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                <title>migratory birds - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>migratory birds RSS Feed</description>
                
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                <title>एक साल में बढ़ी 3500 से ज्यादा देसी विदेशी परिंदों की संख्या,ईको सिस्टम में पक्षियों की भूमिका पर बढ़ रहे शोध</title>
                                    <description><![CDATA[गत वर्ष की जनवरी के मुकाबले इस वर्ष सेंसेस में काउंट हुए 300 से ज्यादा प्रजातियों के पक्षी।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-number-of-native-and-migratory-birds-increased-by-more-than-3500-in-one-year--research-on-the-role-of-birds-in-the-ecosystem-is-increasing/article-141087"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/3322.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा के वेटलैंड्स अब सिर्फ जलस्रोत ही नहीं, बल्कि पक्षी संरक्षण और जैव विविधता की पहचान बन रहे हैं। मिड विंटर वाटर फोल पॉपुलेशन एस्टिमेशन के तहत जनवरी 2025 और जनवरी 2026 के तुलनात्मक अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। शहर के तीन प्रमुख वेटलैंड (तालाब) पर एक साल में ही 3500 से ज्यादा देसी - विदेशी परिंदों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह बढ़ोतरी न सिर्फ पर्यावरण के लिए शुभ संकेत है, बल्कि कोटा को पक्षी अनुसंधान के नए केंद्र के रूप में भी स्थापित कर रही है।</p>
<p><strong>एक साल में ही 8000 से 11,500 बढ़ी पक्षियों की संख्या</strong><br />शहर के तीन प्रमुख वेटलैंड उम्मेदगंज पक्षी विहार,अभेड़ा व जोहरा बाई का तालाब पर जनवरी 2025 में हुए मिड विंटर वाटर फोल पापुलेशन ऐस्टमिशन हुआ था। जिसमें यहां 150 प्रजातियों के 8000 देसी विदेशी पक्षी काउंट हुए थे। जबकि, इस वर्ष 17 व 18 जनवरी को हुए सेंसस में 300 से ज्यादा प्रजातियों के 11,500 परिंदे काउंट हुए हैं, जो पिछले वर्ष की अपेक्षा उल्लेखनीय बढ़ोतरी है। इनमें स्थानीय प्रजातियों के साथ-साथ साइबेरिया, मध्य एशिया और यूरोप से आने वाले प्रवासी पक्षी भी बड़ी संख्या में शामिल हैं।</p>
<p><strong>अनुसंधान का केंद्र बने शहरी वेटलैंड</strong><br />शहर के वेटलैंड अनुसंधान का केंद्र बन रहे हैं। दुनियाभर से हर साल हजारों की तादाद में परिंदे प्रवास पर आ रहे हैं। जिनमें से कई पक्षी तो ऐसे हैं, जो पिछले पांच सालों में पहली बार नजर आ रहे हैं। वन्यजीव विभाग की ओर से शहरी सीमा के वेटलैंड्स को पक्षियों के अनुकूल हैबीटाट के रूप में विकसित किए गए हैं। इसी का नतीजा है कि पिछले दिनों हुई गणना में विभिन्न 345 प्रजातियों के 11500 पक्षी काउंट किए गए। जबकि, यह संख्या मात्र उम्मेदगंज पक्षी विहार सहित तीन वेटलैंड की है। जबकि, शहरी क्षेत्र में दो दर्जन से अधिक वेटलैंड हैं। जहां बड़ी संख्या में पक्षियों का प्रवास रहता है।</p>
<p><strong>परिदों की पसंद बना अभेडा तालाब, 7000 पक्षियों का बसेरा</strong><br />वन्यजीव विभाग कोटा के अधीन अभेडा तालाब तालाब पक्षियों की पहली पसंद बना हुआ है। गत 18 जनवरी को हुए मिड विंटर वाटर फोल पापुलेशन सेंसस में यहां 135 प्रजातियों के 7000 पक्षी काउंट हुए हैं। वहीं जोहरा बाई का तालाब में 70 प्रजातियों के 1500 परिंदे काउंट हुए हैं। जबकि वर्ष 2025 में इन दोनों जगहों से लगभग चार हजार से ज्यादा पक्षी नजर आए थे।</p>
<p><strong>इस बार उम्मेदगंज में पक्षियों की 50 प्रजाती ज्यादा बढ़ी</strong><br />उम्मेदगंज पक्षी विहार में गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष पक्षियों की 50 प्रजाति ज्यादा बढ़ी है। पिछले साल यहां 90 प्रजातियों के 3000 पक्षी काउंट किए गए थे जबकि इस वर्ष 18 जनवरी को 140 प्रजातियों के 3000 से ज्यादा पक्षी मिले हैं । इसकी मुख्य वजह वाइल्ड लाइफ डिपार्टमेंट की ओर से करवाए डवलपमेंट कार्य हैं। अवैध फिशिंग, अतिक्रमण व संदिग्ध घुसपैठ पर पूर्णत: प्रतिबंध लगाए जाना है। साथ ही पेड़ों की अवैध कटाई रुकने से पक्षियों का हैबीटाट न केवल सुरक्षित हुआ बल्कि भोजन की भी पर्याप्त उपलब्धता हो गई। पक्षियों के लिए तालाब में पर्याप्त मछलियां होने व अवैध गतिविधियां थमने से परिंदों का कुनबा आबाद हो गया।</p>
<p><strong>यह वेटलैंड बन रहे बर्ड्स वॉचिंग का डेस्टिनेशन</strong><br />डीएफओ अनुराग भटनागर कहते हैं, उम्मेदगंज पक्षी विहार, अभेड़ा तालाब, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क, सालकिया व जोहराबाई का तालाब, किशोर सागर, गैपरानाथ, गरड़िया महादेव सहित शहर के विभिन्न वेटलैंड वर्ड वॉचिंग का डेस्टिनेशन बन चुके हैं। यहां की फिजा विभिन्न प्रजातियों के देसी-विदेशी पक्षियों की चहचहाट से गुलजार रहती है। कोटा विश्वविद्यालय, महाविद्यालयों व कई शिक्षण संस्थानों से विद्यार्थी और स्कॉलर्स ईको सिस्टम में पक्षियों की भूमिका, उनके व्यवहार, हैबीटाट, विशेषताएं, सिमटते वनों व वेटलैंड से पक्षियों पर पड़ने वाले नकारात्मक असर पर शोध कर रहे हैं।</p>
<p><strong>यह पक्षी आए नजर</strong><br />वन्य जीव विभाग के सहायक वन संरक्षक पंकज कुमार ने बताया कि मिड विंटर वॉटर फॉल सेंसस के तहत जोहराबाई तालाब पर अच्छी तादाद में बार हेडेड गूज नजर आए है । गणना में लगभग 70 प्रजातियों के 1500 पक्षी देखे गए वही, अभेडा तालाब में 135 प्रजातियों के लगभग 7000 पक्षी देखे गए। पक्षी गणना में बार हेडेड गूज, ग्रे लेग गूज, नॉर्दन सावलर, गेडवेल, वुड सेंड पाइपर, ग्रीन सेंड पाइपर, स्पून बिल, मार्स हैरियर, कॉमन स्टर्लिंग, रोजी स्टर्लिंग, ग्रीन सेंक, रेड सेंक, व्हाइट वेगटेल, कैनरी फ्लाई केचर, लिटिल रिंग फ्लोवर ,कॉटन पिग्मी गीज, व्हाइट आई, बजार्ड, ग्रेटर स्पॉटेड ईगल, इंपीरियल ईगल, ब्लू थ्रोट, स्केली ब्रेस्टड मुनिया, रेड मुनिया, क्रेस्टेड लार्क, कॉमरेंट, ई ग्रेट, सहित अन्य प्रजातियों के पक्षी नजर आए। वहीं उम्मीदगंज में 140 प्रजातियों के लगभग 3000 पक्षी नजर आए । जिसमें कॉमन पोचार्ड, टफ्टेड पोचार्ड, ग्रीन सेंक, रेड सेंक, व्हाइट वेगटेल, कैनरी फ्लाई केचर, लिटिल रिंग फ्लोवर , मार्स हैरियर, बजार्ड, भुटेड़ ईगल सहित अन्य प्रजातियों के पक्षी नजर आए।</p>
<p><strong>यूरोप से कजाकिस्तान से आते हैं पक्षी</strong><br />नेचर प्रमोटर ए एच जेडी ने बताया कि कोटा के विभिन्न इलाकों में स्थित वैटलैंड पर इन दिनों देसी विदेशी पक्षियों का कलरव गूंज रहा है। आलनिया, उम्मेदगंज, अभेड़ा, उद्पुरिया, बरधा डेम, गिरधरपुरा, बोराबांस का तालाब, सोखिया तालाब, किशोर सागर तालाब, उम्मेदगंज, अभेड़ा सहित कई इलाके परिंदों की चहचहाट से गुलजार हो रहे हैं। यह पक्षी यूरोप, सेंट्रल एशिया, साइबेरिया, हिमालय, उत्तरी अमेरिका, यूरोपियन व एशियाई देशों से आते हैं। उन्होंने बताया कि सर्दी के मौसम में हिमालय पार से विदेशी पक्षी माइग्रेशन में फीडिंग और ब्रीडिंग के लिए यहां आते है तथा सर्दी के बाद यथास्थान के लिए रवाना हो जाते है।</p>
