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                <title>Editorial News - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>पूर्ण बहुमत वाली सरकार यानी जनता की जीत : नरेंद्र चौधरी</title>
                                    <description><![CDATA[यदि पूर्ण बहुमत की सरकार आने के बाद भी जनप्रतिनिधि वादों को पूरा करने से मना करते हैं तो यह जनता की जिम्मेदारी है की वह उनसे वादे पूरे करवाए। यह प्रजातंत्र है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/editorial--government-with-absolute-majority-means-victory-of-the-people--narendra-chaudhary/article-7192"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/chunav.jpg" alt=""></a><br /><p>हाल ही में पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में पूर्ण बहुमत प्राप्त सरकारों का आना जनता की जीत है। इससे जनता को ही फायदा होगा। क्योंकि पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनने पर जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है की वो जनता से किए वादों को पूरा करें। यदि पूर्ण बहुमत की सरकार आने के बाद भी जनप्रतिनिधि वादों को पूरा करने से मना करते हैं तो यह जनता की जिम्मेदारी है की वह उनसे वादे पूरे करवाए। यह प्रजातंत्र है। दूसरी ओर पूर्ण बहुमत नहीं आने की स्थिति में यदि त्रिशंकु सरकार आती है तो जनता का भला नहीं हो पाता है। जनता को ही इसका खामियाजा उठाना पड़ता है। ऐसी स्थिति में ना तो जनता के कार्य होते हैं और ना ही किसी राज्य या देश का विकास हो पाता है। क्योंकि त्रिशंकु सरकार अपनी ही कुर्सी को बचाने में लगी रहती है। जिस भी पार्टी की त्रिशंकु सरकार बनती है उन्हें यह अनिश्चितता रहती है कि कितने दिन, कितने माह, कितने साल हमारी सरकार सत्ता में रहेगी। ऐसे में उस पार्टी के जनप्रतिनिधि भी जनहित कार्यों में दिलचस्पी नहीं लेते हैं। वह अपने हाथ खड़े कर देते हैं और उनके पास जनता को कहने के लिए यह बहाना मिल जाता है कि हम आपके कार्य कैसे पूरे करवाएं। जनता ने पूर्ण बहुमत से हमें नहीं चुना। हम आपके कार्य करवाने में सक्षम नहीं है। जबकि होता यह है कि अल्पमत में रहते हुए भी जनप्रतिनिधि स्वयं के कार्यों को तो पूरा करवा लेते हैं किंतु जनता से किए वादों को पूरा करने में हाथ खींच लेते हैं। दूसरा, जब भी चुनाव आते हैं, सभी राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने चुनावी घोषणा पत्र जारी करती हैं। उसमें यह कोई नहीं लिखता कि त्रिशंकु सरकार आने की स्थिति में भी हम जनता के कामों को प्रमुखता से प्राथमिकता देंगे। चुनाव जीतने के लिए चुनाव से पहले तो पार्टियां व जनप्रतिनिधि लुभावने वादों की बात करते हैं। जनता को आश्वासन देते हैं कि सत्ता में आते ही हम वादे निभाएंगे। लेकिन वो सिर्फ कोरे वादे ही साबित होते हैं। त्रिशंकु सरकार बनने पर जनता से किए वादे तो पूरे होते नहीं हैं। बल्कि जनता के सिर ही ठीकरा फोड़ते हैं कि आपने ही त्रिशंकु सरकार दी है। जबकि पार्टी व जनप्रतिनिधि स्वयं का पूरा फायदा उठा लेते हैं। वह भूल जाते हैं कि आज जो भी पद-प्रतिष्ठा उन्हें मिल रही है जनता की वजह से ही मिल रही है। सत्ता में होने पर जो फायदा उठाते हैं वह भी जनता की वजह से ही है। सत्ता में आते ही उन्हें अपने हित नजर आने लगते हैं। वह भूल जाते हैं कि जनता से भी हमने वादे किए हैं। जब भी चुनाव आए जनता को त्रिशंकु सरकार की जगह पूर्ण बहुमत वाली सरकार को चुनना चाहिए। चाहे किसी भी राजनीतिक पार्टी को चुनें उसे पूर्ण बहुमत के साथ चुनकर लाएं। तभी जनता को फायदा होगा। अन्यथा त्रिशंकु और अल्पमत सरकार में चुने गए जनप्रतिनिधियों को जनता का कार्य नहीं करने का यह बहाना मिल जाएगा कि हमारी त्रिशंकु सरकार है। ऐसे में अन्य पार्टी पर कार्य ना होने की बात डाल कर जनता के कार्यों से बच कर खुद का पूरा फायदा उठा लेंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 Apr 2022 12:06:45 +0530</pubDate>
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                <title>पगड़ी ही राजमुकुट, पटरियां ही मेरा सिंहासन: त्रिभुवन</title>
                                    <description><![CDATA[पगड़ीधारी और लाठी वाला कद्दावर किसान सा दिखता आदमी और वह भी अंग्रेजी की किताब पढ़े और धोती भी खांटी अंदाज में बांधे तो सहसा आकर्षण का विषय ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/jaipur---editorial--turban-is-the-crown--the-tracks-are-my-throne--kirori-bainsla/article-7151"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/colonel-baisala.jpg" alt=""></a><br /><p>गुर्जर आंदोलन के दिनों से पहले की बात है। मैं भारतीय जनता पार्टी की बीट देखता था और वह पगड़ीधारी कई बार इस पार्टी के ऑफिस में कभी-कभार दिखता था। लेकिन एक दिन मैं उनकी तरफ सहसा खिंचा चला गया जब उस शख्स के सामने एक किताब दिखी। यह नेपोलियन की बायोग्राफी थी। किताब फिलिप ड्वायर की लिखी ‘नेपोलियन : दॅ पाथ टु पावर’ थी। एक पगड़ीधारी और लाठी वाला कद्दावर किसान सा दिखता आदमी और वह भी अंग्रेजी की किताब पढ़े और धोती भी खांटी अंदाज में बांधे तो सहसा आकर्षण का विषय हो ही जाता है। यह जिज्ञासा मेरी आधुनिक परिवेश की उस कुंठा से उपजती है कि आखिर कोई धोती-पगड़ी वाला ठेठ ग्रामीण किसान कैसे अंग्रेजी की बेहतरीन पुस्तक पढ़ सकता है। उन्होंने बताया था कि युवा नेपोलियन उनका नायक है और वे उन्हें सेना के शुरुआती समय से ही पढ़ते रहे हैं। कर्नल किरोड़ी सिंह बैसला से यह पहली मुलाकात थी। उस संक्षिप्त सी मुलाकात में उन्होंने जो बताया, वह उनके मानीखेज व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ कहता था। प्रजा की, देश की और शासन की बातें।</p>
<p><br />खेत का खलिहान हमारा सिंहासन है, वाले दर्शन को मानने वाले किरोड़ीसिंह इस प्रदेश की ऐसी शख्सियतों में एक हैं, जिन्होंने आंदोलन को भिक्षा और दयनीयता से निकालकर आत्मसम्मान से इतना लबरेज बनाया कि राजसिंहासन उनके सामने बार-बार झुके। वे फिराक गोरखपुरी की पंक्तियों ‘सूरज-चांद अंगड़ाई लेंगे और तारे अपनी गति बदलेंगे’ वाले दर्शन को अपने भीतर बसाए हुए आंदोलनकारी थे। उन्होंने अपने तपेतपाए सैनिक जीवन के अनुभवों को जनआंदोलनों से जोड़ा और एक नई इबारत लिखी। जो अफसर और राजनेता अपने घर आए लोगों को निरीह बनाकर रखते हैं और उनसे मिलने का समय तक नहीं देते, उन्हें बैसला ने लोकतंत्र की लोकशक्ति का नया पाठ पढ़ाया। जो आम आदमी को मिलने का समय नहीं देते हैं, घर और दफ्तर के बाहर दिनों चक्कर लगवाते हैं और मिलें तो दुत्कार कर भगा देते हैं, उन अफसरों को उन्होंने याचक की मुद्रा में लाकर आम लोगों के बीच रेल की पटरियों पर बुला लिया। इस सदी के महान कवि विनोद कुमार शुक्ल का कहना है कि एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर। नदी जैसे लोगों से मिलने मैं नदी के किनारे चला जाऊंगा। कुछ तैरूंगा और डूब