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                <title>India Gate - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>India Gate RSS Feed</description>
                
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                <title>सुप्रीम कोर्ट ने CJP के 5 सितंबर दिल्ली मार्च पर रोक से किया इनकार, कानून-व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के 5 सितंबर को प्रस्तावित दिल्ली मार्च पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि प्रदर्शन से अप्रिय स्थिति होने का कोई ठोस आधार नहीं है। CJP अपनी मांगों को लेकर इंडिया गेट से पुलिस मुख्यालय तक मार्च निकालेगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/supreme-court-refuses-to-ban-cjps-5th-september-delhi-march/article-164307"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-08/cjp.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से 5 सितंबर को प्रस्तावित दिल्ली मार्च पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि ऐसा मानने के लिए फिलहाल कोई ठोस आधार नहीं है कि प्रदर्शन से अनिवार्य रूप से अप्रिय स्थिति पैदा होगी। अदालत ने प्रशासन से कानून-व्यवस्था बनाए रखने और प्रदर्शन से जुड़े सभी पक्षों से नियमों के दायरे में रहने की अपेक्षा जताई।</p>
<p>मार्च पर रोक की मांग सेवानिवृत्त दिल्ली पुलिस अधिकारी राजेंद्र सिंह की याचिका में की गई थी। याचिकाकर्ता ने आगामी BRICS सम्मेलन का हवाला देते हुए राजधानी में बड़े प्रदर्शन की अनुमति नहीं देने की मांग की थी। CJP का कहना है कि सरकार ने आंदोलन के दौरान उठाई गई चार मांगों में से तीन अब तक पूरी नहीं की हैं। इनमें छात्रों के परिवारों को मुआवजा, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR वापस लेना और पुलिस-RAF की कार्रवाई पर माफी शामिल है। संगठन ने इन्हीं मुद्दों को लेकर 5 सितंबर को फिर मार्च निकालने का ऐलान किया है।</p>
<p>प्रस्तावित मार्च इंडिया गेट से शुरू होकर नई दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक जाएगा। इसमें कथित NEET अनियमितताओं के बाद जान गंवाने वाले छात्रों के परिजनों के शामिल होने की भी बात कही गई है। सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि प्रदर्शन से जुड़ी FIR वापस लेने के लिए अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट में आवेदन किया गया है। इससे पहले 20 जुलाई के प्रदर्शन में पुलिस कार्रवाई के आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट पांच सदस्यीय समिति गठित कर चुका है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 16:30:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>इंडिया गेट पर राजस्थानी फूड काउन्टर का शुभारंभ</title>
                                    <description><![CDATA[ निगम द्वारा अच्छी गुणवत्ता के साथ राजस्थान के सुप्रसिद्ध व्यंजन उपलब्ध करवाए जाएंगे। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/rajasthani-food-counter-inaugurated-at-india-gate/article-91082"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-09/427rtrer-(19).png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। संसद भवन, प्रधानमंत्री आवास और केंद्र सरकार के प्रमुख कार्यलाओं वाले दिल्ली के सेंट्रल विस्टा में राजस्थानी फूड काउन्टर का शुभारंभ किया गया। दुनिया से इंडिया गेट देखने आने वाले पर्यटकों, देश से आने वाले सांसदों, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को राजस्थान का खाना उपलब्ध होगा। इंडिया गेट पर दक्षिण की ओर स्थित शॉप न. 8 में राजस्थानी फ़ूड काउन्टर का आरटीडीसी प्रबन्ध निदेशक सुषमा अरोड़ा एवं कार्यकारी निदेशक राजेन्द्र सिंह शेखावत ने फीता काटकर शुभारंभ किया। </p>
<p>निगम प्रबंध निदेशक सुषमा अरोड़ा ने कहा कि हमारा प्रयास रहेगा असली राजस्थानी जायके से देश-दुनिया को रूबरू करवाएं। लोग राजस्थान के स्वाद से वाकिफ हो सके। इसलिए गुणवत्ता के साथ जोधपुर के मिर्ची बड़े, प्याज कचोरी, कोटा हींग दाल की कचोरी, जयपुरी समोसा, राजवाड़ा कोफ्ता, पुष्कारी ब्रेड पकोड़ा, मावा कचोरी, जयपुरी राजभोग, गुलाब जामुन, जोधपुरी दूध के लड्डू, जयपुरी घेवर, अलवरी मिल्क केक, मोतीचूर के लड्डू, माखनिया लस्सी, मसाला चाय सहित अन्य कई राजथानी व्यंजन अभी उपलब्ध करवाए जा रहे है। उन्होंने बताया कि अभी यह शुरुआत है, आने वाले समय में राजस्थानी थाली, दाल बाटी चूरमा सहित राजस्थान के प्रसिद्ध व्यंजन उपलब्ध करवाए जाएंगे।</p>
<p><br />आरटीडीसी के कार्यकारी निदेशक राजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि सोशल वेलफेयर के नाते आरटीडीसी द्वारा समय-समय पर नवाचार किये जाते रहे है। राजस्थानी जायके को दुनियाभर में फैलाने का हमारा छोटा सा प्रयास है। निगम द्वारा अच्छी गुणवत्ता के साथ राजस्थान के सुप्रसिद्ध व्यंजन उपलब्ध करवाए जाएंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Sep 2024 15:57:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>इंडिया गेट पर महकेगी राजस्थान खाने की महक</title>
                                    <description><![CDATA[संसद भवन, प्रधानमंत्री आवास और केंद्र सरकार के प्रमुख दफ्तरों वाला दिल्ली का सेंट्रल विस्टा अब राजस्थानी फ़ूड से महकेगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/rajasthan-food-will-smell-at-india-gate/article-90982"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-09/630400-size-(6)5.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। संसद भवन, प्रधानमंत्री आवास और केंद्र सरकार के प्रमुख दफ्तरों वाला दिल्ली का सेंट्रल विस्टा अब राजस्थानी फ़ूड से महकेगा। देशभर से आने वाले सांसदों, अधिकारियों और दुनियाभर से आने वाले प्रतिनिधियों व पर्यटकों को राजस्थानी खाने का स्वाद मिल सकेगा। </p>
<p>केंद्र सरकार ने राजस्थान टूरिज्म डवलपमेंट कॉर्पोरेशन (आरटीडीसी) को फ़ूड काउंटर आवंटन किया है। निगम द्वारा 20 सितम्बर 2024 को राजस्थानी फूड काउंटर का भव्य उद्घाटन किया जा रहा है। आरटीडीसी प्रबन्ध निदेशक सुषमा अरोड़ा मुख्य अतिथि एवं कार्यकारी निदेशक राजेन्द्र सिंह शेखावत अध्यक्षता करेंगे। </p>
<p>इंडिया गेट पर दक्षिण की ओर स्थित शॉप न. 8 राजस्थानी फ़ूड काउन्टर में जोधपुर के मिर्ची बड़े, प्याज कचोरी, कोटा हींग दाल की कचोरी, जयपुरी समोसा, राजवाड़ा कोफ्ता, पुष्कारी ब्रेड पकोड़ा, मावा कचोरी, जयपुरी राजभोग, गुलाबजामुन, जोधपुरी दूध के लड्डू, जयपुरी घेवर, अलवरी मिल्क केक, मोतीचूर के लड्डू, माखनिया लस्सी, मसाला चाय सहित राजथानी व्यंजनों की महक से महकेगा सेंट्रल विस्टा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Sep 2024 17:27:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>'इंडिया गेट'</title>
                                    <description><![CDATA[पर्दे के पीछे की खबरें जो जानना चाहते है आप....]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/india-gate/article-14065"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-07/qutub-minar,delhi,india1.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>ठाकरे का तिया पांचा! </strong><br />तो महाराष्ट्र में शिवसेना की अगुवाई वाली एमवीए सरकार गिरी ही नहीं। बल्कि अब उद्धव ठाकरे की शिवसेना के अस्तित्व पर ही संकट के बादल। पार्टी और संगठन में फूट के आसार। फिर लोकसभा एवं राज्यसभा के सांसद भी। क्योंकि खुद शिवसेना ने ही विधानसभा परिसर में पार्टी ऑफिस में ताला लगा दिया। मतलब शिंदे गुट का इस कदर डर। आशंका यह कि शरद पवार की इसमें पर्दे के पीछे से भूमिका। क्योंकि कांग्रेस तो कॉमन मिनिमम प्रोग्राम का राग अलापती रही। लेकिन पवार साहब इस सरकार के गठन से लेकर चलवाने तक का ठेका लिए थे। फिर भी सरकार गिर गई। सो, तोहमत तो पवार साहब पर आएगा ही। हां, कांग्रेस अध्यक्ष नाना पटोले बहुत पहले कह चुके। भविष्य में होने वाला कोई भी चुनाव कांग्रेस अकेले ही लड़ेगी। मतलब शिंदे के साथ भाजपा की भी चांदी। वह बाला साहब के शिष्य को सीएम बनवाकर आज सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत। दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे का तिया पांचा भी हो चुका!</p>
