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                <title>Mental Health - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>Mental Health RSS Feed</description>
                
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                <title>जयपुर की नींदड़ पहाड़ी पर युवक ने लगाई फांसी, सुसाइड का मामला  </title>
                                    <description><![CDATA[जयपुर के नींदड़ पहाड़ी पर हरमाड़ा निवासी विजेंद्र का शव फंदे से लटका मिलने से हड़कंप मच गया। पुलिस की प्रारंभिक जांच इसे आत्महत्या मान रही है, हालांकि मौके से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है। FSL टीम ने साक्ष्य जुटाए हैं। परिजनों के अनुसार, मृतक पिछले कुछ दिनों से मानसिक तनाव या नाराजगी में था।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/young-man-hanged-himself-on-neendad-hill-in-jaipur-a/article-147450"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/scaled_1001249306.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। रविवार सुबह नींदड़ की पहाड़ी पर एक युवक का शव पेड़ से फंदे पर लटका मिलने से इलाके में सनसनी फैल गई। पुलिस ने प्रारंभिक जांच में इसे आत्महत्या का मामला बताया है। मृतक की पहचान हरमाड़ा के लोहामंडी निवासी विजेंद्र (31) पुत्र पूरण सैनी के रूप में हुई है। वह एक फैक्ट्री में नौकरी करता था। घटना की पूरी जानकारी हरमाड़ा थाना पुलिस के अनुसार, विजेंद्र शनिवार सुबह बिना किसी को बताए घर से निकल गया था और रात तक वापस नहीं लौटा। उसके परिजन उसकी तलाश में जुटे हुए थे।</p>
<p>रविवार सुबह करीब 7 बजे नींदड़ की पहाड़ी पर एक सुनसान जगह में एक पेड़ से उसका शव रस्सी के फंदे से लटका हुआ मिला। सूचना मिलते ही हरमाड़ा थाना पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस ने फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) टीम की मदद से मौके से जरूरी सबूत जुटाए और शव को फंदे से नीचे उतारा। इसके बाद पोस्टमार्टम के लिए शव को कांवटिया हॉस्पिटल की मॉर्चरी में रखवाया गया है। पुलिस जांच में क्या सामने आया? हरमाड़ा थाने के SHO उदय यादव ने बताया कि प्रथम दृष्टया जांच में यह आत्महत्या का मामला प्रतीत हो रहा है। मृतक के पास कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है।</p>
<p>पुलिस ने बताया कि करीब 15 दिन पहले विजेंद्र ने नाराजगी में अपना मोबाइल फोन जमीन पर फेंककर तोड़ दिया था। शनिवार सुबह भी परिजनों के पूछने पर वह बिना कुछ बताए घर से चला गया था। पुलिस का मानना है कि विजेंद्र संभवतः शनिवार देर शाम पहाड़ी पर पहुंचा, जहां सुनसान जगह में उसने रस्सी का फंदा लगाकर फांसी लगा ली। पुलिस अब सुसाइड के पीछे के सटीक कारणों की गहन जांच कर रही है</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 16:43:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ग्रेटर नोएडा में फिर एक सुसाइड...25 वर्षीय MBA छात्रा ने बहुमंजिला सोसाइटी में कूदकर की आत्महत्या, परिवार ने बताई चौकाने वाली वजह</title>
                                    <description><![CDATA[सेंट्रल नोएडा की गौर सौन्दर्यम सोसाइटी में एक 25 वर्षीय एमबीए छात्रा, शिविका ने 13वीं मंजिल से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली। बिसरख थाना पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। फिलहाल खुदकुशी के कारणों का खुलासा नहीं हो सका है; पुलिस परिजनों से पूछताछ और मामले की सघन जांच कर रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/another-suicide-in-greater-noida-25-year-old-mba-student/article-146067"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/mba-student-suicide-case.png" alt=""></a><br /><p>ग्रेटर नोएडा। उत्तर प्रदेश में गौतमबुद्धनगर जिला परिक्षेत्र सेंट्रल नोएडा बिसरख थाना क्षेत्र की गौर सौन्दर्यम सोसाइटी में दिल दहला देने वाली घटना सामने आई। शेरोन टावर में रहने वाली 25 वर्षीय एमबीए छात्रा ने 13वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। घटना के बाद सोसाइटी में अफरा-तफरी मच गई। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू कर दी।</p>
<p>पुलिस ने बुधवार को यह जानकारी दी। पुलिस ने बताया कि मंगलवार को बिसरख थाना क्षेत्र स्थित गौर सौन्दर्यम सोसाइटी से एक छात्रा द्वारा 13वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या करने की सूचना मिली थी। सूचना मिलते ही पुलिस टीम तुरंत मौके पर पहुंची और घटनास्थल का निरीक्षण किया।</p>
<p>प्राथमिक जांच में सामने आया कि शेरोन टावर में रहने वाली युवती ने अपने फ्लैट की 13वीं मंजिल से छलांग लगा दी। नीचे गिरने से उसकी मौके पर ही मौत हो गई। घटना की जानकारी मिलते ही सोसाइटी के लोग मौके पर एकत्र हो गए और पुलिस को सूचना दी। मृतका की पहचान शिविका (25 वर्ष) पुत्री विनय ठकराल के रूप में हुई है। वह गौर सौन्दर्यम सोसाइटी के शेरोन टावर में रहती थी और एमबीए की पढ़ाई कर रही थी। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पंचनामा भरने के बाद पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।</p>
<p>पुलिस अधिकारियों के मुताबिक फिलहाल, आत्महत्या के पीछे के कारणों का स्पष्ट पता नहीं चल पाया है। मृतका के परिजनों को सूचना दे दी गई है और उनसे पूछताछ की जा रही है। साथ ही सोसाइटी के लोगों और आसपास के निवासियों से भी जानकारी जुटाई जा रही है। पुलिस का कहना है कि मामले से जुड़े सभी पहलुओं की जांच की जा रही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और परिजनों के बयान के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।</p>
<p>घटना के बाद सोसाइटी में रहने वाले लोग स्तब्ध हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अचानक हुई इस घटना से पूरे इलाके में शोक और चिंता का माहौल है। पुलिस मामले की गंभीरता से जांच कर रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 12:38:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>श्रीलंका सरकार का बड़ा फैसला, नाबालिगों के सोशल मीडिया उपयोग पर लग सकता है बैन</title>
