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                <title>World Health Organization - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>सभी को समझना होगा रक्तदान का महत्व</title>
                                    <description><![CDATA[ इस वर्ष यह दिवस दान का जश्न मनाने के 20 साल: धन्यवाद रक्तदाता! थीम के साथ मनाया जा रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/everyone-has-to-understand-the-importance-of-blood-donation/article-81482"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-06/uu11rer-(11)1.png" alt=""></a><br /><p>रक्तदान को पूरी दुनिया में सबसे बड़ा दान माना गया है क्योंकि रक्तदान ही है, जो न केवल किसी जरूरतमंद का जीवन बचाता है बल्कि जिंदगी बचाकर उस परिवार के जीवन में खुशियों के ढेरों रंग भी भरता है। कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति रक्त के अभाव में जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहा है और आप एकाएक उम्मीद की किरण बनकर सामने आते हैं और आपके द्वारा किए गए रक्तदान से उसकी जिंदगी बच जाती है तो आपको कितनी खुशी होगी। हालांकि एक समय था, जब चिकित्सा विज्ञान इतना विकसित नहीं था और किसी को पता ही नहीं था कि किसी दूसरे व्यक्ति का रक्त चढ़ाकर किसी मरीज का जीवन बचाया जा सकता है। उस समय रक्त के अभाव में असमय होने वाली मौतों का आंकड़ा बहुत ज्यादा था किन्तु अब स्थिति बिल्कुल अलग है लेकिन फिर भी यह विड़म्बना ही कही जाएगी कि रक्तदान के महत्व को जानते-समझते हुए भी रक्त के अभाव में आज भी दुनियाभर में हर साल करोड़ों लोग असमय ही काल के ग्रास बन जाते हैं। जीवनदायी रक्त की महत्ता के मद्देनजर लोगों को स्वैच्छिक रक्तदान के लिए जागरूक करने के उद्देश्य से 14 जून 1868 को जन्मे कार्ल लैंडस्टीनर के जन्मदिवस पर 14 जून 2004 को रक्तदाता दिवस की शुरूआत की गई थी और तब पहली बार विश्व स्वास्थ्य संगठन, इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेडक्रॉस तथा रेड क्रिसेंट सोसायटीज द्वारा रक्तदाता दिवस मनाया गया था, तभी से यह दिन रक्तदान के नाम कर दिया गया। इस वर्ष यह दिवस दान का जश्न मनाने के 20 साल: धन्यवाद रक्तदाता! थीम के साथ मनाया जा रहा है।</p>
<p>विश्व रक्तदाता दिवस की शुरूआत का उद्देश्य यही था कि चूंकि दुनियाभर में लाखों लोग समय पर रक्त न मिल पाने के कारण मौत के मुंह में समा जाते हैं, अत: लोगों को रक्तदान करने के लिए जागरूक किया जाए। रक्तदान के महत्व को लेकर किए जाते रहे प्रचार-प्रसार के बावजूद आज भी बहुत से लोगों के दिलो दिमाग में रक्तदान को लेकर कुछ गलत धारणाएं विद्यमान हैं, जैसे रक्तदान करने से संक्रमण का खतरा रहता है, शरीर में कमजोरी आती है, बीमारियां शरीर को जकड़ सकती हैं या एचआईवी जैसी बीमारी हो सकती है।</p>
<p>रक्तदान करने से शरीर को किसी भी तरह का कोई नुकसान नहीं होता बल्कि रक्तदान से तो शरीर को कई फायदे ही होते हैं। जहां तक रक्तदान से संक्रमण की बात है तो सभी स्वास्थ्य केन्द्रों द्वारा रक्त लेते समय विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय मानक तरीके अपनाए जाते हैं, इसलिए संक्रमण का कोई खतरा नहीं होता। 18 साल से अधिक उम्र का शारीरिक रूप से स्वस्थ कम से कम 45 किलो से अधिक वजन का कोई भी व्यस्क स्वेच्छा से कम से कम तीन माह के अंतराल पर साल में 3-4 बार रक्तदान कर सकता है। कुछ लोगों को रक्तदान के समय हल्की कमजोरी का अहसास हो सकता है किन्तु यह चंद घंटों के लिए अस्थायी ही होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष एक करोड़ यूनिट से भी ज्यादा रक्त की आवश्यकता पड़ती है किन्तु मरीजों के इलाज में हर साल कई लाख यूनिट रक्त कम पड़ जाता है, जिसका खामियाजा अनगिनत लोगों को रक्त के अभाव में अपनी जान गंवाकर चुकाना पड़ता है। यह बेहद चौंकाने वाली स्थिति है और आधुनिक विज्ञान के युग में भी रक्त की कमी के चलते लाखों लोगों की मौतों के मद्देनजर यह नितांत आवश्यक है कि आमजन को रक्तदान के लिए प्रेरित करने और उसके फायदे समझाने के लिए व्यापक स्तर पर जन-जागरण अभियान चलाया जाए। लोगों को समझाया जाए कि रक्तदान करने से उन्हें किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं होता बल्कि अपने रक्त से एक अनमोल जीवन बचाकर जो आत्मिक संतुष्टि मिलती है, वह अनमोल है, साथ ही हमारे शरीर का रोग प्रतिरोधी तंत्र भी रक्तदान से मजबूत होता है। रक्तदान करते समय कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान अवश्य रखा जाना चाहिए, तभी आप द्वारा किया गया रक्तदान सार्थक होगा। <br />आपको एड्स, मलेरिया, हेपेटाइटिस, अनियंत्रित मधुमेह, किडनी संबंधी रोग, उच्च या निम्न रक्तचाप, टीबी, डिप्थीरिया, ब्रोंकाइटिस, अस्थमा, एलर्जी, पीलिया जैसी कोई बीमारी हो तो रक्तदान न करें। माहवारी के दौरान या गर्भवती अथवा स्तनपान कराने वाली महिलाएं रक्तदान करने से बचें। यदि आपको टाइफाइड हुआ हो और ठीक हुए महीना भर ही हुआ हो, चंद दिनों पहले गर्भपात हुआ हो, तीन साल के भीतर मलेरिया हुआ हो, पिछले छह महीनों में किसी बीमारी से बचने के लिए कोई वैक्सीन लगवाई हो, आयु 18 से कम या 60 साल से ज्यादा हो तो रक्तदान न करें। जब भी रक्तदान करें, उससे कुछ समय पहले और कुछ समय बाद तक पर्याप्त पानी पीएं, भोजन में हरी सब्जियां तथा आयरन व विटामिन से भरपूर पौष्टिक आहार लें लेकिन रक्तदान से पहले जंक फूड, अधिक वसायुक्त भोजन के अलावा धूम्रपान, मद्यपान इत्यादि किसी भी प्रकार के नशे का सेवन करने से बचें। </p>
<p><strong>-योगेश कुमार गोयल</strong><br /><strong> (ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Jun 2024 10:42:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>रोकनी होगी भोजन की बर्बादी</title>
                                    <description><![CDATA[खाने की बर्बादी रोकने की दिशा में देश में महिलाएं बहुत कुछ कर सकती हैं। महिलाओं को अपने घर के बच्चों में बचपन से यह आदत डालनी होगी कि जितनी भूख हो उतना ही खाना लो।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/wastage-of-food-must-be-stopped/article-80698"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-06/food.png" alt=""></a><br /><p>रोटी, कपड़ा और मकान मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएं मानी जाती हैं। जिसके बिना मनुष्य का जीवन बहुत मुश्किल है। इसमें रोटी सबसे महत्वपूर्ण है। खाद्य सुरक्षा का उद्देश्य यह सुनिश्चित किया जाना है कि हर व्यक्ति को पर्याप्त मात्रा में सुरक्षित और पौष्टिक भोजन मिल सके। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दुनिया में हर दस में से एक व्यक्ति दूषित भोजन का सेवन करने से बीमार पड़ जाता है। जो सेहत के लिए एक बड़ा खतरा है। भोजन की कमी व दूषित भोजन खाने से प्रतिवर्ष हजारों लोगों की जान चली जाती है। इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व स्वास्थ्य संगठन और खाद्य और कृषि संगठन को दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देने के प्रयासों का नेतृत्व करने और पौष्टिक खाने के प्रति लोगों को जागरुक करने की जिम्मेदारी दी है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा दिसंबर 2018 में पहली बार खाद्य और कृषि संगठन के सहयोग से विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस मनाया था। इसके बाद पहली बार 7 जून 2019 में विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस मनाया गया था। तब से हर वर्ष 7 जून को विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस मनाया जाने लगा है। </p>
