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                <title>crocodiles - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>रील के लिए मगरमच्छ से बैर ले रहे युवा, सोशल मीडिया पर वायरल होने की सनक में वन्यजीव संरक्षण कानून का कर रहे खुला उल्लंघन</title>
                                    <description><![CDATA[वन विभाग और प्रशासन को चाहिए कि वे जनजागरूकता अभियान चलाकर युवाओं को समझाएं ।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/young-people-are-antagonizing-crocodiles-for-social-media-reels--openly-violating-wildlife-protection-laws-in-their-craze-for-going-viral/article-130525"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/y-of-news-(2)14.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। <strong> केस-1 : पैरों से मुंह दबाकर मगरमच्छ को दबोचा</strong><br />नया नोहरा इलाके में दीपावली से एक दिन पहले रविवार को सड़क पर 4 फीट लंबा मगरमच्छ आ गया था। लोगों को देख वह भागने लगा तो लोग भी उसके पीछे दौड़ने लगे। इस बीच एक युवक ने मगरमच्छ के मुंह को पैरों तले दबाकर रेस्क्यू किया। जिसे बाद में नहर में छोड़ा गया।  </p>
<p><strong>केस-2 : 80 किलो के मगर को कंधों पर उठाया</strong><br />इटावा के बंजारी गांव में एक घर में 8 फीट लंबा मगरमच्छ घुस गया था। जिसे रेस्क्यू करने पहुंचे हयात खान ने उसे पकड़ा और 80 किलो वजनी मगरमच्छ को कंधों पर उठाकर ले गया। जिसे बाद में चंबल नदी में छोड़ा गया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुआ। </p>
<p><strong>केस-3 : गोदी में मगर को उठाकर फोटोशूट करवाया</strong><br />देवली अरब क्षेत्र में शुक्रवार देर रात कुछ युवक मगरमच्छ  गोद में लेकर हंसी ठिठोली कर खेलते नजर आए। इसी तरह कोटड़ी क्षेत्र में आए मगरमच्छ को लोगों ने पकड़कर कंधों पर उठा लिया। घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुए। लोग वन विभाग की टीम को सूचना देने के बजाए रील्स बनाने के लिए खुद ही रेस्क्यू कर रहे हैं।</p>
<p>शेड्यूल वन के वन्यजीवों के साथ रील्स बनाने का बढ़ता क्रेज युवाओं और जानवरों दोनों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। सोशल मीडिया पर लाइक और फॉलोअर्स  बटोरने की होड़ में युवा, न केवल वन्यजीव संरक्षण अधिनियम कानून को ठेंगा दिखा रहे बल्कि अपनी जान भी दांव पर लगाने से नहीं चूक रहे। रील्स, मीम और लाइक-कमेंट की सनक में वन्यजीवों को उकसाते और उनके प्राकृतिक आवास में घुसपैठ करते हैं, जिससे इंसान व जानवरों के बीच संघर्ष के गंभीर खतरे पैदा हो रहे हैं। कोटा जिले में इन दिनों युवाओं का मगरमच्छ के साथ रील बनाने का खतरनाक शौक बन गया है। पिछले कुछ दिनों में कई ऐसे मामले सामने आए, जिसमें कोई गोदी में लेकर मगरमच्छ के साथ खेल रहा तो कोई भारी-भरकम मगरमच्छ को कंधों पर उठाकर वाहवाही लूट रहा। वहीं, सड़कों पर मगरमच्छ के मुंह को पैरों तले दबाकर काबू करने का साहस दिखा रहे। इन हरकतों से युवा खुद के साथ न केवल वन्यजीव की जान खतरे में डाल रहे बल्कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम  का भी खुला उल्लंघन कर रहे हैं। </p>
<p><strong>3 से 7 साल की सजा का प्रावधान</strong><br />मगरमच्छ शेड्यूल वन का एनीमल है। इनको गोदी व कंधों पर उठाकर रील्स बनाना, इनके साथ मारपीट व हंसी ठिठोली करना अमानवीय व्यवहार की श्रेणी में आता है, जो वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट-1972 का खुला उल्लंघन है। जिसमें 3 से 7 साल की सजा का प्रावधान है। वहीं, 10 हजार से 1 लाख तक का जुर्माने की कार्रवाई की जा सकती है। </p>
<p><strong>अपने साथ मगर की जिंदगी भी खतरे में डाल रहे</strong><br />सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियों में युवा, मगरमच्छ को पकड़ते, मुंह पर टेप लगाते व दौड़ाकर रेस्क्यू करने का नाटक करते नजर आए हैं। वन विभाग की रेस्क्यू टीम को सूचना देने के बजाय खुद हीरो  बनने की चाहत में न सिर्फ अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं बल्कि मगरमच्छों के जीवन के लिए भी बड़ा खतरा बन रहे हैं।</p>
<p><strong>कानून की अनदेखी और विभाग की चुप्पी</strong><br />वन विभाग की ओर से अब तक इस संबंध में न तो जागरूकता अभियान चलाया गया और न ही वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के तहत सजा और जुर्माने की कार्रवाई की गई। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की लापरवाही मानव-वन्यजीव संघर्ष को बढ़ावा देती हैं और प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित करती हैं।</p>
<p><strong>फॉलोअर्स की होड़ में उड़ाई जा रही कानून की धज्जियां</strong><br />युवाओं में सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स बढ़ाने और वायरल  होने की सनक इतनी हावी है कि वे वन्यजीवों के प्रति करुणा और कानून दोनों भूल बैठे हैं। फॉरेस्ट अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि इस तरह के मामलों में पाए जाने वालों पर कठोर कार्रवाई की जाएगी।</p>
<p><strong>वन्यजीवों को खतरा</strong><br /><strong>व्यवहार में बदलाव: </strong>रील्स के लिए वन्यजीवों को परेशान करने से उनका प्राकृतिक व्यवहार बदल सकता है। बार-बार होने वाली घुसपैठ से वे तनाव में आ सकते हैं, जिससे उनके खाने, शिकार करने और प्रजनन के तरीकों पर असर पड़ सकता है।<br /><strong>तनाव और चोट: </strong>वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास में परेशान करने से उनमें तनाव पैदा होता है, जिससे वे बीमार पड़ सकते हैं या घायल हो सकते हैं।<br /><strong>हैबीटाट लॉस:</strong> इंसानों की मौजूदगी और रील्स की शूटिंग के दौरान होने वाली गतिविधियों से जानवरों के आवास को नुकसान पहुंचता है, जिससे उनकी संख्या में कमी आ सकती है।<br /><strong>मानव-वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि: </strong>जब जानवर इंसानों के साथ संघर्ष करते हैं, तो अक्सर इसका खामियाजा उन्हें ही भुगतना पड़ता है। ऐसी घटनाएं वन्यजीवों के लिए खतरा बढ़ाती हैं। </p>
<p><strong>यह हो सकते हैं समाधान</strong><br /><strong>जन जागरूकता अभियान:</strong> सोशल मीडिया के जरिए वन्यजीव संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना चाहिए। <br /><strong>सख्ती से लागू हो कानून:</strong> सरकार को वन्यजीवों को परेशान करने वालों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए और कानूनों को सख्ती से लागू करना चाहिए।<br /><strong>शिक्षण और जागरूकता:</strong> स्कूलों और कॉलेजों में वन्यजीव संरक्षण की शिक्षा देना चाहिए ताकि युवा इसके प्रति जागरूक हो सकें। </p>
