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                <title>lungs - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>कमजोर लंग्स और सांस की पुरानी बीमारियों में कारगर है ऑक्सीजन थेरेपी, बेहतर परिणाम के लिए इसे दिन में कम से कम 18 से 24 घंटे लगातार लगाना जरूरी</title>
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                        <![CDATA[सीओपीडी, अस्थमा और आईएलडी जैसे मरीजों में कम ऑक्सीजन लेवल होने पर लॉन्ग टर्म ऑक्सीजन थेरेपी जरूरी। विशेषज्ञों के अनुसार ऑक्सीजन एक दवा है, इसलिए डॉक्टर की सलाह से 18–24 घंटे देना चाहिए। वेट ऑक्सीजन और साफ-सफाई जरूरी।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/oxygen-therapy-is-effective-in-weak-lungs-and-chronic-respiratory/article-149053"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/122200-x-60-px)-(2)4.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों जैसे सीओपीडी, अस्थमा या आईएलडी की वजह से कई बार मरीजों के लंग्स इतने कमजोर हो जाते हैं कि वे सामान्य तरीके से सांस नहीं ले पाते। हार्ट और ब्रेन को सही से काम करने के लिए कम से कम 85 से 90 प्रतिशत ऑक्सीजन लेवल की जरूरत होती है। जब लंग्स खुद से यह लेवल मेंटेन नहीं कर पाते तब ऐसे मरीजों को घर पर ही लॉन्ग टर्म ऑक्सीजन थेरेपी यानी बाहरी ऑक्सीजन सपोर्ट की सख्त जरूरत पड़ती है। विशेषज्ञों का कहना है कि एक विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लेने और उनके सुझाए डोज व समय के अनुसार ही ऑक्सीजन दी जाए। लापरवाही से जान का खतरा बढ़ सकता है।</p>
<p><strong>ऑक्सीजन भी एक तरह की दवा है :</strong></p>
<p>वरिष्ठ श्वांस रोग विशेषज्ञ डॉ. शुभ्रांशु ने बताया कि ऑक्सीजन भी एक तरह की दवा है, इसलिए इसका फ्लो रेट और डोज हमेशा डॉक्टर ही तय करते हैं। इसे दिन में केवल एक-दो घंटे लगाने से कोई खास फायदा नहीं होता, बल्कि बेहतर परिणाम के लिए इसे दिन में कम से कम 18 से 24 घंटे लगातार लगाना जरूरी है। घर पर ऑक्सीजन सप्लाई के लिए मुख्य रूप से ऑक्सीजन सिलेंडर या ऑक्सीजन कंसंट्रेटर मशीन का प्रयोग किया जाता है। कंसंट्रेटर हवा से सीधा ऑक्सीजन लेकर उसे फिल्टर करता है और मरीज को लगातार 90 से 95 प्रतिशत शुद्ध ऑक्सीजन देता है।</p>
<p><strong>तकलीफ बढ़ने पर वेट ऑक्सीजन दें :</strong></p>
<p>डॉ. शुभ्रांशु ने बताया कि लंबे समय तक ड्राई ऑक्सीजन लेने से मरीज का गला और नेजल पैसेज सूखने लगता है। इस तकलीफ  से बचने के लिए हमेशा पानी के जरिए वेट ऑक्सीजन दी जानी चाहिए। ऑक्सीजन को नुकसान होने से बचाने के लिए कुछ खास प्रिजर्विंग वाल्व भी आते हैं जो सिर्फ  सांस अंदर लेते वक्त ही ऑक्सीजन रिलीज करते हैं। अत्यधिक गंभीर मरीजों में सीधे गले में ट्यूब डालकर भी ऑक्सीजन दी जाती है।</p>
<p><strong>इन्फेक्शन से बचाव के लिए हाईजीन और देखरेख जरूरी :</strong></p>
<p>घर पर ऑक्सीजन मशीन का प्रयोग करते समय साफ-सफाई का खास ध्यान रखना पड़ता है। मशीन की बोतल का पानी रोज न बदलने और ट्यूब की सफाई न करने से लंग्स में बैक्टीरियल या फंगल इन्फेक्शन होने का खतरा अधिक होता है। ऐसे मरीजों की इम्युनिटी पहले से ही कमजोर होती है इसलिए छोटी सी लापरवाही भारी पड़ सकती है।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 11:30:24 +0530</pubDate>
