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                <title>Calcutta High Court - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>Calcutta High Court RSS Feed</description>
                
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                <title>अभिषेक बनर्जी को हाईकोर्ट से बड़ी राहत: गिरफ्तारी पर लगी रोक, जांच में सहयोग करने का निर्देश</title>
                                    <description><![CDATA[कलकत्ता उच्च न्यायालय ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद अभिषेक बनर्जी को बड़ी राहत देते हुए तीन प्राथमिकियों में 30 नवंबर तक गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। अदालत ने कहा कि पूछताछ के लिए कस्टडी की जरूरत नहीं है और जांच एजेंसी को पूछताछ से 48 घंटे पहले सूचित करना होगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/big-relief-to-abhishek-banerjee-from-high-court-ban-on/article-163837"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-08/kolkata-hc.png" alt=""></a><br /><p>कोलकाता। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने मंगलवार को तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसद अभिषेक बनर्जी की उनके खिलाफ दर्ज तीन प्राथमिकियों के मामले में 30 नवंबर तक गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। अभिषेक बनर्जी को कोलकाता के भवानीपुर पुलिस स्टेशन और दक्षिण 24 परगना के कालीतला और बिष्णुपुर पुलिस स्टेशनों में उनके खिलाफ दर्ज तीन प्राथमिकियों के मामले में गिरफ्तारी पर 30 नवंबर तक रोक लगा दी है। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने गिरफ्तारी पर रोक 30 नवंबर तक बढ़ाते हुए कहा कि इन मामलों में पूछताछ के लिए अभिषेक बनर्जी को हिरासत में लेने की कोई ज़रूरत नहीं है।</p>
<p>न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने हालांकि बनर्जी को जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने कहा कि अगर जांच एजेंसी को उनकी मौजूदगी की ज़रूरत होती है, तो उन्हें कम से कम 48 घंटे पहले सूचित करना होगा। न्यायालय ने यह भी साफ किया कि अगर बनर्जी जांच में सहयोग नहीं करते हैं, तो राज्य सरकार न्यायालय का रुख कर सकती है। वह न्यायालय की इजाज़त के बिना विदेश यात्रा नहीं कर सकते। न्यायमूर्ति ने ध्यान दिलाया कि उच्चतम न्यायालय ने अभिषेक बनर्जी को 10 अगस्त को आंखों के इलाज के लिए विदेश जाने की इजाज़त दी थी। उन्होंने हालांकि अभी तक यात्रा नहीं की है।</p>
<p>न्यायालय ने साफ किया कि उसके आदेश का असर उच्चतम न्यायालय द्वारा विदेश में इलाज के लिए दी गयी इजाज़त पर नहीं पड़ेगा। इस मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को तय की गयी है। पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनावों के पश्चात सरकार बदलने के बाद बनर्जी के खिलाफ़ अलग-अलग आरोपों में 16 प्राथमिकी दर्ज की गयी थीं। इन प्राथमिकियों को चुनौती देते हुए डायमंड हार्बर सीट से सांसद अभिषेक बनर्जी ने अदालत का रुख किया था। आज के आदेश के साथ, उन्हें अब 16 में से आठ मामलों में राहत मिल गयी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 16:57:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>पश्चिम बंगाल​ विधानसभा चुनाव: अधिकारियों के तबादलों को हाईकोर्ट में चुनौती, चुनाव आयोग की शक्तियों पर उठे सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[चुनाव आयोग द्वारा बंगाल के IAS और IPS अधिकारियों के तबादलों को कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने आयोग के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाते हुए इसे राज्य प्रशासन में हस्तक्षेप बताया। मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ अगले सप्ताह इस जनहित याचिका पर सुनवाई करेगी, जो