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                <title>conservation - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>conservation RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>भीषण गर्मी में वन्यजीवों को राहत: झालाना, आमागढ़ और बीड पापड़ में रोज ट्यूबवेल से भर रहे जलस्रोत; वन्यजीव गणना की तैयारियां भी तेज </title>
                                    <description><![CDATA[जयपुर के झालाना, आमागढ़ और बीड पापड़ लेपर्ड रिजर्व में वन्यजीवों के लिए विशेष जल प्रबंधन किया गया है। भीषण गर्मी के बीच 40 से अधिक वाटर प्वाइंट्स को रोजाना ट्यूबवेल से भरा जा रहा है। वन विभाग ने अगले महीने होने वाली वन्यजीव गणना के लिए भी इन जलस्रोतों पर निगरानी तेज कर दी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/relief-to-wildlife-in-the-scorching-heat-water-sources-are/article-151485"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/jhalana.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। तेज गर्मी के बीच वन विभाग ने जंगलों में रहने वाले वन्यजीवों के लिए विशेष इंतजाम शुरू कर दिए हैं। झालाना लेपर्ड रिजर्व, आमागढ़ लेपर्ड रिजर्व और बीड पापड़ लेपर्ड रिजर्व में लेपर्ड, हायना, नीलगाय सहित कई प्रजातियों के लिए बनाए गए वाटर प्वाइंट्स इन दिनों जीवनरेखा बने हुए हैं। वन विभाग की टीम रोजाना ट्यूबवेल के जरिए इन जलस्रोतों को भर रही है, ताकि भीषण गर्मी में वन्यजीवों को पानी की कमी का सामना न करना पड़े। जानकारी के अनुसार झालाना के तीन जोन में करीब 17, आमागढ़ में 11 और बीड पापड़ लेपर्ड रिजर्व में 7 से 8 वाटर प्वाइंट्स बनाए गए हैं।</p>
<p>अधिकारियों का कहना है कि तापमान बढ़ने के साथ जल स्रोतों की नियमित मॉनिटरिंग की जा रही है। इससे वन्यजीवों की आवाजाही भी इन क्षेत्रों में बनी रहती है और उनका स्वास्थ्य बेहतर रहता है। वहीं, अगले महीने प्रस्तावित वन्यजीव गणना को लेकर भी विभाग ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। वाटर प्वाइंट्स के आसपास गतिविधियों पर नजर रखकर आंकड़े जुटाने की योजना बनाई जा रही है, जिससे वन्यजीवों की सटीक संख्या और स्थिति का आकलन किया जा सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 16:51:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विश्व जल दिवस पर विशेष...''बढ़ती मांग, घटते स्रोत, गहराता जल संकट'': डार्क जोन में डूबता प्रदेश, गर्मियों में टैंकर राज और सूखते स्रोत</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान में जल संकट विकराल हो गया है; राज्य के पास देश का मात्र 1.16% सतही जल है। 299 में से केवल 38 ब्लॉक सुरक्षित बचे हैं, जबकि भूजल दोहन 150% तक पहुँच चुका है। 'जल जीवन मिशन' से कनेक्शन तो बढ़े, लेकिन 350 करोड़ लीटर की भारी मांग और घटता जलस्तर भविष्य के लिए बड़ी चुनौती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/special-on-world-water-day-increasing-demand-decreasing-sources-deepening/article-147402"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/world-water-day.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजस्थान देश का सबसे बड़ा राज्य होने के बावजूद जल संकट की सबसे भयावह तस्वीर पेश करता है। भौगोलिक विषमताओं के कारण यहां जल संसाधन विरासत में ही सीमित मिले। राज्य के पास मात्र 1.16 प्रतिशत सतही जल उपलब्ध है। यही असंतुलन आज गहराते जल संकट की जड़ बन चुका है। लगातार सूखा, घटती वर्षा, बढ़ती आबादी और अनियंत्रित विकास ने हालात को विकराल बना दिया है। राज्य के अधिकांश ब्लॉक अब डार्क जोन में पहुंच चुके हैं, जहां भूजल का स्तर खतरनाक रूप से नीचे जा चुका है। 55 प्रतिशत ग्रामीण आबादी आज भी भूजल पर निर्भर है, लेकिन यह पानी भी कई जगह खारा और स्वास्थ्य के लिए अनुपयुक्त हो चुका है। गर्मियों में 150 से अधिक शहरों और 15 हजार गांवों में पानी का संकट खड़ा हो जाता हैं। जलदाय मंत्री कन्हैया लाल के अनुसार सरकार की प्राथमिकता हर घर को स्वच्छ जल उपलब्ध कराना है। </p>
<p>राज्य के 222 शहरों और कस्बों में पेयजल योजनाएं संचालित हैं। जयपुर जैसे बड़े शहर में ही सात लाख कनेक्शन हैं। 28 प्रतिशत शहरों को सतही जल और 50 प्रतिशत को भूजल से पानी मिल रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि 60 शहरों में रोजाना सिर्फ  एक बार पानी आता है, जबकि 30 से अधिक शहरों में दो दिन में एक बार सप्लाई हो रही है। गर्मी के दिनों में यह संकट और विकराल हो जाता है, जिससे आमजन को परेशानी झेलनी पड़ती है।</p>
<p><strong>एक्सपर्ट व्यू</strong></p>
<p>जल प्रबंधन विशेषज्ञ मानते हैं कि राजस्थान में जल संकट केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि प्रबंधन की विफलता भी है। यदि वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और फसल चक्र में बदलाव जैसे उपायों को सख्ती से लागू नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है।</p>
<p><strong>ग्रामीण उम्मीद: नल कनेक्शन बढ़े, पानी कहां से आएगा</strong></p>