जाऊंगा। बैसला ने अपनी तरह के आंदोलन को जीवंत किया और बताया कि लोक की ताकत क्या होती है। उन्होंने सत्ता की उफनती मदमाती नदी को रेल की पटरियों पर बुलवाया और कहा कि इसमें पहले डूबो तो तैरने की बात बाद में सोचना। बैसला के भीतर गोल्ड्सवर्थी के सीजर की परंपरा के किस्सों की अनुगूंज थी। उन्होंने युवा नेपोलियन की जीवनी पढ़ी और चर्चा करके छोड़ दी हो, ऐसा नहीं था। उन्होंने उसे अपने भीतर उतारा। नेपोलियन ने महज तीस साल में सत्ता को अपने हाथ में करके असंभव को संभव कर दिखाया था। बैसला के लिए भी आंदोलन न तो सुगम था और न अपरिहार्य; लेकिन उन्होंने राजस्थान के शासन तंत्र और प्रशासन तंत्र के भीतर के मिथकों को एक-एक कर कुचल दिया। वे एक जोशीले नेता थे और उनका जुनून जिस उम्र में उभरा, वह इस प्रदेश के युवा नेताओं के लिए बहुत ही रश्क करने वाला है। बैसला एक गहरे आंदोलनकारी थे। अपने समय के राजनेताओं के बारे में उनका दृष्टिकोण हैरानीजनक तटस्थ और परिपक्व था। उन्होंने तड़ीबाज राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के छक्के छुड़ाए और अपनी शर्तों पर नए नियम और नए कायदे-कानून बनवाए। नए रंग और नए ढंग बनवाए। उनकी ताकत का आलम यह था कि अपने आंदोलन वाले इलाकों के कई जिलों में वे कलेक्टरों और जिला स्तरीय अधिकारियों की बैठकें लिया करते थे और राज्य सरकार ने इसके लिए बाकायदा एक आदेश निकाला था। भले उनका यह समय कम रहा; लेकिन जितना भी रहा, वह ऐसा था कि समाज के लोगों को लगता था ‘अब पाप कटेगा, संताप हटेगा और जीवन बदलेगा।’ बैसला ने अपने तरीके के आंदोलनों से अपनी एक अलग छवि गढ़ी। युवा नेपोलियन की कामयाबियों को अपने भीतर बसाते हुए बैसला ने राजस्थान के आधुनिक आंदोलनों के इतिहास में अपने आपको एक आकर्षक और नए दृष्टिकोण वाले नेता के रूप में स्थापित किया। हम देखते हैं कि प्राय: सभी आंदोलनकारी हर समय सिस्टम को ‘अब्यूज’ करते हैं, लेकिन बैसला ने ‘अब्यूज’ करने के बजाय बहुत नफासत से उसकी मरम्मत की और उसे ‘यूज’ भी किया। राजस्थान में आंदोलनों के अथाह कुएं, झरने, नदियां और बावड़ियां हैं; लेकिन एक गहरी सूखी नदी से अथाह जल हासिल कर लेने वाला अंदाज सिर्फ उन्हीं के पास था। उन्हें न कोई मुख्यमंत्री झुका पाया और न कोई सुप्रीम पावर। यह उन्होंने जन आंदोलनों से हासिल किया थौं; लेकिन जैसे ही वे राजनीति में गए, प्रदेश के लोक हृदय के क्षितिज पर दमकते उनके व्यक्तित्व ने अपनी दुर्लभ आभा को खो दिया।<br />बैसला के व्यक्तित्व की एक अनूठी प्रतिमा लोगों के हृदय में बनी हुई है। उनके आंदोलनों को लेकर सहमतियां-असहमतियां बनी रहेंगीैं;  लेकिन उनके आंदोलन ने पिरामिड की सी उम्र पाई है। जन आंदोलनों के सामने सरकारें बल्लियां लगाती हैं, शूल बिछाती हंै और तरह-तरह के मुकदमे दर्ज करती हैं; लेकिन बैसला ने रेल की पटरियों पर बैठकर सत्ता के शक्ति केंद्रों के तौर-तरीकों को बुलबुले की हैसियत में ला दिया। सरकारी तंत्र और राजसत्ता में बैठे राजनेता महीनों-वर्षों तक शांतिपूर्वक चलने वाले धरनों-प्रदर्शनों पर ध्यान नहीं देते हैं। यह हर दिन हर सरकार और हर विचार में देखने वाला सच है। लेकिन बैसला ने सिद्ध किया कि नवोदित तृणों के स्पर्श से भी सरकारों और प्रशासन तंत्र की रीढ़ को हिलाया जा सकता है और वह भी लोकतांत्रिक सभ्यता के खंडहरों में जनआंदोलनों की परंपरा के धराशायी होकर सिसकने के करुण समय में। <br />          <strong>  -त्रिभुवन </strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong><br /><br /><span style="color:#ff0000;">उन्होंने अपने तपेतपाए सैनिक जीवन के अनुभवों को जनआंदोलनों</span> से जोड़ा और एक नई इबारत लिखी। जो अफसर और राजनेता अपने घर-दफ्तर आए लोगों को निरीह बनाकर रखते हैं और उनसे मिलने का समय तक नहीं देते, उन्हें बैसला ने लोकतंत्र की लोकशक्ति का नया पाठ पढ़ाया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Apr 2022 14:14:32 +0530</pubDate>
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                <title>हवा में जहर</title>
                                    <description><![CDATA[दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख अपनाने के बाद चेती दिल्ली सरकार ने बड़ी कार्रवाई करते हुए एक बार फिर स्कूलों को एक हफ्ते तक बंद करने का फैसला लिया है। इसके अलावा सरकारी कर्मचारियों से घर से ही काम करने को कहा गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/%E0%A4%B9%E0%A4%B5%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A4%B0/article-2439"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-11/polution_sc1.jpg" alt=""></a><br /><p>दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख अपनाने के बाद चेती दिल्ली सरकार ने बड़ी कार्रवाई करते हुए एक बार फिर स्कूलों को एक हफ्ते तक बंद करने का फैसला लिया है। इसके अलावा सरकारी कर्मचारियों से घर से ही काम करने को कहा गया है। निजी संस्थानों को भी ऐसा कदम उठाने को कहा है। इसके अलावा दिल्ली में निर्माण गतिविधियों को तीन दिन के लिए प्रतिबंधित किया गया है। ऐसा नहीं है कि दिल्ली में पहली बार ही प्रदूषण का संकट गहराया है, बल्कि पिछले कई सालों से अक्टूबर-नवंबर के महीने में हवा में जहर घुलने का सिलसिला चल रहा है। दिल्ली सरकार ने पिछले सालों में प्रदूषण पर नियंत्रण पाने के कई प्रयोग किए हैं, लेकिन कोई अपेक्षित नतीजा नहीं निकला। दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है और यहां से केन्द्रीय सत्ता भी चलती है, लेकिन केन्द्र सरकार दिल्ली के प्रदूषण को लेकर गंभीरता नहीं दिखाती। अक्सर हर साल दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण की जिम्मेदारी पड़ोसी राज्यों के किसानों के कंधों पर कह दिया जाता है कि उनके पराली जलाने से हवा में धुआं घुल जाता है जिसकी वजह से प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट वैज्ञानिक अध्ययन का हवाला देते हुए मान लिया है कि पराली के धुएं का केवल 30 प्रतिशत ही योगदान है, जबकि 70 प्रतिशत अन्य स्थानीय कारणों से प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है। दिल्ली के बढ़ते प्रदूषण की वजह से आसपास के राज्यों पर पड़ रहा है। खबर है कि राजस्थान की राजधानी जयपुर, कोटा, उदयपुर के अलावा भिवाड़ी का प्रदूषण स्तर भी काफी बिगड़ा हुआ है। राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश के कई बड़े शहरों की आबोहवा अच्छी तरह सांस लेने वाली नहीं रह गई है। प्रदूषण दिल्ली का ही नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय संकट बन चुका है, जिससे केन्द्र सरकार को ही कोई ठोस योजना बनानी होगी और प्रदूषण से मुक्ति दिलानी होगी। हकीकत यह है कि प्रदूषण को लेकर राज्य सरकारें और केन्द्र की सरकार कतई गंभीर नहीं हैं। समय रहते ही आवश्यक कदम उठा लिए जाते तो दिल्ली ही नहीं, बल्कि हर शहर को प्रदूषण का ज्यादा दंश नहीं झेलना पड़ता। सरकारें एक्शन प्लान बनाती जरूर है, लेकिन क्रियान्वयन पर ध्यान नहीं दिया जाता, जिसका खामियाजा जनता को भुगतना होता है और अनेक प्रकार की बीमारियों की पीड़ा झेलनी पड़ती है। केन्द्र व राज्यों को कारगर योजना बनानी चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Nov 2021 14:56:46 +0530</pubDate>
