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                <title>e-waste - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>डिजिटल दौर की समस्या: शहर में लगातार बढ़ रहा ई-वेस्ट, निष्पादन की नहीं व्यवस्था</title>
                                    <description><![CDATA[मोबाइल और कम्प्यूटर के उपयोग के कारण शहर में ई-वेस्ट पिछले कुछ सालों में काफी मात्रा में बढ़ा है। 
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/problem-of-digital-era--e-waste-is-increasing-continuously-in-the-city--no-arrangement-for-disposal/article-93027"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-10/630400-size-(5)14.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। डिजिटल दौर में हर काम कम्प्यूटर और मोबाइल पर होने लगा है। जिसने देश दुनिया में मोबाइल और कम्प्यूटर की मांग बढ़ रही है। वही इसी मांग के चलते हमारे वातावरण में ई-वेस्ट की भी मात्रा लगातार बढ़ रही है। इलेक्ट्रिक उत्पादकों के कुछ पार्ट्स को तो रिसाइकल कर लिया जाता है। लेकिन कुछ पाटर््स ऐसे हैं, जिन्हें ना तो रिसाइकल किया जा सकता है ना ही नष्ट जो कचरा पॉइंट या सड़कों और दुकानों में यूं ही पड़ा रहता है। जो वातावारण में मौजूद प्रदूषण को लगातार बढ़ा रहा है।</p>
<p><strong>पिछले कुछ सालों में बढ़ा ई-कचरा</strong><br />मोबाइल और कम्प्यूटर के उपयोग के कारण शहर में ई-वेस्ट पिछले कुछ सालों में काफी मात्रा में बढ़ा है। जिसमें सबसे ज्यादा कम्प्यूटर, की-बोर्ड, माउस, टीवी, मोबाइल, ई-व्हीकल और अन्य वाहनों की बैटरी सहित अन्य सामनों से निकला ई-वेस्ट शामिल है। शहर में सालाना 800 से 850 टन कचरा निकलता है। इसमें प्लास्टिक की थैलियां, कांच, टायर, लोहे का स्क्रेप सहित अन्य कचरा होता है। इसमें करीब 5 प्रतिशत यानि 40 टन कचरा ई-वेस्ट होता है। लेकिन इसमें से निगम द्वारा साल भर में केवल 100 से 150 किलो ई वेस्ट का निष्पादन किया जाता है। बाकि कचरा कबाड़ी या दूसरे वेंडरों के पास जाता है। वहीं इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों में बढ़ोतरी को देखते हुए दस साल में ई-वेस्ट पूरे कचरे का 10 से 12 प्रतिशत पहुंच सकता है।</p>
<p><strong>ई-वेस्ट के ये नुकसान</strong><br />पर्यावरणविद् सौरभ मेहता ने बताया कि ई वेस्ट में कई तरह के हानिकारक तत्व होते हैं जो शरीर पर बुरा प्रभाव डालते हैं। ुई वेस्ट में मौजूद सीसा, पारा और कैडमियम के संपर्क में आने से तंत्रिका, गुर्दे और मस्तिष्क को नुकसान, ई-कचरे के धुएं से अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारी, सीसा और कैडमियम जैसे रसायनों से बांझपन और प्रजनन रोग, डाईआॅक्सिन के संपर्क में आने से कैंसर का खतरा, इससे मिट्टी और जल प्रदूषण, खाद्य श्रृंखला पर असर और क्लोरो फ्लोरो कार्बन गैस से ओजोन परत को नुकसान पहुंचता है। </p>
<p><strong>कोटा में नहीं कोई आॅथोराइज्ड डीलर व सेंटर</strong><br />शहर में नियमित ई-वेस्ट कलेक्शन के लिए कोई आॅथोराइज्ड सेंटर या डीलर नहीं है जो इन्हें खरीदकर आगे भेजता या इनका सेगरेगेशन करता हो। शहर में लोग स्क्रेप खरीदने वाले कबाड़ियों या इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकानों पर ही पुराने ई सामान या ई वेस्ट को बेच रहे हैं। जहां इलेक्ट्रिोनिक्स की दुकान वाले और कबाड़ी केवल जरूरी चीजें निकाल लेते हैं जबकि बचे हुए ई-वेस्ट को यूं ही फेंक देते हैं। जो सड़कों से लेकर कचरा पॉइन्ट तक प्रदूषण करता है। वहीं नगर निगम, जिला प्रशासन और प्रदूषण मंडल स्तर पर भी ई वेस्ट के लिए पर्याप्त निष्पादन की व्यवस्था नहीं है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने करीब दो वर्ष पहले रिपोर्ट जारी की थी। इसके तहत 2021-22 तक देश में 14 लाख 15 हजार 961 टन ई-वेस्ट पैदा हुआ था। इसमें से 70 फीसदी का निष्पादन सही ढंग से नहीं हो पाया है।</p>