<p>जल जीवन मिशन के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में नल कनेक्शन तेजी से बढ़े हैं। 2019 से पहले जहां केवल 11 लाख घरों में नल थे, अब यह संख्या बढ़कर 58 लाख तक पहुंच गई है। यह उपलब्धि दिखने में बड़ी है, लेकिन असली चुनौती पानी की उपलब्धता है। वर्तमान में विभाग के पास 130 करोड़ लीटर प्रतिदिन पानी उपलब्ध है, जबकि भविष्य में 350 करोड़ लीटर की जरूरत होगी। </p>
<p>प्रदेश में 150 प्रतिशत भूजल दोहन हो रहा है। 214 ब्लॉक अतिदोहित है। 1984 में दोहन 35 प्रतिशत, 1995 में 58 प्रतिशत, 2004 में 125 प्रतिशत, 2013 में 139 प्रतिशत, 2020 में 150 प्रतिशत और 2023 में 149 प्रतिशत तक पहुंच गया है। 1984 में 236 में से 203 ब्लॉक सुरक्षित थे, जो स्थिति 2023 में 299 में से 38 ब्लॉक ही सुरक्षित श्रेणी में रहे।</p>
<p><strong>जल आपूर्ति की स्थिति</strong></p>
<p><strong>श्रेणी                                              आंकड़े</strong><br />कुल शहर/कस्बे                                 222<br />कुल उपभोक्ता                                   35 लाख<br />जयपुर में उपभोक्ता                            07 लाख<br />ग्रामीण नल कनेक्शन                          11 लाख<br />(2019 तक)    <br />वर्तमान नल कनेक्शन                          58 लाख<br />वर्तमान जल उपलब्धता                       130 करोड़ लीटर प्रतिदिन<br />अनुमानित आवश्यकता                       350 करोड़ लीटर प्रतिदिन</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 11:30:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कॉर्बेट नेशनल पार्क में दिखा दुर्लभ और खूबसूरत पक्षी''लॉन्ग टेल मिनिवेट'',पक्षी प्रेमियों में उत्साह</title>
                                    <description><![CDATA[रामनगर के कॉर्बेट नेशनल पार्क में दुर्लभ लॉन्ग टेल मिनिवेट पक्षी देखा गया। इसकी मौजूदगी क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और सुरक्षित वन्य आवास का संकेत मानी जा रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/rare-and-beautiful-bird-long-tail-minivet-seen-in-corbett/article-141099"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(10)3.png" alt=""></a><br /><p>रामनगर। उत्तराखंड के रामनगर में कॉर्बेट नेशनल पार्क में एक बेहद आकर्षक और  दुर्लभ पक्षी ''लॉन्ग टेल मिनिवेट' देखा गया है, जिसने पक्षी प्रेमियों और पर्यटकों का ध्यान खींचा है। वन्य जीव प्रेमी संजय छिम्वाल बताते हैं कि कॉर्बेट और इसके आसपास के जंगलों में अब तक करीब 600 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ दर्ज की जा चुकी हैं। यह क्षेत्र पक्षी अवलोकन के लिए बेहद खास माना जाता है। उन्होंने बताया कि हाल ही में जो पक्षी देखा गया है, वह लॉन्ग टेल मिनिवेट है, जो अपनी खूबसूरती और रंगों के कारण अलग पहचान रखता है।</p>
<p>संजय के अनुसार लॉन्ग टेल मिनिवेट आमतौर पर पेड़ों की ऊँची चोटियों पर रहना पसंद करता है और जमीन पर बहुत कम उतरता है। इसका मुख्य भोजन कीड़े-मकोड़े होते हैं, जिससे यह जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने बताया कि इस पक्षी में सेक्सुअल डाइमॉफरजिम स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है, यानी नर और मादा के रंग-रूप में फर्क होता है। नर लॉन्ग टेल मिनिवेट चटक लाल रंग का होता है, जबकि मादा हल्के पीले-हरे रंग की दिखाई देती है। आमतौर पर पक्षियों में नर का रंग ज्यादा चमकीला होता है, ताकि वह मादा को आकर्षित कर सके, और यही विशेषता इस पक्षी में भी देखने को मिलती है।</p>
<p>संजय ने आगे बताया कि कॉर्बेट क्षेत्र में कई पक्षी दुर्लभ श्रेणी में आते हैं, जिनकी विशेष सूची (वॉचर लिस्ट) तैयार की जाती है। इस सूची में हॉर्नबिल, बार्बेट और वुडपेकर जैसे पक्षियों के साथ-साथ मिनिवेट भी शामिल है। उन्होंने कहा कि ऐसे पक्षियों का दिखना इस बात का संकेत है कि कॉर्बेट का जंगल आज भी जैव विविधता के लिए सुरक्षित और समृद्ध है। कॉर्बेट में लॉन्ग टेल मिनिवेट का दिखना न केवल पक्षी प्रेमियों के लिए बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Jan 2026 17:55:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पाकिस्तान के रास्ते होते हुए हजारों किलोमीटर का सफर तय कर बीकानेर पहुंचे कई देशों से 10,000 गिद्ध</title>
                                    <description><![CDATA[बीकानेर के जोहड़बीड़ में रूस, मंगोलिया और कजाकिस्तान से करीब 10,000 प्रवासी गिद्ध पहुंचे हैं। पिछले पांच वर्षों में इन पक्षियों की संख्या दोगुनी हो गई है, जिससे यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय आकर्षण बन गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bikaner/10000-vultures-from-many-countries-reached-bikaner-after-traveling-thousands/article-138488"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/bikaner.png" alt=""></a><br /><p>बीकानेर। राजस्थान में इस समय कुछ ऐसे मेहमानों ने डेरा डाला हुआ है, जो कि 10-20 किलोमीटर का सफर तय करके नहीं आएं बल्कि 10,000 किलोमीटर का सफर तय करके आए हैं। हम बात कर रहे हैं दुनिया के अलग अलग देशों से आए हुए गिद्धों के बारे में, जिन्होंने आजकल राजस्थान के बीकानेर को अपना डेरा बनाया हुआ है। बता दें कि ये पक्षी रूस, आर्मेनिया, पाकिस्तान, मंगोलिया और कजाकिस्तान के रास्ते होते हुए यहां पहुंचे हैं।</p>