<p>भारत का खाद्य मंत्रालय भोजन की बर्बादी को रोकने के लिए शदियों में मेहमानों की संख्या के साथ ही परोसे जाने वाले व्यंजनों की संख्या सीमित करने पर विचार कर रहा है। इस बारे में विवाह समारोह अधिनियम, 2006 कानून भी बनाया गया है। हालांकि इस कानून का कड़ाई से कहीं भी पालन नहीं किया जाता है। भारत में हर वर्ष जितना भोजन तैयार होता है उसका एक तिहाई बर्बाद हो जाता है। बर्बाद होने वाला भोजन इतना होता है कि उससे करोड़ों लोगों की खाने की जरूरत पूरी हो सकती है। एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत में बढ़ती सम्पन्नता के साथ ही लोग खाने के प्रति असंवेदनशील हो रहे हैं। खर्च करने की क्षमता के साथ ही खाना फेंकने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। विश्व खाद्य संगठन के अनुसार देश में हर साल पचास हजार करोड़ रुपए का भोजन बर्बाद चला जाता है। एक आंकलन के मुताबिक बर्बाद होने वाले भोजन की धनराशि से पांच करोड़ बच्चों की जिदगी संवारीं जा सकती है। </p>
<p>विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि खाद्य अपव्यय को रोके बिना खाद्य सुरक्षा सम्भव नहीं है। इस रिपोर्ट में वैश्विक खाद्य अपव्यय का अध्ययन पर्यावरणीय दृष्टिकोण से करते हुए बताया है कि भोजन के अपव्यय से जल, जमीन और जलवायु के साथ साथ जैव- विविधता पर भी बेहद नकारात्मक असर पड़ता है। रिपोर्ट के मुताबिक हमारी लापरवाही के कारण पैदा किए जाने वाले अनाज का एक तिहाई हिस्सा बर्बाद कर दिया जाता है। देश में एक तरफ करोड़ों लोग खाने को मोहताज हैं, वहीं लाखों टन खाना प्रतिदिन बर्बाद किया जा रहा है। </p>
<p>हमारे देश में हर साल उतना गेहूं बर्बाद होता है, जितना आस्ट्रेलिया की कुल पैदावार है। नष्ट हुए गेहूं की कीमत लगभग 50 हजार करोड़ रुपये होती है और इससे 30 करोड़ लोगों को साल भर भरपेट खाना दिया जा सकता है। हमारे देश में 2.1 करोड़ टन अनाज केवल इसलिए बर्बाद हो जाता है। क्योंकि उसे रखने के लिए हमारे पास पर्याप्त भंडारण की सुविधा नहीं है। औसतन हर भारतीय एक साल में छह से 11 किलो अन्न बर्बाद करता है। साल में जितना सरकारी खरीदी का धान व गेहूं खुले में पड़े होने के कारण नष्ट हो जाता है। उतनी राशि से गांवों में पांच हजार वेयर हाउस बनाए जा सकते हैं। </p>
<p>आज कल कई शहरो में समाजसेवी लोगो ने मिलकर रोटी बैंक बना रखा है। रोटी बैंक से जुड़े कार्यकर्ता शहर में घरों से व विभिन्न समारोह स्थलों से बचे हुये भोजन को एकत्रित कर जरूरत मंद गरीबो तक पहुंचाते हैं। इससे जहां भोजन की बर्बादी रूकती है, वहीं जरूरत मंदों को भोजन भी उपलब्ध होता है। इस दिशा में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अभियान सोंचे, खाए और बचाएं भी एक अच्छी पहल है। इसमें शामिल होकर की भोजन की बर्बादी रोकी जा सकती है। वर्तमान समय में समाज के सभी लोगों को मिलकर भोजन की बर्बादी रोकने के लिये सामाजिक चेतना लानी होगा। तभी भोजन की बर्बादी रोकने का अभियान सफल हो पायेगा। </p>
<p>खाने की बर्बादी रोकने की दिशा में देश में महिलाएं बहुत कुछ कर सकती हैं। महिलाओं को अपने घर के बच्चों में बचपन से यह आदत डालनी होगी कि जितनी भूख हो उतना ही खाना लो। एक- दूसरे से बांट कर खाना भी भोजन की बर्बादी को बड़ी हद तक रोक सकता है। हमें अपनी आदतों को सुधारने की जरूरत है। धार्मिक लोगों एवं स्वयंसेवी संगठनों को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए। <br />                                  <br /><strong>- रमेश सर्राफ धमोरा</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 07 Jun 2024 11:10:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>International Nurses Day : इंसानी सेवा की अथक मिसाल हैं नर्सें</title>
                                    <description><![CDATA[ नर्सों के समर्पण भाव, उनकी अथक मेहनत और मरीजों की गुणवत्तापूर्ण देखभाल की बदौलत ही समूची स्वास्थ्य प्रणाली टिकी हुई है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/international-nurses-day-nurses-are-a-tireless-example-of-human/article-77702"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-05/florence.jpg" alt=""></a><br /><p>आधुनिक नर्सिंग आंदोलन की जन्मदाता फ्लोरेंस नाइटेंगल, जिन्हें विद द लैंप भी कहा जाता है,उनका जन्म 12 मई 1820 को इटली के फ्लोरेंस में हुआ था। फ्लोरेंस नाइटेंगल ने  युद्ध में घायल सिपाहियों की देखरेख का एक ऐसा उच्चस्तरीय मानदंड स्थापित किया था कि उनके जन्मदिन को दुनिया के 130 से भी ज्यादा देशों में अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस के रूप में मनाया जाता है।  इस समय दुनिया में 3 करोड़ के आसपास नर्स हैं और अगर कहा जाए कि दुनिया के स्वास्थ्य का सारा दारोमदार उनकी ही अथक मेहनत और इंसानी सेवा के लिए दिखाए जाने वाले उनके समर्पण भाव पर टिका है, तो अतिश्योक्ति न होगी। ये नर्स ही होती हैं, जो किसी बीमार व्यक्ति का सबसे ज्यादा ख्याल रखती है। <br />नर्सों के समर्पण भाव, उनकी अथक मेहनत और मरीजों की गुणवत्तापूर्ण देखभाल की बदौलत ही समूची स्वास्थ्य प्रणाली टिकी हुई है। इसलिए जरूरी है कि नर्सिंग पेशे के लिए महत्वपूर्ण संसाधन उपलब्ध हों, उन्हें वित्तीय संकट से न गुजरना पड़े वरना दुनियाभर का स्वास्थ्य ढांचा चरमरा जाता है। साल 2024 के लिए इंटरनेशनल नर्स डे की थीम है- नर्सों को सशक्त बनाना, स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों को मजबूत करना है। इस थीम से पता चलता है कि आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में नर्सों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। <br />दो साल पहले दुनिया को अपनी हाहाकारी गिरफ्त में लेने वाली कोरोना महामारी के समय नर्सों की महत्ता पूरी दुनिया ने न सिर्फ  महसूसा था बल्कि उन्हीं के हाथों में इंसान की जिंदगी आकर टिक गई थी और यह कोई पहली बार नहीं हुआ, हमेशा से स्वास्थ्य देखभाल की दुनिया नर्सों पर ही टिकी रही है। इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि अगर दुनिया के स्वास्थ्य को सुरक्षित और मजबूत बनाना है तो जरूरी है कि हम नर्सिंग जैसी संस्था को मजबूत बनाया जाए।</p>