<p><strong>वन्य जीव प्रेमी बोले</strong><br />वन्यजीव को छेड़ना, पकड़ना, हंसी ठिठोली करना या वाइल्ड एनीमल्स के साथ रील बनाना न केवल गैरकानूनी है बल्कि उनके साथ अमानवीय व्यवहार भी है। जागरूकता की कमी और सोशल मीडिया की लालसा मिलकर एक गंभीर खतरा पैदा कर रही है। युवाओं को इससे बचना चाहिए। वन विभाग को जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। <br /><strong>- एएच जैदी, नेचर प्रमोटर</strong></p>
<p>रील की कुछ सेकंड की लोकप्रियता पाने के लिए युवाओं की यह नादानी उन्हें कानूनी सजा, शारीरिक चोट या मौत के खतरे तक पहुंचा सकती है। वन विभाग और प्रशासन को चाहिए कि वे जनजागरूकता अभियान चलाकर युवाओं को समझाएं कि वन्यजीव खिलौना नहीं बल्कि प्रकृति की अमूल्य धरोहर हैं।<br /><strong>- डॉ. सुधीर गुप्ता, वन्यजीव प्रेमी</strong></p>
<p>मगरमच्छ शेड्यूल वन का एनीमल है। इसके साथ छेड़छाड़ करना वन्यजीव अधिनियम 1972 का खुला उल्लंघन है। वन विभाग को ऐसी घटनाओं पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन, विभाग कार्रवाई नहीं करता क्योंकि यह लोग विभाग का काम कर देते हैं। कार्रवाई होगी तो रेस्क्यू के लिए वन विभाग को काम करना पड़ेगा, इसलिए जिम्मेदारी से बचने के लिए एक्शन नहीं करते। नतीजन, ऐसे मामलों की पुनरावृति बढ़ती है।<br /><strong>- तपेश्वर सिंह भाटी, वन्यजीव प्रेमी</strong></p>
<p>वाइल्ड लाइफ के प्रति लोगों में जागरूकता की कमी है। अवेयरनेस बढ़ाने के लिए कार्य किए जा रहे हैं। हाल ही में वाइल्ड लाइफ सप्ताह में भी स्कूल व कॉलेज में विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थियों को वन्यजीवों के प्रति जागरूक किया है।  वहीं, इस तरह की घटनाओं में शामिल लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>
<p>वन्यजीवों के साथ रील्स बनाना, सोशल मीडिया पर फोटो वीडियो अपलोड करना गैर कानूनी है। इसमें सजा और जुर्माने का प्रावधान है। यदि, आबादी क्षेत्र में वन्यजीव नजर आए तो वन विभाग को सूचित किया जाना चाहिए, हमारी टीम तुरंत रेस्क्यू करने पहुंचेगी। <br /><strong>- सुगना राम जाट, संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक वन्यजीव</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Oct 2025 15:56:10 +0530</pubDate>
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                <title>सीवी गार्डन में एक नहीं दो मगरमच्छों का डेरा</title>
                                    <description><![CDATA[मॉर्निंग वॉकर्स व पर्यटकों पर बढ़ा हमले का खतरा।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/not-one-but-two-crocodiles-camp-in-cv-garden/article-97788"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/257rtrer-(2)23.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। नयापुरा स्थित सीवी गार्डन में  मॉर्निंग वॉकर्स, पर्यटकों व बच्चों की जान खतरे में है। गार्डन के तालाब में एक नहीं दो मगरमच्छ ने डेरा जमाया हुआ है। रविवार को भी दूसरा  मगरमच्छ  नजर आया। वह तालाब किनारे कमल पौधों के पास दलदली जमीन पर घात लगाए बैठा था। जबकि, तालाब में बोटिंग व किनारे पर जॉय ट्रेन होने से बच्चों की आवाजाही ज्यादा रहती है। ऐसे मे हादसे की आशंका बनी रहती है। वहीं, तालाब के आसपास पर्यटकों मौजूदगी होने से मगरमच्छ के हमले का  खतरा बढ़ गया है। मॉर्निंग वॉकर्स द्वारा वन्यजीव विभाग को कई बार संभावित खतरे से आगाज किया जा चुका है, इसके बावजूद मगरमच्छ को रेस्क्यू नहीं किया जा रहा। वन अधिकारियों की लापरवाही से किसी दिन सीवी गार्डन में बड़ा हादसा हो सकता है। </p>
<p><strong>सुबह-शाम पर्यटकों की रहती है भीड़</strong><br />डॉ. सुधीर उपाध्याय का कहना है, सीवी गार्डन शहर का सबसे बड़ा व पुराना गार्डन है। जहां सुबह व शाम के वक्त बड़ी संख्या में लोग परिवार संग घूमने आते हैं। जिनके साथ बच्चे भी होते हैं। ऐसे में तालाब किनारे दो मगरमच्छों की मौजूदगी से हादसे का खतरा बना रहता है। वन अधिकारियों को व्यक्तिगत व सम्पर्क पोर्टल के तहत शिकायत कर चुके है, इसके बावजूद वन अधिकारी लापरवाह बने हुए हैं। </p>
<p><strong>एक 8-10 फीट तो दूसरा 5 फीट लंबा मगरमच्छ</strong><br />सीवी गार्डन में तैनात गार्ड्स का कहना है कि पार्क के तालाब में दो मगरमच्छ हैं। एक 8 से 10 फिट लंबा व दूसरा 5 फिट लंबा मगरमच्छ है। यहां पैदल बोटिंग की जाती है। शनिवार को भी बच्चे  बोटिंग कर रहे थे। वह पानी में भी हाथ डाल देते हैं, ऐसे में हादसे का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है। </p>
<p><strong>पानी में नहीं उतर रही बतख </strong><br />पार्क में बतख पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। लेकिन, हाल ही में हुए हमले से वह इतनी सहम गई की वे पानी में नहीं उतरी हैं। जिससे उनके भोजन का संकट हो गया। डॉ. उपाध्याय ने बताया कि तालाब स्थित मंदिर पर महिला श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। ऐसे में मगरमच्छ के हमले का खतरा बना रहता है। खतरों से अनजान बच्चे खेलते हुए तालाब किनारे आ जाते हैं, ऐसे में मगरमच्छ उन पर झपट्टा मार सकता है। उन्होंने बताया कि प्रशासन को भी समस्या से अवगत करवाने के बावजूद गंभीर समस्या पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 Dec 2024 14:28:44 +0530</pubDate>
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                <title>एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई, बीच में मगरमच्छ से भरी चंद्रलोही आई</title>
                                    <description><![CDATA[हाल ही में बुजुर्ग पर हमला कर चबा दिया था हाथ।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/on-one-side-there-was-a-well-and-on-the/article-95848"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/257rtrer-(4)5.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। एक तरफ कुआ तो दूसरी तरफ खाई...यह कहावत इन दिनों चंद्रलोही नदी के किनारों पर बसी कॉलोनियों के बाशिंदों पर चरितार्थ हो रही है। नदी के एक तरफ आबादी क्षेत्र हैं तो दूसरी तरफ खेत हैं और बीच से मगरमच्छों से भरी चंद्रलोही है। नदी किनारे सुरक्षा दीवार या फेंसिंग नहीं होने से मगरमच्छ खेतों व कॉलोनियों में घुसकर लोगों पर हमले कर रहे हैं। इससे इंसान व वन्यजीवों के बीच टकराव होने से संघर्ष बढ़ गया। हाल ही में बुजुर्ग पर हुए मगरमच्छ के हमले के बाद भी वन विभाग नहीं चेता। दरअसल, सुरक्षा दीवार के अभाव में मगरमच्छ खेतों में पहुंच जाते हैं। पूर्व में धोरों पर फसल धोते समय मगरमच्छ एक किसान पर जानलेवा हमला कर चुका है। इसके बावजूद विभाग न तो लोगों की जिंदगी और न ही वन्यजीव के संरक्षण के प्रति गंभीर है। </p>
