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                <title>plastic waste - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>plastic waste RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>बिहार ग्रामीण कार्य विभाग की अनोखी पहल: प्लास्टिक कचरे से बनाई 7,214 किलोमीटर ग्रामीण सड़कें</title>
                                    <description><![CDATA[ग्रीन टेक्नोलॉजी अपनाते हुए 7,214 किमी से अधिक लंबी सड़कों का निर्माण। वेस्ट प्लास्टिक का उपयोग कर सड़कों को मजबूती। 6.40 लाख वृक्षारोपण से पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित। आईआईटी पटना में इंजीनियरों का प्रशिक्षण और हाई-टेक मॉनिटरिंग बिहार के ग्रामीण बुनियादी ढांचे को अंतरराष्ट्रीय मानकों पर ले जाना सुनिश्चित किया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/unique-initiative-of-bihar-rural-works-department-7214-km-rural/article-144548"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/road.png" alt=""></a><br /><p>पटना। बिहार ग्रामीण कार्य विभाग ने ग्रामीण सड़कों के निर्माण में आधुनिक ग्रीन टेक्नोलॉजी का उपयोग करते हुए 7,214 किलोमीटर से अधिक लंबी सड़कों का निर्माण किया है। बिहार में ग्रामीण कार्य विभाग द्वारा राज्य के सुदूर इलाकों में बारहमासी सड़क का निर्माण कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति प्रदान किया जा रहा है। साथ ही निर्माण की गुणवत्ता और पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य के साथ एक नया मानक भी स्थापित किया है। पर्यावरण संरक्षण के क्रम में ग्रामीण कार्य विभाग ने ग्रामीण सड़कों के निर्माण में आधुनिक ग्रीन टेक्नोलॉजी का उपयोग करते हुए 7,214 किलोमीटर से अधिक लंबी सड़कों का निर्माण किया गया है। यह पहल केवल तकनीकी नवाचार के दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण असंतुलन की चुनौती के दृष्टिकोण से भी एक दूरदर्शी कदम है।</p>
<p>ग्रामीण सड़कों के निर्माण में प्रयुक्त वेस्ट प्लास्टिक न केवल ठोस कचरे के पुनर्चक्रण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, बल्कि इससे सड़कों की मजबूती और आयु भी बढ़ती है। प्लास्टिक अपशिष्ट जो पहले पर्यावरण प्रदूषण का कारण बनता था, अब बिहार में ग्रामीण सड़कों की आधारशिला बन रहा है। </p>
<p>सड़क निर्माण के साथ-साथ विभाग ने हरियाली को भी समान महत्व दिया है। ग्रामीण सड़क निर्माण के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के प्रति सजगता दिखाते हुए विभाग ने लगभग पिछले एक वर्ष में सड़कों के किनारे 6,40,000 वृक्षारोपण का कार्य किया है। इस विशाल वृक्षारोपण अभियान से ग्रामीण क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन में कमी आई है और हरित आवरण का विस्तार हुआ है।</p>
<p>इसके साथ-साथ भविष्य की चुनौतियों और आधुनिक निर्माण शैली को देखते हुए विभाग ने अपने नवनियुक्त 480 सहायक अभियंताओं को आईआईटी पटना जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में विशेष प्रशिक्षण दिलाने का अभियान शुरू किया है। इस पहल के तहत अब तक 120 अभियंताओं को प्रशिक्षित किया जा चुका है और जुलाई 2026 तक सभी अभियंताओं को दक्ष बनाने का लक्ष्य है, जिससे राज्य की ग्रामीण सड़कों और पुलों का निर्माण अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप सुनिश्चित हो सके।</p>
<p>वहीं, विभाग अब भविष्य की तकनीक की ओर उन्मुख होते हुए आधुनिक तकनीकी प्रणाली लागू करने की दिशा में भी कार्य कर रहा है, जिससे सड़कों के रखरखाव में मानवीय हस्तक्षेप कम होगा और तकनीक के माध्यम से रियल-टाइम मॉनिटिंरिग सुनिश्चित की जा सकेगी।</p>