<p>फ्लोरेंस नाइटेंगल जिनके नाम पर आज पूरी दुनिया में नर्स डे मनाया जाता है और जो आधुनिक नर्स पेशे की आधार हैंए उनकी अथक मेहनत और इंसान के प्रति समर्पण भाव ही दरअसल नर्सिंग पेशे की आत्मा है। फ्लोरेंस नाइटेंगल सिर्फ नर्स ही नहीं थीं, वह अपने जमाने की नर्सए समाज सुधारक और आधुनिक नर्सिंग पेशे की संस्थापक और दार्शनिक थीं।<br />क्रीमिया युद्ध के दौरान 1858 में नाइटेंगल को ब्रिटेन और सहयोगी देशों के सैनिकों की देखभाल के लिए तुर्की में तैनात किया गया था। वह घायल सैनिकों की दिनरात सेवा में लगी रहती थीं और देर रात, लालटेन लिए अस्पतालों का चक्कर लगाती रहती थीं, इसलिए उनका नाम लेडी विद द लैंप पड़ गया। उस साल यानी 1887 में उनकी सैनिकों के लिए की गई इस महान सेवा की सराहना ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया और राजकुमार अलबर्ट ने भी किया था। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 May 2024 15:52:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>World Health Organization की पहल पर राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में &quot;निरोगी भारत स्वस्थ भारत&quot; की थीम पर मनाया ‘वर्ल्ड हैंड हाइजीन डे’</title>
                                    <description><![CDATA[मरीजों एवं उनके परिजनों को चिकित्सकों, नर्सिंग कर्मियों द्वारा हाथों को अच्छी तरह धोने के लिए सात स्टेप्स को करके दिखाया गया एवं स्वस्थ रहने के लिए हाथों की स्वच्छता से जुड़ी जानकारी दी गई ।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/on-the-initiative-of-world-health-organization-%E2%80%98world-hand-hygiene/article-76870"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-05/123.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर | विश्व स्वास्थ्य संगठन की पहल पर जोरावर सिंह गेट स्थित राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान जयपुर के अस्पताल परिसर में वर्ल्ड हैंड हाइजीन डे पर विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से जागरुकता कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में आने वाले रोगियों, उनके परिजनों और स्वास्थ्य कर्मियों को हाथों की स्वच्छता के महत्व के बारे में जागरूक करने और गंदे हाथों से होने वाले संक्रामक रोगों को रोकने के लिये बैनर पोस्टर्स के माध्यम से जागरूक किया गया।  मरीजों एवं उनके परिजनों को चिकित्सकों, नर्सिंग कर्मियों द्वारा हाथों को अच्छी तरह धोने के लिए सात स्टेप्स को करके दिखाया गया एवं स्वस्थ रहने के लिए हाथों की स्वच्छता से जुड़ी जानकारी दी गई ।</p>
<p>कुलपति प्रोफेसर संजीव शर्मा ने कहा स्वस्थ एवं निरोगी रहने के लिए हमारी स्वच्छता और हाथों का स्वच्छ होना बहुत जरूरी है, हाथों के स्वच्छ नहीं होने पर शरीर में कई रोग होने की आशंका रहती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की आमजन को स्वस्थ रखने की पहल पर 5 मई को वर्ल्ड हैंड हाइजीन डे दुनियाभर में मनाया जाता है। यह विशेष दिन आमजन को हाथों से होने वाले संक्रामक रोगों को फैलने से रोकने के उद्देश्य से मनाया जाता है। इस अवसर पर राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में निरोगी भारत स्वस्थ भारत की थीम पर अस्पताल परिसर में स्वास्थ्य कर्मियों, रोगियों और उनके परिजनों को हाथों की स्वच्छता के महत्व के बारे में शिक्षित करने और उन्हें नियमित रूप से हाथ धोने के उद्देश्य से विभिन्न गतिविधियों का आयोजन किया गया है। </p>
<p>अस्पताल अधीक्षक प्रोफेसर अनुपम श्रीवास्तव ने कहा हाथों से होने वाले इन्फेक्शन के कारण कई बीमारियां होती है इसके लिए राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान के अस्पताल परिसर में  वर्ल्ड हैंड हाइजीन डे पर विभिन्न गतिविधियों का आयोजन किया गया है। अस्पताल उपाधीक्षक डॉ. हरीश भाकुनी ने कहा विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी संक्रमणों से बचाव के लिए हाथ धोने के महत्व पर जोर दिया है। उनके दिशा-निर्देशों के अनुसार, हाथों को साबुन और पानी से कम से कम 20 सेकेंड तक अच्छी तरह धोना चाहिए। कोरोना महामारी के समय भी बीमारियों से बचने के लिए हाथों को अच्छी तरीके से धोने पर काफी जोर दिया गया था, क्योंकि यदि हाथ स्वच्छ है तो हम कहीं संकामक बीमारियों से बच सकते हैं।</p>
<p>आवासीय चिकित्सा अधिकारी डॉ आभा सिंह ने कार्यक्रम की जानकारी देते हुए बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के वर्ल्ड हैंड हाइजीन डे पर हर वर्ष राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में भी लोगों को बड़ी संख्या में जागरूक किया जाता है। इस वर्ष भी राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान के अस्पताल की आईपीडी और ओपीडी में आने वाले रोगियों उनके रिश्तेदारों, संस्थान के स्वास्थ्य कर्मियों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों को हाथ धोने से स्वस्थ एवं निरोगी रहने के महत्व से जुड़ी जानकारी 2000 से अधिक लोगों को दी गई। राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान के नर्सिंग स्टाफ द्वारा हाथ धोने के लिये 7 स्टेप्स के वीडियो को सोशल मीडिया के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों को जागरूक किया जाएगा। वर्ल्ड हैंड हाइजीन डे के अवसर पर राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान के शिक्षक, चिकित्सक, विद्यार्थी, नर्सिंगकर्मी एवं अन्य कर्मचारी उपस्थित रहे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 May 2024 15:27:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मंकीपॉक्स का खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[इसका मतलब है कि अब मंकीपॉक्स दुनियाभर में तेजी से फैल सकता है, यह वैसे ही है जैसे कोरोना महामारी ने दुनियाभर को हिलाकर रख दिया था।