिडोर बनाया था। कॉरिडोर बनने के बाद भी सड़क दुर्घटनाओं में कमी नहीं आई तो इसके निर्माण पर सवाल उठे थे। इसके बाद जनवरी 2020 में केन्द्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान ने कॉरिडोर हटाने का फैसला किया था, लेकिन इस पर आगे कार्रवाई नहीं हो पाई थी। अब दुबारा से कॉरिडोर का सर्वे करवाकर इस पर कार्रवाई की जाएगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 May 2024 09:56:24 +0530</pubDate>
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                <title>वैज्ञानिकों की कल्पना के विपरीत खोज, पृथ्वी के सभी महासागरों के आकार का 3 गुना पानी के भंडार का लगाया पता</title>
                                    <description><![CDATA[पृथ्वी से इसकी दूरी की बात करे, तो यह करीब हमारी सतह के करीब 700 किमी नीचे मौजूद है। इतना नीचे पानी होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/scientists-discovered-water-700-km-below-the-earths-surface-making/article-74353"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/transfer5.png" alt=""></a><br /><p>वाशिंगटन। इलिनोइस में नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की सतह से बहुत नीचे पानी के भंडार का पता लगाने में सफलता हासिल की है। पानी का यह भंडार पृथ्वी के सभी महासागरों के आकार का तीन गुना है। पृथ्वी से इसकी दूरी की बात करे, तो यह करीब हमारी सतह के करीब 700 किमी नीचे मौजूद है। इतना नीचे पानी होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। </p>
<p>यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक पृथ्वी के पानी की उत्पत्ति का पता लगाने की कोशिश कर रहे थे। इस दौरान शोधकर्ताओं ने एक अप्रत्याशित विशाल खोज की। इस खोज में उन्हें धरती की सतह से 700 किलोमीटर नीचे, पृथ्वी के आवरण के भीतर एक विशाल महासागर मिला। पानी का यह भंडार रिंगवुडाइट नामक चट्टान के अंदर छिपा हुआ मिला। शोध से पला चला है कि पृथ्वी पर पानी धूमकेतु के प्रभाव के माध्यम से नहीं पहुंचा है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Apr 2024 13:14:09 +0530</pubDate>
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