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                <title>दौसा और बूंदी में चप्पल पर छिड़ा चुनावी संग्राम : निर्दलीय बोले-हमें ये निशान नहीं चाहिए, बदलो चुनाव चिन्ह</title>
                                    <description><![CDATA[निकाय चुनाव में दौसा और बूंदी के कुछ निर्दलीय प्रत्याशियों को चुनाव चिन्ह के रूप में चप्पल मिलने से नाराजगी। प्रत्याशियों ने निशान बदलने की मांग उठाई। उनका कहना है कि चप्पल को शुभ नहीं मानते और जनता के बीच इसे लेकर वोट मांगने में असहजता होगी। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/election-war-broke-out-over-slippers-in-dausa-and-bundi/article-164720"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-09/111200-x-600-px)18.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। निकाय चुनाव में उम्मीदवार वोट मांगने के लिए गलियों की खाक छान रहे हैं, लेकिन दौसा ओर बूंदी में कुछ निर्दलीय प्रत्याशियों के लिए चुनावी सफर शुरू होने से पहले ही चप्पल सिरदर्द बन गई है। चुनाव चिन्ह के रूप में चप्पल मिलते ही कई प्रत्याशियों की त्यौरियां चढ़ गईं। अब उनका कहना है कि जनता से वोट मांगने जाएंगे तो हाथ में चप्पल लेकर कैसे जाएं, निशान बदलवाओ! मामला राज्य निर्वाचन आयोग की चुनाव चिन्ह सूची से जुड़ा है। निर्दलीय प्रत्याशियों के मुताबिक आयोग की सूची में अलमारी पहले और चप्पल दूसरे नंबर पर है। चुनाव चिन्ह आवंटन की प्रक्रिया में इसी क्रम के चलते कई उम्मीदवारों के हिस्से में चप्पल आ गई। बस फिर क्या था, चुनावी मैदान में उतरने से पहले ही प्रत्याशियों का मूड ऑफ हो गया। उम्मीदवारों का तर्क है कि चुनाव में निशान ही उनकी पहचान बनता है। ऐसे में अगर मनपसंद चिन्ह न मिले और ऊपर से ऐसा निशान मिल जाए जिसे वे शुभ नहीं मानत, तो परेशानी होना स्वाभाविक है।</p>
<p><strong>चप्पल देखकर प्रत्याशियों का पारा चढ़ा :</strong></p>
<p>निर्दलीय प्रत्याशियों ने चुनाव चिन्ह बदलने की मांग उठाते हुए कहा कि नामांकन के समय उन्होंने अपनी पसंद के चिन्ह मांगे थे। उनका सवाल है कि जब उन्होंने चप्पल को पसंद में चुना ही नहीं, तो फिर उनके हिस्से में यही निशान क्यों आया। उम्मीदवारों का कहना है कि चुनाव चिन्ह महज एक निशान नहीं होता, बल्कि मतदाताओं के बीच प्रत्याशी की पहचान बन जाता है। इसलिए वे ऐसा चिन्ह चाहते हैं, जिसे लेकर वे पूरे उत्साह के साथ जनता के बीच जा सकें।</p>
<p><strong>पसंद का निशान मांगा, लेकिन सूची ने दे दी चप्पल :</strong></p>
<p>नामांकन के दौरान कुछ प्रत्याशियों ने अपनी पसंद के अलग-अलग चुनाव चिन्ह भर दिए थे। लेकिन पेंच यहां फंस गया कि उनके पसंद किए गए कुछ निशान राज्य निर्वाचन आयोग की निर्धारित 40 चुनाव चिन्हों की सूची में थे ही नहीं। ऐसे में रिटर्निंग अधिकारी के पास भी विकल्प सीमित थे। आयोग की सूची में जो चिन्ह उपलब्ध हैं, उसी के आधार पर आवंटन किया जा रहा है।</p>
<p><strong>नियम के हिसाब से ही बंट रहे निशान :</strong></p>
<p>मामले पर दौसा रिटर्निंग अधिकारी संजू मीणा ने स्पष्ट भी किया कि चुनाव चिन्हों का वितरण राज्य निर्वाचन आयोग की गाइडलाइन के अनुसार किया जा रहा है। उपलब्ध चुनाव चिन्हों की सूची में जो क्रम तय है, उसी आधार पर प्रत्याशियों को चिन्ह आवंटित किए जा रहे हैं। यानी फिलहाल प्रत्याशियों की नाराजगी अपनी जगह और आयोग के नियम अपनी जगह। अब देखना दिलचस्प होगा कि दौसा और बूंदी की चप्पल चुनावी मैदान में उतरती है या प्रत्याशियों की मांग पर इसका रंग-रूप बदलता है। फिलहाल इतना जरूर है कि निकाय चुनाव में इस बार वोट से पहले ही चप्पल ने खूब चर्चा बटोर ली है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 10:23:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जीवट के ज्वलंत प्रतीक कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी</title>
