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                <title>sanctuary - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>रणथम्भौर पहुंचे PCCF अरिजीत बनर्जी : बाघ और घड़ियाल संरक्षण व्यवस्थाओं का लिया जायजा, अधिकारियों को दिए निर्देश</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान के वन बल प्रमुख अरिजीत बनर्जी ने रणथम्भौर टाइगर रिजर्व और पालीघाट का विस्तृत निरीक्षण किया। उन्होंने बाघों की मॉनिटरिंग, चम्बल नदी में घड़ियाल नेस्टिंग स्थलों और सुरक्षा तंत्र की समीक्षा की। बनर्जी ने फील्ड स्टाफ की सराहना करते हुए वन्यजीव आवास सुधार और वैज्ञानिक प्रबंधन के निर्देश दिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/sawai-madhopur/pccf-arijit-banerjee-reached-ranthambore-took-stock-of-tiger-and/article-156262"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-06/अरिजीत-बनर्जी.png" alt=""></a><br /><p>सवाई माधोपुर। राजस्थान के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) एवं वन बल प्रमुख (HoFF) अरिजीत बनर्जी ने रणथम्भौर टाइगर रिजर्व एवं पालीघाट क्षेत्र का दो दिवसीय विस्तृत निरीक्षण एवं भ्रमण किया। इस दौरान उन्होंने बाघ संरक्षण, वन्यजीव आवास प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण, गश्ती व्यवस्था तथा घड़ियाल संरक्षण से संबंधित विभिन्न गतिविधियों का स्थलीय निरीक्षण कर अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश प्रदान किए।</p>
<p>भ्रमण के प्रथम दिवस बनर्जी ने रणथम्भौर टाइगर रिजर्व के विभिन्न महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों का दौरा किया। उन्होंने वन्यजीव आवासों, प्राकृतिक जल स्रोतों, एनीकटों, वन्यजीवों के लिए विकसित जल प्रबंधन संरचनाओं, कैमरा ट्रैप मॉनिटरिंग व्यवस्था तथा क्षेत्र में संचालित संरक्षण गतिविधियों का निरीक्षण किया। उन्होंने क्षेत्रीय अधिकारियों से बाघों की वर्तमान स्थिति, उनके विचरण क्षेत्र, मॉनिटरिंग प्रणाली, मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम तथा आवास सुधार कार्यों के संबंध में विस्तृत जानकारी प्राप्त की।</p>
<p>निरीक्षण के दौरान उन्होंने फील्ड स्टाफ द्वारा किए जा रहे नियमित गश्त कार्य, आधुनिक तकनीकों के उपयोग, वन अपराध नियंत्रण एवं वन्यजीव संरक्षण के लिए अपनाए जा रहे उपायों की समीक्षा की। उन्होंने अधिकारियों एवं कार्मिकों को संरक्षण कार्यों में निरंतर सतर्कता एवं वैज्ञानिक प्रबंधन दृष्टिकोण अपनाने के निर्देश दिए।</p>
<p>दो दिवस बनर्जी ने पालीघाट क्षेत्र का दौरा कर चम्बल नदी तंत्र में संचालित घड़ियाल संरक्षण कार्यक्रमों का निरीक्षण किया। उन्होंने घड़ियाल नेस्टिंग स्थलों, हाल ही में हैच हुए घड़ियाल शिशुओं की सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी तंत्र एवं संरक्षण गतिविधियों का अवलोकन किया। उन्होंने घड़ियालों के प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा एवं संरक्षण को और अधिक सुदृढ़ बनाने पर बल दिया तथा अधिकारियों को नियमित मॉनिटरिंग जारी रखने के निर्देश दिए।</p>
