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                <title>mukundra tiger reserve - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>इनसाइड स्टोरी : पूरी रात रेलवे ट्रैक के पास पर बैठी रही बाघिन  कनकटी, टला ब्रोकन टेल जैसा हादसा</title>
                                    <description><![CDATA[हाइवे एनएच-52  व रेलवे  ट्रैक पास होने से टाइग्रेस की जान को था खतरा। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/inside-story--tigress-kanakati-sat-near-the-railway-track-all-night--averting-a-broken-tail-like-accident/article-135729"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/1200-x-600-px)25.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा टाइगर रिजर्व से बाहर निकली बाघिन एमटी-8 बुधवार को पूरी रात नेशनल हाइवे और रेलवे ट्रैक के पास झाड़ियों में बैठी रही। ऐसे में दोनों तरफ से उसकी जान जोखिम में थी। लेकिन, कनकटी की सुरक्षा में लगे एक दर्जन वनकर्मियों की सतर्कता से संभावित खतरा टल गया। जबकि, एनएच-52 से झालावाड़ की ओर से बड़े वाहन स्पीड से गुजरते हैं। वहीं, रेलवे ट्रैक पर लंबी दूरी की ट्रेनों का लगातार आवागमन रहता है। ऐसे में ब्रोकन टेल जैसा हादसे की आशंका बनी हुई थी। इस पर मुकुंदरा प्रशासन व वनकर्मियों ने वाहनों की गति पर नियंत्रण रखा और रेलवे प्रशासन को मामले से अवगत कराकर ट्रेन की रफ्तार घटाई। जिससे संभावित खतरे को टाला जा सका।</p>
<p><strong>ग्रामीण बोले-तीन दिन खेत तक नहीं देखे</strong><br />बटवाड़ा व दरा गांव के प्रहलाद, सुरेंद्र, महेंद्र कुमार का कहना था कि गांव और जंगल के बीच सिर्फ एक रोड का फासला है। जब बाघिन एनक्लोजर से बाहर निकली तो वनकर्मियों ने उन्हें रात और दिन में अकेले घर से बाहर नहीं निकलने की हिदायत दी। ऐसे में स्थिति कशमशभरी थी। एक ओर बाघिन के हमले का खतरा तो दूसरी ओर खेतों में फसलों को वन्यजीवों द्वारा नुकसान पहुंचाए जाने का डर सता रहा था। हालात यह है कि तीन दिन खेतों तक नहीं जा पाए।</p>
<p><strong>बाघिन और इंसान दोनों की जान को था खतरा</strong><br />बाघिन को जहां रेलेव ट्रेक व वाहनों से खतरा था, वहीं पास ही के दरा गांव के लोगों को बाघिन के हमले का डर सता रहा था। क्योंकि, दरा गांव में करीब एक दर्जन घर है। ऐसे में बाघिन का गांव की ओर मूवमेंट की आशंका से लोग भयभीत थे। वहीं, ट्रैकमेन व होम गार्ड की जान को भी खतरा था। क्योंकि, वाहनों व ट्रेन के शोर से बाघिन स्ट्रेस में थी। इधर,बटवाड़ा के ग्रामीणों का कहना है कि मंगलवार को बाघिन की दहाड़ सुनाई देने से गांव में हड़कम्प मच गया था। लोग डरे हुए थे। वनकर्मियों की टीमें लोगों को सतर्क रहने को कह रहे थे। यह बाघिन रणथम्भौर में एक बच्चे सहित दो जनों को मार चुकी है। ऐसे में उसके हमले का डर सता रहा था। इधर, वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि बाघिन रेलवे व हाइवे से सटे नाले के पास झाड़ियों में बैठी थी। यदि, वह सड़क या ट्रेक पर आ जाती तो बड़ा हादसा होने का खतरा बना रहता।</p>
<p><strong>अप-डाउन रेलवे लाइन पर आई नजर आई थी कनकटी</strong><br />सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, बुधवार देर रात कोटा-रामगंजमंडी रेल खंड स्थित दरा घाटी में दिल्ली-मुंबई रेलवे ट्रैक पर दो ट्रैकमैनों और साथ रहे होमगार्ड को कनकटी बाघिन दिखाई दी। गश्त कर रहे ट्रैकमैन बलजीत सिंह और हेमंत नागर, होमगार्ड को यह बाघिन रात करीब 12:40 बजे अबली मीणी महल के पास अप और डाउन लाइन पर मूवमेंट करती दिखाई दी थी। करीब 2 मिनट तक यह नजारा देखने के बाद ट्रैकमेन बलजीत और हेमंत ने मामले की सूचना तुरंत दरा स्टेशन सुपरवाइजर और कोटा कंट्रोल रूम को दी। सूचना पर बाघिन की तलाश कर रही वन विभाग की टीमें कुछ ही देर में मौके पर पहुंच गई थी। लेकिन तब तक बाघिन गायब हो चुकी थी।</p>
<p><strong>ट्रेन की टक्कर से ब्रोकन टेल की हो चुकी मौत</strong><br />दरा घाटी से गुजर रही रेलवे लाइन पर वर्ष 2003 में रणथम्भौर से आए बाघ ब्रोकन टेल की तेज रफ्तार ट्रेन की टक्कर से मौत हो चुकी है। इसकी पूंछ कटी हुई थी। इसलिए इसे ब्रोकन टेल नाम दिया गया था। यह बाघ रणथंभौर टाइगर रिजर्व से निकलकर लगभग 160 किलोमीटर की यात्रा कर मुकुंदरा दरा के जंगलों में पहुंचा था। बाघ के अलावा भालू, लैपर्ड सहित कई वन्यजीव ट्रेन की चपेट में आने से अकाल मौत के शिकार हो चुके हैं। इसके बावजूद वन विभाग द्वारा रेलवे लाइन व हाइवे पर वन्यजीवों को आने से रोकने व उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं कर सका।</p>
<p>बाघिन का मूवमेंट कई बार रेलवे लाइन तथा कोटा-झालावाड़ राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच-52 ) के नजदीक रहा, जो बाघिन और आमजन दोनों के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता था। हालांकि, फील्ड टीमें 24 घंटे अलर्ट पर रहीं जो बाघिन के मूवमेंट की निगरानी रेडियो टेलीमेट्री से निरंतर कर रहे थे।<br /><strong>-सुगनाराम जाट, सीसीएफ मुकुंदरा टाइगर रिजर्व</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Dec 2025 16:51:24 +0530</pubDate>
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                <title>वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया खोज रहा मुकुंदरा में बीमारियां : टाइगर रिजर्व मैनेजमेंट में मिलेगी मदद, बीमारियों व इंफेक्शन से बचाना उद्देश्य</title>