                                    <description><![CDATA[ऑनलाइन कंटेंट से बढ़ती चिंताओं के बीच श्रीलंका सरकार नाबालिगों की सोशल मीडिया पहुंच सीमित करने पर विचार कर रही है। अंतिम निर्णय नीति तय होने के बाद होगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/big-decision-of-sri-lankan-government/article-141069"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(6)3.png" alt=""></a><br /><p>कोलंबो। श्रीलंका की सरकार ऑनलाइन कंटेंट के हानिकारक प्रभावों से जुड़ी चिंताओं में वृद्धि के बीच सोशल मीडिया तक नाबालिग बच्चों की पहुंच सीमित करने पर विचार कर रही है। स्थानीय मीडिया ने बुधवार को एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से यह जानकारी दी। डिजिटल अर्थव्यवस्था के उप मंत्री एरंगा वीरारत्ने ने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ी दुर्घटनाओं में वृद्धि के बाद विद्यार्थियों और नाबालिगों के सोशल मीडिया के उपयोग पर संभावित सीमाओं का पता लगाने के लिए चर्चा चल रही है। उन्होंने कहा कि प्रतिबंध लगाने का निर्णय जनसंचार मंत्रालय या शिक्षा मंत्रालय के तहत आएगा। एक बार नीति को अंतिम रूप देने के बाद, अधिकारी कार्यान्वयन के लिए आवश्यक तकनीकी सहायता प्रदान करेंगे। </p>
<p>डिजिटल अर्थव्यवस्था के उप मंत्री एरंगा वीरारत्ने ने कहा कि सरकार अभी तक किसी अंतिम निर्णय पर नहीं पहुंची है, लेकिन देश को सोशल मीडिया कंटेंट से नाबालिग बच्चों के दिमाग को होने वाले नुकसान को संज्ञान में लेना जरूरी है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया कंपनियां नियंत्रण लागू करने के लिए स्थानीय दूरसंचार प्रदाताओं के साथ काम कर सकती हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था के उप मंत्री एरंगा वीरारत्ने ने कहा कि इसी तरह के उपाय पहले ही कई देशों में अपनाये जा चुके हैं। उन्होंने कहा कि आवश्यक तकनीकी क्षमता पहले से मौजूद है और इसे श्रीलंका में लागू किया जा सकता है। </p>
<p>मंत्री ने कहा कि किसी भी प्रतिबंध के लिए लागू करने से पहले एक औपचारिक सरकारी नीति और एक व्यापक योजना की आवश्यकता होगी। विश्व स्तर पर सरकारें साइबरबुलिंग, नाबालिगों के हानिकारक कंटेंट के संपर्क में आने और बिगड़ते मानसिक स्वास्थ्य के बारे में ङ्क्षचताओं के कारण बच्चों की सोशल मीडिया मौजूदगी पर निगरानी बढ़ा रही हैं। इसका एक प्रमुख उदाहरण ऑस्ट्रेलिया है, जहां दिसंबर 2025 में नाबालिगों के लिए दुनिया का पहला सोशल मीडिया प्रतिबंध लागू हुआ। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/world/big-decision-of-sri-lankan-government/article-141069</link>
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                <pubDate>Wed, 28 Jan 2026 16:27:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बच्चों की मानसिक सेहत : एक अनदेखा संकट</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में बचपन अब केवल उम्र का एक पड़ाव नहीं रहा, बल्कि निरंतर दबाव का अनुभव बनता जा रहा है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/childrens-mental-health-an-unseen-crisis/article-138958"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px-(2)10.png" alt=""></a><br /><p>भारत में बचपन अब केवल उम्र का एक पड़ाव नहीं रहा, बल्कि निरंतर दबाव का अनुभव बनता जा रहा है। जिस उम्र में बच्चे खेलते हैं, सवाल पूछते हैं और दुनिया को समझने की कोशिश करते हैं, उसी उम्र में वे प्रदर्शन, प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं की कसौटी पर तौले जा रहे हैं। शिक्षा, जो कभी विकास का माध्यम थी, अब कई बच्चों के लिए चिंता और डर का स्रोत बन गई है। इस पूरे बदलाव में सबसे ज़्यादा उपेक्षित मुद्दा है आंकड़ों के अनुसार किशोर किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य विकार से प्रभावित पाए गए हैं। इसका अर्थ है कि हर स्कूल, हर कक्षा और हर मोहल्ले में ऐसे बच्चे मौजूद हैं जो भीतर ही भीतर संघर्ष कर रहे हैं।</p>
<p><strong>विशेषज्ञ मानते हैं :</strong></p>
<p>विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है, क्योंकि मानसिक समस्याओं को आज भी खुलकर स्वीकार नहीं किया जाता। 2024 में ही तेलंगाना और कर्नाटक के स्कूलों में किए गए एक बड़े सर्वे में सामने आया कि लगभग 24 प्रतिशत बच्चों में गंभीर मानसिक तनाव के लक्षण थे। इनमें से6 से 10 प्रतिशत बच्चों को तत्काल परामर्श और उपचार की आवश्यकता बताई गई। यह स्थिति किसी एक राज्य या वर्ग तक सीमित नहीं है, यह पूरे देश में फैलता हुआ संकट है। फर्क बस इतना है कि कहीं यह शोर बनकर सामने आता है और कहीं खामोशी में दबा रह जाता है।</p>
<p><strong>शैक्षणिक दबाव :</strong></p>
<p>इस संकट का सबसे बड़ा कारण है शैक्षणिक दबाव। आज बच्चों की योग्यता का मूल्यांकन उनके अंकों, रैंक और तुलना से किया जाता है।अच्छा बच्चा वही माना जाता है, जो बेहतर परिणाम दे सके। असफलता का डर, माता-पिता की अपेक्षाएँ और सामाजिक तुलना बच्चों के मन में स्थायी तनाव पैदा कर रही हैं। परीक्षा अब ज्ञान की जाँच नहीं, बल्कि मानसिक सहनशक्ति की परीक्षा बनती जा रही है। कई बच्चे इसी डर में अपनी नींद, रुचियाँ और आत्मविश्वास खो बैठते हैं।</p>
<p><strong>डिजिटल दुनिया में :</strong></p>
<p>इस शैक्षणिक दबाव के साथ-साथ डिजिटल दुनिया ने बच्चों की मानसिक दुनिया को और जटिल बना दिया है। एक राष्ट्रीय सर्वे के अनुसार, भारत में60 प्रतिशत से अधिक बच्चे रोज़ तीन घंटे से अधिक समय स्क्रीन पर बिताते हैं। सोशल मीडिया बच्चों के सामने एक ऐसी दुनिया रखता है, जहाँ सब कुछ सुंदर, सफल और परिपूर्ण दिखता है। इस निरंतर तुलना में बच्चा स्वयं को अधूरा और असफल महसूस करने लगता है। धीरे-धीरे यह भावना आत्म-सम्मान को कमजोर करती है और चिंता व अवसाद को जन्म देती है।</p>
