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                <title>farming - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>farming RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>राजस्थान 12वीं टॉपर नव्या मीणा : खेत और बकरियां चराने के साथ की पढ़ाई, पढ़ें संघर्ष से सफलता तक की कहानी</title>
                                    <description><![CDATA[12वीं परिणाम 2026 में लूणियावास की नव्या मीणा ने 99.60% अंक हासिल कर टॉप किया। किसान परिवार से आने वाली नव्या रोज 6 किमी पैदल स्कूल जाती थी। आर्थिक तंगी, घर-खेत के काम और जिम्मेदारियों के बीच उसने मेहनत जारी रखी। नव्या ने अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता और शिक्षकों को दिया।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/rajasthan-12th-topper-navya-meena-studied-along-with-farming-and/article-148694"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/navya-meena.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजस्थान बोर्ड 12वीं का रिजल्ट 2026 जारी हो गया है। लूणियावास की नव्या मीणा ने  99.60% अंक हासिल कर प्रदेश में टॉप किया। नव्या एक साधारण किसान परिवार से आती है, जिन्होंने 12वीं की परीक्षा में 99.60% अंक हासिल कर नया कीर्तिमान बनाया है। नव्या हर दिन 6 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाती थी। सीमित संसाधनों और आर्थिक तंगी के बावजूद उसने पढ़ाई के प्रति अपना जुनून कभी कम नहीं होने दिया।</p>
<p><strong>परिवार की जिम्मेदारियों के साथ पढ़ाई</strong><br />नव्या के पिता पानी की कमी के कारण खेती छोड़ गुजरात में मजदूरी करते हैं। छह भाई-बहनों में तीसरे स्थान पर नव्या घर के काम, खेत और बकरियां चराने के साथ पढ़ाई भी करती रही। उसकी मेहनत और लगन ने आज उसे इस मुकाम तक पहुंचाया है।</p>
<p><strong>शिक्षकों और परिवार को दिया श्रेय</strong><br />नव्या अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता और सरकारी स्कूल के शिक्षकों को देती है। घर में पढ़ाई का माहौल और बहन के साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा ने उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>शिक्षा जगत</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 13:03:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हिमाचल प्रदेश में विदेशी ड्रैगन फ्रूट की खेती सफल : किसान राजेंद्र को 5 क्विंटल फसल, 864 पौधे और सरकारी सब्सिडी से मिली मदद</title>
                                    <description><![CDATA[पपलाह गांव के प्रगतिशील किसान राजेंद्र कुमार ने यूट्यूब से प्रेरणा लेकर ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू की। पांच कनाल भूमि में 864 पौधे लगाए, जिससे शुरुआती दौर में ही पांच क्विंटल फल मिले। बागवानी विभाग से 29,160 रुपए की सब्सिडी मिली। अब उन्होंने नर्सरी भी शुरू की है, जिससे अन्य किसान भी लाभ ले सकते हैं।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/business/farmer-rajendra-successful-in-cultivating-foreign-dragon-fruit-in-himachal/article-129492"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/copy-of-news-(1)33.png" alt=""></a><br /><div>हमीरपुर। हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले में प्रगतिशील किसान राजेंद्र कुमार ने विदेशी फल ‘ड्रैगन फ्रूट’ की सफल बागवानी करके काश्तकारों को खेती से अधिक मुनाफा कमाने की नई राह दिखाई है। राज्य सरकार बागवानी विभाग के जरिए यहां आम, अमरूद और खट्टे फलों की खेती को बढ़ावा देती आ रही है। विभाग अब अन्य फलों की खेती की संभावनाएं तलाश रहा है। जिले के भोरंज उपमंडल के पपलाह गांव के राजेंद्र कुमार भी ऐसे प्रगतिशील किसान हैं। उन्होंने अपनी लगभग पांच कनाल जमीन पर ‘ड्रैगन फ्रूट’ का बाग लगाया और नर्सरी भी बनाई। यहां के बागवानी विभाग के अधिकारी भी राजेंद्र कुमार की इस दिशा में मदद करते हैं। उनकी कोशिश है कि इस विदेशी फल के बाग को दूसरे किसानों के लिए  एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाए ताकि अन्य किसान भी  दूसरे और नए फलों की खेती को अपनाएं।</div>
<div> </div>
<div>यूट्यूब पर जाना इसके बारे में  राजेंद्र ने कुछ साल पहले यूट्यूब पर ‘ड्रैगन फ्रूट’ के बारे में जाना और तब उनकी इसकी खेती में रुचि पैदा हुई। उन्होंने यूट्यूब पर और जानकारी जुटाई और प्रशिक्षण के लिए महाराष्ट्र गए। इसके बाद उन्होंने अपने खेत में ‘ड्रैगन फ्रूट’ का बाग लगाने की कोशिशें शुरु कर दीं। उनको बागवानी विभाग से लगभग 29,160 रुपए की सब्सिडी भी मिली। कुमार ने बाग में 216 खास तरह के खंभे लगाए और हर एक खंभे पर चार पौधे लगाए। इस प्रकार, उनके बाग में अब कुल 864 पौधे हैं, और इनमें से कुछ पौधों ने इस मौसम में अपनी पहली फसल दे दी है। दरअसल ‘ड्रैगन फ्रूट’ को फलने फूलने के लिए खंभे के सहारे की जरूरत पड़ती है। </div>
<div> </div>
<div>शुरूआती दौर में मिल चुके पांच क्विंटल फल  राजेंद्र कुमार ने बताया कि उनके बाग में शुरुआती दौर में ही लगभग पांच क्विंटल फल मिल चुके हैं। उन्होंने बताया कि बाजार में इस फल की कीमत आसानी से 200 से 250 रुपए प्रति किलोग्राम मिल जाती है। उन्होंने बताया कि बाग में एक खंभा खड़ा करने और उस पर चार पौधे लगाने में 2,000 से 2,500 रुपए तक का खर्च आता है। एक बार पौधे तैयार हो जाने पर, ये किसान को लगातार अच्छी आय प्रदान करते हैं। इसमें बहुत कम मेहनत लगती है और बाज़ार में अच्छी कीमत भी मिलती है। इसी वजह से ड्रैगन फ्रूट की खेती किसानों और बागवानों के लिए बेहद फायदेमंद और सुविधाजनक साबित हो सकती है। कुमार ने बताया कि उन्होंने अब इस फल की एक नर्सरी भी बना ली है, जहां से अन्य किसान भी पौधे ले सकते हैं और मुनाफा कमा सकते हैं।  </div>
<div> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Oct 2025 11:09:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अवैध पैटा काश्त : ड्रोन करें पहरेदारी और तारबंदी बने ढाल,  जलस्रोतों का दम घोंट रही अवैध खेती </title>