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/danger-of-monkeypox/article-16677"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-07/monkey-pox.jpg" alt=""></a><br /><p>विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने मंकीपॉक्स रोग को लेकर ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी की घोषणा कर दी है। इसका मतलब है कि अब मंकीपॉक्स दुनियाभर में तेजी से फैल सकता है, यह वैसे ही है जैसे कोरोना महामारी ने दुनियाभर को हिलाकर रख दिया था। खबरों के अनुसार यह वायरस उन देशों में भी पहुंच रहा है, जहां अभी तक इसका कोई मामला पाया नहीं गया था। लेकिन अब दुनिया के 75 देशों में 17 हजार से अधिक मरीज पाए गए हैं और भारत में भी केरल में पहले दो मरीजों के पाए जाने के बाद मंकीपॉक्स दिल्ली तक में दस्तक दे चुका है, जो चिंताएं बढ़ाने वाला है। भारत में अब तक पांच मरीज सामने आए हैं। केरल में एक और मरीज मिला है और अब वह तीन मरीजों का इलाज चल रहा है। यूपी में एक मरीज को संदिग्ध मानकर उसकी जांच की जा रही है। केरल में पाए गए मंकीपॉक्स से संक्रमित तीनों यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) से लौटे थे और वहीं पर वे किसी संक्रमित मरीज के सम्पर्क में आए थे, लेकिन दिल्ली में संक्रमित चौथे मरीज की तो कोई ट्रेवल हिस्ट्री भी नहीं पाई गई है। यूरोप व अमेरिका में मंकीपॉक्स के मरीज सर्वाधिक हैं। अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (सीडीसी) के मुताबिक साल 1958 में यह रोग पहली बार देखने को मिला था। दरअसल रिसर्च के लिए रखे गए बंदरों में यह पाया गया था और उन बंदरों में चेचक जैसी बीमारी के लक्ष्य थे। इसीलिए इस बीमारी का नाम मंकीपॉक्स रखा गया है। यह बीमारी काफी कष्टदायक है और मरीज को तड़फाने वाली है। लेकिन इससे ज्यादा चिंतित होने की भी जरूरत नहीं है। जरूरत सिर्फ सावधानी बरतने की और शरीर की सफाई रखने की जरूरत है। डब्ल्यूएचओ ने सतर्क रहने की वजह से ही इसे इमरजेंसी घोषित किया है कहीं यह बीमारी भी कोविड-19 महामारी जैसा रूप धारण न कर लें। कुछ देशों में मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और अभी दुनिया कोरोना से भी पूरी तरह निपटी नहीं है। उसकी मौजूदगी बनी हुई है। मंकीपॉक्स महामारी न बने, बस इसका ही विशेष ध्यान रखना है। भारत में अभी चार-पांच मामले मिले हैं। लेकिन यह वायरस भी तेजी से फैलता है तो सरकारों को सतर्कता से काम लेना होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/danger-of-monkeypox/article-16677</link>
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                <pubDate>Fri, 29 Jul 2022 11:00:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मंकी पॉक्स पर कड़ी निगाह रखे है कोटा</title>
                                    <description><![CDATA[ देश में मंकीपॉक्स अलर्ट के बाद से राज्य का  चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग भी अलर्ट मोड पर है। कोटा में सभी हेल्थ सेंटरों को विदेश से आने वाले लोगों पर कड़ी नजर रखने निर्देश दिए हंै, जिनके शरीर पर दाने दिखते हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/kota-is-keeping-a-close-watch-of-monkey-pox/article-15884"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-07/a-11.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। दुनिया के 70 से ज्यादा देशों में फैले मंकीपॉक्स वायरस ने भारत में दस्तक दे दी है। 14 जुलाई को केरल के कोल्लम जिले से देश का पहला मंकीपॉक्स केस सामने आया। अभी तक दो केस आ चुके हैं। एक मरीज हाल ही में यूएई से केरल लौटा था। वर्ल्ड हेल्थ आॅर्गेनाइजेशन के मुताबिक मंकी पॉक्स चेचक, खसरा, बैक्टीरियल स्किन इंफेक्शन, खुजली, और दवाओं से होने वाली एलर्जी  से अलग होती है। इसमें लिंफ नोड्स में सूजन होती है, जबकि चेचक में ऐसा नहीं होता है। इसका इनक्यूबेशन पीरियड (इंफेक्शन से सिम्प्टम्स तक का समय) आमतौर पर 7-14 दिनों का होता है, लेकिन यह 5-21 दिनों का भी हो सकता है।<br /><br /><strong>मंकीपॉक्स को लेकर कोटा अलर्ट</strong><br />देश में मंकीपॉक्स अलर्ट के बाद से राज्य का  चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग भी अलर्ट मोड पर है। कोटा में सभी हेल्थ सेंटरों को विदेश से आने वाले लोगों पर कड़ी नजर रखने निर्देश दिए हंै, जिनके शरीर पर दाने दिखते हैं। पिछले 21 दिनों में मंकीपॉक्स सस्पेक्टेड देशों की ट्रैवल हिस्ट्री, किसी मंकीपॉक्स सस्पेक्टेड से सीधा संपर्क रहा हो। ऐसे सभी संदिग्ध केस को हेल्थकेयर फैसिलिटी में आइसोलेट किया जाएगा, जब तक उसके दानों की पपड़ी नहीं उधड़ जाती। मंकीपॉक्स संदिग्ध मरीजों के फ्लूइड या खून का सैंपल एनआईवी पुणे में टेस्ट के लिए भेजा जाएगा। अगर कोई पॉजिटिव केस पाया जाता है, तो फौरन कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग शुरू की जाएगी। विदेश से आने वाले यात्रियों को ऐसे लोगों के संपर्क में आने से बचना चाहिए जो स्किन रोग से पीड़ित हों। यात्रियों को चूहे, गिलहरी, बंदर सहित जीवित अथवा मृत जंगली जानवरों के संपर्क में नहीं आना चाहिए। अफ्रीकी जंगली जीवों से बनाए गए उत्पादों जैसे- क्रीम, लोशन, पाउडर का इस्तेमाल करने से बचें। शिकार से प्राप्त मांस को न तो खाएं और न ही बनाएं।<br /><br /><strong>इम्वाम्यून वैक्सीन मौजूद</strong><br />कोविड टीकारण प्रभारी डॉ. अभिमन्यु शर्मा ने बताया कि अमेरिका की नेशनल हेल्थ एंजेसी सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन यानी सीडीसी  ने अपनी वेबसाइट पर बताया है कि मंकीपॉक्स के संक्रमण के लिए अभी कोई इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन दवा के साथ इसे रोका जा सकता है। मार्केट में पहले से ऐसी दवाएं मौजूद हैं जो मंकीपॉक्स के इलाज में इस्तेमाल के लिए अप्रूव्ड हैं और बीमारी के खिलाफ प्रभावी रही हैं। जैसे- सिडोफोविर, एसटी-246 और वैक्सीनिया इम्युनोग्लोबुलिन का इस्तेमाल मंकीपॉक्स के संक्रमण में किया जाता है। मंकीपॉक्स की रोकथाम और उपचार के लिए जैनियोस टीएम वैक्सीन भी उपलब्ध है जिसे इम्वाम्यून या इम्वेनेक्स के नाम से भी जाना जाता है। इस वैक्सीन को डेनिश दवा कंपनी बवेरियन नॉर्डिक बनाती है। अफ्रीका में इसके इस्तेमाल के पिछले आंकड़े बताते हैं कि यह मंकीपॉक्स को रोकने में 85 प्रतिशत  प्रभावी है।<br /><br /><strong>95 फीसदी मरीजों में चेहरे पर होते हैं दाने</strong><br />मंकीपॉक्स में स्किन पर दाने आमतौर पर बुखार आने के दो दिनों के अंदर दिखाई देते हैं। 95 प्रतिशत मामलों में ज्यादातर दाने चेहरे पर निकलते हैं। 75 प्रतिशत केसेज में दाने हथेली और पैरों के तलवों में होते हैं। जबकि 70 प्रतिशत केसेज में ये ओरल म्यूकस झिल्ली को प्रभावित करता है। साथ ही ये आंखों और प्राइवेट पार्ट्स एरिया में भी देखने को मिलता है। मंकीपॉक्स होने के बाद स्किन फटने का स्टेज 2 से 4 सप्ताह के बीच रह सकता है। पहले ये दाने पानी और फिर मवाद से भर जाते हैं, और फिर इन पर पपड़ी पड़ जाती है। यह काफी पेनफुल स्टेज होता है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि मरीजों को आंखों में दर्द या धुंधला दिखाई दे, सांस लेने में तकलीफ हो और कम पेशाब हो तो अलर्ट हो जाना चाहिए। खुद को आइसोलेट कर लेना चाहिए।<br /><br /><strong>अब तक दुनिया में 14 हजार मामले आ चुके सामने</strong><br /><strong>क्या है मंकी पॉक्स का इलाज?</strong><br />डॉ.ओपी मीणा ने बताया कि  मंकी पॉक्स के मरीजों को सिस्टेमैटिक ट्रीटमेंट दिया जाता है। अगर बुखार है तो पेरासिटामोल दिया जाता है।  अगर किसी को स्किन में प्रॉब्लम है तो स्किन का इलाज किया जाता है।  ज्यादातर मंकी पॉक्स के मामले 2 से 3 हफ्ते में ठीक हो जाते हैं।  