चुनावी निष्पक्षता और शक्तियों की सीमा तय कर सकती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/transfers-of-west-bengal-assembly-election-officers-challenged-in-high/article-147222"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/calcutta-high-court.png" alt=""></a><br /><p>कोलकाता। चुनाव आयोग द्वारा पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ अधिकारियों के तबादलों का मामला अब कलकत्ता उच्च न्यायालय पहुंच गया है। एक याचिका में चुनाव आयोग के उस अधिकार को चुनौती दी गयी है, जिसके तहत अधिकारियों को चुनाव ड्यूटी के लिए अन्य राज्यों में भेजा जा रहा है। वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने न्यायालय का ध्यान इस मुद्दे की ओर आकर्षित करते हुए कहा कि आयोग के पास इस तरह से भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारियों को राज्य से बाहर भेजने का अधिकार नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि इससे राज्य प्रशासन के सामान्य कामकाज पर असर पड़ता है।</p>
<p>इस मामले में तृणमूल कांग्रेस के अधिवक्ता अर्क नाग जनहित याचिका दाखिल करेंगे। न्यायालय से याचिका दाखिल करने की अनुमति देने की मांग करते हुए बनर्जी ने तबादला आदेशों पर रोक लगाने का आग्रह किया है। मुख्य न्यायाधीश सुजोय पाल और न्यायमूर्ति पार्थसारथी सेन की खंडपीठ ने याचिका दायर करने की अनुमति दे दी है और मामले की सुनवाई अगले सप्ताह निर्धारित की है।</p>
<p>यह विवाद चुनाव आयोग द्वारा रविवार आधी रात से लेकर गुरुवार तक किये गये बड़े प्रशासनिक फेरबदल के बाद उत्पन्न हुआ है। इसमें मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक और कोलकाता पुलिस आयुक्त समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों को उनके पदों से हटाया गया है। कई जिलों के जिलाधिकारियों का भी तबादला किया गया है और नये अधिकारियों की नियुक्ति की गयी है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि हटाये गये अधिकारियों को फिलहाल पश्चिम बंगाल में चुनाव संबंधी कोई जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी। इनमें से कई अधिकारियों को अन्य राज्यों में चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में पहले ही प्रतिनियुक्त किया गया है।</p>
<p>तबादलों की इस कार्रवाई पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने कड़ी आपत्ति जतायी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर आयोग के फैसलों पर सवाल उठाये हैं। अब इस मामले के उच्च न्यायालय में पहुंच जाने के बाद चुनाव आयोग की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र की सीमा का कानूनी परीक्षण होने की संभावना है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Mar 2026 18:22:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव: शुक्रवार को जारी हो सकती है Updated Voter List, मतदाता सूची को लेकर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश की आज अहम बैठक</title>
                                    <description><![CDATA[पश्चिम बंगाल में 60 लाख से अधिक 'विचाराधीन' नामों की जांच के बाद शुक्रवार को संशोधित मतदाता सूची जारी होने की संभावना है। कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने सुरक्षा स्थिति की समीक्षा हेतु शीर्ष अधिकारियों के साथ बैठक की। प्रशासन सूची प्रकाशन के बाद संभावित कानून-व्यवस्था की चुनौतियों को लेकर पूरी तरह सतर्क है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/west-bengal-assembly-elections-may-be-released-on-friday-updated/article-147049"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/west-bengal-sir.png" alt=""></a><br /><p>कोलकाता। पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के बाद  मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) कार्यालय की ओर से तैयार की गई अतिरिक्त मतदाता सूची से नामों का पहला सेट प्रकाशित किए जाने की संभावना है और ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि अद्यतन मतदाता सूची शुक्रवार तक जारी की जा सकती है। यह घटनाक्रम संशोधित नामों के सार्वजनिक होने के बाद संभावित कानून-व्यवस्था संबंधी समस्याओं को लेकर बढ़ी हुई प्रशासनिक तैयारियों और चिंताओं के बीच सामने आया है।</p>
