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                <title>abheda biological park - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>abheda biological park RSS Feed</description>
                
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                <title>कागजों में दफन 80 लाख की सोलर फैंसिंग और 50 लाख का इलैक्ट्रिक शवदाह गृह</title>
                                    <description><![CDATA[अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में शाकाहारी वन्यजीवों व वन कर्मियों पर मंडराया मांसाहारी जानवरों के हमले का खतरा।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/solar-fencing-worth-80-lakh-and-an-electric-crematorium-worth-50-lakh-remain-buried-in-paperwork/article-143055"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/(12200-x-600-px)-(4)11.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क को मांसाहारी जानवरों के हमले से सुरक्षित बनाने के लिए 80 लाख की लागत से सौलर फेंसिंग का सुरक्षा कवच बनाया जाना था, जो एक साल बाद भी नहीं बन सका। जबकि, पार्क के चारों ओर घना जंगल है, जहां लेपर्ड, हाइना व भालुओं की मौजूदगी से शाकाहारी वन्यजीवों व रात्रि गश्त पर तैनात वन कर्मियों की जान पर संकट बना रहता है।वहीं, मृत जानवरों के खुले में अंतिम संस्कार से इंफेक्शन, बैक्टीरिया व संक्रमण का खतरा टालने को 50 लाख का इलेक्ट्रिक शवदाह गृह का निर्माण भी कागजों में दफन होकर रह गया।</p>
<p>दरअसल, मुख्यमंत्री बजट घोषणा 2025-26 के तहत अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में सेकंड फेस के विकास कार्यों के लिए 40 करोड़ के बजट की घोषणा की गई थी। जिसमें 80 लाख से पार्क की सम्पूर्ण दीवार पर सौलर फेंसिंग करवाने व 50 लाख से इलेक्ट्रिक शवदाह गृह के निर्माण के लिए वन्यजीव विभाग ने कुल 1.30 करोड़ का प्रस्ताव बनाकर उच्चाधिकारियों को भेजे थे, जो बजट के अभाव में स्वीकृत नहीं हुए।</p>
<p><strong>5 हजार मीटर सुरक्षा दीवार पर लगनी थी फेंसिंग</strong><br />वन्यजीव विभाग के उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर ने बताया कि अभेड़ा बायोलॉजिकल की सुरक्षा दीवार 5 हजार रनिंग मीटर लंबी है। वर्तमान में यह दीवार 10 फीट ऊंची है, जिस पर करीब 4 फीट ऊंची सीलर फेंसिंग लगाई जाएगी, जो सौलर से कनेक्ट रहेगी और चार्ज होने के साथ उसमें निर्धारित मात्रा में विद्युत करंट प्रवाहित होता रहेगा। इससे बाहर का कोई भी वाइल्ड एनिमल खास तौर पर लेपर्ड दीवार फांद पार्क के अंदर नहीं आ सकेगा। जिससे शाकाहारी वन्यजीव व गश्त करते वनकर्मियों पर मांसाहारी जानवरों के हमले का खतरा टल सकेगा। इस सौलर फेंसिंग से पूरा बायोलॉजिकल पार्क कवर्ड रहेगा। इसमें करीब 80 लाख रुपए का खर्चा आएगा। इसके प्रस्ताव बनाकर उच्चाधिकारियों को भेज दिए हैं।</p>
<p><strong>पिंजरे में घुसकर लेपर्ड कर चुका ब्लैकबक का शिकार</strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में वर्ष 2023 में 29 अप्रैल की रात लेपर्ड ने बाहर से बायोलॉजिकल पार्क की 10 फीट ऊंची दीवार फांद परिसर में कूद गया था और ब्लैक बक के एनक्लोजर में घुसकर हमला कर दिया। जिसमें ब्लैक बक के शावक की मौत हो गई। घटना के बाद से वनकर्मी रात्रि गश्त के दौरान खुद की सुरक्षा को लेकर चिंतित हो गए।</p>
<p><strong>इलैक्ट्रिक शवदाह गृह बने तो टले बैक्टीरिया व संक्रमण का खतरा</strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में 50 लाख की लागत से इलेक्ट्रिक शवदाह गृह बनवाया जाना है। इससे मृत जानवरों के शव का सुगमता से डिस्पोजल हो सकेगा। अब तक शव का अंतिम संस्कार करने के लिए जलाया जाता है, जिससे लकड़ियों की खपत बढ़ती है और धुएं से हवा में प्रदूषण भी बढ़ता है। ऐसे में इलेक्ट्रिक शवदाह गृह बनने से लकड़ियों की खपत रुकेगी और वायुमंडल में प्रदूषण भी नहीं फैलेगा। इसके अलावा इंफेक्शन, बैक्टीरिया व संक्रमण का खतरा भी टलेगा। लेकिन विभाग की अनदेखी के कारण प्रस्ताव कागजों से बाहर नहीं निकल सके।</p>
<p>बायोलॉजिकल पार्क में 40 करोड़ की लागत से द्वितीय चरण के विकास कार्य करवाए जाने हैं। जिसमें 80 लाख की लागत से सोलर फेंसिंग और 50 लाख से इलेक्ट्रिक शवदाह गृह बनाना है। जिसके प्रस्ताव बनाकर उच्चाधिकारियों को भेजे गए हैं, जैसे ही बजट प्राप्त होगा वैसे ही कार्य शुरू करवा दिया जाएगा।<br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Feb 2026 16:30:03 +0530</pubDate>
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                <title>टाइगर-लॉयन को मल्टी विटामिन तो भालू खा रहा अंडे-पिंड खजूर, सर्दियां आते ही अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में वन्यजीवों का बदला डाइट प्लान</title>
                                    <description><![CDATA[शाकाहारी वन्यजीवों की मौज, ताजी हरी सब्जियों के साथ मौसमी फलों का उठा रहे लुत्फ।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/tigers-and-lions-are-getting-multivitamins--while-bears-are-eating-eggs-and-dates--the-diet-plan-for-wildlife-at-abheda-biological-park-changes-with-the-arrival-of-winter/article-138237"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/tiger-or-lion-multivitamins-to-bhalu-kha-raha-ande-pind-khajoor,-sardiyan-ate-he-abheda-biological-park-mein-vanyajeevon-ka-badala-diet-plan...kota-news-03.01.2026.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। सर्दी के तेवर तीखे होने के साथ ही अभेड़ा बायॉलोजिकल पार्क में वन्यजीवों के रहन-सहन व डाइट प्लान भी बदल गया है। सुबह-शाम हो रही गलन व सर्द हवाओं के झौंके से बचाव के लिए वन्यजीव विभाग ने विशेष इंतजाम किए हैं। एनक्लोजर व पिंजरों में वन्यजीवों को गमार्हाट देने के लिए जहां एक ओर हीटर लगाए हैं वहीं, चावल की पराल बिछाई गई है। साथ ही इंफेक्शन से बचाव के लिए हल्दी का छिड़काव भी किया जा रहा है। खुराक भी बढ़ा दी गई है। दरअसल, सर्दियों की दस्तक के साथ ही प्रदेशभर के चिड़ियाघर और बायोलॉजिकल पार्क में वन्यजीवों के डाइट प्लान में बदलाव किया जाता है। जिसके तहत ही सर्दियों का शेड्यूल लागू किया जाता है, जो फरवरी तक जारी रहता है।</p>
<p><strong>शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों की हो रही मौज</strong><br />सर्दियों का शेडयूल लागू होते ही अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों की मौज हो गई। उन्हें वीआईपी ट्रीटमेंट दिया जा रहा है। मांसाहारियों को मांस के साथ अंडे, मल्टीविटामिन, मल्टी मिनरल्स, कैल्शियम परोसा जा रहा है। जबकि, शाकाहारी ताजी सब्जियों के साथ पशुआहार, मौसमी फल, गुड़ व अजवाइन का लुफ्त उठा रहे हैं। वहीं, भालू दूध, दलिया, फल, शहद और पिंडखजूर की दावत उड़ा रहे हैं ।</p>
<p><strong>बायोलॉजिकल पार्क में हैं 86 वन्यजीव</strong><br />बायलॉजिकल पार्क में मांसाहारी व शाकाहारी मिलाकर कुल 86 वन्यजीव हैं। मांसाहारी में लॉयनेस- 1, बाघिन- 1, भेड़िया-2, सियार-4, भालू-2, लेपर्ड-4, जरख-4 हैं। इसी तरह शाकाहारी में नीलगाय-16, चिंकारा-2, चितल 39, ब्लैक बक 27 है।</p>
<p><strong>मांसाहारियों के नाइट शेल्टर में लगाए हीटर</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के वनकर्मियों ने बताया कि सर्दियों की शुरूआत के साथ ही शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। सभी वन्यजीवों के नाइट शेल्टरों में पर्दें लगवा दिए गए हैं। लॉयनेस, टाइग्रेस, जरख, सियार, भेडिया व भालू के नाइट शेल्टर से 10 फीट की दूरी पर हीटर लगाए गए हैं। साथ ही खिड़कियों पर पर्दे लगाए गए हैं ताकि, सर्द हवाओं से बचाव हो सके।</p>
<p><strong>मांसाहारी वन्यजीवों का डाइट प्लान- </strong>लॉयनेस व टाइगे्रस को 10 किलो मांस के साथ मल्टी विटामिन<br />लॉयनेस व बाघ-बाघिन को 8 किलो पाड़ा मांस और 1 मुर्गा (प्रति एनिमल) दिया जा रहा है। इसके अलावा मल्टी विटामिन, मल्टी मिनरल्स व लीवर टॉनिक व कैल्शियम अलग से दिए जा रहे हैं। यह सप्लीमेंट्स 10 एमएल परडे मांस के टुकड़ों पर मिलाकर दिया जा रहा है। इससे शरीर में ऊर्जा का संचार बेहतर होने के साथ पाचन तंत्र भी मजबूत रहता है।<br /><strong>भेडिया :</strong> 2 किलो प्रति पाड़ा मांस, 1 अंडा सहित मल्टी विटामिन व मिनरल्स दिए जा रहे हैं।<br /><strong>सियार :</strong> 1.25 किलो मांस प्रति सियार, 1 अंडा व सप्लीमेंट्स<br /><strong>जरख :</strong> 3 किलो प्रति एनिमल्स, 1 अंडा व सप्लीमेंट्स</p>
