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                <title>raj kaj special - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>जाने राज काज में क्या हैं खास</title>
                                    <description><![CDATA[वैसे मेम को आधी आबादी की आयोग की चैयरपर्सन मराठी ताई से उम्मीद हैं, लेकिन उन पर भी दोनों मेंबर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-the-kingdom/article-126193"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/rajkaj.png" alt=""></a><br /><p>चर्चा में नए समीकरण<br />समीकरण बनते-बिगड़ते हैं, तो उसकी चर्चा हुए बिना नहीं रहती। सूबे में इन दिनों हाथ वाले भाई लोगों में भी नए समीकरण को लेकर काफी चर्चा है। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वाले ठिकाने पर आने वाले वर्कर्स में नई तिगड़ी को लेकर चर्चा हुए बिना नहीं रहती। तिगड़ी भी और किसी की नहीं बल्कि बॉर्डर डि्ट्रिरक्ट के साथ ही शेखावाटी वाले भाई साहब और नवाबों के शहर से ताल्लुक रखने वाले लीडर की है। ठिकाने पर सालों से आने वाले बुजुर्गवार भाई साहब की मानें, तो तिगड़ी भी सूर्यनगरी में सेंधमारी कर मैसेज देने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। अब भाई लोगों को कौन समझाए कि ठिकाने पर कहानी तो कुछ और होती है, और सुनाई कुछ और जाती है।</p>
<p>परेशानी हरिराम नाई से<br />सूबे में इन दिनों हाथ वाले कुछ भाई लोग हरिराम नाई से काफी परेशान हैं। हरिराम भी शोले फिल्म वाला नहीं बल्कि संगठन का मजबूत खंभा है, इसलिए उससे कोई बात भी छुपी नहीं रहती। मेष राशि वाले हरिराम के कान और नजरें भी बहुत तेज हैं तथा सूंघने की क्षमता भी लाजवाब। संगठन वाले नेताजी अपना मुंह खोलने से पहले उससे सावधानी तो बरतते हैं, लेकिन कभी-कभी चूक भी हो जाती है। इस हरिराम की वजह से इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने की पल-पल की खबरें लाग लपेट के साथ सिविल लाइन्स में बने बंगले तक पहुंचने में कोई चूक नहीं होती। अब संगठन के भाई लोगों को ऐसे वीरू और जय की तलाश है, जो हरिराम नाई को सबक सीखा सके।</p>
<p>अब नजरें आरयू की तरफ<br />सूबे के शिक्षाविद्धों की नजरें अब आजादी के साल बने शिक्षा के सबसे बड़े मंदिर की तरफ टिकी हुई हैं। टिके भी क्यों नहीं भरतपुर, जोधपुर, बीकानेर और अलवर कुलगुरु पर राज की टेढ़ी नजरें जो हो चुकी है। सूबे की सबसे बड़ी पंचायत के दो सदस्यों की आरयू की कुलगुरु मेम को लेकर पहले से ही आंखें लाल हैं। वैसे मेम को आधी आबादी की आयोग की चैयरपर्सन मराठी ताई से उम्मीद हैं, लेकिन उन पर भी दोनों मेंबर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं।</p>
<p>एक जुमला यह भी<br />सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि राहत को लेकर है। राहत भी बाढ़ से प्रभावित लोगों से ताल्लुक रखती है। जुमला है कि मीनेश वंशज डॉक्टर साहब और अटारी वाले भाई साहब एक साथ हवा में उड़ने के बाद भी 193 में से केवल 26 को ही राहत देने के पीछे का कारण राज को बदनाम करने की मंसा तो नही है। अब इस राज को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं) </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Sep 2025 11:16:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur PS]]></dc:creator>
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                <title>जानें राज काज में क्या हैं खास </title>
                                    <description><![CDATA[तीन धड़ों में बंटे भगवा वाले भाई लोगों ने तय कर रखा है कि फ्रंट लाइनों वाले ऊंघेंगे, तो फोर्थ लाइन वाले भी सुस्ताएंगे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj/article-105338"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/rajkaj.png" alt=""></a><br /><p><strong>ऊंघते मंत्री, सुस्ताते एमएलए</strong><br />आज हम बात करेंगे सदन में ऊंघने वाले मंत्रियों और सुस्ताने वाले एमएलएज की। इनको लेकर फ्लोर पर कई बार राज की किरकिरी भी हुई, मगर उनके कोई असर नहीं पड़ा। बेचारे चीफ व्हिप ने उनकी परफोरमेंस सुधारने के लिए टोने-टोटके भी किए, मगर पार नहीं पड़ी। फोर्थ लाइन में बैठने वाले भाई लोग सुस्ताए तो कोई खास बात नहीं, लेकिन फ्रन्ट लाइन से थर्ड लाइन वाले राज के रत्न ऊंघे, तो मामला सीरियस हो जाता है। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि यह सब जान बूझकर किया जा रहा है, चूंकि भगवा वालों में इन दिनों सबकुछ ठीक नहीं चल रहा। तीन धड़ों में बंटे भगवा वाले भाई लोगों ने तय कर रखा है कि फ्रंट लाइनों वाले ऊंघेंगे, तो फोर्थ लाइन वाले भी सुस्ताएंगे।</p>
