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                <title>rbi decision - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>rbi decision RSS Feed</description>
                
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                <title>आरबीआई के नीतिगत निर्णय पर रहेगी बाजार की नजर, सेंसेक्स 270.07 अंक की गिरावट लेकर सप्ताहांत पर 81451.01 अंक पर हुआ बंद</title>
                                    <description><![CDATA[बीते सप्ताह बीएसई का तीस शेयरों वाला संवेदी सूचकांक सेंसेक्स 270.07 अंक अर्थात 0.33 प्रतिशत की गिरावट लेकर सप्ताहांत पर 81451.01 अंक पर बंद हुआ। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/business/the-market-will-be-eyeing-rbis-policy-decision-sensex-closed/article-116100"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-06/share-market-01.jpg" alt=""></a><br /><p>मुंबई। वैश्विक स्तर पर कमजोर संकेत और स्थानीय बाजार में सकारात्मक उत्प्ररेकों की अनुपस्थिति से निवेशकों की धारणा कमजोर पड़ने के दबाव में बीते सप्ताह आधे प्रतिशत से कम गिरे बाजार की अगले सप्ताह भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा बैक के निर्णयों पर नजर रहेगी। बीते सप्ताह बीएसई का तीस शेयरों वाला संवेदी सूचकांक सेंसेक्स 270.07 अंक अर्थात 0.33 प्रतिशत की गिरावट लेकर सप्ताहांत पर 81451.01 अंक पर बंद हुआ। </p>
<p>इसी तरह नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का निफ्टी 102.45 अंक यानी 0.41 प्रतिशत टूटकर 24750.70 अंक पर आ गया। वहीं, समीक्षाधीन सप्ताह में बीएसई की दिग्गज कंपनियों के विपरीत मझौली और छोटी कंपनियों के शेयरों में तेजी का रुख रहा। इससे मिडकैप 274.93 अंक अर्थात 0.61 प्रतिशत उछलकर 45136.35 अंक और स्मॉलकैप 891.83 अंक यानी 1.7 प्रतिशत की छलांग लगाकर 52413.25 अंक पर पहुंच गया। विश्लेषकों के अनुसार, घरेलू शेयर बाजारों ने लगातार दूसरे सप्ताह गिरावट दर्ज की क्योंकि वैश्विक स्तर पर कमजोर संकेत और स्थानीय स्तर पर सकारात्मक ट्रिगर्स की अनुपस्थिति ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी व्यापार नीतियों में अस्थिरता, विशेष रूप से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पारस्परिक व्यापार रणनीति की वापसी के संकेत, वैश्विक बाजारों में व्यापक आर्थिक चिंताओं को और गहरा सकते हैं, जिससे उभरते बाजारों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। वहीं, मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों ने उम्मीद से बेहतर तिमाही नतीजों के दम पर मजबूती दिखाई जबकि लार्जकैप कंपनियों के ब्लूचिप परिणाम अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर सके, जिससे इन शेयरों का प्रदर्शन कमजोर रहा। विशेष रूप से निफ्टी पीएसयू बैंक और निफ्टी रियल्टी इंडेक्स ने दरों में संभावित कटौती की उम्मीदों के चलते प्रमुख सूचकांकों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया। विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार फिलहाल चौथाई फीसदी की दर कटौती को मूल्यांकन में शामिल कर चुका है, जिससे ब्याज दर के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों के लिए दृष्टिकोण सकारात्मक बनता है। घरेलू आर्थिक संकेतकों की बात करें तो परिदृश्य अपेक्षाकृत अनुकूल नजर आ रहा है। बेहतर मानसून पूर्वानुमान, सौम्य मुद्रास्फीति प्रक्षेपवक्र और 31 मार्च को समाप्त वित्त वर्ष 2024-25 की चौथी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की मजबूती (7.4 प्रतिशत) ने निवेशकों के लिए एक राहत का माहौल बनाया है, जो बाजार में गिरावट की गति को थामने में मदद कर सकता है।  अगले सप्ताह 06 जून को आरबीआई की द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक के निर्णय जारी होने वाले हैं। निवेशक महंगाई में नरमी और मजबूत आर्थिक विकास दर को ध्यान में रखते हुए ब्याज दर में 0.25 प्रतिशत तक की एक और कटौती की उम्मीद कर रहे हैं। अगले सप्ताह केंद्रीय बैंक के रुख पर बाजार की नजर रहेगी। वहीं, विश्लेषकों का मानना है कि संपूर्ण बाजार में स्थिरता तभी आ सकती है जब कॉर्पोरेट आय में स्थायी सुधार दिखे और वैश्विक व्यापार तनाव में कमी आए। तब तक निवेशकों को सतर्क रहते हुए मजबूत मौलिकताओं वाली कंपनियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। </p>