<p>स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल ने गृह सचिव संघमित्रा घोष, पुलिस महानिदेशक सिद्धनाथ गुप्ता और कोलकाता पुलिस आयुक्त अजय नंदा के साथ राज्य में मौजूदा सुरक्षा स्थिति का आकलन करने के लिए बैठक की। गुरुवार को सुबह 10 बजे बैठक शुरू हुई और लगभग आधे घंटे तक चली।  इस समीक्षा का समय महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह एसआईआर प्रक्रिया के बाद अतिरिक्त मतदाता सूची के प्रकाशन से ठीक पहले हो रही है। चुनाव आयोग ने इससे पहले 28 फरवरी को एक संशोधित मतदाता सूची जारी की थी, हालांकि इसे अपूर्ण माना गया था।</p>
<p>आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, उस सूची में 6,44,52,609 मतदाताओं को 'पात्र' के रूप में चिह्नित किया गया था, जबकि 60,06,675 नाम 'विचाराधीन' श्रेणी में रखे गए थे। इन लंबित नामों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में हाल के दिनों में तेजी आई है। बुधवार तक लगभग 23.3 लाख ऐसे मामलों पर निर्णय लिए जा चुके थे।</p>
<p>उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त 700 से अधिक न्यायिक अधिकारी वर्तमान में इन प्रविष्टियों की जांच में लगे हुए हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारियों ने सुझाव दिया है कि यदि वर्तमान गति बनी रही, तो चुनाव से पहले सभी लंबित नामों का निपटारा पूरा हो सकता है। कुछ हलकों में आशंका बनी हुई है कि जब मतदाताओं की पहली सूची प्रकाशित होगी, तो कई नाम छूट सकते हैं। इससे राज्य के कुछ हिस्सों में सूची जारी होने के बाद संभावित कानून-व्यवस्था की गड़बड़ी की आशंका बढ़ गई है।</p>
<p>इस पृष्ठभूमि में, उच्च न्यायालय द्वारा सुरक्षा स्थिति की सक्रिय समीक्षा प्रशासन की सतर्कता को रेखांकित करती है। अधिकारी घटनाक्रम पर कड़ी नजर रख रहे हैं ताकि संशोधित मतदाता सूचियों के प्रकाशन से उत्पन्न होने वाले किसी भी दुष्प्रभाव को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Mar 2026 17:49:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट का आर्टिकल 142 का उपयोग: बंगाल चुनाव से पहले 'पूर्ण न्याय' का आदेश</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अपनी खास शक्तियों का इस्तेमाल किया ताकि यह पक्का किया जा सके कि प्रोसेस की टाइमलाइन की वजह से पश्चिम बंगाल में कोई भी योग्य वोटर वोटर रोल से छूट न जाए, और राज्य विधानसभा चुनावों से पहले यह एक बहुत बड़ा दखल है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/supreme-courts-use-of-article-142-to-order-complete-justice/article-144398"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/supreme-court-of-india.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सशक्त बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह सुनिश्चित किया कि समय सीमा की बाधाओं के कारण कोई भी पात्र मतदाता मताधिकार से वंचित न रहे।</p>
<p><strong>सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट और ज्यूडिशियल मैनपावर</strong></p>
<p>अदालत ने भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) को निर्देश दिया है कि 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद भी सप्लीमेंट्री (पूरक) लिस्ट जारी रखी जाए। यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य में 'लॉजिकल डिसकम्पेन्सी' जैसे तकनीकी कारणों से लगभग 80 लाख मामलों का निपटारा होना अभी बाकी है। कोर्ट ने माना कि मौजूदा गति से इन दावों को निपटाने में 80 दिन लग सकते हैं, जो चुनाव की संभावित तारीखों के हिसाब से बहुत अधिक है।</p>