<p><strong>चिन्ता में राज का रत्न</strong><br />राज के एक रत्न के चौघड़िए इन दिनों ठीक नहीं है। पंडितों को हाथ की रेखाएं भी खूब दिखाई, मगर चौघड़िया ठीक होने का नाम ही नहीं लेता। अब देखो ना गुजरे दिनों फर्जी मामले के चक्कर में खाकी वालों के हत्थे चढ़े खून के एक रिश्तेदार की वजह से उनको वो सब कुछ करना पड़ा, जो कभी भी सपने में नहीं सोचा था। फिलहाल ऊपर से नीचे तक हाथा-जोड़ी कर मामले को तो निपटा लिया, मगर चौघड़िया ठीक करने में कामयाब नहीं हो पाए। अब उनको कौन समझाए कि जब शनि की दशा आती है, तो सबसे पहले पालतू भैंस ही सींग मारती है या फिर अपनी ही छान से आंख फूटती है। अब चौघड़िया ठीक करना है, तो शनि को तेल तो चढ़ाना ही पड़ेगा।</p>
<p><strong>आड़ फेफड़ों के दम की</strong><br />जब से कोटा वाले भाई साहब ने फेफड़ों के दम को लेकर छाती ठोकी है, तब से सामने वालों की नींद उड़ी हुई है। उनके समझ में नहीं आ रहा कि 81 वां बसंत देख चुके शांति जी के इस चैलेंज के पीछे इशारा किस तरफ है। अपने से 13 साल छोटे शांति से बैठने वाले श्रीमाधोपुर वाले भाई साहब को भरी पंचायत में ललकारा तो 77 साल के अजमेर वाले वासु जी अपने फेफड़ों को टटोले बिना नहीं रहे। अब सूबे के पंचों को कौन समझाए कि शांति जी का इशारा तो कहीं ओर था, जिनको मैसेज देना था, उसमें खर्रा जी की आड़ लेकर देने में कामयाब हो गए। चर्चा है कि कोटा वाले भाई साहब को अपने फेफड़ों के बजाय घुटनों का दम पर ज्यादा भरोसा है।</p>
<p><strong>साहब का दर्द</strong><br />गुजरे जमाने में खाकी का सुख ले चुके भाई साहब ने सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में अपना दर्द बयां क्या कर दिया, राज का काज करने वाले कई साहब लोगों को खुसरफुसर करने का मौका मिल गया। दर्द बयां करने वाले साहब भी कोई छोटे-मोटे नहीं, बल्कि पांच साल पहले अपने दम पर पंचायत में पहुंचने के बाद अब  हाथ से हाथ मिला रखा है। खाकी वाले साहब लोगों में चर्चा है कि पिंकसिटी से सटी अगुणी वाली सीट से नुमाइंदी करने वाले भाई साहब ने अपनी ही पार्टी के राज का इकबाल खत्म होने की बात कहकर अपना दर्द तो बयां कर दिया, मगर इसके लिए जिम्मेदारों की लिस्ट भी बता देते, तो सारा सच सामने आ जाता। चूंकि राज के इकबाल के खात्मे के बारे में उनसे ज्यादा कोई नहीं जानता।</p>
<p><strong>सांसें ऊपर-नीचे</strong><br />ठाले बैठे हाथ वाले भाई लोग भी खुराफात की प्रेक्टिस में इतना ट्रेंड हो गए कि अपने बॉस तक को पीछे छोड़ दिया। बॉस ने तीन सप्ताह पहले कइयों की सांसों को ऊपर-नीचे किया, तो कारिन्दों ने भी शुक्र को नहले पर दहला मार दिया। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने में रोजाना इधर-उधर की सूंघासांघी करने वाले कुछ भाईयों ने वाट्सहेप पर अपने अपने ग्रुप बना रखे है। एक गु्रप के एडमिन ने शुक्र को अपना स्टेटस अपडेट किया, तो कइयों की धड़कनें तेज हो गईं। बेचैनी से कुछ तो पसीने से तरबतर हो गए। उनकी सांसें तेज होना भी लाजमी था, चूंकि भाई साहब ने बीस पदाधिकारियों की छुट्टी होने के संकेत जो दे दिए। पीसीसी की बडी कुर्सी पर बैठे भाई साहब की टेड़ी नजरों का असर तो कुछ दिनों बाद में दिखेगा, मगर फिलहाल खुराफातियों ने मजे जरूर ले लिए।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />सूबे इन दिनों एक जुमले को लेकर चर्चा जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नही बल्कि डीपीटी को लेकर है। इसकी चर्चा हो भी क्यों न, इन दिनों इसकी डिमाण्ड जो है। यह डीपीटी वैक्सीन नहीं है, जो संक्रामक रोगों से बचाव के लिए बच्चों को लगाया जाता है। इसका अर्थ कुछ और ही है। राज का काज करने वाले इस डीपीटी को लेकर लंच केबिनों में चर्चा किए बिना नहीं रहते। इस डीपीटी के सहारे से खाचरियावास वाले बाबोसा वीपी के कुर्सी तक पहुंच चुके हैं। चर्चा है कि अटारी वाले भाई साहब भी सुशासन के सपने को पूरा करने के लिए डिसीजन मैकिंग, पैसेंस एण्ड टारलेंस को प्रायरिटी पर जोर देने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। अब इस डीपीटी वाले जुमले का मतलब समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।</p>
<p>एल.एल. शर्मा<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 24 Feb 2025 11:43:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>जाने राज काज में क्या हैं खास</title>
                                    <description><![CDATA[दूत की चिट्ठी पर दिल्ली में बने इस रिपोर्ट कार्ड के फार्मूले को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj/article-100599"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/rajkaj.png" alt=""></a><br /><p><strong>रेडी टू डिलिमिटेशन </strong><br />आज हम बात करेंगे, रेडी टू डिलिमिटेशन की। अब देखो न, इलेक्शन कमीशन तो पता नहीं अपना काम कब स्टार्ट करेगा, मगर हमारे भारती भवन के भाई लोग हैं कि फितरत के मुताबिक अभी से ही काम में जुट गए हैं। इसके लिए दिन-रात चर्चा, चिंतन और मीटिंग्स होने लग गई है। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि भारती भवन वाले बड़े भाई ने गंगा-जमुनी तहजीब के साथ जिला स्तर के भाई साहबों को काम पर लगा दिया है, ताकि 2028 में फिर फतह करने में ज्यादा जोर नहीं लगाना पड़े। भाई साहबों ने भी अपने हिसाब से डिलिमिटेशन के लिए जोड़-बाकी और गुणा-भाग करने में कोई कंजूसी नहीं बरतने की कसमें खाई हैं।  </p>