<p>बीते सप्ताह बाजार में दो दिन तेजी जबकि तीन दिन गिरावट रही। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ चल रही व्यापार (एजेंसी) की समय सीमा बढ़ाए जाने के वैश्विक स्तर पर व्यापार तनाव घटने की उम्मीद में स्थानीय स्तर पर हुई चौतरफा लिवाली की बदौलत सोमवार को सेंसेक्स 455.37 अंक की छलांग लगाकर 82,176.45 अंक और निफ्टी 148.00  अंक की तेजी के साथ 25001.15 अंक पर बंद हुआ। वहीं, डोनालड ट्रम्प के कर-कटौती विधेयक से अमेरिका का राजकोषीय घाटा बढ़ जाने की आशंका के बीच स्थानीय स्तर पर हुई जबरदस्त मुनाफावसूली से मंगलवार को सेंसेक्स 624.82 अंक लुढ़ककर 81,551.63 अंक और निफ्टी 174.95 अंक का गोता लगाकर 24826.20 अंक रह गया।  विश्व बाजार की भारी गिरावट से हतोत्साहित निवेशकों की स्थानीय स्तर पर एफएमसीजी, ऑटो, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और धातु समेत तेरह समूहों में हुई बिकवाली से बुधवार को सेंसेक्स 239.31 अंक की गिरावट लेकर 81,312.32 अंक और निफ्टी 73.75 अंक टूटकर 24752.45 अंक पर आ गया।  अमेरिकी संघीय न्यायालय के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रस्तावित ‘लिबरेशन डे’ टैरिफ पर रोक लगाने से विश्व बाजार में आई तेजी से उत्साहित निवेशकों की स्थानीय स्तर पर हुई चौतरफा लिवाली की बदौलत गुरुवार को सेंसेक्स 320.70 अंक की छलांग लगाकर 81,633.02 अक और निफ्टी 81.15 अंक चढ़कर 24833.60 अंक पर पहुंच गया।  भारत में समाप्त वित्त वर्ष के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के जारी होने वाले आंकड़े को लेकर निवेशकों की सतर्कता बरतते हुए की गई चौतरफा बिकवाली के दबाव में सेंसेक्स 182.01 अंक टूटकर 81,451.01 अंक और निफ्टी 82.90 अंक की गिरावट लेकर 24750.70 अंक पर आ गया। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 Jun 2025 11:14:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
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                <title>कारोबारियों के हित में एक सही फैसला </title>
                                    <description><![CDATA[कारोबारी साझेदारों के साथ विनिमय दर बाजार द्वारा निर्धारित की जाएगी। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/a-right-step-in-the-interest-of-businessmen/article-14433"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-07/654654654.jpg" alt=""></a><br /><p>भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अन्तरराष्ट्रीय कारोबारी सौदों को भारतीय रुपए में निपटाने की अनुमति देकर कारोबारियों के हित में एक सही फैसला किया है। इससे आयातकों और निर्यातकों को अपने भुगतान निपटाने का एक अतिरिक्त विकल्प मिल जाएगा। आरबीआई ने यह घोषणा की है कि नए प्रारूप के तहत होने वाले सभी आयात-निर्यात रुपए में निपटाए जा सकेंगे। कारोबारी साझेदारों के साथ विनिमय दर बाजार द्वारा निर्धारित की जाएगी। इसी तरह आरबीआई की तरफ से भारतीय बैंकों को यह अनुमति दी गई है कि वे कारोबारी साझेदारी देशों में विशेष वोस्ट्रो खाते खोल सकेंगे। ये ऐसे खाते होते हैं, जो एक बैंक किसी दूसरे बैंक के लिए खोलता है। इससे भारतीय आयातक रुपए में भुगतान कर सकेंगे। इस भुगतान को कारोबारी साझेदार देश के एक विशेष खाते में जमा किया जाएगा। इसी प्रकार निर्यातक भी विदेशों से रुपए में भुगतान ले सकेंगे। आरबीआई का कहना है कि यह नई व्यवस्था भारत से अन्तरराष्ट्रीय कारोबार और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए की गई है। यह व्यवस्था एक तरह से समय की मांग के अनुरूप ही है। देखा जा रहा है कि रुपए तथा कुछ अन्य मुद्राओं पर भारी दबाव है और आरबीआई अपने मुद्रा भण्डार का प्रयोग इस गिरावट को कम करने के लिए कर रहा है। वित्त वर्ष में चालू खाते का नुकसान सकल घरेलू उत्पाद से तीन प्रतिशत से ऊपर रहने की उम्मीद है और पूंजी खाते से भी धन का बहिर्गमन हो रहा है।</p>