<p>काम में तेजी लाने के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को झारखंड और ओडिशा के मौजूदा व सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों की मदद लेने का अधिकार दिया गया है। कोर्ट ने इसे "युद्ध स्तर पर" पूरा करने का निर्देश दिया है।</p>
<p><strong>चुनावी शुद्धता और समावेशिता</strong></p>
<p>बेंच ने स्पष्ट किया कि पहचान के सबूत के तौर पर आधार, एडमिट कार्ड और सर्टिफिकेट मान्य रहेंगे। इस हस्तक्षेप का मुख्य उद्देश्य चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच "भरोसे की कमी" को पाटते हुए मतदाता सूची की पवित्रता बनाए रखना है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अनुच्छेद 142 के तहत दिए गए इन निर्देशों को भविष्य के लिए 'मिसाल' (Precedent) नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि यह केवल बंगाल की "असाधारण स्थिति" के लिए है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Feb 2026 14:11:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बंगाल वोटर लिस्ट विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल SIR को ज्यूडिशियल निगरानी में रखा, माइक्रो-ऑब्जर्वर पर भी आपत्ति जताई</title>
                                    <description><![CDATA[ममता बनर्जी सरकार ने आयोग को पर्याप्त संख्या में ग्रुप-B अधिकारी उपलब्ध कराए हैं। सरकार ने चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त माइक्रो-ऑब्जर्वर पर भी आपत्ति जताई थी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/bengal-voter-list-controversy-supreme-court-puts-bengal-sir-under/article-143962"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/sc.png" alt=""></a><br /><p>पश्चिम बंगाल। एसआईआर को लेकर पूरे देश में विवाद खड़ा हुआ है जिसको लेकर अलग अलग जगहों पर अलग अलग पार्टियों ने मिलकर विरोध प्रदर्शन किया। इसी बीच पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जारी गतिरोध पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए शुक्रवार 20 फरवरी को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने निर्देश देते हुए कहा कि इस प्रक्रिया की निगरानी के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मौजूदा या सेवानिवृत्त अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों (ADJs) को नियुक्त करें।</p>
<p><strong>संवैधानिक संस्थाओं के बीच 'भरोसे की कमी'</strong></p>
<p>अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा, राज्य सरकार और भारत निर्वाचन आयोग के बीच "दुर्भाग्यपूर्ण आरोप-प्रत्यारोप" और भरोसे की भारी कमी के कारण उसके पास न्यायिक हस्तक्षेप के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। यह विवाद मुख्य रूप से इस बात पर था कि क्या ममता बनर्जी सरकार ने आयोग को पर्याप्त संख्या में ग्रुप-B अधिकारी उपलब्ध कराए हैं। सरकार ने चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त माइक्रो-ऑब्जर्वर पर भी आपत्ति जताई थी।</p>
<p><strong>निष्पक्षता के लिए न्यायिक हस्तक्षेप</strong></p>
<p>इसके आगे सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट करते हुए कहा, मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने के दावों पर निष्पक्ष निर्णय सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक अधिकारी Logical Error की श्रेणी में लंबित मामलों का निपटारा करेंगे। पीठ ने कलकत्ता हाई कोर्ट के सीजे से अनुरोध किया कि वे ईमानदार अधिकारियों का चयन करें, जिन्हें राज्य सरकार और माइक्रो-ऑब्जर्वर सहयोग देंगे। साथ ही, जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षकों को इन टीमों को पूर्ण लॉजिस्टिक सहायता प्रदान करने का आदेश दिया गया है।</p>