                                    <description><![CDATA[बरसाती नदियों और तालाबों में पानी का प्राकृतिक प्रवाह रुक रहा है। परिणाम स्वरूप तालाब आधे भी नहीं भर पा रहे और भू-जल स्तर लगातार गिरता जा रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/illegal-patta-cultivation--drones-should-monitor-and-fences-become-a-shield--illegal-farming-is-choking-water-sources/article-128343"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/1111of-news-(1).png" alt=""></a><br /><p>कोटा। हाड़ौती क्षेत्र में जलस्रोतों पर अवैध पैटा काश्त (कब्जा कर खेती) का दायरा बढ़ता ही जा रहा है। तालाब और नदियों की जमीन पर ग्रामीण व प्रभावशाली लोग खुलेआम खेती कर रहे हैं। इसमें मुख्य रूप से चना, सोयाबीन और मौसमी सब्जियां उगाई जा रही हैं। पानी की उपलब्धता और उपजाऊ मिट्टी के कारण यहां खेती आसानी से हो जाती है, लेकिन इसकी कीमत जलस्रोतों को चुकानी पड़ रही है। बरसाती नदियों और तालाबों में पानी का प्राकृतिक प्रवाह रुक रहा है। परिणामस्वरूप तालाब आधे भी नहीं भर पा रहे और भू-जल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। ऐसे में इन जलस्रोतों को सुरक्षा कवच की दरकार है। पर्यावरणविदें का कहन है कि जलस्रोतों की जमीन पर अवैध खेती से इनके अस्तित्व पर संकट आने लगा है। इसलिए अब इनकी सुरक्षा के लिए तारबंदी सहित अन्य उपाय करने जरूरी है। अन्यथा आगामी वर्षों में जलस्रोतों का नामोनिशान मिट जाएगा।<br /> <br /><strong>पैटा काश्त के नाम पर कर रहे कब्जा:</strong> तालाबों और नदियों के किनारे की जमीन को कानूनी रूप से संरक्षित माना जाता है, ताकि बारिश का पानी संग्रहित हो सके और भूजल स्तर बना रहे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इन जलाशयों की जमीन पर खेती कर अवैध कब्जा किया जा रहा है, जिसे "पैटा काश्त" कहा जाता है। हाड़ौती अंचल में जलस्रोतों की जमीनों पर तेजी से हो रही अवैध पैटा काश्त (अस्थायी खेती) ने पर्यावरणविदों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। कई तालाब, नदियों की सीमाएं और बरसाती नालों की जमीनें किसानों और भूमाफियाओं द्वारा जोत ली गई हैं, जिससे भविष्य में जलसंकट और जल भराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। सरकार और प्रशासन की ओर से इनकी सुरक्षा के लिए पुख्ता उपाय नहीं करने से अवैध पैटा काश्त का दायरा बढ़ता ही जा रहा है।</p>
<p><strong>कमाई के लिए कब्जे की होड़</strong><br />जानकारी के अनुसार राजस्व रिकॉर्ड में इन जमीनों को तालाब और नदी की भूमि बताया गया है। बावजूद इसके कब्जाधारी ट्रैक्टर से जुताई कर फसल बो देते हैं। प्रशासन की कई बार की कार्रवाई भी टिकाऊ साबित नहीं हुई। अधिकांश मामलों में खेत खाली करवाने के कुछ समय बाद फिर कब्जा हो जाता है। तालाबों और नदियों की जमीनों पर खेती करने के लिए किसानों और ग्रामीणों ज्यादा खर्चा नहीं करना पड़ता है। वहीं मुफ्त में सिंचाई की सुविधा भी उपलब्ध हो जाती है। इसलिए अब इस भूमि को अधिकांश किसानों ने अच्छी कमाई का जरिया बना लिया है। प्रशासन की ओर से प्रभावी नहीं होने से अवैध कब्जा काश्त के मामले बढ़ते जा रहे हैं।</p>
<p><strong>यह हो सकती है कार्रवाई?</strong><br />- ड्रोन सर्वे व सीमांकन: तालाब-नदी की जमीन का ड्रोन से सर्वे करवा कर सीमांकन किया जाए।<br />- तारबंदी और पिलर: जलस्रोतों की परिधि तारबंदी कर या फिर पिलर लगाकर सुरक्षित की जाए।<br />- अतिक्रमण हटाने का स्थायी अभियान: केवल अस्थायी नहीं, बल्कि बार-बार निगरानी करते हुए कार्रवाई हो।<br />- जुर्माना व कानूनी कार्रवाई: कब्जाधारियों पर आर्थिक दंड और राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने पर एफआईआर करवाई जाए।<br />- ग्राम पंचायत निगरानी समिति: स्थानीय स्तर पर चौकसी बढ़ाई जाए और पंचायतों को जिम्मेदारी सौंपी जाए।</p>
<p><strong>हाड़ौती क्षेत्र में अवैध पैटा काश्त के अनुमानित आंकड़े (2024-25)</strong><br /><strong>जिला जल स्रोतों की संख्या अवैध पैटा काश्त प्रभावित क्षेत्र (हैक्टेयर में)</strong><br />कोटा    1,200    700-800 हैक्टेयर<br />बूंदी    950    600-700 हैक्टेयर                 <br />बारां    800    500-600 हैक्टेयर                       <br />झालावाड़    1,100    750-850 हैक्टेयर   </p>
<p>जलस्रोतों की जमीन पर अवैध पैटा काश्त के कारण न केवल जलभराव और बाढ़ जैसी समस्या बढ़ रही है, बल्कि आने वाले समय में पीने के पानी की किल्लत और सिंचाई संकट भी गहरा सकता है। अब इसे रोकने के लिए तारबंदी और सीमांकन जरूरी है।<br /><strong>- राजू गुप्ता, पर्यावरणविद्</strong></p>
<p>तालाबों के कैचमेंट एरिया पर खेती होने से जलभराव रुक जाता है। पहले जहां पानी महीनों रहता था, अब कुछ ही दिनों में सूख जाता है। कुछ लोग थोड़े फायदे के लिए आने वाली पीढ़ियों के जलस्रोत नष्ट कर रहे हैं। प्रशासन को सख्ती से कार्रवाई करनी चाहिए।<br /><strong>- रघुवीर सिंह, पूर्व उपसरपंच</strong></p>
<p>जहां भी जलस्रोतों की जमीन पर पैटा काश्त करने की शिकायत मिलती है तो वहां पर टीम भेजकर सीमांकन करवाया जाता है। मौके पर अवैध कब्जा काश्त मिलने पर उसे हटाने की कार्रवाई की जाती है। सुरक्षा के लिए तारबंदी सहित अन्य उपाय करने का मामला सरकार के स्तर का है। <strong> - जुगल कुमार, नायब तहसीलदार</strong></p>
<p>विभाग के अधीन जलस्रोतों पर अवैध कब्जा काश्त को रोकने के लिए नियमित रूप से निगरानी की जाती है। यदि कहीं से कोई शिकायत मिलती है तो इस सम्बंध में कार्रवाई भी करते हैं। वहीं किसानों और ग्रामीणों से समझाइश भी की जाती है।<br /><strong>- संजय कुमार, सहायक अभियंता, जल संसाधन विभाग</strong></p>
<p>आलनिया तालाब पक्षियों के लिए बेतरीन वैटलेंड है। लेकिन, पेटाकाश्त करने वालों ने अतिक्रमण कर नुकसान पहुंचा रहे हैं। वन विभाग व सिंचाई विभाग को इनके खिलाफ कार्रवाई कर गश्त बढ़ानी चाहिए।  ताकि, दोबारा पेटाकश्त न हो सके। <br /><strong>- एएच जैदी, नेचर प्रमोटर </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Sep 2025 17:24:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>खरीफ की बुवाई अब भी अपने लक्ष्य से पीछे, केवल 59 फीसदी पर अटकी, खेतों में लौटी हरियाली किसानों की मेहनत रंग लाने को तैयार</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान के आसमान में बादल हैं, धरती की छाती पर पहली हरियाली उग आई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/kharif-sowing-is-still-ready-to-bring-off-the-hard/article-119890"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/882roer-(3)1.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजस्थान के आसमान में बादल हैं, धरती की छाती पर पहली हरियाली उग आई है और किसानों की आंखों में उम्मीदें लौट रही हैं, लेकिन खरीफ  2025 की बुवाई अब भी अपने लक्ष्य से पीछे है। राज्य सरकार ने इस साल 165 लाख हेक्टेयर में खरीफ  फसलों की बुवाई का लक्ष्य रखा था, लेकिन अब तक सिर्फ 97.36 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही बुवाई हो सकी है यानी कुल लक्ष्य का महज 59 प्रतिशत है। मिट्टी में नमी है पर मानसून की देरी और अनियमित बरसातों ने बुवाई की गति पर ब्रेक लगा दिया है। किसान अब भी पूरा मौसम नहीं आधे मौसम में पूरी फसल की दुविधा से जूझ रहे हैं।</p>
<p><strong>जैव विविधता के प्रहरी ग्वार और अरंडी पिछड़े :</strong></p>
<p>ग्वार की बुवाई भी सिर्फ 31 प्रतिशत रही है, जबकि यह न सिर्फ  पशु आहार और जमीन सुधार की फसल है, बल्कि इसका वैश्विक मांग वाला उद्योग भी है। अरंडी जैसी पारंपरिक फसल में तो जैसे सांस ही नहीं बची केवल 624 हेक्टेयर में बुवाई हुई है।</p>