<p>ग्रामीण कार्य विभाग का यह बदलता स्वरूप न केवल आवागमन को सुगम बना रहा है, बल्कि यह सतत विकास, नवाचार, तकनीकी उत्कृष्टता और पर्यावरण-अनुकूल निर्माण की परंपरा की शुरुआत का नया मॉडल बनकर उभर रहा है। एक तरफ जहां वित्तीय वर्ष 2025-26 में विभाग ने लगभग 1 लाख 20 हजार किलोमीटर सड़कों के निर्माण सहित अन्य उपलब्धियों को हासिल किया है और कई मानक स्थापित किए हैं। </p>
<p>वहीं, आगामी वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए विभाग ने सड़कों के नए विस्तार, नए पुलों के निर्माण, हाई-टेक मॉनिटिंरिंग की व्यवस्था की सुनिश्चितता के साथ-साथ सात निश्चय-3 के तहत महत्वपूर्ण सड़कों के चौड़ीकरण और सुदृढ़ीकरण का लक्ष्य निर्धारित किया है, जिसके लिए मोबाइल ऐप के माध्यम से सर्वेक्षण का कार्य भी पूर्ण कर लिया गया है। यह संपूर्ण प्रयास बिहार के ग्रामीण जनजीवन को आधुनिकता और समृद्धि के एक नए स्तर पर ले जाने के लिए किए जा रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Feb 2026 14:13:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>असर खबर का - पॉलीथिन कैरी बैग का निर्माण करना पड़ेगा भारी</title>
                                    <description><![CDATA[प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने पुरस्कार की बढ़ाई राशि।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/effect-of-news---manufacturing-polythene-carry-bags-will-be-costly/article-124675"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-08/1ne1ws-(3)48.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। प्लास्टिक कचरा दुनिया में प्रदूषण फैलाने में सबसे बड़ा खतरा बन रहा है। देश में भी प्लास्टिक पॉलिथीन को कम करने के लिए इस पर अलग-अलग तरीके से बैन किया गया है। आमजन को जागरुक करने के लिए लगातार अभियान चलाया जा रहा है, लेकिन इसके बाद भी प्लास्टिक पॉलिथीन से लोगों का मोह नहीं छूट रहा है। बाहर से हरेक सामान पॉलिथीन में पैक होकर आ रहा है। अब राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने सिंगल यूज प्लास्टिक एवं प्लास्टिक कैरी बैग का उपयोग बंद करवाने के लिए प्रभावी कार्रवाई करने का निर्णय किया है। इसके प्रतिबंध पर प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने पुरस्कार योजना लागू की है।  पूर्व में इस योजना के अंतर्गत प्रतिबंधित प्लास्टिक कैरी बैग अथवा सिंगल यूज प्लास्टिक वस्तुओं का निर्माण करने वाले इकाइयों व उद्योगों की सूचना देने पर पांच हजार रुपए का पुरस्कार निर्धारित था। अब मंडल द्वारा इस योजना में संशोधन करते हुए पुरस्कार राशि को बढ़ाकर पंद्रह हजार रुपए कर दिया गया है।  </p>
<p><strong>नवज्योति ने प्रमुखता से उठाया था मामला </strong><br />सिंगल यूज प्लास्टिक सर्वाधिक खतरनाक है। इसकी बिक्री पर बैन लगा हुआ है लेकिन इसके बाद भी यह बाजार में खुलेआम बिक रही है। दैनिक नवज्योति में गत 9 मार्च को प्रमुखता से समाचार प्रकाशित किया था। इसमें बताया था कि शहर की थोक फल सब्जीमंडी में पॉलीथिन का धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है। यहां पर सभी विक्रेता पॉलीथिन के साथ ही कारोबार करने में जुटे हुए हैं। मंडी परिसर में दिनभर सब्जियों की बिक्री पॉलीथिन में ही हो रही है। थैलियों में सामग्री लाने और ले जाने सुविधाजनक होने के कारण विक्रेता से लेकर ग्राहक तक इसका उपयोग करता है। दिनभर के कारोबार के बाद ज्यादातर पॉलीथिन कचरे के रूप में तब्दील हो जाती है। देश में 120 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक बैग पर प्रतिबंध है। जबकि 75 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक बैग पर पहले से ही बैन लगा हुआ है। प्रतिबंध के बावजूद थोक फलमंडी का कारोबार पॉलीथिन के बल पर हो रहा है। इसके बावजूद जिम्मेदार विभाग इस सम्बंध में कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। ऐसे में इनका धड़ल्ले से संचालन हो रहा है। </p>
