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                <title>navratri special - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>Durga Puja Festival : शाम ढलते-ढलते जगमगा उठते हैं दुर्गा पूजा के सजे-धजे पंडाल, दुर्गाबाड़ी में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़</title>
                                    <description><![CDATA[सिंह पर आरूढ़ देवी का महिषासुर वध का दृश्य बिजली और धुएं के विशेष प्रभावों के साथ जीवंत प्रतीत हो रहा था।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/durga-puja-festival-in-the-evening-there-is-a-lot/article-128207"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/6390.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। शहर में बंगाली समाज की ओर से आयोजित होने वाली दुर्गा पूजा के भव्य आयोजन धीरे-धीरे परवान चढ़ने लगे हैं। प्रवासी बंगाली कल्चरल सोसायटी के जय क्लब लॉन में दुर्गा पूजा महोत्सव की षष्ठी की शाम श्रद्धा और उल्लास का अद्भुत संगम रही। सूर्यास्त होते ही सजे-धजे पंडाल में दीपों और रंगीन रोशनी की जगमगाहट फैल गई। अधिवास आमंत्रण के बाद संध्या आरती के साथ ही 'जय मां दुर्गा' और 'बोलो दुर्गा मां' की जय के गगनभेदी जयकारों ने पूरा वातावरण भक्तिमय बना दिया। शाम का मुख्य आकर्षण मां दुर्गा की भव्य झांकी रही। सिंह पर आरूढ़ देवी का महिषासुर वध का दृश्य बिजली और धुएं के विशेष प्रभावों के साथ जीवंत प्रतीत हो रहा था।</p>
<p>ढाक की ताल और शंखध्वनि ने वातावरण को और भी दिव्यता प्रदान की। सांस्कृतिक संध्या में पारंपरिक नृत्यों, भक्तिगीतों और बच्चों की नृत्य प्रतियोगिता ने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। समारोह के अध्यक्ष डॉ. एसके सरकार ने कहा कि जब ढाक बजता है और जय मां दुर्गा के स्वर गूंजते हैं तो लगता है मानो स्वयं शक्ति हमारे बीच अवतरित हो गई हैं। षष्ठी की यह संध्या हमें याद दिलाती है कि मां दुर्गा केवल शक्ति की प्रतीक नहीं, बल्कि आनंद आशा और नई शुरुआत की दूत भी हैं। </p>
<p><strong>दुर्गाबाड़ी में उमड़ पड़े श्रद्धालु</strong><br />बनीपार्क स्थित दुर्गाबाड़ी में दुर्गा पूजा महोत्सव के दूसरे दिन ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ पड़े। शाम ढलने के साथ ही लोगों के आने का सिलसिला शुरू हुआ,जो देर रात तक चलता रहा। लोगों ने जमकर लुत्फ उठाया।  </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Sep 2025 13:04:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur PS]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>दुर्गा से प्रकट हुई ज्वाला से सातवीं देवी कालरात्रि का आविर्भाव : काला वर्ण, बिखरे केश, चार भुजाओं में लोहे का खड्ग ही इनकी विशेष पहचान </title>
                                    <description><![CDATA[नवरात्र पर्व पर माता कालरात्रि की उपासना न केवल धार्मिक आस्था का विषय है, बल्कि यह मानव जीवन में सत्य, साहस और न्याय की स्थापना का प्रेरणास्रोत भी है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/from-the-flame-appearing-from-durga-the-emergence-of-the/article-128177"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(7)10.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। असुरों ने जब त्रिलोक में आतंक फैलाया, तब देवी दुर्गा ने अपने शरीर से एक तीव्र ज्वाला प्रकट की। उसी से कालरात्रि का जन्म हुआ। इनका स्वरूप अत्यंत भयंकर बताया गया है। काला वर्ण, बिखरे केश, गर्दन पर माला, चार भुजाओं में लोहे का खड्ग और वज्र धारण करने वाली इनकी विशेष पहचान है। यह उग्रता केवल दुष्टों के लिए है। भक्तों को माता कालरात्रि सदैव शुभ फ ल देती हैं। इसलिए इन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है। सप्तमी तिथि पर माता कालरात्रि अपने अत्यंत उग्र और वीर स्वरूप के लिए जानी जाती हैं।</p>