<p><strong>अनाज और नकदी फसलों में किसानों ने हाथ डाला :</strong></p>
<p>इस मुश्किल मौसम में भी कुछ फसलें उम्मीद की तरह उभरी हैं। मक्का व बाजरा की बुवाई 77 प्रतिशत और कपास की 82 प्रतिशत बुवाई हो चुकी है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि अनाजों और नकदी फसलों में किसानों ने सबसे पहले हाथ डाला है। इसके उलट तिलहन और दालों की बुबाई औसत से काफी कम हो पाई है। इसमें तिल की बुवाई सिर्फ  29 प्रतिशत, अरंडी तो महज 3 प्रतिशत और मूंग भी 53 प्रतिशत पर अटकी हुई है। दालों की कुल बुवाई 50 प्रतिशत लक्ष्य तक ही पहुंच पाई है, जो पोषण सुरक्षा और बाजार दोनों के लिए चिंताजनक संकेत है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 09 Jul 2025 12:01:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur PS]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कोटा के खेतों में दिखेगी डेनमार्क व नीदरलैंड की झलक, विदेशा यात्रा पर जाएंगे किसान</title>
                                    <description><![CDATA[प्रशिक्षण लेने के बाद किसानों द्वारा कोटा संभाग के खेतों में डेनमार्क और नीदरलैंड की खेती की तकनीक का उपयोग किया जाएगा।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/a-glimpse-of-denmark-and-netherlands-will-be-seen-in-the-fields-of-kota/article-106000"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-03/257rtrer-(2)1.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । प्रदेश के 100 प्रगतिशील व नवाचारी किसानों को सरकार खेती में आधुनिक तकनीक व नवाचार से रूबरू करवाने के लिए जल्द ही विदेश यात्रा पर भेजेगी। इनमें कोटा संभाग के 9 किसान भी शामिल हैं। अब तक किसानों को इजरायल भेजा जाता रहा है। पिछले कुछ समय इजरायल व हमास के बीच चल रहे संघर्ष को देखते हुए इस बार सरकार ने किसानों को डेनमार्क व नीदरलैंड भेजने का निर्णय किया है। वहां इन किसानों को हाईटेक खेती व डेयरी का प्रशिक्षण दिया जाएगा। एक सप्ताह के इस भ्रमण कार्यक्रम को लेकर किसानों का चयन हो चुका है। कोटा सहित जोधपुर, भरतपुर, बीकानेर और अन्य संभागों के किसानों को यह मौका दिया जाएगा। प्रशिक्षण लेने के बाद किसानों द्वारा कोटा संभाग के खेतों में डेनमार्क और नीदरलैंड की खेती की तकनीक का उपयोग किया जाएगा।</p>
<p><strong>कोटा जिले के तीन किसानों का चयन</strong><br />उद्यान विभाग के अधिकारियों के अनुसार सरकार की ओर से किसानों का चयन करने के लिए अंक निर्धारित किए गए थे। इन अंकों के आधार पर कोटा जिले के तीन किसानों का चयन किया गया है। इनमें दो किसान सांगोद और एक किसान सीमल्या क्षेत्र का है। नॉलेज एनहांसमेंट प्रोग्राम के तहत 75 फीसदी किसानों का चयन विभागीय स्तर पर हो चुका है। अब शेष पच्चीस प्रतिशत किसानों का चयन राज्य सरकार के स्तर पर होना है। कोटा संभाग के कुल 9 किसानों का चयन किया गया है। इनमें एक पशुपालन क्षेत्र का शामिल किया गया है। उद्यान विभाग ने अंकों के आधार पर किसानों का पैनल बनाकर सरकार के पास भेज दिया था। बाद में सरकार द्वारा विदेश यात्रा के लिए किसानों का चयन किया गया है।   </p>
<p><strong>प्रथम चरण में जाएंगे सौ किसान</strong><br />उद्यान विभाग के अधिकारियों के अनुसार किसानों को विदेशों में भेजने की घोषणा राजस्थान सरकार ने वित्तीय वर्ष 2024-25 के बजट में की थी। इस सम्बंध में किसानों से दस सितम्बर तक आवेदन मांगे गए थे। चयनित होने वाले किसानों में एसटी, एससी, महिला कृषक के साथ-साथ बीस प्रतिशत पशुपालकों को शामिल किया गया। कुल अस्सी किसानों व बीस पशुपालकों का चयन किया गया। प्रथम चरण में कुल सौ किसान विदेश जाएंगे। वहां नई तकनीक सीखकर राजस्थान में अन्य किसानों को सिखाएंगे व खुद भी उसका उपयोग करेंगे।  </p>
<p><strong>128 किसानों ने किया था आवेदन</strong><br />सरकारी खर्च पर विदेश यात्रा करने के लिए किसानों में होड़ मची गई थी।  नॉलेज एनहांसमेंट प्रोग्राम के तहत किसानों से विदेशा यात्रा के लिए आवेदन मांगे गए थे। इसके तहत कोटा संभाग से 128 किसानों ने विदेश यात्रा के लिए आवेदन किया था। यानी अधिकांश किसान सरकारी खर्च पर विदेश जाना चाहते थे। उद्यान विभाग ने अंकों के आधार पर किसानों का पैनल बनाकर सरकार के पास भेज दिया था। इसके बाद सरकार ने कोटा संभाग के 9 किसानों को चयन कर लिया है। संभाग के एक किसान का चयन सरकार द्वारा किया जाएगा। सरकार द्वारा सभी संभा्रगों से किसानों का चयन करने के बाद जल्द ही इनकों को विदेश यात्रा पर भेजा जाएगा।  </p>
<p><strong>फैक्ट फाइल</strong><br />-100 प्रगतिशील किसान जाएंगे विदेश<br />- 09 किसानों का कोटा संभाग से चयनित<br />- 128 किसानों ने किया था आवेदन<br />- 25 फीसदी किसानों का चयन सरकार करेगी</p>
<p>राज्य सरकार का यह प्रोग्राम युवा किसानों को खेती के लिए प्रोत्साहित करने का अच्छा प्रयास है। विदेशों में हाईटेक तरीके से खेती की जाती है। यहां के किसानों को वहां पर खेती की उन्नत तकनीक सीखने को मिलेगी। इससे अन्य किसानों को भी खेती की जानकारी मिलेगी।<br /><strong>-लक्ष्मीचंद नागर, किसान </strong></p>
<p>राज्य सरकार नॉलेज एनहांसमेंट प्रोग्राम के तहत किसानों को जल्द डेनमार्क व नीदरलैंड हाईटेक खेती के प्रशिक्षण के लिए भेजेगी। कोटा संभाग से 9 किसानों का चयन कर लिया गया है। एक किसान का चयन सरकार करेगी। इसके लिए 128 किसानों ने आवेदन किया था। <br /><strong>-आर. के. जैन, संयुक्त निदेशक, उद्यान विभाग, कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Mar 2025 16:23:29 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>तापमान में बढ़ोतरी का खेती पर नकारात्मक असर</title>
                                    <description><![CDATA[जलवायु परिवर्तन का असर खेती किसानी पर साफ दिखाई देने लगा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/increase-in-temperature-negatively-on-farming/article-105470"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/257rtrer95.png" alt=""></a><br /><p>जलवायु परिवर्तन का असर खेती किसानी पर साफ दिखाई देने लगा है। कहा जा रहा था कि 2024 की फरवरी सर्वाधिक गर्मी वाला माह रहा है पर 2025 में जनवरी में जिस तरह से तापमान में बढ़ोतरी देखी गई है और फरवरी में ही देश के अधिकांश हिस्सों खासकर उत्तरी भारत में तापमान में लगातार तेजी देखी जा रही है, वह चिंतनीय होती जा रही है। दिल्ली, उत्तरप्रदेश,  मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान सहित अनेक प्रदेशों में फरवरी में अधिकतम तापमान का आंकड़ा 30 डिग्री को छूने को बेताब हो रहा है। देश के कई हिस्सों में दिन का तापमान 29 डिग्री को पार कर रहा है। यह कोई हमारे देश के ही हालात नहीं हैं अपितु दुनिया के अधिकांश देशों में जलवायु परिवर्तन का असर साफ  दिखाई देने लगा है। बढ़ता तापमान बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है। बढ़ते तापमान के कारण परिस्थिति तंत्र प्रभावित हो रहा है। बीमारियां तो फैल ही रही हैं संपूर्ण तंत्र पर ही नकारात्मक प्रभाव पड़ता जा रहा है। </p>