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                <title>असर खबर का : नवज्योति ने समाज में किया जागरूकता का संचार, स्कूलों में पहुंचा वन विभाग, कबूतरों से स्वास्थ्य नुकसान से किया रुबरु</title>
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                        <![CDATA[नवज्योति की खबरों को वन्यजीव विभाग ने बनाया अवेयरनेस कैम्पेन]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of-news---navjyoti-spread-awareness-in-the-society--forest-department-reached-schools--made-people-aware-of-the-health-hazards-caused-by-pigeons/article-127022"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(4)7.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कबूतरों के पंखों की फड़फड़ाहट व बीट से पनपने वाले बैक्ट्रीरिया से होने वाली जानलेवा बीमारियां को लेकर दैनिक नवज्योति ने लगातार खबरें प्रकाशित कर समाज व वन विभाग को जागरूक किया। नवज्योति में छपी खबर को  वन्यजीव विभाग कोटा ने अपना अभियान बनाकर जागरूकता कैम्पेन बना लिया। वन अधिकारी व कर्मचारी अब स्कूलों में पहुंच बच्चों को कबूतरों को दाना डालने से प्रकृति के ईको सिस्टम व स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान से रुबरु कर रहा है।  शोर्ट मूवी, खबरों की कटिंग के माध्यम से बच्चों को बुनियादी शिक्षा से ही जागरूक किया जा रहा है। वन्यजीव विभाग के डीएफओ अनुराग भटनागर ने नवज्योति के प्रयास सामाजिक सरोकार में सराहनीय है। उन्होंने बताया कि कबूतरों के पंख व बीट में जानलेवा बैक्ट्रीरिया होते हैं, जो हवा के साथ शरीर में प्रवेश करने से फेफड़ों में मधुमक्खी के छत्ते जैसे जाले और फाइब्रोसिस के खड्ढ़े बना देता है। इस पर दवाएं भी असर नहीं करती। ऐसी स्थिति में जान बचाने का एकमात्र विकल्प लंग्स ट्रांसप्लांट ही बचता है। </p>
<p>इधर, सीनियर चेस्ट फिजिशियन डॉ. केवल कृष्ण डंग कहते हैं, कबूतर की बीट और उसके पंख में थर्मोफिलिक एक्टिनोमाइ साइटिस सहित अन्य कीटाणु होते हैं, जो फेफड़ों पर बुरा असर डालते हैं। जो लोग कबूतर पालते हैं या जिनकी बालकनी, रोशनदान में कबूतर आते हैं, उन्हें एलर्जी का न्यूमोनिया होने का खतरा अधिक रहता है। जिसे हाइपरसेंसेटिव न्यूमोनाइटिस कहते हैं। यह रोग फेफड़ों की झिल्ली और श्वास नलियां खराब करता है। जिससे सांस में तकलीफ और खांसी होती है। अगर इसका तुरंत पता नहीं लगाया जाए तो फेफड़े खत्म हो सकते हैं। शरुआती दौर में खांसी बुखार जैसे लक्षण होते हैं, जो टीबी जैसे लगते हैं। भारत में बच्चों में यह बीमारी नहीं के बराबर होती है। लेकिन गत वर्ष 10 वर्षीय बच्ची का जो केस आया, वो मैंने अपने कॅरिअर में पहला मामला देखा।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Sep 2025 16:07:44 +0530</pubDate>
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                <title>अलर्ट: रोजाना 6 सिगरेट पीने को मजबूर हो रहे कोटावासी</title>