<p>इन्हें विनाशकारी शक्तियों का नाश करने वाली देवी के रूप में स्मरण किया जाता है। माता कालरात्रि को समस्त दानवों, असुरों, भूत-प्रेत और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करने वाली जगज्जननी के रूप में जाना जाता है। धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि राक्षस शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज के संहार में माता कालरात्रि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नवरात्र पर्व पर माता कालरात्रि की उपासना न केवल धार्मिक आस्था का विषय है, बल्कि यह मानव जीवन में सत्य, साहस और न्याय की स्थापना का प्रेरणास्रोत भी है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Sep 2025 10:17:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur PS]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नवरात्र विशेष : आस्था का द्वार कुन्हाड़ी बीजासन माता धाम, दूर होती है लकवा व हकलाने की बीमारी</title>
                                    <description><![CDATA[राव चंद्रसेन ने कराया था निर्माण, सारबाग के इमली के पेड़ के नीचे से लाए थे मूर्ति
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/navratri-special--kunhadi-bijasan-mata-dham--a-gateway-to-faith--cures-paralysis-and-stammering/article-127837"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(10)4.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहर के रेलवे स्टेशन से करीब 9 किलोमीटर तथा बस स्टैंड से मात्र 2 किलोमीटर दूर स्थित कुन्हाड़ी माता अर्थात बीजासन माता मंदिर स्थित है। यह मंदिर करीब 500 साल पुराना है। यह रियासतकालीन के दौरान बना हुआ है। इस मंदिर की माता कुन्हाड़ी ठिकाना राजपरिवार की कुलदेवी है। इस मूर्ति को राव चंद्रसेन ने सारबाग के इमली के पेड़ से लाकर यहां स्थापित किया था। यह चमत्कारी मंदिर अपने आप में अनूठा मंदिर है। यहां आने वाले हर श्रद्धालु की मनोकामना पूरी होती है। अधिकतर यहां आने वाले श्रद्धालु लकवा, जिनको बोलने में समस्या होती है या फिर जिनके हाथ-पैर में दर्द जैसी कई समस्याएं होती है। जो श्रद्धालु इस मंदिर आकर 2 से 7 परिक्रमा सीधी लगाता है उसकी मनोकामना पूरी हो जाती है। कुछ श्रद्धालु मन्नत पूरी होने तक यहीं रहते है। अपने विश्वास का दीया लगाए रखते है। पुजारी भूपेन्द्र शर्मा व छित्तरलाल ने बताया कि धार्मिक आस्था का ऐसा संगम जहां श्रद्धालु अपनी पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ आते हैं और मां की चौखट से खाली नहीं लौटते। बीजासन माता मंदिर, जिसे कुन्हाड़ी ठिाकाना की कुलदेवी माना जाता है, आज भी आस्था का सबसे बड़ा केन्द्र है। श्रद्धालुओं की हर मनोकामना पूरी होती है। यही कारण है कि यह मंदिर न केवल कोटा और बूंदी, बल्कि पूरे हाड़ौती अंचल के लिए आस्था का अद्भुत धाम बन चुका है।</p>
<p><strong>होती है मन्नत पूरी</strong><br />श्रद्धालुओं के अनुसार मनोकामना पूरी होने के बाद उल्टा साखिया बनाते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। ग्रामीण मान्यता है कि अगर कोई सच्चे मन से मां के दरबार में आता है, अपनी मनोकामना रखता है और परिक्रमा करता है, तो माता उसकी झोली जरूर भरती है। श्राद्धालुओं के अनुसार इस मंदिर में लकवा जैसी बीमारी में भी काफी फायदा मिलता है। </p>