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                <title>75 साल बाद भी 80 करोड़ को मुफ्त राशन देने की जरूरत?</title>
                                    <description><![CDATA[देश की बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है। आजादी से लेकर अब तब देश से गरीबी का उन्मूलन नहीं हो सका है। यह जानकर हैरानी होती है कि 75 साल बाद भी 80 करोड़ जनसंख्या गरीब है। सरकार प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत देश के 80 करोड़ गरीबों को दीपावली तक मुफ्त अनाज देगी। 75 वर्षों में ऐसी स्थिति क्यों आई की देश के 80 करोड़ लोगों के लिए दो वक्त के भोजन की व्यवस्था सरकार को करनी पड़ रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/75-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%AD%E0%A5%80-80-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A5%9C-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%AB%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A4%A8-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9C%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4%A4/article-1291"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-07/ration.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>@नरेंद्र चौधरी</strong><br /> देश की बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है। आजादी से लेकर अब तब देश से गरीबी का उन्मूलन नहीं हो सका है। यह जानकर हैरानी होती है कि 75 साल बाद भी 80 करोड़ जनसंख्या गरीब है। सरकार प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत देश के 80 करोड़ गरीबों को दीपावली तक मुफ्त अनाज देगी। 75 वर्षों में ऐसी स्थिति क्यों आई की देश के 80 करोड़ लोगों के लिए दो वक्त के भोजन की व्यवस्था सरकार को करनी पड़ रही है। इतने वर्षों में गरीबी उन्मूलन के लिए जितना धन खर्च हुआ उसका क्या हुआ? वह धन डायरेक्ट या इनडायरेक्ट रूप से आयकर दाताओं का ही था। एक ही समस्या के लिए क्या आयकरदाता जिंदगी भर पैसा देते रहेंगे उन्हें क्या हर साल पैसा देना पड़ेगा जबकि गरीबी उन्मूलन आज तक नहीं किया गया। 80 करोड़ गरीब अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं रोटी, कपड़ा और मकान से वर्तमान में भी ऊपर नहीं उठ पाए हैं, इनकी आय का स्तर इतना कम है कि भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ है। दो वक्त की रोटी जुटा पाने में इनकी जिंदगी निकल जाती है। उसी में इतने उलझे रहते हैं तो शिक्षित कैसे हो पाएंगे। <br /> <br /> जब इतनी आबादी शिक्षित नहीं हो पाएंगी तो देश का विकास कब व कैसे होगा? देश के फैसले में इनकी भागीदारी नहीं हो पाती है। बड़े मुद्दों पर निर्णय लेने में इनकी राय नहीं आ पाती है। ओपिनियन बिल्डिंग में इनका कोई सहयोग ही नहीं है। 80 करोड़ यानी 57 प्रतिशत आबादी की महत्वपूर्ण मुद्दों पर भागीदारी नहीं मिलती, कैसे तरक्की होगी देश में...? यदि 80 करोड़ शिक्षित होंगे तो देश का भविष्य और विकास की दिशा ही बदल जाएगी, क्योंकि यह अपने अधिकारों के बारे में जागरुक हो जाएंगे। अभी ये अपने अधिकारों के बारे में जानते नहीं है। सरकार एजुकेशन के नाम पर एजुकेशन सेस भी ले रही है। वह पैसा  भी कहां जा रहा है? गरीबी उन्मूलन समस्या के लिए बार-बार पैसा लिया जाता है लेकिन आज तक इतनी सरकारें आईं और गईं, किसी का भी यह एजेंडा नहीं रहा कि हम इतने समय अवधि में देश से गरीबी का उन्मूलन कर देंगे। इस बात की आज तक किसी ने गारंटी नहीं दी। यह समस्या सिर्फ अकेले ना तो केंद्र सरकार की है, और ना ही राज्य सरकारों की है। यह सबकी समस्या है। इस पर राज्य व केंद्र सरकार दोनों को मिलकर काम करना चाहिए? <br /> <br /> विश्व में बड़े-बड़े अर्थशास्त्री और बुद्धिजीवी हैं। उनसे इस मसले पर चर्चा की जानी चाहिए। वह पूरा प्लान बताएं कि इतनी समय अवधि में संपूर्ण देश से गरीबी उन्मूलन कर दिया जाएगा और उसके लिए इतना धन लगेगा। गरीबी हटाओ का नारा तो 1971 में दिया गया था इसके बावजूद आज भी गरीबी नहीं हटाई जा सकी। गरीबी देश के लिए नुकसानदायक ही है। गरीबी दूर होगी तो अपराध भी घटेंगे। भूख से जब इन्हें निजात मिलेगी तो शिक्षित होने के बारे में सोच पाएंगे क्योंकि भूखे पेट पढ़ाई भी नहीं होती है। भूख ही है जो आपराधिक गतिविधियों के दलदल में धकेलती है। वहीं दूसरी ओर देश की राजनीति भी गरीबों को अशिक्षित और गरीब बनाए रखना चाहती है जिससे राजनीति चलती रहे। जब गरीबी हटेगी और शिक्षा का स्तर बढ़ेगा तो देश उन्नति कर पाएगा। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 29 Jul 2021 17:34:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास?</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में एक बार नाथी का बाड़ा चर्चा में है। हो भी क्यों ना हर कोई नेता नाथी का बाड़ा से ताल्लुकात रखे बिना नहीं रहते। इसके बिना उनकी पार भी नहीं पड़ती है। गुजरे जमाने में नाथी का बाड़ा केवल पाली जिले से ताल्लुकात रखता था लेकिन अब इसका थड़ा बदल कर सीकर के लक्ष्मणगढ़ इलाके में पहुंच गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-1263"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-06/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>एल एल शर्मा<br /> --------------------------</strong></p>
<p> </p>
<p><strong>चर्चा में नाथी का बाड़ा<br /> </strong>सूबे में एक बार नाथी का बाड़ा चर्चा में है। हो भी क्यों ना हर कोई नेता नाथी का बाड़ा से ताल्लुकात रखे बिना नहीं रहते। इसके बिना उनकी पार भी नहीं पड़ती है। गुजरे जमाने में नाथी का बाड़ा केवल पाली जिले से ताल्लुकात रखता था लेकिन अब इसका थड़ा बदल कर सीकर के लक्ष्मणगढ़ इलाके में पहुंच गया है। गोविन्द की मेहरबानी से ख्वाजा की नगरी तक इसका असर पड़ा। राज का काज करने वाले में चर्चा है कि जागीरदारों ने नाथी का बाड़ा वैसे ही नाम थोड़े ही दिया था, इसके लिए उनको दिन-रात पसीने बहाने पड़े थे। नाथी के बाड़े में कदम रखने से पहले आगा-पीछा सोचना पड़ता है, लेकिन इस बार लक्ष्मणगढ़ वाले भाई साहब ने सीना ठोक कर कदम रखा, तो बीकाजी की नगरी से गुलाबीनगर तक हलचल मच गई। अब भाई लोगों को कौन समझाए कि नाथी का बाड़ा में तो पहले भी कई बड़े साहबों के कदम पड़े थे, तब भी बाल भी बांका नहीं हुआ था, तो अब उम्मीद रखने से कोई लाभ नहीं है।<strong><br /> <br /> वो आए और चले गए<br /> </strong>सूबे में एक साल से चल रहे सियासी संकट को लेकर कई भाई लोगों की नींद उड़ी हुई है। वे दिन-रात दुबले हो रहे हैं। उनके चेहरों पर चिन्ता की लकीरें साफ दिखाई देने लगी हैं। गुटबाजी में फंसे हाथ वाले भाई लोगों के समझ में नहीं आ रहा कि आखिर माजरा क्या है। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर संडे को चर्चा थी कि आलाकमान के दोनों संदेशवाहक आए और चले गए। भाई लोगों ने सूंघासांघी भी खूब की, मगर बंद कमरों में क्या हुआ, किसी को पता नहीं चला। शनिवार तक उछलकूद कर रहे एक खेमे के लोगों को सांप सूंघ गया। अब वे कानाफूसी कर रहे हैं कि जब गोपालजी और अजय को कुछ करना ही नहीं था, तो हवा गर्म करने के पीछे कोई न कोई राज जरूर है। अब उनके अच्छी तरह समझ में आ गया कि राजनीति में जो होता है, वह दिखता नहीं है और जो दिखता है, वह होता नहीं है। इसलिए दोनों वाहक आए और संदेश देकर चले गए।<strong><br /> <br /> नाइट वॉच मैन भी...<br /> </strong>आजकल सरदार पटेल मार्ग पर स्थित बंगला नंबर 51 चर्चा का केन्द्र बना हुआ है। जबसे इस दफ्तर में आमेर वाले पूनिया का पदार्पण हुआ है, तब से कई जुमले भी पैदा हो रहे हैं। भगवा वाली पार्टी के नए सदर इन छोटे सतीश जी को लेकर कई लोगों की जुबान फिसल रही है। दिलजले उन्हें नाइटवॉचमैन की संज्ञा तक दे रहे हैं। लेकिन उनको यह बोध नहीं है कि नाइटवॉचमैन भी हीरो बन सकता है, बशर्ते वह अपने दिमाग से काम लें। पूनिया जी की नियुक्ति के बाद मैडम के लोग भी काफी सक्रिय हैं। वो मैडम को सलाह दे रहे हैं कि छह महीने की दूरियों से काफी नुकसान उठाना पड़ा है, उसकी भरपाई बहुत जरूरी है। सलाह का असर सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में भी दिखाई देने लगा है। भगवा वाले ठिकाने पर चर्चा है कि कुछ दिनों बाद सरदार पटेल मार्ग के बंगला नंबर 51 में तस्वीर बदली हुई नजर आएगी। अब गेंद पूनिया जी के पाले में है<strong>।<br /> <br /> चर्चाएं पावरफुल होने की<br /> </strong>इंदिरा गांधी भवन में हाथ वाली पार्टी के दफ्तर में बड़ी कुर्सियों को लेकर दिनभर कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं। चर्चाएं भी बोर्ड और निगमों में होने वाली राजनीतिक नियुक्तियों में पावरफुल को लेकर है। लक्ष्मणगढ़ वाले गोविंद जी भाई साहब जब भी दफ्तर में आते हैं, तो चर्चाएं जोर पकड़ लेती हैं। पिछले दिनों ठिकाने पर एक लिफाफा हवा में लहराने के बाद तो चर्चाओं ने और भी जोर पकड़ लिया था। अब बिना सिर पैर की बातें बनाने वाले हाथ वाले भाइयों को कौन समझाए कि पावरफुल तो वो ही होता है, जो सरकार चलाता है। अब समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।<strong><br /> (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Mon, 26 Jul 2021 17:19:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास?</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में इन दिनों एक बार फिर ललचाई नजरों को लेकर काफी खुसरफुसर है। दोनों दलों में नेताओं की नजरें भी दिल्ली की तरफ टिकी हैं। भगवा और हाथ वाले एक-एक गुट को दिल्ली वालों बड़ी आस है। दिल्ली वाले हैं कि सिर्फ चक्कर पर चक्कर कटवा रहे हैं और कोई फरमान जारी नहीं कर रहे। वे फिलहाल वजन टटोलने में लगे हुए हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-997"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-06/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>एल एल शर्मा<br /> --------------------------<br /> ललचाई नजरें</strong><br /> सूबे में इन दिनों एक बार फिर ललचाई नजरों को लेकर काफी खुसरफुसर है। दोनों दलों में नेताओं की नजरें भी दिल्ली की तरफ टिकी हैं। भगवा और हाथ वाले एक-एक गुट को दिल्ली वालों बड़ी आस है। दिल्ली वाले हैं कि सिर्फ चक्कर पर चक्कर कटवा रहे हैं और कोई फरमान जारी नहीं कर रहे। वे फिलहाल वजन टटोलने में लगे हुए हैं। आंकड़ों में मायाजाल में फंसे दिल्ली वालों की मजबूरी भी जगजाहिर है। सूबे के नेताओं के पास भी अपने पक्ष में झूठी बातें प्रचारित करने के सिवाय कोई चारा नहीं है। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि सूबे में हाथ वाले भाई लोगों को पिछले साल इसी महीने में की गई गलतियों की कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी, चाहे कोई कितने ही आंसू पौंछ दे। गांधी परिवार से ताल्लुकात रखने वाले नेताओं के सलाहकार भी तो एक कदम आगे हैं, उन्होंने बता दिया कि जल्दबाजी में अपने फ्यूचर के रास्ते में शूल बोने से नुकसान के सिवाय कुछ भी हाथ में आने वाला नहीं है। इस सलाह को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।<br /> <br /> <strong>पैंतरा साहब का</strong><br /> सूबे की सबसे बड़ी पंचायत के सरपंच प्रोफेसर साहब का कोई सानी नहीं है। सरपंच साहब भी छोटे मोटे नहीं बल्कि नाथद्वारा से ताल्लुकात रखते हैं और कॉलेज के अपने जमाने में कइयों की हेकड़ी निकाल चुके हैं। दाढ़ी वाले सरपंच साहब जो करते हैं, वह सामने वालों के बाद में समझ में आता है। अब देखो ना सरपंच साहब ने दो दिन पहले ऐसा पैंतरा फेंका कि गुढ़ामलानी वाले चौधरी जी को समझ में नहीं आया। प्रेशर पॉलिटिक्स के चक्कर में इंदिरा गांधी नहर का पानी पीने वाले हेमा जी ने तो सरपंच साहब को इस्तीफा भेजा था, लेकिन सरपंच साहब उनसे भी एक कदम आगे निकले और कमेटी में शामिल कर सात दिन के लिए श्रीनाथजी की शरण में चले गए। अब बेचारे हेमाजी के पास अपना सिर पीटने के सिवाय कोई चारा भी तो नहीं है। अब उनको कौन समझाए कि प्रोफेसर साहब ने जो किया, वह उनकी क्लास अटेंड किए बिना कतई समझ में नहीं आता। <br /> <br /> <strong>याद बीते दिनों की </strong><br /> आजकल खाकी वालों पर शनि की दशा है। कभी चौराहे पर तो कभी गली में पिट रहे हैं। और तो और चूड़ियों वाली तक हाथ पैर चला जाती है। बेचारे खाकी वाले भी क्या करें, उनको अपने ऊपर वालों पर भरोसा नहीं है, कब इंक्वायरी बिठा दे। सो पिटने में ही अपनी भलाई समझते हैं। करे भी तो क्या पुलिस का इकबाल जो खत्म हो गया। अब टाइगर और लॉयन तक दहाड़ मारना भूल गए। पीटर और गामाज के बारे में सोचना तो बेईमानी होगी। विक्टर की मजबूरी जगजाहिर है। उनके काम में खलल की किसी में दम नजर नहीं आ रहा। अब तो खाकी वाले भाई लोग ऊपर वालों से प्रार्थना कर रहे हैं कि कोई उनके बीते दिन लौटा दे ताकि खाकी का इकबाल कायम रहे।<br /> <br /> <strong>एक जुमला यह भी</strong><br /> सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि प्रसाद को लेकर है। प्रसाद भी किसी मंदिर का नहीं बल्कि बगावत से ताल्लुक रखता है। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के दफ्तर में आने वाले हर किसी वर्कर की जुबान पर पार्टी के डिसिप्लिन एण्ड फ्यूचर को लेकर चर्चा हुए बिना नहीं रहती। जुमला है कि 136 साल पुरानी पार्टी में इनडिसिप्लिन करने वालों को प्रसाद तो मिला है, लेकिन मीठा नहीं।<br /> <strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Mon, 05 Jul 2021 16:27:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास?</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में इन दिनों हाथ वाले भाई लोग 19 और 27 के फेर में फंसे हुए हैं। दोनों खेमों के नेताओं के 11 महीनों से समझ में नहीं आ रहा कि आखिर इस फेर के चक्रव्यूह का तोड़ क्या है। दिल्ली वाले नेता भी इसके चलते चुप रहने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-812"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-06/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>एल एल शर्मा<br /> --------------------------<br /> 19 और 27 का फेर</strong><br /> सूबे में इन दिनों हाथ वाले भाई लोग 19 और 27 के फेर में फंसे हुए हैं। दोनों खेमों के नेताओं के 11 महीनों से समझ में नहीं आ रहा कि आखिर इस फेर के चक्रव्यूह का तोड़ क्या है। दिल्ली वाले नेता भी इसके चलते चुप रहने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं। अब देखो ना जोधपुर वाले अशोक जी के खिलाफ बगावत करने वाले 19 हैं, तो समर्थित पक्ष वालों की संख्या 27 है, बाकी 81 तो वैसे ही खुले में राज का गुणगान करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। शेष 71 हैं, जो खुद ही 40 और 31 के फेर में ऐसे लिपटे हुए हैं कि दूसरों के बारे में सोचने की फुर्सत तक नहीं है। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि जब 19 ही मूंछों पर ताव दे रहे हैं, तो 27 तो सामने वालों को कहीं का भी नहीं छोड़ेंगे। अब इतना ही इशारा काफी है, चूंकि समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।<br /> <br /> <strong>खेल नरम-गरम का</strong><br /> भगवा वाले दल में नरम और गरम का खेल के चक्कर में सूबे के भाईसाहबों की नींद उड़ी हुई है। उड़े भी क्यों नहीं, बेचारों के समझ में नहीं आ रहा है कि नरम और गरम दल के इस खेल में वे किस पाले के खिलाड़ियों के लिए ताली बजाए। भाईसाहबों में खुसरफुसर है कि जब से नमोजी ने हाथ वाले कुछ भाइयों की तारीफ करना शुरू किया है, उनका सबका साथ, सबका विश्वास नारा एक धड़े को नापसंद है। भाईसाहबों का तर्क है कि जब अटल जी नरम पड़े, तो आडवाणी ही गरम हुए और आडवाणी जी नरम पड़े तो मोदी जी गरम हुए बिना नहीं रह सके। अब मोदी जी नरम पड़ते दिखाई दे रहे हैं, तो योगी जी को गरम होना लाजमी है। योगी धड़े वाले भाईसाहब सिर्फ एक धर्म की बात करने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं और दिल्ली में इस विचारधारा का श्रीगणेश भी कर दिया है।<br /> <br /> <strong>लाइलाज छपास रोग</strong><br /> सूबे में एक बार फिर छपास रोग को लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं। चर्चा करने वाले और कोई नहीं, बल्कि हाथ वाली पार्टी के वर्कर हैं। अपने नेताओं के लगे पब्लिसिटी नाम के इस रोग को लेकर वर्कर्स काफी परेशान हैं। बेचारे वे अपने नेताओं को समझाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे, लेकिन नेता हैं कि मानते ही नहीं। वर्कर्स का सालों लंबा अनुभव है कि पब्लिक पर भरोसा नहीं कर फोटो छपवाने वाले कभी बड़ा नेता नहीं बन सकते। कोरोना में ठाले बैठे वर्कर्स ने छपास रोग वाले नेताओं की लिस्ट तो बना ली, लेकिन बेचारों के सामने नाम बोलने से पहले इधर-उधर देख कर पीछे हटने की मजबूरी है।<br /> <br /> <strong>एक जुमला यह भी</strong><br /> सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि ओवर लेपिंग एमएलएज की है। इनकी संख्या भी सात है। जुमला है कि ओवर लेपिंग करने वाले इन एमएलएज की हालत काकड़ पर खड़े जिनावर की तरह है, जो इधर भी मुड़ सकते हैं और उधर भी। अब राज से बगावत करने वाले नेताओं को भी समझ में आ गया है कि 15 को साथ लेकर नंबर वन की कुर्सी पाना मुश्किल ही नहीं, असंभव भी है। अब दिल्ली वालों की आड़ में बीच का रास्ता निकालने में अपनी भलाई समझ रहे हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वाले भाई लोगों के ठिकाने पर चर्चा है कि सत्ता तो जोधपुर वाले भाईसाहब की संभालेंगे और संगठन वापस पुराने हाथों में सौंपे जाने का फार्मूला अपनाए जाने की तैयारी अंतिम चरण में है। लेकिन यह भी अशोक जी भाईसाहब की मर्जी पर है। <br /> <strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Mon, 21 Jun 2021 16:25:28 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास?</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे की राजनीति में केबिनेट रिशफलिंग को एक बार फिर शगूफा उठा है। शगूफा भी पिंकसिटी से लेकर लालकिले वाली नगरी तक दौड़ रहा है। रिशफलिंग को लेकर हर कोई अपने हिसाब से मायने निकाल रहा है। निकाले भी क्यों नहीं, राजधर्म आड़े जो आ रहा है। दिल्ली तक की भाग दौड़ में एक बात का खुलासा हुआ है कि आलाकमान को एक सूची को इंतजार है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-712"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-06/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>एल एल शर्मा<br /> --------------------------<br /> इंतजार लिस्ट का</strong><br /> सूबे की राजनीति में केबिनेट रिशफलिंग को एक बार फिर शगूफा उठा है। शगूफा भी पिंकसिटी से लेकर लालकिले वाली नगरी तक दौड़ रहा है। रिशफलिंग को लेकर हर कोई अपने हिसाब से मायने निकाल रहा है। निकाले भी क्यों नहीं, राजधर्म आड़े जो आ रहा है। दिल्ली तक की भाग दौड़ में एक बात का खुलासा हुआ है कि आलाकमान को एक सूची को इंतजार है। सूची के लिए सूबे के नेताओं से भी पूछताछ हुई, पर उनके पास भी नहीं पहुंची। राज का काज करने वालों में खुसर-फुसर है कि आलाकमान को दस महीने से उस सूची का इंतजार है, जिसमें अंसतुष्ट खेमे की ओर से मंत्री बनाया जाना है। कन्फ्यूजन के चलते सूची फाइनल नहीं हो पा रही, चूंकि रोजाना नाम जोड़ने और हटाने से ही फुर्सत जो नहीं है। हम बताय देते हैं कि दिल्ली वाले तो पहले रिशफलिंग में राज के रत्नों की संख्या 21 से 26 करने के मूड में है।<br /> <br /> <strong>जब सेनापति कमजोर हो तो....</strong><br /> आज हम बात करेंगे सेनापति की। सेनापति कमजोर होता है, तो सेना का जीतना नामुमकिन नहीं असंभव होता है। सूबे की सियासी राजनीति में भी इन दिनों कुछ ऐसा ही चल रहा है। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि सूबे में पिछले एक साल से जो चल रहा है, उसके लिए लोकल लीडरशिप नहीं, बल्कि लालकिले वाले महानगर में बिराजे पार्टी आलाकमान ज्यादा जिम्मेदार हैं। अब देखो ना जो कुछ हो रहा है, वह हाथ वाली पार्टी के लिए नहीं बल्कि पर्सनल एजेण्डे के लिए है, तभी तो सिर्फ थप्पी की वजह से दस महीनों में भी सुलटारा नहीं हो पाया, वरना दस दिन भी नहीं लगते। अब बेचारे आलाकमान भी क्या करे हम उम्र वालों की यारी दोस्ती आड़े जो आई हुई हैं।