<p>आर्दभूमि (वेटलैंड) पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह जीव जंतुओं के आवास होते हैं। प्रवासी पक्षियों के भी रहने के अनुकूल होते हैं। इनके लुप्त होने से पारिस्थितिकी तंत्र से ईको सिस्टम को नुकसान हो सकता है। इसलिए इसका संरक्षण जरूरी है। इस बार तीनों वेटलैंड पर पिछले पिछले साल के मुकाबले इस साल 3500 से ज्यादा पक्षियों की संख्या में इजाफा हुआ है। हाल ही में हुए सेंसस में कुल 345 प्रजातियों के 11 हजार 500 बर्ड्स काउंट हुए हैं। उम्मीदगंज पक्षी विहार में अतिक्रमण, संदिग्ध घुसपैठ और अवैध फिशिंग रोकी है। जिससे पक्षियों को पर्याप्त भोजन मिलने लगा है।<br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वाइल्ड लाइफ कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Jan 2026 16:30:04 +0530</pubDate>
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                <title>पाकिस्तान के रास्ते होते हुए हजारों किलोमीटर का सफर तय कर बीकानेर पहुंचे कई देशों से 10,000 गिद्ध</title>
                                    <description><![CDATA[बीकानेर के जोहड़बीड़ में रूस, मंगोलिया और कजाकिस्तान से करीब 10,000 प्रवासी गिद्ध पहुंचे हैं। पिछले पांच वर्षों में इन पक्षियों की संख्या दोगुनी हो गई है, जिससे यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय आकर्षण बन गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bikaner/10000-vultures-from-many-countries-reached-bikaner-after-traveling-thousands/article-138488"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/bikaner.png" alt=""></a><br /><p>बीकानेर। राजस्थान में इस समय कुछ ऐसे मेहमानों ने डेरा डाला हुआ है, जो कि 10-20 किलोमीटर का सफर तय करके नहीं आएं बल्कि 10,000 किलोमीटर का सफर तय करके आए हैं। हम बात कर रहे हैं दुनिया के अलग अलग देशों से आए हुए गिद्धों के बारे में, जिन्होंने आजकल राजस्थान के बीकानेर को अपना डेरा बनाया हुआ है। बता दें कि ये पक्षी रूस, आर्मेनिया, पाकिस्तान, मंगोलिया और कजाकिस्तान के रास्ते होते हुए यहां पहुंचे हैं।</p>
<p>एक्सपर्ट की मानें तो पिछले पांच सालों में राजस्थान में आने वाले विदेशी पक्षियों की संख्या में इजाफा हुआ है। साल 2020 में राजस्थान में करीब 4-5 हजार गिद्ध आए थे, लेकिन इस बार ये संख्या सीधे 10,000 पर पहुंच गई।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बीकानेर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 05 Jan 2026 18:40:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गंदे नालों में देशी-विदेशी पक्षियों का बसेरा, शहर के अधिकतर नाले गंदे, नियमित नहीं हो रही सफाई</title>
                                    <description><![CDATA[पक्षियों को प्राकृतिक आवासों में पर्याप्त भोजन न मिलने के कारण वे अवांछित स्थानों जैसे नालों में भोजन की तलाश में जा रहे हैं।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/dirty-drains-are-home-to-both-native-and-foreign-birds--and-most-of-the-city-s-drains-are-dirty-and-lack-regular-cleaning/article-127770"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(1)24.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहरी क्षेत्र में वैटलेंड लगातार घट रहे हैं। कहीं अतिक्रमण तो कहीं विकास की भेंट चढ़ गए। नतीजन,  देश-विदेश से आने वाले परिंदों के सामने भोजन व रहवास का संकट गहरा गया। ऐसे में गंदे नाले उनकी शरणस्थली <br />बन गई। जहां भोजन के साथ अनगिनत बैक्टीरिया, वायरस, संक्रमण, रसायन भी मिल रहे हंै, जो न केवल पक्षियों के जीवन चक्र को बीमारियों की जद में ला रहा बल्कि उनकी उम्र भी घटा रहा है। जिम्मेदारों की अनदेखी के कारण माइग्रेट बर्ड्स की संख्या में भी कमी देखी जा रही है। शहर के कई इलाकों के नाले नियमित सफाई के अभाव में गंदगी से अटे पड़े हैं। जिनमें साजीदेहड़ा, एलबीएस मार्ग स्थित नाला, केशवपुरा, डीसीएम रोड, देवली अरब सहित कई नाले शामिल है। जहां गंदगी के बीच भोजन ढृूंढ रहे देसी-विदेशी पक्षियों को होने वाले नुकसान, कारण, सुझाव पर पक्षी विशेषज्ञों से जाना। पेश है रिपोर्ट के प्रमुख अंश...</p>
<p><strong>नालों में भोजन से परिंदों को संभावित नुकसान</strong><br /><strong>बीमारियां व संक्रमण : </strong>नालों का पानी अक्सर गंदा और प्रदूषित होता है। इसमें बैक्टीरिया, वायरस और परजीवी होते हैं, जो पक्षियों को संक्रमण देकर बीमार कर सकते हैं। </p>
<p><strong>रसायन व अपशिष्ट पदार्थ :</strong> सीवेज या नालों में औद्योगिक व घरेलू कचरे से निकलने वाले रसायन और भारी धातुएं (लेड, पारा, आर्सेनिक आदि) पक्षियों के शरीर में जमा होकर उनकी प्रजनन क्षमता पर बुरा असर डालते हैं। जिससे अंडे देने की क्षमता भी प्रभावित होती है। </p>
<p><strong>प्लास्टिक और कचरे का खतरा :</strong> नालों में कई ऐसे अपशिष्ट पदार्थ, रासायनिक व अपचनीय सामग्री भी प्रवाहित होती हैं, जिन्हें पक्षी भोजन समझकर निगल लेते हैं, जो पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचाती हैं और कई बार उनकी मृत्यु तक हो सकती है।</p>
<p><strong>धागे व तार में उलझने से घायल:</strong> नालों में हर तरह का कचरा आता है। जिनमें तार, बैलून से बंधे धागे भी होते हैं। कई बार फिडिंग के दौरान उनके शरीर में जाकर फंस जाते हैं और पंजों व पंखों में उलझने से घायल हो जाते हैं। वहीं,  गंदे पानी में पनपने वाले कीड़े व परजीवी पक्षियों की चोंच, आंखों व पैरों पर भी विपरीत असर डालते हैं।</p>
<p><strong>जीवन दर घटने की आशंका : </strong>यदि, प्रवासी पक्षी लगातार गंदे नालों या प्रदूषित जलाशयों पर निर्भर होने लगे तो उनकी जीवित रहने की दर घट सकती है और उनकी संख्या में गिरावट आ सकती है।</p>
<p><strong>आलनिया तालाब वैटलेंड, पेटा काशत बने मुसीबत</strong><br />पक्षी विशेषज्ञ बताते हैं, आलनिया डेम का तालाब पक्षियों के लिए बेहतरीन वेटलैंड है,यहां हर साल हजारों देसी-विदेशी पक्षी आते हैं। लेकिन, यहां पेटा काश्त परिंदों के लिए मुसीबत बनी है। तालाब में जब पानी कम होता है तो यहां लोग अतिक्रमण कर तालाब की जमीन पर पेटा काश्त करते हैं।  जिसका सीधा असर प्रवासी पक्षियों पर पड़ता है। यहां आने वाली माइगे्रटरी बर्ड्स जमीन पर अंडे देते हैं क्योंकि डेम की भूमि में नमी होती है। वहीं, आसपास झाड़ियों में घौंसला बनाकर रहते हैं, जिसे पेटाकाश्त करने वाले लोग नष्ट कर देते हैं।</p>
<p><strong>शहर में वैटलेंड हो विकसित</strong><br />पक्षियों को प्राकृतिक आवासों में पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा है, जिसके कारण वे अवांछित स्थानों जैसे नालों में भोजन की तलाश में जा रहे हैं। वन विभाग को शहरी क्षेत्र में वैटलेंड डवलप करवाए जाने चाहिए। साथ ही रहवास सुरक्षित हो, यह सुनिश्चित की जानी चाहिए। नगर निगम को भी नालों की नियमित सफाई करवानी चाहिए।  <br /><strong>- एएच जैदी, नेचर प्रमोटर </strong></p>