<p><strong>राव चंद्रसेन ने कराया था निर्माण</strong><br />श्रद्धालुओं के अनुसार इस मंदिर का निर्माण लगभग 500 साल पहले राव चंद्रसेन ने कराया था। वे इस मंदिर को कुन्हाड़ी ठिकाना की कुलदेवी के रूप में लेकर आए थे। कहा जाता है कि सारवाड़ से इमली के पेड़ के नीचे से मां की प्रतिमा को लाकर यहां स्थापित किया गया। तभी से बीजासन माता को कुन्हाड़ी ठिकाना राज परिवार की कुलदेवी के रूप में पूजा जाने लगा। कुन्हाड़ी ठिकाना के राजपरिवार के लोग आज भी यहां दर्शन करने आते हैं। इसे सिर्फ ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि राजघराने की आस्था से भी जुड़ा स्थान माना जाता है। बीजासन माता मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था और विश्वास की ऐसी धारा है जो पूरे हाड़ौती को जोड़ती है। यहां हर वर्ष हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। खासतौर पर नवरात्रि और पूर्णिमा के दिन यहां श्रद्धालुओं का मेला लगता है। नवरात्रि में यहां नौ दिन का भव्य मेला लगता है। इस दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ इतनी बढ़ जाती है कि मंदिर परिसर और आसपास का इलाका पूरा आस्था के रंग में रंग जाता है। पंचमी और अष्टमी के दिन सबसे ज्यादा भीड़ रहती है। कई श्रद्धालु पूरे नौ दिन मंदिर परिसर में ही डेरा डालते हैं।</p>
<p><strong>मंदिर के आसपास का वातावरण</strong><br />मंदिर हरे-भरे वातावरण में स्थित है। आसपास के क्षेत्र में मेला लगने पर बड़ी संख्या में दुकानें सजती हैं। श्रद्धालु यहां से माता की प्रतिमाएं, नारियल, चुनरी और अन्य पूजा सामग्री खरीदते हैं। धार्मिक विद्वानों का मानना है कि बीजासन माता शक्ति स्वरूपा हैं। यहां साधना करने से मानसिक शांति मिलती है। यही कारण है कि कई श्रद्धालु दिन-रात मंदिर में भजन-कीर्तन करते हैं। नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष पूजन और हवन का आयोजन किया जाता है। माता के दरबार को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। हजारों की संख्या में श्रद्धालु इस आयोजन का हिस्सा बनते हैं। बीजासन माता मंदिर सिर्फ धार्मिक धाम नहीं, बल्कि यह समर्पण और विश्वास का केन्द्र है। यहां हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं और मां से आशीर्वाद लेकर जाते हैं।</p>
<p><strong>यह बोले श्रद्धालु</strong><br />कुन्हाड़ी बीजासन माता में मेरी पूरी आस्था है, खड़ीपुर चित्तौड़ रोड से आया हंू। मेरे माताजी देवबाई को चलने में दिक्कत हो रही थी। तीन दिन से यहां रूके हुए है। रोज परिक्रमा भी कर रहे है। माता की कृपा से अब ठीक है।<br /><strong>-उच्छबलाल गुर्जर, खडीपुर, गरडिया महादेव के पास</strong></p>
<p>मैं अपनी पत्नी सेनाबाई के साथ आया हूं। मेरी पत्नी के दोनों हाथों में काफी दिक्कत थी। हम करीब 16 दिन से यहां रुके हुए है।  माता रानी की कृपा से अब काफी सुधार है।<br /><strong>-भोजराज, लठूरा, सांगोद</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 Sep 2025 15:21:22 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>गरबा में तिलक-आधार कार्ड अनिवार्यता को लेकर गरमाई सियासत : खेलों में नियम तो धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में क्यों नहीं- मदन दिलावर</title>
                                    <description><![CDATA[देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में राजस्थान के अन्य जिलों में इस तरह के नियम किस स्तर तक लागू होते हैं और आमजन इन्हें किस नजरिए से स्वीकार करते हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jodhpur/why-not-in-religious-and-cultural-events-in-the-politics/article-127542"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/madan-dilawar-2.png" alt=""></a><br /><p>जोधपुर। भीलवाड़ा जिले में गरबा समिति की ओर से कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए तिलक और आधार कार्ड को अनिवार्य करने का नियम लागू करने के बाद प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। नए नियम को लेकर राजनीतिक दलों से लेकर सामाजिक संगठनों तक अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने नियम का समर्थन करते सुझाव दिया कि अब समय आ गया है कि गरबा कार्यक्रमों में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग आयोजन किए जाएं। राठौड़ ने कहा, बहनों का गरबा अलग से होना चाहिए और पुरुषों का अलग से। कई जगह संयुक्त कार्यक्रमों में ऐसे लोग भी शामिल हो जाते हैं जो भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ते और अन्य प्रयोजन से आते हैं। ऐसे तत्वों पर रोक लगाना जरूरी है। इसी मुद्दे पर प्रदेश के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने भी प्रतिक्रिया दी कि जब खेलों में नियम बनाए जाते हैं तो धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में क्यों नहीं। उन्होंने उदाहरण देते कहा, कबड्डी खेलने के लिए नियम तय होते हैं, उसी तरह गरबा में भी नियम होने चाहिए।</p>
<p>जिनके लिए यह आयोजन है, उन्हीं को प्रवेश मिलना चाहिए। कई स्थानों पर आयोजक समितियां भी इस पर विचार कर रही हैं कि गरबा में सुरक्षा और अनुशासन बनाए रखने के लिए पहचान पत्र दिखाने और सांस्कृतिक परंपरा के अनुरूप नियमों का पालन करना जरुरी होगा। वहीं, विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों ने इस निर्णय को लेकर सवाल भी उठाए हैं। उनका कहना हैं, कि गरबा जैसे उत्सव सामाजिक सद्भाव और आपसी मेलजोल का प्रतीक हैं, ऐसे में कठोर शर्तें लगाना कहीं-न-कहीं धार्मिक और सांस्कृतिक एकता पर सवाल खड़े कर सकता है। देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में राजस्थान के अन्य जिलों में इस तरह के नियम किस स्तर तक लागू होते हैं और आमजन इन्हें किस नजरिए से स्वीकार करते हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जोधपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Sep 2025 11:43:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur PS]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नवरात्रि स्पेशल: विशाल पहाड़ फाड़कर प्रकट हुई थी बिजासन माता</title>
                                    <description><![CDATA[ बिजासन माता मंदिर इंद्रगढ़  से करवर सडक मार्ग पर  दरा गांव के पास 615 मीटर की ऊंचाई पर विशाल पहाड़ी पर स्थित है। बिजासन माता की मूर्ति गुफा में है।  ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bundi/bijasan-mata-was-revealed-by-tearing-a-huge-mountain/article-7207"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/4.jpg_new.jpg" alt=""></a><br /><p>करवर।  बूंदी जिले में इंद्रगढ़ से 2 किलोमीटर दूरी पर स्थित माता बिजासन मंदिर प्रमुख धार्मिक स्थल है। बिजासन माता मंदिर इंद्रगढ़  से करवर सडक मार्ग पर  दरा गांव के पास 615 मीटर की ऊंचाई पर विशाल पहाड़ी पर स्थित है। बिजासन माता की मूर्ति गुफा में है। बिजासन माता विशाल पहाड़ फाड़कर प्रकट हुई थी।  जो अपने आप शीला उबरकर कर मूर्ति बन गई।  यह मूर्ति प्राकृतिक है।  बीजासन माता की मूर्ति लगभग पौने 3 फुट की है। यहां पर दूर-दूर से भक्त माता से मनोकामना मांगने के लिए आते हैं। मंदिर तक पहुंचने के लिए पहले 750 सिढ़ियां हुआ करती थी जो कि अब नव निर्माण के बाद करीब 850 सीढ़ियां बताई जाती है। <br /><br /><strong>बिजासन माता के प्रकट होने की की पौराणिक कथा</strong><br /> माता के पुजारी हरि मोहन योगी, अक्षय योगी,नरेश योगी, सत्यनारायण योगी ने बताया कि माता की प्रतिष्ठा 2 हजार सौ से भी  पुरानी बताई जाती है। <br />उस समय दरा गांव में नाथ संप्रदाय में गोरखनाथ जैसे गुरु कृपानाथ थे। कृपानाथ को माता बिजासन ने दर्शन दिए। जब इस क्षेत्र में घना जंगल हुआ करता था कृपानाथ महाराज दरा गांव में नागण माता के पास दूना है। उस स्थान पर तपस्या किया करते थे अभी भी वहां पर  एक बावड़ी व बड़ का पेड़  मौजूद है। यहां पर तपस्या में लिन रहते थे। सोलंकी राजपूत  भटकता हुआ  स्थान पर आ पहुंचा और गुरु कृपानाथ का शिष्य बन गया। उसके बाद महाराज ने समाधि ले ली। जब से सोलंकी नाथ के वंशज आज भी माता बिजासन की सेवा पूजा करते आ रहे है।