<p><strong>3.5 किलो मांस के साथ कैल्शियम खा रहा पैंथर</strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में मांसाहारी वन्यजीवों की डाइट में हैल्दी पोषक तत्व शामिल किए हैं। यहां 4 लेपर्ड हैं। मेल लेपर्ड को 3.5 किलो व फिमेल लेपर्ड को 2.5 किलो मांस प्रतिदिन दिया जा रहा है। इसके अलावा 1-1 अंडा व मल्टी विटामिन व कैल्शियम दिया जा रहा है। इसी तरह सभी 4 सियार को 1.25 किलो के हिसाब से प्रतिदिन 5 किलो मांस परोसा जा रहा है। वहीं, प्रत्येक भेड़िए को 2 किलो के हिसाब से 4 किलो तथा चारों हायना को 3 किलो के हिसाब से 12 किलो मीट प्रतिदिन खिलाया जा रहा है।</p>
<p><strong>ढाई लीटर दूध के साथ अंडे और खजूर खा रहा भालू</strong><br />सर्दियों में सबसे ज्यादा मजे भालू के हैं। यहां 2 भालू हैं, जिसे डाइट में प्रतिदिन 2.5 लीटर दूध के साथ 1 किलो चावल, 1.75 किलो दलिया, 2 अंडे, 200 ग्राम गुड़, 200 ग्राम शहद, 200 ग्राम शहद प्रतिदिन डाइट में दिए जा रहे हैं। साथ ही मल्टीविटामिन, कैल्शियम व मिनरल्स भी दिए जाते हैं।</p>
<p><strong>इंफेक्शन से बचाव के भी किए उपाए</strong><br />बायॉलोजिकल पार्क में तैनात कर्मचारियों ने बताया कि शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों के एनक्लोजर और नाइट शेल्टरों में हल्दी का छिड़काव किए गए हैं। हल्दी की तासीर गर्म होने के साथ एंटी बायटिक भी रहती है। यदि, उनके शरीर पर कोई चोट लग जाए तो हल्दी लगने से इंफेक्शन नहीं होगा। सर्दियों में वन्यजीवों की साइटिंग होने से पर्यटक रोमांचित हो रहे हैं।</p>
<p><strong>एनक्लोजर में बिछाई पराल</strong><br />शाकाहारियों के नाइट शेल्टर में पराल बिछाई गई है। ताकि, एनिमल के चलने फिरने व बैठने पर फर्श ठंडा न लगे। पराल से शेल्टर में गमार्हाट बनी रहती है। इसके अलावा एनक्लोजर की जालियों व पिंजरों को ग्रीन नेट से कवर किया गया है। ताकि, सर्द हवाओं के झौंकों से बच सके।</p>
<p><strong>हरी सब्जियों के साथ नमक का भी चख रहे स्वाद</strong><br />मांसाहारी वन्यजीवों के मुकाबले शाकाहारियों का डाइट प्लान बड़ा है। उन्हें गाजर, मूली, खीरा, टमाटर, ककड़ी, गोभी, लौकी, पालक, पत्ता गोभी सहित मौसमी सब्जियां, हरा चारा, पशु आहार, फल-फू्रट, गुड़, आजवाइन के साथ मल्टीविटामिन व न्यूट्रिशियन दिए जा रहे हैं। शाकाहारी वन्यजीवों का डाइट चार्ट एक ही है लेकिन डाइट की मात्रा अलग-अलग है। हैल्दी डाइट से सभी वन्यजीव सर्दियों में तंदरुस्त रहेंगे।</p>
<p>सर्दी की शुरूआत होने के साथ ही बायोलॉजिकल पार्क में मौजूद सभी वन्यजीवों की डाइट में परिवर्तन कर दिया है। इन दिनों वन्यजीवों की खुराक बढ़ जाती है। डाइट में जरूरी पोषक तत्वों को शामिल कर जरूरत के मुताबिक उनकी मात्रा में बढ़ोतरी की गई है। वहीं, सर्द हवाओं से बचाव के लिए मांसाहारी वन्यजीवों के नाइट शेल्टर के पास हीटर व शाकाहारियों के शेल्टरों में पराल बिछाई गई है और खिड़कियों पर पर्दे लगाए गए हैं। वैसे तो वन्यजीवों को इस तरह की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि जंगल में तो वह अपने हिसाब से अपना हैबीटाट जैसे-गुफाएं, पेड़ों के नीचे, धूप में बैठकर सर्दी से खुद का बचाव करते हैं। वहीं, अलग-अलग तरह के जानवरों का शिकार करते हैं, जिससे वैराइटिज आॅफ फूड मिल जाता है लेकिन चिड़ियाघरों में इनका एरिया सीमित होता है। इसलिए यह सुविधाएं उपलब्ध करवानी पड़ती है।<br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 03 Jan 2026 16:31:13 +0530</pubDate>
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                <title>पर्यटकों का बायोलॉजिकल पार्क के प्रति घटता रुझान : बड़े वन्यजीवों की कमी और टूटते झूलों से मोह हुआ भंग, न टाइगर न लॉयन, पर्यटक और राजस्व में भारी गिरावट </title>
                                    <description><![CDATA[वर्ष 2024 से 31 अक्टूबर 2025 तक के आंकड़ों से हुआ खुलासा।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/tourists--interest-in-the-biological-park-is-declining--the-lack-of-large-wildlife-and-broken-swings-have-dissipated-their-attraction--neither-tigers-nor-lions-have-been-seen--resulting-in-a-sharp-decline-in-tourist-arrivals-and-revenue/article-132707"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-11/111-(1)25.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। देश-विदेश के पयर्टकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क अपनी चमक खोता जा रहा है। पर्यटकों से गुलजार रहने वाला राजस्थान का सबसे बड़ा पार्क अब वीरान सा नजर आने लगा है। जहां कद्रदानों की महफिलें सजा करती थी वहां आज पर्यटकों की बेरुखी देखने को मिल रही है। जिसका असर, राजस्व में भारी गिरावट के रूप देखने को मिला। गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष 31 अक्टूबर तक करीब तीन हजार से ज्यादा पर्यटकों की संख्या घटी है। वहीं, एक लाख रुपए राजस्व का घाटा हुआ है। यह खुलासा वर्ष 2024 व 2025 के 10 माह के आंकड़ों से हुआ है। </p>
<p><strong>3 हजार पर्यटक व 1 लाख से ज्यादा राजस्व घटा</strong><br />वर्ष 2024 व 2025 के जनवरी से अक्टूबर तक के तुल्नात्मक आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आया कि वर्ष 2024 के मुकाबले 2025 में पर्यटकों की संख्या में करीब 3 हजार तथा  1  लाख से ज्यादा के राजस्व में गिरावट दर्ज हुई है।  वन्यजीव विभाग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, गत वर्ष जनवरी से अक्टूबर तक करीब 66 हजार 886 पर्यटक बायोलॉजिकल पार्क में वन्यजीवों के दीदार को पहुंचे थे। जबकि, वर्ष 2025 में 31 अक्टूबर तक यह संख्या घटकर 63 हजार 225 ही रह गई। वहीं, पर्यटकों से होने वाली आय की बात करें तो गत वर्ष अक्टूबर तक करीब 25 लाख 33 हजार से ज्यादा का राजस्व प्राप्त हुआ था। वहीं, अक्टूबर 2025 तक 24 लाख 28 हजार 220 ही हुआ है। </p>
<p><strong>जनवरी के बाद अर्श से फर्श पर पहुंची कमाई </strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के लिए जनवरी माह ही कमाई का होता है। पूरे साल में इसी माह में सबसे ज्यादा पर्यटक घूमने आते हैं। वर्ष 2024 की जनवरी में 13 हजार 356 पर्यटक वन्यजीवों की दुनिया निहारने पहुंचे थे। उनसे पार्क को 4 लाख 96 हजार 740 रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ था। वहीं, वर्ष 2025 में पर्यटकों में 2764 की बढ़ोतरी हुई। साथ ही 1 लाख 7 हजार 730 रुपए का राजस्व ज्यादा प्राप्त हुआ। इस तरह इस वर्ष की जनवरी में कुल 6,04470 रुपए की आय हुई। लेकिन इसके बाद के महीनों में पर्यटकों व राजस्व के आंकड़े अर्श से फर्श पर पहुंच गए।  अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क से मिली जानकारी के अनुसार, गत वर्ष 2024 में मार्च में कुल 7,796 पर्यटक पार्क की सैर पर आए थे। जबकि, वर्ष 2025 के मार्च में घटकर पर्यटकों की संख्या मात्र 4, 628 ही रह गई। यानी गत वर्ष के मुकाबले इस वर्ष 3,168 पर्यटक घट गए। </p>
<p>वनकर्मियों का कहना है कि गर्मी के कारण पर्यटक दिन में नहीं आते। लेकिन, शाम को आते हैं। वर्ष 2024 के मार्च माह में पर्यटकों से बायोलॉजिकल पार्क को 2 लाख 67 हजार 580 रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ था, जिसके मुकाबले इस वर्ष के मार्च में 1 लाख 62 हजार 770 रुपए ही राजस्व एकत्रित हुआ। यानी, गत वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष के मार्च में 1 लाख 4 हजार 810 रुपए राजस्व का नुकसान हुआ है। जानकारों का मानना है कि पर्यटक व राजस्व में गिरावट का कारण गर्मी से ज्यादा बड़े एनिमल की कमी है। यहां टाइगर-लॉयन, मगरमच्छ, घड़ियाल जैसे बड़े एनिमल की कमी है। जिसकी वजह से पर्यटकों का रुझान घटा है। </p>
<p><strong>अप्रेल : 1540 पर्यटक घटे व 65 हजार का नुकसान</strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में वर्ष 2024 के अप्रेल माह में भीषण गर्मी के बावजूद 3 हजार 484 पर्यटक घूमने आए थे। जबकि, इस वर्ष के अप्रेल में पर्यटकों की संख्या तेजी से घटती हुई 1944 ही रह गई। जबकि, अभी पिछले साल के मुकाबले गर्मी का पारा भी कम रहा। गत वर्ष अप्रेल माह के मुकाबले इस वर्ष 1944 पर्यटकों की संख्या दर्ज की गई। वहीं, राजस्व की बात करें तो 80240 रुपए की आय हुई। यानी, गत वर्ष के मुकाबले इस वर्ष 64370 राजस्व का नुकसान हुआ। </p>