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                        <![CDATA[शहर में एक्यूआई का लेवल 210 पर पहुंचा ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/alert--kota-residents-forced-to-smoke-6-cigarettes-daily/article-102060"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-01/untitled-design9.png" alt=""></a><br /><p>कोटा।  मौसम में बदलाव का दौर जारी है। ऐसे में कोटा शहर की आबो हवा इन दिनों दूषित हो रही है। शहर में शुक्रवार को  एयर क्वालिटी डंडेक्स (एक्यूआई)  210 दर्ज किया गया। यानी यहां की हवा इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि रोजाना 6 सिगरेट पीने बराबर धुआं कोटावासियों के फेफड़ो में सांस के जरिए जा रहा है। इस समय वातावरण में इतना प्रदूषण व्याप्त हो रहा है कि बिना सिगरेट पीने वाले व्यक्ति की सांसों में उतना ही प्रदूषण घुल रहा है, जितना 6 सिगरेट पीने से धुआं शरीर में जाता है। इससे अब  शहरवासियों में विभिन्न घातक बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अधिकारियों के अनुसार सर्दियों में एयर क्वालिटी की स्थिति बेहद खराब रहती है। इस समय मौसम में बदलाव के कारण हवा पूरी गति से नहीं चल रही और कोहरे की वजह से हवा में मौजूद प्रदूषण के कण वायुमंडल में नहीं जा पा रहे है। ऐसे में वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ा हुआ है।</p>
<p><strong>एक्यूआई का कौनसा स्तर कितनी सिगरेट पीने बराबर</strong><br />यदि वायु प्रदूषण के स्तर की तुलना सिगरेट के धुएं से करें तो आंकड़े चौंकाने वाले हैं। यदि एक्यूआई 500 या उससे अधिक है इसका मतलब है प्रदूषण का लेवल गंभीर स्तर पर पहुंच गया है और 30 से अधिक सिगरेट पीने के बराबर धुआं आपके शरीर में पहुंच रहा है। वहीं, 450-500 एक्यूआई 25-30 सिगरेट और 401-450 एक्यूआई16-20 सिगरेट पीने के बराबर है। इसके अलावा 301-400 लेवल पर 11-15 और 201-300 एक्यूआई पर शरीर में जो धुआं पहुंचता है वो 6-10 सिगरेट पीने के बराबर है। इसके अलावा 101-200 लेवल पर 3-5 और 51-100 एक्यूआई लेवल 1-2 सिगरेट पीने के बराबर है। 0-50 एक्यूआई लेवल को अच्छा माना जाता है। इस समय कोटा में एक्यूआई 210 है यानी 6 सिगरेट पीने बराबर धुआं हमारे शरीर में जा रहा है।</p>
<p><strong>प्रदूषण से कई बीमारियों का खतरा</strong><br />चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार वाहनों से निकलने वाले धुएं में अनगिनत नैनो पार्टिकल्स होते हैं, जिनके हवा के साथ शरीर में प्रवेश करने से कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। जिसमें  खांसी, सिर में दर्द, जी-मिचलाना, घबराहट होना, आंखों में जलन, दिल से संबंधित बीमारियां, दिमाग,  फेफड़े,  हृदय,  गुर्दे,  फेफड़े के कैंसर, सांस अटैक, दमा, एलर्जी सहित कई बीमारियों का खतरा बना रहता है। सड़कों पर बेधड़क दौड़ रहे खटारा वाहनों से निकलने वाला काला धुआं अपने पीछे गंभीर बीमारियां छोड़ रहा है, जिससे राहगीरों पर सांस के अटैक से लेकर आंखों में सूजन तक कई गंभीर बीमारियों का खतरा रहता है। इन खतरों से बचने के लिए व्यक्ति को मास्क का उपयोग करना चाहिए।</p>