<p><strong>दक्षिण में सुगबुगाहट!</strong><br />तमिलनाडु में राजनीतिक सुगबुगाहट। मसला राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी प्रत्याशी यशवंत सिन्हा के लिए समर्थन मांगने का। पिछले दिनों मीडिया में खबर आई कि राहुल गांधी ने अम्मा की पार्टी के नेता पलानीस्वामी से सिन्हा के लिए समर्थन मांगा। चूंकि तमिलनाडु में इस समय डीएमके सत्ता में और स्टालिन सीएम। तमिलनाडु की राजनीति में डीएमके और अम्मा की पार्टी के बीच 36 का आंकड़ा। तिस पर कांग्रेस राज्य में डीएमके की सहयोगी। देशभर में वैसे ही कांग्रेस की हालत पतली। सो, कहीं एक और सत्तारूढ़ राज्य में गठबंधन सहयोगी नाराज नहीं हो जाए। इसीलिए तुरंत महासचिव जयराम रमेश द्वारा सफाई आई कि खबर भ्रामक। वैसे कांग्रेस संप्रग का सबसे बड़ा घटक दल। फिर कांग्रेस द्वारा राजग के घटक दलों से भी समर्थन मांगने में हर्ज ही क्या? यह एक स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया। असल में, कांग्रेस को डीएमके ने वादा करने के बावजूद तमिलनाडु से कांग्रेस को एक राज्यसभा सीट नहीं दी है। इसीलिए यह गठबंधन में संभावित खटपट को रोकने की कवायद!</p>
<p><strong>क्षत्रपों के दिन!</strong><br />तेलंगाना के केसीआर की छटपटाहट बहुत कुछ बयां कर रही। उद्धव ठाकरे अभी होश में नहीं। जिनके बारे में ममता दीदी भी बोलीं। उधर, चंद्राबाबू अभी तक संभल नहीं पा रहे। इधर, हेमंत सोरेन भी चौकन्ने। सतर्क तो नितिश कुमार भी। हां, नवीन चुपचाप। वहीं, जगन मोहन भी फिलहाल काफी कुछ मुतमईन। क्योंकि चंद्रबाबू नायडू मुसीबत में। दक्षिण में एआईडीएमके में नेतृत्व का झगड़ा। यानी जिस तरह से उद्धव ठाकरे राजनीति में पराभाव के कगार पर। बाकी सब क्षत्रप परेशान हो रहे होंगे! क्या 21वीं सदी के तीसरे दशक में भारत की राजनीति करवट लेने की ओर? एक दौर था। जब देश के कई क्षत्रपों ने केन्द्र में दमदारी से अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई। मुलायम सिंह के वारिस भी दिशाहीन नजर आ रहे। हालिया दो लोकसभा उपुचनाव की हार किसी को नहीं पच रही। अकाली दल बादल में भी नेतृत्व परिवर्तन का दबाव। मायावती अभी भी अपना राजनीतिक वारिस घोषित नहीं कर पाईं। मतलब चारों ओर क्षत्रपों के दिन खराब होने वाले?</p>
<p><strong>एनसी-पीडीपी साथ-साथ!</strong><br />तो जम्मू-कश्मीर का चुनाव गुपकार गठबंधन के बैनर तले नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी साथ-साथ लड़ेंगी। फिलहाल तो दोनों ने यही इरादा जाहिर किया। लेकिन बाकी दलों में 90 सीटो में बंटवारा कैसे होगा। यह समय बताएगा। जिस प्रकार से नए परीसीमन और अनुच्छेद-370 के खात्मे के बाद विधानसभा चुनाव होंगे। उसके परिणामों पर देश ही नहीं तमाम दुनियां की नजरें होंगी। सो, विधानसभा चुनाव काफी दिलचरूप होगा। अनुमान जताया जा रहा कि इसी अक्टूबर-नवंबर या अगले साल मार्च में चुनाव होंगे। अभी मतदाता सूचियों में संशोधन का काम हो रहा। यह होते ही चुनावी प्रक्रिया शुरू होने की आस। लेकिन फारूख अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जिस तरह से संकेत कर रहे। उससे लग रहा कि यह दोनों भी इस बार पूरी तरह से मुतमईन नहीं। न वैसे वादे, न इरादे और न दशा एवं दिशा। हां, भाजपा मानकर चल रही। वह खुद सत्तारूढ़ नहीं भी हुई। तो उसके बिना सरकार भी नहीं बनेगी। बस यही चिंता एनसी-पीडीपी खाए जा रही। फिर क्या होगा?</p>
<p><strong>ईडी सरकार!</strong><br />ईडी का मतलब वैसे तो प्रवर्तन निदेशालय। जिसे लेकर सत्तापक्ष पर विपक्ष हमेशा हमलावर रहता। लेकिन महाराष्ट्र  विधानसभा में डिप्टी सीएम बने देवेन्द्र फड़नवीस ने बकायदा माना। हां, यह ईडी सरकार। मतलब एकनाथ शिंदे एवं देवेन्द्र फड़नवीस की सरकार। असल में, कल तक सत्तारूढ़ रहे एमवीए गठबंधन के घटक दलों ने विधानसभा में ईडी-ईडी के नारे लगाए। जिस पर फड़नवीस की ओर से यह जवाब आया। जबकि विपक्ष यानी एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना का आरोप कि यह सरकार ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय के जरिए सत्तारूढ़ हुई। वैसे कांग्रेस के 11 और एनसीपी के सात विधायकों ने बहुमत परीक्षण के दौरान गैर हाजिर रहकर जता दिया कि खेल अभी खत्म नहीं। बल्कि खतरा अभी बना हुआ। शिवसेना तो टूट गई। अब एनसीपी और कांग्रेस को भी यही डर सता रहा। शिवसेना की हालत तो माया मिल न राम वाली। फिर सबसे बड़ा मसला मुंबई महानगर पालिका के चुनाव का। जो जल्द ही होने वाले। यहां माना जा रहा। एमवीए के घटक दल अकेले लड़ेंगे!</p>
<p><strong>ब्रिटेन में भारत-पाक!</strong><br />एक दौर था। गोरों के साम्राज्य का कभी सूरज अस्त नहीं होता था। मतलब भारत समेत पूर्व से लेकर पश्चिम तक गोरों का दुनियां के इतने इलाकों पर शासन था कि हमेशा कहीं न कहीं दिन होता था। लेकिन अब समय का फेर। ब्रिटेन में अब ऐसी नौबत आ गई कि भारतीय या पाकिस्तानी मूल के दो नेता पीएम की कुर्सी के करीब माने जा रहे। इसमें भारतीय मूल के नेता ने तो पीएम की गद्दी पर दावा भी ठोक दिया। असल में, ब्रिटिश पीएम बोरिस जॉनसन का इस्तीफा हो गया। उनके खिलाफ नैतिकता से लेकर कोरोना नियमों का उल्लघंन जैसे मामले। इस बीच, सत्ताधारी कन्जर्वेटिव पार्टी के वित्त मंत्री रहे ऋषि सुनक भारतीय मूल के। तो दूसरे स्वास्थ्य मंत्री रहे साजिद जावेद पाकिस्तान मूल के। दोनों को ही पीएम पद का दावेदार माना जा रहा। हां, बात चाहे क्रिकेट की हो या यूएनओ की। भारत-पाक के बीच हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहता आया। अब मैदान ब्रिटेन की राजनीति बनने जा रहा!<br />-दिल्ली डेस्क</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 Jul 2022 16:16:06 +0530</pubDate>
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                <title>सतरंगी सियासत</title>
                                    <description><![CDATA[कांग्रेस अब राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ही सत्तारूढ़। अभी वह झारखंड में भी सत्ता में हिस्सेदार। लेकिन देखते ही देखते महाराष्ट्र हाथ से निकल गया। जहां कांग्रेस एमवीए गठबंधन में हिस्सा थी। हालात ऐसे बन रहे कि अब कब झारखंड भी चला जाए। कहा नहीं जा सकता।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/sarangi-politics/article-13566"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-07/qutub-minar,delhi,india.jpg" alt=""></a><br /><p>कांग्रेस अब राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ही सत्तारूढ़। अभी वह झारखंड में भी सत्ता में हिस्सेदार। लेकिन देखते ही देखते महाराष्ट्र हाथ से निकल गया। जहां कांग्रेस एमवीए गठबंधन में हिस्सा थी। हालात ऐसे बन रहे कि अब कब झारखंड भी चला जाए। कहा नहीं जा सकता। राष्ट्रपति चुनाव में इसकी सुगबुगाहट भी दिखाई पड़ रही। इस बीच, बिहार में भी कांग्रेस विधायक दल कहीं टूट न जाए। इसी का अंदेशा जताया जा रहा। आखिर वहां भाजपा-जदयू के बीच राजनीतिक रस्साकशी जो चल रही। साल के अंत में गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव। जिसमें गुजरात में बहुत उत्साहजनक संकेत नहीं। फिर अगले साल कर्नाटक के भी चुनाव। कांग्रेस उत्तर पूर्व के राज्यों में पहले ही साफ हो चुकी। जहां उसने एकछत्र राज किया। लेकिन अब बिल्कुल नदारद। फिर सितंबर तक नए अध्यक्ष का चुनाव भी। हां, राहुल गांधी से ईडी द्वारा पांच दिन तक लगातार की गई पूछताछ के बाद पार्टी ह्यचार्जह्ण नजर आ रही। लेकिन यह कब तक रहेगी?</p>
<p><strong>महाराष्ट्र का खेला!</strong></p>
<p>तो मराठा प्रदेश में खेला हो गया। काफी कुछ उलट पुलट गया। अब कहा जा रहा। भाजपा की सबसे पहले नजर मुंबई महानगर पालिका पर। जिसका बजट ही देश के कई छोटे राज्यों से ज्यादा। अगर मनपा में बदलाव हुआ। तो इसका मतलब होगा शिवसेना की सीधे रीढ़ पर चोट। फिर 2024 का आम चुनाव। जहां भाजपा की नजर पूरी 48 सीटों के समीकरणों पर। भाजपा ने शिवसेना के बागी गुट के मराठा नेता एकनाथ शिंदे को सीएम बनाकर करीब 32 फीसदी मराठाओं को भी साध ही लिया। उसके बाद 2024 के अंत में राज्य में विधानसभा चुनाव। तब तक भाजपा अपनी जमीनी पकड़ काफी मजबूत कर चुकी होगी। ऐसे में जिनको यह भ्रम कि राजनीति में कल क्या होगा! ऐसा सोचने वालों के लिए भी यह घटनाक्रम एक नजीर। भाजपा काफी आगे की सोचकर चल रही। इसीलिए पूर्व सीएम फड़नवीस को छोटा ओहदा देकर भी नेतृत्व द्वारा मना लिया गया। मतलब उसने साथ में अपनी रणनीति का भी लौहा मनवा लिया।</p>
<p><strong>संकेत साफ!</strong></p>