<p>अतिक्रमण पर कार्रवाई हो तो रुके पक्षियों का पलायन आलनिया तालाब बेहतर वैटलैंड है, यहां की परिस्थितियां पक्षियों के अनुकूल है। भोजन पानी की उपलब्धता भी पर्याप्त है लेकिन तालाब पर पेटा काश्तकारों के अतिक्रमण बड़ी समस्या है। प्रशासन को इस पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए ताकि, परिंदों को गंदे जलाश्यों पर आश्रित न रहना पड़े और उनका पलायन रुके।<br /><strong>- रवि नागर, बायोलॉजिस्ट </strong></p>
<p>पक्षी नालों में फिडिंग के आदी हो गए हैं। क्योंकि, यहां कीड़े-मकोड़े भोजन के रूप में मिल जाते हैं। ऐसी परिस्थितियां क्यों बनी, इसके कारण विभाग को तलाशने चाहिए। प्रदूषित जलस्रोतों  में कई तरह के बैक्टीरिया होते हैं, जो उनके जीवन चक्र को  प्रभावित करता है।  ऐसे में वेटलैंड्स (आर्द्रभूमियों) का संरक्षण बेहद जरूरी है।<br /><strong>- डॉ. अंशु शर्मा, पक्षी विशेषज्ञ </strong></p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />गंदगी में रहने से पक्षियों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव जरूर पड़ता है। बर्ड्स वहां रहती है तो वह स्थान एक तरह से उनका रहवास है। कीट, पतंगे, कीड़े-मकोड़े खाकर वायरस, संक्रमण फैलने से रोकती है,जो इंसानों को बीमारियों से बचाव के लिए अहम रोल अदा रही है। लेकिन, मनुष्य पक्षियों के प्रति अपना फर्ज नहीं निभा रहा है। नालों की नियमित सफाई होनी चाहिए ताकि, अपशिष्ट व रसायनिक पद्धार्थ को बहने से रोका जा सके। रही बात वैटलेंड की तो हमारे क्षेत्र में डवलप कर रहे हैं। जिनमें अभेड़ा तालाब, जोहरा बाई का तालाब, उम्मेदगंज पक्षी विहार, बायोलॉजिकल पार्क सहित भैंसरोडगढ़ व शेरगढ़ सेंचुरी के कई क्षेत्र शामिल हैं।<br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा </strong></p>
<p>नगर निगम द्वारा नालों की समय-समय पर सफाई करवाई जाती है। यदि, कहीं गंदगी की शिकायत मिलती है तो तुरंत  सफाई करवा दी जाएगी।<br /><strong>- अशोक त्यागी, आयुक्त नगर निगम कोटा दक्षिण</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Sep 2025 15:44:48 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>प्रवासी पक्षियों को लुप्त होने से बचाने की बढ़ती चुनौतियां </title>
                                    <description><![CDATA[दुनिया में वन्य और पालतू प्राणियों की जान बचाना एक बड़ी चुनौती है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/increasing-challenges-to-save-migratory-birds-from-disappearance/article-114305"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-05/rtrer-(4)28.png" alt=""></a><br /><p>दुनिया में वन्य और पालतू प्राणियों की जान बचाना एक बड़ी चुनौती है। वन्य प्राणियों पर बढ़ते खतरों की वजह से उसका असर जैव विविधता पर साफ दिखाई पड़ने लगा है। जैव विविधता को बनाए रखने में अहम रोल निभाने वाले पक्षियों पर खतरे लगातार बढ़ रहे हैं। पक्षियों की सुरक्षा और उनके संरक्षण के लिए बना कानून भी नाकाम साबित हुआ है। यही वजह है कई प्रवासी पक्षी प्रजातियों पर लुप्त होने का खतरा लगातार मडराता रहता है। जब देश में कोविड 19 की दहशत से लोग परेशान थे, लेकिन प्रवासी मेहमान देश के कई अभ्यारण्यों और तालाबों में प्रवास के लिए पहुंच रहे थे। यह पहली दफा था, जब प्रवासी पक्षियों के लिए हवा और हरीतिमा सबसे अनुकूल मिली। लेकिन इस अनुकूलता का नाजायज फायदा प्रवासी पक्षियों के दुश्मन शिकारियों ने उठाया। लॉक डाउन और आंशिक बंदी के बावजूद प्रवासी पक्षियों का शिकार और व्यापार जारी रहा। सैकड़ों ग्रीष्म कालीन प्रवासी पक्षी लौट कर अपने घर नहीं जा सके। ऐसे में जब आदमी को बचाना मुश्किल हो गया हो, दूसरे प्राणियों की हिफाजत तो भगवान भरोसे ही होनी थी। </p>
<p>अभ्यारण्यों में इस साल और पिछले साल बड़ी तादाद में प्रवासी पक्षी आए, लेकिन उनके शिकार व व्यापार की खबरें भी आती रही हैं। जबकि स्वदेशी पक्षियों और प्रवासी पक्षियों का शिकार करना गैर कानूनी है। गौरतलब है पक्षियों का शिकार होने की वजह से पिछले 35 सालों में पक्षियों की दुर्लभ 23 प्रजातियां लुप्त हो गई हैं, जबकि सौ साल में इसके पहले औसतन एक प्रजाति लुप्त होती थी। कुछ खास तरह के भारतीय पक्षियों का शिकार पिछले 35 सालों में तेज हुआ है। इसी तरह प्रवासी पक्षियों में कॉमन कूट, ब्लैक बिंग्ड स्टिल्ट, नदन फावडे, रूडी शेल्डक, लेसर व्हिस्लिंगडक, वाइड एवोसेट और कैस्पियन मूल भारत में हर साल प्रवास के लिए आते हैं, का शिकार होने की खबरें भी आती रही हैं। </p>
<p>पिछले कुछ वर्षों से जलवायु सम्मेलनों में हिस्सा लेने वाले देशों ने जलवायु परिवर्तन के चलते प्रवासी पक्षियों पर लुप्त होने का मडराते खतरे पर चिंता जाहिर करते रहे हैं, लेकिन इस बाबत ऐसा कदम नही उठाया जा सका कि विश्व स्तर पर पक्षियों के दुश्मनों में दहशत पैदा होती। जाहिर तौर पर प्रवासी व देशी दोनों तरह के पक्षियों को लुप्त होने से बचाना एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई है। इंटर नेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर के अनुसार शिकार और परिस्थितिक प्रणाली के कारण देश में निवास करने वाली 180 पक्षी प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर हैं या खतरे में हैं। प्रवासी और देशी पक्षियों के संरक्षण के लिए और उन्हें स्वतंत्रता देने के लिए कानून बनाए गए हैं, लेकिन उन कानूनों का भ्रष्टाचार की वजह से कड़ाई से पालन नहीं हो पा रहा है। वहीं दूसरी तरफ देश में ऐसे भी लोग हैं, जो प्रवासी और देशी पक्षियों के संरक्षण के लिए अपना जीवन लगाए हुए हैं, लेकिन ऐसे लोग बहुत कम हैं। ज्यादातर मारने वाले हैं, जिलाने वाले अंगुलियों पर हैं। </p>
<p>प्रवासी पक्षी अपनी लम्बी यात्रा से विभिन्न संस्कृतियों और परिवेशों को जोड़ने का कार्य करते हैं। ये पक्षी रेगिस्तान, समुद्र और पहाड़ों को पार करके एक देश से दूसरे देश का सफर करते हैं। पक्षियों की ज्ञात प्रजातियों में 19 फीसदी पक्षी नियमित रूप से प्रवास करते हैं। यदि इनका संरक्षण पूरी तरह से निश्चित नहीं किया गया तो, कुछ ही सालों में बचे प्रवासी और देशी पक्षी हमेशा के लिए लुप्त हो जाएंगे। विश्व प्रसिद्ध संभर झील हो या झारखंड और भरतपुर का प्रसिद्ध केवलानंद अभ्यारण्य में पहले से बहुत कम प्रवासी पक्षी अब आते हैं। वहीं पर डुंगुरपुर, बांसवाड़ा और उदयपुर में पहले से ज्यादा प्रवासी पक्षी आते हैं। इसी तरह राजस्थान के छोटे से गांव मेनार में ग्रामीण पर्यावरण संरक्षण की एक नई इबारत लिखने लगे हैं। ऐसी ही जीव रक्षा की भावना देश के दूसरे हिस्सों में में हो जाए, तो पक्षियों की सुरक्षा और संरक्षण की चिंता ही खत्म हो जाएगी। भारत में पक्षियों की 1200 से ज्यादा प्रजातियों तथा उपप्रजातियों के लगभग 2100 प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं। इनमें से लगभग 350 प्रजातियां प्रवासी हैं, जो देश के अलग-अलग क्षेत्रों में शीत और ग्रीष्म ऋतु में आते हैं। </p>