<p><strong>समयसीमा और सुरक्षा</strong></p>
<p>अदालत ने निर्वाचन आयोग को 28 फरवरी तक अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने की अनुमति दी है, जबकि शेष दावों के लिए सप्लीमेंट्री लिस्ट बाद में जारी की जा सकती है। इसके अलावा, राज्य के डीजीपी को उन शिकायतों पर हलफनामा दाखिल करने को कहा गया है जिनमें पुनरीक्षण अधिकारियों को धमकियां मिलने की बात कही गई थी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पहले कोर्ट में पेश होकर आरोप लगाया था कि चुनाव से पहले राज्य को निशाना बनाया जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Feb 2026 16:56:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट ने पार्ट-टाइम शिक्षकों को वेतन समानता की मांग करने की अनुमति दी, जानें पूरा मामला</title>
                                    <description><![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल के पार्ट-टाइम शिक्षकों को बड़ी राहत देते हुए उन्हें राज्य शिक्षा सचिव के समक्ष वेतन समानता के लिए नया आवेदन देने की अनुमति दी है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सरकार को निर्देश दिया कि वे चार महीने के भीतर इस पर कानूनसम्मत निर्णय लें।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/supreme-court-allows-part-time-teachers-to-demand-pay-parity-know/article-138634"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/part-time-teacher.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को पश्चिम बंगाल के कुछ अल्पकालिक (पार्ट-टाइम) शिक्षकों को यह अनुमति दी कि वे राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव के समक्ष नया प्रतिवेदन प्रस्तुत कर सकें, जिसमें वे गैर-सरकारी सहायता प्राप्त उच्च माध्यमिक विद्यालयों में कार्यरत पूर्ण-कालिक शिक्षकों के समान वेतन (वेतन समानता) की मांग कर सकें। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने निर्देश दिया कि यदि यह प्रतिवेदन दाखिल किया जाता है, तो उस पर कानून के अनुसार विचार किया जाए और चार महीने के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित कर निर्णय लिया जाए।</p>
<p>अदालत में निर्णय का प्रभावी (ऑपरेटिव) हिस्सा पढ़ते हुए न्यायमूर्ति मेहता ने याचिकाकर्ताओं को यह छूट प्रदान की कि वे छह सप्ताह के भीतर सचिव के समक्ष प्रस्तुत हो सकते हैं और पूर्व में दिए गए उच्च न्यायालय के आदेशों के अनुरूप अपनी शिकायतें, दावे और अधिकार रिकॉर्ड पर रख सकते हैं। न्यायालय ने आगे निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को प्रतिनिधि रूप में सुनवाई का अवसर दिया जाए और संबंधित स्कूलों से उनकी नियुक्ति से जुड़े रिकॉर्ड मंगवाकर जांच की जाए। यदि निर्णय प्रतिकूल होता है, तो याचिकाकर्ता कानून के तहत उपलब्ध उपचारों का सहारा लेने के लिए स्वतंत्र होंगे।</p>
<p>ऑपरेटिव निर्देश पढ़े जाने के बाद न्यायमूर्ति नाथ ने टिप्पणी की, यहां मत आओ! उचित मंच पर जाओ। यह मामला तब शुरू हुआ जब राज्य सरकार ने 28 जुलाई 2010 को एक आदेश पारित किया, जिसमें संविदा पर रखे गये अल्पकालिक शिक्षकों को 10 दिनों की आकस्मिक अवकाश और 10 दिनों की चिकित्सा अवकाश का लाभ दिया गया, बशर्ते वे नियमित पूर्णकालिक शिक्षकों की तरह प्रति सप्ताह समान संख्या में कक्षाएं लें।</p>
<p>भेदभावपूर्ण व्यवहार का आरोप लगाते हुए कुछ अल्पकालिक शिक्षकों ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की, जिसमें नियमित शिक्षकों के साथ समानता की मांग की गई, जिसमें समान कार्य के लिए समान वेतन भी शामिल था। राज्य अधिकारियों ने पहले इस दावे को खारिज कर दिया था, इस आधार पर कि अल्पकालिक शिक्षक पूरी तरह संविदात्मक आधार पर नियुक्त किए गए थे और उनकी नियमितीकरण के लिए कोई नीति नहीं थी। बाद में उच्च न्यायालय के एकल पीठ ने याचिका को स्वीकार कर लिया और समान कार्य के लिए समान वेतन के सिद्धांत को लागू करते हुए 27 अप्रैल 2007 से पूर्णकालिक शिक्षकों के समान वेतन और लाभों का भुगतान करने का निर्देश दिया।</p>