<p><strong>पर्यटकों को अखर रहा टिकट का पैसा </strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में शाकाहारी व मांसाहारी मिलाकर कुल 70 से ज्यादा वन्यजीव हैं। यहां आने वाले पर्यटक 55 रुपए खर्च करने के बावजूद बब्बर शेर, टाइगर, मगरमच्छ, घड़ियाल, अजगर सहित अन्य बडेÞ वन्यजीवों का दीदार नहीं कर पाने से निराश होकर लौट रहे हैं। हालांकि, यहां उम्र दराज बाघिन   महक व लॉयनेस सुहासिनी ही दिखाई देती है। लेकिन, भेडिए, पैंथर, जरख एनक्लोजर में उगी झाड़ियों में छिपे रहने से दिखाई नहीं देते। वहीं, कैफेटेरिया नहीं होने से लोगों को चाय-नाश्ते के लिए परेशान होना पड़ता है। इसके अलावा पर्यटकों के बैठने के लिए छायादार शेड व वाटरकूलर भी पर्याप्त नहीं है। पानी के लिए भी भटकना पड़ता है। </p>
<p><strong>गर्मी से ज्यादा बड़े एनीमल की कमी बड़ा कारण</strong><br />वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि कोटा अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क क्षेत्रफल की दृष्टि से प्रदेश का सबसे बड़ा पार्क है। इसके बावजूद यह सुविधाओं व बजट की कमी से जूझ रहा है। यहां पर्यटकों व राजस्व में गिरावट का मुख्य कारण गर्मी से ज्यादा बड़े एनिमल की कमी है।  बजट नहीं होने के कारण बायोलॉजिकल पार्क में पिंजरे यानी एनक्लोजर नहीं बन पा रहे। वहीं, टाइगर-लॉयन जैसे बड़े एनिमल्स की कमी है। जबकि, चिड़ियाघर में  मगरमच्छ, घड़ियाल, अजगर सहित दो दर्जन से अधिक  पक्षी है। यदि, एनक्लोजर बने तो इनकी शिफ्टिंग से पर्यटकों का रुझान बढ़ेगा। जिसका असर राजस्व की बढ़ोतरी के रूप में नजर आएगा।</p>
<p><strong>चिड़ियाघर से वन्यजीवों की नहीं हो पा रही शिफ्टिंग  </strong><br />बायोलॉजिकल पार्क के निर्माण के दौरान 44 एनक्लोजर बनने थे लेकिन प्रथम चरण में मात्र 13 ही बन पाए। जबकि, 31 एनक्लोजर अभी बनने बाकी हैं। जब तक यह एनक्लोजर नहीं बनेंगे तब तक पुराने चिड़ियाघर में मौजूद अजगर, घड़ियाल, मगरमच्छ, बंदर व कछुए सहित एक दर्जन से अधिक वन्यजीव बायलॉजिकल पार्क में शिफ्ट नहीं हो पाएंगे।</p>
<p><strong>द्वितीय चरण में यह होने हैं कार्य </strong><br />पार्क में द्वितीय चरण के तहत 25 करोड़ की लागत से करीब 17 एनक्लोजर, स्टाफ क्वार्टर, कैफेटेरिया, वेटनरी हॉस्पिटल, इंटरपिटेक्शन सेंटर, पर्यटकों के लिए आॅडिटोरियम हॉल, छांव के लिए शेड, कुछ जगहों पर पथ-वे सहित अन्य कार्य शामिल हैं। </p>
<p><strong>पर्यटक बोले-न कैफेटेरिया न लॉयन टाइगर, क्या देंखे</strong><br />परिवार के साथ पार्क घूमने आए बोरखेड़ा निवासी अजय कुश्वाह, राहुल प्रजापति व उस्मान अली ने बताया कि यहां बड़े एनिमल नहीं है, जो है वो भी झाड़ियों में छिपे रहते हैं। साइटिंग नहीं होने से बच्चे भी मायूस हो जाते हैं। टिकट का पैसा अखर रहा है। </p>
<p><strong>झूले टूटे, बच्चे होते मायूस</strong><br />बजरंग नगर निवासी अखिलेश शर्मा व खेड़ली फाटक के सूर्य प्रकाश मेहरा का कहना था कि यहां कुछ झूले लगे हुए हैं, जो भी टूट चुके हैं। कुछ तो टेडे हो गए। जिनमें बच्चों के गिरने का खतरा रहता है। वहीं, वाटरकूलर भी कम ही जगहों पर लगे हैं। शाकाहारी जानवरों के पिंजरों की तरफ कम है। पानी के लिए परेशान होना पड़ता है। </p>
<p>टाइगर-लॉयन लाने के प्रयास लगातार जारी है। हमने यहां प्राकृतिक जंगल, जैव विविधता विकसित की है। पर्यटकों के लिए सुविधाएं विकसित करने का पूरा प्रयास कर रहे हैं। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Nov 2025 15:55:24 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>असर खबर का - नवज्योति इम्पेक्ट : राजस्थान में पहली बार अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क को मिली स्पोंसरशिप, कैपटिव एनिमल स्पोंसरशिप स्कीम में कोटा को मिली सफलता </title>
                                    <description><![CDATA[ दैनिक नवज्योति ने इस मुद्दे को प्रमुखता से प्रकाशित कर वन विभाग को ध्यान इस ओर आकर्षित किया। 
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of-news---navjyoti-impact--for-the-first-time-in-rajasthan--abheda-biological-park-receives-sponsorship--kota-achieves-success-in-the-captive-animal-sponsorship-scheme/article-132704"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-11/111-(3)18.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। अभेड़ा बायोलॉजिलक पार्क के लिए रविवार का दिन खुशियों की सौगात लेकर आया। राजस्थान में पहली बार किसी औद्योगिक संस्थान ने 5 प्रजातियों के एक दर्जन वन्यजीवों की सम्पूर्ण पालन-पोषण की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाई है। वन्यजीव संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक पहल करते हुए एनटीपीसी ने टाइगर, लैपर्ड व हायना सहित 12 वन्यजीवों को 17 लाख रुपए में गौद लिया है। जिनके भोजन, दवाइयां, वैक्सीनेशन व एनक्लोजर मेंटिनेंस सहित देखभाल का सम्पूर्ण खर्चा उठाएगी। औद्योगिक संस्थान ने यह पहल वन विभाग की कैपटिव एनिमल स्पोंसरशिप स्कीम के तहत की है। इस स्कीम को यह अब तक की सबसे बड़ी सफलता मानी जा रही है। इस कदम से न केवल वन्यजीवों को बेहतर सुविधा मिलेगी, बल्कि पार्क के रखरखाव और वन्यजीव संरक्षण को भी मजबूती मिलेगी।</p>
<p><strong>इन शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों को लिया गोद</strong><br />वन्यजीव विभाग के डीएफओ अनुराग भटनागर ने बताया कि एनटीपीसी औद्योगिक संस्थान ने अभेड़ा बायोलॉजिलक पार्क के 5 प्रजातियों के 12 वन्यजीवों को गोद लिया है। जिसमें 1 टाइग्रेस, 4 लेपर्ड, 3 हायना, 1 चिंकारा और 1 सांभर शामिल है। कम्पनी द्वारा इन वन्यजीवों के पालन-पोषण सहित सम्पूर्ण देखभाल के लिए 17 रुपए वन विभाग को दिए हैं। राजस्थान में पहली बार कैपटिव एनिमल स्पोंसरशिप स्कीम के तहत अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क को यह सफलता मिली है। </p>
<p><strong>1500 पौधे लगाने के लिए 10.50 लाख रु.की सहमति</strong><br />डीएफओ भटनागर ने बताया कि एनटीपीसी द्वारा अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में 1500 पौधे लगाने और तीन साल के मेंटिनेंस के लिए 10.50 लाख रुपए दिए जाने की सैदांतिक सहमति दी गई है। इससे पार्क में घना जंगल विकसित हो सकेगा। इससे पहले यहां 7 हजार पौधे लगाए गए थे, जो अब पेड़ में बदल गए हैं। वहीं, साढ़े तीन किमी के परिसर में हजारों की तादात में बड़े वृक्ष जड़े फैला चुके हैं। जिन पर बड़ी संख्या में देशी विदेशी परिंदों का बसेरा बसा हुआ है। वनकर्मियों के परिश्रम से यहां पर्यटकों के लिए खूबसूरत जंगल विकसित किया गया है। </p>
<p><strong>वन्यजीव विभाग को आज सौंपा जाएगा 17 लाख का चैक</strong><br />डीएफओ भटनागर ने बताया कि सोमवार शाम 4 बजे अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क परिसर में कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। जिसमें मुख्य अतिथि एनटीपीसी औद्योगिक संस्थान के डायरेक्टर(आॅपरेशनल) रविंद्र कुमार द्वारा वन्यजीवों के संरक्षण के लिए विभाग को 17 लाख रुपए का चैक सौंपा जाएगा। इस दौरान परिसर में पौधरोपण भी किया जाएगा। </p>
<p><strong>नवज्योति के प्रयास लाए रंग, जताया आभार  </strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क प्रदेश का सबसे बड़ा पार्क होने के बावजूद बजट की कमी से जूझता है। जिसकी वजह से वन्यजीवों की देखभाल में कमी महसूस होती थी। जिसे देखते हुए दैनिक नवज्योति ने इस मुद्दे को प्रमुखता से प्रकाशित कर वन विभाग को ध्यान इस ओर आकर्षित किया। इसके बाद विभाग ने प्रदेशभर में कैपटिव एनिमल स्पोंसरशिप स्कीम शुरू कर वन्यजीवों को गोद दिए जाने की सकारात्मक पहल की। जिसका लगातार फॉलो-अप किया गया। नवज्योति के प्रयासों का असर इतना गहरा रहा कि प्रदेश में पहली बार किसी कॉपोर्रेट जगत ने अभेड़ा के वन्यजीवों को पालन-पोषण की जिम्मेदारी सामाजिक सरोकार में अपने कंधों पर उठा ली।</p>
<p><strong>कॉपोर्रेट सेक्टर में बढ़ेगी वन्यजीवों के प्रति संरक्षण की भावना</strong><br />उन्होंने बताया कि वन विभाग द्वारा कैप्टिव एनिमल स्पॉन्सरशिप स्कीम को वर्ष 2022 में शुरू किया गया था। लगातार किए जा रहे प्रचार-प्रसार के बाद पहली बार किसी बड़ी कंपनी ने इस दिशा में पहल करते हुए वन्यजीवों को गोद लेने में रुचि दिखाई। एनटीपीसी को सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत इस योजना की जानकारी दी गई थी, जिस पर कंपनी प्रशासन ने सकारात्मक कदम बढ़ाते हुए तत्काल सहमति दी। यह पहल न केवल अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क बल्कि राजस्थान के समग्र वन्यजीव संरक्षण प्रयासों के लिए एक मिसाल बनेगी। कॉपोर्रेट सेक्टर की इस भागीदारी से अन्य संस्थाओं को भी प्रेरणा मिलेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Nov 2025 15:41:14 +0530</pubDate>