<p><strong>दुकान वालों का कहना है</strong><br />ई वेस्ट ज्यादातर अब मोबाइल और कम्प्यूटर से निकलता है अब इसमें टीवी भी शामिल हो गई है। बहुत सारे पार्ट्स को री यूज कर लिया जाता है। लेकिन लीथियम बैटरी और मदर बोर्ड का फिर उपयोग नहीं हो पाता। ऐसे में इन्हें री साइकल करने के लिए बाहर ही भेजना पड़ता है जो महंगा होता है।<br /><strong>- आतिक अहमद, कम्प्यूटर विक्रेता, भीमगंज मंडी</strong></p>
<p>शहर में ई वेस्ट का कोई सेंटर नहीं है, सब कबाड़ी वाले को ही बेचते हैं। जो केवल उन्हीं चीजों को लेते हैं जो आसानी से री साइकल या री यूजेबल हों, बाकि चीजें बिना किसी निष्पादन के पड़ी रहती हैं, या उन्हें बाहर री साइकल के लिए बाहर भेजना पड़ता है।<br /><strong>- मनमोहन सिंह, कम्प्यूटर विक्रेता, गुमानपुरा</strong></p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />शहर में अभी ई वेस्ट के लिए कोई आॅथोराइज सेंटर या डीलर नहीं है। राइजिंग राजस्थान समिट के दौरान कुछ इन्वेस्टरर्स ने इसके लिए आवेदन किया है। जिसके बाद कोटा में भी ई वेस्ट का आधिकारिक खरीद और निष्पादन हो सकेगा। <br /><strong>- अमित सोनी, क्षेत्रीय अधिकारी, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 14 Oct 2024 16:51:44 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>बढ़ता ई-कचरा स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[आज दुनिया के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं, जिसमें से ई-वेस्ट एक नई उभरती विकराल एवं विध्वंसक समस्या भी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/increasing-e-waste-is-a-threat-to-health-and-environment/article-58049"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-09/e-waste.png" alt=""></a><br /><p>लगातार बढ़ रहा ई-कचरा न केवल भारत के लिए बल्कि समूची दुनिया के बड़ा पर्यावरण, प्रकृति एवं स्वास्थ्य खतरा है। ई-कचरा से तात्पर्य उन सभी इलेक्ट्रॉनिक और इलेक्ट्रिकल उपकरणों (ईईई) तथा उनके पार्ट्स से है, जो उपभोगकर्ता द्वारा दोबारा इस्तेमाल में नहीं लाया जाता। ग्लोबल ई-वेस्ट मानिटर-2020 के मुताबिक चीन और अमेरिका के बाद भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा ई-वेस्ट उत्पादक है। चूंकि इलेक्ट्रिक्ल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को बनाने में खतरनाक पदार्थों (शीशा, पारा, कैडमियम आदि) का इस्तेमाल होता है, जिसका मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर दुष्प्रभाव पड़ता है। दुनियाभर में इस तरह से उत्पन्न हो रहा ई-कचरा एक ज्वलंत समस्या के रूप में सामने आ रहा है। पारा, कैडमियम, सीसा, पॉलीब्रोमिनेटेड फ्लेम रिटार्डेंट्स, बेरियम, लिथियम आदि ई-कचरे के जहरीले अवशेष मानव स्वास्थ्य के लिए बहुत खतरनाक होते हैं। इन विषाक्त पदार्थों के सम्पर्क में आने पर मनुष्य के हृदय, यकृत, मस्तिष्क, गुर्दे और कंकाल प्रणाली की क्षति होती है। इसके अलावा, यह ई-वेस्ट मिट्टी और भूजल को भी दूषित करता है। ई-उत्पादों की अंधी दौड़ ने एक अन्तहीन समस्या को जन्म दिया है। शुद्ध साध्य के लिए शुद्ध साधन अपनाने की बात इसीलिए जरूरी है कि प्राप्त ई-साधनों का प्रयोग सही दिशा में सही लक्ष्य के साथ किया जाए, पदार्थ संयम के साथ इच्छा संयम हो।