<p>राज्य ने इसके बाद उस निर्णय को चुनौती दी, जिससे आगे की कार्यवाही हुई और अंतत: शीर्ष अदालत का वर्तमान आदेश आया, जिसमें याचिकाकर्ताओं को उचित प्राधिकरण के समक्ष नया प्रतिवेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 06 Jan 2026 18:28:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>Bengal : 2010 के बाद के सभी ओबीसी प्रमाण पत्र रद्द</title>
                                    <description><![CDATA[बंगाल सीएम ममता बनर्जी ने कहा कि वे हाईकोर्ट और भाजपा के आदेश को नहीं मानेंगी। राज्य में ओबीसी आरक्षण जारी रहेगा। एक रैली में ममता ने कहा कि ओबीसी आरक्षण लागू करने से पहले कई सर्वे कराए गए थे। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/bengal-cancels-all-obc-certificates-after-2010/article-78999"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-05/t21rer-(2)45.png" alt=""></a><br /><p>कोलकाता। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में ममता सरकार द्वारा 2010 के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए जारी सभी प्रमाण पत्रों को रद्द कर दिया। जिससे करीब पांच लाख लोगों के प्रभावित होने का अनुमान है। न्यायालय ने पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के अतिरिक्त) (सेवाओं और पदों की रिक्तियों मे आरक्षण) अधिनियम 2012 की अनुच्छेद 2एच, पांच, छह और 16 तथा इस अधिनियम के अनुसूची एक और तीन को असंवैधानिक करार दिया है। न्यायमूर्ति तारापद चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति राजशेखर मनता की खंड पीठ ने इस मामले पर फैसला देते हुए कहा कि 2010 से पहले ओबीसी की 66 श्रेणियों के वर्गीकरण के राज्य सरकार के आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया गया है क्योंकि याचिका में उनकों चुनौती नहीं दी थी।  </p>
<p><strong>2010 के बाद वास्तव में ओबीसी को उनका हक नहीं दिया गया</strong><br />अदालत ने कहा कि 2010 के बाद राज्य में वास्तव में ओबीसी को उनका हक नहीं दिया गया है और इस टिप्पणी के साथ आयोग ने 2010 के बाद के प्रमाण-पत्रों को खारिज कर दिया। पीठ ने 2010 के बाद 37 श्रेणियों को ओबीसी आरक्षण दिये जाने की व्यवस्था को भी खारिज कर दिया है।  </p>
<p><strong>यह फैसला वोट की राजनीति के लिए किया गया</strong><br />फैसले में यह भी कहा गया है कि मुसलमानों की जिन 77 श्रेणियों को आरक्षण के चुना गया वह पूरे मुस्लिम समुदाय के लिए अपमानजनक है। पीठ की राय में निसंदेह ऐसा निर्णय वोट की राजनीति के लिए किया गया।</p>
<p><strong>हाईकोर्ट का आदेश नहीं मानेंगे: ममता बनर्जी</strong><br />हाईकोर्ट के फैसले को लेकर बंगाल सीएम ममता बनर्जी ने कहा कि वे हाईकोर्ट और भाजपा के आदेश को नहीं मानेंगी। राज्य में ओबीसी आरक्षण जारी रहेगा। एक रैली में ममता ने कहा कि ओबीसी आरक्षण लागू करने से पहले कई सर्वे कराए गए थे। इस मामले में पहले भी कई केस दर्ज कराए गए हैं, पर उनका कोई नतीजा नहीं निकला। ये लोग भाजपा शासित प्रदेशों में नीतियों पर बात क्यों नहीं करते हैं।</p>
<p><strong>माइनॉरिटीज कभी तापाशिली या आदिवासी रिजर्वेशन को हाथ भी नहीं लगा सकती</strong><br />ममता ने आगे कहा कि पीएम मोदी लगातार बात करते आए हैं कि कैसे माइनॉरिटीज तापाशिली आरक्षण को छीन लेंगी और इससे संविधान ध्वस्त हो जाएगा। माइनॉरिटीज कभी तापाशिली या आदिवासी रिजर्वेशन को हाथ भी नहीं लगा सकती हैं, लेकिन भाजपा के शातिर लोग एजेंसियों के जरिए अपने काम करवाते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 May 2024 11:26:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कलकत्ता HC ने ममता बनर्जी पर लगाया 5 लाख का जुर्माना, कहा- न्यायपालिका की छवि धूमिल करने की कोशिश की</title>