<p>ऐसा इसलिए कि वैश्विक वित्तीय तंत्र में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने वर्ष के आरंभ से अब तक करीब तीस अरब डॉलर मूल्य की भारतीय परिसम्पत्तियों की बिक्री की है। सैद्धांतिक रूप से देखा जाए, तो अगर भारत के कारोबार का अहम हिस्सा रुपए में निपटाया जाता है, तो चालू खाते के नुकसान की भरपाई आसान हो जाएगा। इससे विनिमय दर को स्थिरता मिलेगी। वर्तमान में भारत चालू खाते के नुकसान से जूझ रहा है। इसलिए संभव है कि कारोबारी साझेदारों के पास अधिशेष भारतीय मुद्रा रह जाए। इसका इस्तेमाल भारतीय परिसम्पत्तियों में निवेश के लिए किया जा सकता है। हालांकि निकट भविष्य में ऐसा होता संभव नहीं लगता है, क्योंकि अधिकांश वैश्विक व्यापार अमेरिकी डॉलर में निपटाया जाता है। आने वाले दिनों में यह व्यवस्था बदलती दिखाई नहीं देती है। मौजूदा हालात में ज्यादातर साझेदार रुपए में भुगतान को तैयार नहीं होंगे, लेकिन इस व्यवस्था का लाभ रूस और श्रीलंका से निपटने में उपयोगी साबित हो सकती है।<br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 14 Jul 2022 10:49:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>संतुलन का फैसला </title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने आखिरकार सामने दिख रही आर्थिक हकीकत के साथ संतुलन बनाए करने का फैसला ले ही लिया। आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने अपनी नियमित बैठकों से अलग एक बैठक में फैसला किया कि नीतिगत रेपो दर में तत्काल से 40 आधार अंकों की बढ़ोतरी की जाएगी। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/decision-of-balance/article-9201"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/delhi_capitals-copy1.jpg" alt=""></a><br /><p>भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने आखिरकार सामने दिख रही आर्थिक हकीकत के साथ संतुलन बनाए करने का फैसला ले ही लिया। आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने अपनी नियमित बैठकों से अलग एक बैठक में फैसला किया कि नीतिगत रेपो दर में तत्काल से 40 आधार अंकों की बढ़ोतरी की जाएगी। समिति ने स्थायी जमा सुविधा और सीमांत स्थायी सुविधा दरों को भी इसी अनुरूप समायोजित किया। आरबीआई ने नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में 50 आधार अंकों का इजाफा किया, जो 21 मई से प्रभावी होगा। अब यह दर 4.5 फीसदी हो गई है। दरें तय करने वाली समिति ने बैठक में नीतिगत दरों को अपरिवर्तित रहने दिया था। आरबीआई ने नकदी समायोजन सुविधा को सामान्य करने के लिए स्थायी जमा सुविधा पेश कर दी थी। इस सारी कवायद के पीछे की मुख्य वजह महंगाई का असहज तरीके बढ़ता रहा है। हालांकि नीतिगत दरों में अचानक बढ़ोतरी ने सभी को चौंकाया जरूर है, लेकिन इसके संकेत पहले से ही मिल रहे थे। रिजर्व बैंक के गवर्नर शशिकांत दास कहते भी रहे हैं कि नीतिगत दरों के मामले में उदार रुख को बहुत लंबे समय तक नहीं बनाए रखा जा सकता। पिछले महीने की मौद्रिक नीति समिति की बैठक में साफ कहा था कि बैंक की प्राथमिकता महंगाई को नियंत्रित करना है। इसलिए नीतिगत दरें कभी भी बढ़ाई जा सकती हैं।</p>
<p>महंगाई की दर 6 फीसदी के दायरे से भी ऊपर निकल गई है और इसके और बढ़ने की पूरी संभावना बनी हुई है। ऐसे में रिजर्व बैंक चुपचाप नहीं बैठ सकता था। हमने देखा है कि मार्च के महीने में ही महंगाई थी, जो 17 महीने में सबसे ज्यादा थी। ऐसे में रिजर्व बैंक की यह जिम्मेदारी है कि वह खुदरा महंगाई दर को निर्धारित 6 फीसदी से ऊपर ने जाने दे। नीतिगत दरों में बढ़ोतरी का कदम उठाकर महंगाई को थामने का प्रयास किया गया है। फिर यह इसलिए भी जरूरी था कि इसी तरह बढ़ती महंगाई से अर्थव्यवस्था पर भी विपरीत असर पड़ता है। महंगाई बढ़ने के कई कारण हैं और अब रूस-यूक्रेन युद्ध ने संकट को गहरा कर दिया है। इसकी वजह से ही पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ गए। महंगाई और बढ़ती है तो देश नए संकट में फंस जाएगा। यदि महंगाई बढ़ी, तो आरबीआई नीतिगत दरों में और बढ़ोतरी कर सकता है। अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों में संतुलन बैठाना जरूरी हो जाता है।<br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 May 2022 11:22:40 +0530</pubDate>
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