<br /><br />आज दुनिया के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं, जिसमें से ई-वेस्ट एक नई उभरती विकराल एवं विध्वंसक समस्या भी है। दुनिया में हर साल 3 से 5 करोड़ टन ई-वेस्ट पैदा हो रहा है। ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर के मुताबिक भारत सालाना करीब 20 लाख टन ई-वेस्ट पैदा करता है और अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद ई-वेस्ट उत्पादक देशों में 5वें स्थान पर है। ई-वेस्ट के निपटारे में भारत काफी पीछे है, जहां केवल 0.003 मीट्रिक टन का निपटारा ही किया जाता है। यूएन के मुताबिक, दुनिया के हर व्यक्ति ने साल 2021 में 7.6 किलो ई-वेस्ट डंप किया। भारत में हर साल लगभग 25 करोड़ मोबाइल ई-वेस्ट हो रहे हैं। ये आंकड़ा हर किसी को चौंकाता है एवं चिंता का बड़ा कारण बन रहा है, क्योंकि इनसे कैंसर और डीएनए डैमेज जैसी बीमारियों के साथ कृषि उत्पाद एवं पर्यावरण के सम्मुख गंभीर खतरा भी बढ़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, ई-कचरे से निकलने वाले जहरीले पदार्थों के सीधे सम्पर्क से स्वास्थ्य जोखिम हो सकता है।<br />दुनियाभर में इलेक्ट्रॉनिक कचरे के बढ़ने की सबसे बड़ी वजह इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की तेजी से बढ़ती खपत है। आज हम जिन इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों को अपनाते जा रहे हैं। उनका जीवन काल छोटा होता है। इस वजह से इन्हें जल्द फेंक दिया जाता है। जैसे ही कोई नई टेक्नोलॉजी आती है, पुराने को फेंक दिया जाता है। इसके साथ ही कई देशों में इन उत्पादों के मरम्मत और रिसायक्लिंग की सीमित व्यवस्था है या बहुत महंगी है। ऐसे में जैसे ही कोई उत्पाद खराब होता है लोग उसे ठीक कराने की जगह बदलना ज्यादा पसंद करते हैं। साल 2021 में डेफ्ट यूनिवर्सिटी आफ टेक्नोलॉजी द्वारा किए गए सर्वेक्षण में फोन बदलने का सबसे बड़ा कारण साफ्टवेयर का धीमा होना और बैट्री में गिरावट रहा। दूसरा बड़ा कारण नए फोन के प्रति आकर्षण था। कंपनियों की मार्केटिंग और दोस्तों द्वारा हर साल फोन बदलने की आदतों से भी प्रभावित होकर भी लोग नया फोन ले लेते हैं, जबकि इसकी जरूरत नहीं होती। इस वजह से भी ई-कचरे में इजाफा हो रहा है। एक अन्य आंकड़े के मुताबिक अगर साल 2019 में उत्पादित कुल इलेक्ट्रॉनिक कचरे को रिसायकल कर लिया गया होता वो करीब 425,833 करोड़ रुपए का फायदा देता। यह आंकड़ा दुनिया के कई देशों के जीडीपी से भी ज्यादा है। यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी की ओर से जारी ‘ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर 2020 रिपोर्ट के मुताबिक साल 2019 में दुनिया में 5.36 करोड़ मीट्रिक टन ई-कचरा पैदा हुआ था। अनुमान है कि साल 2030 तक इस वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक कचरे में तकरीबन 38 प्रतिशत तक वृद्धि हो जाएगी। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह समस्या कितनी बड़ी है और आने वाले समय में यह और कितना बढ़ने वाली है। बात अगर दिल्ली की करें तो यहां हर साल 2 लाख टन ई-कचरा पैदा होता है। हालांकि, इसे वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीके से हैंडल नहीं किया जा रहा है। इससे आग लगने जैसी कई जानलेवा घटनाएं हो चुकी हैं, जो दिल्ली के निवासियों और कूड़ा उठाने वालों के स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। इसी क्रम में अभी हाल ही में दिल्ली सरकार ने घोषणा की है कि दिल्ली में भारत का पहला ई-कचरा इको-पार्क खोला जाएगा। 