                                    <description><![CDATA[गत वर्षों में लगातार बाघों की मौत के बाद उठाया कदम। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/wild-life-institute-of-india-is-looking-for-diseases-in-mukundra/article-126650"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/_400-px)-(4)3.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ से टाइगर-टाइग्रेस लाने से पहले वन विभाग एमएचटीआर में डिजीज सर्विलांस सर्वे करवा रहा है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) ने मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में बाघों की आबादी को संरक्षित व सुरक्षित करने के लिए सर्वे शुरू किया है। ताकि, जंगल और आसपास के इलाकों के जानवरों में कोई बीमारी है तो उसका पता लग सके। यह डिजीज सर्विलांस सर्वे को दरा रेंज में बने 82 वर्ग किमी के घने जंगल में किया जा रहा है। गौरतलब है कि वर्ष 2020 से 2023 के बीच अचानक बाघ व बाघिनों की मौत के मामले सामने आए थे। जिसमें बीमारियों का भी अंदेशा जताया गया। ऐसे में वन विभाग द्वारा बाहरी प्रदेशों से बाघ लाने से पहले यह सर्वे करवाया जा रहा है। </p>
<p><strong>वाइल्ड एनीमल को बीमारियों व इंफेक्शन से बचाना उद्देश्य</strong><br />मुकुंदरा के वन्यजीव चिकित्सक तेजेंद्र सिंह रियाड़ ने कहा कि रिजर्व के आसपास बसे गांवों में पालतू पशु चराई के लिए जंगल में आ जाते हैं, ऐसे में उनमें यदि कोई बीमारी हो और वह जंगल में किसी वाइल्ड एनिमल का शिकार हो जाता है तो उसे वह बीमारी लग सकती है। ऐसी संभावनाओं को देखते हुए यह सर्वे किया जा रहा है, ताकि पिकोशन रखा जा सके।  </p>
<p><strong>टाइगर रिजर्व मैनेजमेंट में मिलेगी मदद</strong><br />संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक सुगनाराम जाट ने बताया कि यह सर्वे गत वर्ष से शुरू हुआ था। पहले फेज के सैंपल एकत्रित हुए हैं, जिनका विशलेषण डब्ल्यूएआई द्वारा किया जा रहा है।  फिलहाल, हमें रिपोर्ट नहीं मिली है, लेकिन इसकी रिपोर्ट के आधार पर रिजर्व मैनेजमेंट में काफी मदद मिलेगी।  </p>
<p><strong>प्रथम फेज के सैंपल कलेक्ट, विशलेषण जारी </strong><br />उन्होंने बताया कि सर्वें में यह भी देखा जाता है कि पालतू पशु से फैलने वाली बीमारियों के संबंध में भी जानकारी ली जाती है। जिसका विशलेषण कर प्रीवेंटली डिसीजन लिए जा सके। इस रिपोर्ट के आधार पर टाइगर रिजर्व में बीमारियों से बाघों को बचाने के लिए क्या-क्या कदम उठाए जा सकते हैं, उनकी भी जानकारी मिल जाएगी। अभी पहले फेज में सर्वे सैंपल हो गए हैं, जिनका विशलेषण किया जा रहा है। रिजर्व मैनेजमेंट में यह काफी मददगार हो सकता है। अगर पता चलता है की मवेशियों में कोई बीमारी है या फिर कोई उन बीमारियों को कैसे रोका जा सकता है? उसको लेकर एक पूरी एसओपी भी बनाई जा सकती है।</p>
<p><strong>प्रे-बेस व डोमेस्टिक एनिमल के इंटरेक्शन से बीमारियों का खतरा </strong><br />सर्वे के दौरान रिजर्व के शाकाहारी वन्यजीवों के स्केट के नमूने लिए जाते हैं। इसके अलावा रिजर्व के आसपास बसे गांवों के पालतु पशु भी रिजर्व क्षेत्र में पहुंच जाते हैं। ऐसे में डिजीज सर्विलांस सर्वे में उन पर भी स्टडी होती है।  ज्यादातर शाकाहारी जानवरों के ही नमूने लिए जाते हैं। क्योंकि, यह जंगल में प्रे बेस के साथ विचरण करते हैं और घास भी खाते हैं। ऐसे में हार्बिवोर्स और डोमेस्टिक एनिमल का इंटरेक्शन होता है।  इससे बीमारियां भी इधर से उधर चले जाने का खतरा बना रहता है। </p>
<p><strong>वर्तमान में चार टाइगर व एक शावक रिजर्व में </strong><br />मुकुंदरा में वर्तमान में चार टाइगर हैं। जिसमें एक बाघ व तीन बाघिन हैं। वहीं, एक शावक है।  बाघ एमटी-5 को साल 2022 में रणथंभौर से यहां शिफ्ट किया गया। इसके बाद मई 2023 में बाघिन एमटी-4 की मौत हो गई थी। वह गर्भवती थी  उसके गर्भ से तीन बच्चे थे, जो मृत मिले थे। इसके बाद एमटी 6 बाघिन को रणथम्भौर से यहां शिफ्ट किया गया। वहीं, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क से रिवाइल्डिंग के लिए 11 दिसम्बर 2024 को फीमेल शावक को मुकुंदरा रिलीज किया गया,जो अभी एनक्लोजर में है। इसके बाद इसी वर्ष में रणथम्भौर से एक और बाघिन कनकटी को मुकुंदरा में शिफ्ट किया गया।    </p>
<p>मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में डिजीज सर्विलांस सर्वे करवाया जा रहा है। यह सर्वे गत वर्ष से शुरू हुआ है। प्रथम फेज के सैंपल एकत्रित हो गए हैं, जिनका विशलेषण किया जा रहा है।  फिलहाल, हमें रिपोर्ट नहीं मिली है। इसकी रिपोर्ट के आधार पर रिजर्व मैनेजमेंट में काफी मदद मिलेगी। हालांकि, हमने डब्ल्यूएआई को रिपोर्ट देने को पत्र भी लिखा है। <br /><strong>- सुगनाराम जाट, संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक मुकुंदरा </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Sep 2025 15:56:03 +0530</pubDate>
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                <title>चीता बसाने को 42563 हैक्टेयर वनखंड को वाइल्ड लाइफ में शामिल करने की तैयारी</title>
                                    <description><![CDATA[शेरगढ़ सेंचुरी से सटे बारां-झालावाड़ व कोटा के तीन वनखंडों को वन्यजीव के अधीन करने का मामला।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/preparation-to-include-42563-hectares-of-forest-block-in-wildlife-to-settle-cheetah/article-102185"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-01/257rtrer46.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। हाड़ौती में चीता बसाने के लिए  शेरगढ़ सेंचुरी से सटे बारां, झालावाड़ व कोटा वनमंडल के तीन वनखंडों का 42 हजार 563.52 हैक्टेयर वनभूमि को वन्यजीव विभाग के अधीन किए जाने की तैयारी है। इसके लिए वाइल्ड लाइफ कोटा  डीसीएफ ने संभागीय मुख्य वनसंरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक मुकुंदरा टाइगर रिजर्व को प्रस्ताव भेजा है। जिसमें शेरगढ़ सेंचुरी से सटे बारां, झालावाड़ व कोटा वनमंडल के अधीन वनखंडों को चीता लैंडस्केप के रूप में डवलप किए जाने की बात कही गई है। ताकि, भविष्य में यहां चीता  बसाया जा सके और उसके अनुकूनल हैबीटाट विकसित हो सके। </p>