<p><strong>ये हैं साफ हवा के दुश्मन</strong><br /><strong>ग्राउंड लेवल ओजोन:</strong> ग्राउंड लेवल ओजोन भी वायु प्रदूषक है। यह पृथ्वी के वायुमंडल में नाइट्रोजन ऑक्साइड और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों के बीच सूरज की रोशनी में केमिकल रिएक्शन से बनता है। यह फोटोकेमिकल स्मॉग का एक बड़ा फैक्टर है और जो आंख, नाक और गले में जलन की वजह बन सकता है।<br /><strong>पार्टिकुलेट मैटर:</strong> यह कई चीजों का मिश्रण होता है। इनमें अकार्बनिक आयन, धातु यौगिक, मौलिक कार्बन, कार्बनिक यौगिक हो सकते हैं। पर्टिकुलेट मैटर दो तरह केपीएम-2.5 और पीएम-10.0 होते हैं। पीएम 2.5 वो सूक्ष्म कणों का समूह होता, जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या इससे कम है। वहीं 10 माइक्रोमीटर या इससे कम डायमीटर वाले सूक्ष्म कण को पीएम-10 कहते हैं।<br /><strong>कार्बन मोनोऑक्साइड:</strong> यह एक रंग, गंध और स्वादहीन गैस है। यह गैस कार्बन वाले ईधन के जलने पर निकलती है। जैसे- वाहन, बिजली संयंत्र, आग, तेल या गैस से चलने वाली भट्टियां, गैस ओवन, चारकोल ग्रिल और लकड़ी के जलने पर यह निकलती है और सांस के जरिए शरीर में पहुंचती है।<br /><strong>सल्फर डाईऑक्साइड:</strong> सल्फर डाईऑक्साइड यानी रंगहीन और जहरीली गैस होती है। यह सल्फर और ऑक्सीजन से मिलकर बनती है। तेल या कोयला जलने पर यह गैस बनती है और वायुमंडल में जाकर हवा को दूषित करती है।</p>
<p> शहर में वायु प्रदूषण के कारण बुजुर्गो को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। सुबह के समय मार्निंग वॉक के दौरान भी सड़कों पर प्रदूषण होना चिंताजनक है। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार और जनप्रतिनिधियों को विशेष प्रयास करने चाहिए ताकि आमजन स्वच्छ हवा में सांस ले सकें। <br /><strong>-बलबीर कुमार, सीनियर सिटीजन</strong></p>
<p> वायु प्रदूषण का स्तर बीमारियों को बढ़ावा देता है। वाहनों के कारण शहर के चौराहों पर प्रदूषण का ज्यादा होता है। ऐसे में यहां से निकलने वाले लोगों को बीमारियों की संभावना अधिक होती है। सौ से ऊपर एक्यआई होना यानी कई सिगरेट पीने के बराबर धुआं शरीर में समा रहा है। <br /><strong>-डॉ. के. के. डंग, श्वास रोग विशेषज्ञ</strong></p>
<p> </p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Jan 2025 16:02:35 +0530</pubDate>
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                <title>ये लक्षण दिखते ही समझ जाएं डैमेज हो गए हैं आपके फेफड़े</title>
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                        <![CDATA[सीओपीडी के लक्षण आमतौर पर तब ही दिखते हैं जब फेफड़ों को काफी नुकसान पहुंच चुका होता है,अगर कोई लगातार स्मोकिंग करता रहता है तो समय के साथ यह समस्या और भी ज्यादा बढ़ने लगती है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/health/as-soon-as-you-see-these-symptoms-understand-that-your/article-30305"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-11/556.jpg" alt=""></a><br /><p>क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज को सीओपीडी के नाम से भी जाना जाता है, इस समस्या के दौरान फेफड़ों के वायुमार्ग सिकुड़ जाते हैं, जिस वजह से सांस लेने में परेशानी आती है। ऐसा होने पर शरीर के अंदर से कार्बन डाई ऑक्साइड बाहर नहीं निकल पाती। लंबे समय से जारी खांसी, बलगम का बहुत अधिक मात्रा में बननाए सांस लेने में दिक्कत, थकान, बिना किसी कारण के वजन कम होना, ये सभी आम लक्षण हैं, समय पर पता लगा लिया जाए तो इस बीमारी से निजात पाया जा सकता है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं में इस बीमारी के विकसित होने की संभावना अधिक होती है। </p>