<p>एक्सपर्ट की मानें तो पिछले पांच सालों में राजस्थान में आने वाले विदेशी पक्षियों की संख्या में इजाफा हुआ है। साल 2020 में राजस्थान में करीब 4-5 हजार गिद्ध आए थे, लेकिन इस बार ये संख्या सीधे 10,000 पर पहुंच गई।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बीकानेर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 05 Jan 2026 18:40:44 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>&quot;वन्दे गंगा जल संरक्षण जन अभियान&quot; की कल से शुरुआत, दो दिन प्रभार वाले जिलों में रहेंगे मंत्री</title>
                                    <description><![CDATA["वन्दे गंगा जल संरक्षण जन अभियान" का कल से शुभारंभ होगा, जो 20 जून 2025 तक प्रदेशभर में संचालित होगा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/vande-ganga-water-conservation-jan-abhiyan-will-start-tomorrow-from/article-116338"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-06/news-(3)4.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। "वन्दे गंगा जल संरक्षण जन अभियान" का कल से शुभारंभ होगा, जो 20 जून 2025 तक प्रदेशभर में संचालित होगा। इस अभियान का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, वर्षा जल संग्रहण, और स्वच्छता को बढ़ावा देना है।</p>
<p>सरकार के निर्देशानुसार, सभी जिलों में विभिन्न विभागों की ओर से कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें जल संरक्षण और स्वच्छता को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके तहत जागरूकता रैलियां, वर्कशॉप और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से जनहितकारी गतिविधियां होंगी।</p>
<p>साथ ही, राज्य के सभी मंत्री 5-6 जून को अपने प्रभार वाले जिलों का दौरा करेंगे और अभियान की प्रगति का जायजा लेंगे। इस दौरान मंत्री सुनिश्चित करेंगे कि अभियान की सफलता के लिए समर्पित प्रयास किए जाएं। मंत्रिमंडल सचिवालय के शासन सचिव डॉ. जोगा राम ने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे मंत्री को इस अभियान के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए  पूर्ण सहयोग प्रदान करें। "वन्दे गंगा जल संरक्षण जन अभियान" राज्य में जल संरक्षण और पर्यावरण सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 04 Jun 2025 13:24:26 +0530</pubDate>
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                <title>विश्व वन्यजीव दिवस : विद्यार्थियों एवं वन्यजीव प्रेमियों को दी वन्यजीवों की जानकारी, संरक्षण पर साझा किए विचार</title>
                                    <description><![CDATA[ वन्यजीव संरक्षण पर अपने विचार साझा किए। रणथंभौर बाघ परियोजना के डीएफओ रणवीर सिंह भंडारी ने वन्य जीव एवं प्रकृति के महत्व की जानकारी दी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/world--day-shared-ideas-on-conservation-of/article-106212"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-03/257rtrer8.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। विश्व वन्यजीव दिवस के अवसर पर सोमवार को रणथंभौर बाघ परियोजना के सीसीएफ अनूप केआर के निर्देशन में विश्व वन्यजीव दिवस मनाया गया इस अवसर पर विद्यार्थियों एवं वन्यजीव प्रेमियों के साथ वन्यजीवों की जानकारी एवं संरक्षण से जुड़ी प्रश्नोत्तरी, वन्य जीव आधारित पोस्टर प्रतियोगिता कार्यक्रम आयोजित किया गया। उन्होंने वन्यजीव संरक्षण पर अपने विचार साझा किए। रणथंभौर बाघ परियोजना के डीएफओ रणवीर सिंह भंडारी ने वन्य जीव एवं प्रकृति के महत्व की जानकारी दी।</p>
<p>उन्होंने कहा कि पृथ्वी को जीवंत बनाए रखने के लिए मनुष्य के साथ-साथ पशु पक्षी पेड़ पौधों का रहना अत्यंत आवश्यक है। वन विभाग की सोशियोलॉजिस्ट ममता साहू ने  कहा कि वन्यजीव दिवस का उद्देश्य ही विश्व स्तर पर वन्य जीवो के संरक्षण की दिशा में जागरूकता सहयोग और समन्वय स्थापित करना है। इस मौके पर  वन्यजीवों एवं वनों के संरक्षण की शपथ दिलवाई और जीव और वनों से संबंधित जानकारी देकर वन्यजीवों के महत्व को बताया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Mar 2025 14:23:37 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>वन्य जीव संरक्षण के लिए काम करने वालों का बढ़ाएं हौसला : हमारे इतिहास और संस्कृति में बसे हैं वन्य जीव, मोदी ने लोगों से की अपील </title>