<p><strong>बारां-झालावाड़ व कोटा के इन वनखंडों को शेरगढ़ से जोड़ने की तैयारी</strong><br />वन्यजीव विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, झालावाड़ के 16 वनखंड जिसका क्षेत्रफल 2892.14 हैक्टेयर है। इसी तरह बारां वनमंडल के दो वनखंड, जिनका क्षेत्रफल 11830.37 है और कोटा वनमंडल का 1 वनखंड जिसका क्षेत्रफल 1806.88 हैक्टेयर है। इन  तीनों वनमंडलों का कुल 42 हजार 563.52 हैक्टेयर वनखंडों को वन्यजीव विभाग के अधीन किए जाने को लेकर वन्यजीव डीएफओ अनुराग भटनागर ने सीसीएफ कोटा को प्रस्ताव भेजा है। हालांकि, सीसीएफ कार्यालय में इस प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है। </p>
<p><strong>चीतों का हैबीटॉट होगा विकसित  </strong><br />कोटा वन्यजीव विभाग के डीएफओ अनुराग भटनागर ने बताया कि बारां, झालावाड़ व कोटा वनमंडल के तीन वनखंड, जिनका क्षेत्रफल 42 हजार 563.52 हैक्टेयर है। यह तीनों वनखंड शेरगढ़ सेंचुरी से सटे हैं, जो चीता लैंडस्केप की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसे  वन्यजीव विभाग के अधीन किया जाना चाहिए ताकि यहां चीतों का बेहतर हैबीटाट विकसित किया जा सके। क्योंकि, शेरगढ़ अभयारणय चीतों के अनुकूल  है लेकिन चीतों के लिहाज से इसका क्षेत्रफल छोटा है। ऐसे में बारां, झालावाड़ व कोटा के यह तीनों वनखंडों को शेरगढ़ सेंचुरी में शामिल कर लिया जाए  तो 52 हजार 444.12 हैक्टेयर का चीता लैंडस्केप डवलप हो सकता है। </p>
<p><strong>जंगल और वन्यजीवों की बढ़ जाएगी सुरक्षा</strong><br />डीएफओ भटनागर ने बताया कि 42 हजार 563.52 हैक्टेयर वनभूमि वर्तमान में बारां, झालावाड़ व कोटा वनमंडल के अधीन है। लेकिन, वन्यजीव प्रबंधन के लिहाज से यहां बेहतर कार्य नहीं हुआ। ऐसे में इस क्षेत्र को वाइल्ड लाइफ के अधीन कर दिया जाए तो  जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा पुख्ता हो जाएगी। साथ ही ग्रासलैंड, वैटलैंड व वाटर प्वाइंट विकसित होंगे। सुरक्षा दीवार बनेगी। जिससे वन्यजीवों व जंगल की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हो सकेंगे। वर्तमान में इस क्षेत्र में पिछले 15-20 वर्षों में वन्यजीव संरक्षण एवं प्रबंधन की दृष्टि से कोई विशेष कार्य नहीं हुए हैं। यदि इस क्षेत्र में भविष्य में चीता इन्ट्रोड्यूज किया जाता है, तो यह इस पूरे क्षेत्र के लिए बहुत श्रेयकर होगा। चीता को बसाए जाने के क्षेत्र में यह एक महत्वपूर्ण कार्य होगा।</p>
<p><strong>4 साल पहले कूनों की टीम ने किया था सर्वे  </strong><br />डीएफओ अनुराग भटनागर ने बताया कि चीता लैण्डस्कैप के सर्वे के लिए 23 नवम्बर 2020 को वन्यजीव संस्थान देहरादून के डॉ वाई.वी. झाला की टीम ने शेरगढ़ सेंचुरी का निरीक्षण किया था। टीम में तत्कालीन मुकुंदरा सीसीएफ एस.आर. यादव भी शामिल थे।  यादव ने सर्वे के बाद 22 जनवरी 2021 को शेरगढ सेंचुरी से लगते हुए वन मण्डल बारां, झालावाड, एवं कोटा के वनखण्डों को जोड़कर चीता लैण्डस्कैप बनाने के लिए उच्चाधिकारियों को लिखा था। इन तीनों जिलों के वन मण्डलों का क्षेत्रफल 425.64 वर्ग किलोमीटर नापा गया था। वर्तमान में उक्त  वनखण्ड टेरिटोरियल वन मण्डलों के अधीन है। इन वनखण्डों को वन्यजीव मण्डल के अधीन कर दिया जाए तो वन्यजीवों का बेहतर प्रबंधन हो सकता है। इसके अलावा शाकाहारी वन्यजीव, आॅगमेन्टेशन, ग्रासलैंड व वेटलैंड डवलपमेन्ट वन्यजीव प्रबन्धन कार्य कराये जाए तो यह क्षेत्र चीता लैण्डस्कैप एवं वन्यजीवों के प्रबन्धन के लिए मील का पत्थर साबित होगा। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />कोटा वन्यजीव विभाग द्वारा शेरगढ़ से सटे बारां-झालावाड़ व कोटा वनमंडल के 42 हजार 563.52 हैक्टेयर के वनखंड़ों को वाइल्ड लाइफ में शामिल करने का प्रस्ताव भेजा है। यह चीता लैंडस्केप बनाने, हैबीटाट इम्प्रूमेंट व बेहतर वन्यजीव प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा। हालांकि, इस प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है।<br /><strong>- रामकरण खैरवा, संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक वन विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Jan 2025 13:19:42 +0530</pubDate>
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                <title>अब मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में जड़ से उखाड़ा जाएगा जूली फ्लोरा</title>
                                    <description><![CDATA[वन्यजीवों के लिए नासूर बना कांटों का पेड़, जख्मी हो रहे जानवर
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/now-julie-flora-will-be-uprooted-from-the-root-in-mukundra-tiger-reserve/article-84761"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/54.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों के लिए नासूर बना जूली फ्लोरा को बड़े पैमाने पर अब जड़ समेत उखाड़ा जाएगा। इसकी जगह ग्रास लैंड विकसित किया जाएगा। इसके लिए वन विभाग से मुकुंदरा प्रशासन को लाखों का बजट मिला है। विभाग ने टेंडर जारी कर दिए हैं। जल्द ही विलायती बबूल को जड़ समेत उखाड़ फैंकने का कार्य शुरू हो जाएगा। जुली फ्लोरा से न केवल शाकाहारी वन्यजीवों का भोजन समाप्त हो रहा है बल्कि प्रे-बेस पर भी विपरीत असर पड़ रहा है।</p>