<p><strong>सर्दी आते ही किनारों पर डेरा</strong><br />नेचर प्रमोटर जैदी ने बताया कि सर्दी आने के साथ ही ये किनारे पर आ जाते हैं। हाथीखेड़ा, मानसगांव  में एक साथ 10 से 12 मगरमच्छों का झुंड देखा जा सकता है। नदी के बीच-बीच में जहां पानी सूख जाता है, वहीं आकर बैठ जाते हैं। दिनभर धूप सेकते हैं। कई बार तो ये बस्ती की ओर भी रुख कर लेते हैं। </p>
<p><strong>श्रद्धालुओं पर हमले का रहता खतरा</strong><br />वन्यजीव प्रेमी शेख जुनैद ने बताया कि चन्द्रलोई नदी मानस गांव के पास चंबल में मिल जाती है, लेकिन इससे पहले करीब 15 से 16 किमी में मगरमच्छों की तादात काफी ज्यादा है। रायपुरा, राजपुरा, देवलीअरब, जग्गनाथपुरा, बोरखंडी हाथीखेड़ा, अर्जुनपुरा में इन्हें बड़ी तादाद में देखा जा सकता है। हालांकि यहां मगरमच्छों की गिनती कभी नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि चन्द्रेसल गांव में प्राचीन मठ है,जिसमें शिव मंदिर है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। जबकि, मठ के पास नदी किनारों पर  मगरमच्छों का मूवमेंट बना रहता है। ऐसे में श्रद्धालुओं पर हमले का खतरा बना रहता है। </p>
<p><strong>हर साल 80 से ज्यादा मगरमच्छों का रेस्क्यू</strong><br />वन विभाग के रेस्क्यू टीम के सदस्य वीरेंद्र सिंह बताते हैं, साल में करीब 70 से 80 मगरमच्छों का आबादी क्षेत्रों से रेस्क्यू किया जाता है। शहर के विभिन्न रिहायशी इलाकों में आए दिन मगरमच्छ के आने के मामले सामने आ रहे हैं। एक ही दिन में बोरखेड़ा व स्टेशन क्षेत्र के भदाना इलाके में तीन-तीन मगरमच्छों का रेस्क्यू किया गया। बोरखेड़ा क्षेत्र में तो आए दिन कॉलोनियों में मगरमच्छों की मौजूदगी बनी रहती है।  </p>
<p><strong>चंद्रलोही किनारे बसे इन गांवों को खतरा </strong><br />ग्रामीण दीनदयाल शर्मा, पंकज गौतम ने बताया कि चंद्रलोही केबल नगर के उपरी क्षेत्र मंदिरगढ़ से शुरू हो रही है। नदी के दोनों किनारों पर कई गांव बसे हैं। जिनमें काला तलाब, खेडली पांड्या, मांदलिया, केबल नगर, मवासा, जामपुरा, नगपुरा, भीमपुरा, कैथून, संजय नगर, चैनपुरा, जालीखेड़ा, आरामपुरा, खेड़ारसूलपुर, भोजपुरा, रामराजपुरा, अर्जुनपुरा, बोरखंडी, हाथीखेड़ा, जगदीशपुरा व मानसगांव होते हुए चंबल नदी में मिल जाती है। तार फेंसिंग नहीं होने से इन इलाकों में हर पल अनहोनी का डर सताता है।  </p>
<p><strong>सैंकड़ों मगरमच्छ से भरी चंद्रलोही  </strong><br />चंद्रलोही की कोख में सैंकड़ों मगरमच्छ पनप रहे हैं, जो जगह-जगह पानी के बीच चट्टानों पर झुंड के रूप में धूप सेंकते नजर आ रहे हैं। नदी में 5 से 12 फीट लंबे मगरमच्छ मौजूद हैं। जिनसे अनहोनी का डर बना रहता है। क्योंकि, नदी किनारे खेती-बाड़ी है, जहां काम करने वाले किसानों को हादसे का डर सताता है। क्षेत्रवासियों ने पूर्व में भी नदी किनारों पर तार फेंसिंग करवाने की मांग की थी लेकिन प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया। पूर्व में कई हादसे भी हो चुके हैं। </p>
<p><strong>खेतों में जाने से लगता डर </strong><br />नदी के आसपास बसे क्षेत्रवासियो में मगरमच्छों का खौफ है। किसान खेतों में जाने से डरते हैं। लोगों ने नदी में नहाना व सब्जियां धोना भी बंद कर दिया है।  हाल ही में हुई घटना के अलावा पूर्व में भी मगरमच्छ के हमले की कई जानलेवा घटनाएं  हो चुकी हैं। इसके बावजूद विभाग द्वारा सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए गए। जिम्मेदारों की लापरवाही से मगरमच्छ व इंसानों के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो रही है।</p>
<p><strong>बालक व किसान का पैर खा गया मगरमच्छ</strong><br />नेचर प्रमोटर जैदी ने बताया कि गत वर्षों में एक महिला  नदी के घाट पर कपड़े धो रही थी। उसका बच्चा पास में ही खेल रहा था। इसी दौरान नदी से निकला मगरमच्छ ने बालक पर हमला कर नदी में ले गया। जिससे उसकी मौत हो गई। वहीं, फसल धोते समय किसान का पैर मगरमच्छ खा गया। उसे नदी में खींचने लगा लेकिन किसान ने पेड़ को पकड़ शोर मचाया। आसपास के खेतों में काम कर रहे अन्य किसान मौके पर पहुंचे तो वह नदी में चला गया। लेकिन, किसान का एक पैर पूरा शरीर से अलग हो गया। इसके अलावा मवेशियों को भी शिकार बना चुका है।</p>
<p>- नदी व नाले किनारे चारों तरफ चेन फेंसिंग कर इंसान व वन्यजीवों के बीच टकराव रोका जाए।  <br />- वन विभाग को लोगों के बीच जागरूकता फैलानी चाहिए। <br />- शहर में ज्यादा से ज्यादा हेल्पलाइन नम्बर बांटना चाहिए। <br />- एक से ज्यादा क्रोकोडाइल रेस्क्यू टीम बनाई जाए। <br />- वन्यजीव विभाग रेस्क्यू के दौरान मगरमच्छों पर टेगिंग जरूर करवाएं। <br />- नहर व नालों में मृत जीव-जंतु, जानवर, मटन-चिकन के अवशेष व खाद्य सामग्री न फेंकी जाएं। <br />- जब मगरमच्छों को भोजन नहीं मिलेगा तो वह आबादी क्षेत्रों से सटे नहर-नालों में नहीं आएंगे। <br />- इनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखा जाए। <br />- रायपुरा नाले से मगरमच्छों को सावनभादो डेम में शिफ्ट किया जाए। <br />- इनके संरक्षण व भोजन की नियमित व्यवस्था हो। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />शहरी सीमा में चंद्रेसल नदी किनारे चैन फेंसिंग के प्रस्ताव भेजे गए हैं, हालांकि स्वीकृति नहीं मिली है। लोगों को जागरूक करने के लिए नदी किनारे संकेतक व चेतावनी बोर्ड लगवाए जाएंगे। <br /><strong>- अपूर्व कृष्ण श्रीवास्तव, उप वन संरक्षक, कोटा वन मंडल  </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 Nov 2024 16:48:48 +0530</pubDate>
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                <title>मगरमच्छों से आंख मिलाने का रोमांच दे सकता है केएसटी</title>