<p>चिंतनीय यह है कि एक और हम निरंतर घटते भूजल स्तर से प्रभावित हो रहे हैं तो ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का असर दिखाई दे रहा है। असमय अतिवृष्टि, अनावृष्टि, तूफान, जंगलों में आग आदि आदि सीधा असर दिखाई दे रहा है। जहां तक खेती-किसानी का प्रश्न है मौसम के अप्रत्याशित बदलाव से फसल चक्र पर नकारात्मक असर दिखने लगा है। बुआईं से लेकर फसल के पक कर तैयार होने का चक्र होता है। दर असल हो यह रहा है कि जिस समय फसल में फूल आने का समय होता है उस समय तापमान बढ़ने से इनका विकास रुक जाता है और फसल पकने लगती है, इससे फसल में खराब और उत्पादन में कमी होना स्वाभाविक हो जाता है। दिसंबर, जनवरी की सर्दी और फरवरी में औसत तापमान से फसलों का सही ढंग से विकास संभव हो पाता है। एक अन्य चिंतनीय कारण यह भी बनता जा रहा है कि मावठ के समय मावठ नहीं होती, सर्दियों की बरसात के समय बरसात नहीं होती और जिस समय तापमान में बढ़ोतरी होनी चाहिए उस समय आंधी, तूफान और बरसात आकर फसल को चौपट करने में कोई कमी नहीं छोड़ती। </p>
<p>इसका सीधा सीधा असर खाद्यान्न संकट के रुप में देखा जा सकता है। जब फसल की कटाई का समय होता है उस समय आंधी तूफान या ओला-बरसात होकर फस्ल को चौपट करने में कमी नहीं छोड़ती। इसी तरह से जनवरी-फरवरी में जब तापमान में गिरावट की आवश्यकता होती है उस समय तापमान में बढ़ोतरी चिंता का विषय बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जलवायु परिवर्तन के हालात यही रहे तो कुछ खाद्य वस्तुओं के भावों में कई गुणा तक बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। तापमान की असामयिक उतार-चढ़ाव के चलते कृषि पैदावार पर सीधा सीधा नकारात्मक असर पड़ रहा है। कृषि उत्पादन प्रभावित हो रहा है। गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। इससे साफ  हो जाता है कि खाद्य वस्तुओं के भाव बढ़ेंगे ही और उसका सीधा असर हमें महंगाई के रुप में देखने को मिलेगा। मजे की बात यह है कि जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के देशों में तेजी से बंजर होती भूमि को लेकर चिंता तो जताई जा रही है पर अभी तक इन हालातों से निपटने का ठोस आधार तैयार नहीं किया जा सका है।</p>
<p>आज दुनिया के देश आसन्न खाद्यान्न संकट को लेकर चिंतित है। इसके लिए बड़े बड़े सम्मेलनों में चिंतन मनन हो रहा है। विश्व खाद्य संगठन सहित दुनिया की संस्थाएं इस संकट को लेकर परेशान हैं। जलवायु परिवर्तन का असर जब साफ साफ  सामने आने लगा है तो उस हालात में मौसम विज्ञानियों और कृषि विज्ञानियों के सामने बड़ी चुनौती आ गई है। एक और जलवायु परिवर्तन को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले कारकों का कोई ना कोई विकल्प खोजना ही होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि इलेक्ट्रोनिक उत्पादों व नई नई खोजों ने हमारा जीवन आसान बनाया है पर उसके साइड इफेक्ट तेजी से असर दिखाने लगे हैं। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग ने भूमि की उर्वरा शक्ति को प्रभावित किया है। अत्यधिक जल दोहन से भूजल का स्तर साल दर साल नीचे जाता जा रहा है। </p>
<p>भू क्षरण होने लगा है। भूमि तेजी से बंजर होती जा रही है। प्रयास यह करना होगा कि जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहे मौसम चक्र के बदलाव के अनुकूल फसलों की किस्में तैयार हो। क्योंकि प्रकृति से छेड़छाड़ करने में हमने कोई कमी नहीं छोड़ी और उसका खामियाजा हमें आज भुगतना पड़ रहा है। तेज सर्दी के समय गर्मी से दो चार होना पड़ रहा है। इस सबके साथ ही धरती के बढ़ते तापमान को नियंत्रित करने के उपायों पर ध्यान देना होगा। हालात गंभीर चिंतनीय होते जा रहे हैं और यही हालात रहे तो इसका असर सारी दुनिया को भुगतना होगा।  </p>
<p><strong>-डॉ.राजेन्द्र प्रसाद शर्मा </strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/increase-in-temperature-negatively-on-farming/article-105470</link>
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                <pubDate>Tue, 25 Feb 2025 12:20:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जेड श्रेणी की सुरक्षा से बची सब्जियों की जान, बारिश से खेतों में मौजूद सब्जियों को नहीं हुआ नुकसान</title>
                                    <description><![CDATA[तेज बरसात में कारगर साबित हुई प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक ।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/z-category-protection-saved-the-lives-of-vegetables/article-101097"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-01/257rtrer26.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होने के कारण कोटा जिले में बुधवार रात को तेज बरसात खेतों में मौजूद सब्जियों की फसल के लिए आफत बन सकती थी, लेकिन प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक सब्जियों के लिए जेड श्रेणी की सुरक्षा साबित हुई और कोई नुकसान नहीं हो पाया। इस तेज सर्दी के मौसम में बरसात से सब्जियों का उत्पादन प्रभावित होने की संभावना बन गई थी। किसानों द्वारा उद्यान विभाग की मल्चिंग तकनीक से पौधों को सफेद प्लास्टिक से कवर करने से उनकी सुरक्षा हो गई है। अब कोटा जिले में मौसम की मार से परेशान किसान मल्चिंग खेती की ओर कदम बढ़ा रहे है। इससे न केवल उनकी फसल का उत्पादन बढ़ रहा है वहीं उनके खेती के खर्चे में भी कमी आने लगी है। </p>
<p><strong>उत्पादन और आमदनी में हो रहा इजाफा</strong><br />जिले में सैकड़ों बीघा भूमि के खेतों में किसान अब इसी तर्ज पर मिर्च, करेला, आलू व टमाटर की खेती कर रहे हैं। कृषि एक्सपर्ट का मानना है कि इस तकनीक से किसान के खेत में खरपतवार भी नहीं होती है जिससे उसे खरपतवार हटाने के लिए खुदाई की जरूरत भी नहीं पड़ती है। अब सैकड़ों किसान इस तकनीक से फसल उत्पादन कर रहे है। मल्चिंग तकनीक का अर्थ अपनी फसल को पूरी तरह से सफेद प्लास्टिक के कवर करके उसकी सुरक्षा करना है। इससे पौधों की ग्रोथ में बढ़ोतरी हो रही है और ग्रोथ अच्छी होने से फसल का उत्पादन भी बढ़ने लगा है। इससे किसानों की आमदनी भी अन्य तरकीब से होने वाली आमदनी के बजाय दोगुनी होने लगी है।</p>
<p><strong>पाले से सुरक्षा, शीतलहर का झंझट समाप्त</strong><br />प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक से फसल की पौध को ऊपर की ओर प्लास्टिक से ढंकने के कारण सर्दी के मौसम में पाला पड़ने से सुरक्षा मिल रही है। वहीं शीत लहर से भी फसल को बचाया जा रहा है। उक्त प्लास्टिक सफेद व पारदर्शी होने से सूरज की किरणें भी पर्याप्त मात्रा में पौधों तक पहुंचने के कारण पौधे की बढ़ोतरी में कोई नुकसान नहीं हो रहा है। इस तरकीब को अपनाने से फसल के पौधे के चारों तरफ उगने वाले खरपतवार नहीं होने से खरपतवार हटाने के लिए लगने वाले मजदूर की आवश्यकता नहीं पड़ती है। साथ ही खरपतवार हटाने के लिए रासायनिक दवा की आवश्यकता भी नहीं होती है। इसी प्रकार फसल में किसानों की ओर से दिया जाने वाला रासायनिक खाद व गोबर की खाद भी बूंद- बूंद सिंचाई के साथ देने से खर्च में कमी आती है। </p>