जिन लोगों की इम्युनिटी कमजोर होती है उनको थोड़ी परेशानी होती है। <br /><br /><strong>ऐसी होती है जांच</strong><br />डॉ. अभिमन्यु शर्मा ने बताया कि इसका टेस्ट नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ वायरोलॉजी पुणे में होता है।  यह अलग वायरस है. दिल्ली में अब तक इसका एक भी केस नहीं है, इसलिए इसके बारे में जानकारी सीमित है।  अभी हम डब्ल्यूएचओं की गाइडलाइंस और भारत सरकार के निर्देशों को फॉलो कर रहे हैं।  बुश मीट और वाइल्ड एनिमल्स के जरिए यह फैलता है। मंकी पॉक्स में मरीज को स्किन पर निशान आता है, रैशेज होते हैं, बुखार, आंखों में लालपन और मसल्स पेन भी इसके लक्षण हैं। <br /><br /><strong>पहली बार 1970 में हुआ मंकीपॉक्स आउटब्रेक</strong> <br />1970 में कॉन्गो में मंकीपॉक्स का पहला ह्यूमन केस सामने आया था। इसके बाद ये 11 अफ्रीकी देशों में रिपोर्ट किया गया है।  बेनिन, कैमरून, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक आॅफ कॉन्गो, गैबोन, लाइबेरिया, नाइजीरिया, रिपब्लिक आॅफ कॉन्गो, सिएरा लियोन और साउथ सूडान।अफ्रीका के बाहर मंकीपॉक्स का पहला आउटब्रेक 2003 में अमेरिका में हुआ था। ये पालतू कुत्तों के संपर्क में आने से फैला था। ये पालतू कुत्ते ऐसे चूहों के साथ रखे गए थे, जिन्हें घाना से इंपोर्ट किया गया था। तब अमेरिका में 70 मामलों की पुष्टि हुई थी। इसके अलावा इजरायल में 2018 में, ब्रिटेन में 2018, 2019, 2021 और 2022 में, सिंगापुर में 2019 में मंकीपॉक्स के मामले पाए गए। इन सभी केस की कोई न कोई ट्रैवल हिस्ट्री थी।<br /><br /><strong>मंकीपॉक्स और चेचक एक ही वायरस फैमिली से</strong> <br />पहली बार मंकीपॉक्स 1958 में खोजा गया था। तब रिसर्च के लिए रखे दो बंदरों में चेचक जैसी बीमारी के लक्षण सामने आए थे। इंसानों में इसका पहला मामला 1970 में कॉन्गों में 9 साल के बच्चे में पाया गया। आम तौर पर ये बीमारी रोडेंट्स यानी चूहे गिलहरी और नर बंदरों से फैलती है। मंकीपॉक्स और चेचक एक ही वायरस फैमिली से हैं। डब्ल्यूएचओ  और दुनिया भर की नेशनल हेल्थ एजेंसियों के पास चेचक से लड़ने का दशकों का अनुभव है, जिसे 1980 में दुनिया से खत्म घोषित कर दिया गया था। उसका अनुभव मंकीपॉक्स के इलाज में काम आ सकता है। इतने सालों में यह बीमारी कभी भी बड़े पैमाने पर अफ्रीका के बाहर नहीं गई, लेकिन इस बार बिना अफ्रीका की ट्रैवल हिस्ट्री के विकसित देशों में मंकीपॉक्स के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इसी नए पैटर्न की वजह से दुनिया घबराई हुई है।<br /><br /><strong>कितनी खतरनाक है ये बीमारी?</strong><br />कोरोना के मुकाबले मंकी पॉक्स के मामले में मृत्यु दर काफी कम है। अभी तक भारत में मंकी पॉक्स से एक भी मौत नहीं हुई है। 2 मामले जरूर सामने आए हैं। ये वैसे लोग थे जो विदेश से आए हंै और मंकी पॉक्स से संक्रमित लोगों के संपर्क में आए थे। इस बीमारी में इंसान से इंसान में संक्रमण हो सकता है। इससे बचाव सबसे जरूरी है। मास्क का प्रयोग करना सबसे जरूरी है। सामान्य मास्क का भी प्रयोग किया जा सकता है। इसके साथ साथ सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखना भी जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति में मंकी पॉक्स के लक्षण सामने आते हैंंंंंंंंंं तो उसे तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। इसके टेस्ट के लिए स्किन से स्लेट लिया जाता है। इसका टेस्ट स्किन से होता है। इसके जांच से हमे पता चलता है की इंसान में मंकी पॉक्स का वायरस है या कोई दूसरा वायरस। <br /><br /><strong>मंकीपॉक्स के 14 हजार मामलों की पुष्टि</strong> <br />विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दुनिया भर में मंकीपॉक्स के 14 हजार मामलों की पुष्टि की है। अफ्रीका में पांच लोगों की मौत हुई हैं। इसकी जानकारी डब्ल्यूएचओ के महासचिव टेड्रोस अधनोम घेब्रेसियस ने दी थी।  दिल्ली सरकार  ने भी इसको लेकर तैयारियां शुरू कर दी है।  दिल्ली सरकार ने लोक नायक जय प्रकाश  अस्पताल को इसके लिए नोडल अस्पताल बनाया है और इस अस्पताल में 6 बेड का एक स्पेशल वार्ड भी तैयार किया  है।   गुरुवार को, डब्ल्यूएचओ ने  समिति की दूसरी बैठक ली। 15 जुलाई को डब्ल्यूएचओ ने दुनियाभर में मंकीपॉक्स संक्रमण के 11634 मामलों की पुष्टि की थी। 21 जुलाई को यह आंकड़ा 14 हजार तक पहुंच गया है। इस तरह पांच  दिनों में संक्रमण के तकरीबन साढ़े तीन हजार मामले सामने आए हैं। असल में अभी तक अमेरिका, कनाड़ा में मंकीपॉक्स संक्रमण के सबसे अधिक मामले सामने आ चुके हैं। वहीं दुनिया के 75 से अधिक देशों में अभी तक मंकीपॉक्स संक्रमण रिपोर्ट हो चुका है।<br /><br /><strong>कोरोना और इसमें क्या समानता है</strong> <br />डॉ. जगदीश सोनी ने बताया कि यह कोरोना  से बिल्कुल अलग है।  यह एक डीएनए वायरस है, इसमें ह्यूमन टू ह्यूमन ट्रांसमिशन  भी होता है। यदि कोई पेशेंट के क्लोज कॉन्टेक्ट में हो, क्लॉथ शेयर करते हैं, तो उसमें भी ट्रांसमिशन हो सकता है। मदर टू चाइल्ड ट्रांसमिशन के भी केस आ सकते हैं। मंकीपॉक्स का इस बार का प्रसार बहुत असामान्य है। क्योंकि ये नॉर्थ अमेरिका और यूरोपियन देशों में तेजी से फैल रहा है, जहां आमतौर पर ये वायरस नहीं पाया जाता है। यूरोप मंकीपॉक्स के प्रसार का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है। इस साल अब तक मंकीपॉक्स के कंफर्ड केसेज में से 80% से ज्यादा केस यूरोपीय देशों से आए हैं। अमेरिका के 37 राज्यों में अब तक मंकीपॉक्स के 750 से ज्यादा कैसेज सामने आए हैं।<br /><br /><strong>महामारी में बदलने की संभावना कम, सावधानी जरूरी</strong> <br />यूरोप में डब्ल्यूएचओ की पैथागन थ्रेट टीम के प्रमुख रिचर्ड पेबॉडी के मुताबिक मंकीपॉक्स आसानी से नहीं फैलता और इससे फिलहाल कोई जानलेवा गंभीर बीमारी नहीं हो रही। इसके आउटब्रेक को लेकर कोविड-19 जैसे बड़े वैक्सीनेशन की जरूरत नहीं है। लोग संक्रमण से बचाव के लिए  हाइजीन का ध्यान रखें और नियमित तौर पर हाथ धोते रहें। इसके देशभर में फैलने का रिस्क बहुत कम है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस बात के कोई संकेत नहीं मिले हैं कि मंकीपॉक्स का वायरस म्यूटेट होकर और ज्यादा खतरनाक वैरिएंट विकसित कर रहा है। यह कोविड नहीं है। यह हवा में नहीं फैलता और हमारे पास इसे रोकने के लिए वैक्सीन मौजूद है।<br /><strong>- डॉ. अभिमन्यु शर्मा,  कोविड टीकाकरण प्रभारी कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 23 Jul 2022 17:14:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
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                <title>कोरोना की उत्पत्ति की आगे की जांच के WHO के प्रस्ताव को चीन ने किया खारिज, जताई हैरानी</title>