<p><strong>अत्यधिक स्क्रीन-टाइम :</strong></p>
<p>मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन-टाइम का सीधा संबंध एकाग्रता में कमी, चिड़चिड़ापन, नींद की समस्या और सामाजिक अलगाव से है। लेकिन विडंबना यह है कि इन संकेतों को अक्सर मोबाइल की लत या अनुशासन की कमी कहकर टाल दिया जाता है, जबकि असल समस्या कहीं गहरी होती है। घरेलू वातावरण भी बच्चों की मानसिक सेहत पर गहरा असर डालता है। पारिवारिक तनाव, आर्थिक दबाव, माता-पिता के बीच तनाव या अत्यधिक नियंत्रण ये सभी बच्चे के मन में असुरक्षा पैदा करते हैं।</p>
<p><strong>सर्वे में सामने आया :</strong></p>
<p>उत्तराखंड में हुए एक सर्वे में सामने आया कि बच्चे और किशोर मानसिक विकारों, व्यवहारिक समस्याओं और विकास संबंधी चुनौतियों के साथ जीवन जी रहे हैं। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि मानसिक स्वास्थ्य संकट केवल महानगरों की समस्या नहीं, बल्कि गाँवों और कस्बों तक फैला हुआ है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे बच्चों को कोई पेशेवर सहायता नहीं मिल पाती। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, प्रशिक्षित काउंसलरों का अभाव और सामाजिक कलंक इस समस्या को और गंभीर बना देते हैं। कई परिवार आज भी मानसिक परेशानी को कमजोरी या बदतमीज़ी मान लेते हैं। परिणामस्वरूप बच्चा अकेला पड़ जाता है।</p>
<p><strong>अकेलापन खतरनाक है :</strong></p>
<p>यह अकेलापन ही सबसे खतरनाक है। जब बच्चा अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाता, जब उसकी चिंता को गंभीरता से नहीं लिया जाता, तब वह भीतर-ही-भीतर टूटने लगता है। कई बार यह टूटन पढ़ाई छोड़ने, आत्म-अलगाव या आत्म-नुकसान जैसे गंभीर रूप भी ले लेती है। ये घटनाएँ हमें झकझोरती हैं, लेकिन हम अक्सर उन्हें अपवाद मानकर आगे बढ़ जाते हैं। हकीकत यह है कि बच्चों की मानसिक सेहत को नज़रअंदाज़ करना उनके भविष्य को जोखिम में डालना है। बचपन में अनदेखी गई समस्याएँ आगे चलकर कम आत्मविश्वास, संबंधों में कठिनाई, कार्यक्षमता में कमी और गंभीर मानसिक रोगों का कारण बन सकती हैं। एक समाज के रूप में यह हमारी सामूहिक विफलता होगी।</p>
<p><strong>बच्चों की मानसिक सेहत :</strong></p>
<p>अब समय आ गया है कि हम बच्चों की मानसिक सेहत को दया या शर्म के चश्मे से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और समझ के साथ देखें। स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य परामर्श को अनिवार्य करना, शिक्षकों को भावनात्मक संकेत पहचानने के लिए प्रशिक्षित करना और अभिभावकों को बच्चों से संवाद के लिए तैयार करना, ये कदम अब टाले नहीं जा सकते। बचपन को बोझ से मुक्त करना केवल सरकारी नीतियों का सवाल नहीं है, यह हमारे समाज की सोच की परीक्षा है। यदि हम सचमुच एक सशक्त और मानवीय भारत का सपना देखते हैं, तो हमें अपने बच्चों को केवल सफल नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से मजबूत बनाना होगा।</p>
<p><strong>-डॉ सुनिधि मिश्रा</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 09 Jan 2026 12:44:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दिखावे की दौड़ में मानसिक स्वास्थ्य की कीमत</title>
                                    <description><![CDATA[आज के डिजिटल युग में, इंस्टाग्राम और टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद छोटी वीडियो क्लिप्स, जिन्हें हम रील्स कहते हैं, ने भारतीय समाज पर गहरा और जटिल प्रभाव डाला है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/mental-health-price-in-showing-race/article-121384"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/855842roer6.png" alt=""></a><br /><p>आज के डिजिटल युग में, इंस्टाग्राम और टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद छोटी वीडियो क्लिप्स, जिन्हें हम रील्स कहते हैं, ने भारतीय समाज पर गहरा और जटिल प्रभाव डाला है। मनोरंजन का साधन रहीं यह रील्स अब धीरे-धीरे हमारी सामाजिक जड़ों को खोखला कर रही हैं। यह सिर्फ वीडियो क्लिप्स नहीं, बल्कि एक नई आदत है, जिसने हमारे व्यवहार, सोच और रिश्तों को बदलना शुरू कर दिया है। रील्स हमारे समाज के पतन का एक बड़ा कारण बनती जा रही हैं, जिसके दूरगामी परिणाम हमारी कल्पना से कहीं अधिक गंभीर हो सकते हैं।</p>
<p><strong>घटती एकाग्रता :</strong></p>
<p>एक समय था, जब लोग किसी विषय पर गहन चिंतन करते थे, लेकिन रील्स के आने से यह सब बदल गया है। 15 से 60 सेकंड की ये वीडियो क्लिप्स हमारे मस्तिष्क को इतनी तीव्र गति से उत्तेजना देती हैं कि हमारा दिमाग अब किसी एक चीज पर ज्यादा देर तक टिक नहीं पाता। यह निरंतर विजÞुअल उत्तेजना हमारे दिमाग को तत्काल संतुष्टि का आदी बना देती है। नतीजतन, पढ़ाई, गंभीर बातचीत या कोई भी ऐसा काम जिसमें धैर्य और एकाग्रता की आवश्यकता होती है, हमें उबाऊ लगने लगता है। यह सतहीपन हमारी सोचने और समझने की शक्ति को कम कर रहा है।</p>
<p><strong>नकारात्मक प्रभाव :</strong></p>
<p>रील्स की दुनिया चमक-दमक से भरी है। हर कोई अपनी शानदार जिंदगी का प्रदर्शन कर रहा है। महंगी गाड़ियां, विदेश यात्राएं, ब्रांडेड कपड़े भले ही वे असल में वैसे न हों। जब हम इन रील्स को देखते हैं, तो अनजाने में अपनी जिंदगी की तुलना उनसे करने लगते हैं। यह तुलना एक गहरी जलन और हीन भावना को जन्म देती है। हम अपने सामान्य जीवन से असंतुष्ट होने लगते हैं और लगातार कुछ बड़ा और बेहतर पाने की दौड़ में शामिल हो जाते हैं। जब लाइक्स, शेयर ही सफलता का पैमाना बन जाएं, तो मेहनत और वास्तविक उपलब्धियों की अहमियत कम हो जाती है। युवा इस जाल में आसानी से फंस जाते हैं, यह मानते हुए कि सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है। इसका सीधा असर हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।</p>
<p><strong>नैतिक मूल्यों का क्षरण :</strong></p>