                                    <description><![CDATA[किशोर सागर में बड़ी संख्या में मगरमच्छ मौजूद हैं। सर्दियों में मगरमच्छ धूप सेकने के लिए बड़ी संख्या में पानी से बाहर आते हैं। सुरक्षित दूरी होने के चलते लोग इन्हें देखकर रोमांचित हो उठते हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/kst-can-give-the-thrill-of-eye-contact-with-crocodiles/article-40433"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-03/kst-magrmacho-ke-sath-ankhon-ke-sampark-ka-romanch-de-sakata-hai...kota-news-21-03-2023.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहर का हृदय स्थल किशोर सागर दिनोंदिन जवां होता जा रहा है। अपनी खूबसूरती से पर्यटकों को आनंदित कर रहा है, साथ ही जलीय जीवों और पक्षियों के लिए संरक्षण स्थली बना है। अपने फैलाव और सौन्दर्य से आकर्षण का केंद्र बन चुका केएसटी  रोमांच का नया व्यू पाइंट बन सकता है। यहां पक्षियों व मगरमच्छों के लिए आईलैंड विकसित करने की जरूरत है। दरअसल, तालाब में आईलैंड नहीं होने से मगरमच्छों को पानी से बाहर आने की कोई ठौर नहीं है। ऐसे में वे छतरियों व नहर की दीवारों पर ही धूप सेंकते नजर आते हैं। यदि, यूआईटी द्वारा यहां आईलैंड विकसित कर दिया जाए तो पर्यटन की दृष्टि से बड़ा कदम साबित हो सकता है। </p>
<p><strong>इन जगहों पर बनाया जा सकता है आईलैंड</strong><br /> किशोर सागर तालाब में कम से कम दो आईलैंड विकसित किए जाने की जरूरत है। इसके लिए प्रशासन को कम गहराई वाले स्थान सरोवर टॉकीज व न्यू क्लॉथ मार्केट के सामने वाली जगह चिन्हित कर टापू बनाने के सुझाव दिए थे। यहां पेड़ भी हैं, जहां परिदे अपना आशियाना बनाते हैं और दलदली जगह होने से भोजन की उपलब्धता भी रहती है। वहीं, स्थाई ठौर मिलने से पक्षियों की अठखेलियों के बीच मगरमच्छों की काया पर्यटकों को डर और रोमांच का अनुभव कराएगी। साथ ही किशोर सागर के पर्यटन को नई दिशा मिलेगी।  </p>
<p><strong>रंग-बिरंगे पक्षी भी बन रहे आकर्षण </strong><br />जैदी बताते हैं, इन दिनों तालाब में रंग बिरंगे, मनमोहक प्रवासी व अप्रवासी विभिन्न प्रजातियों के करीब 4 हजार पक्षियों की मौजूदगी लोगों को आकर्षित करती है।  सर्दियों में इनका आना शुरू होता है और तापमान में वृद्धि के साथ ही ये मार्च तक पलायन कर जाते हैं। यदि, आईलैंड विकसित किए जाए तो स्थाई रूप से यहां बस सकते हैं। </p>
<p><strong>झलक पाने को थम जाता ट्रैफिक </strong><br />किशोर सागर में बड़ी संख्या में मगरमच्छ मौजूद हैं। सर्दियों में मगरमच्छ धूप सेकने के लिए बड़ी संख्या में पानी से बाहर आते हैं। सुरक्षित दूरी होने के चलते लोग इन्हें देखकर रोमांचित हो उठते हैं। गुनगुनी धूप का आंनद लेने के लिए ये बाहर निकलते हैं और थोड़ी भी हलचल हो तो तुरंत पानी में चले जाते हैं।  सप्ताह भर से पांच से छह मगरमच्छ किशोर सागर व नहर के बीच बनी दीवार व छतरियों में नजर आ रहे हैं।</p>
<p><strong>देशी-विदेशी पक्षियों का गूंजता है कलरव</strong><br />किशोर सागर में ब्लेक काइट बड़ी तादाद में हैं। हालांकि, कॉम्ब डक की संख्या कम हो गई है।  पहले इनकी संख्या एक हजार के करीब थी। यहां रुडी शेल्डक, कॉमन पोचर्ड, कॉमन टिल, लिटिल ग्रीव, कॉमन कूट, कॉटन टिल, रेड क्रस्टेड पोचर्ड, ब्लेक हैडेड सीगर, लेसर सीगल, रिवर्टन समेत अन्य पक्षियों का जमावड़ा है। वहीं लिटिल कॉरमोरेंट, लार्ज कॉरमोरेंट, इग्रेट्स, पौंड हरोन, ग्रे हैरोन, लेसर विसलिंग टिल, किंग फिशर, परपल मूरहेन, इंडियन मूरहेन की भी मौजूदगी है।</p>
<p><strong>न ठौर है न ठिकाना</strong><br />किशोर सागर में अनगिनत मगरमच्छ हैं। इनकी संख्या का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। तालाब में 5 से 12 फीट तक के मगरमच्छों की मौजूदगी रहती है। अभेड़ा की तर्ज पर यहां भी आईलैंड विकसित किया जाना चाहिए। ताकि, ये पानी से बाहर निकले तो इन्हें बैठने के लिए जगह नसीब हो सके। विगत वर्षों में सौंदर्यीकरण कार्यों के दौरान भी यूआईटी अधिकारियों के समक्ष मामला उठाया था लेकिन सुनवाई नहीं हुई। ऐसे में मगरमच्छों को धूप सेंकने के लिए नहर की दीवारों व तालाब में बनी छतरियों को ही अपनी ठौर बनानी पड़ती है।  <br /><strong>-एएच जैदी, नेचर प्रमोटर </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Mar 2023 14:37:01 +0530</pubDate>
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                <title>असर खबर का - चन्द्रलोई नदी में मगरमच्छों  के मामले में डीएफओ से मांगा जवाब</title>
                                    <description><![CDATA[रायपुरा के गंदे नाले में कैमिकल युक्त पानी में उनके शरीर का रंग सफेद हो गया। शेडयूल-1 का एनीमल होने के बावजूद वन विभाग इनके संरक्षण के प्रति गंभीर नहीं है। बेकद्री का शिकार हो रहे मगरमच्छों के हालात को लेकर दैनिक नवज्योति ने 6 जनवरी को खबर प्रकाशिक कर विभाग का ध्यान आकर्षित किया था।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/asar-khabar-ka---answer-sought-from-dfo-in-case-of-crocodiles-in-chandraloi-river/article-35637"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-01/asar-khaber-ka--chandrloi-nadi-mei-magarmachcho-k-maamle-mai-dfo-se-maanga-jawab...kota-news..24.1.2023.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। चन्द्रलोई नदी में मगरमच्छों  को लेकर पेश एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए  स्थाई लोक अदालत ने सोमवार को जिला वन अधिकारी वन मंडल कोटा को नोटिस जारी कर 15 फरवरी 2023 तक जवाब तलब किया है। मामले में एडवोकेट लोकेश कुमार सैनी ने न्यायालय में एक जनहित याचिका पेश की थी।  जिसमें बताया  था कि चंद लोई नदी में अनेक मगरमच्छ हैं, जो कि यहां आने वाले पर्यटकों एवं स्थानीय लोगों को रोमांचित भी करते हैं और भय  में भी डालते हैं। कोटा शहर में आबादी के बीच निकले नदी नालों में सैकड़ों मगरमच्छ पल रहे हैं शेड्यूल एक  एनिमल होने के बावजूद इसके संरक्षण के प्रति जिला वन अधिकारी गंभीर नहीं हैं। कहीं केमिकल युक्त गंदे नाले में तो कहीं प्रदूषित होती नालियों में इनकी दुर्दशा हो रही है।  जबकि नदी नालों के आसपास वन विभाग की बेश कीमती जमीन है, जिस पर अतिक्रमण हो रहा है। जल जंगल जमीन बचाने के लिए नदी के किनारे क्रोकोडाइल पॉइंट विकसित किया जाना अति आवश्यक है। याचिका में बताया गया कि चंद्र लोई नदी मानस गांव के पास चंबल नदी में मिलती है जबकि इसमें पहले करीब 15 -16 किलोमीटर में मगरमच्छों की संख्या ज्यादा होती है।  रायपुरा, देवली अरब, राजपुरा, जगन्नाथपुरा , बोरखंडी हाथी खेड़ा, अर्जुनपुरा में यह बड़ी संख्या में मिलते हैं । इस  क्षेत्र में मगरमच्छों की गिनती कभी नहीं हुई है।  चंद्रसेल गांव में प्राचीन मठ है इसमें शिव मंदिर है, जहां पर नदी किनारे इन्हें देखा जा सकता है। हर वर्ष वन विभाग की  रेस्क्यू टीम द्वारा मगरमच्छों का आबादी क्षेत्रों से रेस्क्यू किया जाता है।   </p>