<p><strong>नवरत्नों की बढ़ी धड़कनें</strong><br />इन दिनों राज के कुछ नवरत्नों की अचानक धड़कनें तेज हो गई हैं। धड़कनें बढ़ने की वजह बीपी नहीं, बल्कि अटारी वाले भाई का दिल्ली दौरा है। उनकी धड़कनों का बढ़ना भी लाजिमी है, चूंकि पुरवाई चलने के बीच मलमास के बाद कैबिनेट रिसफलिंग के साथ ही संगठन में बदलाव की सुगबुगाहट जो चल रही है। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर चर्चा है कि उन रत्नों की हालत ज्यादा खराब है, जिनके 365 दिन के रिपोर्ट कार्ड में थर्ड डिवीजन या सप्लीमेंटरी के मार्क्स हैं। दूत की चिट्ठी पर दिल्ली में बने इस रिपोर्ट कार्ड के फार्मूले को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है। </p>
<p><strong>नजरें गुजराती बंधु पर टिकीं</strong><br />नजरें भी हर किसी पर नहीं टिकती हैं और जब टिकती हैं, तो बहुत देर तक पलकें भी नहीं झपकतीं। इन दिनों सूबे के भगवा वाले भाई लोगों की नजरें भी एक गुजराती बंधु पर टिकी हैं। गुजराती बंधु और कोई नहीं बल्कि वृषभ वाले भाई साहब है, जो पड़ोसी सूबे के राज की कुर्सी संभाल चुके हैं और अब मरु प्रदेश के इंचार्ज हैं। गले की फांस बने संगठन के इलेक्शन के बीच भाई साहबों को उनसे काफी उम्मीद है। ठिकाने पर खुसरफुसर है कि बंद लिफाफों का तोड़ और कोई नहीं सिर्फ 68 बसंत देख चुके राजकोट की माटी के लाल ही हैं। इस खुसरफुसर के बाद हर किसी भाई की नजरें गुजराती भाई साहब पर टिकी हैं।</p>
<p><strong>मंत्रियों का क्षेत्र मोह</strong><br />सूबे के राज के आधा दर्जन मंत्रियों का एक साल बाद भी क्षेत्र का मोह नहीं छूटा है। क्षेत्र मोह ने उनकी रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा रखा है। किसी न किसी बहाने क्षेत्र में शक्ल दिखाने पहुंच जाते हैं। भाई साहबों के क्षेत्र की दूरियां कई बार उनके कमर में दर्द कर देती हैं। सबसे बुजुर्ग भाई साहब के मोह के बीच उम्र भी बाधक नहीं है। इन मंत्रियों का सरकारी काज निपटाने वाले कारिन्दे भी उनके इस मोह से परेशान हैं। उनकी समझ में यह नहीं आ रहा कि आखिर कौन सा कारण है कि सचिवालय से इतनी दूरियां बनी हुई हैं। अब राज का काज करने वालों को कौन समझाए कि अगली पीढ़ी के रोजगार के लिए क्षेत्र में हाजिरी लगाए बिना पार पाना बड़ा मुश्किल है।</p>
<p><strong>अब लड़ाई पतंग-डोर की</strong><br />राजनीति में कई तरह के दांवपेच होते हैं। सूबे के कई नेता इसमें महारत हासिल किए हुए हैं। कुछ दिनों पहले हाथ वाले गोविन्दजी जी ने अब गांवों की सरकार के चुनावों में हाथ वालों की पतंग काटने का ऐलान किया था। लेकिन अटारी वाले भाई साहब तो एक कदम आगे निकले और मैसेज दे डाला कि जिनके हाथों में डोर ही नहीं है, वे भला पतंग कैसे काटेंगे। पतंग और डोर दोनों कमल वालों के ही हाथों में है।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />राज का काज करने वाले कई भाइयों को एक फरवरी का बेसब्री से इंतजार है। उस एक को कईयों को ठाठ की उम्मीद है। पिछले दिनों पदोन्नति पा चुके कई लोगों को मलाईदार कुर्सियां दिखाई देने लगी हैं। इसके लिए जुगाड़ भी बिठाने की पूरी तैयारी कर ली है।</p>
<p><strong>एल.एल. शर्मा</strong></p>
<p><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं।)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Jan 2025 13:11:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>जानें राज-काज में क्या हैं खास</title>
                                    <description><![CDATA[चर्चा करने वाले भाई लोग दोनों तरफ के थे, जिनकी लिस्ट काफी लम्बी है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-politics/article-97754"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/rajkaj.png" alt=""></a><br /><p><strong>कर्म और फल के भरोसे</strong><br />सूबे के राज की कुर्सी को लेकर पिछले एक साल से कई तरह की चर्चाएं हुईं। चर्चा करने वाले भाई लोग दोनों तरफ के थे, जिनकी लिस्ट काफी लम्बी है। सूची में सबसे ज्यादा नाम सरदार पटेल मार्ग पर स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा के ठिकाने पर आने वालों के है। इनमें से कई भाई लोगों को तो रात-दिन राज की कुर्सी के सपने आ रहे हैं। राज का काज करने वाले में चर्चा है कि अटारी वाले भाई साहब को लेकर भी कई तरह की अफवाहें फैलाने में कोई कसर नहीं छोडी, लेकिन कर्म पर ज्यादा विश्वास करने वाले भाई साहब भी एक कदम आगे निकले, जो कुछ मैसेज देना था, चुपचाप दे दिया। अब भाई लोगों को कौन समझाए कि जिसने एक बार सरपंची कर ली, वह सारे दांवपेच में माहिर हो जाता है। धनु राशि वाले भाई साहब तो पूंछरी वाले श्रीनाथ जी महाराज के आशीर्वाद से कर्म करने में माहिर हैं, फल देना ऊपर वाले पर छोड़ते हैं।</p>