<p><strong>लक्षणों को ना करें इग्नोर  </strong><br />सीओपीडी के लक्षण आमतौर पर तब ही दिखते हैं जब फेफड़ों को काफी नुकसान पहुंच चुका होता है,अगर कोई लगातार स्मोकिंग करता रहता है तो समय के साथ यह समस्या और भी ज्यादा बढ़ने लगती है,समस्या से छुटकारा पाने के लिए जरूरी है कि आप समय रहते इसके संकेतों को पहचाने ताकि इस बीमारी का इलाज किया जा सके। लंबे समय से खांसी या कफ का होना ,सीओपीडी की समस्या ऐसे में व्यक्ति को लगातार पूरे दिन खांसी की समस्या का सामना करना पड़ता है, अगर आपको 4 से 8 हफ्तों से ज्यादा कफ की समस्या का सामना करना पड़ रहा है तो यह सीओपीडी का शुरुआती लक्षण हो सकता है।</p>
<p>सीओपीडी का दूसरा मुख्य लक्षण बहुत अधिक बलगम का बनना है,अगर आपके बलगम का रंग पीला या हरा नजर आता है तो यह किसी इंफेक्शन की ओर इशारा करता है। सीओपीडी का तीसरा मुख्य लक्षण सांस लेने में दिक्कत का होना है,काफी देर तक चलने के बाद या चढ़ाई चढ़ने के बाद अगर आपको पूरे दिन थकावट महसूस होती है तो यह इस ओर इशारा करता है कि आपके फेफड़े कमजोर हो रहे हैं।</p>
<p>सीओपीडी का चौथा मुख्य कारण बिना किसी वजह के वजन का लगातार कम होना है,अगर आपका भी वजन बिना किसी कारण के लगातार कम होता जा रहा है तो जरूरी है कि आप डॉक्टर से संपर्क करें। सीओपीडी का खतरा उन लोगों में सबसे ज्यादा पाया जाता है जो सिगरेट या तंबाकू क सेवन ज्यादा मात्रा में करते हैं, इसका एक और मुख्य कारण प्रदूषण, धुएं के संपर्क में ज्यादा रहना या  केमिकल के संपर्क में रहना भी हो सकता है। </p>]]>
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                                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 21 Nov 2022 12:35:16 +0530</pubDate>
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                <title> आंखों से फेफड़ों तक चोट पहुंचा रहे धूल के कण</title>
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                        <![CDATA[ शहर में जगह-जगह हो रहे निर्माण कार्य व सीवरेज पाइप लाइन डालने के लिए खोदी गई सड़कों के कारण धूल के गुबार उड़ रहे हैं। धूल-धुएं से जहां वायु प्रदूषण बढ़ता है। वहीं, इसका सीधा असर फेफड़ों पर पड़ता है। लेकिन, अब ये धूल लोगों की आंखों पर भारी पड़ रही है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/dust-particles-are-causing-damage-from-eyes-to-lungs/article-9867"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/eyes-to-lungs-dust-particals-copy.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहर में जगह-जगह हो रहे निर्माण कार्य व सीवरेज पाइप लाइन डालने के लिए खोदी गई सड़कों के कारण धूल के गुबार उड़ रहे हैं। सबसे ज्यादा बुरे हाल डामर की सड़कों के हैं। बारीक गिटटी लोगों को ज्यादा परेशान करती है। धूल-धुएं से जहां वायु प्रदूषण बढ़ता है। वहीं, इसका सीधा असर फेफड़ों पर पड़ता है। लेकिन, अब ये धूल लोगों की आंखों पर भारी पड़ रही है। पिछले कुछ महीनों में आंखों से जुड़ी बीमारियों के मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है।