                                    <description><![CDATA[हमारे यहाँ वनस्पति और जीव-जंतुओ का एक बहुत ही जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र है और ये वन्य जीव हमारे इतिहास और संस्कृति में रचे-बसे हुए हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/increase-the-encouragement-of-those-working-for-conservation/article-105271"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/modi-3.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वन्य जीव संरक्षण के लिए काम करने वालों का हौसला बढ़ाने की अपील करते हुए कहा कि यह हमारे लिए बहुत संतोष की बात है कि इस क्षेत्र में अब कई स्टार्ट अप भी उभरकर सामने आए हैं। मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में कहा कि क्या आप जानते हैं कि एशियाटिक लायन, हंगुल, पिग्मी हाग और शेर की पूंछ वाला मकाक में क्या समानता है , इसका जवाब है कि ये सब दुनिया में कहीं और नहीं पाए जाते हैं, केवल हमारे देश में ही पाए जाते हैं। वाकई हमारे यहाँ वनस्पति और जीव-जंतुओ का एक बहुत ही जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र है और ये वन्य जीव हमारे इतिहास और संस्कृति में रचे-बसे हुए हैं। </p>
<p>कई जीव-जन्तु हमारे देवी-देवताओं की सवारी के तौर पर भी देखे जाते हैं। मध्य भारत में कई जन-जातियाँ बाघेश्वर की पूजा करती हैं। महाराष्ट्र में वाघोबा के पूजन की परंपरा रही है। भगवान अयप्पा का भी बाघ से बहुत गहरा नाता है। सुंदरवन में बोनबीबी की पूजा-अर्चना होती है जिनकी सवारी बाघ है। हमारे यहाँ कर्नाटक के हुली वेशा, तमिलनाडु के पूली और केरला के पुलिकली जैसे कई सांस्कृतिक नृत्य हैं जो प्रकृति और वन्य जीव के साथ जुड़े हुए हैं। मैं अपने आदिवासी भाई-बहनों का भी बहुत आभार करूंगा क्योंकि वो वन्य जीव संरक्षण से जुड़े कार्यों में बढ़-चढ़कर भागीदारी करते हैं। कर्नाटक के बीआरटी टाइगर रिजर्व में बाघों की आबादी में लगातार वृद्धि हुई है। इसका बहुत श्रेय सोलिगा जनजाति को जाता है जो बाघ की पूजा करते हैं। इनके कारण इस क्षेत्र में मानवजीव संघर्ष ना के बराबर होता है। गुजरात में भी लोगों ने गिर में एशियाटिक लायन की सुरक्षा और संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने दुनिया को दिखा दिया है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य आखिर क्या होता है। </p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा कि इन प्रयासों के कारण ही पिछले कई वर्षों में बाघ, तेंदुए, एशियाटिक लायन, गैंडा और बारहसिंघा की आबादी तेजी से बढ़ी है और भारत में वन्य जीवों की विविधता कितनी खूबसूरत है ये भी गौर करने लायक है। एशियाटिक लायन देश के पश्चिमी हिस्से में पाए जाते हैं, जबकि टाइगर का क्षेत्र है पूर्वी, मध्य और दक्षिण भारत वहीं गैंडा पूर्वोत्तर में मिलते हैं। भारत का हर हिस्सा ना केवल प्रकृति के लिए संवेदनशील है बल्कि वन्य जीव संरक्षण के लिए भी प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि अगले महीने की शुरुआत में हम वन्य जीव संरक्षण दिवस मनाएंगे। मेरा आग्रह है कि आप वन्य जीव संरक्षण से जुड़े लोगों का हौसला जरूर बढ़ाएं। यह मेरे लिए बहुत संतोष की बात है कि इस क्षेत्र में अब कई स्टार्ट अप भी उभरकर सामने आए हैं।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 23 Feb 2025 15:04:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>उपेक्षा के आंसू बहा रही हाड़ौती की पुरासम्पदा </title>
                                    <description><![CDATA[मंदिर की बेशकीमती मूर्तियों को चुरा ले गए चोर । 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/hadoti-s-heritage-is-shedding-tears-of-neglect/article-91621"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-09/4427rtrer-(5)1.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। पुरासंपदा में देश-प्रदेश में सबसे ज्यादा संपन्न होने के बावजूद हाड़ौती क्षेत्र संरक्षण को तरस रहा है। हाड़ौती के कोटा, बारां, बूंदी व झालावाड़ा जिले में प्रारंभिक पाषाणकाल, मध्य पाषाणकाल, उत्तर पाषाणकाल, ताम्रयुग, लोहयुग, जनपद, मौर्य, शुंग, कुषाण, गुप्तकालीन सभ्यताओं से लेकर ब्रिटिशकाल तक के प्रमाण बिखरे पड़े हैं। 5वीं से 14वीं शताब्दी के दर्जनों मंदिर हैं। हर काल की कलाएं हैं। इसके बावजूद पुरातत्व विभाग इन पुरासम्पदाओं को सही ढंग से सहेज नहीं कर पा रहा है। कई स्थानों पर ऐतिहासिक धरोहर दुर्दशा की शिकार हो रही है। प्राचीन मंदिर खण्डहर में तब्दील होते जा रहे हैं। सरकार पुरा सम्पदाओं के संरक्षण के दावे तो करती है, लेकिन सरंक्षण की कवायद कभी भी कागजों से बाहर नहीं आ पाई है।  </p>
<p><strong>कोटा: इन मंदिरों को जीर्णोद्धार की दरकार</strong><br />जिले के अयाना क्षेत्र में प्राचीन शिव मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन है। इस मंदिर की बेशकीमती मूर्तियों को कुछ साल पहले चोर चुरा ले गए थे और कई मूर्तियों को खंडित कर दिया था। अभी भी काफी संख्या में मूर्तियां मंदिर परिसर में पड़ी हुई है। जो रखरखाव के अभाव में जमींदोज होती जा रही है। मंदिर की सुरक्षा के नाम पर अनुबंध पर एक सुरक्षा गार्ड लगा रखा है, जो रात को नहीं रहता है। जिससे यहां की बेशकीमती मूर्तियां भगवान भरोसे ही है। कंसुआ स्थित कर्णेश्वर महादेव मंदिर और चारचौमा स्थित शिवालय सदियों पुरानी धरोहर है। हालांकि इन मंदिरों के जीर्णोद्धार का कार्य चल रहा है, लेकिन विभाग को इसके लिए काफी कम बजट मिला है, ऐसे में कम बजट विरासत को सहेजने में मुश्किल हो सकती है।</p>