<p>इस अवसर पर उन्हें रणथम्भौर टाइगर रिजर्व में बाघ संरक्षण, जैव विविधता प्रबंधन, वन्यजीव बचाव एवं उपचार, आवास विकास, सामुदायिक सहभागिता तथा संरक्षण शिक्षा से संबंधित विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी भी प्रस्तुत की गई। उन्होंने संरक्षण कार्यों में लगे अधिकारियों एवं वन कार्मिकों की प्रतिबद्धता, समर्पण एवं कठिन परिस्थितियों में किए जा रहे प्रयासों की सराहना की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>सवाई माधोपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 17:00:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>शेरगढ़ व भैंसरोडगढ़ सेंचुरी में 5 करोड़ से बनेगा हबीर्वोर ब्रिडिंग सेंटर, प्रत्येक एनक्लोजर 100 लाख से बनेगा</title>
                                    <description><![CDATA[15 से 20 हैक्टेयर के बनेंगे 3 एनक्लोजर,लेपर्ड प्रूफ होंगे एनक्लोजर , ब्लैक बक व चिंकारा  की होगी वंशवृद्धि । ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/herbivore-breeding-center-will-be-built-in-shergarh-and-bhainsrodgarh-sanctuary-with-5-crores/article-116690"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-06/news19.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मध्यप्रदेश के बाद राजस्थान में चीतों की एंट्री सबसे पहले  शेरगढ़ व भैंसरोडगढ़ अभयारणय से होगी। लेकिन, चीते लाने से पहले दोनों सेंचुरी में उनके भोजन (प्रे-बेस) बढ़ाना होगा। जिसके लिए कोटा वन्यजीव विभाग करोड़ों की लागत से हबीर्वोर ब्रिडिंग सेंटर बनाने जा रहा है। जिसके माध्यम से ब्लैक बक व चीतलों की संख्या बढ़ाई जाएगी। ताकि, चीतों के लिए यहां पर्याप्त भोजन की उपलब्धता हो सके।  दरअसल, शेरगढ़ व भैंसरोडगढ़ सेंचुरी में 500 लाख की लागत से 3 हबीर्वोर एनक्लोजर बनाए जाएंगे। जिसमें चीतल, ब्लैक बक सहित हिरण की अन्य प्रजातियों को रख उनकी वंश वृद्धि की जाएगी। </p>
<p><strong>प्रत्येक एनक्लोजर 100 लाख से बनेगा</strong><br />डीएफओ भटनागर ने बताया कि प्रत्येक हबीर्वोर एनक्लोजर 100 लाख की लागत से बनाए जाने हैं। भैंसरोडगढ़ में वनखंड नीमड़ी-आगरा में एक तथा शेरगढ़ अभयारणय के वनखंड नाहरिया व बारापाटी में दो एनक्लोजर बनेंगे। प्रत्येक एनक्लोजर में 40-10 के रेशो में चीतल व ब्लैक बक रखे जाएंगे। प्रथम फेज में 40 मादा और 10 नर होंगे। यह एनिमल साल में दो बार ब्रिडिंग करता है। मादा एक बार में दो बच्चों को जन्म देती है। ऐसे में एक साल में ही एबीर्वोर एनिमल्स की संख्या दो गुना हो जाएगी। इस तरह से भविष्य  में इनका जनसंख्या घनत्व में इजाफा होगा। </p>
<p><strong>ऐसे होगी चीते की हाड़ौती में एंट्री</strong><br />विशेषज्ञों के अनुसार, मध्यप्रदेश से राजस्थान तक 400 वर्ग किमी के क्षेत्र में चीता लैंडस्केप बनाया जाना प्रस्तावित है। इसके लिए कार्य योजना तैयार की जा रही है। मध्यमप्रदेश का कूनो अभयारणय का क्षेत्र शेरगढ़ से जुड़ा है। जबकि, गांधी सागर सेंचुरी चित्तौड़ व भैंसरोडगढ़ से जुड़ा है। वर्तमान में गांधी सागर में चीतों को शिफ्ट किया जा चुका है। जब भी यहां हार्ड रिलीज होंगे तो चीतों की भैंसरोडगढ़ में एंट्री सौ फीसदी होगी। यहां का भगौलिक वातावरण चीते के अनूकूल है। पूर्व में भी चीता कूनों से निकल बारां के शाहबाद के जंगल तक आ चुका है। </p>
<p><strong>5 करोड़ से बनेंगे 3 एनक्लोजर</strong><br /> वन्यजीव विभाग कोटा के उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर ने बताया कि भैंसरोडगढ़ शेरगढ़ सेंचुरी में 15 से 20 हैक्टेयर में तीन प्रे-बेस एनक्लोजर बनाए जाएंगे। जिसके लिए कैम्पा मद से 5 करोड़ का बजट मिला है। इसकी तैयारियां भी शुरू कर दी गई है। अभी एस्टीमेट बनाए जा रहे हैं। जल्द ही टैंडर प्रक्रिया की जाएगी।</p>
