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                <title>millet - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>PDS में मिलेगा तीन माह बाजरा, किसानों से दस लाख मीट्रिक टन बाजरे की एमएसपी पर होगी खरीद</title>
                                    <description><![CDATA[इसके बाद राजस्थान देश का दूसरा राज्य होगा, जहां किसानों से बाजरे की खरीद की जाएगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/millet-will-be-available-for-three-months-in-pds-one/article-82707"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-06/bhajanlal-sharma-(3)1.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। प्रदेश के करीब एक करोड़ परिवारों को पीडीएस के तहत तीन माह गेहूं की जगह बाजरा मिलेगा। इसके लिए पहले एमएसपी पर राज्य सरकार किसानों से बाजरे की खरीद करेगी। राज्य सरकार इसकी बजट में घोषणा करने की तैयारी कर रही है।</p>
<p>राज्य में करीब 50 लाख मेट्रिक टन बाजरे का उत्पादन होता है। इसमें से 10 लाख मेट्रिक टन बाजरे की राज्य सरकार किसानों से एमएसपी पर खरीद करेगी। इसमें करीब साढ़े सात लाख मेट्रिक टन बाजरा पीडीएस के पात्र परिवारों को निशुल्क बांटा जाएगा। इसका वितरण नवम्बर, दिसंबर और जनवरी में वितरण होगा। फिलहाल देश मे केवल हरियाणा में ही एमएसपी पर बाजरे की खरीद हो रही है। इसके बाद राजस्थान देश का दूसरा राज्य होगा, जहां किसानों से बाजरे की खरीद की जाएगी।</p>
<p>खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री सुमित गोदारा ने कहा कि मुख्यमंत्री से इस बारे में चर्चा की है। जल्द ही इसके परिणाम आएंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 25 Jun 2024 20:14:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>मोटे अनाज क्यों हैं इतने महत्वपूर्ण?</title>
                                    <description><![CDATA[सिंधु घाटी सभ्यता यानी लगभग 3000 ईसा पूर्व भारत में मोटे अनाजों की खेती होती थी, इसके साक्ष्य पाए गए हैं। जानकारों के अनुसार सबसे पहले भारत से ही मोटे अनाज की कई किस्मों की खेती की शुरुआत हुई थी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/why-are-millets-so-important/article-41268"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-03/e1.jpg" alt=""></a><br /><p>कोविड महामारी, जलवायु परिवर्तन तथा रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते पूरी दुनिया में खाद्य सुरक्षा को लेकर बड़ी चिंता बनी हुई है, क्योंकि वर्तमान की वैश्विक परिस्थितियों के कारण खाद्य उत्पादन में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे खाद्य संकट की स्थिति पैदा हो सकती है और इस वजह से भुखमरी और कुपोषण जैसे हालात बन सकते हैं। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था को जोखिम से बचाने के लिए मोटे अनाजों की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है। साथ ही इसके उपभोग को बढ़ाने के लिए, इसे लोकप्रिय बनाने के भी भरपूर प्रयास किए जा रहे हैं। मोटे अनाज छोटे-छोटे दानों वाले ऐसे अनाज होते हैं, जो पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। इनके अंतर्गत ज्वार, बाजरा, मक्का, जौ, मडुवा, कंगनी, कुटकी, रागी, कोदों, चीना, और सावां जैसे कई अनाज आते हैं, जो फाइबर व पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। इसीलिए इन्हें सुपरफूड भी कहा जाता