<p>बिहार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। भाजपा एवं जदयू की बयानबाजी अब एक सीमा के पार हो रही। अब तो जदयू की ओर से यहां तक कहा गया। नितिश ही राजग और राजग ही नितिश। मतलब एकदम साफ संकेत। कुछ बड़ा होने जा रहा। इसी को भांपते हुए चार एमआईएम विधायक राजद में जा मिले। जबकि कायदे से उन्हें जाना तो सत्ता के साथ था। लेकिन उन्होंने विपक्षी राजद के तेजस्वी को चुना। लालू 2017 में नितिश से गच्चा खा चुके। सो, उतना भरोसा नहीं। फिर पहले से जदयू की राजनीतिक ताकत भी आधी। वैसे जदयू में पहले ही असमंजस के हालात। आरसीपी सिंह अभी केन्द्र में मंत्री बने हुए। इस्तीफा नहीं हुआ। उनके बदले पार्टी अध्यक्ष लल्लन कुमार सिंह के मंत्री बनने के आसार बन रहे। साथ में बिहार में निर्बाध सरकार चलाने के लिहाज से भाजपा ने एक और मंत्री का आफर दे दिया बताया। लेकिन मामला कुछ और ही लग रहा। लालूजी शतरंज की चाल जो चल रहे।</p>
<p><strong>मरुधरा में आहट!</strong></p>
<p>राजस्थान में सीएम अशोक गहलोत और पूर्व डिप्टी सीएम पायलट की बयानबाजी ने राजनीतिक सरगर्मी तेज कर दी। कार्यकतार्ओं और राजनीति के जानकारों की जिज्ञासाएं बढ़ा दीं। ऐसे में अगले एक दो माह में क्या होने वाला? चर्चा यह कि अगस्त के अंत तक 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव की दशा और दिशा तय होने वाली। लेकिन क्या यह इतना आसान? कयास तो पहले भी कई प्रकार के लगते रहे। लेकिन अभी तक वैसा कुछ भी नहीं हुआ। उदयपुर की घटना ने सभी को अचम्भित कर दिया। तीन चार दिनों तक इंटरनेट बंद रखना पड़ा। इससे समाज जीवन के कई कामों पर असर हुआ। फिर कांग्रेस नेतृत्व के सामने पंजाब का उदाहरण भी। वहीं, पार्टी नेतृत्व के समक्ष एक युवा नेता को रोके रखने की भी चुनौति। इसी बीच, सवाल यह कि क्या आलाकमान किसी भी प्रकार का जोखिम मोल लेगा? यदि जोखिम ले भी लिया। तो उसकी परिणति का भी भान होगा ही। फिर क्या उसे जमीन पर उतार पाएगा?</p>
<p><strong>तेलंगाना पर नजर</strong></p>
<p>भाजपा तेलंगाना में प्रभावी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज करवाने कोशिश में जुटी हुई। भाजपा को तेलंगाना राजनीतिक दृष्टि से उर्वरा लग रहा। टीआरएस अध्यक्ष एवं राज्य के सीएम केसीआर की बचैनी और बौखलाहट साफ बता रही। इसीलिए उन्होंने कांग्रेस को छोड़कर भाजपा को विरोध के लिए पकड़ लिया। जबकि कांग्रेस भी कह चुकी। वह पूरे दमखम से तेलंगाना में चुनाव लड़ेगी। मतलब भाजपा विरोध वोट बंटेगा। पीएम मोदी और भाजपा अगली बार परिवारवाद पर चोट करने जा रहे। वहां भी शिंदे तलाशने की कोशिश शुरू हो चुकी। मतलब कर्नाटक के बाद दक्षिण में भाजपा यहीं धूणी जमाने की फिराक में। वैसे वह पुड्डुचेरी में सफलता पा चुकी। लेकिन राजनीतिक लिहाज से वह उतना प्रभावी नहीं। ऐसे में तेलंगाना में यदि भाजपा प्रमुख विपक्ष की भूमिका में भी आ जाए। तो यह बड़ी उपलब्धि होगी। ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव को जिस तरह से भाजपा ने लिया। उससे टीआरएस ही नहीं कांग्रेस भी सकते में। इसीलिए भाजपा कार्यसमिति की बैठक भी यहीं रखी गई।</p>
<p><strong>नजरअंदाजी या लापरवाही?</strong></p>
<p>सपा प्रमुख अखिलेश यादव को दोहरा झटका। आजमगढ़ ही नहीं रामपुर लोकसभा उपचुनाव भी हार गए। आजमगढ में भाई धर्मेन्द्र यादव। तो रामपुर में आजम खान का चुना हुआ पार्टी प्रत्याशी खेत रहा। जबकि अभी मार्च में ही हुए विधानसभा चुनाव में इन दोनों ही क्षेत्रों में सपा को अच्छी खासी सफलता मिली थी। अब तो सपा के विधायक भी ढाई गुना से ज्यादा हो गए। फिर लोकसभा चुनाव की अभी से ही चिंता हो रही। चर्चा यह भी कि उनका मुस्लिम-यादव वोट बैंक भी इधर-उधर हो सकता है। क्योंकि भले ही यादव समाज विधानसभा में सपा को वोट देता हो। लेकिन आम चुनाव में सपा को उतना समर्थन नहीं मिलता। इसी प्रकार यूपी विधानसभा चुनाव के बाद जैसी बैरूखी मुस्लिम समाज के प्रति अखिलेश ने दिखाई। उससे वह बहुत निराश एवं हताश। अब वह भी विकल्प की तलाश में। अब यह थोक वोट बैंक कहां जाकर रूकेगा। फिलहाल तो किसी को पता नहीं। लेकिन सपा का अच्छा खासा नुकसान जरूर होगा।</p>
<p><strong>-दिल्ली डेस्क</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 Jul 2022 13:14:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> 'इंडिया गेट'</title>
                                    <description><![CDATA[पर्दे के पीछे की खबरें जो जानना चाहते है आप....]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/india-gate/article-13082"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/qutub-minar,delhi,india.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>एमवीए का झमेला!</strong><br />महाराष्ट्र में एमवीए का झमेला जारी। गठबंधन सरकार हिचकोले ले रही। हां, कांग्रेस सतर्क। तो एनसीपी इधर-उधर देख रही। आखिर वहां पवार जैसा दिग्गज नेता। इसी बीच, एकनाथ शिंदे ने बवंडर कर दिया। अब कई कानूनी पेचिदगियां सामने। बागी गुट भी कानूनी एवं राजनीतिक दावंपेच में मशगूल। तो पवार खुद उद्धव ठाकरे को आगे कर रहे। इससे पहले वह 2019 में कारनामा कर चुके। जब राजनीतिक समझ से एमवीए सरकार बनवा दी। अब हालात फिर से वही लग रहे। अब सवाल यहीं। कहीं, उद्धव ठाकरे ही तो चाल नहीं चल रहे? अब शिवसेना या तो टूटेगी या भाजपा से जा मिलेगी! साल 2024 में लोकसभा और उसके बाद विधानसभा चुनाव। शिवसेना के सांसदों एवं विधायकों का डर लाजमी। क्योंकि वह जीतकर तो भाजपा के साथ आए थे। लेकिन अब किस मुंह से गठबंधन के साथ मैदान में जाएंगे। फिर अभी तो भाजपा के साथ आधी सीटों का बंटवारा हुआ। लेकिन अब एमवीए में तो तीन हिस्सेदार। फिर वैचारिक समानता तो कहीं नहीं।</p>
<p><br /><strong>दो और लाइन में...</strong><br />महाराष्ट्र के बाद दो और सरकारें लाइन में! राजनीतिक गलियारे में यही चर्चा। बस राष्ट्रपति चुनाव निपटने की देरी। यदि महाराष्ट्र की बगावत अंजाम तक पहुंची। तो झारखंड और बिहार का नंबर लगेगा! वैसे भी झारखंड में गठबंधन धर्म की अग्निपरीक्षा। यहां जेएमएम राष्ट्रपति चुनाव में पसोपेश में। विपक्ष के साथ जाए या एनडीए की आदिवासी प्रत्याशी के साथ खड़ी हो। सो, यदि जेएमएम राजग की द्रौपदी मुर्मू के साथ गई। तो गठबंधन में दरार के आसार। दूसरे, बिहार में सब कुछ ठीक नहीं। भाजपा एवं जदयू लगभग आमने सामने। बयानबाजी से तो यही लग रहा। बिहार में समीकरण ऐसे उलझे हुए कि बस पूछो मत। आरसीपी की विदाई हो रही। तो लल्लन सिंह को खुद पीएम अपने पास सटा रहे। आरसीपी सिंह पूर्व तो लल्लन सिंह वर्तमान जदयू अध्यक्ष। उधर, राजद नितिश पर पहले जैसा भरोसा नहीं कर पा रहा। इधर, कांग्रेस के 19 एमएलए में से एक दर्जन लगभग तैयार बैठे हुए। कोई तो पूछे। बस चिंगारी देना बाकी!</p>
<p><br /><strong>कश्मीर में जी-20...</strong><br />पाक को मिर्च लग गई। जम्मू-कश्मीर में जी-20 जैसा सम्मेलन का प्रस्ताव। इसके मायने। यह भारत की बढ़ती ताकत और रसूख का प्रमाण। पाक के दुष्प्रचार का इससे अच्छा क्या जवाब होगा? असल में, भारत का इरादा उन ताकतों को बताना कि वह अब उसे हल्के में नहीं लें। कश्मीर के बहाने पाक के दुष्प्रचार के पीछे जो ताकतें लगी हुईं। उनको भी सीधा संकेत। बहुत हो गया। अब नहीं चलेगा। कश्मीर स्थिर एवं शांत। यूएनओ या अन्य मंचों पर क्या होता रहा। लेकिन धरातल पर क्या स्थिति। यह बताने का इरादा। वैसे भी भारत अब यूएनओ या अमरीका ही नहीं यूरोप को भी समझा चुका। यदि उसे ज्ञान दिया जाएगा! तो भारत की भी सुननी पड़ेगी। रूस पर ज्ञान देने वाले अंदर से कितने खोखले। भारत उसकी पोल खोल चुका। बात चाहे तेल आयात की हो या रूस के साथ व्यापार की। बड़े देश चुप्पी साध गए। और यह याद दिलाने के लिए एस. जयशंकर। जो हर कूटनीतिक पैंतरे से लैस।</p>
<p><br /><strong>लड़ाई विरासत की!</strong><br />तमिलनाडु की एआईएडीएमके चर्चा में। जहां अम्मा यानी जयललिता की विरासत पर कब्जे की लड़ाई सतह पर। ओ पनीरसेल्वम एवं पलानीस्वामी के बीच सरेआम जूतम पैजार की नौबत। तमिलनाडु में एक जमाने जबरदस्त पकड़ रखने वाली अम्मा की पार्टी एआईएडीएमके उनके जाने के बाद डांवाडोल। जिसे रोकने वाला कोई दिग्गज नहीं। अम्मा ने समय रहते भावी नेतृत्व उभारा नहीं। न ही इसका कभी संकेत किया। कोशिश तो शशिकला नटराजन ने भी की थी। लेकिन उन्हें जेल हो गई। बाहर आईं तो बहुत कुछ बदल चुका था। उनके भतीजे ने प्रयास किया। लेकिन वह चुनावी गुबार के साथ खत्म हो गया। लेकिन अब दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के बीच मानो फैसलाकुन रार। बात राजनीतिक विरासत के साथ ही पार्टी की संपत्तियां भी होगी। डीएमके के स्टालीन तो समय रहते वारिस घोषित हो गए। लेकिन एआईएडीएमके इस मामले में पीछे रह गई। विभाजन तो डीएमके में भी हुआ। लेकिन करूणानिधि ने समय रहते संभाला। लेकिन अम्मा यह काम नहीं कर पाईं। सो, बिखराव की नौबत।<br /><strong>चार्ज हो गई!</strong><br />कोई माने या नहीं माने। लेकिन राहुल गांधी से ईडी की पूछताछ के बहाने कांग्रेस देशभर में जार्च हो गई। राहुल गांधी के पीछे पूरी पार्टी खड़ी नजर आई। सड़क पर संघर्ष देखने को मिला। शायद सरकार या भाजपा भी यही चाहती होगी। वरना उसको इन सबका पता न हो। ऐसा हो नहीं सकता। असल में, अब तैयारी 2024 की। राष्ट्रपति चुनाव इसका पड़ाव। ऐसे में राहुल गांधी के पीछे पार्टी वर्कर यदि खडा हो गया। तो समझो क्षेत्रीय दलों को भी खतरा। यदि कांग्रेस जमीन पर मजबूत हुई। तो सबसे से ज्यादा नुकसान क्षेत्रीय दलों को ही होगा। क्योंकि कांग्रेस एवं क्षेत्रीय दलों का वोट बैंक लगभग एक जैसा ही। भाजपा का अपना वोट बैंक। अब भाजपा के मुकाबले विरोधी वोट बैंक बंटा। तो लाभ में भाजपा ही रहेगी। फिर वैसे भी कांग्रेस पैन इंडियन पार्टी। कोई भी नहीं चाहेगा कि भाजपा जैसी मजबूत पार्टी के आगे कांग्रेस जैसी ग्रेंड ओल्ड पार्टी कमजोर पड़े। आखिर समृद्ध लोकतंत्र का भी यही तकाजा।</p>