<p><strong>लेपर्ड फ्रूफ होंगे एनक्लोजर</strong><br />उन्होंने बताया कि दोनों सेंचुरी में बनाए जाने वाले एनक्लोजर पूरी तरह से लेपर्ड फ्रूफ होंगे। उनका डिजाइन इस तरह से होगा कि लेपर्ड के अलावा भी अन्य मांसाहारी जानवरों से एनक्लोजर में रखने वाले शाकाहारी जानवरों को कोई खतरा नहीं होगा। इसके अलावा एनक्लोजर में घास के मैदान डवलप कराए जाएंगे और पानी की समुचित व्यवस्था के लिए सौलर बोरिंग की जाएगी। जब हबीर्वोर को सुरक्षित रहवास, भोजन-पानी की भरपूर उपलब्धता मिलेगी तो ब्रिडिंग भी अच्छी होगी। जिससे  वंश वृद्धि होगी। इनकी संख्या में इजाफा होना बेहद जरूरी है, क्योंकि शेरगढ़ व भैंसरोडगढ़ सेंचुरी चीता लैंडस्केप है। यहां भविष्य में चीते की एंट्री होने की प्रबल संभावना है। </p>
<p><strong>500-500 हैक्टेयर में तैयार किया ग्रासलैंड </strong><br />शेरगढ़ व भैंसरोडगढ़ सेंचुरी में 500-500 हैक्टेयर में ग्रासलैंड तैयार कर चुके हैं। वर्तमान में घास तीन-तीन फीट से ज्यादा की हो चुकी है। जब जमीन पर बीज गिरेंगे तो बारिश में तीन गुना घास फिर से उगकर तेजी से बढ़ेगी। अभी समस्या यह है, बीज आने से पहले ही मवेशी घास चर जाते हैं। जिससे घास पनपने से पहले ही नष्ट हो जाती है। जबकि, शाकाहारी वन्यजीवों का मुख्य भोजन ही चारा होता है। पर्याप्त भोजन के अभाव में इनकी संख्या में तेजी से गिरावट होती जा रही है।</p>
<p>हाड़ौती के शेरगढ़ व भैंसरोडगढ़ का जंगल चीते के अनूकूल है। यहां ग्रासलैंड व पठारी क्षेत्र अधिक है, जो चीते का नेचुरल हैबीटॉट है। ऐसे में यहां फ्रूड चेन डवलप हो, इसके लिए दोनों सेंचुरी में 5 करोड़ की लागत से हबीर्वोर एनक्लोजर बनाया जाएगा। इसके लिए कैम्पा मद से बजट भी मिल चुका है। जल्द ही एस्टीमेट बनाकर कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया जाएगा। इन एनक्लोजर में चीतल व ब्लैक बक रखे जाएंगे। ब्रिडिंग होने से उनकी वंश वृद्धि हो सकेगी। <br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 07 Jun 2025 16:29:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नाहरगढ़ अभ्यारण्य में पार्टी करने गया युवक लापता, पुलिस को 4 किमी दूर मिला </title>
                                    <description><![CDATA[इस सूचना पर थानाप्रभारी रमेश सैनी ने टीम बनाई और जंगल में ग्रामीणों के साथ युवक की तलाश शुरू कर दी। जंगल रात के अंधेरे में करीब 6 घंटे ऑपरेशन चला और करीब सात किलोमीटर दूर युवक एक पहाड़ी पर मिला। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/youth-went-missing-to-party-in-nahargarh-sanctuary-police-found/article-16022"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-07/chor-copy2.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। नाहरगढ़ अभ्यारण के जंगल में 5 दोस्तों के साथ पार्टी करने गए युवकों में से एक लापता हो गया। साथियों ने दो घंटे तक तलाश की, जब वह नहीं मिला, तो विश्वकर्मा पुलिस को सूचना दी। इस सूचना पर थानाप्रभारी रमेश सैनी ने टीम बनाई और जंगल में ग्रामीणों के साथ युवक की तलाश शुरू कर दी। जंगल रात के अंधेरे में करीब 6 घंटे ऑपरेशन चला और करीब सात किलोमीटर दूर युवक एक पहाड़ी पर मिला। पुलिस को देखकर युवक रोने लगा और कहा कि मुझे विश्वास नहीं था कि मैं बच पाऊंगा।  थानाप्रभारी विश्वकर्मा रमेश सैनी ने बताया कि विनोद कुमार अपने दोस्तों के साथ शाम करीब 5 बजे नाहरगढ़ पहाड़ी पर पार्टी करने निकला था। यह सभी नाहरगढ़ अभयारण्य के मायला बाग के जंगलों में पहुंच गए। पार्टी के बाद ये वापस जंगल से पैदल-पैदल बाहर निकलने लगे, तो विनोद इनसे पीछे रह गया। जब दोस्तों ने पीछे देखा, तो विनोद नहीं मिला। उन्होंने तलाश शुरू की। जंगल में नेटवर्क नहीं मिलने के कारण उससे सम्पर्क भी नहीं हो पा रहा था। ऐसे में चारों दोस्त ने विश्वकर्मा थाना पुलिस को सूचना दी।</p>