<p>कुछ प्रजातियां जैसे पाइड क्रेस्टेड, चातक भारत में बरसात के समय प्रवास पर आते हैं। स्थानीय स्तर के प्रवासी पक्षी भी बड़ी संख्या में देश के एक कोने से दूसरे कोने का सफर कर प्रवासी बनते हैं। बिहार में 35 से 40 प्रतिशत प्रजातियां प्रवासी पक्षियों की हैं। इनकी सुरक्षा और संरक्षण करना एक बड़ी चुनौती है। जानकारी के मुताबिक यूं तो देश में, जहां भी प्रवासी पक्षी प्रवास करते हैं, वहां उनका शिकार होना आम बात है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में इन प्रवासियों का शिकार तेजी से हो रहा है। इसलिए ऐसा कानून होना चाहिए की पक्षियों के दुश्मनों में दहशत पैदा हो, जिससे पक्षियों को बचाया जा सके। आज भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में प्रवासी पक्षियों का संरक्षण करना कई स्तरों पर चुनौती बनी हुई है। </p>
<p>भारत एक गर्म जलवायु का क्षेत्र है। इसलिए यहां उन क्षेत्रों के पक्षी प्रवास में लाखों की संख्या में आते हैं, जहां जलवायु अत्यंत ठंठी है, लेकिन जलवायु परिवर्तन की समस्या हमारे यहां भी बड़ी समस्या बनती जा रही है। इसका असर उन प्रवासी पक्षियों पर देखा जा रहा है, जो अनुकूलता के लिए यहां चार से छ महीने रहते हैं। भारत में मांसाहार जैसे-जैसे तेजी से बढ़ रहा है पक्षियों का शिकार और सुरक्षा करना चुनौती बन गए हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रवासी पक्षियों को सरकारी इंतजाम और कानून के जरिए सुरक्षा दी जा सकती है।</p>
<p><strong>-अखिलेश आर्येन्दु</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 16 May 2025 11:42:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रवासी पक्षियों पर मौसम की मार, आने का सिलसिला धीमा</title>
                                    <description><![CDATA[झालावाड़ के वेटलैंड्स और यहां की आबोहवा प्रवासी पक्षियों को काफी रास आती रही है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jhalawar/weather-has-affected-the-migratory-birds--their-arrival-has-slowed-down/article-97127"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/257rtrer14.png" alt=""></a><br /><p>झालावाड़। झालावाड़ के वेटलैंड इस बार पूरी तरह आबाद नजर नहीं आते, अधिकांश वेटलैंड्स पर सन्नाटा पसरा नजर आता है। पक्षियों की अठखेलियों से आबाद रहने वाले इन वेटलैंड्स पर फिलहाल जो सन्नाटा है उसके पीछे का कारण मौसम की मार बताया जा रहा है। यहां प्रवासी पक्षी अब धीरे-धीरे पहुंचने लगे हैं जो अपने समय से लगभग एक महीना देरी से चल रहे हैं। प्रवासी पक्षियों की कुछ प्रजातियां फिलहाल यहां नजर आने लगी है, लेकिन आमतौर पर इस समय तक यहां लगभग डेढ़ सौ प्रजातियों के प्रवासी पक्षी देखे जाते रहे हैं, लेकिन इस बार मौसम ने कुछ ऐसी करवट ली है कि पक्षियों के यहां आने का सिलसिला अपने समय से लगभग एक महीना देरी से अब जाकर शुरू हुआ है। जानकारी के लिए आपको बता दें कि झालावाड़ के वेटलैंड्स और यहां की आबोहवा प्रवासी पक्षियों को काफी रास आती रही है। इसके चलते झालावाड़ जिला राजस्थान का प्रमुख बर्थडे डेस्टिनेशन बन चुका है। यहां शहर के आसपास ही बडबेला, खंडिया, मूंडलिया खेड़ी और दुगार्पुर तालाब जैसे बड़े वेटलैंड हैं जहां प्रवासी पक्षियों की सैकड़ो प्रजातियां आसानी से देखने को मिल जाती हैं, इसी के चलते हैं यहां पक्षी प्रेमी और फोटोग्राफर्स बड़ी तादाद में पहुंचने लगे हैं।</p>
<p><strong>हजारों किलोमीटर का सफर तय करके आते हैं प्रवासी पक्षी</strong><br />विशेषज्ञों से प्राप्त जानकारी अनुसार झालावाड़ में आने वाले प्रवासी पक्षी कई हजार किलोमीटर का सफर तय करके यहां आते हैं तथा यहां वह तीन से चार महीना रुकते हैं और उसके बाद पुन: लौट जाते हैं। प्राप्त जानकारी अनुसार कई पक्षी ऐसे हैं जो 5 से 10000 किलोमीटर की यात्रा करते हुए यहां पहुंचते हैं। हिमालय के अतिरिक्त यूरोप एवं पृथ्वी के अन्य भागों से भी यह प्रवासी पक्षी यहां पहुंचते हैं जो लोगों के लिए खास आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।</p>
<p><strong>विश्व प्रसिद्ध सुर्खाबभी पहुंचते हैं यहां</strong><br />अपनी खूबसूरती और विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध सुर्खाब यानी रुड़ी शैलडक सर्दियों के प्रवास पर मध्य एशिया से यहां पहुंचता है। बड़बेला तालाब पर इसे आसानी से देखा जा सकता है। रूडी शेल्डक यानि सुर्खाब को भारत में ब्राह्मणी बतख के नाम से भी पहचाना जाता है। यह उत्तरी पश्चिमी अफ्रीका, इथियोपिया, दक्षिण-पूर्वी यूरोप, मध्य एशिया के साथ चीन और नेपाल के ठंडे क्षेत्रों में निवास करता है। मार्च अप्रैल के महीने में यह मध्य एशिया में प्रजनन करने पहुंचता है। </p>
<p><strong>इन प्रजातियों के प्रवासी पक्षी आए</strong><br />झालावाड़ डीएफओ सागर पंवार ने बताया कि इस बार पक्षियों के आने का सिलसिला धीमा चल रहा है, फिलहाल झालावाड़ और उसके आसपास के विभिन्न जलाशयों पर कॉमन कूट, नार्दन पिनटेल, रेड क्रेस्टेड पॉचार्ड, कॉमन टील, बार हेडेड गीज, रुडी शेल डक, और पेंटेड स्टॉर्क पहुंचने लगे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>झालावाड़</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Dec 2024 15:21:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>कैवलादेव बना कोटा का राजपुरा व गोदल्याहेड़ी</title>
                                    <description><![CDATA[1200 से ज्यादा खूबसूरत पक्षियों का बसा संसार। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/kailavadev-becomes-kota-s-rajpura-and-godlyaheri/article-94835"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/6630400-sizee-(2)9.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहर से करीब 25 किमी दूर खूबसूरत पक्षियों का संसार चहक रहा है। रुई जैसे सफेद पंख पर गुलाबी और नारंगी रंग प्रकृति की अनोखी कला प्रदर्शित कर रहा है। आसमान में परवाज भरते इन परिंदों को देख, ऐसा लगता है, मानो बिन बारिश इंद्रधनुष के रंग बिखर रहे हों। यहां बात हो रही है,पैंटेड  स्टार्क बडर््स की। शहरी सीमा से सटे राजपुरा और गोदल्याहेड़ी गांव में प्रवासी पक्षियों की दुनिया बसी है। दोनों जगहों के तालाब किनारे पेड़ों पर करीब साढ़े छह सौ से ज्यादा नन्हें पक्षियों ने जन्म लिया है। इनकी चहचहाट लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। पक्षियों को देखने के लिए दूर-दराज से बर्ड्स वॉचर व रिसर्चर पहुंच रहे हैं। रिसचर्स का कहना है, कोटा के यह इलाके कैलवादेव पक्षी विहार जैसा नजारा देखने को मिल रहा है। </p>