<p><strong>सुगबुगाहट बदलाव की</strong><br />सूबे में इन दिनों एक बड़े दल में बदलाव की सुगबुगाहट जोरों पर है। दल भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि 139 साल पुराना अंग्रजों के जमाने का है। इंदिरा गांधी भवन में बने ठिकाने पर आने वाले वर्कर्स में सुगबुगाहट है कि एसेम्बली के उपचुनावों में तीन सीटों को खोने के बाद आलाकमान का मूड उखड़ा हुआ है। उखड़े भी क्यों नहीं, इलेक्शन मैनेजमेंट में कई खामियां जो रह गईं। हार्डकोर वर्कर्स में चर्चा है कि पार्टी को फिर से मजबूती देने के लिए एक खेमे के लोगों ने आलाकमान को नीचे से ऊपर तक बदलाव करने की सलाह दी। अब आलाकमान उनकी सलाह को कितना तवज्जो देते हैं, उसका असर तो दो-तीन महीने बाद पता चलेगा, किन्तु एक खेमे के लीडर हाथ-पैर मारने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।</p>
<p><strong>जलवा भारती भवन का</strong><br />जलवा तो जलवा ही होता है और अब जलवा होता है, तो उसकी चर्चा भी होती है। अब देखो न, सूबे में फर्स्ट टाइम राइजिंग राजस्थान में भारती भवन वालों ने भी अपना जलवा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भाई साहबों ने जलवा भी बडेÞ धन कुबेरों के जरिए नहीं, बल्कि  एमएसएमई के बैनर तले छोटे-मोटे कारखानों को लेकर दिखाया है। इसको लेकर बातें भी खूब हुई, मगर जलवा दिखाने वालों ने इसकी परवाह तक नहीं की। चर्चा है कि अब तक शाखाएं लगाने तक सीमित भाई साहबों ने अपना दूसरा रूप दिखाने के लिए पहली बार मिली जिम्मेदारी को निभाने के लिए दिन रात पसीने बहाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके पीछे के राज को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाडी है।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />सूबे में सात दिन से एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि राजस्थान को राइज करने के मकसद से किए जमघट को लेकर है। जुमला है कि दुनियाभर के लोगों ने राइजिंग राजस्थान का लुत्फ उठाया, लेकिन सबसे ज्यादा मजे सूरजमल की नगरी से आए बंधुओं ने लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बसों में सवार होकर आए भाई लोग तीन दिन तक मन मोहक ना-ना प्रकार के व्यंजनों के साथ नाच गानों से भी आनंदित हुए बिना नहीं रहे। चर्चा है कि जब कोठ्यार का मालिक ही काकाजी हो, तो भतीजों की बीसों अंगुलियां घी में डूबे बिना नहीं रहतीं।</p>
<p><strong>एल.एल. शर्मा</strong><br /><strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 Dec 2024 11:30:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>जानें राज-काज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[नेताओं की जुबानें भी लक्ष्मण रेखा पार कर गई हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-politics/article-97083"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/raj_kaj-copy.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>चर्चा में सीएम</strong><br />सूबे में इन दिनों एक सीएम काफी चर्चा में हैं। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा के ठिकाने पर भी इन सीएम साहब की चर्चा हुए बिना नहीं रहती। सीएम भी किसी छोटी पार्टी से नहीं बल्कि भगवा से ताल्लुकात रखते हैं। पिंकसिटी के दीनों का नाथ इलाके में बने ठिकाने पर निवास करने वाले सीएम साहब सूबे की सबसे बड़ी पंचायत के चुनाव में कमल के निशान पर अपना भाग्य भी आजमा चुके हैं, पर पार नहीं पड़ी। साहब का चर्चा में आना लाजमी भी है, चूंकि साहब के उड़नखटोले पर मोटे अक्षरों में जो पट्टी लगी है, उस पर हर किसी का ध्यान पड़े बिना नहीं रहता। साहब का एमएलए बनने का सपना तो पूरा नहीं हो सका, किन्तु अपने उड़नखटोले पर विधायक लिखा कर रोब दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। हालांकि अपने बचाव में छोटे अक्षरों में हारा हुआ प्रत्याशी लिखकर ईमानदारी भी दिखा कर मन हलका करने में कंजूसी नहीं दिखाई।</p>
<p><strong>लाशों पर राजनीति</strong><br />सूबे में इन दिनों लाशों पर राजनीति जोरों पर है। लाशें भी किन्हीं बड़े-बुजुर्गों की नहीं बल्कि दुधमुंहें बच्चों की। वैसे लाशों पर राजनीति नई बात नहीं, लेकिन इस बार कुछ ज्यादा ही है। नेताओं की जुबानें भी लक्ष्मण रेखा पार कर गई हैं। अब देखो न, नेतागिरी चमकाने के चक्कर में न तो अपनों को छोड़ रहे हैं और न सामने वालों को लपेटने में कोई कसर छोड़ रहे। अब इन नेताओं को कौन समझाए कि गुजरे जमाने में दोनों दलों के राज में भूख से मौतों को लेकर पहले भी कई बार सूबे की किरकिरी हो चुकी है। अब उनको कौन समझाए कि उनकी लंबी जुबानों से राज का काज करने वालों की मोटी चमड़ी पर कोई असर दिखाई देने वाला नहीं, चूंकि राज ही बदलता है, काज करने वाले नहीं।</p>