<br /> <br /> <strong>सौम्य-शील और भगवाधारी</strong><br /> सूबे में इन दिनों भगवाधारी भाई लोगों की हालत कुछ ज्यादा ठीक नहीं है। बेचारे अपने ही दल की सौम्या और शील के फेर में फंसे हुए हैं। फेर भी ऐसा है कि न उगला जा रहा है और नहीं निगला। बैठकों में चिंतन-मंथन करने वाले भाईसाहबों को तनिक भी अहसास नहीं था कि राज की बड़ी चतुराई से ग्रेटर वाली सौम्या और शील की आड़ में भारती भवन तक गर्मी हो जाएगी। अब छोटे भाइयों को कौन समझाए कि बड़े भाईसाहबों के इशारों पर देश हित में ऐसे ही काम करोगे, तो कई राजा आएंगे और राम बनकर चले जाएंगे। राज का काज करने वाले साहब लोग भी लंच केबिनों में गुनगुना रहे हैं कि रुपया नाम की लूट है, लूट सके तो लूट-अंत काल पछताएगा, प्राण जाएगा छूट।<br /> <br /> <strong>टोटका लाल चींटी का</strong><br /> टोटका तो टोटका ही होता है, कब और कहॉं करना पड़ पाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। अब देखो ना जयपुर ग्रेटर निगम में शील जी ने दूसरी बार मेयर की कुर्सी संभाली, तो जाने-अनजाने में टोटका हुए बिना नहीं रह सका। किसी शुभचिंतक की फूल माला में आई लाल चींटी ने मैडम को मैसेज दे दिया कि अब यह कुर्सी इतनी मखमली नहीं है, जितनी पहले वाले काल में थी। कभी भी किसी का गलत पगफेरा हो सकता है, जैसे पहले दिन ही फूल माला की आड़ में लाल चींटी ने अपना कमाल दिखा दिया। <br /> <br /> <strong>एक जुमला यह भी</strong><br /> सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि संतुष्ट और असंतुष्टों को लेकर है। दोनों खेमों के नेताओं की नींद उड़ी हुई है। इंदिरा गांधी भवन में आने वाले सालों पुराने हार्ड वर्कर्स बतियाते हैं, कि अब असंतुष्टों की हालत देखते लायक है, उनके चेहरों पर चिन्ता की लकीरें साफ दिखाई देने लगी है। कुछ वरिष्ठों ने राज के खिलाफ झण्डा तो उठा लिया, परन्तु अब सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं को होता दिख रहा है। चूंकि यह राजनीति है, इसमें जो होता है, वह दिखता नहीं है, और दिखता है, वह होता नहीं है। कसमें और वादे भूलकर सब अपनी-अपनी बचाने के लिए देवरे धोक रहे हैं। लेकिन जोधपुर वाले अशोक जी भाईसाहब की मंद-मंद मुस्कराहट के आगे बेबसी के सिवाय उनके पास कोई चारा भी तो नहीं है।<br /> <strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Mon, 14 Jun 2021 17:42:54 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास?</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में हाथ वाली पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं है। दो खेमों में बंटे भाई लोग आपस में दो-दो हाथ करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। वैसे तो खुद को पार्टी का वफादार वर्कर साबित करने के लिए रात दिन बढ़कर दावे कर रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि उनको अपने स्वार्थ के सिवाय 136 साल पुरानी पार्टी की इमेज से कोई लेना देना नहीं है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-540"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-06/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>एल एल शर्मा<br /> --------------------------<br /> यह तो होना ही था</strong><br /> सूबे में हाथ वाली पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं है। दो खेमों में बंटे भाई लोग आपस में दो-दो हाथ करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। वैसे तो खुद को पार्टी का वफादार वर्कर साबित करने के लिए रात दिन बढ़कर दावे कर रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि उनको अपने स्वार्थ के सिवाय 136 साल पुरानी पार्टी की इमेज से कोई लेना देना नहीं है। कोरोना काल में ठाले बैठे राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि यह तो होना ही था, चूंकि गुजरे जमाने में जिसने जिसके साथ जो किया, वह उसको भूल नहीं पा रहे हैं। एक खेमे के मंसूबे पूरे होते दिखाई नहीं दे रहे हैं, तो दूसरा खेमा हर गलती की कीमत भुगताने पर अड़ा हुआ है। अब भाई लोगों को कौन समझाए कि दिल्ली वालों के सामने एमएलएज की संख्या बल की मजबूरी है, इसलिए दस महीनों से चुप्पी साधे बैठे हैं, वरना जोधपुर वाले अशोक जी भाईसाहब का विरोध करने वालों के पास 54 का आंकड़ा होता, अब तक सपने भी पूरे हो जाते।<br /> <br /> <strong>गोविन्द के दरबार में खाकी</strong><br /> इन दिनों सूबे की राजधानी पिंकसिटी में खाकी वाले साहब लोग गोविन्द के दरबार में कुछ ज्यादा हाजरी दे रहे हैं। दे भी क्यों नहीं, आखिरकार कोरोना में भी गाइडलाइन की पालना कराने की जिम्मेदारी भी सिर पर जो है। हिन्दू-मुस्लिमों के फेर में फंसे नेता लोग कब क्या करवा बैठे, इसका कोई पता नहीं। घर की खीज सड़कों पर उतारने वाले कुछ नेताओं के चक्कर में खाकी वाले साहब लोगों का दिन का चैन और रातों की नींद उड़ी हुई है। अब बेचारों के सामने गुलाबीनगर में अमन-चैन बनाए रखने के लिए गोविन्द दरबार के अलावा कोई चारा भी तो नहीं है। सो कई साहब लोग तो बड़ी चौपड़ से गोविन्द के दरबार में नंगे पैर जाकर धोक देने में ही अपनी भलाई समझते हैं।<br /> <br /> <strong>बिगड़ा चन्द्रमा</strong><br /> जयपुर ग्रेटर की सौम्य स्वभाव वाली फर्स्ट लेडी का चन्द्रमा अभी सुधरने का नाम ही नहीं ले रहा। आठ महीने से आए दिन कुछ न कुछ पंगे से सामना करना पड़ता है। पहले हाथ वाले भाई लोगों ने पसीने छुडाए तो अब बड़े साहब से 36 के आंकड़े ने परेशान कर रखा है। पहले वाले साहब तो दस हजार तक की फाइल भी मेयर तक भेजते थे, लेकिन जब से चन्द्रमा बिगड़ा है, तब से यज्ञ और मित्र शब्द के साथ सिंह बने देव साहब बड़ी-बड़ी फाइलें भी खुद ही निपटा रहे हैं। और तो और विद्याधरनगर से कब्जे हटाने का भूत भी शहर की सड़कों से पंडित दीनदयाल उपाध्याय भवन तक जा पहुंचा। अब बेचारी देवनारायण वंशज फर्स्ट लेडी चन्द्रमा सुधारने के लिए कई मंदिरों धोक दे चुकी हैं।<br /> <br /> <strong>अब लगे पंख</strong><br /> पांच प्रदेशों के चुनाव खत्म होने के साथ ही सूबे के नेताओं के पंख लग गए हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ के दफ्तर में चर्चाएं बढ़ने के साथ ही लाइन में लगे भाइयों के दिल की धड़कनें बढ़ गई। गांधी टोपी वाले बुजुर्गवान का दावा है कि एक जून से 31 जुलाई के बीच बहुत कुछ होगा। कई महीनों से पॉलिटिकल अपॉइंटमेंट का इंतजार खत्म होने के साथ ही मंत्रिमंडल का बैलेंस भी ठीक होगा। पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों को हरा कर उन्हीं की छाती पर मूंग दलने वालों से भी निजात मिलेगी। बुजुर्ग की बातें सुन कई भाई लोग हवा में उड़ते दिख रहे हैं।<br /> <br /> <strong>एक जुमला यह भी</strong><br /> सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के दफ्तर में एक चर्चा जोरों पर है। चर्चा भी अपनों को लेकर है। ढाई साल से वेटिंग सीएम के फेर में फंसे पार्टी के नेता अपनी भूमिका तक को भूल गए। राज का आधा काल गुजरने पर भी उनकी जुबान बंद है। गुलाबीनगरी के बाद नवाबों के शहर में भी नेताओं के नाम पर मोहर लगाने के लिए दोनों तरफ से जोर आजमाइश की गई, मगर जेपी का दिल अभी भी नहीं पसीजा। ठाले बैठे भाईसाहबों के पास राम नाम की माला जपने के अलावा कोई काम भी नहीं है।<br /> <strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Tue, 01 Jun 2021 16:51:41 +0530</pubDate>