<p><strong>तलाशी के दौरान मंगवाई लोकेशन</strong><br />थानाप्रभारी ने बताया कि नरेन्द्र को तलाशने के लिए 3-4 टीमें बनाई थी, जब जंगल में पहुंचे, तो बारिश हो रही थी। रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। इस दौरान कुछ ग्रामीणों को अपने साथ लिया और तलाशना शुरू की। विनोद से भी सम्पर्क करने का प्रयास किया जा रहा था। ड्रेगन लाइट के सहारे पुलिस समेत अन्य लोग दो किलोमीटर तक अंदर पहुंचे। इस दौरान लेपर्ड के हमले का भी डर था। रात करीब 9 बजे विनोद से मोबाइल पर सम्पर्क हुआ, उसने तुरंत अपनी लोकेशन भेजी। पुलिस टीम से यह लोकेशन करीब 4 किलोमीटर दूर थी। लोकेशन का पीछा करते हुए टीम विनोद के पास पहुंची। विनोद पुलिस को देख भागकर आया और थानाप्रभारी रमेश सैनी को देखकर रोने लगा। पुलिस उसे 11 बजे निकालकर ले आई। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 Jul 2022 10:03:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इतनी कम हुई तादाद की सेंचुरी से हट गया घड़ियाल का नाम </title>
                                    <description><![CDATA[चंबल में घड़ियालों की अच्छी तादात के चलते 43 साल पहले मिला घड़ियाल अभयारण्य का दर्जा छीन लिया गया है। लगातार कम होती घड़ियालों की संख्या के चलते अब चंबल घड़ियाल अभयारण्य का नाम बदल कर घड़ियाल शब्द ही हटा दिया गया है। अब इस सेंचुरी का नाम राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य कर दिया गया है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-name-of-the-alligator-was-removed-from-the-sanctuary-of-such-a-reduced-number/article-12431"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/photo-2-itni-kum-hui-tadaad-ki-sanctuary-se-hat-gaya-ghariyaal-ka-naam.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। चंबल में घड़ियालों की अच्छी तादात के चलते 43 साल पहले मिला घड़ियाल अभयारण्य का दर्जा छीन लिया गया है। लगातार कम होती घड़ियालों की संख्या के चलते अब चंबल घड़ियाल अभयारण्य का नाम बदल कर घड़ियाल शब्द ही हटा दिया गया है। अब इस सेंचुरी का नाम राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य कर दिया गया है। राजस्थान को 7 दिसम्बर 1979 में  43 साल पहले चंबल घड़ियाल अभयारण्य का दर्जा मिला था। इससे पहले 20 दिसम्बर 1978 में मध्यप्रदेश और 29 जनवरी 1979 में उत्तर प्रदेश को चंबल घड़ियाल सेंचुरी घोषित किया था।  बाद में चंबल घड़ियाल अभयारण्य का नाम बदलकर राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य कर दिया गया। विशेषज्ञों ने लगातार घट रही घड़ियालों की संख्या को अभयारण्य का नाम बदलने की वजह बताया। <br /><br /><strong>यहां तक फैली है राजस्थान की सीमा</strong><br />राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य तीन राज्यों की सेंचुरी है। जिसमें मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश व राजस्थान शामिल हैं। हमारा प्रदेश अभयारण्य का 425 किमी