                                    <description><![CDATA[कलकत्ता हाईकोर्ट ने बुधवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को बड़ा झटका देते हुए 5 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। ममता बनर्जी के वकील ने नंदीग्राम चुनाव से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई में पक्षपात का हवाला देते हुए जस्टिस कौशिक चंदा की पीठ से मामले को स्थानांतरित करने की अपील की थी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE-hc-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A4%AE%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%B2%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%BE-5-%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%96-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE--%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE--%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9B%E0%A4%B5%E0%A4%BF-%E0%A4%A7%E0%A5%82%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B6-%E0%A4%95%E0%A5%80/article-1031"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-05/calcutta_high_court.jpg" alt=""></a><br /><p>कोलकाता। कलकत्ता हाईकोर्ट ने बुधवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को बड़ा झटका देते हुए 5 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। ममता बनर्जी के वकील ने नंदीग्राम चुनाव से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई में पक्षपात का हवाला देते हुए जस्टिस कौशिक चंदा की पीठ से मामले को स्थानांतरित करने की अपील की थी। ममता ने जस्टिस चंदा पर भाजपा से संबंधों का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि जस्टिस चंदा की एक फोटो सामने आई है, जिसमें वे भाजपा नेताओं के साथ दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में उनका इस केस से जुड़े होना ठीक नहीं है।<br /> <br /> नंदीग्राम चुनाव केस की सुनवाई कर रहे जस्टिस कौशिक चंदा ने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज करते हुए ममता बनर्जी पर 5 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है और उसके बाद खुद को मामले से अलग कर लिया। जस्टिस चंदा में इस मामले में 24 जून को फैसला रिजर्व रख लिया था। उन्होंने बुधवार को फैसला सुनाते हुए कहा कि ममता ने न्यायपालिका की छवि धूमिल करने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक दल के लिए उपस्थित होता है, तो यह असामान्य है लेकिन वह एक मामले की सुनवाई करते समय अपने पूर्वाग्रह को छोड़ देता है।<br /> <br /> जस्टिस कौशिक चंदा ने कहा कि इस मामले में आर्थिक हित पैदा नहीं होता, यह सुझाव देना बेतुका है कि एक न्यायाधीश जिसका किसी मामले के लिए एक राजनीतिक दल के साथ संबंध है, वह पक्षपात कर सकता है। वादी के दृष्टिकोण के कारण किसी न्यायाधीश को पक्षपाती नहीं देखा जा सकता। जस्टिस चंदा ने कहा कि याचिकाकर्ता के मामले को सुनने के लिए मेरा कोई व्यक्तिगत झुकाव नहीं है। मुझे इस मामले को उठाने में भी कोई हिचक नहीं है। चीफ जस्टिस द्वारा मुझे सौंपे गए मामले की सुनवाई करना मेरा संवैधानिक कर्तव्य है, शुरुआत में बेंच बदलने का कुछ भी उल्लेख नहीं किया गया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 07 Jul 2021 16:21:27 +0530</pubDate>
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                <title>नारदा स्टिंग केस में गिरफ्तार TMC नेताओं को हाईकोर्ट से नहीं मिली जमानत, घर में रहेंगे नजरबंद</title>