                                    <description><![CDATA[चीन सरकार ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के कोरोना वायरस की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए देश में आगे की जांच के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग के उप निदेशक जेंग यिक्सिन ने चीन में कोविड-19 की उत्पत्ति के दूसरे चरण के अध्ययन के प्रस्ताव पर हैरानी जताते हुए इसे अभिमानी और व्यावहारिक ज्ञान के प्रति सम्मान की कमी करार दिया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%86%E0%A4%97%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%9A-%E0%A4%95%E0%A5%87-who-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B5-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%9A%E0%A5%80%E0%A4%A8-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%9C--%E0%A4%9C%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%88-%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80/article-1235"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-07/corona-1.jpg" alt=""></a><br /><p>बीजिंग। चीन सरकार ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के कोरोना वायरस की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए देश में आगे की जांच के प्रस्ताव को गुरुवार को ठुकरा दिया। राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग के उप निदेशक जेंग यिक्सिन ने चीन में कोविड-19 की उत्पत्ति के दूसरे चरण के अध्ययन के प्रस्ताव पर हैरानी जताते हुए इसे अभिमानी और व्यावहारिक ज्ञान के प्रति सम्मान की कमी करार दिया। जेंग ने मीडिया से कहा कि चीन ने डब्ल्यूएचओ के समक्ष कोविड-19 की उत्पत्ति का पता लगाने के दूसरे चरण सिफारिशें प्रस्तुत की हैं। चीन का मानना है कि इसे डब्ल्यूएचओ-चीन के संयुक्त अध्ययन पर आधारित होना चाहिए और इसे सदस्य देशों के साथ पूर्ण परामर्श के बाद दुनिया भर के कई और देशों में किया जाना चाहिए।<br /> <br /> डब्ल्यूएचओ ने चीन में कोरोना वायरस की उत्पत्ति के दूसरे चरण के अध्ययन का प्रस्ताव दिया था, जिसमें वुहान की सभी प्रयोगशालाएं और बाजारों का अध्ययन भी शामिल है। उन्होंने कहा कि अध्ययन के दूसरे चरण को उन जगहों पर नहीं किया जाना चाहिए, जिनका पहले चरण के अध्ययन के दौरान निरीक्षण किया जा चुका है। चीनी पर्यवेक्षकों ने डब्ल्यूएचओ के प्रमुख टेड्रोस गेब्रियेसस पर इस मुद्दे पर राजनीतिक दबाव के सामने घुटने टेकने का भी आरोप लगाया है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 22 Jul 2021 17:56:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>WHO की चेतावनी, डेल्टा से भी अधिक संक्रामक और खतरनाक कोविड-19 वैरिएंट आ सकता है सामने</title>
                                    <description><![CDATA[विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने बुधवार को चेतावनी दी कि मानव जाति के समक्ष जल्द ही मौजूदा डेल्टा संस्करण की तुलना में एक और भी अधिक संक्रामक और खतरनाक कोरोना वायरस वैरिएंट आ सकता है। डब्ल्यूएचओ प्रमुख टेड्रोस गेब्रियेसस ने अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के 138वें सत्र को बताया कि जितना अधिक संचरण होगा, उतने ही अधिक वैरिएंट डेल्टा संस्करण की तुलना में और खतरनाक होने की आशंका के साथ उभरेंगे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/who-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9A%E0%A5%87%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A5%80--%E0%A4%A1%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%AD%E0%A5%80-%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%95-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%96%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%95-%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A1-19-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%8F%E0%A4%82%E0%A4%9F-%E0%A4%86-%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%87/article-1222"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-07/corona-1.jpg" alt=""></a><br /><p>मॉस्को। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने बुधवार को चेतावनी दी कि मानव जाति के समक्ष जल्द ही मौजूदा डेल्टा संस्करण की तुलना में एक और भी अधिक संक्रामक और खतरनाक कोरोना वायरस वैरिएंट आ सकता है। डब्ल्यूएचओ प्रमुख टेड्रोस गेब्रियेसस ने अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के 138वें सत्र को बताया कि जितना अधिक संचरण होगा, उतने ही अधिक वैरिएंट डेल्टा संस्करण की तुलना में और खतरनाक होने की आशंका के साथ उभरेंगे, जो अभी इस तरह की तबाही का कारण बन रहे हैं। जितने अधिक वैरिएंट सामने आएंगे, उतनी ही अधिक आशंका बनी रहेगी कि उनमें से एक के खिलाफ भी टीका बेअर रहा, तो हम सभी को वापस वहीं ले आएगा, जहां से टीकाकरण और इलाज आदि की शुरुआत की गई थी। <br /> <br /> गेब्रियेसस ने कहा कि दुनिया भर में टीकों के आविष्कार और टीकाकरण अभियान शुरू होने के साथ-साथ महामारी को रोकने के लिए अन्य निवारक उपायों के बावजूद विश्व एक और कोरोना वायरस लहर की कगार पर है। उन्होंने हर देश तक टीकों के समान पहुंच की कमी का इसका बड़ा कारण बताया। विशेष रूप से कम आय वाले देशों की आबादी के केवल एक फीसदी को वैक्सीन का कम से कम एक शॉट मिला है जबकि विकसित देशों में आधी से अधिक आबादी को वैक्सीन की एक डोज मिल चुकी है। <br /> <br /> डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने कहा कि कोरोना के परीक्षण और उपचार सहित महामारी से लड़ने के लिए टीके और अन्य निवारक उपायों को साझा करने में वर्तमान में दुनिया भर के कई देशों के साथ हो रहा अन्याय न केवल सामाजिक और आर्थिक उथल-पुथल में योगदान देता है, बल्कि काफी हद तक वायरस के आगे प्रसार के लिए भी जिम्मेदार है। गौरतलब है कि डब्ल्यूएचओ ने 11 मार्च 2020 को कोरोना को महामारी घोषित किया था। जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के अनुसार अब तक दुनिया भर में 19.13 करोड़ से अधिक लोग कोरोनावायरस से संक्रमित हो चुके हैं, और 41 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 21 Jul 2021 17:55:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>WHO की चीफ साइंटिस्ट ने किया आगाह, अलग-अलग कंपनियों की कोरोना वैक्सीन की डोज लेना खतरनाक</title>
