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                <title>structure - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>भारत की चेतावनी : पाकिस्तान को स्वीकार करना होगा, सीमापार आतंकवाद प्रायोजित करने के होते हैं गंभीर परिणाम </title>
                                    <description><![CDATA[संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरीश ने पाकिस्तान को सीमा पार आतंकवाद प्रायोजित करने के गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है। उन्होंने यूएनएससी के वर्तमान ढांचे को '1940 के दशक का पुराना ढांचा' बताते हुए इसमें सुधार और भारत के लिए स्थायी सदस्यता की मांग पुरजोर तरीके से उठाई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/india-warns-pakistan-that-sponsoring-cross-border-terrorism-has-serious-consequences/article-155237"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-05/harish.jpg" alt=""></a><br /><p>न्यूयॉर्क। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में पाकिस्तान पर दशकों से आतंकवाद, धार्मिक उग्रवाद और हिंसक कट्टरवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए कहा कि उसे 'यह स्वीकार करना होगा कि सीमा पार आतंकवाद को प्रायोजित करने के गंभीर परिणाम होते हैं।' न्यूयॉर्क में सुरक्षा परिषद की खुली बहस में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने कड़ा प्रतिवाद करते हुए कहा, "मैं आज पाकिस्तान द्वारा की गई आधारहीन और अनुचित टिप्पणियों का जवाब देने के लिए बाध्य हूँ। भारत तथ्यों को स्पष्ट करना चाहता है।"</p>
<p>राजदूत ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद से पाकिस्तान का इतिहास भारत के खिलाफ आक्रामकता और सीमा पार आतंकवाद को लगातार प्रायोजित करने से भरा रहा है। उन्होंने कहा, "स्वतंत्र भारत ने अपनी शुरुआत पाकिस्तान द्वारा किए गए सीमा पार आक्रमण का मुकाबला करते हुए की थी।" हरीश ने कहा कि पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ कई 'हमले' किये हैं और 'बिना उकसावे के आक्रामकता' दिखाई है, जबकि वह संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देना भी जारी रखे हुए है।</p>
<p>हरीश ने 'भारत को हजार घाव देकर लहूलुहान करने के पाकिस्तान के सिद्धांत' का जिक्र करते हुए कहा कि भारत के पास अपनी रक्षा करने का पूरा अधिकार है और 'पाकिस्तान को यह स्वीकार करना होगा कि सीमा पार आतंकवाद को प्रायोजित करने के परिणाम होते हैं।'<br />राजदूत ने पाकिस्तान पर उसके गठन के समय से ही 'आतंकवाद, धार्मिक उग्रवाद और हिंसक कट्टरवाद की ताकतों' को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए कहा कि ये तथ्य अच्छी तरह से दर्ज हैं। उन्होंने मांग की कि पाकिस्तान आतंकवाद के लिए हर तरह के समर्थन को 'विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय रूप से' समाप्त करे।</p>
<p>इस बहस से अलग, भारत ने इस मंच का उपयोग सुरक्षा परिषद के बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए अपने अब तक के सबसे मजबूत तर्कों को पेश करने के लिए किया। भारत ने इसके वर्तमान ढांचे को '1940 के दशक के पूराने' ढांचे के रूप में वर्णित किया। हरीश ने कहा कि सुरक्षा परिषद की व्यवस्था अब पुरानी हो चुकी है। इसे समझाने के लिए उन्होंने 1945 के पुराने कंप्यूटर का उदाहरण दिया और कहा कि आज की आधुनिक एआई तकनीक को इतने पुराने सिस्टम पर चलाने जैसी स्थिति सुरक्षा परिषद की है।</p>