<p><strong>रूठे सैंयां हमारे...</strong><br />इन दिनों हाथ वाली पार्टी में रूठों को मनाने का काम जोरों पर है, लेकिन रूठने वाले तो किसी न किसी बहाने रूठेंगे, उनको रोक भी कौन सकता है। अब देखों न विधानसभा के उप चुनावों में शिकस्त खाने के बाद सूबे में पार्टी को फिर से अपने पांवों पर खड़ा करने के लिए लक्ष्मणगढ वाले भाई साहब हाथ रूपी जहाज को बैतरणी पार कराने के लिए रात दिन भी एक कर रहे हैं। बाहर का रास्ता दिखा चुके कुछ नेताओं को भी जैसे-तैसे मनाकर अंदर लेने के लिए पसीने बहा रहे हैं, मगर अभी भी उनकी रातों की नींद और दिन का चैन गायब है। बेचारे सूख कर दुबले होते ही जा रहे हैं। इतना करने के बाद भी जहाज है, कि विपरीत हवाओं के चलते आगे नहीं बढ़ पा रहा। और तो और साहब के सहयोगी तक सौ कदम दूर भाग रहे हैं। इंदिरा गांधी भवन में हाथ वाले ठिकाने पर सालों से आने वाले भाई लोग भी समझ नहीं पा रहे कि भाई साहब के सिवाय किसी भी बड़े नेता की सक्रियता दिखाई नहीं दे रही। दो पूर्व सदरों को जिम्मेदारी भी सौंपी गई, लेकिन दोनों किसी न किसी बहाने खुश नहीं है।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि थोथे थानेदारों को लेकर है। चार महीने पहले छापाखानों में दो दिन तक चर्चा में आए थोथे थानेदारों को भोली भाली पब्लिक भुला चुकी थी, लेकिन गवर्नमेंट हॉस्टल के आसपास बन रहे राजस्थानी गेटों को देखकर उनकी याद ताजा हुए बिना नहीं रहती। जुमला है कि इन गेटों और थोथे थानेदारों की घटना के बीच गहरा ताल्लुकात है।<br />(यह लेखक के अपने विचार हैं) </p>
<p><strong>-एलएल शर्मा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Dec 2024 11:23:49 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>जाने राज-काज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[स टांग खिंचाई का इलाज करने दिल्ली वालों ने सबसे बड़े वैध को भी भेजा, लेकिन वह भी नब्ज टटोलने में कामयाब नहीं हो पाए। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj/article-22494"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-09/46546546576.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>पोस्टर पॉलिटिक्स से बढ़ी चिन्ता</strong><br />सूबे में भगवा का राज आएगा या नहीं यह तो पता नहीं, लेकिन उनको मिले शुभ संकेतों के बाद से ही राज की कुर्सी के सपने देखने वालों में टांग खिंचाई जोरों पर है। हो भी क्यूं ना मामला, राज की कुर्सी से ताल्लुक जो रखता है। इस टांग खिंचाई का इलाज करने दिल्ली वालों ने सबसे बड़े वैध को भी भेजा, लेकिन वह भी नब्ज टटोलने में कामयाब नहीं हो पाए। अब देखो ना शनि को सूर्यनगरी में हुई पोस्टर पॉलिटिक्स से आलाकमान तक के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें दिखाई देने लगी हैं। चिन्ता भी होना लाजमी था, चूंकि नंबर वन कुर्सी के दावेदारों ने अपने-अपने होर्डिंग्स में एक-दूसरे की फोटो से परहेज जो किया।</p>
<p><strong>चर्चा में जूते</strong><br />सूबे में इन दिनों नेताओं के साथ जूते भी चर्चाओं में हैं। जनता का जूता कब किस नेता पर खुल जाए, यह पता नहीं चल पाता। जूते का असर इक्कीसवीं सदी के नेताओं पर कितना पड़ता है, यह तो कहा नहीं जा सकता। लेकिन जूता बनाने वाली कंपनियों की कमाई पर इसका जरूर असर पड़ता है। कंपनी वाले पेटेंट कराने के लिए दौड़धूप भी करते हैं। जूते-जूते में फर्क होता है। नेता जब आपस में शब्द बाणों से एक दूसरे पर जूते मार रहे हैं, तो जनता अब हकीकत में उठाने लगी है। जूते उठाने या फिर फेंकने की परम्परा नई नहीं है। यह सिलसिला प्रथम विश्व युद्ध से ही शुरू हो गया था। उस समय जनता ने राजा- महाराजाओं के खिलाफ जूता उठाया तो उनको राज छोड़ना ही पड़ा। अब नेताओं पर सरे आम जूते फेंके जा रहे हैं। राज करने वालों में चर्चा है कि आने वाले समय में जो नेता ज्यादा जूते खाएगा, वो सबसे अच्छा राजनेता साबित होगा। चूंकि जनता इतनी सयानी है कि वह नेताओं के लखणों के आधार पर ही जूता मारेगी।</p>