                                    <description><![CDATA[विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रमुख वैज्ञानिक सौम्या स्वामीनाथन ने कहा है कि कोरोना वायरस वैक्सीन की अलग-अलग कंपनियों की डोज लिया जाना खतरनाक हो सकता है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग कंपनियों की डोज लेने के बारे में अध्ययन चल रहा है, नतीजों का हमें इंतजार करना चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/who-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9A%E0%A5%80%E0%A4%AB-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%87%E0%A4%82%E0%A4%9F%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%B9--%E0%A4%85%E0%A4%B2%E0%A4%97-%E0%A4%85%E0%A4%B2%E0%A4%97-%E0%A4%95%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A1%E0%A5%8B%E0%A4%9C-%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%95/article-1106"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-07/soumya_swaminathan_who.jpg" alt=""></a><br /><p>जिनेवा। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि कोरोना वायरस वैक्सीन की अलग-अलग कंपनियों की डोज लिया जाना खतरनाक हो सकता है। संगठन की प्रमुख वैज्ञानिक सौम्या स्वामीनाथन ने ऑनलाइन ब्रीफिंग में कहा कि अलग-अलग कंपनियों की कोविड वैक्सीन को मिलाने से जुड़े वैज्ञानिक आंकड़े और साक्ष्य हमारे पास नहीं हैं। इसके प्रभाव के बारे में बहुत कम डेटा उपलब्ध है।<br /> <br /> डॉ. स्वामीनाथन ने कहा कि कोरोना वायरस वैक्सीन मिलाने के क्या नतीजे हो सकते हैं इसके बारे में किसी तरह का डेटा उपलब्ध नहीं है। इसके मद्देनजर सावधानी बरतने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यदि अलग-अलग देशों के लोग खुद तय करने लगेंगे कि कब कौन सी डोज लेनी है, तो अराजक स्थिति पैदा हो जाने की आशंका है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग कंपनियों की डोज लेने के बारे में अध्ययन चल रहा है, नतीजों का हमें इंतजार करना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 13 Jul 2021 16:27:46 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>WHO ने भी कोवैक्सीन को माना असरदार, कहा- भारत बायोटेक की वैक्सीन का डेटा संतोषजनक</title>
                                    <description><![CDATA[ भारत की स्वदेशी वैक्सीन 'कोवैक्सीन' को लेकर अच्छी खबर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की मंजूरी का इंतजार कर रही भारत बायोटेक की कोवैक्सीन को डब्ल्यूएचओ की चीफ साइंटिस्ट ने भी असरदार माना है और इसकी जमकर तारीफ की है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/who-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%AD%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B0--%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE--%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9F%E0%A5%87%E0%A4%95-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%A1%E0%A5%87%E0%A4%9F%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8B%E0%A4%B7%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%95/article-1066"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-07/covaxin.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। भारत की स्वदेशी वैक्सीन 'कोवैक्सीन' को लेकर अच्छी खबर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की मंजूरी का इंतजार कर रही भारत बायोटेक की कोवैक्सीन को डब्ल्यूएचओ की चीफ साइंटिस्ट ने भी असरदार माना है और इसकी जमकर तारीफ की है। डब्ल्यूएचओ की मुख्य वैज्ञानिक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने कहा कि भारत बायोटेक की कोवैक्सीन के तीसरे चरण के ट्रायल का डेटा संतोषजनक लग रहा है। कुल मिलाकर इसकी ओवरऑल एफिकेसी काफी अधिक है। हालांकि डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ वैक्सीन की प्रभावशीलता कम है, लेकिन फिर भी यह काफी हद तक कारगर साबित हुई है। वैज्ञानिक ने आगे कहा कि कोवैक्सीन की सुरक्षा प्रोफाइल अब तक डब्ल्यूएचओ के मानकों को पूरा करती है।<br /> <br /> स्वामीनाथन ने बताया कि भारत बायोटेक और डब्ल्यूएचओ के बीच प्री-सबमिशन मीटिंग 23 जून को हुई थी और अब उसके ट्रायल के डेटा को इकट्ठा किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि हम उन सभी टीकों पर कड़ी नजर रखते हैं, जिन्हें इमरजेंसी यूज लिस्टिंग मिली है। हम अधिक से अधिक डेटा की तलाश जारी रखते हैं। स्वामीनाथन ने भारत में कम से कम 60-70 प्रतिशत आबादी के प्राथमिक टीकाकरण का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि भारत ब्रिटेन जैसे देशों से प्रेरणा ले सकता है, जो बूस्टर शॉट्स की योजना बना रहे हैं और उनसे सीख सकते हैं। <br /> <br /> बता दें कि भारत बायोटेक ने 26 जून को कोवैक्सीन के तीसरे फेज के ट्रायल का डेटा जारी किया था। इसमें बताया गया था कि कोवैक्सीन सिम्प्टोमेटिक लोगों पर 77.8 फीसदी तक असरदार है। इसमें बताया गया था कि गंभीर लक्षणों वाले मामलों के खिलाफ यह वैक्सीन 93.4 फीसदी तक असरदार है। हालांकि डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ सुरक्षा देने के मामले में इसकी एफिकेसी 65.2 फीसदी साबित हुई थी। कोवैक्सीन को आईसीएमआर और भारत बायोटेक ने मिलकर विकसित किया है। इस वैक्सीन को अब तक डब्ल्यूएचओ की इमरजेंसी यूज की लिस्ट में शामिल नहीं किया गया है, जिसकी वजह से कई देशों ने कोवैक्सीन लगवाने वाले लोगों के ट्रेवल की मंजूरी नहीं दी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 09 Jul 2021 16:53:56 +0530</pubDate>
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                <title>WHO ने कोरोना वैरिएंट का किया नामकरण, भारत में मिला बी.1.617.2 स्ट्रेन कहलाएगा 'डेल्टा'</title>
                                    <description><![CDATA[विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना के मुख्य वैरिएंट के नामों को पुकारने और याद रखने के लिहाज से आसान नामकरण किया है। भारत में पहली बार मिले कोरोना वायरस के बी.1.617.2 वैरिएंट डेल्टा के नाम से जाना जाएगा जबकि देश में मिले एक अन्य वैरिएंट बी.1.617.1 को कप्पा नाम दिया गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/who-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%8F%E0%A4%82%E0%A4%9F-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3--%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A5%80-1-617-2-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%97%E0%A4%BE--%E0%A4%A1%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%BE/article-530"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-06/corona-1.