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                <title>टारगेट से ज्यादा किए शिकार फिर भी पिंजरे में कैद बाघिन, रिवाइल्डिंग के नाम पर एक साल से सॉफ्ट एनक्लोजर में टाइग्रेस एमटी-7</title>
                                    <description><![CDATA[अब तक बाघिन 60 से ज्यादा कर चुकी शिकार, फिर भी हार्ड रिलीज नहीं कर रहे अधिकारी। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/despite-exceeding-the-target--the-tigress-remains-caged--tigress-mt-7-remains-in-a-soft-enclosure-for-a-year-in-the-name-of-rewilding/article-128894"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/copy-of-news-(2)12.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क से रिवाल्डिंग के लिए मुकुंदरा टाइगर रिजर्व की दरा रेंज में शिफ्ट की गई बाघिन एक साल बाद भी पिंजरे में कैद है। जबकि, वन अधिकारियों ने बाघिन द्वारा 50 शिकार सफलतापूर्वक कर लेने पर खुले जंगल में हार्ड रिलीज किया जाना निर्धारित किया था। लेकिन, टाइग्रेस एमटी-7 अब तक टारगेट से ज्यादा शिकार कर चुकी है। इसके बाद भी उसे 5 हैक्टेयर के सॉफ्ट  एनक्लोजर में ही रखा जा रहा है। वर्तमान में उसकी उम्र करीब 3 वर्ष हो चुकी है। इस उम्र के अन्य टाइगर अपनी टेरीटरी बनाने के लिए जंगल का चप्पा-चप्पा छान लेते हैं लेकिन एमटी-7 पांच हैक्टेयर के एनक्लोजर से ही आगे नहीं बढ़ पा रही। इधर, वन्यजीव प्रेमियों का तर्क है, हार्ड रिलीज में अनावश्यक देरी से बाघिन के विकास पर विपरीत असर पड़ सकता है। </p>
<p><strong>60 से ज्यादा शिकार, फिर भी आजादी नहीं</strong><br />मुकुंदरा से मिली जानकारी के अनुसार, बाघिन एमटी-7 अब तक 66 से 70 के बीच सफलतापूर्वक शिकार कर चुकी है। जबकि, टारगेट 50 का ही था। इससे स्पष्ट होता है कि बाघिन शिकार करना सीख चुकी है। ऐसे में उसे खुले जंगल में छोड़ दिया जाना चाहिए। ताकि, वह जंगल की विपरीत परिस्थितियों में खुद को ढाल सके। </p>
<p><strong>चीतल से नीलगाय तक का किया शिकार</strong><br />टाइग्रेस एमटी-7 अब तक चीतल ही नहीं बल्कि बड़े एनिमल नील गाय का भी शिकार कर चुकी है। जबकि, नील गाय का शिकार आसान नहीं होता है। बाघिन के लगातार शिकार किए जाने से 5 हैक्टेयर के एनक्लोजर में प्रे-बेस की भी कमी होती जा रही है। ऐसे में रिवाइल्डिंग के उद्देश्यों की सफलता के लिए उसे शीघ्र ही खुले जंगल में छोड़ा जाना आवश्यक है। </p>
<p><strong>कैसे सीखेगी शिकार ढूंढना व टेरीटरी बनाना </strong><br />बायोलॉजिस्ट रवि कुमार बताते हैं, पिछले एक साल से बाघिन दरा में 5 हैक्टेयर के सॉफ्ट एनक्लोजर में रह रही है। जहां रिवाइल्डिंग के नाम पर सिर्फ शिकार करना ही सीखा है। लेकिन, शिकार ढूंढना नहीं सीख पा रही है। क्योंकि, सॉफ्ट एनक्लोजर में पहले से ही प्रे-बेस की उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है। जबकि, खुले जंगल में ऐसा नहीं होता है। वहां हर दिन चूनौतियों के बीच उन्हें भोजन ढूंढना पड़ता है, जो पिंजरे में कैद होने के कारण इस गुण का विकास नहीं हो पा रहा। वहीं, अनावश्यक देरी से टेरीटरी बनाने में भी उसे परेशानी का सामना करना पड़ेगा।  </p>
<p><strong>तीन साल की उम्र में भी खुला जंगल नसीब नहीं</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी बताते हैं, बाघिन एमटी-7 को पिछले साल दिसम्बर माह में शिफ्ट किया गया था। वर्तमान में उसकी उम्र लगभग 3 साल हो चुकी है। इसके बावजूद वह सॉफ्ट एनक्लोजर से बाहर नहीं निकल सकी। जबकि, इस उम्र के अन्य बाघ-बाघिन खुद को एक्सपोलर करते हैं और मां से अलग होकर अपनी टेरीटरी बनाने के लिए जंगल को सर्च करते हैं। इस बीच कई परिस्थितियों से गुजरने के दौरान बहुत कुछ सीखते हैं, जो जंगल में उनके सरवाइवल रेट को बढ़ाने में मददगार होते हैं। बाघिन को जल्द से जल्द हार्ड रिलीज किया जाना चाहिए।</p>
<p><strong>डब्ल्यूआईआई की टीम पर अटकी शिफ्टिंग</strong><br />बाघिन एमटी-7 की शिफ्टिंग पर फैसला डब्ल्यूआईआई  की टीम द्वारा किया जाना है। लेकिन, टीम का इंतजार 6 माह से हो रहा है, जो अब तक खत्म नहीं हुआ। वन अधिकारियों द्वारा  पूर्व में बारिश से पहले टीम का मुकुंदरा आना बताया जा रहा था, फिर बारिश में जंगल के रास्ते खराब होने का हवाला देते हुए विजिट टाल दी गई। अब अक्टूबर माह के अंतिम सप्ताह में आने की बात कही जा रही है। एनटीसीए की टीम  कब आएगी, इसको लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी जा रही।</p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिलक पार्क से गत वर्ष दिसम्बर माह में  रिवाइल्डिंग के लिए मुकुंदरा में शिफ्ट की गई बाघिन एमटी-7 को खुले जंगल में छोड़े जाने का फैसला इसी माह में होगा। क्योंकि, इसी अक्टूबर माह डब्ल्यूआईआई की टीम मुकुंदरा आने की संभावना है। टीम यहां बाघिन के व्यवहार, शिकार सहित फिजिकल वेरिफिकेशन कर हार्ड रिलीज को लेकर रिपोर्ट देगी। जिसके आधार पर खुले जंगल में छोड़े जाने को लेकर निर्णय होगा। <br /><strong>- सुगनाराम जाट, सीसीएफ मुकुंदरा </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Oct 2025 17:06:18 +0530</pubDate>
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                <title>चार साल से 25 करोड़ का इंतजार, न कैफेटेरिया बना, न एनक्लोजर</title>
                                    <description><![CDATA[अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क का अब तक शुरू नहीं हुआ द्वितीय चरण का काम।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/waiting-for-25-crores-since-four-years--neither-cafeteria-nor-enclosure/article-121875"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/news74.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। राजस्थान का सबसे बड़ा अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क 4 साल से बजट को तरस रहा है। 25 करोड़ के बजट के अभाव में सुविधाएं विकसित नहीं हो पा रही। वहीं, रियासतकालीन चिड़ियाघर से वन्यजीवों की शिफ्टिंग भी अटकी पड़ी है। यहां न तो कैफेटेरिया है और न ही बड़े वन्यजीवों को रखनेके लिए एनक्लोजर। ऐसे में यहां आने वाले पर्यटकों को टिकट का पैसा अखर रहा है और वन विभाग को कोसते हुए मायूस लौट रहे हैं।  दरअसल, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में द्वितीय चरण के विकास कार्यों के लिए तत्कालीन सरकार में जायका प्रोजेक्ट के तहत 25 करोड़ रुपए दिए जाने थे,जो अब तक नहीं मिले। इसके बाद वर्तमान सरकार में हाल ही में मुख्यमंत्री बजट घोषणा में 25 करोड़ बजट दिए जाने की घोषणा हुई लेकिन राशि नहीं मिला। हालांकि, कार्य की डीपीआर तैयार करने के लिए मात्र 20 लाख रुपए की राशि मिली है। जिसमें से वन्यजीव प्रशासन ने 5 लाख टेंडर कर 11 एनक्लोजर की डिजाइन ड्राइंग बनवा ली है। अब काम शुरू करने के लिए बजट राशि मिलने का इंतजार हो रहा है।  </p>
<p><strong>30 करोड़ से बना था बायोलॉजिकल पार्क </strong><br />वन्यजीव विभाग के उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर ने बताया कि वर्ष 2017 में 30 करोड़ की लागत से बायोलॉजिकल पार्क का निर्माण कार्य शुरू हुआ था। जिसे 2019 में पूरा किया जाना था लेकिन कोविड के 2 साल के कारण काम समय पर पूरा नहीं हो सका। इसके बाद 21 नवंबर 2021 को प्रथम चरण का काम पूरा हुआ था। </p>
<p><strong>प्रथम चरण में यह हुए कार्य </strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में कुल 35 एनक्लोजर बनने थे। जिसमें से प्रथम चरण में 8 मांसाहारी, 5 शाकाहारी तथा 5 पक्षियों के बनाए गए हैं। शेष एनक्लोजर बजट के अभाव में नहीं बन पाए। जिसकी वजह से चिड़ियाघर   के दो दर्जन से अधिक वन्यजीव शिफ्ट नहीं हो सके। </p>
<p><strong>आॅपरेशन या पोस्टमार्टम के लिए 16 किमी का चक्कर</strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में तैनात वनकर्मियों ने बताया कि वेटनरी हॉस्पिटल नहीं होने से वन्यजीवों के इलाज में परेशानी होती है। इलाज के संबंधित कुछ उपकरण बायोलॉजिकल पार्क में तो कुछ चिड़ियाघर में हैं। वन्यजीवों को यदि दवाइयां देनी हो तो यहां से दे देते हैं लेकिन आॅपरेशन या पोस्टमार्टम करना हो तो उसे करीब 16 किमी दूर चिड़ियाघर लाना होता है। ऐसे में कई बार वन्यजीवों को समय पर इलाज मुहैया करवाना काफी चुनौतिपूर्ण हो जाता है। </p>
<p><strong>द्वितीय चरण में यह होने हैं कार्य </strong><br />पार्क में द्वितीय चरण के तहत 25 करोड़ की लागत से करीब 17 एनक्लोजर, स्टाफ क्वार्टर, कैफेटेरिया, वेटनरी हॉस्पिटल, इंटरपिटेक्शन सेंटर, पर्यटकों के लिए आॅडिटोरियम हॉल, छांव के लिए शेड, कुछ जगहों पर पथ-वे सहित अन्य कार्य शामिल हैं। </p>