<p><strong>650 से ज्यादा नन्हें मेहमानों ने लिया जन्म</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि राजपुरा व गोदल्याहेड़ी में तालाब किनारे इलाके पक्षियों से चहक रहे है। वर्ष 2017 से ही पैंटेड स्टार्क यहां रहकर नेस्टिंग कर रहे हैं। राजपुरा में 200 घौंसले गिने हैं, जिनमें कहीं 2 तो कहीं 3 बच्चे दिखाई दिए। वहीं, गोदल्याहेड़ी में 100 घौंसले नजर आए, उनमें दो दो व तीन की संख्या में नन्हें परिंदे दिखाई दिए। ऐसे में प्रत्येक घौसले में 2-2 बच्चों के हिसाब से राजपुरा व गोदल्याहेड़ी में 6.50 से ज्यादा नन्हें पैंटेड  स्टार्क  ने जन्म लिया है। इन दिनों पेड़ों पर बड़ी संख्या में पक्षी इतनी पास से तो भरतपुर कैलवादेव पक्षी अभयारणय में भी दिखाई नहीं देते। </p>
<p><strong>बडर््स रिसर्च का डेस्टिनेशन बना राजपुरा-गोदल्याहेड़ी</strong><br />जैदी कहते हैं, राजपुरा व गोदल्याहेड़ी तलाब किनारे का यह इलाका इन दिनों पक्षियों पर शौध करने वाले बर्ड्स रिसचर्स का डेस्टिंनेशन बना हुआ है। पैंटेर्ड स्टार्क बडर््स जोड़े में रहते हैं, प्रत्येक घौंसले में कहीं दो व कहीं तीन बच्चे हैं। ऐसे में माता-पिता व बच्चों को मिलाकर कुल 1200 से ज्यादा जांघिलों की आबादी बसी हुई है। पिछले साल भी अच्छी संख्या में बच्चों ने जन्म लिया था। यहां स्थानीय निवासियों  द्वारा बडर््स का ध्यान रखा जाता है। अतिक्रमण व पेड़ों की अवैध कटाई नहीं होने देते। इसकी वजह से यहां इन पक्षियों का हैबीटॉट विकसित हो गया। </p>
<p><strong>दूर-दराज से पहुंच रहे बडर््स वॉचर</strong><br />पक्षी प्रेमी सुरेश नागर लंबे समय से पैंंटेर्ड स्टार्क का ख्याल रख रहे हैं। यहां आने वाले शौधार्थियों व बर्ड्स वॉचर को इनकी विशेषताएं व हैबीटॉट की जानकारी देते हैं। उन्होंने बताया कि जांघिलों को देखने के लिए दूर दराज से लोग आ रहे हैं। खुले आसमान में परिंदों को परवाज भरते व तालाब में अठखेलियां करते देख बर्ड्स वॉचर आनंदित हो रहे हैं। अल सुबह पक्षियों की चहचहाट से स्थानीय लोगों का मन मोह लेते हैं। राजपुरा व गोदल्याहेड़ी गांव इन दिनों कैलवादेव पक्षी विहार बना हुआ है।  </p>
<p><strong>दुर्लभ प्रजाति में आते हैं पेंटेड स्टॉर्क</strong><br />वन्यजीव प्रेमी शेख जुनैद ने बताया कि पेंटेड स्टार्क दुर्लभ प्रजाति की श्रेणी में आते हंै। इसे नियर थ्रेटेंड संरक्षण की स्थिति में लिया गया। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि प्रजातियों को खतरा है, लेकिन थ्रेटैंड टैक्सा में आमतौर पर कमजोर प्रजातियां शामिल होती हैं, वहीं यह प्रजाति कमजोर स्थिति में मानी जाती है।</p>
<p><strong>वर्ष 2021 में 250 थी संख्या </strong><br />जुनैद बताते हैं, ये पक्षी 7 सालों से यहां आ रहे हैं। वर्ष 2021 में इनकी संख्या 250 थी, जो अगले ही साल बढ़कर वर्ष 2022 में 500 पर पहुंच गई। वर्तमान में इनकी संख्या यहां 1200 से ज्यादा हैं, यह वंश वृद्धि का संकेत है, जो पक्षी पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। जांघिल 5 से 10 के समूह में कॉलोनी बना कर रहते हैं और आपस में एक-दूसरे की मदद करते हैं।</p>
<p><strong>साढ़े तीन फीट है ऊंचाई</strong><br />शोधार्थी रवि नागर ने बताया कि जांघिल लगभग साढ़े तीन फीट ऊंचाई के होते हैं। इनके पंख सफेद होते हैं, जिन पर ऊपर की तरफ काले रंग के निशान व पट्टियां पड़ी होती हैं और पूछ के हल्के गुलाबी रंग के पंख होते है। चोंच पीली होती है। इनका मुख्य भोजन मछलियां, केकड़े, मेंडक, छोटे सांप, छिपकली व कीड़े होते हैं। साथ ही यह किसान मित्र भी होेते हैं। इनकी मौजूदगी से धरतीपुत्रों को कीट पतंगों से फसलों की सुरक्षा में मदद मिलती है। </p>
<p><strong>अध्ययन के लिए भरतपुर जाने की जरूरत नहीं</strong><br />कोटा विश्विद्यालय की वन्यजीव विभाग की छात्रा गार्गी का कहना है, इन दोनों स्थानों पर 300 से ज्यादा पैंटेर्ड स्टार्क के घौंसले बने हैं और सभी में बच्चे हैं। पक्षियों पर अध्ययन के लिए हमें भरतपुर के कैवलादेव व घना नेशनल पार्क जाने की जरूरत नहीं है। 25 किमी दूर ही राजपुरा व गोदल्याहेड़ी रिसर्च का डेस्टिनेशन बना हुआ है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 Nov 2024 16:57:40 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>500 नन्हें परिंदों ने लिया जन्म, कोटा की फिजां में भर रहे उड़ान</title>
                                    <description><![CDATA[तालाब के पानी में अठखेलियां व हवा में कलाबाजी करते नन्हें परिंदों को देखने के लिए दूर-दराज से बर्ड्स वॉचर पहुंच रहे हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/500-small-birds-were-born--flying-in-the-air-of-kota/article-66308"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/500-nanhe-parindo-ne-liya-janm,-kota-ki-fiza-me-bhr-rhe-udaan...kota-news-08-01-2024.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहर से करीब 25 किमी दूर खूबसूरत पक्षियों का संसार चहक रहा है। नन्हें परिंदे कोटा की फिजां में उड़ान भर रहे हैं।। सूरज उगने के साथ ही पक्षियों की चहचहाट से बडर््स वार्चर आनंदित हो रहे हैं। राजपुरा और गोदल्याहेड़ी दोनों इलाके के तालाब किनारे पेड़ों पर करीब 450 से 500 नन्हें परिंदें जन्म ले चूके हैं, जो वर्तमान में करीब 4 माह के हो गए। दरअसल, शहरी सीमा से सटे राजपुरा और गोदल्याहेड़ी गांव में प्रवासी पक्षियों की दुनिया आबाद हो रही है। तालाब के पानी में अठखेलियां व हवा में कलाबाजी करते नन्हें परिंदों को देखने के लिए दूर-दराज से बर्ड्स वॉचर पहुंच रहे हैं। </p>
<p><strong>एक साल बाद आएंगे पंखों पर कुदरती रंग </strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि शहर से सटे राजपुरा गांव के तालाब किनारे पेड़ों पर 250 से ज्यादा पेंटेर्ड स्टॉक बडर्््स के घौंसले बने हुए हैं। यह पक्षी जोड़ों में रहते हैं। प्रत्येक घौसले में दो से तीन बच्चे नजर आ रहे हैं। ऐसे में यहां करीब 280 नन्हें पक्षियों ने जन्म लिया है। वहीं, गोदल्याहेड़ी गांव में 200 से ज्यादा पक्षियों ने दुनिया में आए हैं। वर्तमान में इनकी उम्र करीब 4 माह हो चुकी है। जब यह पक्षी एक साल की उम्र पार कर लेंगे तब इनके पंखों पर कुदरती रंग आने लगेंगे। इससे पहले तक यह मटमेले रंग में नजर आते हैं। </p>
<p><strong>दूर-दराज से पहुंच रहे बर्ड्स वॉचर</strong><br />पक्षीप्रेमी सुरेश नागर ने बताया कि राजपुरा तालाब किनारे पेड़ों पर पेंटेर्ड बर्ड्स देखने के लिए दूर दराज से लोग आ रहे हैं। खुले आसमान में परिंदों को परवाज भरते व तालाब में अठखेलियां करते देख बर्ड्स वॉचर आनंदित हो रहे हैं। उनका कहना है कि कोटा के राजपुरा व गोदल्याहेड़ी गांव इन दिनों कैलवादेवी पक्षी विहार बना हुआ है। स्थानीय निवासियों में भी इन पक्षियों को देखने का क्रेज है।</p>
<p><strong>ग्लॉसी आईबीज व रेड मुनिया आकर्षण का केंद्र</strong><br />पक्षी विशेषज्ञों ने बताया कि राजपुरा व गोदल्याहेड़ी के तालाब जैव विविधता से भरपूर हैं। यहां ग्लॉसी आईबीज, रेड मुनिया, कॉमन कूट, यूरोपीयन शावलर, स्पोटबिल लेसर, विस्लिंग टील, कोटन टील, इगरेट्स कोरमोरेंट पक्षी आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। </p>