<p><strong>लोगों ने नदी में नहाना छोड़ा</strong> <br />नदी के आसपास बसे क्षेत्र के निवासियों में इनका डर रहता है लोगों ने नदी में नहाना एवं सब्जियां धोना भी बंद कर दिया है। नदी में पानी पीने के लिए आने वाले मवेशियों को भी यह मगरमच्छ शिकार बना लेते हैं । 45 किलोमीटर लंबी चंदलोई नदी में सैकड़ों मगरमच्छ हैं, जो जगह-जगह पानी के बीच चट्टानों पर झुंड के रूप में धूप सेकते नजर आ रहे हैं,  जिन्हें देखकर पर्यटक और स्थानीय निवासी रोमांचित होते हैं उन्हें अनहोनी का भयभीत भी रहता है। नदी किनारे खेतीवाड़ी है जहां पर किसानों को हादसे का डर लगा रहता है।  चंद्रलोई नदी किशोर सागर तालाब रायपुरा नाले में बड़ी संख्या में मगरमच्छ हैं। यहां भी भैंस रोड गढ़ अभयारण्य की तर्ज पर क्रोकोडाइल पॉइंट विकसित किया जाना जनहित में अत्यावश्यक है।  जिससे पर्यटकों को बढ़ावा मिलेगा और इसका संरक्षण भी होगा, साथ ही आबादी क्षेत्र में इनके आने की घटनाओं से भी निजात मिलेगी। क्रोकोडाइल डेस्टीनेशन बनाने से शहर की में पर्यटकों का भी रुझान बढ़ेगा।    वन विभाग की भी आय बढ़ेगी।इसके दोनों किनारों पर कई गांव बसे हैं नदी के किनारे पर तार फेसिंग नहीं होने से लोगों में इनका डर रहता है। डीएफओ की अनदेखी के कारण यह समस्याएं सामने आ रही है इस मामले में सुनवाई करते हुए न्यायालय ने डीएफओ को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। </p>
<p><strong>नवज्योति ने उठाया था मामला</strong><br />चन्द्रलोई नदी मगरमच्छों के लिए वरदान साबित हो रही है। यहां अनगिनत मगरमच्छ हैं, जिनकी संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। शहर में आबादी के बीच गुजरते नदी-नालों में सैंकड़ों मगरमच्छ पल रहे हैं। वहीं, रायपुरा के गंदे नाले में कैमिकल युक्त पानी में उनके शरीर का रंग सफेद हो गया। शेडयूल-1 का एनीमल होने के बावजूद वन विभाग इनके संरक्षण के प्रति गंभीर नहीं है। बेकद्री का शिकार हो रहे मगरमच्छों के हालात को लेकर दैनिक नवज्योति ने 6 जनवरी को खबर प्रकाशिक कर विभाग का ध्यान आकर्षित किया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Jan 2023 15:04:06 +0530</pubDate>
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                <title>डर और रोमांच से भरी चंद्रलोही, कोटा में बने क्रोकोडाइल पॉइंट </title>
                                    <description><![CDATA[45 किलोमीटर लंबी चंद्रलोही नदी की कोख में सैंकड़ों मगरमच्छ पनप रहे हैं, भैंसरोडगढ़ सैंचुरी की तर्ज पर शहर में भी क्रोकोडाइल डेस्टीनेशन बनाया जाना चाहिए। जिससे पयर्टन को बढ़ावा मिलेगा। वहीं, मगरमच्छों का संरक्षण हो सकेगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/chandralohi-full-of-fear-and-thrill--crocodile-point-made-in-kota/article-34301"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-01/dar-aur-romanch-se-bhari-chandraloi,-kota-mei-bane-crocodile-point-kota-news-6.1.2023.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। चन्द्रलोई मगरमच्छों के लिए वरदान साबित हो रही है। नदी में अनगिनत मगरमच्छ हैं, जिनकी संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। भारी भरकम मगरमच्छ यहां आने वाले पर्यटक व स्थानीय बाशिंदों को रोमांचित करते हैं तो भय में भी डाल देते हैं। शहर में आबादी के बीच गुजरते नदी-नालों में सैंकड़ों मगरमच्छ पल रहे हैं। शेडयूल-1 का एनीमल होने के बावजूद इनके संरक्षण के प्रति वन विभाग गंभीर नहीं है। हालात यह हैं, कहीं कैमिकल युक्त गंदे नालों में तो कहीं प्रदूषित होती नदियों में पानी का सुल्तान बेकद्री का शिकार है। जबकि, नदी-नालों के आसपास वनविभाग की बेशकीमती जमीन हैं, जो यूं ही अतिक्रमण की भेंट चढ़ रही हैं। जल-जंगल, जमीन बचानी हैं तो नदी किनारे क्रोकाडाइल प्वाइंट विकसित करना ही होगा।  दरअसल, भैंसरोडगढ़ सैंचुरी की तर्ज पर शहर में भी क्रोकोडाइल डेस्टीनेशन बनाया जाना चाहिए। इसके दो बड़े फायदे होंगे। जल-जंगल जमीन सुरक्षित रहेगी वहीं, पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। भैंसरोड़गढ़ को प्रतिवर्ष पर्यटकों से लाखों की आमदनी होती है।  </p>
<p><strong>16 किमी क्षेत्र में मगरमच्छों की संख्या अधिक </strong><br />वन्यजीव प्रेमी शेख जुनैद ने बताया कि चन्द्रलोई नदी मानस गांव के पास चंबल में मिल जाती है, लेकिन इससे पहले करीब 15 से 16 किलोमीटर में मगरमच्छों की काफी संख्या है। रायपुरा, देवलीअरब, राजपुरा, जग्गनाथपुरा, बोरखंडी हाथीखेड़ा, अर्जुनपुरा में इन्हें बड़ी तादाद में देखा जा सकता है। हालांकि क्षेत्र में मगरमच्छों की गिनती कभी नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि चन्द्रेसल गांव में प्राचीन मठ है। इसमें शिव मंदिर है। इस मठ के पास चन्द्रलोई नदी नदी के किनारों में इन्हें आए दिन सुस्ताते देखा जा सकता है। लगता है जैसे मगरमच्छों ने भगवान शिव की शरण में अपना डेरा डाल लिया है। वन्यजीवों की प्रथम श्रेणी का प्राणी होने के बावजूद वन विभाग मगरमच्छों की ओर ध्यान नहीं दे रहा। </p>
<p><strong>भैंसरोडगढ़ की प्रतिवर्ष कमाई 6 लाख</strong><br />भैंसरोडगढ़ अभ्यारणय में क्रोकोडाइट प्वाइंट 195 स्वायर किमी में फैला हुआ है। जिसे देखने के लिए यहां प्रतिवर्ष 6 हजार पर्यटक आते हैं, जिनसे करीब 6 लाख रूपए की आय होती है। रेंजर दिनेश नाथ ने बताया कि सैंचुरी में प्रवेश के लिए 85 रुपए का टिकट है। जिनमें स्टूडेंट्स से 40 तथा विदेशी पर्यटकों से 450 रुपए वसूले जाते हैं। इसके अलावा कार के 305, बाइक के 55, तीन पहिया वाहनों के 300 तथा बस लेकर सैंचुरी में घुमने का किराया 450 रुपए है। यहां चंबल नदी का विहंग्म नजारा और मगरमच्छों का झुंड देख सैलानी रोमांचित हो उठते हैं। ऐसा ही क्रोकोडाइल प्वाइंट कोटा शहर में भी बनाया जाना चाहिए। </p>
<p><strong>वो प्वाइंट जहां सालभर रहता है पानी </strong><br />चंद्रलोही नदी के कुछ ऐसे प्वाइंट हैं, जहां पूरे वर्ष पानी भरा रहने के कारण मगरमच्छों का जमावड़ा लगा रहता है। जिसमें देवलीअरब, राजपुरा, अर्जुनपुरा, चंद्रसेल, बोरखंडी, हाथीखेड़ा, धाकड़खेड़ी एनिकट, मानसगांव शामिल हैं। </p>