<p>राजदूत ने कहा कि केवल अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाना काफी नहीं है, जबकि पांच स्थायी सदस्यों (पी5) को वैसे ही रखा जाए। स्थायी सदस्यता में भी बदलाव और विस्तार होना चाहिए। इसी संदर्भ में भारत ने अपनी स्थायी सीट की मांग भी दोहराई। हरीश ने संयुक्त राष्ट्र में 'दोहरे मापदंड' अपनाने की भी आलोचना की। उन्होंने रेखांकित किया कि अलग-अलग मामलों में नियमों को अलग तरीके से लागू किया जाता है और बातों व कामों में फर्क दिखाई देता है। उन्होंने जोर दिया कि केवल ताकत और दबाव से मजबूत वैश्विक व्यवस्था या दुनिया का भला नहीं हो सकता। राजदूत ने कहा कि सुरक्षा परिषद को एक सक्रिय और समय के साथ बदलने वाली संस्था होना चाहिए, कोई 'जीवाश्म' यानी जड़ और पुरानी संस्था नहीं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 28 May 2026 14:20:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>  राजस्व न्यायालयों के संगठन और संरचना की संवैधानिकता पर खड़े किए सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[ट्रांसफर प्रार्थना पत्र पर सुनवाई करते हुए रैफरेंस बनाकर मण्डल के रजिस्ट्रार को हाईकोर्ट को रैफर करने के निर्देश दिए]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/ajmer/questions-raised-on-the-constitutionality-of-the-organization-and-structure-of-revenue-courts/article-13179"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/ajmer2.jpg" alt=""></a><br /><p>अजमेर। प्रदेश के राजस्व न्यायालयों के संगठन एवं संरचना की संवैधानिकता पर भी अब सवाल खड़े हो गए हैं। खुद राजस्व मण्डल के न्यायिक सदस्य अविनाश चौधरी की एकलपीठ ने मंगलवार को एक ट्रांसफर प्रार्थना पत्र पर सुनवाई करते हुए रैफरेंस बनाकर मण्डल के रजिस्ट्रार को हाईकोर्ट को रैफर करने के निर्देश दिए। मण्डल के इतिहास में पहली बार किसी पीठ ने इस पर प्रश्नचिन्ह लगाकर समीक्षा के लिए हाईकोर्ट को प्रस्तुत किया है। इससे पहले हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कोई समीक्षा के लिए प्रश्न प्रस्तुत नहीं किए गए। चौधरी की एकलपीठ ने भरतपुर जिले की सैह तहसील के नगला गांव के प्रार्थी राजेन्द्र पुत्र मंगल जाटव बनाम देवेन्द्र सिंह परमार उप जिला कलक्टर एवं जगदीश पुत्र मंगल जाटव व अन्य द्वारा प्रस्तुत मुंतकिली प्रार्थना पत्र की सुनवाई करते हुए पीठासीन अधिकारी से पैरावाइज टिप्पणी मंगवाने और विपक्षीगण को नोटिस जारी करने के आदेश दिए। </p>
<p><strong>यह बनाया प्रश्न</strong></p>
<p>क्या राजस्थान राज्य के राजस्व न्यायालयों का संगठन एवं संरचना, भारतीय संविधान के मूलभूत तत्व कार्यपालिका व न्यायपालिका के बीच शक्तियों का पृथक्करण एवं न्यायपालिका की स्वतंत्रता के मानकों के अनुरुप है। ऐसे में क्या भू-राजस्व अधिनियम 1956 के अध्याय 3, 4 और 5 व राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 के अध्याय 15 में राजस्व न्यायालयों के संगठन व संरचना संबंधी उपबंध संवैधानिक हैं?</p>
<p><strong>मण्डल में 7 हजार से ज्यादा ट्रांसफर एप्लीकेशन</strong></p>
<p>उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि वर्तमान में राजस्व मण्डल में ट्रांसफर एप्लीकेशन के करीब 7 हजार से ज्यादा प्रकरण लम्बित हैं, जबकि हाईकोर्ट में अधीनस्थ न्यायालयों के पीठासीन अधिकारियों के विरुद्ध लम्बित प्रकरण नगण्य हैं। यह भी तब है जब हाईकोर्ट के अधीनस्थ सिविल व दांडिक न्यायालयों की संख्या राजस्व न्यायालयों से कहीं ज्यादा है। इससे आम जनता का राजस्व न्यायालयों के प्रति असंतोष तो प्रतिबिम्बित होता ही है, साथ ही राजस्व न्यायालयों के संस्थानिक ढांचे पर भी सोचने को मजबूर करता है।</p>
<p><strong>कार्यपालिका और न्यायिक शक्तियों का मिश्रण भी समस्या</strong></p>
<p>उन्होंने निर्णय में उल्लेख किया है कि मण्डल में प्रस्तुत होने वाली ट्रांसफर एप्लीकेशन में अधीनस्थ न्यायालय के पीठासीन अधिकारी पर प्रतिपक्षी द्वारा राजनीतिक पहुंच वाला व्यक्ति बताते हुए न्याय की उम्मीद नहीं होने के जो आधार बताए जाते हैं, इस पर गहनता से विचार किया जाए तो इसके पीछे कार्यपालिका और न्यायपालिका की शक्तियों के मिश्रण से ही समस्या उत्पन्न होती है। चूंकि पीठासीन अधिकारियों के पास न्यायिक व प्रशासनिक शक्तियां एक साथ होती हैं।</p>