<p>प्रसिद्धि पाने की अंधी दौड़ में, युवा अक्सर ऐसी हरकतें कर जाते हैं, जो न सिर्फ खतरनाक होती हैं, बल्कि हमारी संस्कृति और नैतिक मूल्यों के खिलाफ भी होती हैं। अश्लील भाषा, हिंसा को बढ़ावा देना या समाज के नियमों को तोड़ने वाले वीडियो आम हो गए हैं, और हैरानी की बात यह है कि इन्हीं पर सबसे ज्यादा व्यूज आते हैं। जब लोग गलत चीजों को देखकर उसे सही मानने लगते हैं, तो समाज में अनुशासनहीनता और अराजकता बढ़ती है। बच्चे और किशोर, जो इन रील्स को अपना आदर्श मानते हैं, वे आॅनलाइन देखे गए व्यवहार की नकल करते हैं, बिना यह समझे कि इसके वास्तविक जीवन में क्या परिणाम हो सकते हैं। जब समाज का युवा वर्ग अपनी संस्कृति और नैतिक मर्यादाओं से विमुख होने लगे, तो यह एक गंभीर खतरे की घंटी है।</p>
<p><strong>रिश्तों में गिरावट :</strong></p>
<p>आजकल परिवार के लोग एक साथ होते हुए भी अलग-अलग महसूस करते हैं। डाइनिंग टेबल पर हो या लिविंग रूम में, सब अपने-अपने फोन में रील्स देखने में व्यस्त रहते हैं। घर में बातचीत और हंसी-मजाक कम हो गया है। त्योहारों पर भी लोग उन पलों को जीने की बजाय, उसे रिकॉर्ड करके रील बनाने में लगे रहते हैं, ताकि वे उसे सोशल मीडिया पर अपलोड कर सकें। यह डिजिटल जुड़ाव हमें अपनों से दूर कर रहा है और रिश्तों में खालीपन ला रहा है। हम वर्चुअल दुनिया में तो जुड़े हैं, लेकिन असलियत में अकेले होते जा रहे हैं। पारिवारिक बंधन किसी भी समाज की नींव होते हैं।</p>
<p><strong>करियर और भविष्य :</strong></p>
<p>रील्स की चकाचौंध युवाओं को यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि वे रातों-रात मशहूर होकर पैसा कमा सकते हैं। वे अपनी पढ़ाई, कौशल विकास और एक ठोस करियर पर ध्यान देने की बजाय, केवल रील्स बनाने में अपना समय और ऊर्जा बर्बाद कर रहे हैं। यह एक खोखला सपना है, जो अक्सर टूट जाता है और निराशा, हताशा और बेरोजगारी को जन्म देता है। कुछ मुट्ठी भर लोग शायद सफल हो जाएं, लेकिन अधिकांश युवा अपना बहुमूल्य समय एक ऐसे रास्ते पर बर्बाद कर देते हैं, जिसका कोई ठोस भविष्य नहीं होता। जब हमारी युवा शक्ति अनुत्पादक कामों में लगेगी, तो देश का विकास कैसे होगा। यह प्रवृत्ति हमारी दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता और सामाजिक प्रगति के लिए एक गंभीर खतरा है।</p>
<p><strong>समाधान और रास्ता :</strong></p>
<p>ऐसा नहीं है कि रील्स पूरी तरह से नकारात्मक हैं। यह रचनात्मकता और सूचना के आदान-प्रदान का एक शक्तिशाली माध्यम भी हो सकती हैं। समस्या उनके अंधाधुंध और अनियंत्रित उपयोग में है। हमें इस पतन को रोकने के लिए तुरंत और ठोस कदम उठाने होंगे। माता-पिता को अपने बच्चों के स्क्रीन टाइम पर लगाम लगानी होगी। उन्हें बच्चों को वास्तविक दुनिया की गतिविधियों, जैसे खेलकूद, किताबें पढ़ने और परिवार के साथ समय बिताने के लिए प्रेरित करना होगा और खुद भी एक अच्छा उदाहरण पेश करना होगा। हमें समझना होगा कि सच्ची खुशी और संतोष वास्तविक रिश्तों, कड़ी मेहनत और नैतिक मूल्यों में है। यदि हम इस पर ध्यान नहीं देंगे, तो रील्स की यह बाढ़ हमारे भारतीय समाज को ऐसे गहरे दलदल में धकेल सकती है, जहां से निकलना असंभव हो जाएगा।</p>
<p><strong>-रंजना मिश्रा</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 23 Jul 2025 12:19:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राजस्थान अस्पताल में चिकित्सक दिवस पर कार्यक्रम आयोजित : डॉक्टरों की मानसिक, सामाजिक चुनौतियों पर विचार-विमर्श</title>
                                    <description><![CDATA[कार्यक्रम के संयोजक डॉ. दिनेश माथुर के मार्गदर्शन में एक उच्च स्तरीय पैनल चर्चा आयोजित हुई, जिसमें विशेषज्ञों ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/discussion-on-mental-social-challenges-of-doctors-organized-on-doctors/article-119284"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/rt1142roer.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजस्थान अस्पताल में राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस के अवसर पर कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस वर्ष की थीम मास्क के पीछे- देखभालकर्ताओं की देखभाल को केंद्र में रखते हुए डॉक्टरों की मानसिक, सामाजिक और नैतिक चुनौतियों पर गंभीर विमर्श किया गया। <br />कार्यक्रम का शुभारंभ राजस्थान अस्पताल के वाइस प्रेसिडेंट एवं सीईओ डॉ. सर्वेश अग्रवाल की ओर से किया गया, जिन्होंने थीम के महत्व को स्पष्ट करते हुए डॉक्टरों की आंतरिक दुनिया की ओर ध्यान आकर्षित किया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं अस्पताल के चेयरमैन डॉ. एसएस अग्रवाल ने कहा कि डॉक्टर भी इंसान हैं। सफेद कोट के पीछे थकान, अकेलापन और आत्म-संघर्ष भी छिपा होता है। उन्होंने डॉक्टरों के सामाजिक बलिदान, नैतिक द्वंद्व और आत्म-देखभाल की उपेक्षा पर गंभीर चर्चा की और चिकित्सकों एवं उनके परिजनों की वार्षिक निशुल्क स्वास्थ्य जांच की योजना की घोषणा भी की। अस्पताल के प्रेसिडेंट डॉ. वीरेंद्र सिंह ने सेवा करने वाले हाथों की देखभाल की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि जो दूसरों की सेवा करते हैं, उन्हें भी समझने और सहारा देने की आवश्यकता है।</p>
<p>कार्यक्रम के संयोजक डॉ. दिनेश माथुर के मार्गदर्शन में एक उच्च स्तरीय पैनल चर्चा आयोजित हुई, जिसमें विशेषज्ञों ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए। डॉ. दिनेश माथुर द्वारा तैयार किया गया एक विशेष वीडियो भी प्रदर्शित किया गया, जिसमें चिकित्सकों के संघर्षों को चित्रों, अनुभवों और भावनाओं के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. वीणा आचार्य ने गर्भ-संस्कार विषय पर विस्तार से चर्चा की। इस अवसर पर डॉ. रविंद्र राव, डॉ. बुद्धादित्य चक्रवर्ती, डॉ. कैलाश, डॉ. शीतू सिंह, डॉ. राघव शाह, डॉ. एडी माथुर सहित अन्य चिकित्सक उपस्थित रहे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 03 Jul 2025 11:41:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur PS]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारतीय कार्पोरेट में भारी तनाव में 51 प्रतिशत कर्मचारी : थकावट, चिंता, हताशा और मानसिक दबाव से जूझ रहे, कार्यस्थल पर ध्यान देने की आवश्यकता </title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय कार्पोरेट क्षेत्र में 51 प्रतिशत कर्मचारी भारी तनाव में हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/51-percent-of-employees-under-heavy-stress-in-indian-corporate/article-116379"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-06/rtroer-(2)11.