<p><strong>25 लाख का मिला बजट </strong><br />मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के दरा अभयारणय में करीब 2 वर्ग किमी के एरिया में जूली फ्लोरा फैला हुआ है। सावनभादौ डेम की डाउन स्ट्रीम की तरफ बबूल घना हो गया है। जिसे जड़ समेत उखाड़ने के लिए विभाग को 25 लाख का बजट मिला है। विभाग ने इसके टैंडर प्रक्रिया भी कर दी है। जल्द ही जूली फ्लोरा हटाने का कार्य शुरू हो जाएगा। डेम की ओर जूली फ्लोरा इतना घना हो चुका है कि वन्यजीवों की साइटिंग तक नहीं होे पाती। वहीं, जूली फ्लोरा न केवल स्थानीय वनस्पति को नष्ट कर रहा है, बल्कि बाघ एवं अन्य वन्यजीवों के लिए भी खतरनाक साबित हो रहा है।जमीन को कर देता है बंजर : वनाधिकारियों की माने तो जूली फ्लोरा एक प्रकार का जंगली पौधा है। इससे लाभ की अपेक्षा नुकसान अधिक है। जिस क्षेत्र में जूली फ्लोरा अधिक हो जाता है वहां की जमीन को यह धीेरे-धीरे बंजर कर देता है। ऐसे में जंगल के जिस क्षेत्र में जूली फ्लोरा अधिक होता है। वहां पर ग्रास लैण्ड समाप्त हो जाता है। इससे वन्यजीवों का भोजन समाप्त होने से उन्हें परेशानी होती है। जिसका असर प्रे-बेस पर पड़ता है। </p>
<p><strong>बाघिन एमटी-4 का पैर हो गया था जख्मी</strong><br />जानकारी के अनुसार, मुकुंदरा में अक्टूबर 2020 में बाघिन एमटी-4 का पैर कांटा लगने जख्मी हो गया था। जिसके इलाज के लिए पशु चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान इज्जतनगर बरेली से विशेषज्ञ बुलाए गए थे। इलाज के लिए उसे अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में लाया गया था। पैर में घाव होने से वह काफी दिनों से लंगड़ाकर चल रही थी। तब विशेषज्ञों की निगरानी में चिकित्सकों ने लेजर थैरेपी देकर इलाज किया था। इसके अलावा जंगल में कई वन्यजीव कांटे लगने से जख्मी हो जाते हैं। </p>
<p><strong>2 वर्ग किमी में डवलप करेंगे ग्रासलैंड </strong><br />मुकुंदरा टाइगर रिजर्व के डीएफओ अभिमन्यू सहारण ने बताया कि दरा सेंचुरी में 2 वर्ग किमी के एरिया में जूली फ्लोरा को जड़ समेत उखाड़ा जाएगा। इसकी जगह ग्रासलैंड विकसित करने के लिए बीजारोपण किया जाएगा। इससे शाकाहारी वन्यजीवों के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध हो सकेगा। जिससे जानवरों की संख्या में बढ़ोतरी होगी। वहीं, वन्यजीवों की मॉनिटरिंग व साइटिंग भी आसानी से हो सकेगी। </p>
<p><strong>10 साल होती उम्र</strong><br />वनकर्मियों ने बताया कि विलायती बबूल की उम्र करीब 10 वर्ष होती है। यह तने से काटनेभर से ही खत्म नहीं होता बल्कि इसे पूरी तरह से खत्म करने के लिए जड़ से उखाड़ा जाना आवश्यक है। अब तक केवल इसे तने तक ही काटा जा रहा है। वहीं इसकी लम्बाई भी करीब 8 से 10 फीट होती है। यह पेड़ अपने आसपास किसी भी वनस्पति को पनपने नहीं देता। </p>
<p><strong>वन्यजीवों के लिए घातक जूली फ्लोरा</strong><br />मुकंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में जूली फ्लोरा का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। इससे बाघों की मॉनिटिरिंग पर भी असर पड़ रहा है। वहीं, दूसरी ओर इसके असर से बाघों के प्रे-बेस के लिए ग्रासलैंड पर भी खतरा होने लगा है। स्थिति यह है कि बबूल की दरा एरिया में अधिकता होने से वन्यजीवों की दूर से साइटिंग नहीं हो पा रही। एक्सपर्ट का कहना है कि इसके असर से शाकाहारी वन्यजीव चीतल, नील गाय, चिंकारा के लिए चारे की समस्या तक हो जाती है। साथ ही धीरे-धीरे इस वनस्पति के असर से ग्रासलैंड पनप नहीं पाता। </p>
<p><strong>जानवरों की जान भी जा सकती है</strong><br />जूली फ्लोरा यानी विलायती बबूल आसानी से ग्रोथ कर लेता है। उसे जिनता काटा जाए वह तेजी से फैलाव लेते हुए बढ़ता है। ऐसे में उसको जड़ से निकालकर ही नष्ट किया जा सकता है। जूली फ्लोरा का सबसे बड़ा नुकसान वाइल्ड लाइफ को है। जूली फ्लोरा का कांटा जंगली जानवर के पैर में लग जाए तो पैर सड़ा देता है, जिससे जानवर की मृत्यु भी हो सकती है।  <br /><strong>- देवव्रत सिंह हाड़ा, अध्यक्ष पगमार्क फाउंडेशन </strong></p>
<p>मुकुंदरा में जूलीफ्लोरा तेजी से फैल रहा है। ये स्थानीय वनस्पति को नष्ट कर रहा है। बाघों सहित अन्य वन्यजीवों के लिए भी घातक है। एक बार जहां उगता है, इसके बाद ये बढ़ता ही जाता है। जमीन के पौषक तत्वों को भी खत्म कर रहा है। जूली फ्लोरा का कांटा जानवरों के लिए नुकसान दायक है। समय रहते इसकी रोकथाम जरूरी है।<br /><strong>- एएच जैदी, नेचर प्रमोटर </strong></p>
<p><strong>कई टाइगर हो चुके जख्मी</strong><br />जूलीफ्लोरा का कांटा मोटा होता है, जो बाघों व वन्यजीवों के लिए खतरनाक है। कांटा लगने से देश के अन्य टाइगर रिजर्व में कई बाघ जख्मी भी हो चुके हैं। यह वनस्पति को मिलने वाले पानी व खाद सोखकर खुद का पोषण करता है। जिससे दूसरा पौधा कमजोर पड़ जाता है। गर्मियों में गहरा हरा हो जाता है, तब भी इसकी मजबूत जड़ें जमीन का पानी सोख लेती है, जो जमीन के लिए भी नुकसानदायक है।<br /><strong>- रवि नागर, रिसर्चर वाइल्ड लाइफ</strong></p>
<p>मुकुंदरा की दरा रेंज में जुली फ्लोरा को जड़ समेत उखाड़ा जाएगा।  इसके लिए 25 लाख का बजट मिला है। टेंडर प्रक्रिया भी कर दी गई है। इसकी जगह ग्रासलैंड विकसित करेंगे। ताकि, शाकाहारी जानवरों के लिए भोजप उपलब्ध होगा, जिससे प्रे-बेस बढ़ेगा। जंगल के विकास के लिए हमारी ओर से लगातार प्रयास किए जा रहा है। <br /><strong>- अभिमन्यू सहारण, उपवन संरक्षक, मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Jul 2024 17:22:32 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>मुकुंदरा टाइगर रिजर्व के बफर जोन में अवैध कब्जे</title>