<p><strong>पुरस्कार राशि में किया संशोधन</strong><br />मंडल के अधिकारियों के अनुसार भारत सरकार के  पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार देशभर में चिन्हित सिंगल यूज प्लास्टिक वस्तुओं के निर्माण, आयात, भंडारण, वितरण, बिक्री एवं उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लागू है। इनमें प्लास्टिक स्टिक वाले ईयर बड्स, गुब्बारों की प्लास्टिक स्टिक, प्लास्टिक झंडे, कैंडी और आइसक्रीम की प्लास्टिक स्टिक, मिठाई के डिब्बों के चारों ओर लपेटने वाली प्लास्टिक फिल्म, आमंत्रण पत्रों और सिगरेट पैकेट पर चढ़ाई जाने वाली प्लास्टिक शीट, 100 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंधित हैं। प्रतिबंध के बाद भी इनका बाजार में धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है। अब इस प्रतिबंध के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने जनसहभागिता को बढ़ावा देने के लिए पुरस्कार योजना लागू की है। अब मंडल द्वारा इस योजना में संशोधन करते हुए पुरस्कार राशि को बढ़ाकर पंद्रह हजार रुपए कर दिया गया है। प्रतिबंधित प्लास्टिक कैरी बैग अथवा सिंगल यूज प्लास्टिक वस्तुओं का निर्माण करने वाली किसी इकाई की विश्वसनीय सूचना देने पर सूचना दाता को पंद्रह हजार रुपए का पुरस्कार प्रदान किया जाएगा।</p>
<p>अब प्रतिबंधित प्लास्टिक कैरी बैग अथवा सिंगल यूज प्लास्टिक वस्तुओं का निर्माण करने वाले इकाइयों व उद्योगों की सूचना देने पर पंद्रह हजार रुपए का पुरस्कार दिया जाएगा। आमजन सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग न करें और यदि कहीं इनके निर्माण की जानकारी हो तो इसकी जानकारी तुरन्त विभाग को उपलब्ध  कराएं।<br /><strong>- योग्यता सिंह, क्षेत्रीय अधिकारी, राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मण्डल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 Aug 2025 14:54:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राजस्थान में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के तहत लिगेसी वेस्ट के निपटान में बड़ी सफलता, 76 लाख घन मीटर वेस्ट का निस्तारण पूरा</title>
                                    <description><![CDATA[राज्य को स्वच्छ, हरित और टिकाऊ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p>जयपुर। राज्य को स्वच्छ, हरित और टिकाऊ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के तहत लिगेसी वेस्ट (पुराने कचरे) के उपचार के लिए राज्यभर में विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। इसके अंतर्गत सरकार द्वारा राज्य की 176 डंप साइट्स की पहचान की गई, जिनमें कुल 88 लाख घन मीटर लिगेसी वेस्ट मौजूद था।</p>
<p>अब तक इनमें से 76 लाख घन मीटर लिगेसी वेस्ट का सफलतापूर्वक उपचार किया जा चुका है। इस प्रक्रिया के दौरान 4,03,392 मीट्रिक टन अपशिष्ट RDF (Refuse-Derived Fuel) के रूप में तैयार किया गया, जिसका उपयोग आगे चलकर विभिन्न सीमेंट संयंत्रों में किया जाएगा। यह कदम न केवल कचरा प्रबंधन को बेहतर बना रहा है, बल्कि औद्योगिक उपयोग में भी सहायक सिद्ध हो रहा है।</p>