एरिया कवर करता है, जो 2 भागों में बंटा है। पहला-जवाहर सागार डेम से कोटा बैराज के बीच का उपरी इलाका (अप स्ट्रीम) व दूसरा, केशवरायपाटन से धौलपुर तक का निचला इलाका (डाउन स्ट्रीम) तक है। यहां से राजस्थान की सीमा समाप्त हो जाती है। वहीं, कोटा का 160 किमी इलाका अभयारणय का हिस्सा है। <br /><br /><strong>कोटा में नहीं घडियाल</strong><br />राष्ट्रीय चंबल सेंचुरी में हमारा जिला जवाहर सागर से खातौली स्थित गुड़ला गांव तक 160 किमी में फैला है। विड़ंबना यह है, 160 में से करीब 154 किमी के दायरे में एक भी घड़ियाल नहीं है। जबकि, 6 किमी के दायरे में बसा गुड़ला में मौजूदगी नजर आती है। चंबल सेंचुरी प्रशासन द्वारा इन क्षेत्रों में घड़ियालों को बसाने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया जा रहा। वहीं, इको सेंसटिव जोन घोषित होने से इन क्षेत्रों में पर्यटन के लिहाज से अन्य कार्य भी नहीं हो पा रहे। <br /><br /><strong> अभयारण्य में आते हैं कोटा के ये इलाके</strong><br />प्रोफेसर कृष्नेंद्र सिंह नामा के मुताबिक नेशनल चम्बल अभयारण्य में कोटा का करीब 160 किमी एरिया शामिल है। ये इलाका बैराज की अप और डाउन स्ट्रीम में बंटे हैं। इनमें 27 किमी का एरिया जवाहर सागर से कोटा बैराज का है, जिसमें से 13 किमी का दायरा मुकुंदरा में आ रहा है। जबकि, डाउन स्टीम में 148 किमी का एरिया कवर होता है।  <br /><br /><strong>निचला इलाका ( डाउन स्ट्रीम)</strong> <br />रंगपुर घाट से सेंचुरी शुरू हो जाती है, जो विभिन्न इलाकों से होती हुई आखिरी छोर श्योपुर (एमपी) से मिल जाता है। यहीं से ही कोटा की 148 किमी की सीमा खत्म होकर मध्यप्रदेश की शुरू होती है। लेकिन, लेफ्ट साइड से राजस्थान की सीमा जारी रहती है। क्योंकि, इस साइड में बूंदी का केशवरायपाटन, सवाईमाधोपुर, करौली व धौलपुर हंै। <br /><br /><strong>ऊपरी इलाका ( अप स्ट्रीम)</strong><br />रावतभाटा स्थित जवाहर सागर डेम से कोटा बैराज तक के उपरी इलाकों में चंबल गार्डन, अधरशिला, भीतरिया कुंड, हैंगिंग ब्रिज, आरटीयू यूनिवर्सिटी के पीछे वाला क्षेत्र, गरड़िया महादेव, भंवरकुंज सहित 27 किमी का एरिया चंबल अभयारणय में आता है। <br /><br /><strong>यूं होती है घड़ियालों की गिनती</strong><br />प्रोफेसर नामा के अनुसार चंबल घड़ियाल सेंचुरी द्वारा हर साल फरवरी माह में ही घड़ियालों की गिनती की जाती है। सरीसृप यानी पानी में रहने के साथ धरती पर रैंगने वाले वन्यजीवों को भोजन के अलावा अपने शरीर का तापमान भी मेंटेन करना होता है। फरवरी एक मात्र ऐसा महीना होता है, जिसमें तापमान न तो ज्यादा गर्म होता है और न ही ठंडा। जब यह बाहर निकलते हैं तभी घड़ियालों व मगरमच्छों की गिनती हो पाती है।  <br /><br /><strong>95 प्रतिशत बच्चे बह जाते हैं बहाव में</strong> <br />घड़ियालों को प्रजनन एवं नेस्ट बनाने के लिए मोटी रेत की जरूरत होती है। लेकिन, कोटा का नदी तट पथरीला है जो इनके लिए उपयुक्त नहीं है। इनके अंडों से जब बच्चे निकलते हैं तो यह वह समय होता है, जब बारिश के कारण बेराज के गेट खोले जाते हैं। ऐसे में पानी के तेज बहाव में 95 प्रतिशत बच्चे बह जाते हैं। इनका संरक्षण तभी संभव होगा जब इनके प्राकृतिक आवास को बचाया जाए। हर तरह का अवैध खनन पर पूरी तरह से रोक लगे। वहीं, बांधों के गेट खोलने के दौरान पानी की निकासी इस तरह की जाए, जिससे घड़ियालों के बच्चे अकाल मौत का शिकार न हो। इसके अलावा मध्यप्रदेश के देवरी और उत्तर प्रदेश