                                    <description><![CDATA[जंगल में घुसपैठ से खत्म हो रहा वन्यजीवों का हैबीटॉट। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/illegal-encroachment-in-the-buffer-zone-of-mukundra-tiger-reserve/article-82554"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-06/mukundara-tiger-reserve-k-buffer-zone-me-avesdh-kabze...kota-news-24-06-2024.jpg" alt=""></a><br /><p>क ोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के बफर जोन में दिनदहाड़े अवैध कब्जे हो गएजंगल में 200 से 400 मीटर तक लोगों ने मवेशियों के बाड़े बनाकर अतिक्रमण कर लिए हैं। वहीं, टाइगर रिजर्व की जगह-जगह से कच्ची दीवार भी चोरी हो गई। जबकि, रैंजर से लेकर बीट गार्ड तक का यहां से प्रतिदिन गुजरना होता है। इसके बावजूद  वन अधिकारी आंखें मूंदे पड़े हैं। नतीजन, संदिग्ध गतिविधियां बढ़ने से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो गया। जिससे जानवरों का पलायन बढ़ गया। दरअसल, रावतभाटा रोड स्थित नयागांव से लेकर बोराबांस  नाका तक का जंगल मुकुंदरा टाइगर रिजर्व का बफर जोन है। जिसमें जगह-जगह लोगों ने अतिक्रमण कर बाड़े बना रखे हैं। पक्की दीवारें तोड़ माफियाओं ने आने जाने का रास्ता बना लिया है। जिससे अवैध खनन बढ़ गया। संदिग्ध घुसपैठ होने से वन्यजीवों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई।</p>
<p><strong>नयागांव से दौलतगंज तक अवैध कब्जे</strong><br />मुकुंदरा के बफर जोन में नयागांव से लेकर आंवली रोजड़ी, डायवर्जन चैनल व दौलतगंज तक अवैध कब्जे व अतिक्रमण हो रहे हैं। करीब एक किमी के एरिया में तीन दर्जन से अधिक बाड़े, भूसे का भंडार गृह व कच्ची टापरियां बनी हुई हैं। जबकि, मुकुंदरा के इस रुट पर जंगल सफारी प्रस्तावित है। इसके बावजूद वन अधिकारियों का जंगल व वन्यजीवों की सुरक्षा पर कोई ध्यान नहीं है। </p>
<p><strong>जंगल का सीना चीर निकाल रहे पत्थर </strong><br />मुकुंदरा की बोराबांस रैंज में नयागांव से लेकर बोराबांस गांव तक के कई इलाकों में अवैध खनन हो रहा है। इनमें नयागांव में पटवार घर के पीछे, दौलतगंज में बालाजी मंदिर के पीछे, मोदी लॉ कॉलेज के सामने वाला क्षेत्र, डायवर्जन चैनल से सटा इलाका, भंवरकुंज के आसपास का क्षेत्र व नृहसिंह माता मंदिर सहित कई इलाके शामिल हैं। यहां खनन कर पत्थर निकाले जा रहे तो चट्टानों के टुकड़ों को हथौड़ों से तोड़ा जा रहा। वहीं, जेसीबी लगाकर मिटटी, ग्रेवल निकाली जा रही है। इसके बावजूद वन अधिकारियों द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की जा रही। </p>
<p><strong>नयागांव से डायवर्जन चैनल तक टूटी दीवारें</strong><br />मुकुंदरा की बोराबांस रैंज 12 हजार 684 हैक्टेयर में फैली हुई है। नयागांव से डायवर्जन चैनल तक करीब 500 मीटर के दायरे में जंगल की 53 जगहों से सुरक्षा दीवार टूटी हुई है। माफियाओं ने दीवारें तोड़ आने-जाने का रास्ता बना लिया है। इस इलाके में रात के अंधेरे में खनन होता है और दिन के उजाले में पत्थर, मिट्टी, ग्रेवल ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में भरकर चोरी कर रहे हैं। वहीं, अवैध कटान व मवेशियों की चराई हो रही है। </p>
<p><strong>खत्म हो रहा वन्यजीवों का हैबीटॉट</strong><br />बोराबांस रैंज के जंगलों में लेपर्ड, हिरण, लोमड़ी, भालू, हायना, नीलगाय सहित कई वन्यजीवों का नेचुरल हैबीटॉट है। अवैध खनन, वाहनों का शौर, पत्थर तोड़ने की आवाज, घुसपैठ सहित अन्य संदिग्ध गतिविधियों से उनका प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है। साथ ही जैव विविधता भी खत्म हो रही है। वन्यजीवों का जीवन चक्र प्रभावित होने से उनका अस्तित्व खतरे में पड़ रहा है। </p>
<p><strong>सफारी रूट पर दौड़ रही ट्रैक्टर-ट्रॉली</strong><br />वन्यजीव प्रेमियों ने बताया कि डायवर्जन से गैपरनाथ और गैपरनाथ से जवाहर सागर तक वन विभाग ने मुकुंदरा सफारी के लिए रूट बनाया था। हालांकि, सफारी तो शुरू नहीं हुई लेकिन माफियाओं ने अपनी ही सफारी शुरू कर दी। अधिकारियों की लापरवाही का आलम यह है कि इस रूट पर न तो चौकी बनाई और न ही स्टाफ तैनात किया। नतीजन, खननकर्ता इस रास्ते का जमकर उपयोग कर रहे हैं। वहीं, आगे भंवरकुंज व चंबल घड़ियाल सेंचुरी है। जहां अवैध मतस्य आखेट होता है। मछुआरे भी इसी रूट से आते जाते हैं। फिर भी संदिग्ध घुसपैठ पर रोक नहीं लगाई जा रही।  </p>
<p>टाइगर की टेरीटरी में चर रहे मवेशी : मुकुंदरा में वर्तमान में दो टाइगर विचरण कर रहे हैं। दोनों बाघ-बाघिन का मूवमेंट बोराबांस के वनक्षेत्र सेल्जर में रहता है। सेल्जर के पिछले हिस्से की दीवारें टूट रही हैं। जहां ग्रामीणों के मवेशी चर रहे हैं। मवेशियों को लाने-ले जाने के लिए पशुपालक अंदर तक घुस जाते हैं। जिससे टाइगर और इंसानों के बीच संघर्ष की आशंका बनी रहती है।  </p>
<p>यह एरिया काफी सेंसटिव है, यहां दीवार बनाने से पहले अतिक्रमण हटाना जरूरी है। प्रशासन के सहयोग से कार्रवाई की जाएगी। वहीं, इस वनक्षेत्र में प्लांटेशन के प्रस्ताव भेजे गए हैं। जिसकी स्वीकृति व बजट मिलते ही अवैध कब्जे व अतिक्रमण हटाकर 6 फीट ऊंची पक्की दीवार बनाई जाएगी। इस क्षेत्र में जंगल सफारी प्रस्तावित है, जिसके लिए सुरक्षा चौकी व ट्रैक बनाया जाएगा। <br /><strong>- अभिमन्यू सहारण, उप वन संरक्षक मुकुंदरा</strong></p>
<p>बोराबास रैंज के इस वनक्षेत्र में लोगों ने अतिक्रमण कर  बाड़े बनाए हुए हैं। जिसे पुलिस व प्रशासन से सहयोग से हटाया जाएगा। वहीं, मुख्यालय से बजट मांग पक्की सुरक्षा दीवार बनाई जाएगी।  <br /><strong>- रामकरण खैरवा, मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक वन विभाग कोटा</strong></p>
<p>जंगल में जब कोई व्यक्ति फोटोग्राफी या पिकनिक मनाने गलती से चला जाए तो वह तुरंत वनकर्मियों के रडार पर आ जाता है और उसके खिलाफ कार्रवाई कर दी जाती है। ऐसी स्थिति में जब रैंजर और उसका स्टाफ वन सुरक्षा के प्रति इतना सक्रिय है तो फिर ऐसा कैसे संभव है की उनकी जानकारी के बिना माफिया जंगल की दीवार, अखैध खनन, मिट्टी खनन, संदिग्ध घुसपैठ व पत्थर चोरी को अंजाम दे जाए। बोराबांस रेंजर व उसके स्टाफ की भूमिका संदिग्ध है। निष्पक्ष जांच हो तो निश्चित रूप से इनकी अवैध गतिविधियों में मिलीभगत मिलेगी। <br /><strong>- तपेश्वर सिंह भाटी, अध्यक्ष मुकुंदरा एवं पर्यावरण समिति </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 24 Jun 2024 16:37:33 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में नीलगाय से भालू तक का हो गया शिकार </title>