                                    <description><![CDATA[राजपूताने के लोग अब ब्रिटिश सरकार एवं जागीरदारों की तिहरी गुलामी में पिस रही थी, तब नवज्योति का प्रकाशन नवजागरण एवं नवजीवन का शंखवाद था।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/captain-durgaprasad-chaudhary-the-vivid-symbol/article-13189"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/454465.jpg" alt=""></a><br /><p>राजपूताने के लोग अब ब्रिटिश सरकार एवं जागीरदारों की तिहरी गुलामी में पिस रही थी, तब नवज्योति का प्रकाशन नवजागरण एवं नवजीवन का शंखवाद था। रियासती भारत के लोग गुलामी में तड़प रहे थे, तब उनकी आकांक्षाओं को स्वर और स्वरूप देना विद्रोह का विगुल बजाना ही था। तब अजमेर न केवल ब्रिटिश शासित प्रदेश अजमेर-मेरवाड़ा, पड़ोस की मेवाड़, मारवाड़ और जयपुर आदि महत्वपूर्ण रिययासतों की राजनैतिक गतिविधियों का भी केन्द्र थी। अंग्रेजी राज में राष्ट्रीय विचारधारा का पत्र निकालना आसान काम नहीं था। रियासतों में तो ऐसे पत्रों का पढ़ना भी राजद्रोह माना जाता था। उस समय अखबार निकालना अत्यन्त कठिन कार्य था। विदेशी हुकूमत थी, आजादी के लिए लड़ाई लड़ी जा रही थी। राजस्थान के देशी रियासतों के बीच अजमेर में अंग्रेजों की सीधी हुकूमत थी। वहां शासन के विरुद्ध अखबार निकालना, जनता को अधिकारों के लिये जागृत करना, विदेशी हुकूमत के कारनामों का पर्दाफास करना, जनता को आजादी की लड़ाई में कूदने का आह्वान करना, ये जटिल प्रश्न थे, जिनका बोझ साप्ताहिक नवज्योति के माध्यम से उठाया गया। जनता में हुकूमत के भय से नवज्योति को खरीदते और पढ़ते डर लगता था। ऐसी स्थिति में भी नवज्योति ने अजमेर मेरवाड़ा के साथ-साथ राजस्थान की रियासतों में आजादी का शंखनाद किया। नवज्योति ने इस पुण्य दिवस की गरिमा के अनुरूप ही, गांधीवादी विचारधारा का सार्थक प्रचार एवं प्रसार किया, स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय सहयोग दिया तथा रियासती तानाशही एवं जागीरदारी अत्याचारों का डट कर विरोध किया। जितनी ज्यादा कोशिश नवज्योति को बुझाने की की गई, उतनी ही वह ज्योति और प्रखर होती गई। नवज्योति को बन्द करने की जितनी ज्यादा तदबीर की गई, उतनी ही ज्यादा इसकी रणभेरी आजादी का अलख जगाने में गूंजती रही। नवज्योति की यह ओजमयी परम्परा एवं निर्भय अभिव्यक्ति सतत बनी रही।</p>
<p>राजस्थान सेवक-मण्डल ने श्री रामनारायण चौधरी के संपादन में अक्टूबर 1936 में नवज्योति में साप्ताहिक का अजमेर में प्रकाशन शुरू किया। 1941 में चौधरी वर्धा चले गए, तो पत्र की जिम्मेदारी उन्हीं के अनुज कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी ने सम्हाली। तब से नवज्योति और कप्तान साहब एक दूसरे के पर्यायवाची हो गये। नवज्योति को अंग्रेजी राज के दौरान कितनी बार सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा व उसके सम्पादक को कितनी बार जेल यात्रा करनी पड़ी, यह तो एक दिलचस्प कहानी है ही, पर इससे भी अधिक जीवटभरी कहानी है उनकी आर्थिक मोर्चों पर लड़ाई की। कप्तान साहब और उनके परिवार ने शुरू के 15 वर्षों की लम्बी लड़ाई में अपना सर्वस्व नवज्योति पर न्यौछावर कर दिया। नवज्योति का 56 वर्षों का जीवन निरन्तर प्रगति की और आगे बढ़ने की