<p><strong>आपे से बाहर </strong><br />सूबे की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी के एक साहब ने अपनी औकात क्या दिखाई, उनकी बिरादरी के लोगों के मुंह शर्म से झुक गए। साहब ने भी आगा पीछा नहीं सोचा और आसोज की भरी दुपहरी में तपने के बाद शाम को ढाणी में यौवन देख आपा खो बैठे। अब उनके संगी साथियों का तर्क है कि यह कोई नई बात नहीं है, हमारे यहां तो यह रिवाज सा बन गया। सूची सौपेंगे तो आंकड़ा सैकड़ा पार कर जाएगा। मामला आजादी के साल अस्तित्व में आई यूनिवर्सिटी से जो जुड़ा है।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि भगवा वालों को लेकर है। जुमला भी फ्यूचर लीडर से ताल्लुक रखता है। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर भी इस जुमले को लेकर काफी खुसरफुसर है। ठिकाने पर हर कोई आने वालों को चटकारे लेकर सुनाया जा रहा है। जुमला है कि भगवा वालों के एक खेमे ने तीनों खेमों की नींद उड़ा रखी है। तीनों खेमों के वर्कर अंदरखाने ही एक्शन प्लान बनाने में पसीने बहा रहे हैं, लेकिन कोई न कोई खामी चट्टान बन कर सामने खड़ी हो जाती है। जबकि एक खेमा ऐसा है, जो खुलकर मैडम के फेवर में है और पूरी ताकत के साथ पसीना भी बहा रहा हैं। वर्कर्स के साथ पब्लिक भी ऐसी दीवानी है कि मैडम जहां भी जाती है, अपने आप उमड़ जाती है। पब्लिक की इस दीवानगी को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।</p>
<p><strong>- एलएल शर्मा</strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 12 Sep 2022 10:37:19 +0530</pubDate>
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                <title>देखे राज काज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में जब से झीलों की नगरी उदयपुर में आतंकवादी हादसा हुआ है, जब से पब्लिक रात-दिन आईबी वालो को कोस रही है। कोसे भी क्यों नहीं, 12 साल से गुप्तचरों को हवा तक नहीं लगी कि झीलों की नगरी से तार पड़ोसी देश पाक तक जुड़ चुके हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/what-is-special-in-raj-kaj/article-13563"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-07/46546546515.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>गुप्तचर हुए फेल</strong></p>
<p>सूबे में जब से झीलों की नगरी उदयपुर में आतंकवादी हादसा हुआ है, जब से पब्लिक रात-दिन आईबी वालो को कोस रही है। कोसे भी क्यों नहीं, 12 साल से गुप्तचरों को हवा तक नहीं लगी कि झीलों की नगरी से तार पड़ोसी देश पाक तक जुड़ चुके हैं। अब कौन समझाए कि अब पहले वाले न तो गुप्तचर रहे और न ही उनको सूचना देने वाले। अब पब्लिक को कौन समझाए कि बेचारे आईबी वाले भी अखबारनवीसों तक सीमित रह गए, जो देर रात तक अखबारों के दफ्तरों में फोन लगा कर पहले ही पूछ लेते हैं कि खास क्या है। गुप्तचरों को तो खुद के कामों से ही फुर्सत नहीं है, सूंघासांघी के लिए डे-नाइट टाइम देना पड़ता है, तब जाकर क्लू मिलता है।</p>
<p><strong>नजरें एनआईए पर</strong><br />इन दिनों सूबे में एनआईए की चर्चा जोरों पर है, हो भी क्यों ना, एनआईए वालों का पगफेरा कुछ ज्यादा ही है। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि पहले सीबीआई और बाद में ईडी वाले भी लोगों की जुबान पर थे। दोनों का दखल भी बढ़ा, लेकिन मरु प्रदेश में एसआईटी वालों ने उनकी पार नहीं पड़ने दी, तो दिल्ली वालों ने एनआईए की आड़ लेकर तोड़ निकाल लिया। चर्चा है कि सूबे में पहला मामला दर्ज करने वाली एनआईए अपना करिश्मा दिखाए बिना नहीं रहेगी, चूंकि मामले इंडिया की अस्मत से जुड़े हुए हैं।</p>
<p><strong>फेसबुक-पेय पदार्थ और रेप</strong><br />सूबे में खाकी वाले भाई लोगों का दिन का चैन और रातों की नींद उड़ी हुई है। उड़े भी क्यों नहीं, रेप के मामले जो बढ़ते जा रहे हैं। पीएचक्यू में झण्डे के नीचे बैठने वाले भाई के भी समझ में नहीं आ रहा कि आखिर मामला क्या है। अब खाकी वालों को कौन समझाए कि फेसबुक से दोस्ती के बाद हुई मुलाकात अपना गुल खिलाए बिना नहीं रहती। तभी तो घर से सैकड़ों मील दूर पेय पदार्थ का सेवन होता है, जो अपना असर दिखाता है और अंधे प्यार का नशा उतरने पर ही पता चलता है कि कुछ तो गड़बड़ हुआ है। अब खाकी वालों को भी फेसबुक से दोस्ती करने वालों के लिए नई विंग खोल कर नींद सोने में ही फायदा है।</p>
<p><strong>इंतजार अगस्त क्रांति का</strong><br />भगवा वालों के एक खेमे के भाई लोगों के इन दिनों जमीन पर पैर ही नहीं टिक रहे। राज का काज करने वाले भी चुपचाप इसकी टोह लेने के लिए इधर-उधर सूंघासांघी कर रहे हैं। उत्साहित खेमे को नौ अगस्त की क्रांति का बेसब्री से इंतजार है। अभी से वे एक-दूसरे को बधाइयां देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। सुबह-शाम सिर्फ एक ही रट लगाए बैठे हैं कि बस अगस्त का इंतजार करो, सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में सूबे के सदर वाली कुर्सी पर ताजपोशी होने वाली है। लेकिन भवन में रोजाना आने वाले भाई लोगों का सवाल है कि आखिर यह कैसे संभव है।</p>