<p><strong>बूंदी में ऐसे हो रही दुर्दशा</strong><br />जिले में सबसे ज्यादा शैलचित्र, शुतुरमुर्ग के अंडे, 5वीं से 14वीं शताब्दी के दर्जनों मंदिर हैं। हर काल की कलाएं हैं। कमलेश्वर में 9वीं-10वीं शताब्दी की अधगढ़ मूर्तियां और पूरी वर्कशॉप, गुप्तकाल का सफेद सैंड स्टोन से निर्मित 5 फुट ऊंचा एकमुखी दुर्लभ शिवलिंग भीमलत क्षेत्र में जंगल में पड़ा है। 10 साल पहले यह साबुत था, समाजकंटकों ने खोदकर बाहर फेंक दिया, दो टुकड़े हो गए। ऐसे ही दो एकमुखी शिवलिंग चंबल-मेज नदी के संगमस्थल पाली गांव में मौजूद हैं। बीजमाता मंडावरा के पास बड़ी संख्या में एक हजार साल से पुरानी मूर्तियां खुले में पड़ी है, जो तस्करों-समाजकंटकों से बची हुई है, लेकिन अब इनकी सुरक्षा की दरकार है।</p>
<p><strong>पर्यटन के लिहाज से विकसित करें अथवा इनका निष्पादन करें</strong><br />हाड़ौती के बारां जिले में पुरासम्पदा की भरमार है। जिला मुख्यालय से कुछ दूर स्थित रामगढ़ में भंडदेवरा मंदिर काफी प्रसिद्ध है। हालांकि इसके संरक्षण के लिए प्रयास किए गए हैं, लेकिन वह नाकाफी हैं। दूर से भंडदेवरा बस पत्थरों का टीला नजर आता है। प्रतिमाओं के साथ मंदिर की सुंदरता बढ़ाने वाले कलात्मक झालर व खंभ टूट कर गिर चुके हैं। इन प्रतिमाओं का सौंदर्य बढ़ाने वाली सामग्री जर्जर होती जा रही है। अभी इस विरासत को संरक्षित किया जा सकता है। इसके अलावा बारां जिले में कई किले बने हुए हैं, जो समय के साथ-साथ अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हँै।</p>
<p><strong>झालावाड़ - आकर्षण का केन्द्र कोलवीं की गुफाएं</strong><br />जिला मुख्यालय से 90 किलोमीटर दूर कोलवी नामक गांव में चट्टानों को काटकर बनाई गई बौद्ध गुफाएं राजस्थान में बौद्धकालीन संस्कृति के अवशेष के रूप में अपना विशेष महत्व रखती हैं।  गुफाओं पर हिन्दु शैली के मंदिरों का तथा स्तूप शिखर पर दक्षिण भारतीय कला का प्रभाव नजर आता है। यहां बनी दो मंजिली गुफाएं विशेष रूप से दर्शनीय हैं। कुछ गुफाओं में भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं एवं दीवारों पर रेखांकन नजर आता है। कोलवी से 12 किलोमीटर बिनायका में भी पहाड़ी पर चट्टानों को काटकर 16 गुफाएं बनाई गई हैं। पगारिया गांव के समीप हथियागोड़ की पहाड़ी पर भी 5 गुफाएं बनी हैं। इनकों भी संरक्षण की दरकार है।</p>
<p>प्रारंभिक पाषाणकाल, मध्य पाषाणकाल, उत्तर पाषाणकाल, ताम्रयुग, लोहयुग, जनपद, मौर्य, शुंग, कुषाण से लेकर ब्रिटिशकाल तक के प्रमाण बिखरे पड़े हैं। बिखरी पुरा संपदाओं को सहेजने के लिए साइट म्यूजियम जरूरी है, ताकि धरोहरें संरक्षित हो सके और लोगों की पहुंच में आ सके। वहीं बिखरी पड़ी पुरासम्पदाओं को मंदिरों के आसपास ही स्थापित किया जा सकता है। ताकि भावी पीढ़ी इन धरोहर से रूबरू हो सकें।<br /><strong>- ओमप्रकाश, पुरा अन्वेषक </strong></p>
<p>हाड़ौती की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए इन क्षेत्रों में पर्यटकों की आवाजाही बढ़ानी होगी। इसके लिए पहले धरोहरों स्थलों को पर्यटन के लिहाज से विकसित करना होगा, ताकि पर्यटकों की इन क्षेत्रों के बारे में पूरी जानकारी मिल सके। इन क्षेत्रों का व्यापक प्रचार-प्रसार भी होना चाहिए। इसके लिए विभिन्न संगठनों की मदद ली जा सकती है।<br /><strong>- अनिरुद्ध सिंह, ट्यूरिस्ट गाइड</strong></p>
<p>हाड़ौती की पुराम्पदाओं के बारे में अधिकांश पर्यटकों को पता ही नहीं होता है। यहां पर कई पर्यटक बाहर से आते हैं, उनके लिए निजी ट्रैवल्स संचालक वाहनों की व्यवस्था करते हैं। पुरातत्व विभाग को चाहिए कि इन ट्रैवल्स संचालकों से सम्पर्क कर उन्हें पुरा स्थलों तक ले जाने के लिए चर्चा करें ताकि वहां पर पर्यटन गति पकड़ सके।<br /><strong>- महेन्द्र सिंह, ट्रैवल्स संचालक</strong></p>
<p>हाड़ौती में पुरासम्पदाओं के सरंक्षण के लिए हर संभव प्रयास किए जाते हैं। अधिकांश प्राचीन विरासत को सहेजने के लिए प्रत्येक जिलों में संग्रहालय बना रखे हैं। इनमें कई पुरासम्पदाओं का संरक्षण किया जा रहा है। जिलों में दूरदराज प्राचीन धरोहरों की सुरक्षा के लिए अनुबंध पर कर्मचारी लगा रखे हैं। वहीं बजट आने पर समय-समय पर प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार भी करवाया जाता है।<br /><strong>- ललित कुमार, वरिष्ठ लिपिक, पुरातत्व विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Sep 2024 16:15:06 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>बेहद जरूरी है संकटग्रस्त जैव प्रजातियों का संरक्षण</title>