यशस्वी यात्रा है, तथा संघर्ष और विकास का लम्बा इतिहास है। नवज्योति का कालजयी जीवन समर्पण, त्याग, सेवा एवं दृढ़ संकल्पों की गाथा है। नवज्योति के संचालक एवं सम्पादक कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी स्वयं एक आदर्श स्वतंत्रता सैनानी थे, जिनका स्वतंत्रता संग्राम को आर्थिक योगदान रहा है। यह स्तुत्य है कि संचालक ने अपने बरतन-भांडे यहां तक कि साईकिल गिरवी रखकर, कर्जा लेकर, आर्थिक कष्ट सह कर भी नवज्योति को सतत् प्रज्जवलित रखा। प्रारंभिक दौर में नवज्योति को अपने अस्तित्व के लिये जो कड़ा संघर्ष करना पड़ा, वह राजस्थान में पत्रकारिता के इतिहास का एक प्रेरणादायक पृष्ठ है।</p>
<p>भरी जवानी में डूंगरपुर के भील क्षेत्र में, माणिक्य लाल वर्मा के साथ कप्तान दुर्गाप्रसाद ने जंगलों में रहकर आदिवासियों की सेवा का निर्णय लिया, तो उनकी सहधर्मिणी विमलादेवी भी तुरंत साथ हो लीं। वहां पर अपने पति के साथ भीलों में रचनात्मक कार्य करती थी और दिन भर धूप में पहाड़ों और जंगलों में भीलों के घर जाकर उनकी सेवा व उनका मार्ग-दर्शन करती थी और उन्हें खादी स्वावलंबन का कार्य सिखाती थी। आप वहां पांच प्राणियों सहित सिर्फ-दो रुपये महीने में गुजारा करती थी। आजादी के बाद इस कुटुम्ब को 10 वर्ष तक, 1947 से 1957 तक और भी अधिक भयंकर आर्थिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। दैनिक नवज्योति के संचालन में भारी नुकसान व कठिनाईयों व नाजुक आर्थिक स्थिति का सामना करना पड़ा। यहां तक कि एक वक्त के खाने के लाले भी पड़े रहते थे। एक दीपावली पर त्यौहार मनाने के लिए एक पैसा भी घर पर नहीं था। परन्तु सतत साधना और धैर्य के कारण नवज्योति 1948 में साप्ताहिक से दैनिक बना। इसके 12 वर्ष बाद 1960 में उसका संस्करण राजस्थान की राजधानी जयपुर में निकला। सन 1981 में वह कोटा से भी निकलने लगा। इसके बाद जोधपुर में 2004 में नवज्योति का प्रकाशन आरंभ हुआ। इस सफलता का श्रेय जाता है पत्र के संस्थापक संपादक स्व. कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी को। देशी रियासतों में होने वाले दमन और देश की स्वतंत्रता के लिए किये जाने वाले संघर्षों में इस पत्र ने अपनी  महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।</p>
<p>इसी उद्देश्य को लकर अपनी यात्रा प्रारम्भ करने वाले इस पत्र ने कई कठिन तथा संकटाकीर्ण मंजिलें पार की हैं। इस लम्बी यात्रा में स्व. दुर्गाप्रसाद चौधरी का साहस, लगन तथा उद्देश्य की प्राप्ति के लिए दृढ़निश्चय, आज की स्थिति तक पहुंचाने में सबसे बड़ा आधार रहा है। आज नवज्योति प्रदेश के जन-जीवन में एक विशष्ट स्थान रखता है। वर्तमान राजनीतिक संघर्ष में स्वाभाविक रूप से नवज्योति निरपेक्ष पत्र से यह आशा की जा सकती है कि वह किसी व्यक्ति या समय के प्रभाव से ऊपर उठकर, अपनी शानदार ऐतिहासिक परम्परा के अनुकूल जनता की अनुभूतियों को निडर तथा निष्पक्ष भाव से सामने लाता रहे। स्व. दुर्गाप्रसाद चौधरी का व्यक्तित्व सदैव ही जुझारू रहा, वे जन्मजात लीडर थे। दिसम्बर, 1932 में हंटूडी में कांग्रेस का हिन्दुस्तानी सेवादल द्वारा स्वयं सेवको ंंका एक कैम्प लगाया गया। दुर्गाप्रसाद चौधरी को स्वयं सेवकों की टोली का कप्तान नियुक्त किया गया था, तब से उन्हें सब लोग कप्तान कहकर सम्बोधित करने लगे और उन्होंने इस उपाधि के अनुसार ही कांग्रेस में, स्वयं सेवक दल का नेतृत्व संभाल कर युवकों को नमक कानून तोड़ने, विदेशी कपड़ों की होली जलाने, शराब का बहिष्कार करने आदि की प्रेरणा देकर विदेशी हुकूमत से संघर्ष करने के लिए तैयार किया। दुर्गाप्रसाद