है। कृषि मंत्रालय ने 10 अप्रैल 2018 को इसे पोषक अनाज घोषित किया था। <br />विशेषज्ञों का मानना है कि पोषक अनाजों से 3.5 गुना ज्यादा पोषण प्राप्त होता है। इनमें बीटा-कैरोटीन, नाइयासिन, विटामिन-बी6, फोलिक एसिड, पोटेशियम, मैग्नीशियम, जस्ता आदि खनिज लवण और विटामिन भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इनमें पोषण के साथ-साथ औषधीय गुण भी मौजूद होते हैं, जिससे शरीर की पाचन क्रिया मजबूत होती है तथा ये रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार ये ओजवर्धक और बलवर्धक होते हैं। मोटे अनाजों को अपने भोजन में शामिल करने से कब्ज और अपच जैसी समस्याओं से बचा जा सकता है तथा ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल आदि कई बीमारियों के खतरे को कम किया जा सकता है। आईसीएआर और भारतीय बाजरा अनुसंधान संस्थान की एक रिपोर्ट के अनुसारए मोटे अनाजों में लगभग 7.12 फीसदी प्रोटीन, 2.5 फीसदी वसा, 65.75 फीसदी कार्बोहाइड्रेट और 15.20 फीसदी खाने वाला फाइबर होता है। जई यानी ओट्स जो आजकल सुबह नाश्ते में खाया जाता है, काफी पौष्टिक होता है और इसमें फाइबर बहुत ज्यादा होता है।<br /><br />भारत में मोटे अनाजों की खेती सदियों से की जाती रही है। सिंधु घाटी सभ्यता यानी लगभग 3000 ईसा पूर्व भारत में मोटे अनाजों की खेती होती थी, इसके साक्ष्य पाए गए हैं। जानकारों के अनुसार सबसे पहले भारत से ही मोटे अनाज की कई किस्मों की खेती की शुरुआत हुई थी। इसके अलावा पश्चिम अफ ्रीका, चीन और जापान आदि देशों में भी मोटे अनाज की कई अन्य किस्मों का विकास किया गया। वर्तमान में 130 से अधिक देशों में मोटे अनाजों की खेती होती है और ये एशिया और अफ्र ीका के लगभग 50 करोड़ से अधिक लोगों का पारंपरिक भोजन बन चुका है। मोटे अनाजों को कम उपजाऊ भूमि और कम पानी में उगाया जा सकता है। इसलिए गेहूं और चावल जैसे अनाजों की अपेक्षा इन्हें उगाना आसान होता है। इनमें कीटों से लड़ने की रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है। इसके अलावा इन्हें उर्वरकों व खादों की कम आवश्यकता होती है, जिससे इनकी उत्पादन लागत काफी कम हो जाती है। इस कारण गरीब किसान भी इनकी खेती आसानी से कर सकते हैं और अधिक लाभ कमा सकते हैं। विश्व स्तर पर मोटे अनाजों की सबसे प्रमुख फसल ज्वार है। इसके प्रमुख उत्पादक देश यूएसए, चीन, आॅस्ट्रेलिया, भारत, अर्जेंटीना, नाइजीरिया और सूडान हैं। इतिहास के प्राथमिक स्रोतों से पता चलता है कि मनुष्यों ने सबसे पहले ज्वार की ही खेती की थी। इसके अलावा बाजरा एक दूसरी प्रमुख फसल है, जो भारत और कुछ अफ्रीकी देशों में प्रमुख रूप से उपजाया जाता है। भारत में अधिकांश मोटे अनाजों की खेती खरीफ  के मौसम में होती है। <br /><br />कृषि मंत्रालय के अनुसार, देश में 2015-16 से 2019-20 तक मोटे अनाजों का उत्पादन 44.01 मिलियन टन था। 2018-19 के दौरान सकल कृषि उत्पादन में मोटे अनाजों का योगदान लगभग 7 फीसदी तक रहा। इनमें मुख्य रूप से बाजरा, ज्वार और रागी का उत्पादन किया गया। भारत में अधिकांश मोटे अनाज गुजरात, राजस्थान, महाराष्टÑ, कर्नाटक आदि राज्यों में उपजाए जाते हैं। भारत में ज्वार की खेती मुख्य रूप से महाराष्टÑ, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश में होती है तथा बाजरे का उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्य राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्टÑ हैं। जौ की पैदावार सबसे ज्यादा राजस्थान और उत्तर प्रदेश में है तो रागी कर्नाटक और उत्तराखंड में उगाई जाती है। साल 2020-21 के दौरान देश में ज्वार का उत्पादन लगभग 4.78 मिलियन टन और बाजरे का उत्पादन लगभग 10.86 मिलियन टन हुआ था। वर्ष 2020-21 में महाराष्टÑ ने ज्वार का और राजस्थान ने बाजरे का देश में सबसे अधिक उत्पादन किया था।