<p>सरकार ने इस परियोजना के तहत लगभग 593 एकड़ भूमि को भविष्य में उपयोग व वृक्षारोपण हेतु चिह्नित किया है, जिससे इन क्षेत्रों का हरित क्षेत्र में परिवर्तन सुनिश्चित किया जा सके। एसबीएम अर्बन निदेशक प्रतीक जुइकर ने बताया कि यह पहल राज्य में सतत विकास, पर्यावरणीय संरक्षण और संसाधनों के पुनः उपयोग की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर उभर रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 06 Aug 2025 15:40:03 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्लास्टिक उत्पादन में कटौती आवश्यक</title>
                                    <description><![CDATA[प्लास्टिक के भयावह खतरों को देखते हुए दुनिया के 40 देश प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा चुके हैं। इनमें फ्रांस, चीन, इटली, रवांडा और केन्या शामिल हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/reduction-in-plastic-production-necessary/article-92632"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-10/plastic-waste.png" alt=""></a><br /><p>आज समूची दुनिया में प्लास्टिक का संकट पर्यावरण के लिए ही नहीं, मानव सभ्यता के लिए भी बड़ी चुनौती के रूप में मुंह बाए खड़ा है। उपभोक्तावाद की संस्कृति ने इसमें अहम भूमिका निबाही है। इसके कारण ही पर्यावरण संरक्षण के लिए बने कानून केवल किताबों की शोभा बनकर रह गए हैं। असलियत यह है कि प्लास्टिक कचरे का संकट मानव सभ्यता के लिए भयावह रूप अख्तियार करता जा रहा है। इसके विस्तार में उपभोक्तावाद में आकंठ डूबी हमारी जीवन शैली की अहम भूमिका है। इससे महानगर ही नहीं छोटे शहर, कस्बे और गांव भी अछूते नहीं रहे।</p>
<p>रोजमर्रा के कामों में प्लास्टिक का उपयोग इस बात का साक्षी है कि वह चाहे दूध हो, सब्जी हो, किराने का सामान ही क्यों न हो सब प्लास्टिक के थैलों में आ रहे हैं। यह भी सच है कि खान-पान में इस्तेमाल होने वाली गर्म वस्तु तो प्लास्टिक के संपर्क में आने पर रासायनिक क्रिया से जहरीली हो जाती है, जो मानव के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। इससे कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी होने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। इसके कण संक्रमण का कारण बन रहे हैं। यही नहीं हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक कण सांस के जरिए फेफड़ों को प्रभावित कर सकते हैं। फूड चेन और मानव भोजन में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी जहरीले रसायनों केअसर को सुनिश्चित करती है। इस प्रकार ये कण शाकाहारी या मांसाहारी भोजन के जरिए मानव शरीर में पहुंच कर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं। हर साल समुद्र में 5 से 14 मिलियन टन प्लास्टिक पहुंच रहा है। यह टूटकर माइक्रोप्लास्टिक में बदल जाता है। इंसान ही नहीं, पशु-पक्षियों के शरीर में भी पहुंच रहा है। टूथपेस्ट, शैम्पू और हेयर क्रीम के जरिए ये कण हमारे शरीर में पहुंच रहे हैं। कार के टायरों से हर 100 किलोमीटर पर 20 ग्राम प्लास्टिक की धूल उड़ती है। माइक्रोप्लास्टिक भौतिक, एंजाइमेटिक और माइक्रोबियल गिरावट की विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजरता है। लेकिन यह पूरी तरह टूटता नहीं है। समुद्र में प्राथमिक माइक्रोप्लास्टिक का औसत वार्षिक आंकड़ा 7.5 मिलियन टन होने का अनुमान है। यह भी अहम तथ्य है कि जलीय पर्यावरण में माइक्रोप्लास्टिक को हटाना अत्यंत कठिन है। इस प्रकार आने वाले दिनों में माइक्रोब और नैनोप्लास्टिक बहुत बड़ी समस्या बनने वाली है। इसके चलते दुनिया में करोड़ों लोगों के प्रभावित होने की आशंका है। एक अनुमान के मुताबिक समुद्र में अब कोई जलीय जीव प्लास्टिक के प्रभाव से बचा नहीं रह सका है।</p>