<p><br /><strong>केरल में पंगा!</strong><br />कांग्रेस और वामदलों का भी अजब साथ। पश्चिम बंगाल में साथ लड़ेंगे। लेकिन केरल में आमने सामने होंगे। फिलहाल अभी दिल्ली में राष्ट्रपति पद के चुनाव में विपक्ष के संयुक्त प्रत्याशी को समर्थन दे रहे। इस बीच, केरल में राहुल गांधी के सांसद कार्यालय पर हमला हो गया। आरोप माकपा के छात्र संगठन एसएफआई पर लगा। अब लोग कह रहे। यह क्या? यह कैसी राजनीति? एक राज्य में साथ। तो दूसरे राज्य में सत्ता के संघर्ष के लिए आमने सामने। दोनों दल दिल्ली में बीते करीब दो दशकों से साथ-साथ। राजनीति की यह कैसी सुविधा, असुविधा? लोकसभा सांसद राहुल गांधी के कार्यालय पर हमला होना कोई सामान्य घटना नहीं। असल में, कांग्रेस एवं वाम का केरल में बहुत कुछ स्टेक पर। जहां दोनों ही सत्ता की दावेदार। कांग्रेस के लिए केरल संभावित राज्य। तो वामदल भी अब यहीं बचे हुए। बंगाल और त्रिपुरा उनके हाथ से जा चुके। इसलिए सत्ता के लिए संघर्ष होना स्वाभाविक। लेकिन इसके लिए हिंसक लडाई कहां तक जायज?<br /><strong>-दिल्ली डेस्क</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Jun 2022 13:02:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>'इंडिया गेट'</title>
                                    <description><![CDATA[जानें इंडिया गेट में क्या है खास]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/india-gate/article-11984"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/india-gate01.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>रंग में भंग...</strong><br />नुपुर शर्मा एवं नवीन जिंदल प्रकरण से मानो मोदी सरकार के आठ साल पूरे होने का जश्न खराब कर दिया। मतलब रंग में भंग पड़ गया। जनता को बताने के लिए अच्छा खासा उपलब्धियों का पिटारा था। लेकिन अचानक सामने आए इस विवाद से सारा स्वाद कसेला हो गया। इसीलिए जब मीडिया का फोकस उधर गया। तो कार्रवाई करनी पड़ी। साथ में पार्टी और सरकार ने प्रवक्ताओं के कथनों से पल्ला भी झाड़ लिया। अब कहा जा रहा। यह सब विरोधियों की चाल को विफल करने के लिए ठंडे छींटे डाले गए। वैसे इससे पहले भी ऐसे वाकिए होते रहे। लेकिन चर्चा इसी प्रकरण की हो रही। देशभर में विरोध के सुर। फिर सोशल मीडिया इसके असर से कैसे बचेगा। लेकिन कार्रवाई की असली वजह आठ साल का जश्न ही! कहां तो बात विकास का होनी चाहिए थी और बात नुपूर के बयान पर आकर अटक गई। फिर गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव की योजना भी इसी के साथ बनी थी।</p>
<p><br /><strong>कोई चेहरा नहीं होगा...</strong><br />राज्यसभा से टिकट कटने के बाद केन्द्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी को रामपुर लोकसभा उपचुनाव में भी मौका नहीं मिला। उच्च सदन में अब भाजपा का कोई मुस्लिम चेहरा नहीं बचा। नकवी के साथ ही राज्यसभा से एमजे अकबर और जफर इस्लाम का कार्यकाल भी खत्म हो गया। जो इन दिनों राजनीतिक गलियारे में चर्चा का विषय। लोकसभा में भी भाजपा का कोई मुस्लिम सांसद नहीं। सिर्फ गठबंधन सहयोगी का एक सदस्य। अब उच्च सदन में भी नहीं होगा। ऐसे में भाजपा का संकेत और संदेश क्या? पार्टी किस रणनीति पर काम कर रही? चर्चा यह भी कि भाजपा नेतृत्व नकवी को कोई बड़ा अवसर देने के मूड में। या फिर अगले आम चुनाव में वोट जुटाने के लिए संगठन में काम का मौका दिया जाए। वैसे भले ही जफर इस्लाम को बाद में कहीं से मौका मिले। लेकिन एमजे अकबर की संभावनाएं कम हीं। आखिर भाजपा मुस्लिम समुदाय को लेकर किस रणनीति पर काम कर रही? यही सभी में जिज्ञासा।</p>
<p><br /><strong>हाथ खींचा...</strong><br />यूपी कांग्रेस की कमान प्रियंका गांधी के हाथों में। करीब तीन माह से वहां पीसीसी चीफ का पद भी खाली। अब पार्टी की हालत यह हो गई कि रामपुर और आजमगढ़ के लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस अपना प्रत्याशी तक नहीं उतार पाई। प्रियंका गांधी राज्य में पिछले आम चुनाव से ही सक्रिय। अब वह कांग्रेस का चेहरा। जिसे वह कह भी चुकीं। इसके बावजूद दोनों उपचुनाव में पार्टी ने उम्मीदवार उतारने से हाथ खींच लिए। आखिर कांग्रेस की इस हालत के लिए जिम्मेदार कौन? उदयपुर में चिंतन शिविर तो हुआ। लेकिन यूपी से कोई जिम्मेदार नेता वहां नहीं था। ऐसा कहा गया। और जब बात राज्यसभा चुनाव की आई। तो प्रमोद तिवारी को राजस्थान से, राजीव शुक्ल को छत्तीसगढ़ और इमरान प्रतापगढ़ी को महाराष्ट्र से मौका दिया गया। लेकिन मैदान में उतरकर पसीना बहाने वाला कोई नहीं मिल रहा। जबकि देश के सबसे बड़े सूबे में आम चुनाव में भी जाना होगा। आखिर भाजपा और सपा को वॉक ओवर देना कहां तक ठीक?</p>
<p><br /><strong>अग्निपरीक्षा?</strong><br />तो सीएम गहलोत अग्निपरीक्षा पार कर गए। राज्यसभा चुनाव में वह राजनीति के जादूगर ही साबित हुए। साथ ही भीतर और बाहर वालों के लिए इक्कीस! अब समीकरण बदले हुए होंगे। प्रदेश में सरकार और संगठन पर पकड़ मजबूत होगी। राष्ट्रीय स्तर पर भी कद बढ़ेगा। अब 2023 तक कोई न बाधा और न कोई रूकावट। न कोई चुनौती देने वाला। अब इससे आगे क्या? गहलोत तो भाजपा में भी सेंध लगाने में कामयाब रहे। सो, खटपट तो वहां भी संभावित। हां, अब पार्टी में उनके विरोधी ठंडे पड़ जाएंगे। एक बात और। उन बागियों का क्या? जो 2023 में विधानसभा चुनाव तो लड़ना चाहेंगे। लेकिन उनके टिकट का क्या होगा? क्योंकि इसका दारोमदार गहलोत पर ही रहेगा। फिर अब प्रभारी अजय माकन की बात का वजन कितना रहेगा? अब चर्चा यहां तक। प्रभारी महासचिव में बदलाव संभव। क्योंकि माकन को पार्टी संगठन में एक नए ईजाद होने वाले विभाग की जिम्मेदारी मिलेगी! फिर राजस्थान का प्रभारी भी गहलोत की पसंद का ही होगा!</p>
<p><br /><strong>इस तैयारी का अर्थ ..!</strong><br />नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी बीते साल साल से जमानत पर। आरोप मनी लॉड्रिंग का। अब बात ईडी द्वारा पूछताछ तक आ गई। सो, सोमवार को राहुल गांधी इसी मामले में ईडी के समक्ष उसके कार्यालय में पेश होंगे। लेकिन जब राहुल गांधी ईडी आॅफिस जाएंगे। तब पार्टी के तमाम सांसद और सभी महासचिव, प्रदेश प्रभारी और पीसीसी चीफ भी जुटेंगे। मतलब पूरा लमाजवा होगा। इस तैयारी के भी मायने! क्या कांग्रेस को इससे आगे की आशंका? इसीलिए विरोध का पुख्ता इंतजाम? जो रविवार से ही शुरू हो गया। लेकिन ऐसी क्या बात। जो कांग्रेस को विरोध का सुर इतना तीखा करना पड़ रहा। देशभर में प्रदर्शन की तैयारी। कांग्रेस में चल क्या रहा? इसे समझना जरुरी। हां, पार्टी का कार्यकर्ता इससे जरुर ‘बूस्टअप’ हो जाएगा। जो पार्टी के लिए अच्छा होगा। साथ ही भाजपा के लिए भी! क्योंकि मोदी सबसे ज्यादा हमलावर कांग्रेस पर ही रहते। आखिर कांग्रेस आज भी एक पैन इंडिया पार्टी।</p>
<p><br /><strong>संभावनाओं का खेल...</strong><br />राजनीति असीम संभावनाओं का खेल। कब क्या हो जाए। कुछ पता नहीं। कौन किधर चला जाए और कौन कब किससे आ मिले। बिहार में सत्ताधारी जदयू में घमासान की तैयारी हो रही! कहां एक समय लल्लन सिंह साइड लाइन हो गए और आरसीपी सिंह नितिश कुमार की आंख, कान हो गए। बाजी पलटी तो अब आरसीपी सिंह साइड हो गए। और लल्लन सिंह जदयू अध्यक्ष। सो, पुरानी हिसाब चुकता करना तो बनता। अदावत बढ़ती ही जा रही। अब चर्चा आरसीपी सिंह द्वारा अलग राह लेने की। संगठन में काम किया। इसीलिए पूर्व नौकरशाह होने के बावजूद जनता से कनेक्ट होने माद्दा। अब केन्द्रीय मंत्री पद पर तलवार लटक रही। इधर नितिश भी कुछ बोल नहीं रहे। इसी बीच, आरसीपी सिंह राज्य में राजनीतिक उपेक्षितों का मन टटोल रहे! बात चाहे लोजपा, हम या वीआईपी दल की हो। समीकरण बैठाने की कोशिश हो रही। दावा यह कि यह सब मिलाकर करीब 17 फीसदी वोट। अब राजद और जदयू का दौरा जाने का वक्त!<br /><strong>-दिल्ली डेस्क</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Jun 2022 11:18:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>'इंडिया गेट'</title>