<p><strong>शीत ऋतु में नुकसान का खतरा अधिक</strong><br />कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार जब शीतऋतु में तापमान काफी नीचे गिर जाए और दोपहर बाद अचानक हवा का बहाव बन्द हो जाए व आसमान साफ रहे तो उस रात तेज सर्दी पड़ने के संकेत है। तेज सर्दी के कारण फसलों, फलवृक्षों, सब्जियों के तनों, पत्तियों, फूलों तथा फलों में उपस्थित द्रव बर्फ के रूप में जम जाता है, जो सूर्य की रोशनी से पिघलना शुरू होती है। इससे पौधों के इन भागों की कोशिकाएं फट कर नष्ट हो जाती है। जिससे पौधों की पत्तियां झुलसी हुई नजर आती है और फल व फूल झड़ जाते हैं। इससे सब्जी फसलों का उत्पादन प्रभावित हो जाता है और किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है।</p>
<p>हर बार सर्दी में बरसात के कारण सब्जियों की फसल को काफी नुकसान पहुंंचता था। इस साल प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक से पौधों को सुरक्षा प्रदान की गई थी। इस कारण तेज बरसात में भी सब्जियों की पौध को कोई नुकसान नहीं हो पाया।<br /><strong>- शिवरतन मीणा, किसान</strong></p>
<p>अब कोटा जिले में मौसम की मार से परेशान किसान मल्चिंग खेती की ओर कदम बढ़ा रहे है। इससे न केवल उनकी फसल का उत्पादन बढ़ रहा है वहीं उनके खेती के खर्चे में भी कमी आने लगी है। तेज बरसात, पाला और शीतलहर से पौधों को सुरक्षा मिलती है। <br /><strong>- एन.बी. मालव, उपनिदेशक, उद्यान विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Jan 2025 15:16:10 +0530</pubDate>
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                            </item>
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                <title>जांच में मिला मिलावटी खाद व कीटनाशी</title>
                                    <description><![CDATA[अभियान के दौरान खाद, बीज और कीटनाशी के 500 नमूने लेकर जांच के लिए प्रयोगशाला में भेजे गए थे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/inspection-found-adulterated-fertilizers-and-pesticides/article-96302"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/6633-copy190.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा ।  खेती-किसानी के बढ़ रहे रुझान को देखते हुए खाद-बीज और कीटनाशकों के कारोबार में भी इजाफा हो रहा है। ऐसे में कृषि आदान भी मिलावट के दंश से अछूते नहीं है। इसके तहत जिले में कृषि विभाग की ओर से गुण नियंत्रण अभियान चलाया जा रहा है। गत एक माह से चल रहे अभियान के तहत विभाग की ओर से खाद-बीज और कीटनाशकों के नमूने लिए गए हैं। इनमें से कई नमूने जांच में अमानक पाए गए हैं। इनके खिलाफ विभाग की ओर से कार्रवाई की गई है। जिले में नमूने अमानक पाए जाने के बाद अब विभाग ने अभियान की अवधि 15 दिन और बढ़ा दी है। इससे कृषि आदान दुकानदारों में हड़कम्प मचा हुआ है। जिले में एक माह में करीब पांच सौ नमूने लिए गए थे। इनमें अभी तक जांच में 40 नमूने अमानक मिले हैं।</p>
<p><strong>कीटनाशक और खाद में मिली गड़बड़ी</strong><br />जिले में गत कुछ वर्षों से कृषि आदानों में मिलावट की शिकायतों को देखते हुए कृषि विभाग की ओर से नमूने लेने और जांच कराने का अभियान एक माह पूर्व शुरू किया गया था। इसके तहत कृषि विभाग की ओर से कृषि आदान की दुकानों पर निरीक्षण किया गया। अभियान के दौरान खाद, बीज और कीटनाशी के 500 नमूने लेकर जांच के लिए प्रयोगशाला में भेजे गए थे। अभी तक मिली जांच रिपोर्ट में करीब 40 नमूने अमानक पाए गए हैं। ऐसे में इनके खिलाफ न्यायालय में चालान पेश किया गया है। वहां से जुर्माना राशि तय की  जाएगी। कृषि आदानों में सबसे ज्यादा मिलावट खाद और कीटनाशी में मिली है। इनमें नमूने सबसे ज्यादा फेल हुए हैं। वहीं बीज का कोई नमूना फेल नहीं  हुआ है।   </p>
<p><strong>अब लगातार होगी मॉनिटरिंग</strong><br />कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार वैसे तो हर माह कृषि आदान दुकानों का निरीक्षण किया जाता है। अब नमूनों में मिलावट मिलने के बाद विभाग ने लगातार इन दुकानों की मॉनिटरिंग करने का निर्णय किया गया है। इसके तहत अब कृषि आदान दुकानों की आकस्मिक जांच की जाएगी। जिले के सभी डीलरों के यहां निरीक्षक पंजिका का संधारण किया जाना आवश्यक है। इसके साथ ही चैक लिस्ट भी साथ लगानी होती है। यदि जांच में इनकी पूर्ति नहीं मिली तो सम्बंधित आदान विक्रेता के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। आगामी दिनों में समय-समय पर निरीक्षण कर लगातार मॉनिटरिंग की जाएगी। </p>
<p><strong>इनका कहना</strong><br />कृषि आदानों में मिलावट मिलने से किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है। विभाग की ओर से इस तरह का अभियान लगातार चलाया जाना चाहिए ताकि मिलावटी आदानों की बिक्री नहीं हो सके। कई बार देरी से जांच रिपोर्ट मिलने से किसानों को नुकसान हो जाता है। इसलिए जांच रिपोर्ट जल्द-जल्द मिलने की व्यवस्था भी हो।<br /><strong>-जोगेन्द्र सिंह, किसान</strong></p>
<p>कृषि विभाग किसानों के प्रति संवेदनशील है। विभाग की ओर से रबी नियंत्रण अभियान के तहत कृषि आदानों के नमूने लिए जा रहे हैं। इनको जांच के लिए प्रयोगशालाओं में भिजवाया जा रहा है। अभी तक कुछ नमूने जांच में अमानक मिले हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई की गई है। वहीं अभियान की अवधि भी बढ़ा दी गई है। <br /><strong>-आर. के. जैन, संयुक्त निदेशक, कृषि विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 Nov 2024 14:58:20 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सरकारी उदासीनता: कागजों में ही उड़ा ड्रोन, खेतों तक नहीं पहुंचा</title>
                                    <description><![CDATA[कोटा जिले में किसी को नहीं मिल पाया लाभ।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/government-indifference--drone-flew-on-paper-only--did-not-reach-the-fields/article-74365"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/sarkari-udasinta---kagzo-me-hi-uda-drone-,-kheto-tk-nhi-pohcha...kota-news-03-04-2024.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। खेती में नवाचार के लिए प्रदेश में ड्रोन से खेती की योजना मूर्त रूप नहीं ले पाई। पिछले साल बजट घोषणा में राज्य सरकार ने योजना के लिए 40 करोड़ रुपए तक की सब्सिडी का प्रावधान रखते हुए कृषि क्षेत्र के लिए इसे क्रांतिकारी कदम बताया था। वित्तीय वर्ष पूरा हो चुका है। इसके बावजूद कृषि विभाग अब तक एक भी ड्रोन पात्र हाथों तक पहुंचाने में विफल रहा है। कोटा जिले में किसी को भी इस योजना का लाभ नहीं मिल पाया है। यही स्थिति प्रदेश के अन्य जिलों की रही है। </p>