<p><strong>4 माह के हुए बच्चे</strong><br />पक्षी प्रेमी जुनैद के अनुसार, राजपुरा व गोदल्याहेड़ी इलाके में पेटेंर्ड स्टॉर्क के बच्चे चार माह के हो चुके हैं। तालाब किनारे इनकी बड़ी संख्या में साइटिंग होती है। जिन्हें देखने के लिए हाड़ौतीभर से लोग आ रहे हैं। वहीं, पक्षियों पर रिसर्च करने वाले शोधकर्ता भी पहुंच रहे हैं।  उन्होंने बताया कि एक मादा एक घौंसले में दो से चार अंडे दे सकती है। एक माह बाद से इनके शरीर का रंग बदलने लगता है। एक साल की उम्र के बाद इनका शरीर व पंखों का गुलाबी होने लगेंगे।  </p>
<p><strong>बर्ड प्वाइंट में अतिक्रमण बन रहा बाधा</strong><br />जैदी कहते हैं, गांव का तालाब बर्ड्स व्यू प्वाइंट के रूप में विकसित हो सकता है लेकिन अतिक्रमण बाधा बन रहा है। जिस तरफ घौंसले हैं, उधर अवरोधक  के कारण पर्यटक घौंसलों की तरफ नहीं जा पाते। यहां न तो वॉच टावर है और नावों की व्यवस्था। जबकि, इन्हें देखने के लिए दूर दराज से पक्षी प्रेमी व रिसर्चर आते हैं। ऐसे में पर्यटन विभाग को इसे बर्ड्स व्यू प्वाइंट के रूप में विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए। </p>
<p><strong>7 सालों से आ रहे पेटेंर्ड स्टॉर्क</strong><br />पक्षी प्रेमी शेख जुनैद कहते हैं, पेटेंर्ड स्टॉर्क बर्ड दिनभर पेड़ों पर अठखेलिया करते हैं। ये पक्षी पिछले 7 सालों से यहां आ रहे हैं, गत वर्ष इनकी संख्या करीब 500 थी लेकिन इस वर्ष दोगुनी हो गई। जांघिल 5 से 10 के समूह में कॉलोनी बना कर रहते हैं और आपस में एक-दूसरे की मदद करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पेंटेड स्टॉर्क दुर्लभ प्रजाति है। इसे नियर थ्रेटेंड संरक्षण की स्थिति में लिया गया। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि प्रजातियों को खतरा है, लेकिन थ्रेटैंड टैक्सा में आमतौर पर कमजोर प्रजातियां शामिल होती हैं, वहीं यह प्रजाति कमजोर स्थिति में मानी जाती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Jan 2024 19:20:08 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>परिंदों के कलरव से आबाद हुए बूंदी के जलाशय</title>
                                    <description><![CDATA[यूरोप महाद्वीप से आने वाले यूरोपियन पिनटेल व नोर्थन शोवलर भी बूंदी के अधिकांश जल-स्रोतों पर दस्तक दे चुके है। इसी प्रकार गुजरात में कच्छ के रण से आने वाले अन्तरप्रवासी ग्रेटर-फ्लेमिंगो व जिले के बरधा बांध तक सिमटे सारस पक्षी भी आकर्षण का केंद्र बने हुए है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bundi/the-reservoirs-of-bundi-inhabited-by-the-chirping-of-birds/article-37797"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-02/parindo-k-kalrav-se-aabaad-hue-bundi-k-jalashya..bundi-news..20.2.2023.jpg" alt=""></a><br /><p>बूंदी। जिले की प्राकृतिक आबोहवा से आकर्षित होकर आने वाले विदेशी मेहमान परिंदों के कलरव से जलाशय गूंजने लगे हैं। हालांकि इस साल प्रवासी पक्षियों के दल एक माह देरी से जिले के विभिन्न जलाशयों पर पंहुचे है तथा परिंदों की तादात व प्रजातियां भी कम दिखाई दे रही हैं। जिले के प्रमुख वेट-लेंड बरधा सहित सभी बांधों व तालाबों पर प्रवासी व अन्तरप्रवासी पक्षी बड़ी संख्या में पहुंचे है। इनमें चीन-मंगोलिया जैसे ठंडे प्रदेशों में बर्फबारी शुरू होने के साथ आने वाले बार- हेडेड गूज व ग्रे- लेग गूज भी शामिल है। यूरोप महाद्वीप से आने वाले यूरोपियन पिनटेल व नोर्थन शोवलर भी बूंदी के अधिकांश जल-स्रोतों पर दस्तक दे चुके है। इसी प्रकार गुजरात में कच्छ के रण से आने वाले अन्तरप्रवासी ग्रेटर-फ्लेमिंगो व जिले के बरधा बांध तक सिमटे सारस पक्षी भी आकर्षण का केंद्र बने हुए है। </p>
<p><strong>पक्षियों के प्राकृतिक आवासों में खलल </strong><br />जिले के सभी बांधों व तालाबों में मछली ठेका होने से पक्षियों के प्राकृतिक आश्रय-स्थल छिन से गए है। मछली ठेकेदार के कार्मिक मछलियों को पक्षियों से बचाने के लिए दिनभर बांध व तालाबों पर आतिशबाजी के धमाके कर पक्षियों की स्वच्छंदता विचरण में बाधा पैदा कर रहे है। पेलिकन पक्षी को तो मछली ठेकेदार देखते ही मारने दौड़ते है। यह पक्षी जलीय-पक्षियों में सबसे बड़े आकार का होता है तथा एक दिन में करीब 5-6 किलो मछली खाता है, जिससे मछली ठेकेदार इसे एक चुनौती के रूप में देखता है। विडम्बना ही है कि जिन जलाशयों पर परिंदों का अधिकार होना चाहिए, वहां पर चंद पैसों के लालच में मछली ठेके की आड़ में पक्षियों के प्राकृतिक आश्रय-स्थलों पर कब्जे कर लिए है। इसी प्रकार बांधों व तालाबों में अवैध पेटा-काश्त पर भी रोक नहीं लग पाना चिंता का विषय है।</p>
<p><strong>कुरजां व पेलिकन ने किया बूंदी से किनारा</strong><br />जिले के रामनगर तालाब में कुछ समय के लिए आने वाली कुरजां या डेमोशाइल क्रेन पक्षी इस साल बूंदी के किसी भी वेटलैंड पर नजर नहीं आए तथा अपने बड़े आकार के लिए पहचाने जाने वाले पेलिकन की भी जिले के किसी भी वेट-लेंड पर उपस्थिति नहीं देखी गई है। इसके अलावा कई पक्षी प्रजातियों की बहुत कम उपस्थिति दर्ज की गई है।</p>
<p>जिले का प्राकृतिक वातावरण पक्षियों के अनुकूल है, लेकिन मछली ठेके की आड़ में पक्षियों का शिकार हो रहा है। हर जिले में कम से कम एक वेट-लेंड को मछली ठेके से मुक्त करवाने के सामूहिक प्रयास होने चाहिए ताकि पक्षियों के प्राकृतिक आश्रय स्थलों को बचाया जा सके। रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व में आने वाले भीमलत व अभयपुरा बांधों पर भी मछली ठेका होना गंभीर है, जिस पर तत्काल रोक लगनी चाहिए।<br /><strong>- पृथ्वी सिंह राजावत, पक्षी एवं वन्यजीव प्रेमी</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बूंदी</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Feb 2023 15:08:13 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>मध्य यूरोप के प्रवासी परिंदों को भी रास आई बून्दी की आबोहवा</title>