                                    <description><![CDATA[कलकत्ता हाईकोर्ट ने नारदा स्टिंग ऑपरेशन मामले में गिरफ्तार तृणमूल कांग्रेस के दो मंत्रियों समेत तीन नेताओं तथा कोलकाता के पूर्व मेयर के स्वास्थ्य की स्थिति में गिरावट को देखते हुए उन्हें उनके घरों में नजरबंद किए जाने का आदेश शुक्रवार को दिया। वहीं, चारों की बेल याचिका पर कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच फैसला देगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97-%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%B8-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%AB%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B0-tmc-%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%93%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%88%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9F-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%9C%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%A4--%E0%A4%98%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A4%9C%E0%A4%B0%E0%A4%AC%E0%A4%82%E0%A4%A6/article-447"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-05/calcutta_high_court.jpg" alt=""></a><br /><p>कोलकाता। कलकत्ता हाईकोर्ट की दो न्यायाधीशों की पीठ ने गौतम नवलखा मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के अनुरूप शुक्रवार को आदेश दिया कि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के तीन प्रमुख नेताओं और कोलकाता के एक पूर्व मेयर को जेल में रखने के बजाए घर में नजरबंद रखा जाए। सुबह मामले की सुनवाई शुरू होते ही कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति अरिजीत बनर्जी की पीठ इस विषय पर मत नहीं थी। दोनों न्यायाधीश अंतरिम जमानत देने की प्रार्थना पर सहमत नहीं हुए और इसलिए उन्होंने मामले को वृहत पीठ के समक्ष भेजने का फैसला किया। तृणमूल नेताओं और पूर्व मेयर की नजरबंद का आदेश तदर्थ व्यवस्था के रूप में उस समय तक पारित किया गया है, जब तक वृहत पीठ में इस मामले की सुनवाई नहीं होती। पीठ ने कोविड-19 की दूसरी लहर के मद्देनजर चारों नेताओं को न्यायिक हिरासत के बजाय उन्हें घर में नजरबंद करने का आदेश जारी किया।<br /> <br /> कोर्ट ने यह आदेश मामले की सुनवाई कर रहे दो जजों की पीठ के विचारों में भेद के बाद दिया। एक ओर कलकत्ता हाई कोर्ट के कार्यकारी चीफ जस्टिस राजेश बिंदल ने नेताओं को नजरबंद रखे जाने का आदेश दिया तो वहीं जस्टिस अरिजीत बनर्जी ने चारों को जमानत दिए जाने का आदेश दिया। जस्टिस बनर्जी ने कहा कि पीठ के एक सदस्य को लगा कि बेल दे दी जानी चाहिए लेकिन दूसरा इसपर सहमत नहीं था। इसलिए जमानत को लेकर बड़ी बेंच फैसला करेगी। इस बीच महामारी की स्थिति को ध्यान में रखते हुए नेताओं को नजरबंद रखे जाने के लिए मंजूरी दी जाती है। सीबीआई और सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस दोनों ने ही नजरबंद रखे जाने के आदेश का विरोध किया।<br /> <br /> इससे पहले सोमवार को सीबीआई की विशेष अदालत ने ने मंत्री सुब्रत मुखर्जी और फिरहाद हकीम, तृणमूल कांग्रेस विधायक मदन मित्रा और कोलकाता के पूर्व मेयर सोवन चटर्जी को अंतरिम जमानत दे दी थी, लेकिन सीबीआई की अपील पर हाईकोर्ट ने कुछ घंटों इस आदेश पर रोक लगा दी थी। खंडपीठ ने कहा था कि उसने विशेष अदालत के आदेश पर रोक लगाना उचित समझा और निर्देश दिया कि आरोपियों को अगले आदेश तक न्यायिक हिरासत में रखा जाएगा। बुधवार को इस मामले की सुनवाई को एक दिन के लिए स्थगित कर दी गई थी। गौरतलब है कि हाईकोर्ट के आदेश पर नारदा स्टिंग मामले की जांच कर रही सीबीआई ने चारों टीएमसी नेताओं को इसी हफ्ते सोमवार को हाई वोल्टेज ड्रामा के बाद गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद सीबीआई दफ्तर के बाहर धरने पर बैठ गईं थीं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 21 May 2021 16:54:22 +0530</pubDate>
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