<p><strong>निर्धारित नहीं हो पाए जिलेवार लक्ष्य </strong><br />ड्रोन से खेती योजना के तहत कृषक उत्पादक संगठन, कस्टम हायरिंग सेंटर और बेरोजगार कृषि स्नातक युवाओं को अनुदान पर ड्रोन उपलब्ध करवाने थे। कृषि विभाग की ओर से वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान अनुदान पर 1000 ड्रोन उपलब्ध करवाने थे। इसके लिए सितम्बर 2023 में गाइड लाइन जारी कर राज. किसान साथी पोर्टल पर आवेदन भी मांग लिए। उसके बाद अनुदान पर ड्रोन उपलब्ध करवाना तो दूर जिलेवार लक्ष्य ही निर्धारित नहीं हुए। ऐसे में खेतों तक ड्रोन पहुंचाने की योजना कागजों में ही दम तोड़ गई।</p>
<p><strong>खेती में ड्रोन का फायदा</strong><br />- कम समय में कीटनाशी या तरल उर्वरक के छिड़काव से समय की बचत।<br />- मजदूर से कीटनाशी या तरल उर्वरक का छिड़काव करवाने की तुलना में कम खर्च।<br />- ड्रोन से हर पौधे पर समान रूप से छिड़काव।<br />- ड्रोन से कीटनाशी या तरल उर्वरक का संतुलित छिड़काव।<br />- ड्रोन से फसल में सिंचाई की सही योजना बनाने में मदद।</p>
<p><strong>इतना मिलना था अनुदान</strong><br />गत सरकार ने बजट घोषणा में किसानों के लिए ड्रोन तकनीक से खेती का प्रावधान रखा था। घोषणा के तहत राजस्थान में 1000 ड्रोन खरीद कर योजना के तहत उपलब्ध कराने का निर्णय किया था। इसके लिए 40 करोड़ रुपए सब्सिडी के लिए जारी किए गए थे। जैसे 10 लाख रुपए का कोई ड्रोन खरीदेगा तो उसे 4 लाख रुपए की सब्सिडी दी जाएगी। कोई भी कस्टम हायरिंग सेंटर इस ड्रोन को खरीद सकता है। जिसके लिए विभाग में संपर्क करना होगा। पूर्व में इसका प्रचार-प्रसार भी किया गया था। योजना के तहत कस्टम हायरिंग सेंटर से कम दर पर भी ड्रोन किराए पर लेने का निर्णय किया गया था।</p>
<p><strong>हर तरह से फायेदमंद है ड्रोन</strong><br />कृषि क्षेत्र में किसी उपज का उत्पादन करने के लिए कई स्टेप होते हैं, जैसे निराई, गुड़ाई, सिंचाई, कटाई के साथ ही कीटनाशक छिड़काव भी है जो काफी महत्वपूर्ण है। कीटनाशक छिड़काव नहीं करने पर पूरी फसल तक बर्बाद हो जाती है। अभी किसान कीटनाशक छिड़काव के लिए पेटीनुमा स्प्रे उपकरण से छिड़काव करते हैं। इसमें एक एकड़ क्षेत्र में अगर किसान कीटनाशक छिड़काव करता है तो 3 घंटे तक लग जाते है। साथ ही कीटनाशक से किसान के शरीर पर बुरा प्रभाव भी पड़ता है। वहीं ड्रोन से इतने ही क्षेत्र में छिड़काव करेगा तो मात्र 10 मिनट में काम पूरा हो जाएगा। साथ ही शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव से बचा जा सकता है</p>
<p>सरकार की खेती में ड्रोन के उपयोग के लिए बनाई गई काफी अच्छी है। इससे किसानों को काफी फायदा होता, लेकिन यह योजना कागजों से ही बाहर नहीं निकल पाई। राज. किसान साथी पोर्टल पर आवेदन मांगने के बावजूद किसी के भी इसका लाभ नही मिल पाया।<br /><strong>- त्रिलोकचंद, किसान, जाखड़ोंद</strong></p>
<p>ड्रोन से खेती की योजना विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लगने से आगे नहीं बढ़ पाई। लक्ष्य निर्धारित होते उससे पहले 9 अक्टूबर को आचार संहिता लग गई। प्रदेश में नई सरकार का गठन होने के बाद लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लगने से अब 4 जून को आचार संहिता समाप्त होने के बाद ही ड्रोन से खेती योजना पर पुनर्विचार कर लक्ष्य तय किए जाएंगे। <br /><strong>- रमेश चांडक, संयुक्त निदेशक कृषि विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Apr 2024 15:34:05 +0530</pubDate>
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                <title>इजरायली तकनीक छोटी काशी के किसानों की बदलेगी तकदीर</title>
                                    <description><![CDATA[डिप्टी डायरेक्टर ने बताया कि अब तक इस सब्जी उत्कृष्टता केन्द्र से 1350 से ज्यादा सब्जी उत्पादक किसान लाभान्वित हो चुके हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bundi/israeli-technology-will-change-the-fate-of-farmers-of-chhoti-kashi/article-66416"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/israeli-takneek-choti-kashi-k-kisano-ki-bdlegi-takdeer...bundi-news-09-01-2024.jpg" alt=""></a><br /><p>बूंदी। छत्रपुरा रोड़ स्थित राजस्थान का एकमात्र सब्जी उत्कृष्टता केन्द्र अपने विविध नवाचारों से जिले की खेती किसानी को समृद्ध करने की दिशा कदम बढ़ा रहा है। बीमारियों से सुरक्षित खेती, मल्चिंग व लो-टनल जैसी तकनीक से खेती के प्रोत्साहन के साथ ही अब यहां उच्च पौष्टिकता वाली देशी विदेशी सब्जियों को हाईड्रोपोनिक्स तकनीक से यानी बिना मिट्टी, पानी में उगाने की तैयारी की जा रही है। इजरायली तकनीक पर आधारित इस नवाचार में थोड़े पानी में सब्जियों की फसल तैयार की जाएंगी। इसके लिए परियोजना स्थापित की जा रही है। सब्जी उत्कृष्टता केंद्र के डिप्टी डायरेक्टर दुर्गा लाल मौर्य ने बताया कि बूंदी सब्जी उत्पादन में अग्रणी जिला है। यहां मटर, शिमला मिर्च, खीरा, टमाटर, करेला, गोभी आदि सब्जियां प्रचुर मात्रा में पैदा होती हैं। किसानों की उपज को अधिक गुणवतापूर्ण बनाने तथा राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय बाजार तक उनकी पहुंच बनाकर किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में सब्जी उत्कृष्टता केन्द्र कार्य कर रहा है।</p>
<p><strong>शहरवासियों को उपलब्ध करा रहे जैविक व पौष्टिक सब्जियां</strong><br />सब्जी उत्कृष्टता केन्द्र में उगाई जा रही पौष्टिक व उत्कृष्ट तकनीक से तैयार जुकुनी, पार्सली, ब्रोकली, गोभी, टमाटर, आलू, मिर्च, मूली आदि सब्जियां शहर वासियों को उपलब्ध कराई जा रही है। इसके लिए सब्जी उत्कृष्ट केंद्र में सब्जी विक्रय केंद्रीय स्थापित किया गया है। जहां प्रतिदिन शाम को तैयार की गई सब्जियां शहरवासियों को उचित दाम में उपलब्ध कराई जाती है। हाईड्रोपोनिक्स तकनीक से यानी बिना मिट्टी, पानी से तैयार सब्जियां काफी पौष्टिक लाभकारी होती है।</p>
<p><strong>बूंदी के किसान ले रहे दो गुना मुनाफा</strong><br />सब्जी उत्कृष्टता केन्द्र से नवदन व उच्च तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त कर जिले के सब्जी उत्पादक किसान लाभान्वित हो रहे हैं। जिले के मांगली कलां, ठीकरदा, बड़ा नयांगांव, बडौदिया, अमरत्या, बालोला, चैंता, हिंड़ोली, बिचड़ी,सथूर सहित कई गावोंं के प्रगतिशील किसान इन नवीन तकनीकी ज्ञान का फायदा ले रहे हैं।  ठीकरदा के किसान खुशीराम और नंदकिशोर ने अपने खेतों में नवीन तकनीक से स्ट्राबेरी की फ सल कर बडत्रा मुनाफा ले रह हैं। वहीं टीकरदा के ही श्योजी लाल, धन्ना लाल, शंकर लाल, हरक चंद, अमर लाल, मांगी लाल, हर लाल, लाल चंद, मोहन लाल, ईश्वर लाल, मांगली कलां के राकेश, भंवर लाल सहित सैंकड़ों सब्जी उत्पादक नई तकनीकों का प्रशिक्षण लेकर अपने खेतों में मिर्च, टमाटर, मटर, शिमला मिर्च,खीरा, मूलीए पालक, गोभी, पत्ता गोभी सहित कई सब्जियों का उत्पादन कर परम्परागत खेती के मुकाबले डेढ़ से दो गुना मुनाफा ले रहे हैं।</p>