                                    <description><![CDATA[जिले के प्रमुख वेटलैंड तालेड़ा क्षेत्र के बरधा बांध, बून्दी की जैतसगर झील, गुढ़ानाथावतान क्षेत्र में भीमलत-अभयपुरा बांध, रामनगर वेटलैंड, हिंडोली के रामसागर,गुढ़ा बांध, दुगारी के कनक सागर सहित मेज, कुरेल, व चम्बल नदियों में बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों की जलक्रीड़ा आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bundi/migratory-birds-of-central-europe-also-liked-the-climate-of-bundi/article-31872"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-12/madhya-europe-k-prawasi-parindo-ko-bhi-raas-aai-bundi-ki-aabohawa...bundi-news-9.12.2022.jpg" alt=""></a><br /><p>बून्दी। प्रकृति की अनुपम छटा के बीच बसें छोटी काशी में सर्दी की दस्तक के साथ ही जलस्रोतों पर  देशी-विदेशी पक्षियों की तादात  बढ़ने लगी हैं। इस साल अच्छे मानसून के चलते परिंदों के कलरव से जिले के सभी जलाशयों पर रौनक लौट आई है। हजारों किलोमीटर सुदूर यात्राएं कर मध्य यूरोप व हिमालयन क्षेत्र से विभिन्न प्रजातियों के प्रवासी पक्षी बून्दी पहुंच चुके हैं। यहां जलाशयों पर बड़े आकार के पेलिकन सहित अन्य प्रवासी पक्षियों का जमावड़ा लगा हुआ है। जिले के प्रमुख वेटलैंड तालेड़ा क्षेत्र के बरधा बांध, बून्दी की जैतसगर झील, गुढ़ानाथावतान क्षेत्र में भीमलत-अभयपुरा बांध, रामनगर वेटलैंड, हिंडोली के रामसागर,गुढ़ा बांध, दुगारी के कनक सागर सहित मेज, कुरेल, व चम्बल नदियों में बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों की जलक्रीड़ा आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।</p>
<p><strong>गुढ़ा बांध व कनक सागर में इंडियन स्किम्मर व रामनगर में कुरजां का इंतजार</strong><br />जिले के गुढ़ा बांध व कनक सागर दुगारी में हर साल दुर्लभ इंडियन स्किम्मर पक्षी आते है। अभी तक जिले में इन पक्षियों की साइटिंग नहीं हुई है।  जिले के  प्रमुख वेटलैंड रामनगर तालाब पर भी हर साल आने वाले कुरजां पक्षी भी अभी तक नहीं आए है। वर्तमान में जिले के जलाशयों पर पेलिकन, बार हेडेड गूज, ग्रे लेग गूज, सुरखाब, कोमन पोचार्ड, लाल सर पोचार्ड, यूरोपियन पिनटेल, नोर्थन शोवलर आदि प्रवासी परिंदे बड़ी संख्या में पंहुचे है । बरधा बांध में सारस पक्षियों की उपस्थिति लंबे समय से बनी हुई है जो पर्यावरण व पक्षी प्रेमियों के लिए खुशी का विषय है।</p>
<p><strong>बून्दी में बर्ड वाचिंग की हैं प्रबल संभावनाएं</strong><br />बून्दी में बर्ड वाचिंग के क्षेत्र में ईको टूरिज्म की विपुल संभावनाएं हैं। जिले के बरधा, व अभयपुरा बांधों व रामसागर झील को मत्स्य ठेके से मुक्त कर पक्षी संरक्षण केंद्र के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है।<br /><strong>- पृथ्वी सिंह राजावत, पक्षी विशेषज्ञ, बून्दी</strong></p>
<p>अरावली की गोद में बसा बूंदी जिला जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत धनी है। सघन पर्णपाती वनों एवं आर्द्र  भूमियों से युक्त बूंदी जिले की भौगोलिक दशाएं न केवल स्थानीय अपितु प्रवासी पक्षियों हेतु भी आदर्श शरणस्थलीयों का निर्माण करती है। बूंदी जिला शीतकाल में लगभग 200 से अधिक प्रजातियों के स्थानीय व प्रवासी पक्षियों का निवास स्थान रहता है। यहां के प्राकृतिक जल स्रोत व बांध प्रवासी पक्षियों के लिए स्वर्ग है।<br /><strong>- डॉ भारतेंदु गौतम ,वन्यजीव प्रेमी व असिस्टेंट प्रोफे. भूगोल, राजकीय महाविद्यालय बून्दी</strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बूंदी</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 09 Dec 2022 16:13:34 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>प्रवासी पक्षी ‘पेंटेड स्टोर्क’ ने मोरेल बांध पर डाला डेरा</title>
                                    <description><![CDATA[मोरेल बांध का अनुकूल वातावरण, भोजन की उपलब्धता एवं बड़े वृक्षों की मौजूदगी इन पक्षियों को यहां प्रजनन के लिए  आकर्षित करती है। प्रजनन अगस्त से मार्च के महीने में इनका प्रजननकाल होता है। मोरेल बांध को अपना स्थायी आवास बना रहे पेंटेड स्टोर्क  की संख्या एक वृक्ष पर 10 से 40 तक देखी गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/dausa/migratory-bird-painted-stork-camps-at-morel-dam/article-21869"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-09/61.jpg" alt=""></a><br /><p>लालसोट। ढूंढाड़ क्षेत्र का सबसे बड़े मिट्टी का मोरेल बांध गत चार सालों से प्रवासी पक्षियों की शरणस्थली बना हुआ है। यहां इन दिनों लगभग 200 पेंटेड स्टोर्क जिसे (सामान्य रूप से जांघिल भी कहा जाता है)ने डेरा डाला हुआ है। यह पक्षी आईयूसीएन की रेड डेटा लिस्ट में नियर थ्रेटण्ड सूची में शामिल है। पक्षीविद् डॉ. सुभाष पहाड़िया के अनुसार ये सुखद दृश्य है कि कई पक्षी अब यहां प्रजनन करने लगे है। अपनी पीली लंबी और बड़ी चोंच और गुलाबी और हल्के भूरे रंग के पंखों के कारण बेहद आकर्षक लगता है, मानो किसी चित्रकार ने फु रसत से इनके पंखों में रंग भर हो। पेंटेड स्टोर्क इतनी बड़ी संख्या में पहली बार यहां दिखाई दे रहे हैं। मोरेल बांध की तलहटी में देशी बबूल के 5.6 पेड़ों पर इन पक्षियों ने अपने घोंसले बनाना शुरू कर दिया है। मोरेल बांध का अनुकूल वातावरण, भोजन की उपलब्धता एवं बड़े वृक्षों की मौजूदगी इन पक्षियों को यहां प्रजनन के लिए आकर्षित करती है। प्रजनन अगस्त से मार्च के महीने में इनका प्रजननकाल होता है। मोरेल बांध को अपना स्थायी आवास बना रहे पेंटेड स्टोर्क की संख्या एक वृक्ष पर 10 से 40 तक देखी गई है। पक्षीविद् डॉ.सुभाष पहाड़िया के अनुसार ये सुखद दृश्य है कि कई पक्षी अब यहां प्रजनन भी करने लगे है। पेंटेड स्टॉर्क पर्यटकों के इस समय आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। पेंटेड स्टोर्क नर व मादा देखने मे लगभग एक से ही दिखाई देते है लेकिन नर का आकार मादा से बड़ा होता है।इनकी लंबी और पतली टांग, नुकीली लंबी चोंच उसे दूसरे पक्षियों से अलग करती है। यह पक्षी मानव से भी ज्यादा समझदार होती हैं, क्योंकि यह अपने सुरक्षा के लिए अपने आस पास की हरियाली बचा कर रखती है और जिस पेड़ पर घोंसला बनाता है उस पेड़ का नेस्टिंग मेटेरियल काम नहीं लेता है। दूसरी जगह से तिनके व टहनियां लाकर घोंसलों का निर्माण करता है। पहाड़िया के अनुसार कुछ पक्षियों के साथ छोटे पेंटेड स्टोर्क देखे गए हैं जबकि अधिकांश पेंटेड स्टोर्क अभी नीड़ के निर्माण में लगे है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>दौसा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 06 Sep 2022 13:18:20 +0530</pubDate>
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                <title>गर्मी से बार हेडेड गूंज बैचेन, वापसी की करने लगे तैयारी</title>
                                    <description><![CDATA[तापमान में बढ़ोतरी के साथ प्रवासी पक्षी बैचेन हो उठे है। बोराबास में प्रवासी पक्षी बारहेडेड गूज का जमावडा लगा  हुआ है। इनकी 70 से 80 संख्या में मौजूदगी दर्ज की जा रही है।अब इनका अंतिम पडाव है। गर्मी की शुरूआत होते ही यह वतन को लौट जाएंगे। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/bar-headed-goose-restless-due-to-heat--preparing-to-return/article-5972"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/dasfasgasdfgasdf.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। तापमान में बढ़ोतरी के साथ ही गर्मी ने दस्तक दे दी है। गर्मी के कारण प्रवासी पक्षी बैचेन हो उठे है। वे अब वतन को लौटने लगे है, लेकिन बोराबास में प्रवासी पक्षी बारहेडेड गूज का जमावडा लगा  हुआ है। ये क्षेत्र इन मेहमानों को खूब रास आ रहा है। तालाब के छिछले पानी में अनकी अठखेलियां देखते बन रही है। अभी भी इनकी 70 से 80 संख्या में मौजूदगी दर्ज की जा रही है। इनके साथ में अन्य स्थानीय प्रवासी पक्षी है। उनकी संख्या कम है। बार हेडेड गूज  की संख्या यहां पर अधिक होने से अच्छा संकेत है। हालांकि, अब इनका अंतिम पडाव है। क्योंकि, गर्मी की शुरूआत होते ही यह वतन को लौट जाएंगे। पक्षी विशेषज्ञ बताते है कि हर साल कोटा जिले में सर्दी की शुरूआत होने पर बफीर्ले क्षेत्रों से हजारों किलोमीटर का सफर तय कर यहां पहुंचते है। बर्फ जमने के कारण बफीर्ले क्षेत्रों में भोजन की दिक्कत हो जाती है। यहां पर बर्फ की कमी के कारण भोजन की उपलब्धता रहती है। इसी कारण यहां आते है।</p>