के कुकरैल कस्बे की तरह कोटा में भी प्रजनन केंद्र स्थापित किया जाना चाहिए। <br /><strong>कृष्णेंद्र सिंह नामा, सहायक आचार्य एवं रिसर्च सुपरवाइजर वनस्पति विभाग एलजेबरा कॉलेज</strong><br /><br /><strong>कोटा में मानवीय दखल ज्यादा</strong> <br /> यह बात सही है, जवाहर सागर से कोटा बैराज तक के इलाके में एक भी घड़ियाल नहीं है, क्योंकि इस इलाके में चट्टाने अधिक हैं। घड़ियाल रेतीली जगहों पर ही अंडे देते हैं, जो गुड़ला से धौलपुर तक के क्षेत्र में बहुत है। इसके अलावा कोटा के उपरी इलाके में प्राकृतिक आवास भी नहीं है। जबकि, मानवीय दखल बहुत ज्यादा है और गंदे नालों का पानी, अपशिष्ट पदार्थों का गिरने से पानी दूषित होता है, जिसके चलते घड़ियाल यहां रह नहीं पाते। यह नदी से 50 या 100 के दायरे में ही अंडे देते हैं, जो पानी प्रवाह के दौरान या तो बह जाते हैं या चट्टानों से टकराकर नष्ट हो जाते हैं। <br /><strong>अनिल यादव, एसीएफ राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Jun 2022 15:20:44 +0530</pubDate>
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                <title>कहने को घड़ियाल सेंचुरी, कोटा में न नाम न कोई काम</title>
                                    <description><![CDATA[चम्बल में धड़ल्ले से हो रहे अवैध खनन व लगातार बढ़ते जलीय प्रदूषण से घड़ियालों का अस्तिव खतरे में पड़ गया है। जवाहर सागर से कोटा बैराज व केशवरायपाटन तक के इलाके में एक भी घड़ियाल नहीं है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/alligator-sanctuary-to-say--neither-name-nor-work-in-kota/article-11208"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/tipper1.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। चम्बल में धड़ल्ले से हो रहे अवैध खनन व लगातार बढ़ते जलीय प्रदूषण से घड़ियालों का अस्तिव खतरे में पड़ गया है। जवाहर सागर से कोटा बैराज व केशवरायपाटन तक के इलाके में एक भी घड़ियाल नहीं है। वहीं, ग्रामीण इलाके के इटावा उपखंड में एकमात्र नेस्टिंग साइड गुड़ला है। यह गांव खातौली कस्बे से करीब 25 किमी दूर है। यहां 40 से 45 घड़ियालों की मौजूदगी है। <br /><br />विशेषज्ञों के मुताबिक चंबल घड़ियाल अभयारण्य के दायरे में आने वाले इलाके (राणा प्रताप सागर से कोटा बैराज तक) एक भी घड़ियाल नहीं बचा। जबकि, 30 साल पहले यहां घड़ियाल हुआ करते थे। इसका सबसे बड़ा कारण अवैध खनन, अवैध मतस्याखेट, किनारों पर होने वाली पेटाकाश्त व नदी में गिरते नाले हैं। जिन पर समय रहते अंकुश नहीं लगा तो जिले की नेस्टिंग साइड पर पनप रहे घड़ियालों की प्रजाति लुप्त हो जाएगी।  वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के मुताबिक घड़ियाल अभयारण्य में किसी भी तरह का खनन नहीं किया जा सकता। जबकि, जिम्मेदारों की लापरवाही के चलते खननकर्ता हर दिन चंबल का सीना छलनी कर बजरी व पत्थर निकाल रहे हैं।  <br /><br /><strong>बिखरा घरौंदा</strong><br />वन्यजीव स्कॉलर तरुण नायर के मुताबिक घड़ियाल रेत में पनपते हैं लेकिन चम्बल में लगातार बजरी का अवैध खनन होने से न नदी बची है और न ही घड़ियालों की मेटिंग के लायक माहौल। जैसे-तैसे घड़ियालों ने अंडे दे भी दिए हो तो वह सुरक्षित नहीं बच पाते। खनन के दौरान होने वाला शोर-शराबे से प्रजनन में खलल पड़ता है, जिससे घड़ियाल अपना इलाका छोड़ने को मजबूर हो गए।  <br /><br /><strong>कोटा की एकमात्र नेस्टिंग साइड है गुड़ला</strong><br />चंबल नदी के विशेषज्ञ हरिमोहन मीणा बताते हैं, कोटा में चंबल-पार्वती नदी का संगम स्थल गुडला जिले का एक मात्र घड़ियाल नेस्टिंग साइट है। यहां अच्छी तादात में घड़ियाल देखे जा सकते हैं। वर्तमान में यहां 40 से 45 घड़ियाल हैं। एक मादा करीब 50 अंडे देती है लेकिन, बाढ़ व पानी के बहाव के कारण 2 प्रतिशत ही जिंदा बच पाते हैं।<br /><br /><strong>ढाई साल पहले यहां चार घड़ियाल और 35 बच्चे थे अब एक भी नहीं</strong><br />मंडावरा नाका के वनरक्षक राजकुमार शर्मा ने बताया कि वर्ष 2020 में बूढ़ादीत कस्बे का मोराना गांव नेस्टिंग के लिए चर्चा में रहा। यहां तीन मादा और एक नर घड़ियाल था। वातावरण अनुकूल होने पर कुछ ही महीनों में मेटिंग होने से 35 से ज्यादा बच्चे नदी में अटखेलियां करते नजर आए थे, जो पानी के तेज बहाव में बह गए। वर्तमान में यहां एक भी घड़ियाल मौजूद नहीं है। हालांकि, चंबल-कालीसिंध नदी के संगम स्थल इटावा के नोनेरा गांव में वर्ष 2022 की गणना में एक घड़ियाल नजर आया है। <br /><br /><strong>ऐसे बस सकती है यहां घड़ियालों की बस्ती</strong> <br />राष्टÑीय चंबल अभयारण्य प्रशासन को सबसे पहले राणासागर बांध से कोटा बैराज तक के एरिए में घड़ियालों के लिए प्राकृतिक आवास चिन्हित करना चाहिए। सरवाइवल बजरी (विशेष मोटाई वाली रेत) चिन्हित स्थान पर बिछाकर अवैध मतस्य आखेट पर पूरी तरह रोक लगाएं। इसके बाद दो व्यस्क नर व मादा घड़ियालों को रेडियो ट्रांसमीटर लगाकर प्राकृतिक आवास में छोडेÞ। ट्रांसमीटर के जरिए इनकी गतिविधियों पर बराबर नजर रही जाए। यदि 2 माह तक ये घड़ियाल जोड़ा इस वातावरण में जीवित रह जाता है तो फिर एक-एक साल के बच्चे इनके पास छोड़े जाना चाहिए। इन प्रयासों के बाद यहां घड़ियालों की बस्ती बसाने की उम्मीद की जा सकती है।  <br /><strong>-डॉ. कृष्नेंद्र सिंह नामा, सहायक आचार्य एवं रिसर्च सुपरवाइजर वनस्पति विभाग एलजेबरा कॉलेज</strong><br /><br /><strong>चंबल को प्रदूषित होने से बचाना जरूरी</strong> <br />घड़ियाल अभयारण्य की जद में आने वाला चंबल का शहरी इलाका प्रदूषित हो चुका है। नदी में 22 तरह के नालों का गंदा पानी कैमिकल के साथ गिर रहा है। जिससे जलीय वन्यजीव अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं। जनप्रतिनिधियों व जिम्मेदार अफसर मूक दर्शक बने हुए हैं, इनकी तरफ से चंबल शुद्धिकरण को लेकर कोई प्रयास नहीं किया गया। घड़ियालों को बसाने के लिए चंबल की शुद्धी जरूरी है। <br /><strong>-बाबूलाल जाजू, प्रदेश प्रभारी, पीपुल फॉर एनिमल्स</strong><br /><br /><strong>गुडला में हैं 40 से 45 घड़ियाल</strong><br />चंबल सेंचुरी में आने वाले शहरी इलाकों में एक भी घड़ियाल नहीं है, जबकि ग्रामीण इलाके के खातौली कस्बे से 25 किमी दूर गुडला में इनकी संख्या 40 से 45 है। अप स्टीम का एरिया पथरीला होने से ये टकराकर अकाल मौत का शिकार हो जाते है। चंबल-पार्वती नदी का संगम स्थल गुड़ला कोटा की एकमात्र नेस्टिंग साइड है। <br /><strong>-हरिमोहन मीणा, चंबल नदी विशेषज्ञ</strong><br /><br /><strong>मानवीय दखल सबसे बड़ा कारण</strong><br /> घड़ियाल सेंसटीव जीव होता है। चंबल के आसपास खेती करने वाले लोग विभिन्न तरह के रसायनों का उपयोग करते हैं, जो नदी में मिलने से पानी दूषित होता है, जिसके कारण जलीय जीव जीवित नहीं रह पाते। मानवीय गतिविधियां अधिक होने से शोर-शराबे के कारण ये अपनी जगह बदल है।