                                    <description><![CDATA[वन्य जीव-जंतु और उनकी विविधता धरती पर अरबों वर्षों से हो रहे जीवन के सतत् विकास की प्रक्रिया का आधार रहे हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/conservation-of-endangered-species-is-extremely-important/article-78856"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-05/t21rer-(2)43.png" alt=""></a><br /><p>जीव-जंतु तथा पेड़-पौधे भी मनुष्यों की ही भांति ही धरती के अभिन्न अंग हैं लेकिन मनुष्य ने अपने निहित स्वार्थों तथा विकास के नाम पर न केवल वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों को बेदर्दी से उजाड़ने में बड़ी भूमिका निभाई है बल्कि वनस्पतियों का भी तेजी से सफाया किया है। धरती पर अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए मनुष्य को प्रकृति प्रदत्त उन सभी चीजों का आपसी संतुलन बनाए रखने की जरूरत होती है, जो उसे प्राकृतिक रूप से मिलती हैं। इसी को पारिस्थितिकी तंत्र या इकोसिस्टम भी कहा जाता है लेकिन चिंतनीय स्थिति यह है कि धरती पर अब वन्य जीवों तथा दुर्लभ वनस्पतियों की अनेक प्रजातियों का जीवन चक्र संकट में है। वन्यजीवों की असंख्य प्रजातियां या तो लुप्त हो चुकी हैं या लुप्त होने के कगार पर हैं। पर्यावरणीय संकट के चलते जहां दुनियाभर में जीवों की अनेक प्रजातियों के लुप्त होने से वन्य जीवों की विविधता का बड़े स्तर पर सफाया हुआ है, वहीं हजारों प्रजातियों भाग्य से ज्यादा कर्म को महत्व देता हो। जो भागना नाही जागना  सिखाए। साधनों कि बजाय साधना में मन लगाए। जिससे मिलने से व्यथा व्यवस्था में, कोलाहल मौन में एवासना उपासना में बदल जाए। जो कान नहीं प्राण फूंकने वाला हो। वैसे तो माता-पिता और आचार्य भी गुरु है। पर इनका दायरा सीमित है। थोड़े समय बाद ये तीनों साथ छोड़ देते है। लेकिन दीक्षा गुरु लोक से परलोक तक आपका साथ निभाते है, जन्म जन्मान्तर के क्लेश मिटा देते है। व्यक्ति की जिन्दगी दो भागो में बंट जाती है-गुरु से मिलने से पहले और गुरु से मिलने के बाद के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। यही स्थिति वनस्पतियों के मामले में भी है।</p>
<p>वन्य जीव-जंतु और उनकी विविधता धरती पर अरबों वर्षों से हो रहे जीवन के सतत् विकास की प्रक्रिया का आधार रहे हैं। वन्य जीवन में ऐसी वनस्पति और जीव-जंतु सम्मिलित होते हैं, जिनका पालन-पोषण मनुष्यों द्वारा नहीं किया जाता। आज मानवीय क्रियाकलापों तथा अतिक्रमण के अलावा प्रदूषण वातावरण और प्रकृति के बदलते मिजाज के कारण भी दुनियाभर में जीव-जंतुओं तथा वनस्पतियों की अनेक प्रजातियों के अस्तित्व पर दुनियाभर में संकट के बादल मंडरा रहे हैं। हिन्दी अकादमी दिल्ली के सौजन्य से प्रकाशित अपनी पुस्तक प्रदूषण मुक्त सांसें में मैंने विस्तार से यह उल्लेख किया है कि विभिन्न वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की संख्या में कमी आने से समग्र पर्यावरण किस प्रकार असंतुलित होता है। दरअसल विभिन्न वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की संख्या में कमी आने से समग्र पर्यावरण जिस प्रकार असंतुलित हो रहा है, वह पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बना है। पर्यावरण के इसी असंतुलन का परिणाम पूरी दुनिया पिछले कुछ दशकों से गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं और प्राकृतिक आपदाओं के रूप में देख और भुगत भी रही है।</p>
<p>लगभग हर देश में कुछ ऐसे जीव-जंतु और पेड़-पौधे पाए जाते हैं, जो उस देश की जलवायु की विशेष पहचान होते हैं लेकिन जंगलों की अंधाधुंध कटाई तथा अन्य मानवीय गतिविधियों के चलते जीव-जंतुओं के आशियाने लगातार बड़े पैमाने पर उजड़ रहे हैं, वहीं वनस्पतियों की कई प्रजातियों का भी अस्तित्व मिट रहा है। हालांकि जीव-जंतुओं तथा पेड़-पौधों की विविधता से ही पृथ्वी का प्राकृतिक सौन्दर्य है, इसलिए भी लुप्तप्राय: पौधों और जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियों की उनके प्राकृतिक निवास स्थान के साथ रक्षा करना पर्यावरण संतुलन के लिए भी बेहद जरूरी है। इसीलिए पृथ्वी पर मौजूद जीव-जंतुओं तथा पेड़-पौधों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए तथा जैव विविधता के मुद्दों के बारे में लोगों में जागरूकता और समझ बढ़ाने के लिए प्रति वर्ष 22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जाता है। 20 दिसम्बर 2000 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा प्रस्ताव पारित करके इसे मनाने की शुरूआत की गई थी। इस प्रस्ताव पर 193 देशों द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे। दरअसल 22 मई 1992 को नैरोबी एक्ट में जैव विविधता पर अभिसमय के पाठ को स्वीकार किया गया था, इसीलिए यह दिवस मनाने के लिए 22 मई का दिन ही निर्धारित किया गया।</p>