<p><br /><strong>25 हजार की ऊचाई से आगमन</strong><br />पक्षियों की यह प्रजाति सर्दियों के मौसम में तिब्बत, कजाकिस्तान, मंगोलिया, रूस, हिमालय आदि जगहों से एक लंबा सफर तय करके हिमालय की ऊंची चोटियों के ऊपर से उड़ कर भारत में आते हैं। ये दुनिया के सबसे अधिक ऊंचाई पर उड़ने वाले पक्षी हैं। ये लगभग 25 हजार फीट तक की ऊंचाई पर उड़ कर भारत में पहुंचते हैं। जब इनके गृह क्षेत्र में ठंड बढ़ती है और बर्फबारी शुरू होती है। उस समय ये दक्षिणी एशिया की तरफ प्रवास आरंभ करते है।</p>
<p><br /><strong>इसलिए खास बारहेडेड गूज</strong><br />. सर्वाधिक ऊंचाई पर उड़ने वाला पक्षी।<br />. दो से तीन किलोग्राम वजन।<br />. मादा 7 से 8 अंडे देती है।<br />. दलदली क्षेत्र, खेती के आसपास और झीलों में मौजूद।<br />. गर्दन व सिर का रंग सफेद, शरीर के बाकी हिस्सों का रंग दूधिया।<br />.  चोंच व पंजों का रंग नारंगी और सिर पर काले रंग की दो धारियां।<br />. बार की तरह धारियां होने से बार हेडेड गूज नाम पड़ा।</p>
<p><br /><strong>अब करेंगे यहां से पलायन</strong><br />बारहेडेड गूज हर साल नवंबर-दिसंबर माह में यहां आते है। करीब तीन से चार माह रूकने के बाद हम वतन लौट जाते है। इनकी खास बात यह है कि कोटा जिले में हजारों की संख्या में इनकी मौजूदगी रहती है, लेकिन यह नेस्ट नहीं बनाते न ब्रिडिंग करते। इनका यहां आने के पीछे उद्देश्य केवल भोजन रहता है। कोटा जिले में भोजन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने से हर साल यहां पर प्रवास पर रहते है।</p>
<p><br /><strong>इनका कहना है।</strong><br />यहां पर इनकी संख्या पिछली बार की अपेक्षा बढ़ी है। करीब 70 से 80 की संख्या में मौजूद है। इनके साथ अन्य पक्षी भी है। मार्च के इस माह  में यहां से पलायन कर जाएंगे।<br /><strong>- अनुराग भटनागर, सहायक वन संरक्षक, वन्यजीव विभाग, कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 11 Mar 2022 17:46:43 +0530</pubDate>
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                <title>यूक्रेन-रूस से प्रवासी पक्षियों पर आया संकट</title>
                                    <description><![CDATA[हर साल बड़ी तादाद में हजारों किलोमीटर का सफर तय कर प्रवासी पक्षी यहां आते हैं। लेकिन, वहां युद्ध की स्थिति में  प्रवासी पक्षियों पर भी वापसी का संकट आ गया है। युद्ध की स्थिति में उनका यूक्रेन-रूस में रहना संभव नहीं होगा। ऐसी स्थिति में ये प्रवासी पक्षी अन्य देशों में डायवर्ट होंगे। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/crisis-on-migratory-birds-from-ukraine-russia/article-5950"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/birds.png" alt=""></a><br /><p>कोटा यूक्रेन-रूस युद्ध से लोगों के साथ प्रवासी पक्षियों पर भी वापसी का संकट आ गया है। क्योंकि, हर साल बड़ी तादाद में हजारों किलोमीटर का सफर तय कर प्रवासी पक्षी यहां आते हैं। लेकिन, वहां युद्ध की स्थिति में वापस नहीं जा पाएंगे। चारों तरफ का माहौल ही ऐसा है। इसमें उनका रहना संभव नहीं होगा। ऐसी स्थिति में ये प्रवासी पक्षी अन्य देशों में डायवर्ट होंगे। एक्सपर्ट का कहना है कि रूस-युक्रेन युद्ध का प्रवासी पक्षियों पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। इस समय तो उनका वापसी का समय चल रहा है।  वहां के हालात खराब हैं। चारों और विस्फोट गोलीबारी है। इनसे निकलता धुंआ पर्यावरण के साथ पक्षियों को भी परेशानी होगी। ऐसी स्थिति में पक्षियों को स्थान बदलना पड़ सकता है। हालांकि, उम्मीद जताई जा रही है कि एकाध दिन में युद्ध समाप्त हो जाए। फिर भी काफी दिनों तक युद्ध के परिणाम रहेंगे। ऐसी स्थिति में पक्षी वहां नहीं रह पाएंगे। साथ ही इन पक्षियों को धुंए के चलते रास्ता तलाशने में भी दिक्कत आएगी।<br /><br /><strong>इन कारणों से होगी परेशानी</strong><br />1. रेडिएशन: भारी विस्फोट से रेडिएशन का खतरा हो गया है। ये आसमान में फैला हुआ है। ऐसे वातावरण में पक्षियों का रहना असंभव है। उनको इससे नुकसान पहुंचने की आशंका है।<br />2. फाइटर प्लेन: यूक्रेन और रूस में लगातार फाइट प्लेन उड़ रहे हैं। इनसे पक्षियों के टकराने का खतरा है। क्योंकि, इनका गंतव्य भी यही है। ऐसे में उनके सामने ये दिक्कत होगी।<br />3. बम बारी: पक्षियों को शांत वातावरण पसंद रहता है। लगातार बमबारी से भारी मात्रा में ध्वनि निकल रही है। शोरगुल के चलते ये पक्षी वहां नहीं रह पाएंगे। स्थान बदल लेंगे।<br />4. भोजन पानी: रूस और यूक्रेन ने एक दूसरे पर मिसाइलें दागी है। साथ में बम भी गिराए हैं। इससे वहां काफी नुकसान हुआ है। स्वाभाविक है कि जलाशयों पर भी असर होगा।<br /><br /><strong>इन पक्षियों को करना है प्रवास</strong><br />एक्सपर्ट का कहना है कि हर साल नवंबर में यूक्रेन और रूस में बर्फ जम जाती है। जिसके चलते वहां से पक्षी भोजन और पानी के लिए प्रवास कर जाते हैं। हजारों किलोमीटर का सफर तय कर पक्षी कोटा आते हैं। इनमें ग्रेलैग गूज, कॉमन शेल्डक, रूडी शेल्डक,  मलार्ड, नोर्दन पिनटेल,  नोर्दन शोवलर,  गागेर्नी, कॉमन पोचार्ड और रेड-क्रेस्टेड पोचार्ड आदि शामिल हैं। इनको वापिस जाना है। क्योंकि, यहां गर्मी शुरू हो गई है। फिर से वहां की जलवायु में प्रवास पर रहना है। ऐसे में दिक्कत होगी।<br /><br /><strong>इनका कहना है।</strong><br />यूक्रेन और रूस में युद्ध का असर प्रवासी पक्षियों पर पड़ा है। वहां से काफी संख्या में पक्षी यहां आते हैं, लेकिन बमबारी, फाइटर प्लेन और रेडिएशन से वापसी के समय दिक्कत होगी।<br /><strong>- डॉ. कृष्णेन्द्र सिंह नामा, वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट, कोटा</strong><br /><br />ये सही है कि वहां पक्षियों को खतरा है, लेकिन पक्षी संवेदनशील होते हंै। रास्ता डायवर्ट कर साइबेरिया चले जाएंगे।<br />-<strong> आरएस भंडारी, सहायक वन संरक्षक, मुकंदरा टाइगर रिजर्व, कोटा</strong><br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 11 Mar 2022 13:54:44 +0530</pubDate>
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