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। भारतीय कार्पोरेट क्षेत्र में 51 प्रतिशत कर्मचारी भारी तनाव में हैं और थकावट, चिंता , हताशा जैसे और मानसिक दबाव से जूझ रहे हैं। एक अध्ययन में कहा गया कि भारतीय कर्मचारियों में थकावट, चिंता, हताशा और मानसिक तनाव के लक्षण बड़े पैमाने पर देखे जा रहे हैं। करीब 60 प्रतिशत कर्मचारियों ने थकावट की  शिकायत की, जबकि 51 प्रतिशत ने बताया कि वे काम के भारी दबाव में हैं। इसलिए कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य को लेकर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता हैं।</p>
<p>भारतीय कार्पोरेट मे कार्यस्थल पर कर्मचारियों के व्यवहार पर अध्ययन करने वाले गैर सरकारी संगठन द लिव लव लाफ फाउंडेशन ने कहा कि हमें एक ऐसा माहौल बनाना होगा, जो सहानुभूति पर आधारित हो, जहां लोग मानसिक रूप से सुरक्षित महसूस करें, खुलकर बात कर सकें और जरूरत पडऩे पर मदद ले सकें। मानसिक कल्याण कार्यों में निवेश करना सिर्फ एक नैतिक जिम्मिेदारी नहीं, बल्कि एक समझदारी भरा व्यवसायिक फैसला भी है, जो कंपनी और देश की अर्थव्यवस्था दोनों को मजबूत करता है।</p>
<p>अन्य के अनुसार भारत में कर्मचारियों के खराब मानसिक स्वास्थ्य के कारण भारतीय कंपनियों को हर साल 1,10,000 करोड़ रुपए, लगभग 14 अरब का नुकसान होता है। फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. श्याम भट ने कहा कि भारतीय कंपनियों को सिर्फ कर्मचारी सहायता कार्यक्रमों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। सालाना सर्वेक्षण या तात्कालिक उपायों की बजाय, कार्यस्थल की मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों की जड़ तक पहुंचने और उन्हें दूर करने के लिए डेटा-आधारित और व्यवस्थित द्दष्टिकोण अपनाना होगा। ट्रस्टी एवं बायोकॉन समूह की प्रमुख कहा कि मानसिक स्वास्थ्य संपूर्ण स्वास्थ्य का एक जरूरी हिस्सा है और कंपनियों को समझना चाहिए कि इसका सीधा असर उनकी उत्पादकता, नवाचार और दीर्घकाल पर पड़ता है। अगर कर्मचारी तनाव में हैं और कार्य से जुड़ाव नहीं महसूस कर रहे, तो यह उनकी क्षमता और नए विचारों को बाधित करता है, जिससे कारोबार और अर्थव्यवस्था दोनों प्रभावित होते हैं। </p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 04 Jun 2025 18:54:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तरक्की के लिए मन को स्वस्थ रखें</title>
                                    <description><![CDATA[बाहरी प्रदूषण को मिटाने का प्रयास प्रशासन कर सकता है, किन्तु मन के प्रदूषण को मन का शासन, खुद पर खुद का शासन ही मिटा सकता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/keep-your-mind-healthy-for-progress/article-93000"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-10/630400-size19.png" alt=""></a><br /><p>मन का स्वास्थ्य शरीर के स्वास्थ्य  से भी ज्यादा जरूरी है, क्योंकि जीवन की पूर्णता, सार्थकता एवं सफलता मानसिक स्वास्थ्य पर ही निर्भर है। मन से स्वस्थ व्यक्ति ही दुनिया का सबसे धनी व्यक्ति हो सकता है। मानसिक स्वास्थ्य मानसिक तंदुरुस्ती की एक ऐसी स्थिति है, जो लोगों को जीवन के तनावों से निपटने, अपनी क्षमताओं को पहचानने, अच्छी तरह से सीखने और काम करने तथा अपने समुदाय में योगदान करने में सक्षम बनाती है। यह स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती का एक अभिन्न अंग है, जो निर्णय लेने, संबंध बनाने और जिस दुनिया में हम रहते हैं उसे आकार देने की हमारी व्यक्तिगत और सामूहिक क्षमताओं को रेखांकित करता है।</p>
<p>भारतीय परिप्रेक्ष्य में कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य को ताजा करने और एक स्वस्थ और खुशहाल कार्य वातावरण बनाने की ज्यादा अपेक्षा है। शोध के अनुसार, 6 व्यक्तियों में से एक कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का अनुभव करता है और हर साल 12 बिलियन कार्य दिवस अवसाद, तनाव और चिंता के कारण बर्बाद हो जाते हैं। देश में कार्यस्थलों में बेहतर मानसिक स्वास्थ्य सहायता की स्पष्ट आवश्यकता है, जिससे न केवल व्यक्ति को बल्कि संगठन को भी लाभ होगा। वास्तव में, जो कर्मचारी खुश रहते हैं वे 13 प्रतिशत अधिक उत्पादक होते हैं, इसलिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रदान करना व्यावसायिक रूप से समझदारी है। मानसिक स्वास्थ्य व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्टÑीय विकास की प्राथमिक शर्त है। जैसे शरीर की सफाई दिन में कई बार आवश्यक है, वैसे ही मन की सफाई कई बार होनी चाहिए। मिल या अन्य औद्योगिक ईकाइयों में काम करने वालों का कपड़ा थोड़ा-थोड़ा करके शाम तक खराब हो जाता है, वैसे ही मन भी कार्यस्थलों पर तनावों एवं परेशानियों से खराब होता है। इसके लिए लंबी, गहरी सांस से मानसिक स्वास्थ्य की क्षमता बढ़ाई जा सकती है। मन से लड़े ंनहीं, बल्कि उसे समझाएं। प्रमोदभाव-गुणात्मक दृष्टि का विकास करें। मन को वॉचमैन बनाएं, क्योंकि जीने का वास्तविक अर्थ है हर पल स्वयं के द्वारा स्वयं का निरीक्षण। देखना है कि मन कब राग-द्वेष, तनाव, अवसाद, विकास एवं कुंठाग्रस्त हो रहा है।</p>