<p>प्लास्टिक के भयावह खतरों को देखते हुए दुनिया के 40 देश प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा चुके हैं। इनमें फ्रांस, चीन, इटली, रवांडा और केन्या शामिल हैं। लेकिन भारत का इस बारे में रुख समझ से परे है। देश में हर साल करीब 56 लाख टन प्लास्टिक कचरे का उत्पादन होता है। इसमें से लगभग 9205 टन प्लास्टिक को रिसाइकिल कर दोबारा उपयोग में लाया जाता है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार अकेले देश की राजधानी दिल्ली में हर रोज 690 टन कचरा निकलता है। जबकि चेन्नई में 429 टन,  कोलकाता में 426 टन और मुंबई में 408 टन कचरा रोजाना निकलता है। पूरे देश की हालत क्या होगी, यह विचार का विषय भी है और हालात की भयावहता का सबूत भी। इस बारे में हमें आयरलैंड से सबक सीखना होगा जहां प्लास्टिक के इस्तेमाल पर 2002 में ही पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। </p>
<p>यह जल, मृदा, वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। यह भी कि इसके निर्माण में गुणवत्ता नियमों का किंचित भी पालन नहीं किया जाता। जाहिर है यह सब सामाजिक व्यवस्था और आर्थिक ढांचे को भी खंड-खंड कर रहा है। इसका मूल कारण हमारे यहां प्लास्टिक के कुशल प्रबंधन का सर्वथा अभाव है। इसके लिए जरूरी है हम सब अपनी जीवन शैली में बदलाव लाएं,अन्यथा यदि यही हालात रहे तो बहुत देर हो जाएगी। उस समय हम हाथ मलते रह जाएंगे और हमारे पास करने को कुछ नहीं होगा। अब देखना यह है कि साल के अंत में कनाडा की राजधानी ओटावा में दुनिया के देशों के सम्मेलन में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण पर रोक लगाने पर कहां तक सहमति बनती है। दरअसल इसमें सबसे बड़ी बाधा प्लास्टिक संधि के कुछ प्रावधानों पर विकसित और विकासशील देशों की असहमति है। संधि में जो सबसे बड़ा मुद्दा है वह प्लास्टिक उत्पादन में कटौती से जुड़ा है।</p>
<p>हाई एंबिशन गठबंधन प्लास्टिक प्रदूषण से निजात पाने की दिशा में कचरे के निस्तारण के साथ इसके उत्पादन को सीमित करने का पक्षधर है, वहीं ग्लोबल कोलिएशन सस्टेनेबिल प्लास्टिक ग्रुप है, जो विकासशील देशों के लिए प्लास्टिक उत्पादन में बाध्य होकर कटौती किए जाने को व्यावहारिक नहीं मानता है। ऐसा मानने वाले देश हैं भारत, रूस, ईरान, चीन, सऊदी अरब, क्यूबा और बहरीन जो <br />ये प्लास्टिक जनित प्रदूषण से निपटने को स्वैच्छिक लक्ष्य के हिमायती हैं। असल में प्लास्टिक उत्पादन का सीधा सम्बन्ध तेल और गैस उद्योग से जुड़ा हुआ है। इसकेउत्पादन में इस्तेमाल होने वाले अहम पदार्थ कच्चे तेल एवं नेचुरल गैस से ही हासिल किए जाते हैं। यही वह अहम वजह है जिसके चलते पेट्रोकैमिकल्स कंपनियों के साथ जीवाश्म ईंधन पर निर्भर देश प्लास्टिक संधि के कठोर प्रावधानों का विरोध कर रहे हैं। यदि संधि के मसौदे पर सहमति बनती है, तो यह समूची दुनिया के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। <br /><strong>-ज्ञानेन्द्र रावत</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/reduction-in-plastic-production-necessary/article-92632</link>
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                <pubDate>Wed, 09 Oct 2024 11:21:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>प्लास्टिक के कचरे से अभी भी मैली हो रही चम्बल</title>
                                    <description><![CDATA[नदियों के दूषित होने व उसमें प्लास्टिक का कचरा डालने पर सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से जवाब तलब किया है।  