<p><strong>सर्दी आते ही किनारों पर डेरा</strong><br />नेचर प्रमोटर जैदी ने बताया कि सर्दी आने के साथ ही ये किनारे पर आ जाते हैं दिनभर धूप का आनंद लेते रहते हैं। हाथीखेड़ा, मानसगांव  में एक साथ 10 से 12 मगरमच्छों का झुंड देखा जा सकता है।<br />नदी के बीच-बीच में जहां पानी सूख जाता है, वहीं बीच में आकर बैठ जाते हैं। दिनभर धूप सेकते हैं। कई बार तो ये बस्ती की ओर भी रुख कर लेते हैं। ये चतुर भी इतने हैं कि जरा सी आहट होते ही तेजी से पानी में छलांग लगा लेते हैं।</p>
<p><strong>इनका खौफ भी गहरा</strong><br />नदी के आसपास बसे क्षेत्र के वासियों में मगरमच्छों का खौफ है। लोगों ने नदी में नहाना व सब्जियां धोना भी बंद कर दिया है। कब कहां किसे मगरमच्छ अपने जबड़े में जकड़ ले। क्षेत्रवासियों के अनुसार कई बार इस तरह की घटनाएं पहले भी हो चुकी है। कुछ साल पहले एक बालक को मगरमच्छ ने शिकार बना लिया था। नदी में पानी पीने के लिए आने वाले मवेशियों को भी ये शिकार बना लेते हैं।</p>
<p><strong>चंद्रलोही की कोख में पल रहे सैंकड़ों मगरमच्छ</strong><br />45 किलोमीटर लंबी चंद्रलोही नदी की कोख में सैंकड़ों मगरमच्छ पनप रहे हैं, जो जगह-जगह पानी के बीच चटटानों पर झुंड के रूप में धूप सेंकते नजर आ रहे हैं। जिन्हें देखकर पर्यटक व स्थानीय बाशिंदे रोमांचित हो रहे हैं तो वहीं अनहोनी से भयभीत भी रहते हैं। नदी किनारे खेती-बाड़ी है, जहां काम करने वाले किसानों को हादसे का डर सताता है। क्षेत्रवासियों ने पूर्व में भी नदी किनारों पर तार फेंसिंग करवाने की मांग की थी लेकिन प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया। पूर्व में कई हादसे भी हो चुके हैं। </p>
<p><strong>भैंसरोडगढ़ की तर्ज पर हो काम</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि शहर में आबादी के बीच से गुजर रही चंद्रलोही नदी, किशोर सागर तालाब व रायपुरा नाले में बड़ी तादाद में मगरमच्छ हैं। यहां भैंसरोडगढ़ अभयाण्य की तर्ज पर क्रोकोडाइल प्वाइंट विकसित किया जाना चाहिए। जिससे पयर्टन को बढ़ावा मिलेगा। वहीं, मगरमच्छों का संरक्षण हो सकेगा। साथ ही रिहायशी इलाकों में मगरमच्छ आने की घटनाओं से भी निजात मिल सकेगी। वहीं, क्रोकोडाइल डेस्टीनेशन बनने से शहर में पर्यटकों का रुझान बढ़ेगा। जिससे वन विभाग को अच्छी-खासी आमदनी भी होगी।  </p>
<p><strong>चंद्रलोही किनारे बसे ये गांव</strong> <br />ग्रामीण दीन दयाल शर्मा ने बताया कि चंद्रलोही नदी केबल नगर के उपरी क्षेत्र मंदिरगढ़ से शुरू हो रही है। नदी के दोनों किनारों पर कई गांव बसे हैं। जिनमें मांदलिया, केबल नगर, मवासा, जामपुरा, नगपुरा, भीमपुरा, कैथून, संजय नगर, चैनपुरा, जालीखेड़ा, आरामपुरा, खेड़ारसूलपुर, भोजपुरा, रामराजपुरा, अर्जुनपुरा, बोरखंडी, हाथीखेड़ा, जगदीशपुरा व मानसगांव होते हुए चंबल नदी में मिल जाती है। नदी के किनारों पर तार फेंसिंग नहीं होने से इन इलाकों के बाशिंदों को अनहोनी का डर सताता है।  </p>
<p><strong>जालियां लगाकर करें सुरक्षित, क्रोकोडाइल पॉंइंट बने</strong><br />जैदी बताते हैं कि इन मगरमच्छों व नदी के संरक्षण को लेकर सरकार को ठोस योजना बनानी चाहिए। नदी के घाट पर किनारों से कुछ दूरी पर फैंसिग कर दी जाए तो यह सुरक्षित रह सकते हैं और ग्रामीणों का भय भी दूर हो सकता है। पूर्व में इन मगरमच्छों को रेस्क्यू करने की बात भी सामने आई थी, 25 वर्षों में इनकी संख्या कई गुना बढ़ गई है। सरकार घाट व मवेशियों के पानी पीने के स्थानों को चिन्हित कर फेंसिंग की व्यवस्था करे। नदी किनारे प्राचीन चन्द्रेसल मठ है। यह पुरातत्व की दृष्टि से भी काफी महत्व रखता है। यहां काफी पर्यटक आते हैं, इसे देखते हुए क्षेत्र में क्रोकोडाइल पाइंट विकसित कर दिया जाए तो सोने पे सुहागा होगा।  </p>
<p><strong>हर साल 90 से ज्यादा मगरमच्छों का रेस्क्यू</strong><br />वन विभाग के रेस्क्यू टीम के सदस्य धर्मेंद्र सिंह ने बताया कि साल करीब 90 से ज्यादा मगरमच्छों का आबादी क्षेत्रों से रेस्क्यू किया जाता है। पिछले साल की बात करें तो 85 से ज्यादा मगरमच्छों का रेस्क्यू कर चुके हैं। शहर के विभिन्न रिहायशी इलाकों में आए दिन मगरमच्छ के आने के मामले सामने आ रहे हैं। गत वर्ष नवम्बर माह में बोरखेड़ा व स्टेशन क्षेत्र के भदाना इलाके में तीन-तीन मगरमच्छों का रेस्क्यू किया गया। बोरखेड़ा क्षेत्र में तो आए दिन कॉलोनियों में मगरमच्छों की मौजूदगी बनी रहती है। रेस्क्यू टीम मगरमच्छों को पकड़ सावनभादौं डेम में छोड़ती है। </p>
<p><strong>वन्यजीव प्रेमियों ने दिए सुझाव </strong><br />- नाले किनारे चारों तरफ तार फेंसिंग कर दी जाए। <br />- वन विभाग को लोगों के बीच ज्यादा से ज्यादा जागरूकता फैलानी चाहिए, ज्यादा से ज्यादा हेल्पलाइन नम्बर बांटना चाहिए। <br />- एक से ज्यादा क्रोकोडाइल रेस्क्यू टीम बनाई जाए। <br />- वन्यजीव विभाग रेस्क्यू के दौरान मगरमच्छों पर टेगिंग जरूर करवाएं। <br />- नहर व नालों में मृत जीव-जंतु, जानवर, मटन-चिकन के अवशेष व खाद्य सामग्री न फेकें। <br />- जब मगरमच्छों को भोजन नहीं मिलेगा तो वह आबादी क्षेत्रों से सटे नहर-नालों में नहीं आएंगे। <br /> <br /><strong>मगरमच्छ को मारने पर 7 साल की सजा</strong><br />बायोलॉजिकल पार्क के फोरेस्टर बुद्धराम जाट ने बताया कि मगरमच्छ शेड्यूल-1 श्रेणी का वन्यजीव है। इसे नुकसान पहुंचाने या मारने पर गैर जमानती 7 साल की सजा का प्रावधान है। जबकि, जुर्माने का प्रावधान नहीं है। कई बार आबादी क्षेत्र में घुस जाने के दौरान लोग मगरमच्छ पर पत्थरों से हमला कर देते हैं।</p>
<p><strong>पर्यटकों के लिए व्यू प्वाइंट विकसित करेंगे</strong><br />शहर के सभी नदी-नाले चंबल से जुड़े हैं, जहां हर जगह मगरमच्छ की मौजूदगी है। क्रोकोडाइल प्वाइंट बनाने के लिए ऐसी जगहों का चयन किया जाता है, जहां सालभर पानी भरा रहता हो। चंद्रलोही नदी व रायपुरा नाले से जुड़ी ऐसी ही जगहों को चिन्हित कर रहे हैं। इसी दिशा में देवलीअरब नाले को चिन्हित किया है। जल्द ही यहां क्रोकोडाइल प्वाइंट विकसित किया जाएगा। नाले के चारों ओर तार फेंसिंग  कर पर्यटकों के लिए व्यू प्वाइंट विकसित करेंगे। बजट के लिए सरकार को प्रस्ताव बनाकर भेज दिए हैं। बजट आते ही कार्य शुरू कर दिया जाएगा। <br /><strong>-जयराम पांड्य, डीएफओ वन मंडल कोटा</strong> </p>
<p><strong>रायपुरा से देवली अरब तक हो फेंसिंग</strong><br />चंद्रलोही नदी करीब 45 किमी लंबी है और मानसगांव के पास चंबल में मिल जाती है। चंद्रलोही में बड़ी संख्या में मगरमच्छ हैं। वन विभाग को यहां क्रोकोडाइल प्वाइंट बनाकर पर्यटन विकसित करना चाहिए। जिससे वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास सुरक्षित रहेगा। वहीं, बेशकीमती वनभूमि अतिक्रमण से मुक्त रहेगी। वहीं, रायपुरा नाले में पूरे साल पानी भरा रहता है, इसलिए यहां बड़ी तादाद में मगरमच्छ रहते हैं। ऐसे में रायपुरा से देवलीअरब तक फेंसिंग कर क्रोकोडाइल प्वाइंट बनाना चाहिए। <br /><strong>-डॉ. कृष्नेंद्र सिंह नामा, बायोलॉजिस्ट एवं रिसर्च सुपरवाइजर</strong></p>