<p><strong>हाइड्रोपोनिक्स- काफी कम पानी में पैदावार</strong><br />हाइड्रोपोनिक्स परियोजना के विषय में कृषि अनुसंधान अधिकारी  डॉ तारेश कुमार ने बताया कि इस तकनीक से ना केवल स्थानीय बल्कि जुकुनी, पार्सली, ब्रोकली जैसी विदेशी सब्जियां तैयार की जा सकती है। किसानों को प्रशिक्षण देकर इनकी पैदावार के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इस तकनीक की खूबी है कि काफी कम पानी में पैदावार की जा सकती है। पानी की बचत के दृष्टिगत यह तकनीक भविष्य की तकनीक बनने जा रही है। इसमें मिट्टी के स्थान पर पौष्टिक तत्व वाले पानी का उपयोग किया जाता है। इसमें मामूली पानी की आवश्यकता होती है। उपयोग में लिया पानी भी पुन: काम में लिया जा सकता है। मृदा एवं मौसम जनित व्याधियों से फसल अप्रभावित रहती है अधिक स्वस्थ होती है तथा बेमौसम  भी इच्छित उपज प्राप्त की जा सकती है। चूंकि बूंदी सब्जी उत्पादन में अग्रणी है तथा पानी की भी समस्या है, ऐसे में यह सब्जी उत्पादक तकनीक किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है। इसमें परियोजना स्थापना के समय ही राशि का निवेश करना होता है। इसके बाद तुलनात्मक रूप से अन्य खेती के बजाय कम ही खर्च आता है।  </p>
<p><strong>कम लागत में उच्च गुणवत्ता वाले बीज व पौध करते हैं तैयार</strong><br />इस नर्सरी में उच्च गुणवत्ता वाले बीज तैयार कर उनकी पौध तैयार की जाती है। पूरा संयंत्र पूर्णत: स्वचालित है, जिसकी सम्पूर्ण मॉनिटरिंग डिजिटल माध्यम से की जा सकती है। यहां बीजों की प्रकृति के अनुसार तापमान रखते हुए पौध तैयार की जाती हैं। बूम इरिगेशन से इनमें सिंचाई होती है। यहां किसानों द्वारा लाए गए बीजों को उपचारित कर गुणवतापूर्ण बनाया जाता है तथा उनसे स्वस्थ पौध तैयार कर उन्हीं किसानों को दी जाती हैं। इससे किसानों को कम लागत में उच्च श्रेणी की पौध मिल जाती है। अन्यथा बाजार से मिलने वाले या स्वयं किसान द्वारा तैयार किए गए बीजों में से 50 फीसदी का ही अंकुरण होता है।</p>
<p><strong>तकनीक आधारित उत्पादन से ज्यादा लाभ</strong><br />डिप्टी डायरेक्टर दुर्गा लाल मौर्य ने बताया कि अब तक इस सब्जी उत्कृष्टता केन्द्र से 1350 से ज्यादा सब्जी उत्पादक किसान लाभान्वित हो चुके हैं। परम्परागत रूप से सब्जी उत्पादन के मुकाबले तकनीक आधारित उत्पादन के द्वारा प्रगतिशील किसान एक सीजन में एक लाख से डेढ़ लाख रूपए तक ज्यादा लाभ ले रहे हैं। धीरे धीरे छोटे फार्म होने के कारण कृषक केश क्रॉप्स की ओर आ रहा हैं। केश क्रॉप्स में सब्जी उत्पादन सबसे ज्यादा मुफिद और लाभ देने वाला हैं। तकनीक आधारित सब्जी उत्पादन किसानों को ज्यादा लाभ दे रहा हैं।</p>
<p><strong>परियोजना की स्थापना का उद्देश्य</strong><br />नवीन कृषि तकनीकी प्रदर्शन द्वारा सघन प्रणाली की स्थापना, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार हेतु वर्ष भर उच्च गुणवत्ता का सब्जी फसल उत्पादन है। प्रति इकाई क्षेत्रफल से इष्टतम उत्पादकता एवं लाभ प्राप्त करना तथा तकनीकी के साथ किसानों का नेतृत्व करना भी है। मल्च एवं लो-टनल के साथ ओपन खेती, पॉली हाउस एवं शेडनेट में संरक्षित खेती प्रदर्शन किए जाते हैं। सूक्ष्म सिंचाई एवं उर्वरक प्रबंधन, सूखा रोधी एवं कम पानी की फसलों की जांच, किस्मों के अनुरूप सिफारिश, समन्वित कीट प्रबंधन, फसलोत्तर प्रबंधन के लिए पैक हाउस एवं मूल चैन स्थापना, मूल्य संवर्धन हेतु उत्पाद का प्रसंस्करण भी संस्थान के उद्देश्यों में सम्मिलित है। नवीन कृषि तकनीकी प्रदर्शन द्वारा सघन प्रणाली की स्थापना राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए वर्ष भर उच्च गुणवत्ता का सब्जी फसल उत्पादन पर फोकस है।</p>
<p>हाइड्रोफोनिक्स, डच बकेट, टॉवर मल्च जैसी तकनीक का उपयोग शहरों में बहुतायत में हो रहा हैं। शहरों में जमीन नहीं होने के कारण बागवानी और सब्जी उत्पादन के इच्छुक लोग भी अपने फ्लेट या मकान की छत पर, बालकॉनी या दीवारों पर हाइड्रोफोनिक्स, डच बकेट, टॉवर मल्च जैसी तकनीक का उपयोग करते हुए सब्जी उत्पादन कर सकते हैं। ताकि उन्हें पेस्टीसाइड के उपयोग के बिना जैविक और उच्च पौष्टिकता वाली सब्जियां मिल सकें।<br /><strong>- दुर्गा लाल मौर्य, डिप्टी डायरेक्टर,  सब्जी उत्कृष्टता केंद्र </strong></p>
<p>सब्जी उत्कृष्टता केन्द्र में हाइटेक प्लग नर्सरी विशिष्ट है, जो राजस्थान की अपनी तरह की पहली है। यहां पर हाइटेक प्लग नर्सरी कार्यरत हैं, जिसमें उच्च गुणवत्ता वाले बीजों से उनकी प्रकृति के अनुसार तापमान रखते हुए पौध तैयार की जाती हैं। साथ ही किसानों द्वारा लाए गए बीजों को उपचारित करते हुए स्वस्थ पौध तैयार कर उन्हीं किसानों को दी जाती हैं। जिससे किसानों को कम लागत में उच्च श्रेणी की पौध मिल जाती है।<br /><strong>- डॉ. तारेश कुमार, कृषि अनुसंधान अधिकारी, बून्दी</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बूंदी</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 09 Jan 2024 15:03:52 +0530</pubDate>
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                <title>पेस्टीसाइड्स का बेतहाशा इस्तेमाल दे रहा है जानलेवा बीमारियों को न्योता</title>
                                    <description><![CDATA[कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि किसानो को लगभग हर प्रशिक्षण कार्यक्रम में और अन्य माध्यमों से कीटाणुनाशक दवाओं के उचित इस्तेमाल और जैविक खेती के लिये प्रोत्साहित किया जाता है मगर कुछ निरंकुश रासायनिक दवा विक्रेता अधिक मुनाफा कमाने की गरज से खतरनाक रासायनिक दवाएं डालने के लिये किसानों को उकसाते है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/excessive-use-of-pesticides-is-inviting-deadly-diseases/article-45987"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-05/photo-size-630-400-(5).png" alt=""></a><br /><p>हमीरपुर। फसलों और सब्जियों को सुरक्षित रखने के लिये पेस्टीसाइड्स का अत्यधिक इस्तेमाल कैंसर, किडनी और लीवर जैसी जानलेवा बीमारियों का कारक बन रहा है।</p>
<p>कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि किसानो को लगभग हर प्रशिक्षण कार्यक्रम में और अन्य माध्यमों से कीटाणुनाशक दवाओं के उचित इस्तेमाल और जैविक खेती के लिये प्रोत्साहित किया जाता है मगर कुछ निरंकुश रासायनिक दवा विक्रेता अधिक मुनाफा कमाने की गरज से खतरनाक रासायनिक दवाएं डालने के लिये किसानों को उकसाते है।</p>
<p>कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) के कृषि वैज्ञानिक डा.प्रशांत कुमार ने शुक्रवार को बताया कि हर प्रशिक्षण में किसानों को प्राकृतिक खेती करने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है। यदि पौधों में कोई बीमारी है तो पेस्टीसाइड (कीटाणुनाशक) दवा मानक के अनुरुप डालने को कहा जाता है। </p>