                                    <description><![CDATA[करोड़ों का एंटी पोचिंग सिस्टम व कैमरा टावर भी बेअसर।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/from-nilgai-to-bears-have-been-hunted-in-mukundra-tiger-reserve/article-81048"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-06/mukundara-tiger-reserve-me-neelgaye-s-bhalu-tk-ka-shikar...kota-news-10-06-2024.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिवर्ज शिकारियों के हत्थे चढ़ चुका है। पिछले पांच साल में दो दर्जन से ज्यादा वन्यजीव व जलीव जीवों का शिकार हो चुका है। मुकुंदरा में नीलगाय से लेकर भालू तक को शिकारियों ने मौत के घाट उतार दिया। जिनके हत्यारों को वन विभाग अब तक नहीं पकड़ सका। वहीं, राष्टÑीय पक्षी मौर के शिकारी भी आजाद घूम रहे हैं। जबकि, जंगल और जंगली जानवरों की सुरक्षा के लिए करोड़ों का एंटी पोचिंग सिस्टम, कैमरा टावर व कैमरे ट्रेप लगे हुए हैं। इसके बाजवूद वन अधिकारी व कर्मचारी वन्यजीवों की जान शिकारियों से नहीं बचा सके। वर्ष 2018 से 2022 तक के आंकड़ों से वन्यजीवों की सुरक्षा की पोल खुल गई। वहीं, शिकारियों व संदिग्धों की घुसपैठ से टाइगर की सुरक्षा भी खतरे में पड़ गई। </p>
<p><strong>शिकारियों ने भालू को उतारा मौत के घाट </strong><br />मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में वर्ष 2021-22 में अज्ञात शिकारियों ने भालू को मौत के घाट उतार दिया। शिकारियों ने जंगल में कई जगह लोहे के फंदे लगाए थे। जिसमें भालू का पैर फंसने पर घात लगाए बैठे  शिकारियों ने भालू पर धारधार हथियारों से हमला कर हत्या कर दी। वनकर्मियों को वारदात का पता गश्त के दौरान लगा। मौके पर भालू के पंजे व शरीर के अवशेष मिले। इसके बाद अज्ञात शिकारियों के खिलाफ वन अधिनियम में मामला दर्ज किया लेकिन आरोपियों का सुराग नहीं लगा सके।   </p>
<p><strong>खरगोश से मोर तक का हुआ शिकार</strong> <br />मुकुंदरा में पिछले पांच साल में दो दर्जन से अधिक वन्यजीव व जलीय जीवों का शिकार हो चुका है। इनमें खरगोश से लेकर मोर तक शामिल हैं। खरगोश के शिकार के 4 मामले दर्ज हुए हैं। वहीं, पाटागोह के 4, मोर का 1, भालू-1, नीलगाय-1, अज्ञात शिकार 1 तथा शिकार के प्रयास के 2 मामले दर्ज हुए हैं। वहीं, जलीय जीव में सबसे ज्यादा 15 मामले अवैध मतस्य आखेट के दर्ज हुए हैं। </p>
<p><strong>इन वन्यजीवों के हत्यारों को अब तक नहीं मिली सजा</strong><br />वन विभाग अब तक खरगोश, पाटागोह, मोर, भालू व नीलगाय के शिकारियों को सजा नहीं दिलवा पाया। शिकार के अधिकतर मामले वर्तमान में कोर्ट में विचाराधीन है। वहीं, भालू के हत्यारे अब तक वन कर्मियों की गिरफ्त से दूर है। इधर, वर्ष 2024 में जवाहर सागर रैंज में नील गाय का शिकार करने वाले मुख्य आरोपी भी फरार हैं। जिसे वन अधिकारी गिरफ्तार तक नहीं कर सके। </p>
<p><strong>दो मामलों के आरोपी ही जेल तक पहुंचे</strong><br />वन विभाग शिकार के अब तक दो मामलों के 7 आरोपियों को ही जेल तक पहुंचा सका है। इनमें वर्ष 2021-24 में 4 आरोपियों ने वन्यजीवों का शिकार करने का प्रयास किया था, जिन्हें गश्त के दौरान वनकर्मियों ने दबोच लिया। आरोपियों के खिलाफ वन अधिनियम में मामला दर्ज कर कोर्ट में पेश किया जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया। हालांकि, सभी आरोपी वर्तमान में जमानत पर बाहर हैं। इसी तरह वर्ष 2021-22 में तीन आरोपियों ने बंदूक से वन्यजीवों का शिकार करने का प्रयास किया , जिसे भी जेल भेजा गया। </p>
<p><strong>जलीय जीव के शिकारियों से वसूले 1.34 लाख का जुर्माना</strong><br />कोटा बैराज की अप स्ट्रीम व गरड़िया महादेव, गैरपरनाथ इलाके में चंबल नदी में अवैध मतस्य आखेट के 15 मामले दर्ज हुए। जिसमें आरोपियों को गिरफ्तार कर 2 हजार से 25 हजार तक के जुर्माना वसूला गया। मुकुंदरा से मिले आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच सालों में इनलीगल फिशिंग के मामले में अब तक वन विभाग द्वारा 1 लाख 34 हजार 700 रुपए का जुर्माना वसूला गया है।</p>
<p>मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में पिछले पांच सालों में शिकार की घटनाएं हुई हैं। कई मामलों में आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है, वहीं जो फरार हैं उनकी तलाश की जा रही है। संभावित ठिकानों पर भी दबिश भी दी जा रही है। जंगल व वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए लगातार मॉनिटरिंग व ट्रैकिंग कर रहे हैं। जलीय जीवों की सुरक्षा के लिए दो टीम चंबल नदी में पेट्रोलिंग कर रही है। टाइगर की 24 घंटे तीन शिफ्टों में मॉनिटरिंग व ट्रैकिंग कर रहे हैं। वहीं, निगरानी तंत्र को और अधिक मजबूत बनाने के प्रयास लगातार जारी हैं। <br /><strong>- अभिमन्यू सहारण, उप वन संरक्षक, मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 10 Jun 2024 15:53:28 +0530</pubDate>
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                <title>मुकुंदरा सफारी को तरसा और रामगढ़ खुशी से चहका </title>