<br /><strong>अनिल यादव, एसीएफ, चंबल अभयारण्य</strong><br /><br /><strong>घड़ियालों को बसाने के किए जाएं इंतजाम</strong><br />करीब 25 साल पहले वन्यजीव विभाग ने हाड़ौती नेच्यूरल सोसाइटी के सहयोग से चंबल गार्डन से 8-9 घड़ियालों को जवाहर सागर की कड़पका खाळ में शिफ्ट किया था। क्योंकि, यहां पानी का दबाव कम होने के साथ वातावरण भी इनके अनुकूल था लेकिन संरक्षण के अभाव में कुछ ही सालों बाद यह गायब हो गए। राष्टÑीय चंबल अभयारणय प्रशासन को घड़ियाल के कुछ अंडे लाकर इनक्यूबेटर में रखें और बच्चे निकलने के बाद इन्हें अभेड़ा व उम्मेदगंज के रियासतकालीन तालाब में छोड़ा जाए। साथ ही इनके पालन-पोषण के पुख्ता इंतजाम किए जाएं। <br /><strong>-एमएच जेदी, नेचर प्रमोटर</strong><br /><br /><strong>1970 के बाद तेजी से हुई गिरावट</strong> <br />1970 के बाद से धड़ियालों की संख्या में तेजी से गिरावट होने लगा। क्योंकि इनका नेच्यूरल आवास खत्म होने लगे। अवैध खनन व मतस्य आखेट के कारण इन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा। यहां घड़ियालों की बस्ती फिर से बसाने के लिए विभाग को गाइड लाइन तैयार करनी चाहिए। <br /><strong>-डॉ. फातिमा सुल्ताना, विभागाध्यक्ष प्राणीशास्त्र जेडीबी कॉलेज</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jun 2022 16:09:10 +0530</pubDate>
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                <title>वन्य जीव अभ्यारण्य कुंभलगढ़ के इको सेंसेटिव जोन घोषित होने से उत्पन्न परिस्थितियों का मामला</title>
                                    <description><![CDATA[ विधानसभा में बुधवार को ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए विधायक खुशवीर सिंह ने वन्य जीव अभ्यारण्य कुंभलगढ़ के इको सेंसेटिव जोन घोषित होने से होटल व्यवसाय पर होने वाले प्रभाव का मुद्दा उठाया।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/case-of-circumstances-arising-out-of-declaration-of-wildlife-sanctuary-kumbhalgarh-as-eco-sensitive-zone/article-6582"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/vidhansabha.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। विधानसभा में बुधवार को ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए विधायक खुशवीर सिंह ने वन्य जीव अभ्यारण्य कुंभलगढ़ के इको सेंसेटिव जोन घोषित होने से होटल व्यवसाय पर होने वाले प्रभाव का मुद्दा उठाया।<br /><br />जवाब में वन मंत्री हेमाराम चौधरी ने विश्वास दिलाते हुए कहा कि सभी की राय लेकर ही फैसला किया जाएगा। जनता को किसी तरह की परेशानी में नहीं डाला जाएगा। अभी यह ड्राफ्ट पहली स्टेज में है, जब फाइनल होगा उससे पहले सभी की राय लेकर फैसला किया जाएगा। वही स्पीकर सीपी जोशी ने मंत्री हेमाराम को सलाह देते हुए कहा कि कावड़िया क्षेत्र का दौरा कर कर स्टडी करने की राय दी । कावड़िया में बेहतर तरीके से ट्यूरिज्म को डेवलप किया गया है। हेमाराम चौधरी ने जल्द ही अधिकारियों को भेजने का भरोसा दिया। सदन में वहीं उप नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने सलाह देते हुए कहा कि विधायकों की एक कमेटी बनाकर दौरा कराने की सलाह दी। सीपी जोशी ने कहा पहले अधिकारियों को दौरा करके आने दीजिए फिर कमेटी भेजने पर फैसला होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 23 Mar 2022 14:39:14 +0530</pubDate>
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