<p>उन्होंने कहा कि कीटाणुनाशक दवा के लिये लाल,पीला,नीला.हरा रंग के डिब्बे चिन्हित किये गये है जिसमे लाल रंग के डिब्बे की दवा का प्रयोग कभी भी सब्जी में प्रयोग नही करना चाहिये। यह दवा सबसे ज्यादा घातक होती है। जब नीले रंग के डिब्बे की दवा सब्जियों के पौधे मे डालते है तो उस सब्जी को कम से कम दो सप्ताह तक बाजार मे बिक्री नहीं करना चाहिये मगर किसान कीटाणुनाशक दवा डालने के लिये सीधे बाजार में दवा विक्रेता के यहा जाकर उससे सलाह लेता है और वह घातक दवा देकर फसलो में छिड़काव करता है जिससे व्यक्ति के सेहत के लिये बहुत खतरनाक साबित होती है।</p>
<p>कृषि वैज्ञानिक डा. चंचल सिंह का मानना है कि किसान ओवरडोज दवा फसलों में डालता है जिससे मधुमक्खियां जिस फूल में बैठती है उसी समय वह कमजोर हो जाती है या तो मर जाती है यदि कोई मधुमक्खी फूल का रस लेकर वापस भी आ जाती है तो शहद की गुणवत्ता समाप्त हो जाती है और यह शायद मानव के लिये बेहद खतरनाक साबित होता है।</p>
<p>कृषि वैज्ञानिक डा.एसपी सोनकर का कहना है कि खतरनाक रासायनिक दवा को बिक्री को रोकने का काम कृषि अधिकारियों का है। जिला चिकित्सालय के फिजीशियन डा. आरएस प्रजापति का कहना है कि रासायनिक दवा युक्त सब्जियां व अनाज खाने से लीवर,किडनी तो खराब होती है वहीं कैंसर जैसी प्राणघातक बीमारी का जन्म होता है।<br /><br />वैज्ञानिकों का मानना है कि दवा कोराजैन,इन्फलारोपिट,प्रोफोनाफास्ट,साइफरकेथिना, मैलाथियान ये सभी खतरनाक दवाएं है। फसल में अधिक डोज डालने से मानव की ङ्क्षजदगी बर्बाद कर देती है। उपकृषि निदेशक हरीशंकर भार्गव का कहना है कि किसानों को खतरनाक दवाएं डालने के लिये मना किया जाता है मगर किसान दूसरे से जब सलाह लेता है तो वह भटक जाता है। इसके लिये प्रयास किया जायेगा। </p>
<p>खाद्य सुरक्षा विभाग के अभिहीत अधिकारी(डीओ) रामअवतार यादव ने कहा कि सब्जी को चमकदार और आकर्षित बनाने के लिये उसका खतरनाक रसायनों से रंग रोगन किये जाने की सूचना मिलती है मगर उसके लिए सैम्पल भरने का कोई प्रावधान नही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 May 2023 15:14:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>तारबंदी योजना से किसानों ने मोड़ा मुंह, कृषि विभाग भी लक्ष्य पूर्ति नहीं होने से चिंतित</title>
                                    <description><![CDATA[खेतों में खड़ी फसल को आवारा पशुओं से बचाव कर नुकसान से बचाने के लिए विभाग की ओर से कांटेदार तारबंदी कार्यक्रम शुरू किया गया था। तारबंदी में विभागीय नियमानुसार वायर, पोल, एंगल आदि लगाने होते हैं, जिससे खर्चा अधिक आता है। वहीं किसी किसान के पास डेढ़ हैक्टेयर से कम भूमि है तो वह योजना में शामिल नहीं हो पाता।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/farmers-turned-their-backs-on-the-wire-ban-scheme-the/article-30327"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-11/uljhe-niyam,-anudaan-kum,-kharcha-zyada...kota-news-21.11.2022.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। खेतों में लहलहाती फसल को पशुओं से बचाव के लिए सरकार की ओर से संचालित कांटेदार तारबंदी योजना के प्रति किसानों का रुझान नहीं बढ़ पा रहा है। नतीजतन जिले में पिछले पांच वर्ष में एक बार भी कृषि विभाग इन लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं कर सका है। असल में योजना के तहत बने नियम और तारबंदी में होने वाले अधिक खर्च को लेकर जिले में योजना के प्रति किसान आकर्षित नहीं हो पा रहे। नतीजतन पिछले अन्य वर्षों के मुकाबले इस बार तो तारबंदी के प्रति किसानों ने पूरी तरह मुंह मोड़ लिया है। आधा वित्तीय वर्ष गुजरने के बावजूद जिलेभर के महज कुछ किसानों ने ही खेतों में तारबंदी की है। कृषि विभाग योजना के प्रति किसानों की भले ही अरुचि की बात कहता है, लेकिन समुचित प्रचार-प्रसार भी लक्ष्य प्राप्ति में रोड़ा है। गौरतलब है कि खेतों में खड़ी फसल को आवारा पशुओं से बचाव कर नुकसान से बचाने के लिए विभाग की ओर से कांटेदार तारबंदी कार्यक्रम शुरू किया गया था।</p>
<p><strong>इसलिए नहीं दिखा रहे रुचि</strong><br />योजना के तहत एक किसान या समूह में कम से कम डेढ़ हैक्टेयर भूमि पर तारबंदी करनी होती है। इसमें 400 मीटर तक की तारबंदी पर सामान्य किसान के लिए अधिकतम 40 हजार रुपए का अनुदान देय है, जबकि लघु सीमान्त किसान को 48 हजार रुपए अधिकतम अनुदान दिया जाता है। सूत्र बताते हैं कि तारबंदी में विभागीय नियमानुसार वायर, पोल, एंगल आदि लगाने होते हैं, जिससे खर्चा अधिक आता है। वहीं किसी किसान के पास डेढ़ हैक्टेयर से कम भूमि है तो वह योजना में शामिल नहीं हो पाता। इसके अलावा सभी मापदण्ड पूरे करने और भौतिक सत्यापन होने तक उसे अनुदान राशि का इंतजार करना पड़ता है, ऐसे में किसान इसमें रुचि नहीं दिखा पाते।</p>
<p><strong>177 पत्रावली में से 110 सही </strong><br />कृषि विभाग सूत्रों के अनुसार इस वर्ष जिले को एक लाख 38 हजार मीटर तारबंदी के लक्ष्य मिले हैं। अब तक 177 पत्रावली ही विभाग को प्राप्त हुई हैं। विभागीय जांच में इनमें से 110 पत्रावली दुरुस्त पाई गईं, जबकि शेष विभिन्न कमियों से निरस्त हो गई। 110 पत्रावलियों की विभाग की ओर से प्रशासनिक स्वीकृति भी जारी कर दी, लेकिन 110 में से कुछ किसानों ने ही अब तक तारबंदी की है, जिनका भौतिक सत्यापन भी हो चुका है। हालांकि विभागीय अधिकारी कहते हैं कि सितम्बर-अक्टूबर माह में तारबंदी होनी थी, उसी समय जिले में अच्छी बारिश हुई तो किसानों ने खेतों में बीज की बुवाई कर दी, जिससे तारबंदी अटक गई।</p>
<p><strong>फिर भी नहीं रुचि</strong><br />हालांकि शुरुआती दौर में किसानों ने इसमें रुचि दर्शाई थी, लेकिन उसके बाद नियम में बदलाव हुआ तो इससे किसानों का मोह भंग हो गया। विभागीय सूत्र बताते हैं कि वर्ष 2018-19 से सामुदायिक आधार पर अनुदान का प्रावधान कर दिया गया। इसमें कम से कम तीन किसानों का समूह और 5 हैक्टेयर क्षेत्रफल होने पर अनुदान लागू का प्रावधान किया गया था, जिससे किसानों ने इसमें रुचि नहीं दर्शाई तो लक्ष्यों की प्रगति अधूरी ही रह गई थी, लेकिन अब सरकार ने फिर से नियमों में बदलाव कर एकल किसान को भी तारबंदी की सुविधा दी गई है।</p>
<p>योजना में इस वर्ष जिले को एक लाख 38 हजार मीटर के तारबंदी के लक्ष्य मिले हैं। इसके लिए प्राप्त हुई 177 पत्रावलियों में 110 सही मिली, जिनकी प्रशासनिक स्वीकृति निकाल दी गई। अब नियम में भी बदलाव कर समूह के बजाए एकल किसान भी तारबंदी करा सकता है। लक्ष्यों की पूर्ति के प्रयास किए जा रहे है।<br /><strong>- रामलाल, कृषि पर्यवेक्षक, कृषि विभाग</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 21 Nov 2022 15:14:25 +0530</pubDate>
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