<p><strong>पानी का ट्रीटमेंट जरूरी</strong><br />शहर  में क्रोकोडाइल प्वाइंट बनना ही चाहिए। लेकिन, उससे पहले नदी-नालों के पानी का ट्रीटमेंट करना जरूरी है। रायपुरा नाले में फैक्ट्रियों का कैमिकलयुक्त पानी  का प्रवाह होता है और यह पानी देवलीअरब होते हुए चंद्रलोही में मिलता है। जिससे नदी-नालों का पानी दूषित हो रहा है। इसमें रहने वाले मगरमच्छों का जीवन काल घट जाता है। इसके अलावा प्रजन्न क्षमता खत्म हो सकती है। साथ ही कई विकार पैदा हो सकते हैं। <br /><strong>-हरिमोहन मीणा, चंबल विशेषज्ञ, सवाईमाधोपुर </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Jan 2023 15:07:58 +0530</pubDate>
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                <title>मगरमच्छों का अड्डा बना रायपुरा का गंदा नाला</title>
                                    <description><![CDATA[ रायपुरा का नाला करीब 2 किमी लंबा और 20 फीट चौड़ा है। इसमें करीब पांच दर्जन से अधिक मगरमच्छों का बसेरा है। मगरमच्छों का आबादी क्षेत्रों में आने का प्रमुख कारण इनका प्राकृतिक आवास नष्ट होना और उसमें भोजन की कमी भी है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-dirty-drain-of-raipura-became-a-haven-for-crocodiles/article-28508"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-11/magarmaccho-ka-adda-ban-rah.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा।  नगर निगम क्षेत्र में बसे रायपुरा व देवलीअरब के बाशिंदे डर के साय में जीवन बिता रहे हैं। रायपुर का नाला मगर मच्छों का अडडा बन चुका है। यह करीब डेढ़ से दो किमी लंबा और 20 फीट चौड़ा है। इसमें 5 दर्जन से अधिक मगरमच्छों का बसेरा है, जिनकी लंबाई 3 से 15 फीट तक है। नाले से 100 फीट की दूरी पर ही आबादी क्षेत्र है। कई बार मगरमच्छ नाले से निकलकर आबादी क्षेत्र में घुस जाते हैं। वहीं, नाले के किनारे बाड़ियां व खेत हैं, जहां किसान व माली समाज के लोग सब्जियों की खेती करते हैं। सुरक्षा दीवार के अभाव में मगरमच्छ खेतों में पहुंच जाते हैं। किसानों को हर पल हमले का खतरा सताता है। स्थानीय बाशिंदों व वन्यजीव प्रेमियों ने वन्यजीव विभाग व प्रशासन को लिखित में शिकायत देकर मगरमच्छों को अन्य जगह शिफ्ट करने की गुहार लगाई लेकिन किसी ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया। पूर्व में धोरों पर फसल धोते समय मगरमच्छ एक किसान पर जानलेवा हमला कर चुका है। इसके बावजूद वन विभाग न तो क्षेत्रवासियों की जिंदगी और न ही वन्यजीव के संरक्षण के प्रति गंभीर है। </p>
<p><strong>गंदगी से अटा नाला, कचरों से गहराई हुई कम</strong><br />स्थानीय निवासी भैरूलाल व पप्पू कुमार ने बताया कि रायपुरा नाले की लंबे समय से सफाई नहीं हुई। वर्तमान में यह गंदगी व कचरे से अटा होने से इसकी गहराई बहुत कम हो गई। फैक्ट्रियों का रसायनयुक्त दूषित पानी भी इसी नाले में प्रवाहित होता है। पॉलिथिन व कचरे का ढेर से उठती दुर्गंध से राहगीरों का यहां से गुजरना तक मुश्किल हो गया है। नाले का गंदा पानी रायपुरा, देवली अरब व राजपुरा होते हुए चंद्रलोही नदी में मिल रहा है। जहां जलीय जीव-जंतुओं के जीवन पर भी खतरा मंडरा रहा है। वहीं, गंदे पानी में अनगिनत मच्छर पनप रहे हैं, जिससे डेंगू, मलेरिया, वायरल सहित अन्य जानलेवा बीमारियों का अंदेशा बना रहता है।  </p>
<p><strong>खतरे के साय में खेती, हर पल जान का खतरा</strong><br />किसान हीरा सुमन व मनमोहन मालव ने बताया कि नाले की एक तरफ जंगलात का वन क्षेत्र है तो दूसरी ओर छोटी-छोटी बाड़ियां व खेत हैं। जहां लोग सब्जियों की खेती करते हैं। सुरक्षा दीवार नहीं होने से मगरमच्छ खेतों में घुस जाते हैं। किसानों का रोजाना खेतों में काम करना होता है। ऐसे में हर पल जान का जोखिम बना रहता है। किसानों को मगरमच्छों से अपना बचाव करने के लिए सर्तक होकर खेतों में कामकाज करना पड़ता है। </p>
<p><strong>जालियां लगाकर करें सुरक्षित, क्रोकोडाइल पांइट बनाएं</strong><br />नेचर प्रोमोटर एएच जैदी बताते हैं कि रायपुरा का नाला करीब 2 किमी लंबा और 20 फीट चौड़ा है। इसमें करीब पांच दर्जन से अधिक मगरमच्छों का बसेरा है। जिनके संरक्षण के लिए वन्यजीव विभाग को ठोस योजना बनानी चाहिए। नाले के किनारों से कुछ दूरी पर फैंसिग कर दी जाए तो यह सुरक्षित रह सकते हैं और ग्रामीणों का भय भी दूर हो सकता है। लेकिन इससे पहले नाले की पूरी तरह से सफाई करवाना जरूरी है ताकि उसकी गहराई अपने मूल स्वरूप में लौट सके। </p>
<p><strong>सर्दी आते ही किनारों पर डेरा</strong><br />सर्दी आने के साथ ही मगरमच्छ किनारे पर आकर दिनभर धूप का आनंद लेते रहते हैं। जैदी बताते हैं कि कुछ दिनों पहले ही नाले किनारे पर 10 से 12 मगरमच्छों का झुंड धूप सेंकते नजर आया था। नाले के बीच-बीच में जहां पानी सूख जाता है, वहीं आकर बैठ जाते हैं। कई बार तो ये बस्ती की ओर भी रुख कर लेते हैं। उन्होंने बताया कि ये चतुर भी इतने हैं कि जरा सी आहट होते ही तेजी से पानी में छलांग लगा लेते हैं।</p>
<p><strong>अब तक 65 से ज्यादा का कर चुके रेस्क्यू</strong><br />वन विभाग के रेस्क्यू टीम के सदस्य धर्मेंद्र सिंह ने बताया कि वन विभाग हर साल करीब 90 से ज्यादा मगरमच्छों का आबादी क्षेत्रों से रेस्क्यू किया जाता है। वहीं, इस साल की बात करें तो अब तक करीब 65 से ज्यादा मगरमच्छों का रेस्क्यू कर चुके हैं। रेस्क्यू के दौरान लोगों की अनावश्यक मौके पर जमा भीड़ परेशान करती है। रेस्क्यू में सहयोग नहीं करते। उन्होंने बताया कि टीम के पास न तो रेस्क्यू वाहन है और न ही साधन-संसाधन उपलब्ध हैं। रस्सियां भी खुद वनकर्मी अपने खर्चे से खरीदते हैं। विभाग को वन्यजीवों के रेस्क्यू के लिए जाल, रस्सियां, वाहन सहित अन्य जरूरी संसाधन उपलब्ध करवाना चाहिए। </p>
<p><strong>मवेशियों व इंसानों पर कर चुका हमला </strong><br />वन्यजीव प्रेमी जुनेद शेख ने बताया कि कुछ वर्षों पहले  रायपुरा नाले के किनारे बाड़ियां में सब्जियों की खेती करने वाले एक किसान पर मगरमच्छ ने जानलेवा हमला कर दिया था। मगरमच्छ ने किसान का पैर जबड़े में दबा लिया था और उसे पानी की ओर खींच रहा था लेकिन किसान ने पेड़ को जोर से पकड़ रखा था। उसके चिल्लाने  की आवाज सुन आसपास के खेतों में काम कर रहे मौके पर पहुंचे तो मगरमच्छ नाले में चला गया। लहुलुहान हालत में किसान को अस्पताल पहुंचाया। वहीं, 20 वर्ष पहले देवली अरब में नाले किनारे एक चबुतरा बना हुआ था। जहां एक महिला अपने बच्चे को बिठाकर कपड़े धो रही थी तभी मगरमच्छ ने बच्चे पर हमला कर दिया था। इसके अलावा मवेशियों व श्वानों को भी शिकार बना चुका है। </p>