<p><strong>चिड़ियाघर से नहीं हो पा रही शिफ्टिंग  </strong><br />बायोलॉजिकल पार्क के निर्माण के दौरान 44 एनक्लोजर बनने थे लेकिन प्रथम चरण में मात्र 13 ही बन पाए। जबकि, 31 एनक्लोजर अभी बनने बाकी हैं। जब तक यह एनक्लोजर नहीं बनेंगे तब तक पुराने चिड़ियाघर में मौजूद अजगर, घड़ियाल, मगरमच्छ, बंदर व कछुए सहित एक दर्जन से अधिक वन्यजीव बायलॉजिकल पार्क में शिफ्ट नहीं हो पाएंगे।</p>
<p><strong>पर्यटकों में नाराजगी, अखर रहा टिकट का पैसा </strong><br />वर्तमान में बायोलॉजिलक पार्क में शाकाहारी व मांसाहारी मिलाकर करीब 70 से ज्यादा वन्यजीव हैं। यहां आने वाले पर्यटक 55 रुपए खर्च करने के बावजूद बब्बर शेर, टाइगर, लोमड़ी, मगरमच्छ, घड़ियाल, अजगर सहित अन्य बड़े वन्यजीव का दीदार नहीं कर पाने से निराश होकर लौट रहे हैं। वहीं, कैफेटेरिया सुविधा नहीं होने से लोगों को चाय-नाश्ते के लिए परेशान होना पड़ता है। इसके अलावा र्प्यटकों के बैठने के लिए छायादार शेड भी र्प्याप्त नहीं हैं।  </p>
<p><strong>पर्यटक बोले-न टाइगर न लॉयन, समय होता बर्बाद </strong><br />बोरखेड़ा निवासी अजय कुश्वाह ने बताया कि गत गुरुवार को परिवार के साथ बायोलॉजिकल पार्क गए  थे। यहां प्रत्येक सदस्य के 55 रुपए टिकट लेने के बावजूद अंदर कोई बड़ा वन्यजीव नहीं दिखा। लॉयन व टाइगर नहीं होने से बच्चे मायूस हो गए। पैंथर है लेकिन वह भी पेड़ की आड़ में ही बैठा रहता है।बड़े एनिमल नहीं होने से पैसे और समय की बर्बादी है। वहीं, कुन्हाड़ी निवासी हरमित सांखला व प्रमोद कुमार कहना है कि पार्क के नाम पर वन विभाग पर्यटकों की जेब काट रहा है। पैसा खर्च करने के बावजूद बब्बर शेर, टाइगर, मगरमच्छ, घड़ियाल, अजगर सहित अन्य बडेÞ वन्यजीव देखने को नहीं मिले।  दादाबाड़ी निवासी कैशव दत्ता, रामगोपाल शर्मा, हेमलता कंवर, प्रियंका नंदवाना का कहना था कि यहां गिनती  के जानवर हैं और बैठने के लिए पर्याप्त बैंच भी नहीं है। कुछ झूले लगे हैं, उनमें से भी कुछ खराब हो रहे। एनीमल के साथ प्ले जॉन में सुविधाएं बढ़ानी चाहिए। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के द्वितीय चरण के विकास कार्य के लिए मुख्यमंत्री बजट घोषणा में 25 करोड़ का बजट स्वीकृत हुआ है। डीपीआर तैयार करवाने के लिए ही 20 लाख रुपए की राशि मिली है। जिसमें से 5 लाख रुपए का टेंडर कर 11 एनक्लोजर की ड्रॉइंन डिजाइन बनवा ली है लेकिन कार्य बजट राशि प्राप्त होने पर हो सकेंगे। हालांकि बजट राशि के लिए उच्चाधिकारियों को पत्र लिखा है। जल्द बजट मिलने की उम्मीद है। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 28 Jul 2025 15:21:58 +0530</pubDate>
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                <title>अब बब्बर शेर - टाइगर से लेकर भेड़िया तक को पालो, वन विभाग देगा गोद</title>
                                    <description><![CDATA[इंसानों का वन्यजीवों के प्रति बढ़ेगा लगाव। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/now-raise-a-lion--tiger--wolf--forest-department-will-adopt/article-119929"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/untitled-design-(4).png" alt=""></a><br /><p>कोटा। वन्यजीव प्रेमियों के लिए खुश खबरी है।  अब टाइगर, लॉयन, पैंथर, भालू और भेड़िए से लेकर हिरण तक पाल सकते हैं। साथ ही चिड़ियाघर में मौजूद सभी मांसाहारी व शाकाहारी वन्यजीवों को गोद लेकर पालनहार भी बन सकते हैं। वन विभाग खुद जंगली जानवरों को गोद देगा। दरअसल, राजस्थान में पहली बार वन विभाग ने कैपटिव एनिमल स्पोंसरशिप स्कीम शुरू की है। जिसके तहत आमजन चिड़ियाघर व बायोलॉजिकल पार्क में रहने वाले सभी वन्यजीवों को गोद लेकर उनकी देखरेख का जिम्मा उठा सकते हैं। लेकिन, गोद लिए गए सभी जानवर चिड़ियाघर में ही रहेंगे। इस स्कीम का उद्देश्य इंसानों का वन्यजीवों के प्रति लगाव बढ़ाने और जागरूक करना है।  </p>
<p><strong>यह है कैपटिव एनिमल स्पोंसरशिप स्कीम</strong><br />वन्यजीव विभाग कोटा के उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर ने बताया कि यह कैपटिव एनिमल स्पोंसरशिप स्कीम राजस्थान में पहली बार लॉन्च की गई है। इसके तहत प्रदेशभर के बायोलॉजिकल पार्क व चिड़िया घरों में रहने वाले शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों को आमजन, ग्रुप मेंबर, कॉरपोरेट कम्पनियां, संस्थाएं सहित वन्यजीव प्रेमी कोई भी गोद ले सकता है। जानवर जू  या बायोलॉजिकल पार्क में ही रहेंगे। पालनहार को गोद लिए एनिमल की देखरेख, खानपान, दवाइयां सहित इनके मेंटिनेंस का खर्चा वहन करना होगा।  </p>
<p><strong>यह 5 तरह की मिलेगी स्पोंसरशिप</strong><br />डीसीएफ भटनागर कहते हैं, वन्यजीवों को गोद दिए जाने के लिए 5 तरह की स्पोंसरशिप है। जिसमें एस-1 से लेकर एस-5 तक की कैटेगिरी शामिल हैं, जो इस प्रकार है..... </p>
<p><strong>इंडिज्यूअल एनिमल एडोप्शन</strong><br />पहली स्पोंसरशिप में कोई भी व्यक्ति, संस्था या कम्पनी चाहे तो अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में इंडिज्यूअल रह रहे किसी भी एक वन्यजीव को गोद ले सकते है। जैसे की बायोलॉजिकल पार्क में दो भालू हैं, इनमें से कोई एक भालू को ही गोद लेना चाहता है तो वह ले सकता है। इसके बाद संबंधित व्यक्ति को गोद लिए एनिमल की देखरेख, भोजन, दवाइयां, मेंटिनेंस सहित सम्पूर्ण खर्चा उसे ही वहन करना होगा। वन्यजीवों को गोद 1 से 12 माह या इससे भी अधिक समय तक के लिए नियमानुसार ले सकते हैं। यह एस-1 कैटेगिरी में आती है।</p>
<p><strong>नया एनक्लोजर बनाना </strong><br />पालनहार बायोलॉजिकल पार्क में नया एनक्लोजर बना सकते हैं। उन्हें एनक्लोजर निर्माण का खर्च, निश्चित अवधि तक मेंटिनेंस और उसमें रखे जाने वाले एनिमल, जहां से भी लाना है उसका सम्पूर्ण खर्च वहन करना होगा। इसमें एनक्लोजर की लागत, मेंटिनेंस, एनिमल शिफ्टिंग से देखरेख तक का खर्च शामिल है। </p>
<p><strong>पूरा एनक्लोजर गोद</strong><br />पालनहार पूरा एनक्लोजर ही गोद ले सकता है। इसमें रहने वाले सभी जानवरों की देखरेख, भोजन-पानी, दवाइयां, साफ-सफाई व  मेंटिनेंस सहित सम्पूर्ण खर्चा उन्हें ही वहन करना होगा। यह स्कीम एस-2 कैटेगिरी में आती है। </p>
<p><strong>वन्यजीवों का मेडिकेयर</strong><br />पालनहार पार्क में रहने वाले सभी वन्यजीवों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी ले सकता है। पार्क के सभी एनिमल्स की दवाइयां, जांच परीक्षण किट, वेक्सिनेशन स्वास्थ्य से संबंधित सभी जरूरी खर्च उठाने की जिम्मेदारी ले सकता है। इसमें देखरेख, भोजन  का खर्च शामिल नहीं होगा। </p>
<p><strong>दुलर्भ वन्यजीवोंको चिड़िया घर में  बसाना</strong><br />यह स्पोंसरशिप उन लोगों के लिए है, जो दुलर्भ वन्यजीव उदबिलाउ व गोडावन को कैपटिव में बसाना चाहते हैं। इन वन्यजीवों को कहीं ओर से लाकर कैपटिव ब्रिडिंग करवाना चाहते हैं तो इसके लिए बायोलॉजिस्ट, केयर टेकर की जरूरत होगी, जिसका खर्चा वहन करना होगा। क्योंकि, इन्हीं की निगरानी व देखरेख में यह काम होगा।</p>
<p><strong>पालनहारों को मिलेगा पाई-पाई का हिसाब </strong><br />डीसीएफ ने बताया कि पालनहार द्वारा गोद लिए एनिमल पर जितने भी पैसे खर्च होंगे, उसकी आॅडिट करवाई जाएगी। वे कभी भी अपने पैसे का हिसाब ले सकते हैं। उन्हें खर्च हुई राशि की आॅडिट रिपोर्ट सौंपी जाएगी। इससे कार्य व सिस्टम में पारदर्शिता बनी रहेगी।</p>
<p><strong>वन्यजीवों को कैसे लेंगे गोद </strong><br />चिड़िया घर या अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में मौजूद वन्यजीवों को गोद लेने वाले व्यक्ति, संस्था या कॉपोरेट कम्पनी को पहले जू-इंचार्ज को आवेदन करना होगा। जिसे मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को भेजा जाएगा, जहां से स्वीकृति मिलने के बाद एडोप्शन की कार्यवाही की जाएगी। </p>
<p>अमूमन, वन्यजीव विभाग के पास बजट की कमी रहती है। जिसकी वजह से एनीमल्स की बेहतर देखरेख में परेशानी होती है। इस स्पोंसरशिप स्कीम से वन्यजीवों की अच्छे से देखरेख हो सकेगी। साथ ही इंसानों में बेजुबानों के प्रति लगाव भी बढ़ेगा। <br /><strong>- रवि नागर, रिसर्चर</strong></p>
<p>राजस्थान में पहली बार कैपटिव एनिमल स्पोंसरशिप स्किम शुरू की गई है। कोई भी संस्था या वन्यजीवप्रेमी अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के वन्यजीवों को गोद लेने के लिए आवेदन कर सकते हैं। कई लोग ऐसे हैं जो वन्यजीवों की मदद करना चाहते हैं लेकिन कैसे करें, इसकी जानकारी नहीं है। इस प्लेटफॉर्म से लोगों में वन्यजीवों के प्रति लगाव व जुड़ाव बढ़ेगा। गोद लिए एनीमल चिड़ियाघर में ही रहेंगे। डाइट व देखरेख वन्यजीव चिकित्सक व विशेषज्ञों की निगरानी में ही होगी। वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के नियम यथावत ही रहेंगे।  <br /><strong>- अनुराग भटनागर, उप वन संरक्षक, वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 09 Jul 2025 15:06:03 +0530</pubDate>