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                <title>सत्तर फीसदी वैक्सीनेशन के बिना लॉकडाउन देश पर दोहरी मार</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में कोरोना महामारी का संक्रमण जिस गति से बढ़ रहा है उस संक्रमण को रोकने के लिए वैक्सीनेशन बहुत जरूरी है। संक्रमण की चेन को तोड़ने के लिए सिर्फ लॉकडाउन लगाने से काम नहीं चलेगा। कब तक देश में लॉकडाउन लगाएंगे? क्या जुलाई तक लॉकडाउन रहेगा...? कहा जा रहा कि अभी कोरोना वायरस की दूसरी लहर का पीक आ सकता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0-%E0%A4%AB%E0%A5%80%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%95%E0%A4%A1%E0%A4%BE%E0%A4%89%E0%A4%A8-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0/article-355"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-05/corona16.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>@नरेन्द्र चौधरी</strong><br /> भारत में कोरोना महामारी का संक्रमण जिस गति से बढ़ रहा है उस संक्रमण को रोकने के लिए वैक्सीनेशन बहुत जरूरी है। संक्रमण की चेन को तोड़ने के लिए सिर्फ लॉकडाउन लगाने से काम नहीं चलेगा। कब तक देश में लॉकडाउन लगाएंगे? क्या जुलाई तक लॉकडाउन रहेगा...? कहा जा रहा कि अभी कोरोना वायरस की दूसरी लहर का पीक आ सकता है। इसके बाद कोविड-19 के मामलों में गिरावट दर्ज की जाएगी। इससे एक उम्मीद जाग्रत होती है। जिस तरह द्वितीय विश्व युद्ध के समय विंस्टन चर्चिल ने सैनिकों के शवों को रातों रात हटवा दिया था इससे अन्य सैनिकों का मनोबल नहीं टूटा और इंग्लैंड बच गया था। यह एक उदाहरण है। सकारात्मक दृष्टिकोण की आशा रखना अच्छी बात है, लेकिन इसके साथ ही ठोस कार्रवाई भी करनी पड़ेगी। सिर्फ यह उम्मीद करना कि पीक के बाद संक्रमित मामलों में गिरावट आएगी इससे काम नहीं चलेगा। दुनिया के कई देशों ने ज्यादा से ज्यादा वैक्सीनेशन तीव्र रफ्तार से करके ही कोरोना पर विजय पाई है। महामारी से बचाव के लिए वैक्सीनेशन बेहद जरूरी है। <br /> <br /> कई देशों की सरकार ने लॉकडाउन के साथ वैक्सीनेशन को तवज्जो दी। जिन-जिन देशों में वैक्सीनेशन हुए वहां कोरोना संक्रमण के मामले घटते जा रहे है और अस्पताल में भर्ती होने का सिलसिला भी कम होता जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार देश की कुल जनसंख्या की कम से कम 70 प्रतिशत आबादी को वैक्सीन लगे तभी स्थिति नियंत्रण में आ सकती है। और इस महामारी से मुक्ति मिल सकती है। वैक्सीनेशन भी जितना जल्दी होगा उतना ही ज्यादा फायदा होगा। वैक्सीनेशन कार्यक्रम की रफ्तार में जितना विलंब होगा तो यह वायरस म्यूटेट कर जाएगा। वर्तमान में कोरोना संक्रमण और मृतकों की संख्या के आंकड़े सुनामी की तरह बढ़ते जा रहे हैं। देश में जिस गति से वैक्सीनेशन हो रहा है इस रफ्तार से आखिर कब पूरा होगा अभियान? कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर से जूझ रहे देश में टीकों की कमी हो रही है। पहली डोज के लगने में ही तीन साल लग जाएंगे। सेकंड डोज भी समय पर लगनी है, 6-7 माह बाद तीसरी डोज लगनी भी जरूरी है। इस गति से तो 100 प्रतिशत आबादी को दूसरी डोज का टीका लगने में दस साल लग जाएंगे। <br /> <br /> सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के अदार पूनावाला का कहना है कि भारत में वैक्सीन की किल्लत जुलाई तक जारी रह सकती है। वहीं स्पूतनिक-वी वैक्सीन भी जुलाई तक ही आ सकेगी। ऐसे में क्या जुलाई तक लॉकडाउन किया जाएगा? टीकों को लेकर जनता में उत्साह है, लेकिन टीकों की किल्लत हो रही है। यदि लॉकडाउन खोल दिया तो फिर से कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ जाएंगे। अच्छी मात्रा में वैक्सीन की उपलब्धता जुलाई तक ही संभव है। आज स्थिति यह है कि पहली डोज लगवा चुके लोग दूसरी डोज का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन वैक्सीन की कमी के कारण दूसरी डोज लगने में देरी हो रही है। अस्पताल में बिस्तर और ऑक्सीजन की कमी को देखते हुए सबसे बड़ी उम्मीद वैक्सीन ही है। चाहे जहां से भी हो सरकार वैक्सीन खरीदे। आगे के लिए एडवांस दें और ज्यादा से ज्यादा लोगों को जल्दी से जल्दी वैक्सीन लगवाने का इंतजाम करें। इस समय देश सर्वोपरि है। भारत को विदेशी टीका कंपनियों से टेस्टेड वैक्सीन और कच्चा माल विश्व के किसी भी देश में जहां पर भी यह हो उसे तत्काल खरीद लेना चाहिए। विश्व के देशों से वैक्सीन और कच्चा माल खरीदने के लिए आत्मनिर्भर पॉलिसी भी छोड़नी पड़े तो छोड़नी चाहिए और खुला बाजार नीति अपनानी पड़े तो वह भी अपनानी चाहिए। <br /> <br /> अगर आगामी महीनों तक लॉकडाउन लगा तो मानव क्षति कितनी होगी, साथ ही अर्थव्यवस्था भी चरमरा जाएगी। देश पर दोहरी मार पड़ेगी। पहले भी पूर्ण लॉकडाउन का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा। कोविड-19 महामारी ने देश को सबसे खराब दौर में लाकर खड़ा कर दिया है। स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गई हैं। अर्थव्यवस्था, रोजगार पर संकट उत्पन्न हो गया है। अगर वैक्सीनेशन की सुस्त रफ्तार रही और कम से कम 70 प्रतिशत आबादी का वैक्सीनेशन नहीं हुआ तथा लंबी अवधी तक लॉकडाउन चलता रहा तो भारत की अर्थव्यवस्था 20-25 साल पीछे चली जाएगी। अभी मृतकों की संख्या का आंकड़ा बढ़ रहा है। प्रतिदिन हजारों की संख्या में मृत्यु हो रही है। अगर लॉकडाउन भी खुलता है तो भीड़ बढ़ेगी और वायरस म्यूटेट करेगा। लॉकडाउन खोलने से भी वायरस तो  खत्म नहीं होगा। अमेरिका के शीर्ष चिकित्सा विशेषज्ञ डॉक्टर फाउची ने कोरोना को लेकर बड़ी सलाह दी है। उन्होंने कहा है कि भारत में कोरोना संकट का एकमात्र हल टीकाकरण ही है। उन्होंने घरेलू और वैश्विक दोनों स्तर पर कोविड-19 वैक्सीन के उत्पादन को बढ़ाने की सलाह दी है। दुनिया भर में वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों से बात करनी चाहिए। जुलाई तक वैक्सीन आए यह संभावना है निश्चितता नहीं है। उस समय क्या परिस्थितियां रहेगी यह उस पर निर्भर है। अन्यथा वायरस म्यूटेट कर रहा है। तेजी से फैल रहे संक्रमण और तीसरी लहर की आशंका के बीच अब तक किए गए प्रयास बेकार ना हो जाएं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 May 2021 16:35:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पूर्ण वैक्सीनेशन अभियान को सफल बना सकते हैं जनप्रतिनिधि...?</title>
                                    <description><![CDATA[देश में यदि वैक्सीनेशन अभियान को सफल करना है तो जनप्रतिनिधियों को लक्ष्य देना चाहिए। जब चुनाव के समय जनप्रतिनिधि वोट लेने के लिए घर-घर जाकर प्रचार कर सकते हैं तो वैक्सीनेशन को सफल बनाने के लिए क्यों नहीं घर-घर जाकर प्रचार कर सकते हैं? यह देश व जनहित का कार्य है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A3-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A4%A8-%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%B8%E0%A4%AB%E0%A4%B2-%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BF--/article-123"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-04/corona-vaccine10.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>@नरेन्द्र चौधरी</strong></p>