<p><strong>मण्डल की एलबी परीक्षण के लिए सक्षम नहीं</strong></p>
<p>एकलपीठ ने यह भी टिप्पणी की है कि भू-राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 11 में राजस्व मण्डल की एकलपीठ को कोई रैफरेंस मण्डल की लार्जर बैंच को ही भेजने का प्रावधान है, लेकिन मण्डल की लार्जर बैंच किसी उपबंध की संवैधानिकता का परीक्षण करने के लिए सक्षम नहीं है। हाईकोर्ट अथवा सुप्रीम कोर्ट ही इसके लिए सक्षम हैं। ऐसी स्थिति में लार्जर बैंच को रैफरेंस भेजने का कोई औचित्य नहीं है। सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 113 के अनुसार कोई भी अधीनस्थ न्यायालय किसी उपबन्ध की संवैधानिकता के संबंध में कोई रैफरेंस हाईकोर्ट को भेज सकते हैं। हालांकि मण्डल प्रशासनिक रूप से हाईकोर्ट के अधीनस्थ नहीं है, लेकिन न्यायिक मामलों में हाईकोर्ट के अधीनस्थ ही माना जाएगा। </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अजमेर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jun 2022 15:39:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Ajmer]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मेडिकल शिक्षा के ढांचे में बदलाव जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में एक विसंगति और है। देश के उत्तरी राज्यों में आबादी अधिक है, उसके अनुरूप चिकित्सा शिक्षा के संस्थान कम हैं। इससे उलट कम आबादी वाले दक्षिणी राज्यों में 48 फीसदी चिकित्सा शिक्षण संस्थान हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/need-to-change-structure-of-medical-education/article-5751"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/doctor-logo-copy.jpg" alt=""></a><br /><p>चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में एक विसंगति और है। देश के उत्तरी राज्यों में आबादी अधिक है, उसके अनुरूप चिकित्सा शिक्षा के संस्थान कम हैं। इससे उलट कम आबादी वाले दक्षिणी राज्यों में 48 फीसदी चिकित्सा शिक्षण संस्थान हैं। फिर देश में मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की वजह से आधी से अधिक सीटें भर जाती हैं। ऐसे में नब्बे फीसदी से अधिक अंक पाने वाले प्रतिभाशाली छात्रों का निराश होना स्वाभाविक है। क्रेन-रूस के बीच चल रहा युद्ध अभी थमने का नाम नहीं ले रहा। कीव, खारकीव, पिसोचिन, सूमी आदि क्षेत्रों में फंसे भारतीय नागरिकों एवं मेडिकल छात्रों की सुरक्षित स्वदेश वापसी के प्रयास जारी हैं। युद्ध जनित चिंताओं और चुनौतियों बीच, हमारे देश के समक्ष मेडिकल शिक्षा के मौजूदा बुनियादी ढांचे में सुधार की जरूरतों ने भी अपनी ओर ध्यान खींचा है। जिन पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय, चिकित्सा आयोग और नीति आयोग को मिलकर गौर करना चाहिए। भले ही फारेन मेडिकल ग्रेजुएट लाइसेंसिंग एक्ट में संशोधन ही क्यों ना करना पड़े। युद्ध की वजह से यूक्रेन से लौटे बीस हजार से अधिक मेडिकल छात्रों के सामने अपनी पढ़ाई जारी रखने का संकट उठ खड़ा हुआ है। इस क्रम में सरकार की यह घोषणा स्वागत योग्य है कि उसने मेडिकल छात्रों से इंटर्नशिप के लिए कोई शुल्क नहीं लेने और इस दौरान उन्हें नियमानुसार भत्ते देने का फैसला लिया है। लेकिन अभी जिनकी पढ़ाई अधूरी है, उनका समय बेकार ना चला जाए, उनके बारे में कोई फैसला नहीं लिया गया है। जो कि अपेक्षित है। इस मामले में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने सरकार से मांग की है कि वह ऐसे मेडिकल छात्रों की शिक्षा को जारी रखने के लिए देश के मेडिकल कॉलेजों में अतिरिक्त सीटों और परीक्षाएं कराने के वैकल्पिक इंतजाम करें। इस क्रम में कोरोना महामारी दौरान चीन से अपनी मेडिकल पढ़ाई बीच में छोड़कर स्वदेश आए उन छात्रों के बारे में भी कोई फैसला लेना चाहिए जिन्हें चीन सरकार ने अपने यहां आने की अनुमति अब तक नहीं दी है।</p>