<p>कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनता जा रहा है। कार्यस्थल पर बढ़ते तनाव और उससे जुड़ी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के साथ, नियोक्ताओं के लिए अपने कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य को पहचानना और उसे प्राथमिकता देना महत्वपूर्ण है। अध्ययनों से पता चला है कि कार्यस्थल पर कर्मचारी दबाव और तनाव महसूस कर रहे हैं और इसकी संख्या बढ़ती जा रही है। शोध से पता चलता है कि ब्रिटेन के पांच में से एक कर्मचारी ने कार्यस्थल पर तनाव और दबाव को प्रबंधित करने में असमर्थता महसूस की। लगभग ऐसी ही स्थितियां भारत में भी देखने को मिल रही हैं। भारी कार्यभार, तंग समय सीमा और सहायता की कमी जैसे तनाव कर्मचारियों में चिंता, तनाव, अवसाद और बर्नआउट का कारण बन सकते हैं। कई कर्मचारी कमजोर समझे जाने, संभावित रूप से अपनी नौकरी खोने या मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ी परेशानियों के कारण मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बात करने से डरते हैं। नियोक्ता अपने कर्मचारियों के बीच मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को तेजी से पहचान रहे हैं और कर्मचारियों को उनके मानसिक स्वास्थ्य को समझने और प्रबंधित करने में मदद करने के लिए प्रयास कर रहे हैं।</p>
<p>भारत में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो-साइंसेज के आंकड़ों के अनुसार, ज्ञान की कमी, मानसिक बीमारी के कलंक और देखभाल की उच्च लागत जैसे कई कारणों की वजह से 80 प्रतिशत से अधिक लोगों की देखभाल सेवाओं तक पहुंच नहीं है। भारत में महिलाओं को अवसाद, चिंता और घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है तथा उनके पास मदद मांगने के लिए स्वायत्तता अक्सर सीमित होती है। गरीबी और आर्थिक असमानता मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की वृद्धि में योगदान देती है। वित्तीय अस्थिरता के चलते तनाव और शैक्षिक अवसरों का सीमित होना भी मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल सकती है। मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य समग्र स्वास्थ्य के समान रूप से महत्वपूर्ण घटक हैं। उदाहरण के लिए, अवसाद कई प्रकार की शारीरिक स्वास्थ्य समस्याओं, विशेष रूप से मधुमेह, हृदय रोग और स्ट्रोक जैसी दीर्घकालिक स्थितियों के जोखिम को बढ़ाता है। इसी तरह, पुरानी स्थितियों की उपस्थिति मानसिक बीमारी के जोखिम को बढ़ा सकती है।</p>
<p>प्रतिकूल बचपन के अनुभव, जैसे आघात या दुर्व्यवहार का इतिहास उदाहरण के लिए, बाल दुर्व्यवहार, यौन उत्पीड़न, हिंसा देखना आदि। चल रही दीर्घकालिक चिकित्सा स्थितियों से संबंधित अनुभव, जैसे कि दर्दनाक मस्तिष्क की चोट, कैंसर, या मधुमेह। मस्तिष्क में जैविक कारक या रासायनिक असंतुलन, शराब या नशीली दवाओं का उपयोग, अकेलेपन या अलगाव की भावना होना आदि मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। मन को बीमार करने के ये कुछ कारण है। मन हमारे व्यक्तित्व का दर्पण है। मन अच्छा है तो मानव अच्छा है। मन बुरा है तो मानव बुरा है। हम दुनिया से भाग सकते हैं, उसे वश में कर सकते हैं, परन्तु मन से भागना और उसे वश में करना कठिन है। मन की सरलता सुख है और उसकी कुटिलता दुख है। मानसिक रोगों से ग्रस्त व्यक्ति मन को धैर्य के साथ,आत्मीयता के साथ समझें, उसे शांत करें।</p>
<p>बाहरी प्रदूषण को मिटाने का प्रयास प्रशासन कर सकता है, किन्तु मन के प्रदूषण को मन का शासन, खुद पर खुद का शासन ही मिटा सकता है। भारत में वृद्धों की जनसंख्या में तीव्र वृद्धि को देखते हुए उनके लिए बेहतर मानसिक स्वास्थ्य सहायता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। मनोचिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों और परामर्शदाताओं सहित अधिक मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों को प्रशिक्षित करना और उनकी भर्ती करना जरूरी है।  </p>
<p><strong>-ललित गर्ग </strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/keep-your-mind-healthy-for-progress/article-93000</link>
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                <pubDate>Mon, 14 Oct 2024 11:42:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title> रन फॉर मेन्टल हेल्थ के पोस्टर का विमोचन </title>
                                    <description><![CDATA[ संस्था द्वारा इस बार रन फॉर मेन्टल हेल्थ का आयोजन सीकर जिले में किया जा रहा है, जिसमे प्रदेश के सभी हिस्सों के लोग भाग लेगें। डॉ पूनिया ने बताया की पिछले दो साल में हमने महामारी, अपनों को खोना, अकेलापन, अनिश्चिता, घबराहट, और भी बहुत कुछ सहा है जिसके चलते मानसिक समस्याएं और भी ज्यादा बढ़ गयी हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/run-for-mental-health-organized-for-mental-health-awareness/article-25755"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-10/w-3.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। माइंडरूट फाउंडेशन संस्था द्वारा विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के उपलक्ष में 9 अक्टूबर को सीकर में रन फॉर मेन्टल हेल्थ का आयोजन किया जायेगा।  माइंडरूट फाउंडेशन के संस्थापक डॉ डी एस पूनिया ने बताया की हर साल 10 अक्टूबर को विश्व स्वास्थय संगठन द्वारा मानसिक बिमारियों के बारे में जागरूकता फैलाने और इनसे जुड़े स्टिग्मा को दूर करने के विश्व मानसिक स्वास्थय दिवस बनाया जाता है। इसी क्रम में संस्था द्वारा इस बार रन फॉर मेन्टल हेल्थ का आयोजन सीकर जिले में किया जा रहा है, जिसमे प्रदेश के सभी हिस्सों के लोग भाग लेगें।</p>
<p>डॉ पूनिया ने बताया की पिछले दो साल में हमने महामारी, अपनों को खोना, अकेलापन, अनिश्चिता, घबराहट, और भी बहुत कुछ सहा है जिसके चलते मानसिक समस्याएं और भी ज्यादा बढ़ गयी हैं। ऐसे में रन फॉर मेन्टल हेल्थ का आयोजन करने के पीछे एक ही उद्देश्य है की समाज में मानसिक स्वास्थय के बारे में जागरूकता आये और इस से जुड़ा स्टिग्मा दूर हो ताकि मानसिक बिमारियों से ग्रसित लोग बिना किसी झिझक के वैसे ही समय पर उचित उपचार लें जैसे की बाकी बिमारियों के लिए। इस अवसर पर डॉ डी एस पूनिया, माइंडरूट फाउंडेशन की सेक्रेटरी दीप्ती और वाईस चेयरमैन यशवंत ने रन फॉर मेन्टल हेल्थ के पोस्टर का विमोचन किया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 07 Oct 2022 16:14:37 +0530</pubDate>