<p> </p>
<p>कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए भारत में दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान चल रहा है। प्रतिदिन लाखों लोगों को वैक्सीन लगाई जा रही है। किंतु जिस रफ्तार से कोरोना अपने पैर पसार रहा है उसको देखते हुए वैक्सीनेशन की प्रक्रिया गति नहीं पकड़ पा रही है। वैक्सीनेशन की रफ्तार बढ़ाने के हरसंभव प्रयास इसलिए जरूरी है क्योंकि कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या फिर तेजी से बढ़ने लगी है। जिस रफ्तार से देश में वैक्सीन लग रही है ऐसे में सभी लोगों को टीका लगाने में कई साल लग सकते हैं। देश में अभी सिर्फ करीब 5 फीसदी आबादी को ही वैक्सीन लग पाई है। जबकि ब्रिटेन व इजराइल में वैक्सीनेशन बहुत तेजी से किया जा रहा है। वहां मामले भी कंट्रोल में है। देश में यदि वैक्सीनेशन अभियान को सफल करना है तो जनप्रतिनिधियों को लक्ष्य देना चाहिए। जब चुनाव के समय जनप्रतिनिधि वोट लेने के लिए घर-घर जाकर प्रचार कर सकते हैं तो वैक्सीनेशन को सफल बनाने के लिए क्यों नहीं घर-घर जाकर प्रचार कर सकते हैं? यह देश व जनहित का कार्य है। <br /> <br /> वार्ड पंच से लेकर सांसद तक की जिम्मेदारी टीकाकरण अभियान को सफल बनाने की होनी चाहिए। उन्हें लक्ष्य दिया जाना चाहिए कि प्रतिदिन एक निश्चित संख्या में वैक्सीनेशन करना है साथ ही समय सीमा भी निर्धारित की जानी चाहिए कि इतने समय में वैक्सीनेशन का कार्य पूरा हो जाना चाहिए। जनप्रतिनिधियों को यदि इसका लक्ष्य दिया जाता है तो वह इस कार्य को कर सकते हैं। 5 राज्यों में अभी चल रहे विधानसभा चुनाव में सभी जनप्रतिनिधियों को वोट हासिल करने और सीटें जीतने का लक्ष्य दिया हुआ है। चुनाव निश्चित समय अंतराल में होते हैं ऐसे में कुर्सी की लड़ाई में छोटे कार्यकर्ता से लेकर बड़े स्तर का जनप्रतिनिधि जी-जान से जुट कर एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है। कोरोना काल में भी विधानसभा चुनाव में रैलियां, रोड शो, जनसभाएं हो रही हैं। कोरोना संक्रमण फैल गया तो क्या जनप्रतिनिधियों की कोई जिम्मेदारी नहीं रहेगी? वैक्सीनेशन से ज्यादा महत्वपूण कुर्सी की लड़ाई हो रही है। <br /> <br /> चुनाव में जीत-हार तो लगी रहती है। किंतु असली जंग कोरोना संक्रमण को देश से हराने की है। तब देश की असली जीत होगी। देश में कोरोना की दूसरी लहर चल रही है। इसे काबू करने के लिए जनभागीदारी पर जोर दिया जाता है। वैक्सीनेशन अभियान को सफल बनाने की जिम्मेदारी क्या जनप्रतिनिधियों की नहीं हैं? यह कार्य उनके लिए देशभक्ति नहीं है? देशभक्ति का जिम्मा क्या सिर्फ आम जनता के लिए ही है? वार्ड पंच से लेकर सांसद तक वैक्सीनेशन अभियान में जुट जाए तो बहुत जल्दी यह अभियान पूरा हो सकता है। इससे देश को बहुत फायदा होगा। लॉकडाउन और कर्फ्यू की स्थिति से बचा जा सकेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 13 Apr 2021 16:39:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
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                <title>हिंसक बना आंदोलन</title>
                                    <description><![CDATA[पिछले दो महीने से शांतिपूर्वक चल रहा किसान आंदोलन गणतंत्र दिवस की ट्रैक्टर परेड में आखिर किसान आंदोलन अचानक हिंसक घटनाओं में कैसे बदल गया, यह एक विचारणीय सवाल बन गया है? काफी प्रयासों व बातचीत के बाद किसान नेताओं को परेड निकालने की अनुमति मिली थी। जिम्मेदार किसान नेताओं ने भी सरकार व पुलिस को भरोसा दिलाया था कि परेड शांतिपूर्वक निकलेगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%95-%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%A8/article-122"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-04/2021-01-28~fxg81_nl.jpg" alt=""></a><br /><p>पिछले दो महीने से शांतिपूर्वक चल रहा किसान आंदोलन गणतंत्र दिवस की ट्रैक्टर परेड में आखिर किसान आंदोलन अचानक हिंसक घटनाओं में कैसे बदल गया, यह एक विचारणीय सवाल बन गया है? काफी प्रयासों व बातचीत के बाद किसान नेताओं को परेड निकालने की अनुमति मिली थी। जिम्मेदार किसान नेताओं ने भी सरकार व पुलिस को भरोसा दिलाया था कि परेड शांतिपूर्वक निकलेगी। परेड निकालने के लिए पुलिस व संयुक्त किसान नेताओं के बीच आपसी सहमति से परेड का समय व मार्ग तय हुए थे। यह तय हुआ था कि जब इण्डिया गेट की मुख्य परेड समाप्त हो जाएगी, उसके बाद दोपहर 12 बजे ही ट्रैक्टर परेड निकलेगी। लेकिन सिंधू बार्डर की तरफ से कुछ किसानों ने सुबह साढ़े सात बजे ही अपनी गतिविधियां शुरू कर दी और अवरोधक तोड़कर दिल्ली की तरफ रवाना हो गए। उन्हें रोकने के लिए पुलिस को मजबूरन बल प्रयोग करना पड़ा। लाठीचार्ज का असर न पड़ने पर आंसू गैसें के गोले दागने पड़े। हालांकि किसान नेताओं ने अपील की थी कि वे तय रूट पर ही परेड पर निकलेंगे और शांति बनाए रखेंगे। मगर कुछ आंदोलनकारियों ने उनकी बात को नहीं माना और आंदोलनकारी असंयमित और अनुशासनहीन हो गए। <br /> <br /> इस परेड में जो कुछ हुआ, उसकी आशंका दिल्ली पुलिस को पहले से ही थी लेकिन ट्रैक्टर परेड निकलनी थी। यह भी उम्मीद थी कि किसान गणतंत्र दिवस की भावना का आदर करेंगे और अनुशासित रहेंगे, लेकिन काफी किसानों ने लाल किले पर अपना झंडा फहराकर अपनी ताकत के प्रदर्शन की ठान रखी  थी। कई तो इण्डिया गेट की परेड में भी शामिल होने का इरादा रखते थे, लेकिन वहां पुलिस व सुरक्षा बलों की भारी व्यवस्था थी। आंदोलन में उत्पात मचाने की भावना इसलिए पनपी थी कि कुछ किसान नेता जोशीले भाषण देते चले आ रहे थे। कहने को किसान नेता गणतंत्र की आन बान शान बनाए रखने की बातें भी करते थे, लेकिन दिल्ली के लाल किले और आईटीओ इलाके में उत्पात मचना शुरू हुआ तो किसान नेता ओझल हो गए। उत्पातियों ने लाल किले पर अपना झण्डा फहरा दिया। यह निसंदेह काफी शर्मनाक व निंदनीय घटना थी। <br /> <br /> किसी भी लोकतंत्र में अपने प्रतीकों पर हमले की इजाजत नहीं देता। इस घटना से दो माह से चल रहा शांतिपूर्ण आंदोलन दागदार हो गया। हालांकि कुछ किसान नेता उत्पात के लिए पुलिस पर ही आरोप लगा रहे हैं तो कुछ का मानना है कि कुछ शरारती तत्व भी आंदोलन में घुस गए। यह जांच का विषय है और इसके बाद हकीकत का पता चलेगा। उत्पातियों ने पुलिस वालों पर लाठियों से वार किए, पत्थर बरसाए। इससे सौ से ज्यादा पुलिस कर्मी घायल हो गए। उत्पात से आंदोलन हिंसक बन गया। किसान नेता अब जो भी अपनी दलीलें दें, लेकिन अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 13 Apr 2021 16:38:26 +0530</pubDate>
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