                                    <description><![CDATA[पर्दे के पीछे की खबरें जो जानना चाहते है आप....]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/know-what-is-special-in-india-gate/article-9428"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/india-gate02.jpg" alt=""></a><br /><p>मैदान में पीके!<br />तो आखिरकार प्रशांत कुमार यानी पीके ने राजनीति के मैदान में उतरने का संकेत कर ही दिया। शुरूआत बिहार से करेंगे। सो, सभी राजनीतिक दल उन पर पिल पड़े। हालांकि वह जदयू के उपाध्यक्ष रह चुके। उसके बाद उन्होंने बिहार की हर ग्राम पंचायत से युवा नेतृत्व को आगे लाने का मिशन शुरू किया। लेकिन अचानक उस पर विराम लगा दिया। बहाना कोरोना महामारी का। लेकिन जब उनकी कांग्रेस से बात बिगड़ गई। तो हुंकार भर रहे। कहा, दस साल हो गए। अब जमीन पर कुछ नया करना होगा। लेकिन जमीनी राजनीति करना और पार्टियों से ठेका लेकर जितवाने के लिए आइडिया देना अलग बात! यह डगर इतनी आसान नहीं। आज जो राजनीति के शीर्ष पर। उन्होंने दशकों तक जमीन पर आम जनता के बीच काम किया। उसके बाद ही जनता ने उन्हें भरोसा करके आशीर्वाद दिया। अब सवाल पीके का। उन्होंने अब तक जमीन पर लोगों के लिए किया क्या? अलावा कंप्यूटर पर आंकड़ों का विश्लेषण करने के और पैसा भी कमाया।</p>
<p><br /><strong>शह, मात.. कश्मकश!</strong><br />बिहार में भविष्य की राजनीति के लिहाज से बुहत कुछ घटित हो रहा। सीएम नितिश कुमार संकेत दे रहे। सत्ता में सहयोगी भाजपा समेत विपक्षी राजद को भी। पहले नितिश पूर्व सीएम राबड़ी देवी के आवास पर आयोजित इफ्तार में गए। तो अगले ही दिन प्रोटोकॉल तोड़कर अमित शाह का स्वागत करने एयरपोर्ट पहुंच गए। अब इससे कई तरह के कयास, चचार्एं। उपर से उनके दिल्ली आने की चचार्एं और भाजपा की इच्छा कि उसका सीएम बने। अब बिहर विधानसभा का वर्तमान में समीकरण ऐसा कि जिधर नितिश जाएंगे। सत्ता उधर ही होगी। हां, भाजपा की सहयोगी वीईपी का कुनबा बिखर गया। जबकि चिराग पासवान की लोजपा पहले ही खेत रही। अब डर तो हम के जीतनराम मांझी को भी सता रहा। वहीं, लालूजी के परिवार में भी सब कुछ ठीक ठाक नहीं। उनके बड़े पुत्र तेजप्रताप बगावत के सुर दे रहे। क्योंकि लालूजी की राजनीतिक विरासत उनके छोटे भाई तेजस्वी यादव के पास जा रही। उम्मीद कि राष्ट्रपति चुनाव तक तस्वीर साफ हो।</p>
<p><br /><strong>राष्ट्रपति चुनाव..</strong><br />देश के अगले राष्ट्रपति के चुनाव के लिए सुगबुाहट सुनाई देने लगी। सत्ता पक्ष में नहीं। बल्कि कांग्रेस के अगुवाई वाले विपक्ष में। चर्चा यह कि कांग्रेस समेत वामदल सक्रिय हो रहे। भाजपा विरोधी दल एक साझा प्रत्याशी उतारने के पक्ष में। केसीआर ने वायएसआर के जगनमोहन रेड्डी एवं बीजद के नवीन पटनायक से बात की बताई। लेकिन उन्होंने कांग्रेस के साथ जाने से इनकार किया बताया। असल में, यह दोनों ही दल विरोध के फेर में भाजपा से बैर मोल लेने एवं कांग्रेस के साथ खड़े नहीं होना चाहते। हालांकि मतों का आंकड़ा एनडीए के पक्ष में। सत्ताधारी गठबंधन का प्रत्याशी आराम से जीत जाएगा। लेकिन कांग्रेस एवं वामदलों का रूख हमेशा से विरोध के लिए विरोध करने का। इस बीच, अभी तक यह कोई अनुमान नहीं लगा पा रहा कि देश का अगला राष्ट्रपति कौन होगा? हां, राष्ट्रपति कोई महिला, अल्पसंख्यक या दक्षिण भारत से होने की संभावना जताई जा रही। लेकिन यह सब केवल पीएम मोदी एवं अमित शाह ही जानते!</p>
<p><br /><strong>झारखंड का झमेला!</strong><br />कांग्रेस के दिन वाकई में ठीक नहीं चल रहे। हर ओर से परेशानी ही परेशानी। एक तो केवल राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ में सरकारें बची हुईं। इसके अलावा कांग्रेस झारखंड एवं महाराष्ट्र में गठबंधन सरकारों में शामिल। लेकिन महाराष्ट्र में ऐसा कोई दिन नहीं बीता। जब कोई खटपट न हुई हो। अब झारखंड में भी बखेड़ा। हालांकि यह खुद कांग्रेस के कारण नहीं। बल्कि सहयोगी जेएमएम के नेता एवं सीएम हेमंत सोरेन एक आॅफिस आॅफ प्रोफिट के मामले में फंस गए। शिकायत हुई। तो चुनाव आयोग ने गंभीरता से लेते हुए नोटिस भी भेज दिया। अब परेशान कांग्रेस। मामला आगे बढ़ा तो कहीं विधायक दल ही न टूट जाए। जबकि पार्टी विधायक कई दिनों से सीएम एवं उनके मंत्रियों की शिकायत पार्टी आलाकमान से करते रहे। अब यदि झारखंड में कुछ हुआ। तो इसकी कोई गारंटी नहीं कि महाराष्ट्र में कुछ नहीं होगा। जहां बीएमसी के चुनाव सामने। जहां अभी तक यह पक्का नहीं कि गठबंधन के सहयोगी शिवसेना एवं एनसीपी साथ चुनाव लड़ेंगे।<br /><strong>दूर की रणनीति!</strong><br />जम्मू-कश्मीर को लेकर परिसीमन आयोग की सिफारिशें सार्वजनिक। जहां विधानसभा सीटों में बढ़ोतरी का प्रस्ताव। तो अब जम्मू एवं कश्मीर संभागों में सीटों का अंतर भी नौ से घटकर चार सीट का होगा। एसटी के लिए नौ एवं एससी के लिए सात सीटों पर आरक्षण का भी प्रस्ताव। मतलब अब्दुल्ला एवं मुफ्ती परिवारों के प्रभुत्व के खात्मे का इंतजाम। इसके पहले ग्राम पंचायत एवं बीडीसी के चुनाव हुए। जिसका एनसी एवं पीडीपी ने बायकाट किया। लेकिन जब असली गेम समझ आया। तो मजबूरी में डीडीसी के चुनाव में गुपकार गठबंधन के साथ उतरे। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। अब विधानसभा चुनाव। लेकिन सरकार इससे भी आगे की सोच रही। जम्म-कश्मीर को लेकर पाकिस्तान हमेशा जनमत संग्रह की मांग करता रहा। अब यदि यूएनओ के प्रस्ताव के मुताबिक कभी जनमत संग्रह हुआ। तो वह पाक अधिकृत कश्मीर में भी होगा। चूंकि असली लोकतांत्रिक प्रक्रिया भारत में अपनाई जा रही। आम जनता को इसमें भागीदारी मिल रही। फिर पीओके की जनता किधर जाएगी?</p>
<p><br /><strong>केन्द्र में मरुधरा!</strong><br />अपनी मरुधरा इन दिनों राजनीति के लिहाज से खासी चर्चा में। पहले करौली दंगों और बाद में जोधपुर शहर में हुए तनाव ने देशभर का ध्यान खींचा। हालांकि कांग्रेस एवं भाजपा में आंतरिक गुटबाजी भी राजनीति के जानकारों को गौर करने पर मजबूर कर रही। जहां कांग्रेस में सीएम अशोक गहलोत एवं पूर्व पीसीसी सचिन पायलट की राजनीतिक अदावत किसी न किसी बहाने चर्चा में रहती। तो भाजपा में भी पूर्व सीएम वसुंधरा राजे की भी अपने केन्द्रीय नेतृत्व से पटरी नहीं बैठने की खबरें गाहे बगाहें आती रहतीं। अब एक और मुद्दा। जहां कांग्रेस उदयपुर में तीन दिवसीय चिंतन शिविर आयोजित कर रही। तो भाजपा भी 21 एवं 22 को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की जयपुर में बैठक करने जा रही। उसी समय राहुल गांधी का कोटपूतली में दौरा प्रस्तावित। तो भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा एवं गृहमंत्री अमित शाह भी मरुधरा का दौरा करेंगे। मतलब राजस्थान मानो राजनीतिक गतिविधियों का कुरूक्षेत्र बनने जा रहा। ऐसा क्यों? विधानसभा चुनाव में तो अभी समय। फिर कारण क्या?<br />-<strong>दिल्ली डेस्क </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 May 2022 16:25:41 +0530</pubDate>
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                <title>'इंडिया गेट'</title>
                                    <description><![CDATA[पर्दे के पीछे की खबरें जो जानना चाहते है आप....]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/know-what-is-special-in-india-gate/article-9024"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/india-gate7.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>किसकी लगेगी लॉटरी?</strong><br />राजस्थान भाजपा में पार्टी के संसदीय बोर्ड का जिक्र खूब हो रहा। आखिर यही बोर्ड अगर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी। तो उसके मुख्यमंत्री का नाम तय करेगा। लेकिन इसी ताकतवर बोर्ड में अभी कुल 11 में से चार स्थान रिक्त। इनमें से अरुण जेटली और सुषमा स्वराज का निधन हो चुका। तो वैंकया नायडू उपराष्ट्रपति और थावरचंद गहलोत कर्नाटक के राज्यपाल हो गए। अब इसमें किसकी लॉटरी लगेगी, यही चर्चा। सबसे पहला नाम यूपी के सीएम योगी आदित्नाथ का सामने आ रहा। जिस प्रकार से उन्होंने यूपी में पार्टी को जीत दिलवाई। उससे उनका संगठन में कद बढ़ना तय। उनकी पहचान भी फायरब्रांड नेता की। सो, उनको भाजपा संसदीय बोर्ड में शामिल किया जाना बहुप्रतिक्ष्ति लग रहा। चर्चा में नाम तो धर्मेन्द्र प्रधान, निर्मला सीतारमण, भूपेन्द्र यादव एवं स्मृति ईरानी के भी। वर्तमान में भाजपा संसदीय बोर्ड में सात सदस्य। जिसमें पीएम मोदी, जेपी नड्डा, अमित शाह, शिवराज सिंह चौहान, संगठन महामंत्री बीएल संतोष, राजनाथ सिंह एवं नितिन गडकरी बतौर सदस्य।</p>