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                <title>वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे आज : सकारात्मक सोच से सुधरेगा मानसिक स्वास्थ्य</title>
                                    <description><![CDATA[आज पूरे विश्व में मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जा रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%A1-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%9F%E0%A4%B2-%E0%A4%B9%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%A5-%E0%A4%A1%E0%A5%87-%E0%A4%86%E0%A4%9C---%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%9A-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%97%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A5%8D%E0%A4%AF/article-1567"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-10/dimag.jpg" alt=""></a><br /><p>आज पूरे विश्व में मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जा रहा है। यह दिन मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों और उससे बचने के लिए जनता को समझाने के उद्देश्य से मनाया जाता है। गत वर्ष जब विश्व में कोरोना आया तो इस दिन का महत्व उतना अधिक नजर नहीं आ रहा था जितना कि कोरोना प्रकोप के बाद हो गया है। यदि सीधी सपट कही जाए तो कोरोना ने इस दिन का महत्व इतना अधिक कर दिया है जितना की कोरोना में उपचार का महत्व था।</p>
<p> इस बात पर बहस हो सकती है कि ऐसा क्यों? सीधी सी बात है कि कोरोना से पहले हर व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के प्रति उतना जागरूक नहीं था जितना की कोरोना के बाद हुआ। कोरोना ने हमारी मेंटल स्ट्रेस पर सीधा असर डाला और इससे डिप्रेशन, डिमेंशिया, फोबिया तथा इंजायटी जैसी समस्याओं ने मानसिक बीमारियों की दर में एकदम उछाल ला दिया। वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे का महत्व गत वर्ष भी था,लेकिन तब कोरोना उतने भयावह रूप में सामने नहीं आया था जितने रूप में यह वर्ष 2021 में आया। इसके पीछे जो भी कारण थे वह अलग थे,लेकिन इस कोरोना ने हमें सोशल डिस्टेंसिंग और आइसोलेशन की दुनिया में ढकेल दिया। जब इंसान अकेला रह जाता है तो वह खुद को बीमार महसूस करता है और फिर आरंभ होता है बीमारियों का वह दौर जिसके लिए वह कभी तैयार नहीं होता। शायद इसी कारण से उसकी मेंटल हैल्थ पर बुरा प्रभाव होता है। यह कहा जा रहा है कि विश्व का हर दसवां व्यक्ति मानसिक समस्या से परेशान है,अगर यह सच है तो विश्व की दस प्रतिशत आबादी मानसिक बीमारियों का शिकार है जो हमारे भविष्य यानी इंसानी सभ्यता के लिए बड़ी चिंता का विषय है।</p>
<p><span style="background-color:#ffff99;"><span style="color:#ff0000;"><strong><br /> जरूरतों का दौर और स्वास्थ्य</strong></span></span><br /> यदि यह दौर कोरोना के विदा होने का है तो बेहतर स्वास्थ्य के साथ ही हमारी दूसरी जरूरतें भी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। गत दो वर्ष में हर कोई आर्थिक रूप से काफी कमजोर हुआ है। महंगाई की बात छोड़ भी दें तो कोरोना जैसी बीमारी जिसने कैंसर और दूसरी गंभीर बीमारियों के उपचार में होने वाले खर्चों को भी मात देकर हर किसी को गरीबी के उस मुहाने पर पहुंचाया है,जिस पर पहुंचकर मानव का मानसिक तनाव का शिकार होना लाजिमी है। उपचार में 50 लाख रूपए तक खर्च हुए लेकिन फिर भी तमाम कोरोना पेशेंट की जान नहीं बच सकी। उन परिवारों के लिए यह घटना एक ऐसी दुर्घटना ही थी जो किसी को भी किसी भी परिस्थिति में मानसिक बीमार करने में बड़ी कारक है। जब उपचार में बड़ी राशि खर्च हो जाने के बाद भी परिवारों को राहत नहीं मिली,परिवार के कई सदस्य अपनी जान गंवा बैठे तो न जाने कितने लोग डिप्रेशन, डिमेंशिया ,फोबिया तथा इंजायटी जैसी समस्याओं के शिकार हो गए। जब कोरोना जाने को है जैसा लग रहा है तब भी अभी तक ऐसे आंकड़े सामने नहीं आए हैं कि कितने लोगों को मानसिक बीमारियों ने जकड़ा है लेकिन यह तय है कि इस समस्या से उत्पन्न बीमारियों ने ग्लोबल रूप में भारी उछाल लिया है। पर अब इस जरूरतों के दौर में स्वास्थ्य समस्याओं से कुछ निजात मिलती सी नजर आ रही है।</p>
<p><br /> <span style="background-color:#ffff99;"><span style="color:#ff0000;"><strong>चिकित्सा  का नया अध्याय</strong></span></span><br /> भारत में चिकित्सा व्यवस्था की कितनी भी बेहतर व्यवस्थाएं हो जाएं, लेकिन इनमें झोल के कारण आम आदमी हमेशा से ही अपने को दबा-कुचला महसूस करता रहा है। शायद इसका कारण यह भी हो सकता है कि हमारी जो चिकित्सा प्रणाली है वह आम जन को समझ में कम ही आती है। हेल्थ सेलिब्रिटी मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए तो तमाम सुझाव देते हैं,लेकिन आज तक कोई ऐसी बेहतर प्रणाली सामने नहीं आई जिससे एक आम जीवन जीने वाला व्यक्ति किसी भी चिकित्सालय में जाकर संतुष्ट हो जाए कि उसका उपचार सही और कम से कम खर्च में हो जाएगा।</p>
<p><br /> <strong><span style="background-color:#ffff99;"><span style="color:#ff0000;">नेशनल हेल्थ मिशन</span></span></strong><br /> सितंबर के अंतिम सप्ताह में देश में नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन के तहत यूनिक डिजिटल हेल्थ कार्ड भी बनना आरंभ हुआ है। इस कार्ड की विशेषता है कि इसमें आपकी पूर्व और अभी की बीमारियों का पूरा डेटा होगा। इससे आप देशभर में कहीं भी जाएंगे तो आपको डाक्टर को हर बात बताने की जरूरत नहीं होगी। आपका कार्ड खोलते ही सबकुछ उसमें आ जाएगा। यदि यह योजना आधार कार्ड की तरह सफल हो जाती है तो तय है कि देश की चिकित्सा व्यवस्था में बहुत बड़ा परिवर्तन हो जाएगा। किसी भी मरीज के लिए यह कार्ड एक ऐसी सुविधा होगी जो उसे उन तमाम परेशानियों से राहत दिलाएगी जो वह उपचार के दौरान झेलता है। उदाहरण के लिए यदि कोई मरीज अकेला भी चिकित्सक के पास जाता है और उसका यूनिक कार्ड चिकित्सक खोल लेगा तो मरीज की सारी कहानी उसे पता चल जाएगी जिससे वह उपचार जल्दी और बेहतर कर पाएगा। किसी भी मरीज के लिए इससे अधिक मानसिक चिंता कम होने का सरल उपाय और क्या होगा। खैर जो भी हो जब हम आज वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे मना रहे हैं तो यह सभी के लिए अच्छी खबर हो सकती है कि भारत में अब जल्दी ही चिकित्सा जगत में व्यापक बदलाव आने वाला है,जिससे हर व्यक्ति लाभाविन्त होगा।