<p>थोड़ी चर्चा, देश के मौजूदा चिकित्सा शिक्षा के ढांचे पर गौर कर लें। देश को आजाद हुए सत्तर साल से अधिक हो गए। आबादी बढ़ने के साथ-साथ हमारे यहां भी चिकित्सा शिक्षा और चिकित्सालयों और चिकित्सकों की मांग भी बढ़ गई। लेकिन इसके अनुपात में बुनियादी ढांचे में अपेक्षित बदलाव नहीं लाया जा सका है। इस पर सरकार का नियंत्रण होना चाहिए था। लेकिन उलटा हो रहा है। इस क्षेत्र को मुनाफे का सौदा बनाने में नेताओं, पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों एवं समृद्ध तबके से जुड़े लोगों ने ऐसा समानांतर तंत्र विकसित कर लिया जिसके तय मापदंडों के अनुसार सरकार को ही नीति बनाने पर विवश कर दिया है। आज पहली जरूरत मेडिकल शिक्षा को इस माफिया से मुक्ति दिलाने की है। ताकि इस देश में मध्यम और गरीब तबके के प्रतिभाशाली छात्र सस्ती मेडिकल शिक्षा हासिल कर सकें। देश से प्रतिभा पलायन और पूंजी के बाहर जाने पर रोक लग सके।</p>
<p>चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में एक विसंगति और है। देश के उत्तरी राज्यों में आबादी अधिक है, उसके अनुरूप चिकित्सा शिक्षा के संस्थान कम हैं। इससे उलट कम आबादी वाले दक्षिणी राज्यों में अड़तालीस फीसदी चिकित्सा शिक्षण संस्थान हैं। फिर देश में मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की वजह से आधी से अधिक सीटें भर जाती हैं। ऐसे में नब्बे फीसदी से अधिक अंक पाने वाले प्रतिभाशाली छात्रों का निराश होना स्वाभाविक है। ऐसे में उनका विदेशों में जाकर मेडिकल शिक्षा ग्रहण करने की विवशता भी एक बड़ा कारण है। यही मुख्य वजह है कि आज यूक्रेन में मेडिकल शिक्षा के लिए उत्तर  भारत के बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल जैसे हिंदी प्रांतों के छात्र अधिक जा रहे हैं। राजस्थान से औसतन हर साल ढाई हजार छात्र विदेश जाते हैं इनमें से यूक्रेन जाने वालों की संख्या एक हजार है। यूक्रेन में ही नहीं, रूस, चीन, कजाकिस्तान सहित मध्य एशियाई देशों में भी छात्र पढ़ने जा रहे हैं।</p>
<p>वर्ष 2021 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में कुल 595 मेडिकल कॉलेज संचालित हैं। इनमें 302 सरकारी और 218 निजी मेडिकल कॉलेज हैं। 47 डीम्ड विश्वविद्यालय, तीन केंद्रीय विश्वविद्यालय, 19 एम्स मेडिकल इंस्टीट्यूट्स हैं। इनमें 83 हजार 125 एमबीबीएस, 26 हजार 949 बीडीएस, 52 हजार 720 आयुष, 525 बीवीएससी एंड एच सीट, 542 और 313 मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में सीट हैं। राजस्थान में अभी 26 सरकारी और प्राइवेट मेडिकल कॉलेज हैं। इनमें 15 सरकारी और 9 निजी, एक ईएसआई मेडिकल कॉलेज अलवर व जोधपुर में एम्स मेडिकल कॉलेज है। इनमें कुल 4 हजार 7 सौ पांच सीटें हैं। 15 और सरकारी मेडिकल कॉलेज सरकार के स्तर पर निर्माणाधीन हैं। तीन जिलों प्रतापगढ़, जालोर और राजसमंद में कॉलेज नहीं हैं। हर साल राजस्थान में ही एक लाख सोलह हजार पांच सौ तेरह छात्र परीक्षा देते हैं।</p>
<p>सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रति छात्र दो लाख रुपये प्रति वर्ष फीस है। वहीं निजी कॉलेजों में यह फीस प्रतिवर्ष दस से बीस लाख रुपये लगती है। यानी डॉक्टर बनने के लिए पचास लाख से लेकर पिचहत्तर लाख रुपये खर्च करने पड़ते हैं। जबकि विदेशों में यह फीस पचीस लाख में पूरी हो जाती है। इसमें पढ़ाई के साथ आवास और खाना-पीना भी शामिल है। फिर इन देशों में बारहवीं परीक्षा के प्राप्त अंकों के आधार पर, बिना कोई प्रतिस्पर्धी परीक्षा के प्रवेश मिल जाता है।<br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong><br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 09 Mar 2022 10:39:38 +0530</pubDate>
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