                                    <description><![CDATA[सफारी, टाइगर मॉनिटरिंग और जंगल बचाने की दिशा में अच्छी पहल साबित हो सकती है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/mukundara-yearned-for-safari-and-ramgarh-chirped-with-happiness/article-56246"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-09/mukundara-tiger-ko-tarsa-or-ramgadh-khushi-s-chehka...kota-news-04-09-2023.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। टाइगर रिजर्व घोषित होने के 10 साल बाद भी मुकुंदरा में सफारी शुरू नहीं हो सकी। जबकि, रामगढ़ विषधारी एक साल में ही न केवल बाघों से आबाद हुआ बल्कि सफारी भी परवान चढ़ गई। रामगढ़ जहां खुशियों से चहक रहा वहीं, खामोशी की चादर से ढका मायूस मुकुंदरा अपनी किस्तम कोस रहा है। हालांकि, गत वर्ष  यहां सफारी शुरू करने की कोशिश की गई थी लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति के आभाव में साकार नहीं हो सकी। दरअसल, पिछले साल एक अक्टूबर से सफारी शुरू की जानी थी। जिसके लिए लोकसभा अध्यक्ष ने दिल्ली में बैठक कर वन विभाग को निर्देश भी दिए थे लेकिन वन अधिकारियों की लापरवाही से सफारी का सफर शुरू नहीं हो सका।  </p>
<p><strong>बफर जोन में इन 4 रूट पर शुरू होनी है सफारी </strong><br />मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के बफर जोन में ईको-टूरिज्म का संचालन किया जाना है। इसके लिए वन विभाग ने 4 रूट भी तय किए हैं। इनमें बोराबांस रेंज में बंधा-बग्गी रोड, अखावा-बलिंडा-बंधा, दूसरा रूट कोलीपुरा रेंज में नागनी चौकी पोस्ट, कालाकोट-दीपपुरा घाटा-कान्या तालाब-नागनी चौकी पोस्ट, तीसरा रूट मंदरगढ़ में बेरियर-मंदरगढ़, तालाब-केशोपुरा-रोझा तालाब होते हुए मंदरगढ़ बेरियर और चौथा रूट दरा रेंज में मौरूकलां-बंजर-रेतिया तलाई-पटपडिया-सावनभादौ एरिया शामिल है। इन क्षेत्र में पर्यटक जंगल सफारी का लुत्फ ले सकेंगे। </p>
<p><strong>वाहन मालिक नहीं दिखा रहे रुचि</strong><br />मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में पर्यटकों को जंगल सफारी कराने के लिए गत वर्ष सितम्बर में तीन जिप्सी मालिकों ने आवेदन किया था। लेकिन, उनके द्वारा रजिस्ट्रेशन नहीं करवाए जाने से सफारी की शुरुआत नहीं हो सकी। वन अधिकारियों ने बताया कि विभाग ने दो बार टेंडर निकाल आवेदन आमंत्रित किए लेकिन जिप्सी मालिक यहां गाड़ी लगाने में रुचि नहीं दिखा रहे। वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि वर्तमान हालातों को देखते हुए इस वर्ष भी सफारी के शुरू होने पर संशय है। </p>
<p><strong>सफारी के लिए 16 वाहनों की जरूरत </strong><br />मुकुंदरा में टाइगर सफारी शुरू करने के लिए करीब 16 वाहनों की जरूरत है। प्रत्येक रुट पर 4 जिप्सियां चाहिए। लेकिन, अब तक 3 ही जप्सी मालिकों के आवेदन आए थे, जिन्होंने एक साल बाद भी वाहनों के रजिस्ट्रेशन नहीं करवाए। विभाग ने ओपन टेंडर निकाले थे, जिसके तहत नई गाड़ियां खरीदने की बजाए ठेके पर ही वाहनों का इंतजाम करना है। सफारी के लिए खुली गाड़ियों की डिमांड रहती है, उनमें जिप्सी पहली प्राथमिकता है। वहीं, इसी तरह के अन्य वाहनों की कीमत करीब 16 लाख हैं, ऐसे में कोई भी यहां महंगी गाड़ियां नहीं लगाना चाहता। </p>
<p><strong>लोकसभा अध्यक्ष ने वन विभाग को दिए थे निर्देश </strong><br />लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 22 मार्च 2022 को दिल्ली में आयोजित बैठक में वन अधिकारियों को एमएचटीआर में टाइगर सफारी शुरू करने के निर्देश दिए थे। जिसके तहत 1 अक्टूबर से मुकुंदरा में सफारी शुरू की जानी थी। वन विभाग ने रूट तो तय कर लिए लेकिन वाहनों का इंतजाम नहीं किया। नतीजन, एक साल बाद भी सफारी शुरू नहीं हो सकी। इसके अलावा विभाग की ओर से तय रूटों पर साइन बोर्ड, गाइड सहित अन्य व्यवस्थाओं के लिए भी प्रयास नहीं किए। हालात यह हैं, 4 रूट पर 16 वाहनों की आवश्यकता है, जिसका अब तक इंतजाम नहीं हो सका।  </p>
<p><strong>पांच वर्ष से अधिक पुराने नहीं होंगे वाहन</strong><br />जंगल सफारी के लिए उपलब्ध वाहन पांच वर्ष से अधिक पुराने नहीं होंगे। हालांकि, प्रीमियम वाहन के लिए यह अवधि 7 वर्ष की रहेगी। राजस्थान में पंजीकृत वाहनों को ही सफारी के लिए पंजीकृत किया जाएगा। इधर, रिजर्व क्षेत्र में पर्यटकों को जंगल सफारी के लिए करीब 16 वाहन उपलब्ध रहेंगे। इनमें से दिव्यांगों के लिए एक विशेष वाहन की व्यवस्था की जानी है।  </p>
<p><strong>टाइगर मॉनिटरिंग व सुरक्षा के लिए सफारी जरूरी </strong><br />सफारी, टाइगर मॉनिटरिंग और जंगल बचाने की दिशा में अच्छी पहल साबित हो सकती है। इससे मॉनिटरिंग के लिए विभाग के संसाधनों में बढ़ोतरी होगी और सूचना तंत्र भी मजबूत होगा। सफारी में जा रहे ड्राइवर, गाइड, टूरिस्ट अच्छा या बुरा जो भी उन्हें नजर आता है, वह जानकारी डिपार्टमेंट के पास आएगी। जिससे गलतियों में सुधार की गुंजाइश बनी रहेगी। टाइगर व जंगल से जुड़े अपराध की सूचना मिलने से सुरक्षा और भी पुख्ता होगी। <br /><strong>- डॉ. कृष्णेंद्र सिंह नामा, वाइल्ड लाइफ एक्सप्लोरर </strong></p>
<p><strong>मुकुंदरा में जल्द शुरू हो सफारी </strong><br />मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व बेहद खूबसूरत जंगल है। वर्तमान में यहां एक बाघ और बाघिन है। भालू, पैंथर, भेड़िया, जरख, जंगली श्वान, सांभर, चीतल, नीलगाय, हिरण, लोमड़ी सहित विविध प्रजाति के पक्षियों का संसार बसा है।  जिन्हें देखने के लिए पर्यटक उत्सुक रहते हैं।   <strong>- एएच जैदी, नेचर प्रमोटर </strong></p>
<p><strong>सफारी जल्द शुरू करने के प्रयास </strong><br />मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में सफारी शुरू करने में सबसे बड़ी परेशानी जिप्सियों का उपलब्ध नहीं होना है। पिछले साल तीन वाहन मालिकों ने आवेदन किया था लेकिन उन्होंने एक्सटेंशन ले लिया। जिसकी वजह से रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। कोशिश कर रहे हैं, जल्द ही सफारी शुरू करने का प्रयास है।  <br /><strong>- बीजो जॉय, उप वन संरक्षक, मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 Sep 2023 14:14:37 +0530</pubDate>