<p><br /><strong>नहीं हुआ संगम!</strong><br />तो यह एकदम साफ हो गया। फिलहाल कांग्रेस और पीके का संगम नहीं हो सका। हालांकि शोरगुल जमकर हुआ। लेकिन सारा मिशन फुस्स साबित हुआ। हालांकि दोनों ही पक्षों ने इतनी गुंजाइश रखी कि आगे से कभी मिलने की नौबत आए। तो शर्मिदा होने की स्थिति नहीं बने। अब भाई लोग इसके मतलब निकाल रहे। पीके ने दस जनपथ जाकर अपना समय क्यों गंवाया। तो सोनिया गांधी ने क्यों पीके के सामने सभी पार्टी के बुजुर्ग नेताओं को बैठा दिया। आखिर मसला भी साल 2024 में मोदी-शाह की भाजपा से मुकाबिल होने का था। याद रहे। कांग्रेस यूं ही कांग्रेस नहीं। इसकी गति मानो हाथी की चाल। यहां बदलाव इतना आसान नहीं। वह भी बात जब आमूल चूल परिवर्तन की हो। कांग्रेस में ऐसे-ऐसे दिग्गज। जिनको राजनीतिक आयु ही पीके की वास्तविक आयु से कहीं ज्यादा। इन्होंने पूरा जीवन लगा दिया कांग्रेस और इसकी विचारधारा के लिए। अब आखिरी दौर में क्या पीके इन्हें जमीनी राजनीति का ज्ञान देंगे और चुनावी रणनीति समझाएंगे?</p>
<p><br /><strong>पीके बनाम कांग्रेसी पीके!</strong><br />पीके यानी प्रशांत किशोर। राजनीतिक क्षेत्र में काफी चर्चित नाम। चुनावी रणनीतिकार के रुप में देशभर में अपनी पहचान बना चुके। भाजपा समेत कई क्षेत्रीय दलों एवं नेताओं के साथ चुनावी काम कर चुके। लेकिन अब एक और पीके कांग्रेस में भी। पीके यानी पवन खेड़ा। उदयपुर, राजस्थान निवासी। आजकल पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता। भाजपा, पीएम मोदी एवं केन्द्र सरकार पर खूब हमलावर रहते हैं। कभी दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के करीबी रहे और उनके साथ काम भी किया। असल में, दिल्ली में जब खबरनवीसों ने चुनावी प्रबंधक पीके से कांग्रेस की बात बिगड़ने पर सवाल किया। तो कांग्रेस के पीके का जवाब था। वह यह सब नहीं बता सकते। हालांकि वह खुद भी पीके। तो फिर इस हाजिर जवाबी पर हंसी ठहाके गूंजने ही थे। लेकिन पवन खेड़ा ने एक इशारा तो कर ही दिया। राजनीति के मामले में कांग्रेस समंदर के मानिंद। पार्टी और इसके नेताओं को समझना इतना आसान भी नहीं। जिसे प्रशांत किशोर ने भी स्वीकारा!</p>
<p><br /><strong>हलचल ही हलचल?</strong><br />राजस्थान में भले ही विधानसभा चुनाव साल 2023 के अंत में। लेकिन इस बार लगता है भाजपा एवं कांग्रेस को मानो जल्दी। साथ में, इस बार आम आदमी पार्टी और ओवैसी की एआईएमआईएम के भी मैदान में कूदने की सुगबुगाहट। सो, प्रदेश में राजनीतिक गतिविधियां एवं नेताओं के दौरे तेज हो रहे। जहां उदयपुर में चिंतन शिविर के बहाने तमाम कांग्रेसी दिग्गज जुटेंगे। यह आयोजन अपने आप में चुनावी रणभेरी। वहीं, उसके बाद राहुल गांधी फिर से जयपुर आएंगे। इसी प्रकार से भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा एवं गृहमंत्री अमित शाह के भी दौरे प्रस्तावित। हां, कांग्रेस में जयपुर से ह्यसंभावित बदलावह्ण के लिए एक खबर आई। तो उसका करारा पलटवार ह्यदिल्लीह्ण से किया गया। सो, हलचल तो होगी ही। भाजपा में कार्यकतार्ओं के लिए प्रशिक्षण शिविरों का दौर शुरू। झालावाड़ में प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया। तो बारां में गजेन्द्र सिंह शेखावत पहुंचे। यह भी अपने आप में संकेत, संदेश। इधर दिल्ली में मिलने-जुलने एवं मुलाकातों का दौर। सो, नेताओं की भागदौड़ जारी।</p>
<p><br /><strong>आरोप... प्रत्यारोप... ?</strong><br />देश के अधिकतर राज्य बिजली संकट के दौर से गुजर रहे। भीषण गर्मी के दौर में आम जनता त्राहिमाम हो रही। ऐसे समय में बिजली कटौती किसी सजा से कम नहीं। मौके को ताड़कर जहां कांग्रेस ने भाजपा पर वार किए। तो भाजपा ने भी उसके आरोपों का जवाब दिया। लेकिन समस्या का समाधान नदारद! करीब 16 राज्यों में दिनभर में दो से लेकर दस घंटे की बिजली कटौती हो रही। छात्रों की परीक्षा का समय अलग से। बिजली कटौती के लिए कभी पर्यावरण, तो कभी कोयला एवं खान मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे। फिर ऊर्जा मंत्रालय कैसे बचेगा? इसी के लपेटे में रेल मंत्रालय भी। लेकिन एक सवाल। इन सब मंत्रालयों के बीच समन्वय एवं तालमेल की जिम्मेदारी किसकी? इससे भी जरुरी सवाल बिजली की संभावित खपत और उपलब्ध संसाधनों का अनुमान लगाना किसकी जिम्मेदारी? क्या एक दूसरे पर टोपी उछाल देने से बिजली संकट दूर होगा? देश के नीति नियंताओं को सोचना होगा। इन सबमें जनता ही पिस रही।</p>
<p><br /><strong>पेंडूलम जैसे हालात!</strong><br />जम्मू-कश्मीर से साल 2009 में यूपीएससी टॉप करने वाले शाह फेसल की हालात पेंडूलम जैसी। पहले दस साल तक नौकरी की। महत्वपूर्ण एवं संवदेनशील पदों पर काम किया। फिर आतंकियों के समर्थन में इस्तीफा दे बैठे। बाद में नया दल बनाकर नेता बनने चले थे। जब दिमाग ठीक हुआ। तो वापस वापस नौकरी की सूझी। सरकार भी सदाशयता दिखा रही। सो, अब वह पुन: मुख्यधारा में लौट रहे। हां, उन्होंने इस्तीफा अनुच्छेद- 370 के हटने से पहले दिया। फैसल कश्मीर को लेकर बड़ा निर्णय होने के बाद तुर्की भाग रहे थे। हवाई अड्डे पर पकड़े गए। घर में पूरे डेढ़ साल नजरबंद रहे। इस दौरान सोचने, समझने का फ्रेम बदल गया। अब कह रहे। वह भटक गया। अपने आइडियलिज्म ने उसे धोखा दिया! इससे बहुत कुछ खो बैठा। दोस्त, शुभ चिंतक एवं केरियर। सो, पछतावे का भाव। लेकिन जो अंसतोष जताया। उसका क्या? टॉपर आईएएस के असंतोष को इतना हल्के से लिया जाना चाहिए? कहीं बड़ी प्लानिंग पर तो काम नहीं हो रहा?<br /><strong>-दिल्ली डेस्क</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 May 2022 14:16:01 +0530</pubDate>
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                <title>'इंडिया गेट'</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/know-what-is-special-in-india-gate/article-8584"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/india-gate91.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>किस्सा-ए-पीके!</strong><br />कांग्रेस में किस्सा-ए-पीके चर्चा में। वरिष्ठ नेताओं के साथ मैराथन बैठकें चल रहीं। पीके पार्टी के रिवाइवल के लिए 2024 के रोडमैप पर सैंकड़ों स्लाड्स के जरिए प्रजेंटेशन दे रहे। अपने गहलोत जी उन्हें ब्रांड बता चुके। साथ में प्रोफेशनल भी। लेकिन कांग्रेसियों के मन में एक ही शंका। पीक कई घाट का पानी पी चुके। भरोसा कैसे हो? तेलंगाना पीसीसी चीफ ने तो ट्वीट कर डाला। पीके राज्य में टीआरएस के लिए काम कर रहे। और केन्द्र में कांग्रेस के लिए करेंगे। तो हम क्या करेंगे? वह टीएमसी के साथ भी काम कर चुके। जो बंगाल में कांग्रेस को शून्य पर पहुंचा चुकीं। दक्षिण में डीएमके एवं वायएसआर। तो महाराष्ट्र में शिवसेना के लिए। जिसकी राजनीति कांग्रेस की सेकुलर राजनीति को नहीं भाती। फिर सबसे बड़ा सवाल। देश पर करीब साठ साल राज कर चुकी कांग्रेस में कई नेता तो ऐसे। जो पीक की आयु से भी ज्यादा समय से राजनीति में सक्रिय। ऐसे दिग्गजों को पीके जमीनी राजनीति ज्ञान देंगे? इतने खराब दिन!</p>
<p><br /><strong>रणभेरी से पहले ही?</strong><br />गुजरात में विधानसभा चुनाव की आहट। पीएम मोदी ने राज्य के दौरे बढ़ा दिए। तो आम आदमी पार्टी भी मैदान में उतरने से पहले दंड बैठक पेल रही। उसकी नजर पटेल समाज के नेता नरेश पटेल पर। वह डोरे तो हार्दिक पटेल पर भी डाल रही। जो अपने को कांग्रेस में नया नवेला दूल्हा बता चुके। लेकिन पार्टी के ही वरिष्ठ नेता उनकी राजनीतिक नसबंदी कराना चाहते। कांग्रेस बीते 27 सालों से सत्ता की बाट जो रही। पिछले चुनाव में हार्दिक पटेल एवं अल्पेश ठाकोर आए। तो जिग्नेश मेवाणी ने बाहर रहकर कांग्रेस का समर्थन किया। लेकिन पांच साल बाद इधर-उधर! वैसे गुजरात का संबंध अपनी मरुधरा से भी। पिछले चुनाव में सीएम अशोक गहलोत प्रभारी थे। इस बार रघु शर्मा। फिर गुजरात अपने पड़ोस में भी। गहलोत गुजरात चुनाव से पहले ही रघु शर्मा को लेकर बड़ा बयान दे चुके। वैसे भाजपा गुजरात में पूरी सरकार बदल चुकी। किसी ने चूं तक नहीं की। लेकिन कांग्रेस के पसीने छूट रहे।</p>