<br /><br />-रंजना मिश्रा<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 31 Mar 2023 10:58:00 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>हमारे बाजरे से रु-ब-रु होंगे दुनिया के देश</title>
                                    <description><![CDATA[कदन्न वर्ष के बाद जिस तरह से 2021-22 में बाजरा के निर्यात में 8 प्रतिशत से भी अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, उससे यह साफ  हो जाता है कि विदेशों में बाजरा सहित भारतीय मोटे अनाज की मांग बढ़ेगी और इसका लाभ देश के किसानों को भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से मिलेगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/countries-of-the-world-will-be-face-to-face-with/article-35358"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-01/q-812.jpg" alt=""></a><br /><p>वह दिन दूर नहीं जब दुनिया के देश हमारे बाजरे के स्वाद से रु-ब-रु होने लगेंगे। आज मोटे अनाज को देश और विदेश दोनों ही जगह लोकप्रिय बनाना शुरु हो गया है। अब भारत के मोटे अनाज खासतौर से बाजरा को दुनिया के देशों में पहुंचाने की पहल आरंभ हुई है। सरकार ने विदेशों में मोटे अनाज को लोकप्रिय बनाने और बाजरा आदि के निर्यात को बढ़ाने का पूरा रोडमैप तैयार कर क्रियान्वयन आरंभ कर दिया है। एपिडा सहित अन्य निर्यातक संस्थाओं द्वारा इसके लिए संयुक्त प्रयास किए जा रहे हैं तो विदेशों में रोड शो, फूड फेस्टिवल, कॉन्क्लेव आदि के आयोजन से मोटे अनाज से बने उत्पादों से विदेशियों को आकर्षित करने और निर्यात को बढ़ावा देने के प्रयास शुरु हो गए हैं। दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सांसदों को मोटे अनाज से तैयार व्यंजनों से लंच दिया जा चुका है। अन्य आयोजनों में भी मोटे अनाज से तैयार व्यंजनों को भी प्रमुखता से स्थान दिया जा रहा है। बाजरा व अन्य मोटे अनाज और उनसे तैयार उत्पादों के लिए अंतरराष्टÑीय स्तर पर बाजार तैयार करने की सकारात्मक शुरुआत हुई है जिसके परिणाम प्राप्त भी होने लगे हैं। यही कोई चार-पांच दशक पुरानी बात होगी। संदर्भ तो राजस्थान से ही ले रहा हूं पर कमोबेस यही स्थिति देश के अन्य प्रदेशों में भी रही होगी। जब घर पर कोई मेहमान आता था या तीज त्यौहार होता था तभी घर में मीठे के रुप में चावल और गेहूं की चपाती बना करती थी। अन्यथा दिन प्रतिदिन का खाना तो सर्दियों में बाजरा-मक्का की रोटी, बाजरा की राबड़ी या मक्का का दलिया या गर्मियों में जौ का दलिया और इसके साथ इसी तरह से मोटे अनाज की रोटी और हरी सब्जियां, कढ़ी जिसे गांव देहात की बोली में खाटा कहकर पुकारा जाता था बड़े चाव के साथ खाते थे। फिर एक दौर चला जब मोटे अनाज की जगह गेहूं ने ले ली और फिर आज तो लोग गेहूं चावल को भी छोड़कर जंक फूड पर जोर देने लगे हैं जिसके परिणााम साफ -साफ  दिखाई देने लगे हैं। दवाइयों के सहारे जीवन गुजरने लगा है तो इम्यूनिटी भी बुरी तरह से प्रभावित होने लगी है। खैर, यह तो रही एक बात।