चौधरी के नेतृत्व में ब्रिटिश सरकार और रियासती शासकों के विरोध के बावजूद नवज्योति ने जन-साधारण की सेवा को अपना लक्ष्य बनाया। उसने एक ओर स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के लिये मित्र, पथ-प्रदर्शक का काम किया, तो दूसरी ओर गांधीवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार, स्वतंत्रता संग्राम में सहयोग तथा जागीरदारी अत्याचारों का विरोध किया। नवज्योति ने अपने प्रारंभिक काल में जिन कठिनाइयों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया है, उसके लिये उस के प्रधान सम्पादक, कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी को श्रेय जाता है, जिन्होंने अपने त्यागमय जीवन, स्थिर नीति, निडर अभिव्यक्ति और सतत सेवा से इसमें प्राण डालने में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रखी। इसका सुफल है कि नवज्योति वटवृक्ष की तरह फल-फूल रही है। कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी किस धातु के बने थे, उसका कुछ अंदाज उस समय के अजमेर के अंग्रेज कप्तान की गोपनीय रिपोर्ट में खुफिया टिप्पणी से लगती है।<br /><strong>- डॉ. जी.पी. पिलानिया</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jun 2022 11:09:14 +0530</pubDate>
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                <title>ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह में हिन्दू प्रतीक चिह्न होने का दावा</title>
                                    <description><![CDATA[देश में धार्मिक स्थलों को लेकर चल रहे विवादों के बीच अब महाराणा प्रताप सेना ने अजमेर स्थित विश्वविख्यात सूफी संत ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह में भी हिन्दू प्रतीक चिह्न होने का दावा किया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/jaipur-claim-to-be-hindu-symbol-mark/article-10527"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/46544545.jpg" alt=""></a><br /><p>अजमेर। देश में धार्मिक स्थलों को लेकर चल रहे विवादों के बीच अब महाराणा प्रताप सेना ने अजमेर स्थित विश्वविख्यात सूफी संत ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह में भी हिन्दू प्रतीक चिह्न होने का दावा किया है। संगठन ने मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार से पूरे मामले की जांच की मांग की है।  महाराणा प्रताप सेना के संस्थापक राजवर्धन सिंह परमार ने सोशल मीडिया पर एक पत्र और एक तस्वीर पोस्ट करते हुए उसे अजमेर की गरीब नवाज दरगाह के किसी हिस्से का बताया है। परमार ने कहा कि एक हफ्ते में जांच नहीं हुई, तो केंद्रीय मंत्रियों से मुलाकात करेंगे।</p>
<p><strong>पुलिस-प्रशासन सतर्क</strong><br />उधर पुलिस प्रशासन सतर्क हो गया। दोपहर में ही अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक वैभव शर्मा, अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट शहर भावना गर्ग, उपाधीक्षक वृत्त दरगाह रामावतार तुरंत दरगाह पहुंचे।</p>
<p><strong>वायरल फोटो दरगाह का नहीं : अंगारा </strong><br />अंजुमन मोईनिया फखरिया चिश्तिया के सचिव अंगारा ने कहा कि ख्वाजा साहब की दरगाह सभी धर्म के लोगों की आस्था का प्रतीक है। सोशल मीडिया पर जिस प्रकार से फोटो वायरल किया जा रहा है। वह दरगाह ख्वाजा साहब के किसी भी हिस्से का प्रतीत नहीं होता है। <br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 May 2022 11:15:44 +0530</pubDate>
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