<p><br /><strong>सिम्बोलिक बना बुलडोजर!</strong><br />योगीजी के बुलडोजर की चर्चा यूपी से बाहर निकलकर देशभर में पहुंच गई। असामाजिक तत्वों से सख्ती से निपटने का यह तरीका कई सरकारों को शॉर्ट कट लग रहा। एमपी और राजधानी दिल्ली में तो प्रयोग हो भी चुका। लेकिन अपनी मरुधरा में इसके प्रयोग ने माहौल को तनावपूर्ण और गुस्से से भरा बना दिया। अब यही बुलडोजर तब अचानक सुर्खियों में आ गया। जब ब्रिटिश पीएम बोरिस जॉनसन गुजरात दौरे में बुलडोर पर चढ़ गए। फोटोअप भी करवा लिया। अब जॉनसन ने यह एक्शन अनायास तो नहीं किया होगा? कोई तो बात होगी। लोग इसका अर्थ और मतलब निकाल रहे। लेकिन ब्रिटिश पीएम ने जाने अनजाने में योगीजी की ब्राडिंग जरुर कर दी। क्योंकि बुलडोजर के साथ ही योगीजी का नाम चस्पा हो चुका। अपराधियों एवं असामाजिक तत्वों से निपटने का तरीका योगीजी ने ईजाद किया। इससे कई के तेवर ढीले ही नहीं पड़े। बल्कि आगे कुछ भी गलत करने से पहले सौ बार सोचेंगे। क्या माना जाए? बुलडोजर सिंबोलिक बन गया!</p>
<p><br /><strong>चर्चा में जहांगीर पुरी!</strong><br />राजधानी दिल्ली के इलाके सघन आबादी वाले जहांगीर पुरी की चर्चा इन दिनों देश-दुनियां में हो रही। जहां हनुमान जयंती के दिन निकली शोभायात्रा के दौरान हिंसक झड़पे हो गईं। दोषियों पर कार्रवाई योगीजी की तर्ज पर हुई। तो मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया। वैसे, दिल्ली में अब बकायदा कानूनन तीनों नगर निगम एक। जिसका चुनाव बाकी। वहीं, राजधानी की कानून व्यवस्था सीधे केन्द्र के हाथों में। जिसकी कमान अमित शाह के पास। जबकि दिल्ली पुलिस कमिश्नर राकेश अस्थाना। जिनकी नियुक्ति पर खासा बवाल हुआ था। अब अमित शाह पर खूब निशाना साधा जा रहा। विरोधियों द्वारा उनको घेरने का बड़ी मुश्किल से मौका मिला है। लेकिन बुलडोजर का उपयोग भी खास किस्म का संकेत, संदेश। क्या राजधानी में भी सफाई जम्मू-कश्मीर की तर्ज पर होगी? और समझने वाले समझ रहे हों। यह अवसर जहांगीर पुरी की हिंसा ने दिया। आखिर जब कमान शाह के हाथों में हो। तो कुछ नया ही होगा। लेकिन कहां और कैसे? दिल्ली बेहद संवेदनशील हो चुकी!</p>
<p><br /><strong>गुफ्तगु का दौर...</strong><br />राजस्थान भाजपा और कांग्रेस को लेकर बीते हफ्ते राजधानी दिल्ली में लंबी गुफतगु हुई। भाजपा ने प्रदेश नेताओं की बैठक को रूटिन की कसरत बताया। पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के आवास पर प्रदेश नेताओं की करीब चार घंटे तक मंत्रणा चली। तो कांग्रेस नेतृत्व ने सीएम अशोक गहलोत और पूर्व पीसीसी सचिन पायलट को भी महत्वपूर्ण मसलों पर चर्चा के लिए बुलाया। कांग्रेस आलाकमान ने सीएम गहलोत की पीके के रोडमैप को लेकर राय जाननी चाही। अगले ही दिन पायलट भी दस जनपथ पहुंचे। इस मुलाकत के बाद सीएम गहलोत ने कह डाला। उनका इस्तीफा तो 1998 से ही सोनिया गांधी के पास रखा हुआ। इसी बीच, पूर्व सीएम वसुंधरा राजे को लेकर भी चर्चा। राजे को अगला सीएम फेस घोषित करने की समर्थकों की मांग। जिस पर भाजपा नेतृत्व फिलहाल राजी नहीं दिखता। जबकि पायलट की भूमिका को लेकर भी अभी कांग्रेस आलाकमान तय नहीं कर पा रहा। क्या राजस्थान में दोनों ही दलों में नई पांत और पौध तैयार हो रही!</p>
<p><br /><strong>कांग्रेस-पीडीपी की गलबहियां!</strong><br />जम्मू कश्मीर में चुनावी माहौल बनने जा रहा। जल्द ही चुनावी गतिविधियां शुरू होने की संभावना। जहां रविवार को पीएम मोदी ने जम्मू का दौरा किया। तो इससे पहले पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिल आईं। मतलब जहां कांग्रेस एवं पीडीपी निकट आ रहे। तो फिर भाजपा और एनसी में भी निकटता की बढ़ेगी? जम्मू-कश्मीर में इस बार विधानसभा चुनाव काफी अलग होगा। क्योंकि अब अनुच्छेद-370 अस्तित्व में नहीं। वहीं, जम्मू-कश्मीर केन्द्र शासित प्रदेश हो चुका। दशकों बाद सरपंच, बीडीसी एवं डीडीसी के चुनाव शांतिपूर्ण एवं निष्पक्ष रुप से संपन्न हुए। ऐसे में सारे घिसे पिटे सियासी समीकरण उलट-पुलट होंगे। भारत बंटवारे के समय पाक से आए शरणार्थी एवं 15 बरसों से अधिक समय से राज्य में रह रहे लोग अब राज्य के स्थाई निवासी। ऐसे में, कांग्रेस एवं पीडीपी की गलबहियां क्या गुल खिलाएंगी? हां एक सवाल! गुलाम नबी आजाद फिर का क्या करेंगे? वह सीएम रह चुके। जो अब कांग्रेस में जी-23 की अगुवाई कर रहे।<br /><strong>-दिल्ली डेस्क</strong> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 Apr 2022 16:22:28 +0530</pubDate>
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                <title>'इंडिया गेट'</title>
                                    <description><![CDATA[पर्दे के पीछे की खबरें जो जानना चाहते है आप....]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/know-what-is-special-in-india-gate/article-6912"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/india-gate02.jpg" alt=""></a><br /><p>निशाना कहां?  <br />कांग्रेस में इन दिनों ‘जी-23’ की हलचल। भूपेन्द्र सिंह हुड्डा मानो मध्यस्थ की भूमिका में। वह ‘जी-23’ के अगुवा गुलाम नबी आजाद से मिले। इसके पहले हुड्डा सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी से मिले। संकेत और संदेश क्या? खैर, शशि थरुर भी अब इस ग्रुप से जुड़ गए। आखिर माजरा क्या? पांच राज्यों के चुनाव के बाद जो कांग्रेस में चल रहा। क्या वह आधा सच? असल में, अगले दो तीन माह में राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव होने जा रहे। करीब 70 से ज्यादा सीटों पर चुनाव होंगे। इसमें कई कांग्रेस दिग्गजों की सीट खाली हो रही। इसमें कपिल सिब्बल और आनद शर्मा जैसे नेता शामिल। जबकि गुलाम नबी आजाद पहले ही खाली। कांग्रेस उन्हें कहीं से भी भेज सकने में असमर्थ। सो, सारी कवायद यहीं तक तो सिमित नहीं? कैसे भी उच्च सदन में पहुंचने का जतन। आखिर राजनीति में सारी उठापटक तो कुर्सी के लिए ही। संगठन या पार्टी के लिए समय दिया होता। तो आज क्या कांग्रेस का यह हाल होता?</p>
<p><br />जोर का झटका!<br />पीएम मोदी ने पाकिस्तान के साथ-साथ चीन को भी जोर का झटका दिया। असल में, ऐसा जानकार कह रहे। चीन न तो बोल पा रहा और न ही चुप रह पा रहा। बात सैन्य क्षमता की ही नहीं, बल्कि धंधे की भी। बीती नौ मार्च को भारत की ओर से एक मिसाइल गलती से पाकिस्तान के 125 किमी भीतर जा गिरी। मिसाइल करीब तीन मिनट तक पाक की वायु सीमा में भी रही। अब परेशानी यह हुई कि पाकिस्तान को अगले दिन सार्वजनिक रूप से यह बताना पड़ा। क्योंकि पाक का एयर डिफेंस सिस्टम न इसे पकड़ सका और न ही हवा में मार गिरा पाया। अब यह सारा सिस्टम पाक ने चीन से खरीदा। मतलब बात हथियारों की गुणवत्ता तक की। यानी चीन की सैन्य साख रसातल में। जबकि भारत के पास ऐसी मिसाइल प्रणाली। जो दुश्मन के घर में पहुंच भी गई और वह पकड़ी भी नहीं गई। जबकि चीन की पोल खुल गई। फिर पाक तो कहीं का नहीं रहा।</p>
<p><br />बढ़ रहा कारवां!<br />पांच राज्यों में सत्ता पर काबिज हुए दलों के मुख्यमंत्रियों ने कुर्सी संभाल ली। यूपी में योगीजी तो पंजाब में भगवंत मान साहब की चर्चा अलग से हो रही। उत्तराखंड में पुष्करसिंह धामी की लॉटरी फिर से खुली। तो प्रमोद सावंत भी गोवा में कुर्सी बचा ले गए। तो क्या 2024 के लिए भाजपा की रणनीति का कारवां आगे बढ़ रहा। जबकि अभी कांग्रेस समेत विपक्षी दल हार के सदमे में। इससे जहां राज्यसभा में भाजपा की ताकते बढ़ेगी। तो कांग्रेस और कमजोर होगी। राष्ट्रपति चुनाव में भी भाजपा और सहज रहेगी। क्या भाजपा ने 2024 के लिए सेमी फाइनल पार कर लिया? और अब बारी मुख्य मुकाबले की? आम चुनाव तक करीब एक दर्जन राज्यों के विधानसभा चुनाव। अभी विपक्ष अपनी ताकत बढ़ाने की कवायद ही कर रहा। साथ में गैर भाजपा और गैर कांग्रेस मोर्चे की भी चर्चा। फिर पीएम फेस को लेकर भी कई क्षत्रपों में आपसी प्रतिद्वंदिता भी। लेकिन भाजपा में योगीजी के रुप में भविष्य जरुर दिख रहा!</p>
<p><br />चीनी पहल?<br />यह चीन को अचानक क्या हो गया? चीनी विदेश मंत्री बिन बुलाए नई दिल्ली पहुंच गए। वह पीएम मोदी से मिलने को बेकरार हो गए। लेकिन उन्हें बेरंग लौटना पड़ा। मिले भी तो एनएसए डोभाल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से। लेकिन इन दोनों ही मोदीजी के खास सिपहसालारों ने एकदम साफ -साफ बता दिया। सीमा पर कारस्तानी अब बीते जमाने की बात। चीनी सेना को पीछे हटाना ही पड़ेगा। हालत यह हो गई कि चीन ने अपने विदेश मंत्री के इस दौरे की आधिकारिक घोषणा करने की हिम्मत तक नहीं दिखाई। असल में, चीन की हालत समझने लायक। आखिर ऐसा क्या कारण कि चीन इतना उतावला और अधीर हो गया? चीनी विदेश मंत्री से पीएम मोदीजी का नहीं मिलना। मतलब महाशक्ति बनने का सपना पाले चीन की इससे ज्यादा क्या बनेगी? रूस-यूक्रेन विवाद में भले ही भारत तटस्थ रहा। लेकिन इसी से चीन को पीओके में भारत के सैन्य ऑपरेशन का डर सता रहा! जहां उसकी कई अरबो डॉलर की परियोजनाएं चल रहीं।</p>