<br /><br />एमबीएस अस्पताल की ओपीडी में ही सामान्य दिनों के मुकाबले इन दिनों ज्यादा मरीज पहुंच रहे हैं। इनमें आंखों में इंफेक्शन और एलर्जी के साथ ड्राय आइज के मामलों में 10 से 15 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हुई है। चिकित्सकों के मुताबिक ऐसे लोग जो ज्यादा बाहर रहते हैं, उनमें यह समस्या अधिक है। एमबीएस में इन दिनों आंखों की समस्या से जुड़े करीब 200 मामले आ रहे हैं। <br /><br /><strong>धूल के कणों से खतरा</strong><br />नेत्ररोग विशेषज्ञ डॉक्टर युनूस खान ने बताया कि धूल के पार्टिकल आंखों की कार्निया पर जाकर चिपक जाते हैं, जिससे आंखों को नुकसान पहुंच सकता है। वहीं, आंखों में घाव होने से इंफेक्शन का खतरा भी बढ़ जाता है। वैसे आंखें लाल होने के और भी कई कारण हैं। लेकिन, इन दिनों धूल-मिटटी से लाल आंखें होने के 4 और कंकर जाने के 5 केस प्रतिदिन आ रहे हैं। जबकि, पहले इन समस्याओं के मरीजों की संख्या इक्की-दुक्की ही रहती थी। इसके अलावा समान्य आंखों की समस्याओं के 50 से 60 मामले प्रतिदिन आ रहे हैं। यह आंकड़ा एक क्लिनिक का है। ऐसे शहरभर में कई हॉस्पिटल व क्लिनिक है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है नुकसान किस हद तक बढ़ रहा है। एलर्जी व ड्राय आईज जैसी समस्याओं से बचने के लिए आंखों पर चश्मा पहने ताकि आंखों में धूल-मिटटी न जा सके। <br /><br /><strong>आंखों में सूजन और अंदरूनी समस्याएं भी</strong> <br />एमबीएस अस्पताल के नेत्ररोग विशेषज्ञ डॉक्टर अशोक मीणा बताते हैं कि इन दिनों मौसम बदल रहा है। सड़कों पर धूल है और हवा में भी नमी नहीं है। ऐसे में आंखों में समस्याएं बढ़ रही है। इन दिनों आंखों में खुजली, सूजन, पलक के अंदर वाली लेयर यानी कंजंक्टाइवा में भी इंफेक्शन आ रहा है। बार-बार आंखों को हाथ लगाने से कंजक्टिवाइटिस और पानी सूखना यानी ड्रायआईज के मरीज ज्यादा आ रहे हैं। <br /><br /><strong>इन बातों का रखें ख्याल</strong><br />- दो पहिया वाहन चालक चश्मे का उपयोग करें और हो सके तो हेलमेट जरूर पहनें। <br />-  हाथों को साफ करते रहें और बार-बार आंखें न छुएं।<br />-  आंखों को ठंडे पानी से धोते रहें।<br />- आंखें लाल होने, पानी आने या चुभन महसूस होने पर डॉक्टर की सलाह जरूर लें।<br />- धूल और भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर जाने से बचें। <br /><br /><strong>फेफड़ों की झिल्लियों को नष्ट कर सकते हैं धूल के बारीक कण</strong><br />सड़कों की खुदाई व क्षतिग्रस्त मार्ग से वाहनों के गुजरने के दौरान उड़ने वाली धूल फेफड़ों के लिए घातक होती है। क्योंकि यह महीन कण होते हैं जो सांस के साथ सीधे फेफड़ों की झिल्लियों पर चिपक जाते हैं। इनसे झिल्लयां नष्ट होने का खतरा बढ़ जाता है। यह उन लोगों के लिए घातक होता है, जो पहले से ही एलर्जी व अस्थमा से पीड़ित होते हैं। हालांकि गर्मियों में अस्थमा कंट्रोल रहता है लेकिन धूल-मिटटी के सम्पर्क में आने के बाद समस्या और अधिक बढ़ जाती है। ऐसे में जहां निर्माण कार्य चल रहे हों वहां से गुजरने के दौरान मास्क लगाा चाहिए।<br /><strong>- राजेंद्र ताखर, श्वांस रोग विशेषज्ञ, मेडिकल कॉलेज कोटा</strong></p>]]>
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                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 May 2022 15:42:06 +0530</pubDate>
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