<p>धरती पर पेड़-पौधों की संख्या बड़ी तेजी से घटने के कारण अनेक जानवरों और पक्षियों से उनके आशियाने छिन रहे हैं, जिससे उनका जीवन संकट में पड़ रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यदि इस ओर जल्दी ही ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में स्थितियां इतनी खतरनाक हो जाएंगी कि धरती से पेड़-पौधों तथा जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियां विलुप्त होकर सदा के इतिहास के पन्नों का हिस्सा बन जाएंगी। माना कि धरती पर मानव की बढ़ती जरूरतों और सुविधाओं की पूर्ति के लिए विकास आवश्यक है लेकिन यह हमें ही तय करना होगा कि विकास के इस दौर में पर्यावरण तथा जीव-जंतुओं के लिए खतरा उत्पन्न न हो। प्रदूषण मुक्त सांसें पुस्तक में चेतावनी देते हुए स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि विकास के नाम पर वनों की बड़े पैमाने पर कटाई के साथ-साथ जीव-जंतुओं तथा पक्षियों से उनके आवास छीने जाते रहे और ये प्रजातियां धीरे-धीरे धरती से एक-एक कर लुप्त होती गई तो भविष्य में उससे उत्पन्न होने वाली भयावह समस्याओं और खतरों का सामना हमें ही करना होगा। </p>
<p>दरअसल बढ़ती आबादी तथा जंगलों के तेजी से होते शहरीकरण ने मनुष्य को इतना स्वार्थी बना दिया है कि वह प्रकृति प्रदत्त उन साधनों के स्रोतों को भूल चुका है, जिनके बिना उसका जीवन ही असंभव है। आज अगर खेतों में कीटों को मारकर खाने वाले चिड़िया, मोर, तीतर, बटेर, कौआ, बाज, गिद्ध जैसे किसानों के हितैषी माने जाने वाले पक्षी भी तेजी से लुप्त होने के कगार हैं तो हमें आसानी से समझ लेना चाहिए कि हम भयावह खतरे की ओर आगे बढ़ रहे हैं और हमें अब समय रहते सचेत हो जाना चाहिए। </p>
<p>जैव विविधता की समृद्धि ही धरती को रहने तथा जीवनयापन के योग्य बनाती है, इसलिए लुप्त प्राय: पौधों और जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियों की उनके प्राकृतिक निवास स्थान के साथ रक्षा करना पर्यावरण संतुलन के लिए भी बेहद जरूरी है।</p>
<p><strong>-योगेश कुमार गोयल</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 May 2024 11:39:39 +0530</pubDate>
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                <title>हर व्यक्ति को जल संरक्षण से है जोड़ा</title>
                                    <description><![CDATA[भूजल ने कई दशकों से देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह लाखों नलकूपों के माध्यम से ‘हरित क्रांति’ की सफलता सुनिश्चित करने में प्रमुख संचालक सिद्ध हुआ है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/man-connected-with-water-conservation/article-7154"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/water-copy.jpg" alt=""></a><br /><p>भूजल ने कई दशकों से देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह लाखों नलकूपों के माध्यम से ‘हरित क्रांति’ की सफलता सुनिश्चित करने में प्रमुख संचालक सिद्ध हुआ है। यह सीमित संसाधन वर्तमान में 60 प्रतिशत से अधिक कृषि की सिंचाई, 85 प्रतिशत ग्रामीण पेयजल आपूर्ति और 50 प्रतिशत से अधिक शहरी जल आपूर्ति की जरूरतों को पूरा करता है। राष्ट्रपति द्वारा 29 मार्च को जल शक्ति अभियान कैच द रेन-2022 का शुभारम्भ किया गया था। यह तीसरा वर्ष है, जब देश वर्षा जल के संरक्षण और भूजल पुनर्भरण के लिए एक जन आंदोलन का मिशन मोड में आयोजन कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में और उनकी प्रेरणा से, जल शक्ति अभियान को पहली बार वर्ष 2019 में सभी को ‘वर्षा के लिए तैयार करने’ के विजन के साथ शुरू किया गया था, ताकि हम वर्षाजल का अधिक से अधिक भण्डारण और उपयोग कर सकें तथा हमारे भूजल भंडार को फिर से भरा भी जा सके।</p>
<p>भूजल को कभी-कभी अदृश्य संसाधन कहा जाता है। हर कोई इसका इस्तेमाल करता है। यह ज्यादातर मामलों में नि:शुल्क है और उन लोगों को उपलब्ध है, जो इन स्रोतों तक पहुंच पाते हैं, या जिनके पास इसे प्राप्त करने के साधन मौजूद हैं। यह झीलों, आर्द्रभूमि और जंगल जैसे महत्वपूर्ण पारितंत्र को बनाए रखता है। भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है और उपलब्ध वैश्विक संसाधनों के एक चौथाई से अधिक का उपयोग करता है। भूजल ने कई दशकों से देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह लाखों नलकूपों के माध्यम से ‘हरित क्रांति’ की सफलता सुनिश्चित करने में प्रमुख संचालक सिद्ध हुआ है। यह सीमित संसाधन वर्तमान में 60 प्रतिशत से अधिक कृषि की सिंचाई, 85 प्रतिशत ग्रामीण पेयजल आपूर्ति और 50 प्रतिशत से अधिक शहरी जल आपूर्ति की जरूरतों को पूरा करता है। भूजल के बढ़ते उपयोग और पुनर्भरण से अधिक दोहन के परिणामस्वरूप इस मूल्यवान संसाधन के भण्डार में महत्वपूर्ण कमी आयी है। बड़े पैमाने पर आजीविका के नुकसान से लेकर प्रवासी लोगों के लिए सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता में कमी से जुड़े स्वास्थ्य मुद्दों तक, जल-संकट का गंभीर प्रभाव पड़ा है। जलवायु परिवर्तन के कारण यह समस्या और गंभीर हो जाती है, क्योंकि यह वर्षा के पैटर्न को अनिश्चित बनाता है और भूजल पुनर्भरण को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। वर्तमान में, देश के लगभग एक तिहाई भू-जल संसाधन विभिन्न स्तरों के संकट झेल रहे हैं। छोटे एवं सीमांत किसान, महिलाएं और समाज के कमजोर वर्ग, भूजल की कमी और दूषित जल का सबसे ज्यादा नुकसान सहते हैं।</p>