<br /><br />अब यदि हम खेती किसानी की भी चर्चा करें तो देखेंगे कि मोटे अनाज की खेती कम लागत और कम पानी की खेती होती है। अब वह चाहे बाजरा हो, मक्का हो, रागी हो, ज्वार हो या और इसी तरह का मोटा अनाज। दूसरी बात यह कि इनमें रोग भी कम लगते हैं तो जहरीले कीटाणु नाशकों का उपयोग भी ना के बराबर ही होता है। इस सबके बावजूद एक बात और मोटे अनाज का रकबा धीरे-धीरे घटने के बावजूद यदि बाजरे की ही बात करें तो सारी दुनिया में उत्पादित कुल बाजरे का 41 फीसद बाजरा हमारे देश में उत्पादित होता है। राजस्थान में तो बाजरा खरीफ  की प्रमुख फसलों में से एक है। आज सभी राजनीतिक दल और किसान समर्थक संगठन किसानों की आय बढ़ाने की बात कर रहे हैं। तो यह भी साफ  हो जाना चाहिए कि मोटे अनाज के निर्यात की मार्केटिंग सही तरीके से होती है और इसके उत्पादों को बाजार में आक्रामक रणनीति के साथ उतारा जाता है तो अंततोगत्वा इसका फायदा किसान को ही जाना है। यह अपने आप में कटु सत्य है। जंक फूड के जद में आए दुनिया के देशों को मोटे अनाज का महत्व समझाने की पहल तो भारत ने 2018 को कदन्न वर्ष मनाकर ही कर दी थी और उसी का परिणाम रहा कि मार्च, 2021 में भारत द्वारा मोटे अनाज के महत्व को एक बार फिर समझाने के लिए 2023 को अंतरराष्टÑीय मिलेट वर्ष घोषित करने का प्रस्ताव रखा तो दुनिया के 72 देशों ने भारत के प्रस्ताव का समर्थन किया। अब योजनाबद्ध तरीके से विदेशों में भारत के मोटे अनाज के निर्यात को बढ़ावा देने के प्रयास शुरु कर दिए गए हैं। दिसंबर में रोम में अंतरराष्टÑीय मिलेट वर्ष का आगाज हो चुका है। विदेशाी धरती पर बायर सेलर मीट जैसे आयोजन आरंभ कर दिए गए हैं। उत्पादकों और उपभोक्ताओं के बीच सीधा संवाद कायम करने की कार्य योजना पर अमल शुरु हो गया है। दरअसल अब लोगों को समझ आने लगा है कि कुपोषण के खिलाफ  मोटा अनाज हथियार के रुप में उपयोग में लाया जा सकता है तो दूसरी और हाइपरटेंशन और शुगर जैसी बीमारियों में भी मोटा अनाज कारगर सिद्ध हो सकता है।अन्तरराष्टÑीय मिलेट वर्ष का फायदा उठाने के लिए नई रणनीति के अनुसार आगे बढ़ना होगा। हालांकि सरकार ने दक्षिण अफ्र ीका, दुबई, जापान, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया, जर्मनी, अमेरिका, इंग्लैण्ड सहित विदेशों में रोड शो, प्रदर्शनी, फूड फेस्टिवल आदि आयोजित करने का रोड मेप तैयार किया गया है। निश्चित रुप से इसके परिणाम सकारात्मक ही प्राप्त होंगे।  कदन्न वर्ष के बाद जिस तरह से 2021-22 में बाजरा के निर्यात में 8 प्रतिशत से भी अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, उससे यह साफ  हो जाता है कि विदेशों में बाजरा सहित भारतीय मोटे अनाज की मांग बढ़ेगी और इसका लाभ देश के किसानों को भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से मिलेगा। <br /><br />-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Jan 2023 11:36:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>अनाज का संकट दूर कर सकता है बाजरा</title>
                                    <description><![CDATA[एक अनुमान के अनुसार, दुनिया की लगभग आधी आबादी चावल पर और एक तिहाई आबादी गेहूं पर निर्भर है। हालांकि वर्ष 2023 को संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष के रूप में घोषित किया गया है। ऐसे में इस अनाज को लेकर लोगों की धारणा बदल सकती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/millet-can-solve-the-grain-crisis/article-27255"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-10/q-810.jpg" alt=""></a><br /><p>नाइजीरिया में एलेक्स एकवुमे फेडरल यूनिवर्सिटी के कृषि अर्थशास्त्री रॉबर्ट ओनीनेके का कहना है कि दुनिया अनाज के संकट का सामना कर रही है। यह संकट हर जगह बढ़ रहा है। अब समय आ गया है कि चावल और गेहूं जैसे लोकप्रिय अनाज के विकल्पों की तलाश की जाए। उनका मानना है कि बाजरा इस अनाज का एक विकल्प हो सकता है। बाजरा काफी ज्यादा पौष्टिक होता है, किसी भी तरह की जलवायु में पैदा किया जा सकता है। इसके उत्पादन में समय कम लगता है और यह कार्बन का भी कम उत्सर्जन करता है। इसे लोगों की नजर में लाने की जरूरत है।