<p><br />खुद को समेटा!<br />तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने यूपी के आजमगढ़ से सांसदी छोड़ करहल से विधायकी को चुना। उन्होंने यूपी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनना ज्यादा श्रेयकर समझा। लेकिन इसके भी गहरे मायने। सपा संरक्षक मुलायम सिंह एक जमाने में केन्द्र की राजनीति में भी प्रभावी दखल रखते थे। वह अखिलेश के बस की नहीं। वह लगातार चार चुनाव 2014, 2017, 2019 और अब 2022 में हार चुके। इसके बाद सपा अध्यक्ष ने स्मार्ट फैसला लिया। वह दिल्ली के बजाय लखनऊ में रहकर अपने को यूपी में मजबूत करेंगे। आखिर यूपी देश का सबसे बड़ा सूबा भी तो। सीएम योगीजी का भी अब भाजपा के राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरना तय। सो, अखिलेश द्वारा उनकी नीतियों एवं सरकार की मजम्मत करना अपने आप में संकेत होगा। सो, एक और क्षत्रप ने अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को समेट लिया। जो भाजपा के लिए भी मुफिद। लेकिन ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे, केसीआर, तेजस्वी यादव, अरविंद केजरीवाल समेत कई क्षत्रप मोदी के खिलाफ अभी भी लाइन में। <br />-दिल्ली डेस्क</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 28 Mar 2022 16:34:31 +0530</pubDate>
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                <title>'इंडिया गेट'</title>
                                    <description><![CDATA[पर्दे के पीछे की खबरें जो जानना चाहते है आप....]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/know-what-is-special-in-india-gate/article-6089"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/india-gate03.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>आगे कुंआ, पीछे खाई!</strong><br />एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार पवार एवं शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के लिए इन दिनों धर्म संकट। आखिर एनसीपी और शिवसेना तीसरे दल कांग्रेस साथ मिलकर महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार जो चला रहे। लेकिन कांग्रेस के सितारे मानो गर्दिश में। जिसका असर पवार और ठाकरे की राजनीतिक सेहत पड़ना लाजमी। सो, इन दिनों असमंजस में। कांग्रेस के साथ सरकार में बनें रहें या उसे पीछे छोड़कर आगे बढ़ें? यानी आगे कुंआ, पीछे खाई वाली हालत! आज छोड़ दें तो गठबंधन सरकार की सेहत पर असर होगा। साथ रहे तो इसका असर 2024 में होना तय। महाराष्ट्र में इन दिनों यही चर्चा। बीएमसी चुनाव बिल्कुल नजदीक। कांग्रेस को साथ लें या छोड़ दें? क्योंकि बीएमसी शिवसेना के लिए गर्भनाल जैसी। शरद पवार छटपटा रहे। उनके कई साथी केन्द्रीय जांच एजेंसी के रडार पर। मुंबई में बड़े स्तर पर यूपी एवं बिहार के लोग। जो चुनावी दृष्टि से खासे महत्वपूर्ण। जिन पर भाजपा का भी खासा असर। सो, दोनों दलों में भ्रम की स्थिति।</p>
<p><br /><strong>प्रियंका का स्टारडम!</strong><br />तो यूपी में प्रियंका गांधी के पॉलीटिकल स्टारडम ने काम नहीं किया। वह बीते दो साल से जोरशोर से कांग्रेस की सियासी जमीन सींचने में दिन रात एक किए हुए थीं। कई बार तो वह योगी सरकार के खिलाफ सपा एवं बसपा से ज्यादा प्रभावी दिखीं। लेकिन पार्टी का विधानसभा चुनाव में उम्मीद के अनुरुप प्रदर्शन नहीं रहा। करीब 97 फीसदी कांग्रेस प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई। पार्टी को केवल दो सीटों के साथ 2.70 फीसदी वोट हासिल हुए। अब कांग्रेस यूपी में अपना दल, रालोद एवं निषाद पार्टी से भी नीचले पायदान पर चली गई। प्रियंका गांधी में जो कांग्रेसी इंदिरा गांधी की छवि देख रहे थे। उस पर भी तुषारापात हो गया। पहले राहुल गांधी लगातार विफल होते रहे। वह अमेठी के लोकसभा चुनाव में 2019 में शिकस्त खा चुके। सोनियाजी उम्रदराज हो चलीं। लगभग असक्रिय। अब तो रायबरेली की सीट भी खतरे में। वहां से आदिती सिंह अब भाजपा विधयक। सो, प्रियंका से अब क्या उम्मीद पाली जाए?</p>
<p><br /><strong>केजरीवाल नया चेहरा!</strong><br />पंजाब में ‘आप’ की प्रचंड जीत के बाद अरविंद केजरीवाल को विपक्ष का मोदी के खिलाफ संभावित चेहरा बताया जा रहा। इससे पहले पिछले साल मई में यही शिगूफा ममता बनर्जी के लिए उछला गया था। ममता दीदी ने बंगाल में तमाम झंझावतों से निकलकर भाजपा को जबरदस्त पटखनी दी थी। लेकिन सवाल अभी भी बरकरार। क्या यह संभव? फिर केसीआर क्या करेंगे? जो पीएम मोदी के खिलाफ काफी आक्रामक। और राहुल गांधी तो हैं ही। क्या यह सब आसानी से मान जाएंगे? चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर पूरे आंकलन और अध्ययन के साथ बता चुके। कांग्रेस आज भी 200 लोकसभा सीटों पर सीधे भाजपा को टक्कर देने की स्थिति में। इसके बावजूद कोई क्षेत्रीय दल का नेता मोदी के सामने कैसे खड़ा होगा? हां, गाहे बगाहे नितिश कुमार और नवीन पटनायक का नाम भी संभावितों की सूची में शामिल हो जाता। ऐसे में केजरीवाल कहां ठहरते? फिर वैसे भी आम चुनाव में दो साल बाकी। कहीं फिर कोई नया चेहरा उभरा तो?</p>
<p><br /><strong>काम नहीं आई कवायद</strong><br />सपा प्रमुख अखिलेश यादव के सारे मंसूबे फेल हो गए। इस बार अपनी सीटें भले ही करीब ढाई गुनी कर ली। लेकिन पार्टी को सत्ता दिलाने में विफल रहे। वह 2012 से 17 के बीच सीएम रह चुके। लेकिन सपा की हार का सिलसिला 2014 से ही चल निकला। जो अभी तक थमा नहीं। इस बीच उन्होंने आश्यर्चजनक रुप से 2019 के आम चुनाव में बसपा से गठबंधन कर लिया। इससे पहले 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से गठजोड़ कर लिया। जबकि कांग्रेस शीला दीक्षित को सीएम फेस के रुप में आगे कर चुकी थी। अब आखिरी में 2022 में रालोद के जयंत को भी साथ लिया। लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। अखिलेश पर माफियाओं को साथ लेने का भी आरोप। इस बीच अखिलेश कब राजनीति के दिग्गज मुलायम सिंह की छाया से बाहर निकले। पता ही नहीं चला। लेकिन वह सीएम पिताजी द्वारा सौंपी गई कुर्सी से ही बने। मतलब अभी राजनीति में संघर्ष करना बाकी। लेकिन कब तक?</p>
<p><br /><strong>हाय रे यूक्रेन संकट...</strong><br />बीते दो हफ्तों से रूस-यूक्रेन युद्ध भारतीय राजनीति में भी चर्चा का केन्द्र बना रहा। आखिर करीब 20 भारतीय वहां फंसे जो हुए थे। उनकी स्वदेश वापसी के लिए सरकर ने बकायदा ऑपरेशन गंगा चलाया। हालत यह हो गई कि विधानसभा चुनावों के बीच भी यूक्रेन संकट ने अच्छी खासी सुर्खियां बटोरीं। इससे और कुछ नहीं सपा, कांग्रेस जैसे दलों को परेशानी हुई। क्योंकि चुनावों के दौरान जो मीडिया कवरेज उन्हें मिलना चाहिए था। उससे यह दल महरुम हो गए। इससे कम से कम तीन चरणों में जनता तक सपा अपनी बात उस शिद्दत से नहीं पहुंचा पाई। बल्कि यूक्रेन संकट ने यूपी के चुनावी माहौल का सारा फोकस लूट लिया। बीती 25 फरवरी के बाद से चर्चा वहीं की रही। कांग्रेस भी उतना प्रचार नहीं कर पाई। खासकर सीधे जनता से जुड़े मसलों का। अब तो चर्चा यहां तक। यूपी से फोकस क्या गायब हुआ। भाजपा बाजी मार ले गई। लोगों का फोकस भारतीय नागरिकों की वापसी पर चला गया।</p>
<p><br /><strong>रुतबा घटेगा!</strong><br />भविष्य में कांग्रेस की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं लेंगी। बल्कि यह और बढ़ेंगी। यूपी एवं पंजाब के नतीजों ने काफी निराश किया। तो उत्तराखंड, मणिपुर एवं गोवा ने उम्मीदें तोड़ दीं। राष्ट्रीय स्तर पर आज भी भाजपा के सामने कांग्रेस ही मुख्य विपक्ष। साथ में संसद के दोनों सदनों में भी। लेकिन अब यह आभा लगातार कम हो रही। जो रूकने का नाम ही नहीं ले रही। अब हाल यह है कि केजरीवाल जी की ‘आप’ सुदूर दक्षिण में टीआरएस सरकार पर शिक्षा बजट को कम करने का आरोप मड़ रही। जबकि ममता बनर्जी कांग्रेस के पीछे हाथ धोकर पड़ी हुईं। हालात को देखते हुए देशभर में कई क्षेत्रीय दल कांग्रेस से दूरी बनाने की जुगत में। जो पार्टी के लिए मुसीबत का सबब। अब महाराष्ट्र और झारखंड में भी परेशानियां बढ़ने लगें। यह भी संभव। जहां कांग्रेस गठबंधन सरकार में सहयोगी। जबकि डीएमके पहले ही तमिलनाडु में कांग्रेस को छका रही। नॉर्थ ईस्ट में कांग्रेस का लगभग सफाया हो गया।<br />-दिल्ली डेस्क</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 14 Mar 2022 11:04:51 +0530</pubDate>
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