<p>इस समस्या के समाधान के लिए प्रधानमंत्री की प्रेरणा से भारत सरकार ने 2019 में जल शक्ति अभियान (जेएसए) की शुरूआत की। प्रधानमंत्री ने स्वयं सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और केंद्र शासित प्रदेशों तथा सभी पंचायतों के अग्रणी कर्मियों को पत्र लिखा एवं उनसे अपने-अपने क्षेत्रों में अभियान को नेतृत्व प्रदान करने का अनुरोध किया। यह मिशन मोड में एक समयबद्ध जल संरक्षण अभियान था, जिसे देश में जल-संकट झेल रहे 256 जिलों के 1,592 ब्लॉकों में जुलाई-नवंबर 2019 की अवधि के दौरान लागू किया गया था। ये ब्लॉक भूजल के सन्दर्भ में संकटग्रस्त या अत्यधिक उपयोग किये जाने की श्रेणी में आते हैं, जहां संचय होने की तुलना में भूजल को अधिक मात्रा में निकाला जा रहा था। जेएसए, भारत सरकार और राज्य सरकारों के विभिन्न मंत्रालयों का एक परस्पर सहयोगी प्रयास थाए जिसका संचालन जल शक्ति मंत्रालय के पेयजल और स्वच्छता विभाग द्वारा किया जा रहा था। इस अभियान के दौरान, भारत सरकार के अधिकारियों, भूजल विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने पांच लक्षित कार्यों के त्वरित कार्यान्वयन पर ध्यान केंद्रित करते हुए जल संरक्षण और जल संसाधन प्रबंधन के लिए भारत के सबसे जल-संकटग्रस्त जिलों में राज्यों और जिला अधिकारियों के साथ मिलकर काम किया। जेएसए का उद्देश्य व्यापक प्रचार-प्रसार और समुदायों की भागीदारी के माध्यम से जल संरक्षण को जन-आंदोलन बनाना है।</p>
<p>जेएसए ने पांच बिन्दुओं पर ध्यान केंद्रित किया। जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन, पारंपरिक और अन्य जल निकायों का पुनरुद्धार, पानी का पुन: उपयोग और संरचनाओं का पुनर्भरण, वाटरशेड विकास और गहन वनीकरण। इसके अलावा, विशेष कार्यक्रमों में ब्लॉक जल संरक्षण योजनाओं और जिला जल संरक्षण योजनाओं का निर्माण, कृषि विज्ञान केंद्र मेलों का आयोजन, शहरी अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग और सभी गांवों के लिए 3 डी रूपरेखा मानचित्रण आदि शामिल हैं।राज्यों ने कई स्रोतों से संसाधनों का इस्तेमाल किया। यह निर्धारित किया गया था कि मनरेगा निधि का कम से कम 60 प्रतिशत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन गतिविधियों, मुख्य रूप से जल संरक्षण पर खर्च किया जाना चाहिए। पंद्रहवें वित्त आयोग अनुदान, कैम्पा निधि, सीएसआर संसाधनों का उपयोग इन कार्यक्रमों को निधि देने के लिए किया गया था। 2019 में सभी हितधारकों के संयुक्त प्रयासों से 2.73 लाख जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन संरचनाओं का निर्माण हुआ, 45,000 जल निकायों/टैंकों का पुनरूद्धार किया गया, 1.43 लाख पुन: उपयोग और पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण हुआए 1.59 लाख वाटरशेड विकास संबंधी कार्य पूरे किये गएए 12.36 करोड़ पौधे लगाये गए और 1372 ब्लॉक जल संरक्षण योजनाओं की तैयारी की गयी।</p>
<p><strong>- गजेंद्र सिंह शेखावत, केंद्रीय कैबिनेट मंत्री</strong><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Apr 2022 14:25:24 +0530</pubDate>
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                <title>जल संरक्षण के लिए विभिन्न उपाय कर रही है सरकार : मोदी</title>
                                    <description><![CDATA[सरकार जल संरक्षण के लिए विभिन्न उपाय कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व जल दिवस पर पानी की हर एक बूंद को बचाने के संकल्प को दोहराते हुए कहा कि कि विश्व जल दिवस पर हम पानी की हर बूंद को बचाने के अपने संकल्प को दोहराएं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/modi-appreciates-peoples-working-for-water-conservation/article-6526"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/modi.jpg02-copy6.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। सरकार जल संरक्षण के लिए विभिन्न उपाय कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व जल दिवस पर पानी की हर एक बूंद को बचाने के संकल्प को दोहराते हुए कहा कि कि विश्व जल दिवस पर हम पानी की हर बूंद को बचाने के अपने संकल्प को दोहराएं। मोदी ने ट्वीट किया कि हमारा देश जल संरक्षण और नागरिकों तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने के लिए जल जीवन मिशन जैसे अनेक उपाय कर रहा है। उन्होंने कहा कि यह खुशी की बात है कि पिछले कुछ वर्षो के दौरान जल संरक्षण ने जनांदलोन का रूप ले लिया है और इसके तहत समूचे देश में नये नये तरीके से प्रयास किये जा रहे हैं।</p>
<p>एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा कि माताओं और बहनों के जीवन को आसान बनाने में जल जीवन मिशन अत्यंत प्रभावी साबित हो रहा है। जन-जन की भागीदारी से घर-घर नल से जल पहुंचाने का संकल्प पूरा होगा। उन्होंने जल संरक्षण के लिए काम करने वाले हर व्यक्ति तथा संगठन की भी सराहना की। प्रधानमंत्री ने जल संरक्षण को बढाते हुए ग्रह पर जीवन को सतत बनाने में योगदान देने की भी अपील की। उन्होंने कहा कि पानी की हर बूंद हमारे लोगों की मदद करती है और प्रगति में तेजी लाने का काम करती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 22 Mar 2022 12:32:33 +0530</pubDate>
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