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                <title>कागजों में कैद होकर रह गई जंगल सफारी</title>
                                    <description><![CDATA[विधायक संदीप शर्मा ने विधानसभा में उठाया था मामला। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/jungle-safari-remained-confined-to-papers/article-119719"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/rt112roer27.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क से सटे कोटा वनमंडल की 1100 हैक्टेयर वनभूमि पर वाइल्ड लाइफ सफारी शुरू किए जाने की योजना कागजों में कैद होकर रह गई। जबकि, वन्यजीव विभाग ने इस भूमि को वाइल्ड लाइफ में शामिल किए जाने के लिए उच्चाधिकारियों को प्रस्ताव तक भेजे, जिस पर अमल करना तो दूर एक साल बाद भी फाइल आगे नहीं बड़ी। जबकि, सकतपुरा वनखंड में बड़ी संख्या में वन्यजीवों का बसेरा है। ऐसे में यहां जंगल सफारी शुरू किए जाने से सरकार को राजस्व प्राप्त होगा। साथ ही वन्यजीवों की सुरक्षा भी पुख्ता होगी। दरअसल, कोटा वनमंडल का सकतपुरा वनखंड अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क से सटा है, जो प्रस्तावित कोटा ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट शंभुपुरा तक 1100 हैक्टेयर में फैला हुआ है। यहां बड़ी संख्या में शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों की मौजूदगी है। ऐसे में यह एरिया कंजर्वेशन रिजर्व घोषित किए जाने से यह वनक्षेत्र संरक्षित हो जाएगा। वाइल्ड लाइफ एक्ट 1972 प्रवाही होने से जंगली-जानवरों व जंगल की सुरक्षा बढ़ जाएगी।   वन्यजीव विभाग इसे कंजर्वेशन रिजर्व में तब्दील किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं। विभाग ने गत 20 जुलाई को विधानसभा सत्र-2 में विधायक संदीप शर्मा द्वारा लगाए सवालों के जवाब से इसकी जानकारी दी थी। </p>
<p><strong>भालू से लेकर पैंथर तक का बसेरा</strong><br />वन्यजीव विभाग के डीएफओ अनुराग भटनागर ने बताया कि सकतपुरा वनक्षेत्र में बड़ी तादात में वन्यजीवों का बसेरा है। यहां भालू से लेकर पैंथर का मूवमेंट रहता है। इस क्षेत्र में चिंकारा की संख्या अच्छी है। साथ ही इंडियन वुल्फ, जैकाल, फॉक्स, नीलगाय, जंगली खरगोश, जंगली बिल्ली, जंगली सूअर, सिवेट, भालू, पैंथर, मोनिटर लिजार्ड सहित कई वन्यजीव शामिल हैं। ऐसे में इसे कंजरर्वेशन रिजर्व बनाकर वाइल्ड लाइफ सफारी शुरू करने की योजना है। इसके लिए प्रस्ताव बनाकर  संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक के माध्यम से मुख्यालय भेजे गए हैं।  </p>
<p><strong>कंजर्वेशन रिजर्व बनने पर बढ़ेगी जंगल और जीवों की सुरक्षा</strong><br />वन्यजीव पे्रमी नरेश कुमार ने बताया कि वर्तमान में सकतपुरा वनक्षेत्र में अवैध गतिविधियां हो रही है। जिससे वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है। संदिग्ध घुसपैठ होने से जंगली जानवरों का पलायन बढ़ रहा है। अभी तक यह एरिया साधारण वनक्षेत्र है। ऐसे में इसे कंजर्वेशन रिजर्व घोषित किया जाना अति आवश्यक है। वनक्षेत्र का स्टेटस चेंज होते ही यहां वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 प्रभावी होगा। साथ ही विभिन्न मदों में विभाग को बजट प्राप्त होगा। जिससे सुरक्षा दीवार का निर्माण, वाटर कनजरर्वेशन स्ट्रेक्चर, ट्रैकिंग ट्रेक, ग्रासलैंड विकसित करने सहित अन्य डवलपमेंट कार्य हो सकेंगे।</p>
<p><strong>जंगल सफारी शुरू होने से बढ़ेगा ट्यूरिज्म  </strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि 1100  हैक्टेयर का सकतपुरा वनखंड घना जंगल है। शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों की तादाद भी ज्यादा है। सबसे अहम बात शहर के मध्य स्थित होने से लोगों की पहुंच में है। ऐसे में यहां वन्यजीव विभाग की ओर से जंगल सफारी शुरू की जाए तो शहरवासियों को एडवेंचर मिलेगा और ट्यूरिज्म को पंख लगेंगे। </p>
<p><strong>इधर, दम तोड़ रही मुकुंदरा की सफारी </strong><br />पर्यावरणविद् सत्यनारायण कुमार ने बताया कि मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के दरा अभरारणय में जंगल सफारी शुरू हुए करीब दो साल बीत चुके हैं। फिर भी सफारी परवान नहीं चढ़ सकी।  हालात यह है, शहर से दरा जाने वाले पर्यटकों को 50 किमी का चक्कर काटने के बाद भी वन्यजीवों की साइटिंग नहीं हो रही। मजबूरन उन्हें वापस 50 किमी का तय कर बैरंग लौटना पड़ता है। जबकि, सकतपुरा वनखंड शहर के मध्य स्थित है। यहां टाइगर को छोड़ अन्य मांसाहारी व शाकाहारी जानवरों का  हैबीटाट है। ऐसे में यहां जंगल सफारी परवान चढ़ सकती है। वन विभाग के आला अधिकारियों को प्रस्ताव पर संज्ञान लेना चाहिए। </p>
<p><strong>अवैध खनन व अतिक्रमण पर लगेगी रोक</strong><br />वाइल्ड लाइफ रिसर्चर रवि नागर ने बताया कि वनमंडल का सकतपुरा वनक्षेत्र को सेंचुरी का दर्जा मिलता है तो यह संरक्षित हो जाएगा। चारों ओर सुरक्षा दीवार का निर्माण होने से अवैध खनन, संदिग्ध घुसपैठ व अवैध चराई जैसी गतिविधियों पर लगाम लगेगी। जिससे वहां ग्रासलैंड विकसित होगा। जिसका असर वन्यप्राणियों का प्राकृतिक आवास सुरक्षित होगा और शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या में बढ़ोतरी होगी। जिससे फूड  चैन व पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत होने के साथ उनकी सुरक्षा भी बढ़ सकेगी।  </p>
<p>सकतपुरा वनखंड का 1100 हैक्टेयर वन क्षेत्र को वाइल्ड लाइफ में शामिल करने के लिए उच्चाधिकारियों को प्रस्ताव भेजे गए हैं। यह एरिया वाइल्ड लाइफ में आ जाए तो इसका मैनेजमेंट बेहतर हो सकेगा। वहीं, इसे अभेड़ा कंजर्वेशन रिजर्व बनवाकर वाइल्ड लाइफ सफारी शुरू करने की योजना है। इस संबध में  मुख्य वनसंरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक के माध्यम से प्रस्ताव वन मुख्यालय भेजा गया है। कंजर्वेशन रिजर्व बनने पर अतिक्रमण, अवैध खनन जैसी अवैध गतिविधियों पर लगाम लग सकेगी और ट्यूरिज्म बढ़ सकेगा। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, उप वन संरक्षक, वन्यजीव विभाग </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 07 Jul 2025 15:27:53 +0530</pubDate>
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                <title>अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में 3 साल बाद भी शुरू नहीं हुुआ सैकंड फेज का काम, पर्यटकों में नाराजगी</title>
                                    <description><![CDATA[द्वितीय चरण में बनने हैं 31 एनक्लोजर, वेटनरी हॉस्पिटल, कैफेटेरिया। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/second-phase-work-has-not-started-in-abheda-biological-park-even-after-3-years/article-117062"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-06/news-(1)25.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुख्यमंत्री बजट घोषणा के 5 माह बाद भी अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क को 25 करोड़ का बजट अब तक नहीं मिला। जबकि इस राशि से यहां 31 एनक्लोजर बनाए जाने हैं। बजट के अभाव में चिड़ियाघर में बंद दो दर्जन से अधिक वन्यजीवों की बायोलॉजिकल पार्क में शिफ्टिंग अटकी हुई है। यहां न तो कैफेटेरिया है और न ही बड़े वन्यजीव, ऐसे में यहां आने वाले पर्यटकों को टिकट का पैसा अखर रहा है और वन विभाग को कोसते हुए मायूस लौट रहे हैं। जिम्मेदार अधिकारियों की लेटलतीफी के कारण पर्यटन परवान नहीं चढ़ रहा।  दरअसल, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में द्वितीय चरण के तहत करोड़ों की इस राशि से कई निर्माण कार्य होने हैं, जो बजट के अभाव में शुरू नहीं हो पाए। वन्यजीव विभाग द्वारा सरकार को कई बार प्रस्ताव भेजे जा चुके हैं।  इसके बावजूद बजट नहीं मिला।  </p>
<p><strong>पर्यटकों में नाराजगी, अखर रहा टिकट का पैसा </strong><br />वर्तमान में बायोलॉजिलक पार्क में कुल 60 से 70 वन्यजीव हैं, जिनमें मांसाहारी और शाकाहारी हैं। यहां आने वाले पर्यटक 55 रुपए खर्च करने के बावजूद बब्बर शेर, टाइगर, मगरमच्छ, घड़ियाल, अजगर सहित अन्य बड़े वन्यजीव का दीदार नहीं कर पाने से निराश होकर लौट रहे हैं। वहीं, वनकर्मियों को पर्यटकों की नाराजगी भी झेलनी पड़ती है। </p>