<br /> <span style="background-color:#ffff99;"><span style="color:#ff0000;"><strong><br /> अब बदलेगा चिकित्सा जगत  </strong></span></span><br /> पूरे प्रदेश में गत दो वर्षों में जिस तरह से चिकित्सा सेवाओं के लिए सरकारों ने अपने कदम बढ़ाए हैं ,उससे उम्मीद का दीया तेजी से रोशनी देता नजर आ रहा है। राजस्थान को ही लें तो यहां पर लगभग हर शहर में दूसरी लहर के बाद आक्सीजन के प्लांट लगाने का काम जारी है। माना जा रहा है अगर अब कोई लहर आती भी है तो कम से कम आक्सीजन की कमी तो नहीं होगी? इधर राजस्थान के 33 जिलों में से 30 में मेडिकल कॉलेज खुल जाने से मरीजों को राहत मिलती नजर आ रही है। हर कोई अब जयपुर या दूसरे महानगर की ओर दौड़ता नजर नहीं आएगा,यह माना जा सकता है। इससे सबसे बड़ी बात जो है वह यह है कि आम आदमी अब चिकित्सा जगत के उन शब्दों को आसानी से समझ सकेगा,दवाओं की दुनिया में अपने आप को ठहरा हुआ सा नहीं पाएगा। क्यों? क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अब मेडिकल की पढ़ाई को हिंदी में कराने की भी घोषण कर दी है। जब बच्चे हिंदी में पढ़ेंगे तो दवा आदि भी हिंदी में ही लिखेंगे। इससे आम आदमी जो मेडिकली शब्दों को नहीं समझ पाता है वह भी उसके उपचार में कौन सी दवा दी जा रही है समझ पाएगा। यह हर किसी के लिए मानसिक राहत की बात होगी। जब मानसिक रूप से राहत मिलेगी तो मानसिक बीमारियोंं में भी कमी आएगी।</p>
<p><span style="color:#ff0000;"><span style="font-size:larger;"><strong>मनोज वार्ष्णेय</strong></span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%A1-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%9F%E0%A4%B2-%E0%A4%B9%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%A5-%E0%A4%A1%E0%A5%87-%E0%A4%86%E0%A4%9C---%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%9A-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%97%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A5%8D%E0%A4%AF/article-1567</link>
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                <pubDate>Sun, 10 Oct 2021 13:57:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>इंग्लैंड दौरे पर रवाना होने से पहले बोले कप्तान विराट, मानसिक स्वास्थ्य बड़ा फैक्टर, इसकी उपेक्षा नहीं होनी चाहिए</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय कप्तान विराट कोहली ने एक बार फिर खेल में मानसिक स्वास्थ्य के महत्व पर जोर दिया है, क्योंकि उनकी टीम एक और लंबे दौरे के लिए बायो-बबल में प्रवेश करने वाली है। उन्होंने कहा है कि क्रिकेट में इस समय मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ा फैक्टर है, इसलिए इसकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/khel/%E0%A4%87%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%88%E0%A4%82%E0%A4%A1-%E0%A4%A6%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A4%B2%E0%A5%87-%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9F--%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%AC%E0%A5%9C%E0%A4%BE-%E0%A4%AB%E0%A5%88%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%B0--%E0%A4%87%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%8F/article-553"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-06/virat-kohli-5.jpg" alt=""></a><br /><p>मुंबई। भारतीय कप्तान विराट कोहली ने एक बार फिर खेल में मानसिक स्वास्थ्य के महत्व पर जोर दिया है, क्योंकि उनकी टीम एक और लंबे दौरे के लिए बायो-बबल में प्रवेश करने वाली है। उन्होंने कहा है कि क्रिकेट में इस समय मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ा फैक्टर है, इसलिए इसकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। भारतीय टीम को इंग्लैंड में न्यूजीलैंड के खिलाफ 18 जून से विश्व टेस्ट चैंपियनशिप फाइनल और इसके बाद इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट सीरीज खेलने के लिए गुरुवार को इंग्लैंड रवाना होना है। विराट ने बुधवार को प्रेस कान्फ्रेंस में कहा कि कोरोना महामारी के कारण लंबे दौरों पर होटल के कमरों और मैदान के बीच बंद होने के कारण खिलाड़ियों के लिए प्रेरित रहना मुश्किल होता है। केवल एक क्षेत्र में सीमित रहना और दिन भर एक ही चीज करना बहुत मुश्किल होता है। <br /> <br /> <strong>चुनौती बड़ी लेकिन दबाव नहीं</strong><br /> विराट ने कहा कि न्यूजीलैंड के खिलाफ फाइनल मुकाबला बिल्कुल भी आसान नहीं होगा। चुनौती बड़ी है लेकिन हालात नए हैं। इंग्लैंड में मौसम भी काफी अलग होगा लेकिन टीम पर किसी भी तरह का कोई दबाव नहीं है और टीम हर चुनौती से निपटने के लिए तैयार है। <br /> <br /> <strong>बेस्ट ऑफ थ्री फॉर्मेट में हो फाइनल : शास्त्री</strong><br /> टीम के हैड कोच रवि शास्त्री ने फाइनल के फॉर्मेट पर सवाल खड़े किए। शास्त्री ने कहा कि फाइनल बेस्ट ऑफ थ्री फॉर्मेट में होना चाहिए, जबकि यहां सिर्फ एक ही मैच से विजेता का फैसला किया जाएगा। इतने बड़े टूर्नामेंट के विजेता का फैसला एक फाइनल से नहीं होना चाहिए। एक खराब या अच्छा मैच आपकी प्रतिभा का परिचायक नहीं हो सकता। डब्ल्यूटीसी फाइनल एक बड़ा मुकाबला है, क्योंकि यह क्रिकेट का सबसे मुश्किल प्रारूप है। फाइनल में जगह बनाने लिए दो से भी ज्यादा वर्ष लगे हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>खेल</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 03 Jun 2021 17:28:22 +0530</pubDate>
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