20 एकड़ में बनने वाले इस पार्क में बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक सामान, लैपटॉप, चार्जर, मोबाइल और पीसी से अनूठे एवं दर्शनीय चीजों को निर्मित किया जाएगा। इसी कड़ी में कानपुर में ई-वेस्ट प्रबंधन का एक बेहतरीन मॉडल सामने आया है। यहां जयपुर के एक कलाकार ने ई-वेस्ट से 10 फीट लंबी मूर्ति बनाई है। इसे बनाने में 250 डेस्कटॉप और 200 मदरबोर्ड, केबल और ऐसी अनेक खराब इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का इस्तेमाल किया गया है।   <br /><br />-ललित गर्ग<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)<br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 26 Sep 2023 11:16:42 +0530</pubDate>
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                <title>ई-वेस्ट पॉलिसी जल्द आएगी</title>
                                    <description><![CDATA[जयपुर। राजस्थान में खनन क्षेत्र को 33 प्रतिशत ग्रीन कवर सुनिश्चित करना चाहिए। राज्य में बड़ी संख्या में छोटी और बड़ी माइंस हैं, यदि वे 33 प्रतिशत ग्रीन कवर सुनिश्चित करते हैं, तो इससे दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता भी सुनिश्चित होगी। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/e-waste-policy-will-come-soon/article-11621"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/conference-group.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजस्थान में खनन क्षेत्र को 33 प्रतिशत ग्रीन कवर सुनिश्चित करना चाहिए। राज्य में बड़ी संख्या में छोटी और बड़ी माइंस हैं, यदि वे 33 प्रतिशत ग्रीन कवर सुनिश्चित करते हैं, तो इससे दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता भी सुनिश्चित होगी। यह बात राजस्थान ज्य प्रदूराषण नियंत्रण बोर्ड, राजस्थान सरकार के चेयरमैन सुधांश पंत ने कही। वह जयपुर में कंफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) द्वारा आयोजित ‘द 7आर्स कॉन्फ्रेंस रोडमैप फॉर ए ग्रीनर टुमॉरो’ के 5वें संस्करण में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे।  पंत ने कहा कि राजस्थान सरकार ई.वेस्ट पॉलिसी लेकर आ रही है।</p>
<p>जिसका ड्राफ्ट तैयार है और इसे हितधारकों के साथ उनकी टिप्पणियों और सुझावों के लिए साझा किया गया है। सीईओ और डब्ल्यूटीडी हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड अरुण मिश्रा ने कहा कि राजस्थान में सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं। ऊर्जा के इस स्रोत की क्षमता का बेहतर और प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाना चाहिए। सेंट.गोबेन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के ग्लास सॉल्यूशंस एंड स्ट्रेटेजिक प्रोजेक्ट्स के प्रबंध निदेशकए आइजनहावर स्वामीनाथन ने कहा कि आज के समय में बिल्डिंग्स पर्यावरण की समस्या का एक हिस्सा हैं। कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन बहुत अधिक है। डिप्टी हैड ऑफ  प्लांट ऑपरेशंस हीरो मोटोकॉर्प लिमिटेड मुकेश गोयल ने कहा कि पृथ्वी केवल एक ही है। यह बात किसी को भूलनी नहीं चाहिए। पेरिस जलवायु समझौते में, दुनिया भर के 700 शहरों के साथ-साथ संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों को भी ने उत्सर्जन में कटौती के लिए प्रतिबद्ध हैं। पंत ने ग्रीन रेटिंग कंपनियों को भी पुरस्कार प्रदान किए जो ग्रीन-फ्रेंडली प्रोसेस को अपना रही हैं।</p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Jun 2022 14:27:04 +0530</pubDate>
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