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/chambal-is-still-getting-polluted-due-to-plastic-waste/article-87197"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-08/photo-size-(6)5.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए एक ओर जहां सुप्रीम कोर्ट तक चिंतित है। वहीं दूसरी तरफ आमजन नदियों को दूषित करने  में जुटा हुआ है। यही हाल चम्बल नदी का भी है। कोटा में कई गंदे नालों का पानी चम्बल में गिरने के साथ ही प्लास्टिक के कचरे से चम्बल मैली हो रही है।  राजस्थान व मध्य प्रदेश समेत कई रा’यों व जिलों से होकर गुजर रही चम्बल नदी कोटा वासियों के लिए वरदान है। चम्बल नदी को मैली होने से बचाने व इसकी सफाई के लिए नमामि गंगे समेत कई प्रोजेक्ट बनाए गए। लेकिन उसके बाद भी यह नदी अभी तक पूरी तरह से साफ नहीं हो सकी है।  एनजीटी ने भी चम्बल नदी के प्रदूषित होने पर चिंता जाहिर करते हुए उसमें नालों को गिरने से रोकने के निर्देश दिए थे। हालांकि नगर निगम व नगर विकास न्यास की ओर से डाउन स्टीम के कई नालों को तो नदी में सीधे गिरने से रोका है। लेकिन उसके बाद भी अभी अप स्टीम में कई नाले नदी  में गिर रहे है। नदियों के दूषित होने व उसमें प्लास्टिक का कचरा डालने पर सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से जवाब तलब किया है। </p>
<p><strong>केडीए ने बनाया ट्रीटमेंट प्लांट</strong><br />कोटा विकास प्राधिकरण(पूर्व में नगर विकास न्यास) की ओर से चम्बल नदी के किनारे रिवर फ्रंट का निर्माण कराया गया है। ऐसे में इस क्षेत्र में आने वाले कई गंदे नालों को सीधे नदी में जाने से रोकने के लिए बालिता में एसटीपी सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाया है। जिससे उन नालों का पानी पाइपों के जरिय प्लांट में जाता है। वहां से पानी ट्रीट होकर वापस शुद्ध जल नदी में जा रहा है। जबकि अप स्टीम में नालियों पर जाली लगाकर गंदगी को नदी में जाने से रोकने का दावा तो किया जा रहा है लेकिन वह अभी तक हकीकत में साकार नहीं हो सका है। </p>
<p><strong>यहां से जा रहा कचरा</strong><br />चम्बल नदी वैसे तो बहुत बड़ी व लम्बी है। लेकिन इसमें भतरिया कुंड से प्लास्टिक का कचरा व पॉलिथीन और अन्य कई तरह का कचरा डाला जा रहा है। वहीं किशोरपुरा मुक्तिधाम की तरफ से अंतिम संस्कार के बाद की क्रियाएं करने से निकलने वाला कचरा नदी में ही डाला जा रहा है। शिवपुरा व कुन्हाड़ी की तरफ से अभी भी गंदे नाले सीधे नदी में गिर रहे हैं।  नदी में डाला जा रहा प्लास्टिक का कचरा व अन्य प्रदूषति चीजे पानी में रहने वाले जलीय जीवों के लिए तो हानि कारक हैं ही। साथ ही यह लोगों के लिए भी खतरनाक बना हुआ है। हालत यह है कि शहर के बीच बड़े बरसाती नालों में प्लास्टिक का कचरा अटा पड़ा है। वह सीधे नदी में ही जा रहा है। हालांकि पिछले कई दिन से निगम कीओर से नालों की सफाई का अभियान चलाकर उस कचरे को निकालकर ट्रेचिंग ग्राउंड में पहुंचाया जा रहा है। लेकिन पूरे साल नालों में डलने वाला कचरा नदी में ही जा रहा है।  </p>
<p><strong>इनका कहना : गंदे नालों को नदी में जाने से रोका</strong><br />इधर नगर निगम व केडीए के अधिकारियों का दावा है कि चम्बल नदी में पहले करीब 22 से अधिक बड़े गंदे नालों का पानी सीधे नदी में जा रहा था। उन्हें ट्रीटमेंट प्लांट बनाकर रोका गया है। साथ ही कई नालों को डायवर्ट भी किया गया है। लेकिन उसके बाद भी आमजन को भी नदी को दूषति करने से रोकने में सहयोग करना होगा। अधिकारियों का कहना है कि कई लोग जान बूझकर तो कई धार्मिक आस्था वश पानी में सामग्री बहाने के लिए प्लास्टिक का कचरा तक नदी में डाल रहे है। वह आसानी से गलता भी नहीं है। जिससे वह नदी को अधिक प्रदूषित कर रहा है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 08 Aug 2024 17:01:40 +0530</pubDate>
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                <title>मानसागर झील पर अभियान में इकट्ठा किया 57 किलो प्लास्टिक का कचरा</title>