<p><strong>एक्सक्ल्युड बनाम इनक्ल्युड</strong><br />इन दिनों सूबे में एक्सक्ल्युड और इनक्ल्युड को लेकर काफी चर्चा है। इससे इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने के साथ ही सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में भगवा वालों का मंदिर भी अछूता नहीं है। राज का काज करने वाले अपने हिसाब से चर्चा में मशगूल है। जो भाई लोग इन शब्दों का अर्थ नहीं समझ पा रहे, वो अपने गुरुओं की शरण में हैं। पीसीसी में चर्चा है कि भगवा वाले इनक्ल्युड में कुछ ज्यादा ही विश्वास करते हैं, वो सबसे पहले अपने ही लोगों को घर का रास्ता दिखाने में माहिर हंै। भगवा वालों के ठिकाने के साथ भारती भवन में चिंतन बैठकों में हाथ वालों के इनक्ल्युड फार्मूले को लेकर बहस छिड़ी हुई है। चर्चा है कि भगवा वाले इनक्ल्युड फार्मूले से उन लोगों को गले लगा रहे हैं, जिनके पूर्वजों को किसी न किसी बहाने लगा दिया गया था। चर्चा में दम भी है, जोधपुर, अलवर और जयपुर के मामले जो सामने हैं।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />ब्यूरोक्रेसी में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। हो भी क्यों ना, मामला राज के मूड से जुड़ा है। जब से जोधपुर वाले अशोक जी  की नजरेंं महिलाओं की योजनाओं पर टिकी हैं, तब से ब्यूरोक्रेसी में एस्टीम भी बढ़ा है। सत्ता के साथ संगठन वालों का मुंह खुलने से असर साफ दिखने लगा है। -<strong>एल.एल शर्मा, पत्रकार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/what-is-special-in-raj-kaj/article-13563</link>
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                <pubDate>Mon, 04 Jul 2022 13:09:44 +0530</pubDate>
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                <title>राज-काज में जानें क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[असर तो असर ही होता है, कब किसको हो जाए, कोई पता नहीं। अब देखो ना, सूबे में दिनों दोनों दलों में जेनरेशन गैप का असर साफ-साफ दिख रहा है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj/article-10750"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/46546546546551.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>असर जेनरेशन गैप का</strong><br />असर तो असर ही होता है, कब किसको हो जाए, कोई पता नहीं। अब देखो ना, सूबे में दिनों दोनों दलों में जेनरेशन गैप का असर साफ-साफ दिख रहा है। गैप भी इतना हो गया कि कुछ यूथ तो जोश में होश तक खो दिया। हाथ वाले भाई लोगों का जेनरेशन गैप तो अंधों तक को दिखाई देने लगा है। भगवा वालों का गैप भी जगजाहिर है। अब यूथ ब्रिगेड के भाई लोगों को कौन समझाए कि घर के बुजुर्गों के बिना बीनणी लाना, दिन में तारे देखने से कम नहीं है। अब इसको समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।</p>
<p><strong>मंसूबों पर फिरा पानी</strong><br />राजनीति का अखाड़ा बने खेल के मैदान में राज के दो रत्नों की जंग को लेकर सूबे में कई दिनों से बहस छिड़ी हुई है। उन दोनों के पॉलिटिकल गेम खेल को राज का काज करने वाले भी नहीं पचा पा रहे हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के दफ्तर में आने हर कोई अपने हिसाब से इसके मायने निकाल रहा है। ठिकाने पर कई सालों से आ रहे गांधी टोपी वाले बुजुर्गवार की मानें, तो हाथ वाले कुछ भाइयों ने जोधपुर वाले अशोक भाई साहब को भी लपेटने की कोशिश की थी, लेकिन जादुई छड़ी ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया।</p>
<p><strong>आकलन नफा नुकसान का</strong><br />दोनों तरफ के तीन बड़े जातीय नेताओं के ऊवाच के बाद दोनों दलों में लाभ नुकसान का आकलन के लिए लालकिले की नगरी वाले विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है। राज का काज करने वाले भी लंच केबिनों में अपने हिसाब से जोड़, बाकी, गुणा और भाग में लगे हैं। दोनों दलों के ठिकानेदार भी अपने-अपने हिसाब से गुणिया कर रहे हैं। विशेषज्ञों का तर्क है कि तीन बड़ी जातियों के हाथ से खिसकने का डर अब दोनों तरफ के लीडर्स को सता रहा है। किसी तीसरे ने पुचकार कर गले लगाया, तो वह फायदा उठा सकता है।</p>
<p><strong>बढ़ रही है सूची</strong> <br />राज और काज करने वालों की बीच छत्तीस का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। जोधपुर वाले भाईसाहब तो खाई पाटने की जुगत में हैं, लेकिन उनके नवरत्न कुछ समझना ही नहीं चाहते। काज करने वाले कायदे कानूनों की दुहाई देकर सुशासन के नारे की याद दिलाते हैं, लेकिन रत्न हैं कि अपनी लाल आंखें दिखाकर अपने मनमाफिक काम पर मुहर लगाना चाहते हैं। अब देखो ना, राज के एक युवा रत्न को ऊपर वालों ने आंख के इशारे से समझा दिया, लेकिन उनके समझ में नहीं आई। गुजरे जमाने में माथुर आयोग के चक्कर लगा चुके अफसरों से अभी भी उम्मीद कर रहे हैं कि आंख बंद कर चिड़िया बिठा दें, चाहे दूध फट ही क्यूं ना जाए। ऐसे में नवरत्नों से पिण्ड छुड़ाने वालों की सूची लंबी होती जा रही है। वह अब तक साठ को पार कर चुकी है।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />सूबे में एक बार फिर दोनों बड़े दलों में रिप्लेसमेंट की राजनीति ऊंचाई पर है। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 और इंदिरा गांधी भवन के साथ ही राज का काज करने वालों के लंच क्लब में भी रिप्लेसमेंट की राजनीति चर्चा में है। काज करने वाले चटकारे ले रहे हैं कि भगवा में मैडम और हाथ में जादूगरजी के रिप्लेसमेंट के लिए पसीने तो खूब बहाए जा रहे हैं, लेकिन तोड़ किसी के पास नहीं है। दोनों तरफ वफादारों का भी टोटा नहीं है। और तो और हाथ वाले दोनों छुटभैयों ने भी एक-दूसरे के रिप्लेसमेंट के लिए रात दिन एक किए हुए हैं। रिप्लेसमेंट तो संभव नहीं है, लेकिन दोनों तरफ धड़ाबंदी जरूर हो गई है।<br /><strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong><br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 May 2022 11:26:09 +0530</pubDate>
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                <title>देखे राज-काज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[झीलों की नगरी उदयपुर में हाथ वाले दल के बड़े लोगों ने तीन दिन चिंतन-मंथन क्या किया, कइयों की चिंता बढ़ गई। उनकी रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा हुआ है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/jaipur-see-what-is-special-in-raj-kaj/article-9832"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/raj_kaj-copy.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>चिंतन ने बढ़ाई चिंता</strong><br />झीलों की नगरी उदयपुर में हाथ वाले दल के बड़े लोगों ने तीन दिन चिंतन-मंथन क्या किया, कइयों की चिंता बढ़ गई। उनकी रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा हुआ है। उड़े भी क्यों नहीं, दिल्ली वाली गौरी मैम ने शुक्र को इशारों ही इशारों में जो मैसेज दिया, वह उनके मनमाफिक नहीं है। बेचारों ने अपने मकसद को पूरा करने के लिए पसीने भी बहाए थे, उन्होंने न दिन देखा था और न ही रात। राज का काज करने वालों में खुसरफुसर है कि पार्टी ने बहुत कुछ दिया है, तो अब कर्ज भी ब्याज समेत चुकाने वाले मैसेज को समझने वाले समझ गए, ना समझे अनाड़ी हैं।</p>
<p><strong>मैसेज के मायने</strong><br />जोधपुर वाले अशोक ने शुक्र को जो विक्ट्री साइन दिखाया, उसके बाद से चर्चाओं का बाजार गर्म है। भाईसाहब ने भी विक्ट्री साइन उस समय दिखाया, जब सूबे में अफवाहों का दौर जारी है। खबरनवीसों के बीच दिखाए इस विक्ट्री साइन के कई मायने निकाले जाने लगे हैं। निकाले भी क्यों नहीं, भाईसाहब की बॉडी लैंग्वेज तक बदल गई। उनके चेहरे की मुस्कान भी बिना पूछे ही सबकुछ बता रही है। अब भाई लोग चाहे कुछ भी अर्थ निकाले, लेकिन भाईसाहब ने विक्ट्री साइन से मैसेज दे दिया कि ऑल इज वैल।</p>
<p><strong>इंतजार आंख फूटने का</strong><br />सरदार पटेल मार्ग स्थित भगवा वालों के दफ्तर में एक किस्सा जोरों पर है। वहां आने वाले हर किसी को चटकारे लेकर सुनाया जाता है। हमें भी भाईसाहब ने सुनाया तो हंसे बिना नहीं रह सके। भाईसाहब ने सुनाया कि आजकल यहां तू मेरी आंख फोड़, मैं तेरी फोडू वाला किस्सा चल रहा है। गुजरे जमाने में तिगड़ी ने बेनीवाल के खिलाफ आवाज उठाई थी तो, भाईसाहबों ने भिण्डर का अड़ंगा ला दिया था। अब फिर दोनों खेमे एक-दूसरे की आंख फोड़ने के इंतजार में हैं।</p>
<p><strong>फिर मचा भंवरी का आतंक</strong><br />सूबे में आजकल फिर से भंवरी के आतंक का भूत आया हुआ है। उसके नाम से ही खादी के साथ खाकी को भी पसीना बहाना पड़ रहा है। वैसे सूबे में भंवरी का आतंक नया नहीं है। 39 साल पहले भी भंवरी के आतंक ने सूबे को हिला कर रख दिया था। दोनों भंवरियों में फर्क सिर्फ इतना सा है कि 39 साल पहले वाली ने गांव के पंचों को सबक सिखाया था और दूसरी भंवरी ने राजनीति का गढ़ माने जाने वाले परिवार लपेटे में लिया था। अब नई भंवरी के फेर में बेटे की आड़ में फंसे किशनपोल वाले भाईसाहब से न निगलता बन रहा है और न ही उगलता।</p>
<p><strong>मिला बड़बोलेपन का प्रसाद</strong><br />चिंतन शिविर में आए चर्चित आचार्य का बड़बोलापन उन्हीं को उल्टा पड़ गया। हाथ वाले वेटिंग पीएम की बहन जी के काफी नजदीकी होने का दावा करने वाले आचार्य ने राजस्थान को लेकर मीडिया के सामने कुछ ज्यादा ही मुंह खोल दिया। न्याय और अन्याय होने की बढ़चढ़कर बातें की और अब न्याय होने की उम्मीद भी जताई। लेकिन गुप्तचरों से 30 मिनट में ही सारा गुड़ गोबर कर दिया। बात बहन तक पहुंची, तो आंखें लाल होना लाजमी थी। सो आनन-फानन में आचार्य जी को हिदायत दी गई कि भविष्य में जुबान खोलने से पहले अपना आगा-पीछा भी सोच लें।<br /><strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong> <br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 May 2022 11:27:27 +0530</pubDate>
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