<br /><br /><strong>बिजासन माता मंदिर के धार्मिक महत्व</strong><br />मान्यता है कि बिजासन देवी का चमत्कार तुरंत देखने को मिलता है। ऐसा भी माना जाता है कि माता की कृपा से अंधे को दृष्टि प्राप्त होती है। यहां भक्त अपनी कई इच्छाओं की पूर्ति के लिए माता से प्रार्थना करने के लिए आते हैं। इस मंदिर के प्रति लोगों का दृढ़ विश्वास है कि माता उनकी मनोकामना जरुर पूरी करेंगी। मंदिर में पूरे साल भक्तों और पर्यटकों की भीड़ देखी जा सकती है। माता बिजासन का मंदिर ऊंची पहाड़ी पर जो सीधी चढ़ाई वाली पहाड़ी पर 615 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर पर पहुंचने के लिए पहले 750 सिढ़ियां हुआ करती थी जो कि अब नव निर्माण के बाद करीब 850 सीढ़ियां बताई जाती है। मंदिर के ऊपर एक छतरी भी है।</p>
<p><br /><strong>बिजासन माता मंदिर का मेला एवं त्योहार</strong><br />बिजासन माता मंदिर में चैत्र और आसोज के नवरात्रि मे माता की विशेष पूजा अर्चना के साथ मेले लगते हैं जिसमें आसोज के नवरात्रे विशेष माने जाते है। नवरात्रि को 9 दिनों तक बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस खास मौके पर मंदिर परिसर में मेले का आयोजन किया जाता है। इस दौरान मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ रहती हैए काफी संख्या में भक्त नंगे पैर पेदल चलकर माता के दर्शन के लिए आते है। <br /><br /><strong> माता की प्रतिमा सर्प फनाकार</strong><br /> माता की प्रतिमा सर्प फनाकार है। बीजासन माता की मूर्ति गुफा के बाएं कोने पर स्थित है।  माता की बाई बगल में गणेशजी विद्यमान है। जहां वर्षों से चली आ रही अखंड ज्योति है जिसमें 1 दिन में 3 किलो 500 ग्राम तेल जलता है इससे उत्पन्न होने होने वाला काजल अद्भुत चमत्कारी है जिसको आंखों में लगाते ही आंखें की सारी पीड़ा दूर हो जाती हैं। अखंड ज्योति के पास में  काल भैरव व सातों बहनों की प्रतिमाएं स्थित है।  मंदिर के नीचे उतरते ही दाएं तरफ  बटुक भैरव और क्षेत्रपाल जी है । <br /><br /><strong>इतिहास में बिजासन माता</strong><br />इतिहास में बिजासन माता का उल्लेख उस समय मिलता था जब रामदेवा ने बूंदी पर अधिकार प्राप्त किया। सन 1959 ई में जब रणथंबोर दुर्ग पर राव सर्जन का अधिकार प्राप्त हुआ था बिजासन माता के नाम पर कई बीघा भूमि का पट्टा ताम्रपत्र में लिखा हुआ प्रदान किया था। रणथंभौर के अधिकार क्षेत्र में 81 बीघा भूमि शयोपुर तहसील के अडवाल गांव में से प्रदान की गई थी। इस डोली का ताम्रपत्र माताजी के सेवक सोलंकी नाथ परिवार के पास आज भी है। <br /><br /><strong>सातों बहनों के साथ विद्यमान हैं माता बिजासन</strong><br />कहा जाता है कि बिजासन माता मंदिर परिसर में सातों बहनों के साथ विराजमान है बिजासन माता इंद्रगढ़, राम बाई, रामगढ़ में लाल बाई,डूंगर में चौथ माता बरवाड़ा में कैला माता करौली में करणी माता, देशनोक और गुलाब बाई करणी माता के साथ ही स्थापित है। <br /><br />यह क्षेत्र वन विभाग की भूमि में आता है। अगर यह आबादी भूमि में हो तो यहां विकास के आयाम खुल सकते हैं जिससे आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को सुविधाएं मिल सके।-<strong>हरिमोहन योगी,  पुजारी बिजासन माता मंदिर</strong><br /><br />बाहर से आने वाले यात्रियों व श्रद्धालुओं को सुविधा मिले इसलिए यह क्षेत्र  वन विभाग की जगह आबादी में हो। <strong>- सत्यनारायण योगी, पुजारी बिजासन माता मंदिर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बूंदी</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 Apr 2022 16:01:30 +0530</pubDate>
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