<p><strong>द्वितीय चरण में यह होने हैं कार्य</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में द्वितीय चरण के तहत 25 करोड़ की लागत से 31 एनक्लोजर, स्टाफ क्वार्टर, कैफेटेरिया, वेटनरी हॉस्पिटल, इंटरपिटेक्शन सेंटर, पर्यटकों के लिए आॅडिटोरियम हॉल, छांव के लिए शेड, कुछ जगहों पर पथ-वे सहित अन्य कार्य शामिल हैं। </p>
<p><strong>चिड़ियाघर से वन्यजीवों की नहीं हो पा रही शिफ्टिंग  </strong><br />बायोलॉजिकल पार्क के निर्माण के दौरान 44 एनक्लोजर बनने थे लेकिन प्रथम चरण में मात्र 13 ही बन पाए। जबकि, 31 एनक्लोजर अभी बनने बाकी हैं। जब तक यह एनक्लोजर नहीं बनेंगे तब तक पुराने चिड़ियाघर में मौजूद अजगर, घड़ियाल, मगरमच्छ, बंदर व कछुए सहित एक दर्जन से अधिक वन्यजीव बायलॉजिकल पार्क में शिफ्ट नहीं हो पाएंगे। पार्क में नए एनिमल नहीं होने से पर्यटकों की संख्या में कमी हो रही है। जिसका असर सरकार के राजस्व पर देखने को मिल रहा है। </p>
<p><strong>30 करोड़ से बना था बायोलॉजिकल पार्क </strong><br />डीसीएफ उड़नदस्ता अनुराग भटनागर ने बताया कि वर्ष 2017 में 30 करोड़ की लागत से बायोलॉजिकल पार्क का निर्माण कार्य शुरू हुआ था। जिसे 2019 में पूरा किया जाना था लेकिन कोविड़ के 2 साल के कारण काम समय पर पूरा नहीं हो सका। इसके बाद 21 नवंबर 2021 को प्रथम चरण का काम पूरा हुआ। जिसमें 13 एनक्लोजर बनाए गए। इसके अलावा पथ-वे, पर्यटकों के लिए सुविधाघर, छायादार शेड, जल व्यवस्था के लिए टैंक सहित फेंसिंग करवाई गई। </p>
<p>प्रस्ताव भेजे, प्ररजेंटेशन भी दिया पर बजट नहीं मिला द्वितीय चरण में बेहद महत्वपूर्ण काम होने है, जो बजट के अभाव में नहीं हो पा रहे। सरकार को प्रस्ताव भेजे जा चुके हैं, दो बार प्ररजेंटेशन भी दिया है। यहां सैकंड फेज में 31 एनक्लोजर बनने शेष हैं। इस कारण चिड़ियाघर से वन्यजीवों को बायोलॉजिक पार्क में शिफ्ट नहीं कर पा रहे। वहीं, वेटनरी हॉस्पिटल, स्टाफ क्वार्टर, आॅडिटोरियम, इंटरपिटेक्शन सेंटर व कैफेटेरिया बनाया जाना है, जो पर्यटन की दृष्टि से जरूरी है। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीसीएफ चन्यजीव विभाग </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 11 Jun 2025 15:35:28 +0530</pubDate>
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                <title>प्रदेश में सबसे लंबी उम्र की बाघिन बनी कोटा की महक, चिड़ियाघर में 14 से 16 साल होती है औसत उम्र </title>
                                    <description><![CDATA[अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क  की महक, प्रदेश में सबसे लंबी उम्र की बाघिन होने का खिताब अपने नाम कर चुकी है
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/kota-s-mehak-becomes-the-longest-lived-tigress-in-the-state/article-113885"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-05/pradesh-me-sabse-lami-umr-ki-baghin-bni-kota-ki-mahak...kota-news-12-05-2025.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क  की महक, प्रदेश में सबसे लंबी उम्र की बाघिन होने का खिताब अपने नाम कर चुकी है। तीन माह बाद अगस्त में जीवन के 21 साल पूरे करने के साथ ही रिकॉर्ड भी कायम होगा। राजस्थान के चिड़ियाघरों के इतिहास में ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है, जब कोई बाघिन 21 साल पूरे करने के करीब पहुंच गई है। जबकि, वन अधिकारियों व विशेषज्ञों के अनुसार, कैप्टिविटी (चिड़ियाघर) में बाघ-बाघिन की औसत उम्र 14 से 16 साल मानी जाती है। वहीं, 18 से 20 साल को रिकॉर्ड माना जाता है, जबकि महक वर्तमान में 20 साल 9 महीने पूरे कर चुकी है। हालांकि, महक के साथ बहन रंभा भी अगस्त में 21 साल की उम्र पूरी करेगी। वर्तमान में रंभा जयपुर के नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में रह रही है।  इधर, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में इस बार बाघिन महक का जन्म दिवस मनाया जाएगा। इसके लिए वन्यजीव विभाग की ओर से तैयारियां भी की जा रही है। </p>
<p><strong>वर्ष 2004 में जयपुर जू में हुआ था जन्म</strong><br />जयपुर के नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क के वरिष्ठ वन्यजीव चिकित्सक डॉ. अरविंद कुमार बताते हैं, बाघिन चंदा ने 28 अगस्त 2024 को महक और रंभा को जन्म दिया था। इसके बाद मार्च 2012 में बाघिन महक को पहली बार जयपुर से कोटा चिड़ियाघर में शिफ्ट किया गया था। इसके बाद वर्ष 2019 में महक को कोटा से वापस जयपुर नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में शिफ्ट कर दिया था। फिर, 1 मार्च 2023 को फिर से नाहरगढ़ से कोटा अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में शिफ्ट किया गया। तब से अब तक महक यहीं रह रही है। </p>
<p><strong>रोजाना एनक्लोजर के 10 राउंड काटती है महक</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के वनकर्मी बताते हैं, सुबह 9 बजे महक नाइट शेल्टर से एनक्लोजर में आती है, जो 4000 स्क्वायर मीटर लंबा है। दिनभर में प्रतिदिन 8 से 10 राउंड काटती है। ऐसे में एनक्लोजर व कराल एरिया में मूवमेंट अधिक होने से शरीर में फुर्ति व मांसपेशियां मजबूत रहती है। </p>
<p><strong>महक और रंभा दोनों बहनें सबसे ज्यादा उम्रदराज</strong><br />कैप्टिविटी में  20 साल से अधिक उम्र की कोई बाघिन नहीं है। हालांकि, जयपुर नाहरगढ़ में महक की बहन रंभा भी हमउम्र है। यह दोनों बहनें ही प्रदेश की सबसे लंबी उम्रदराज बाघिन हैं। अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में महक को प्रतिदिन 8 किलो मांस डाइट में दिया जाता है। इसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता जबरदस्त है। महक को देखने पर कभी नहीं लगता कि वह 21 साल की होने वाली है। उम्र के इस पड़ाव में भी वह इतनी एक्टिव है कि पर्यटक बाघिन की साइटिंग देख रोमांचित हो उठते हैं।  <br /><strong>-डॉ. विलासराव गुल्हाने, वन्यजीव चिकित्सक </strong></p>
<p><strong>लंबी उम्र के पीछे जेनेटिकली स्ट्रॉंग होना </strong><br />महक और उसकी बहन रंभा दोनों प्रदेश की सबसे लंबी उम्र की बाघिन हैं। कैप्टिविटी में बाघ-बाघिन की उम्र 14 से 16 साल तक मानी जाती है। लेकिन महक 20 साल 9 माह पूरे कर चुकी है। इसके पीछे  मुख्य कारण जैनेटिक है। उसके शरीर में लंबे जीवन जीने के जीन एक्टिव हैं। यही वजह है महक की बहन रंभा भी सही सलामत है। समान्यता सभी चिड़ियाघरों में भोजन की उपलब्धता एक जैसी होती है, लेकिन सभी बाघ-बाघिन इस उम्र तक नहीं पहुंच पाते। इसलिए, जेनेटिक मेकअप अच्छा होने से ही सरवाइवल बढ़ता है। उम्रदराज होने से बाघिन के दांत कमजोर हो जाते हैं, ऐसे में उसे अलग से कैल्शियम दिया जाना चाहिए। <br /><strong>-डॉ. अखिलेश पांडे्य, वरिष्ठ वन्यजीव एवं पशु चिकित्सक</strong></p>
<p><strong>प्रदेश की सबसे उम्रदराज बाघिन है महक</strong><br />कैप्टिविटी (चिड़ियाघर) में बाघिन महक प्रदेश की सबसे उम्रदराज बाघिन है। हालांकि, जयपुर नाहरगढ़ में इसकी बहन रंभा भी इसी उम्र की है। इन दोनों बहनों के अलावा कोई इस उम्र तक नहीं पहुंच सका है। आगामी तीन माह में महक 21 वर्ष की हो जाएगी।  वह पूरी तरह से फिट है। उसके डाइट व देखरेख पर विशेष ध्यान रखा जा रहा है। <br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 12 May 2025 17:55:41 +0530</pubDate>
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                <title>अब लेपर्ड प्रूफ होगा बायोलॉजिकल पार्क, 80 लाख की सौलर फेंसिंग बनेगी लक्ष्मण रेखा</title>
                                    <description><![CDATA[शाकाहारी वन्यजीव व वनकर्मी होंगे सुरक्षित]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/now-the-biological-park-will-be-leopard-proof-solar-fencing-worth-rs-80-lakh-will-become-laxman-rekha/article-107830"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-03/257rtrer-(3)28.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। प्रदेश का सबसे बड़ा अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क अब लेपर्ड प्रूफ बनेगा। पार्क में मौजूद वन्यजीव व रात को गश्त करते वनकर्मियों के लिए सौलर फेंसिंग सुरक्षा कवच बनेगी। पार्क की सम्पूर्ण दीवार सौलर फेंसिंग रूपी लक्ष्मण रेखा से कवर्ड होगी, जिसमें विद्युत करंट प्रवाहित होता रहेगा। यदि, लेपर्ड छलांग लगाकर दीवार पार करने की कोशिश करेगा तो सौलर फेंसिंग करंट का झटका देगी। इलेक्ट्रिक शॉक लगने से पैंथर बायोलॉजिकल पार्क के अंदर घुस नहीं पाएंगे। हालांकि, इस करंट से वाइल्ड एनिमल को नुकसान नहीं होगा।  दरअसल, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में मौजूद शाकाहारी वन्यजीवों को सबसे ज्यादा खतरा लेपर्ड से है। पार्क के आसपास खुला जंगल है। जहां पैंथर  का मूवमेंट ज्यादा रहता है। ऐसे में वह पार्क की 10 फीट ऊंची सुरक्षा दीवार को फांद अंदर घुस जाता है। गत वर्ष ऐसी घटना घट चुकी है। वन्यजीव विभाग ने सौलर फेंसिंग लगवाने के लिए प्रस्ताव बनाकर उच्चाधिकारियों को भेज दिए हैं। </p>