                                    <description><![CDATA[पर्यावरण स्वच्छता अभियान के तहत वन विभाग और एवं जयपुर की स्वयंसेवी संस्था हॉप एण्ड बियोंड के तत्वाधान में विश्व पर्यावरण दिवस पर उपलक्ष्य में मानसागर झील पर सफाई अभियान शुरू किया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/jaipur-plastic-waste-collected-in-campagin/article-11377"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/cm-copy6.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। पर्यावरण स्वच्छता अभियान के तहत वन विभाग और एवं जयपुर की स्वयंसेवी संस्था हॉप एण्ड बियोंड के तत्वाधान में विश्व पर्यावरण दिवस पर उपलक्ष्य में मानसागर झील पर सफाई अभियान शुरू किया। सुबह 5 बजे से शुरू किए अभियान में 57 किलो प्लास्टिक का कचरा इकट्ठा किया गया। यह कचरा जयपुर की सुन्दर झील मानसागर को न केवल सौन्दर्यविहीन कर रहा है, बल्कि जलीय जीवों के जीवन पर भी संकट बना हुआ है।</p>
<p>इस अभियान का उद्देश्य केवल सफाई करना नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करना है। इस अभियान से वन विभाग और स्वयंसेवी संस्था हॉप एण्ड बियोंड का उद्देश्य न केवल जयपुर बल्कि प्रदेश को पर्यावरण संरक्षण एवं पारिस्थितिकी के संबंध में जागरूक करना है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jun 2022 13:01:25 +0530</pubDate>
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                <title> हर दिन जनरेट होता 1100 मीट्रिक टन प्लास्टिक वेस्ट</title>
                                    <description><![CDATA[प्रदेश में हर रोज करीब 15 हजार मीट्रिक टन कचरा जनरेट होता है, जिसमें 1100 मीट्रिक टन तो प्लास्टिक वेस्ट है। करीब 12 साल बाद एक बार फिर से इस वेस्ट को खत्म करने की मुहिम शुरू हुई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/1100-metric-ton-plastic-waste-in-state/article-7984"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/6546546549.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। प्रदेश में हर रोज करीब 15 हजार मीट्रिक टन कचरा जनरेट होता है, जिसमें 1100 मीट्रिक टन तो प्लास्टिक वेस्ट है। करीब 12 साल बाद एक बार फिर से इस वेस्ट को खत्म करने की मुहिम शुरू हुई है। पहले राज्य सरकार की मुहिम थी, लेकिन इस बार केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने यह मुहिम शुरू करते हुए एक जुलाई से सिंगल यूज प्लास्टिक को बैन करने के लिए सभी पक्षों को नोटिस जारी किए है। साथ ही इस कारोबार से जुड़े सभी पक्षकारों को तीस जून से पहले स्टॉक खत्म करने के निर्देश दिए है। बोर्ड के आदेशों की पालना में अब राजधानी जयपुर में ग्रेटर और हैरिटेज नगर निगम जोरशोर से जुटी है।</p>
<p><strong>2010 में प्लास्टिक बैन</strong><br />एक रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में 2010 में राजस्थान में प्लास्टिक को बैन किया गया था। इसके लिए प्लास्टिक कैरी बैग का इस्तेमाल करने वालों का चालान कर जुर्माना वसूलने और आवश्यकता पड़ने पर कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए, लेकिन फिर से उपयोग होने लगा।</p>
<p><strong>क्या नुकसान</strong><br />हर रोज प्लास्टिक के निकलने वाले वेस्ट से पर्यावरण को नुकसान होने के साथ ही पानी, खाना और मनुष्य व जानवरों के जीवन पर भी प्रभाव पड़ रहा है। इस वेस्ट को खाने से हर साल हजारों की संख्या में पशुओं की मौत होती है। <br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 16 Apr 2022 11:57:26 +0530</pubDate>
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