<br /><br />एक अनुमान के अनुसार, दुनिया की लगभग आधी आबादी चावल पर और एक तिहाई आबादी गेहूं पर निर्भर है। हालांकि वर्ष 2023 को संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष के रूप में घोषित किया गया है। ऐसे में इस अनाज को लेकर लोगों की धारणा बदल सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह अनाज न सिर्फ स्वास्थ्य के हिसाब से सही है, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी इसका उत्पादन किया जा सकता है। जिस तरह से दुनिया जलवायु परिवर्तन का सामना कर रही है, उस स्थिति में यह अनाज खाद्य असुरक्षा की चिंता को कम कर सकता है। बाजरे का उत्पादन गर्म और सूखाग्रस्त इलाकों में भी किया जा सकता है। इसे गेहूं, धान या मक्का की तुलना में काफी कम पानी की जरूरत होती है। इसके उत्पादन में समय भी काफी कम लगता है। बाजरे की कुछ फसल महज 60 से 90 दिनों के भीतर तैयार हो जाती है। धान की खेती के विपरीत बाजरे की खेती के दौरान बहुत कम या न के बराबर ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।<br /><br />ऐतिहासिक रूप से भी देखें तो बाजरे का उत्पादन लगभग 3000 ईसा पूर्व से किया जा रहा है। माना जाता है कि यह उन शुरुआती फसलों में से एक है, जब लोगों ने खेती शुरू की थी। लंबे समय से लाखों किसान मुख्य फसल के तौर पर इसका उत्पादन कर रहे हैं। खासकर भारत, चीन और अफ्रीका के कई हिस्सों में। बाजरे में पर्याप्त मात्रा में आयरन, फाइबर और कुछ विटामिन होते हैं, इसलिए इसे पोषक अनाज भी कहा जाता है। दुनिया के करीब 130 से ज्यादा देशों में इसका उत्पादन होता है। हालांकि इसके बावजूद अफ्रीका और एशिया के महज 9 करोड़ लोग ही मुख्य भोजन के रूप में इसका इस्तेमाल करते हैं। इसे अक्सर गरीबों का भोजन माना जाता है।<br /><br />बाजरे के उत्पादन में सिंथेटिक उर्वरकों और कीटनाशकों की भी कम जरूरत होती है। साथ ही यह मिट्टी की उर्वरता को भी बढ़ा सकता है। मौजूदा स्थिति यह है कि एशिया और अफ्रीका में बाजरे का जितना उत्पादन किया जा रहा है, वह स्थानीय मांगों को भी पूरा नहीं कर सकता है। अगर बाजरे के निर्यात को बढ़ावा देना है तो सरकारों को हस्तक्षेप करना होगा। सब्सिडी और सरकारी स्तर पर खरीद सुनिश्चित कर बाजरे की खेती को आसानी से बढ़ाया जा सकता है। बाजरे की खेती बढ़ने का मतलब है कि इसके प्रसंस्करण के साधनों में भी वृद्धि करनी होगी। भारत सबसे ज्यादा बाजरे का उत्पादन करने वाले देशों में से एक है। 1960 के दशक में यहां हरित क्रांति हुई। उस समय अकाल से निपटने के लिए फसलों के उत्पादन पर दी गई सब्सिडी और बड़े पैमाने पर हुए कृषि औद्योगीकरण से चावल और गेहूं को फायदा हुआ। बाजरे के प्रसंस्करण के लिए जो बुनियादी ढांचा चाहिए, वह आज भी मौजूद नहीं है।