<p><strong>लेपर्ड कर चुका ब्लैक बक के पिंजरे पर हमला</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में गत वर्ष 29 अप्रेल की रात को लेपर्ड ने बाहर से बायोलॉजिकल पार्क की 10 फीट ऊंची दीवार फांद परिसर में घुस गया था और ब्लैक बक के एनक्लोजर पर हमला कर दिया। शाकाहारी वन्यजीवों के नाइट शेल्टर तक पहुंच गया और ब्लैक बक के शावक का शिकार कर लिया। घटना का पता अगले दिन सुबह गश्त कर रहे कर्मचारियों की सूचना पर अधिकारियों को लगा। ऐसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए लेपर्ड प्रूफ सौलर फेंसिंग लगवाना अति आवश्यक है। </p>
<p><strong>5 हजार मीटर सुरक्षा दीवार पर लगेगी सौलर फेंसिंग </strong><br />वन्यजीव विभाग के उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर ने बताया कि अभेड़ा बायोलॉजिकल की सुरक्षा दीवार 5 हजार रनिंग मीटर लंबी है। वर्तमान में यह दीवार 10 फीट ऊंची है, जिस पर करीब 4 फीट ऊंची सौलर फेंसिंग लगाई जाएगी, जो सौलर से कनेक्ट रहेगी और चार्ज होने के साथ उसमें निर्धारित मात्रा में विद्युत करंट प्रवाहित होता रहेगा। इससे बाहर का  कोई भी वाइल्ड एनिमल खास तौर पर लेपर्ड दीवार फांद पार्क के अंदर नहीं आ सकेगा। इस सौलर फेंसिंग से पूरा बायोलॉजिकल पार्क कवर्ड किया जाएगा। जिसमें करीब 80 लाख रुपए का खर्चा आएगा। इसके प्रस्ताव बनाकर उच्चाधिकारियों को भेज दिए हैं।  </p>
<p><strong>रात को गश्त करते वनकर्मियों पर भी हमले का खतरा </strong><br />बायोलॉजिकल पार्क के आसपास खुला वनक्षेत्र है। जिसमें पैंथर व भालूओं का मूवमेंट अधिक रहता है।  चूंकी, वन्यजीव रात को ही सक्रिय होते हैं और शिकार की तलाश में जंगल से बाहर निकलते हैं। ऐसे में भालू और पैंथरों का बायोलॉजिकल पार्क में प्रवेश करने का अंदेशा लगा रहता है। जिससे रात को पार्क में गश्त करने वाले वनकर्मियों व होम गार्ड पर मांसाहारी वन्यजीवों के हमले का खतरा रहता है। ऐसे में सुरक्षा दीवारों पर सौलर फेंसिंग होने से शाकाहारी वन्यजीवों के साथ गश्त करने वाले कर्मचारी भी अनजाने खतरों से महफूज हो सकेंगे। </p>
<p><strong>50 लाख से लगेगा इलेक्ट्रिक शवदाह गृह</strong><br />जानकारी के अनुसार, बायोलॉजिकल पार्क में इलेक्ट्रिक शवदाह गृह बनवाया जाएगा। इससे मृत जानवरों के शव का सुगमता से डिस्पोजल हो सकेगा। अब तक शव का अंतिम संस्कार करने के लिए जलाया जाता है, जिससे लकड़ियों की खपत बढ़ती है और धुएं से हवा में प्रदूÑषण भी बढ़ता है। ऐसे में  इलेक्ट्रिक शवदाह गृह बनने से लकड़ियों की खपत रुकेगी और वायुमंडल में प्रदूषण भी नहीं फैलेगा। इसके अलावा इंफेक्शन, बैक्ट्रेरिया व संक्रमण का खतरा भी टलेगा। ऐसे में 50 लाख की लागत से इलेक्ट्रिक शवदाह गृह बनाया जाएगा। वन्यजीव विभाग द्वारा तैयार किए प्रस्ताव में इसे भी शामिल किया गया है।</p>
<p><strong>इनका कहना</strong><br />बजट घोषणा के तहत अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के द्वितीय फेस के निर्माण के लिए  25 करोड़ रुपए का प्रस्ताव बनाकर मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक व मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को भेजे गए हैं। प्रस्ताव में बायोलॉजिकल पार्क को लेपर्ड पू्रफ सौलर फेंसिंग से कवर्ड किया जाना शामिल किया है। बजट जारी होते ही अधूरे प्रस्तावित कार्यों का निर्माण कार्य पूर्ण हो सकेंगे। पर्यटकों की सुविधाओं में विस्तार के प्रयास लगातार जारी है। <br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Mar 2025 15:47:55 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title> असर खबर का- बायोलॉजिकल पार्क में एनक्लोजर बनाने के लिए राशि स्वीकृत, </title>
                                    <description><![CDATA[दैनिक नवज्योति ने रियासतकालीन चिड़ियाघर के जानवरों को अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में शिफ्ट किए जाने तथा द्वितीय फेस के तहत  शेष रहे 22 एनक्लोजर का निर्माण करवाने सहित विभिन्न मुद्दों पर खबरें प्रकाशित कर सरकार का ध्यान आकर्षित किया था।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/effect-of-the-news---funds-approved-for-building-enclosures-in-the-biological-park/article-107145"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-03/news-(4)4.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में द्वितीय फेस के निर्माण कार्य व शेष रहे 22 एनक्लोजर के निर्माण के लिए सरकार ने राशि स्वीकृत कर दी है। इसके लिए वन्यजीव विभाग ने भी 25 करोड़ का प्रस्ताव बनाकर सरकार को भेज दिए हैं। कोटा दक्षिण विधायक संदीप शर्मा ने विधानसभा में मुकुंदरा में वन्यजीवों के लिए पेयजल योजना स्वीकृत करने एवं अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में एनक्लोजर के लिए राशि स्वीकृत करने की जानकारी देते हुए कहा, सरकार  का यह प्रावधान कोटा के वन्य पर्यटन क्षेत्र में मील का पत्थर सिद्ध होंगे। उन्होंने कहा कि कोटा के वन्य पर्यटन के सम्पूर्ण विकास के लिए मुकुंदरा अभ्यारण्य में बाघों की शिफ्टिंग शीघ्र करवाई जाने की आवश्यकता है, ताकि यहां पर्यटन बढ़ सके। वहीं, बायोलॉजिकल पार्क में एनक्लोजर बनने पर चिड़ियाघर से दो दर्जन से अधिक वन्यजीवों की शिफ्टिंग हो सकेगी। इससे पर्यटकों को ज्यादा वन्यजीव देखने को मिल सकेंगे और सरकार के राजस्व में भी इजाफा होगा।  बता दें, दैनिक नवज्योति ने रियासतकालीन चिड़ियाघर के जानवरों को अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में शिफ्ट किए जाने तथा द्वितीय फेस के तहत  शेष रहे 22 एनक्लोजर का निर्माण करवाने सहित विभिन्न मुद्दों पर खबरें प्रकाशित कर सरकार का ध्यान आकर्षित किया था। जिसके बाद सरकार ने हाल ही में पेश किए बजट में बायोलॉजिकल पार्क में एनक्लोजर बनाने व द्वितीय फेस के निर्माण कार्य पूरा करवाने के लिए बजट की घोषणा की। </p>
<p><strong>प्लांटेशन को सुरक्षित रखने के लिएचारदीवारी बनाने की जरूरत</strong><br />विधायक शर्मा ने विधानसभा में कहा, वन एवं पर्यावरण संरक्षण के साथ ही लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति भी हमारी ही जिम्मेदारी है, इसलिए वन क्षेत्र में बसी हुई पुरानी बस्तियों का भूमि प्रत्यावर्तन कर वन विभाग को अन्यत्र जमीन आवंटित की जाए ताकि लोगों का सुविधाएं मिल सके। इसी प्रकार भामाशाह मण्डी के विस्तार के लिए वन विभाग की भूमि की स्वीकृति, कर्णेश्वर वनखण्ड एवं आसपास के प्लांटेशन को सुरक्षित रखने व अतिक्रमण रोकने के लिए इनकी चारदिवारी ऊंची और सुदृढ़ करवाने, शहरी क्षेत्रों में प्राणवायु देने वाले जंगल विकसित करने के लिए अरबन ग्रीन लंग्स अनन्तपुरा को स्वीकृति प्रदान की मांग भी उन्होंने सदन में रखी।</p>
<p><strong>कांगे्रस पर लगाए आरोप</strong><br />उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस शासन में प्रदेश के औद्योगिक विकास के लिए कुछ नहीं किया गया, गहलोत सरकार की स्पष्ट नीति और योजना के अभाव में इन्वेस्ट राजस्थान समिट फेल हो गया। भूमि आवंटन के अभाव में एनसीआर से जुड़े प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्रों में निवेश के इच्छुक कई बड़े निवेशक वापस लौट गए। जबकि हमारे शासन में एक स्पष्ट सोच, सकारात्मक मानसिकता और प्रदेश के विकास की प्रतिबद्धता, मजबूत इरादों के साथ राइजिंग राजस्थान ग्लोबल इन्वेस्टमेंट सबमिट का सफल आयोजन किया गया।</p>
<p><strong>कोटा स्टोन पार्क स्थापनाकी मांग उठाई</strong><br />शर्मा ने विधानसभा में कोटा स्टोन पार्क की स्थापना की भी मांग उठाई। उन्होंने उद्योग मंत्री से आग्रह किया है कि सरकार द्वारा बजट में स्वीकृत गोपालपुरा औद्योगिक क्षेत्र में हाड़ौती के विशिष्ट उत्पादों कोटा स्टोन, कोटा डोरिया, मांगरोल खादी, धनिये, बूंदी सेंड स्टोन, बूंदी के बासमती चावल के विनिमय के लिए विशेष व्यवस्था हो और इन पर आधारित उद्योग स्थापित किए जाए। वहीं, कोटा में ट्रेचिंग ग्राउण्ड में वेस्ट टू वेल्थ पार्क बनाकर कचरे से ईंट बनाने के उद्योग की भी आवश्यकता उन्होंने सरकार के समक्ष रखी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 11 Mar 2025 13:02:41 +0530</pubDate>
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