<p><strong>वन्यजीव प्रेमियों ने दिए सुझाव </strong><br />    - नाले किनारे चारों तरफ तार फेंसिंग कर दी जाए। <br />    - वन विभाग को लोगों के बीच ज्यादा से ज्यादा जागरूकता फैलानी चाहिए। <br />    - जितने हो सके उसने हेल्पलाइन नम्बर बांटना चाहिए। <br />    - एक से ज्यादा क्रोकोडाइल रेस्क्यू टीम बनाई जाए। <br />    - वन्यजीव विभाग रेस्क्यू के दौरान मगरमच्छों पर टेगिंग जरूर करवाएं। <br />    - नहर व नालों में मृत जीव-जंतु, जानवर, मटन-चिकन के अवशेष व खाद्य सामग्री न फेंकी जाए। <br />    - जब मगरमच्छों को भोजन नहीं मिलेगा तो वह आबादी क्षेत्रों से सटे नहर-नालों में नहीं आएंगे। <br />    - इनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखा जाए। <br />    - नाले से मगरमच्छों को सावनभादो डेम में शिफ्ट कर दिया जाए या फिर नाले की सफाई करवाकर क्रोकोडाइल पाइंट बनाकर विकसित किया जाए। <br />    - इनके संरक्षण व भोजन की नियमित व्यवस्था की जाए। </p>
<p><strong>नालों में कई तरह का मिल रहा भोजन</strong><br />मगरमच्छ मूवमेंट करते रहते हैं। जब बैराज के गेट खोले जाते हैं तो पानी के तेज बहाव के साथ यह नहरों व नालों में आ जाते हैं। वहीं, नदी-नालों में बसे मगरमच्छ तेज बहाव से कम बहाव वाले इलाके में चले जाते हैं। शहर के सभी नाले एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जैसे अंतनपुरा-गोबरिया बावड़ी का नाला विज्ञान नगर, संजय नगर, कंसुआ, डीसीएम, रायपुरा, देवली अरब होते हुए चंद्रलोई नदी से मिल रहा है और यह नदी चंबल से मिल रही है। ऐसे में यह इधर से उधर मूव करते रहते हैं। यही वजह से कि आज तक इनकी ठीक से गिनती नहीं हो पाई। रही बात इनके भोजन की तो नालों में मटन, चिकन, खाद्य सामग्री, मृत जीव-जंतु व मवेशी फेंक दिए जाते हैं, जो इनका भोजन बन रहे हैं। यदि मगरमच्छ भरपेट भोजन कर ले तो फिर उसे कम से कम छह माह तक भोजन की जरूरत नहीं होती। संभवत: मगरमच्छों का आबादी क्षेत्रों में आने का प्रमुख कारण इनका प्राकृतिक आवास नष्ट होना और उसमें भोजन की कमी भी है। इसलिए मगरमच्छों को नदी छोड़कर नालों की ओर आना पड़ रहा है।  <br /><strong>- डॉ. कृष्नेंद्र सिंह नामा, बायोलॉजिस्ट एवं रिसर्च सुपरवाइजर</strong></p>
<p><strong>मगरमच्छ को मारने पर 7 साल की सजा</strong><br />मगरमच्छ शेड्यूल-1 श्रेणी का वन्यजीव है। इसे नुकसान पहुंचाने या मारने पर गैर जमानती 7 साल की सजा का प्रावधान है। जबकि, जुर्माने का कोई प्रावधान नहीं है। कई बार आबादी क्षेत्र में घुस जाने के दौरान लोग मगरमच्छ पर पत्थरों से हमला कर देते हैं। </p>
<p>मगरमच्छ शेड्यूल-1 श्रेणी का वन्यजीव है। इनके प्राकृतिक आवास  से इन्हें कहीं ओर शिफ्ट करने से पहले वन्यजीव विभाग को मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक जयपुर व वाइल्ड लाइफ इंस्टिट्यूड आॅफ इंडिया देहरादून से परमिशन लेनी पड़ती है। हालांकि यह इलाका वन मंडल का है। मौके पर जाकर स्थिति देखने के बाद ही इस बारे में कुछ कहा जा सकता है। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, एसीएफ, वन्यजीव विभाग एवं मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 03 Nov 2022 16:21:14 +0530</pubDate>
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                <title>ये पांच महिलाएं करती हैं सांप, हाइना, मोनिटर लिजार्ड और मगरगच्छ का रेस्क्यू</title>
                                    <description><![CDATA[वन विभाग में कार्यरत प्रदेश की पांच महिलाएं अलग-अलग जिलों में बिना डर के सांपों के रेस्क्यू जैसे चैलेंजिंग काम कर रही हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/these-five-women-rescue-snakes--hyenas--monitor-lizards-and-crocodiles/article-6087"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/011.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। कोबरा सांप का नाम सुनते ही खौफ और डर जेहन में छा जाता है, लेकिन वन विभाग में कार्यरत प्रदेश की पांच महिलाएं अलग-अलग जिलों में बिना डर के सांपों के रेस्क्यू जैसे चैलेंजिंग काम कर रही हैं। ये महिलाएं 60 से 70 फुट गहरें कुएं में जाकर सांपों के साथ हाइना जैसे एनिमल्स को रेस्क्यू करती हैं।<br /><br />वन विभाग में सिरोही में रेस्क्यू इंचार्ज और फोरेस्ट गार्ड के पद पर कार्यरत 38 वर्षीय अंजु चौहान ने साल 2016 में नौकरी ज्वाइन की। वह अब तक अजगर, कोबरा, रसैल वाइपर, कॉमन स्नैक, मगरमच्छ, स्लोथ बियर, नीलगाय, हायना को रेस्क्यू कर चुकी हैं। इनमें सांपों की संख्या तकरीबन 1500 से ज्यादा है। परिवार का सपोर्ट रहता है। बेटा थैलेसिमिया से पीड़ित है, लेकिन रात को भी रेस्क्यू कॉल आने पर निकल जाती हैं।  <br /><br />सीकर में वन रक्षक के पद पर कार्यरत 25 वर्षीय बिमला धाकड़ ने 2016 में नौकरी ज्वाइन की। अब तक वह तकरीबन 30 से अधिक कोबरा सांप, मोनिटर लिजार्ड सहित अन्य प्रजातियों के सांपों का रेस्क्यू कर चुकी हैं। पहले पिताजी मुझे रेस्क्यू देख घबराते थे, लेकिन एक दिन घर में घुसे सांप को रेस्क्यू कर दिखाया तो उनका डर खत्म हो गया। <br /><br />बाड़मेर में वनरक्षक पद पर कार्यरत 27 वर्षीय प्रियंका चौधरी ने अब तक करीब 100 से अधिक विभिन्न प्रजातियों के सांपों का रेस्क्यू किया है। इसमें सबसे ज्यादा कोबरा है। प्रियंका का कहना है कि परिवार और खासकर पति का सपोर्ट रहा। तभी मैं इस चैलेंजिंग कार्य को कर पा रही हूं।<br /><br />जैसलमेर के मोहनगढ़ में सहायक वनपाल के पद पर कार्यरत 29 वर्षीय झमकू ने 2011 में वन विभाग में आई। ट्रेनिंग के बाद विभिन्न प्रजातियों के करीब 50 से अधिक सांपों का रेस्क्यू कर चुकी हैं, जिनमें कोबरा, अजगर आदि शामिल हैं।<br /><br />वन मंडल प्रतापगढ़ में वनपाल के पद पर कार्यरत 27 वर्षीय सोनम कुमारी मीणा कोबरा, रसैल वाइपर सहित तकरीबन 60 प्रजातियों के सांपों को रेस्क्यू कर चुकी हैं। सोनम ने बताया कि पथरीला और चट्टानी इलाका होने के कारण यहां अजगर ज्यादा निकलते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 14 Mar 2022 10:48:12 +0530</pubDate>
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