<br /><br />भारत के कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि संतुलन बनाए रखने के लिए मोती और फिंगर जैसी बाजरे की प्रजातियों पर ध्यान देना चाहिए। इन्हें कम प्रसंस्करण की जरूरत होती है। गेहूं के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले बुनियादी ढांचे में एक छोटा बदलाव कर इन मोटे अनाजों का प्रसंस्करण किया जा सकता है। उनका कहना है कि हमें भूसी वाले छोटे अनाज के प्रसंस्करण के लिए बुनियादी ढांचे का भी विकास करना चाहिए। बाजरे के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकारी सब्सिडी और सहायता की जरूरत होगी। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि केवल एक तरह के अनाज की खपत को दूसरे के साथ इस तरह बदलना सही फैसला नहीं है।<br /> <br />हम अदूरदर्शी यूरोपीयन संस्कृति पर केंद्रित नीति लागू नहीं कर सकते, जो विकासशील देशों को उनके हिस्से के अनाज से वंचित करती है। हालांकि उनका मानना है कि बाजरा किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करना जरूरी है। ऐसा न होने पर किसानों की जगह सिर्फ बिचौलियों को ही फायदा होगा। दुनिया में बाजरे की मांग बढ़ने से शुष्क जमीन के साथ-साथ उपजाऊ जमीन पर भी इसकी खेती बढ़ेगी। बेहतर गुणवत्ता वाली फसल अच्छी मात्रा में पैदा होगी। इससे इस अनाज को लेकर लोगों के मन में जो छवि बनी है, वह भी दूर हो सकती है। बाजरे को लेकर लोगों की जो धारणाएं थीं, वह काफी पहले से ही बदलनी शुरू हो गई हैं। तकनीक और बाजरे से बनने वाले खाद्य उत्पादों में सुधार के साथ बाजरा उत्पादन पूरी दुनिया में खाद्य सुरक्षा को मजबूत बना सकता है। हालांकि इस दिशा में बहुत काम करने की जरूरत है। भारत में किसानों से बाजरा करीब 10 रुपए किलो खरीदा जा रहा है और उसकी अच्छे से पैकिंग कर सुपरमार्केट में 50 रुपए किलो तक बिक्री हो रही है।<br /><br />-अमित बैजनाथ गर्ग<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 20 Oct 2022 12:14:55 +0530</pubDate>
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                <title>बरसात से खिले किसानों के चेहरे, बाजरे की बिजाई में जुटे</title>
                                    <description><![CDATA[कस्बे सड्डहत ग्रामीण अंचल में रड्डववार को इंद्र देव मेहरबान रहे। यहां करीब ढेढ़ घण्टे तक जमकर बरसात हुई। इस दौरान शहर के ड्डनचले इलाकों में पानी भर गया। सड़के दड्डरया बन गई। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bikaner/the-faces-of-farmers-blossomed-due-to-rain--engaged-in-sowing-of-millet/article-12639"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/bik.jpg" alt=""></a><br /><p>श्रीडूंगरगढ़। कस्बे सहित ग्रामीण अंचल में रविवार को इंद्र देव मेहरबान रहे। यहां करीब ढेढ़ घण्टे तक जमकर बरसात हुई। इस दौरान शहर के निचले इलाकों में पानी भर गया। सड़के दरिया बन गई। लोगों ने सड़कों पर भरे पानी के स्थायी समाधान के लिए पालिका की सफाई नीति पर विरोध दर्ज किया। यहां गांधी पार्क, पोस्ट आॅफि स रोड पर करीब तीन फीट तक पानी भर गया। अंचल में हुई 10 से 12 इंच बरसात से बुजुर्ग बच्चे सहित हर वर्ग में उत्साह का संचार हुआ। किसानों ने हल सम्भाल लिए और बाजरे के बीजान प्रारंभ कर दिया है। लोढेरा, उदरासर, लिखमादेसर, आडसर, बिग्गा, उपनी, श्रीडूंगरगढ़ की रोही में बारानी किसानों ने बाजरा बिजाई शुरू कर दी है। वहीं कृषि कुओं पर किसानों ने ग्वार व बाजरा की बिजाई शुरू कर दी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बीकानेर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Jun 2022 14:59:10 +0530</pubDate>
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