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। कोरोना वैरिएंट को लेकर विवाद के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कोरोना के मुख्य वैरिएंट के नामों को पुकारने और याद रखने के लिहाज से आसान नामकरण किया है। डब्ल्यूएचओ ने कोरोना के वैरिएंट ऑफ कंसर्न (वीओसी) और वैरिएंट ऑफ इंटरेस्ट के लिए ग्रीक अल्फाबेट का उपयोग करते हुए लेबल असाइन किया है। भारत में पहली बार मिले कोरोना वायरस के बी.1.617.2 वैरिएंट डेल्टा के नाम से जाना जाएगा जबकि देश में मिले एक अन्य वैरिएंट बी.1.617.1 को कप्पा नाम दिया गया है। दक्षिण अफ्रीका में मिले बी.1.351 को बीटा नाम मिला है। नवंबर 2020 में सबसे पहले दक्षिण अफ्रीका में पाए गए P.1 वैरिएंट को अब गामा नाम से जाना जाएगा। इसी तरह मार्च 2020 में अमेरिका में मिले वैरिएंट बी.1.427/बी.1.429 को एपलिसन, अप्रैल 2020 में ब्राजील में मिले P.2 को जीटा, कई देशों में मिले बी.1.525 वैरिएंट को ईटा, फिलिपींस में मिले P.3 को थीटा नाम दिया गया है। नंवबर 2020 में अमेरिका में मिले बी.1.526 को लोटा नाम से मिला है। <br /> <br /> डब्ल्यूएचओ ने कहा कि कोविड वैरिएंट के ये नए नाम मौजूदा वैज्ञानिक नामों में बदलाव नहीं करेंगे। वे नाम पहले की तरह ही भविष्य के भी वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए प्रयोग किए जाएंगे। किसी का वैज्ञानिक नाम एक ही होता है जो उसकी विशेषताओं के आधार पर रखा जाता हैं। संगठन ने एक बयान में कहा कि डब्ल्यूएचओ द्वारा निर्धारित एक विशेषज्ञ समूह ने वायरस के स्वरूपों को सामान्य बातचीत के दौरान आसानी से समझने के लिए अल्फा, गामा, बीटा गामा जैसे यूनानी शब्दों का उपयोग करने की सिफारिश की, ताकि आम लोगों को भी इनके बारे में होने वाली चर्चा को समझने में दिक्कत न हो।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Jun 2021 16:42:57 +0530</pubDate>
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                <title>कोरोना को लेकर चीन पर शक: दुनिया के बड़े वैज्ञानिकों ने कहा- 'लैब से वायरस लीक' थ्योरी को गंभीरता से लें</title>
                                    <description><![CDATA[साल 2019 के आखिर में चीन से शुरू हुई कोरोना महामारी दुनियाभर में कहर बरपा रही है। यह वायरस आया कहां से, एक साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी यह रहस्य बना हुआ है। इस बारे में दुनिया के टॉप साइंटिस्ट के एक ग्रुप का कहना है कि कोरोनावायरस के किसी लैब से फैलने की थ्योरी को तब तक गंभीरता से लेना चाहिए, जब तक यह गलत साबित नहीं हो जाती।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A4%B0-%E0%A4%9A%E0%A5%80%E0%A4%A8-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%B6%E0%A4%95--%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AC%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A5%87-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE---%E0%A4%B2%E0%A5%88%E0%A4%AC-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B0%E0%A4%B8-%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%95--%E0%A4%A5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%97%E0%A4%82%E0%A4%AD%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%82/article-370"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-04/corona-11.jpg" alt=""></a><br /><p>लंदन। साल 2019 के आखिर में चीन से शुरू हुई कोरोना महामारी दुनियाभर में कहर बरपा रही है। यह वायरस आया कहां से, एक साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी यह रहस्य बना हुआ है। इस बारे में दुनिया के टॉप साइंटिस्ट के एक ग्रुप का कहना है कि कोरोनावायरस के किसी लैब से फैलने की थ्योरी को तब तक गंभीरता से लेना चाहिए, जब तक यह गलत साबित नहीं हो जाती। ब्रिटेन और अमेरिका के प्रमुख वैज्ञानिकों के एक समूह का कहना है कि कोविड-19 महामारी कहां से पैदा हुई, इसका पता लगाने के लिए और अधिक जांच की जरूरत है। समूह का कहना है कि इस जांच में चीन के वुहान की वायरॉलजी लैब से वायरस के 'ऐक्सिडेंटल लीक' से आने की धारणा भी शामिल हो। इन वैज्ञानिकों में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रतिरक्षाविज्ञान और संक्रामक रोग विशेषज्ञ भारतीय मूल के रवींद्र गुप्ता शामिल हैं।<br /> <br /> दुनिया के टॉप साइंटिस्ट की टीम में कुल 18 लोग शामिल हैं, जिन्होंने वायरस के बारे में अहम जानकारियां साझा की हैं। इस टीम में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में क्लिनिकल माइक्रोबायोलॉजिस्ट रवींद्र गुप्ता, फ्रेड हचिंसन कैंसर रिसर्च सेंटर में इवॉल्यूशन ऑफ वायरस की स्टडी करने वाली जेसी ब्लूम भी शामिल हैं। इनका कहना है कि महामारी की उत्पत्ति को लेकर अंतिम फैसले पर पहुंचने के लिए अभी और जांच की जरूरत है। इन विशेषज्ञों ने आगाह किया कि जब तक पर्याप्त आंकड़े न हों तब तक प्राकृतिक तरीके और लैब से वायरस के फैलने के बारे में थ्योरीज को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।<br /> <br /> स्टैनफोर्ड में माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफेसर डेविड रेलमैन सहित वैज्ञानिकों ने साइंस जर्नल में कहा कि वायरस के किसी लैब और जेनेटिक स्पिलओवर दोनों से अचानक बाहर निकलने की थ्योरी को खारिज नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की वायरस के उत्पत्ति के सिलसिले में की गई जांच में इस बात पर सही तरीके से गौर नहीं किया गया कि यह लैब से भी बाहर आ सकता है। महामारी के इतिहास का जिक्र करते हुए वैज्ञानिकों ने याद किया कि किस तरह 30 दिसंबर, 2019 को प्रोग्राम फॉर मॉनिटरिंग इमर्जिंग डिजीज ने दुनिया को चीन के वुहान में अज्ञात कारणों से होने वाले निमोनिया के बारे में सूचित किया था। इससे कारक प्रेरक एजेंट सीवीयर एक्यूट रेसपीरेटरी सिंड्रोम कोरोना वायरस 2 (SARS-CoV-2) की पहचान हुई थी।<br /> <br /> विशेषज्ञों ने डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रस अधानम घेब्रेयेसस की टिप्पणी की ओर इशारा किया कि रिपोर्ट में लैब दुर्घटना का समर्थन करने वाले साक्ष्य पर विचार अपर्याप्त था और संभावना का पूरी तरह से मूल्यांकन करने के लिए अतिरिक्त संसाधन प्रदान करने की पेशकश की। वैज्ञानिकों ने कहा कि एक उचित जांच पारदर्शी, उद्देश्यपूर्ण, आंकड़ा-संचालित, व्यापक विशेषज्ञता वाली, स्वतंत्र निरीक्षण के अधीन होनी चाहिए और हितों के टकराव के प्रभाव को कम करने के लिए जिम्मेदारी से प्रबंधन होना चाहिए। सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियों और अनुसंधान लैबओं को अपने रिकॉर्ड सार्वजनिक करने चाहिए। इससे पहले डब्ल्यूएचओ की टीम ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि वायरस शायद चमगादड़ से मनुष्यों में आया होगा, जबकि किसी लैब से यह फैलने को 'बेहद असंभव' करार दिया। उन्होंने आगाह किया। डब्ल्यूएचओ की टीम ने जनवरी और फरवरी में वुहान और उसके आसपास के इलाकों में 4 हफ्तों तक जांच की थी।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sat, 15 May 2021 17:27:33 +0530</pubDate>
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