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                <title>फिर से मुकुंदरा के जंगल में गूंजेगी किलकारी!</title>
                                    <description><![CDATA[ बाघिन एमटी-4 व बाघ एमटी-5  तीन महीने से अधिक समय से दोनों एक साथ रह रहे हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार वर्तमान में दोनों का मूवमेंट कोलीपुरा व राउंठा रैंज में बना हुआ है। वहीं, बाघिन ने बाघ से थोड़ी दूरी बनाए हुए है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/kilkari-will-again-echo-in-the-forest-of-mukundra/article-41582"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-04/fir-se-mukundra-k-jungle-mei-gunjegi-kilkaari...kota-news..3.4.2023.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा की खूबसूरत वादियों में 4 साल के लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर से शावकों की किलकारी गूंजने की उम्मीद जगी है।  बाघिन एमटी-4 व बाघ एमटी-5 की पहली मुलाकात गत वर्ष 19 दिसम्बर को हुई थी। तब से दोनों एक साथ रह रहे हैं। दोनों के मिलन (मेटिंग) के बाद से ही मुकुंदरा के आबाद होने के उम्मीद लगाई जा रही थी। तीन महीने से अधिक समय से दोनों एक साथ रह रहे हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार वर्तमान में दोनों का मूवमेंट कोलीपुरा व राउंठा रैंज में बना हुआ है। वहीं, बाघिन ने बाघ से थोड़ी दूरी बनाए हुए है। </p>
<p><strong>ये मिले संकेत</strong><br />सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बाघिन एमटी-4 के शरीर में बदलाव देखे गए हैं। पहले की अपेक्षा वर्तमान में शरीर में भारीपन नजर आ रहा है। वहीं, बाघ से भी दूरी बनाए हुए हैं। बाघ और बाघिन दोनों लगभग 100 दिन से साथ विचरण कर रहे हैं। इस बीच इनके बीच कई बार सफल मेटिंग हो चुकी है। बाघिन के स्वभाव व शारीरिक बदलाव देखकर गर्भधारण की संभावना प्रबल हो रही है। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि जल्द ही मुकुंदरा के जंगलों में एक बार फिर से शावकों की किलकारी गूंजेगी। </p>
<p><strong>बाघ कोलीपुरा में तो बाघिन रावंठा में </strong><br />इन दिनों बाघ एमटी-5 का मूवमेंट कोलीपुरा के जंगलों में बना हुआ है। वहीं, बाघिन का मूवमेंट रावंठा के जंगलों में है। दोनों कुछ समय से अलग रह रहे हैं लेकिन बीच-बीच में दोनों एक दूसरे के करीब भी पहुंच जाते हैं। बाघिन ने हाल ही में चितल का शिकार किया है। वहीं, बाघ भी कोलीपुरा में पहाड़ों की कराइयों व सघन वनक्षेत्र में विचरण कर रहा है। इन दोनों रेंजों में प्रे-बेस की संख्या भरपूर है। बाघ लगातार कई किमी वनक्षेत्र में मूवमेंट कर रहा है। </p>
<p><strong>एक और बाघिन लाने की तैयारी </strong><br />मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में जल्द ही रणथम्भौर से एक और बाघिन शिफ्ट की जाएगी। इसकी तैयारियां चल रही है। एनटीसी को प्रस्ताव भी भिजवाए गए हैं। वहां से स्वीकृति मिलने के बाद बाघिन लाने की प्रक्रिया गति पकड़ेगी। </p>
<p><strong>मुकुंदरा के आबाद होने की जगी उम्मीद</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में बाघ और बाघिन का जोड़ा बनने से वन्यजीव प्रेमियों में खुशी का माहौल है। दोनों के मिलन से जल्द ही मुकुंदरा में शावकों की अठखेलियां देखने को मिल सकती है। एक बार फिर से मुकुंदरा बाघों से आबाद होने की उम्मीद जगी है।  </p>
<p><strong>साढ़े तीन माह का रहता है बाधिन का गर्भकाल</strong><br />वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट डॉ. कृष्णेंद्र सिंह नामा ने बताया कि बाघ-बाघिन के मिलन से मुकुंदरा के फिर से आबाद होने की उम्मीद जगी है। बाघिन का गर्भकाल करीब साढ़े तीन माह का होता है। जब वह प्रेग्नेंट हो जाती है तो वह नर बाघ से थोड़ी दूरी बनाकर रखती है। क्योंकि, उस दौरान उसके स्वभाव में बदलाव आने से वह उग्र हो जाती है। गर्भ में पल रहे शावकों को लेकर काफी सजग रहती है।  इस दौरान बाघिन ऐसी जगहों की तलाश करती है, जहां आसानी से शिकार मिलते रहे और पानी की पर्याप्त उपलब्धता रहती है। जब जंगल की दुनिया में शावकों का आगमन होता है तो उनकी परवरिश और सुरक्षा को लेकर पहले से अधिक सजग हो जाती है। साथ ही लेपर्ड, हायना, सियार सहित अन्य मांसाहारी वन्यजीवों से अपने शावकों की सुरक्षा के लिए मांद या ऊंचाई वाले स्थान का चयन करती है। </p>
<p><strong>दामोदरपुरा गांव के पुनर्वास की प्रक्रिया तेज </strong><br />मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में बसे दामोदरपुरा गांव के विस्थापन की प्रक्रिया तेज हो गई है। विभाग द्वारा गांव का सामाजिक एवं आर्थिक सर्वेक्षण कार्य पूर्ण हो चुका है। साथ ही जिला समिति द्वारा अनुमोदित भी किया जा चुका है। शीघ्र ही पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। हालांकि, अभी कई गांव ऐसे हैं जो अभी तक विस्थापन की राह देख रहे हैं। उनकी भी जल्द से जल्द विस्थापन की तैयारियां की जानी चाहिए।</p>
<p><strong>रिकॉल : ऐसे हुई थी बाघ-बाघिन की पहली मुलाकात</strong><br />बाघ एमटी-5 व बाघिन एमटी-4 की पहली मुलाकात 19 दिसम्बर को राउंठा रेंज में हुई थी। लेकिन, इससे पहले 18 दिसम्बर शुक्रवार की रात बाघ बाघिन से करीब 4 किमी की दूरी पर था। दोनों एक-दूसरे की दिशा में आगे बढ़ रहे थे। ऐसे में उनके मिलन की संभवना तेज हो गई थी। लेकिन, बाघ के कदम आगे बढ़ने के बजाए फिर से पीछे की ओर मुड़ गए थे और वह बाघिन से करीब 20 किमी दूर गैपरनाथ चला गया था। इसके बाद वह अगले दिन शनिवार को कोलीपुरा के जंगलों में पहुंच गया। इसके बाद वह अगले दिन करीब 32 किमी की दूरी तय कर बाघिन के पास पहुंचा। </p>
<p><strong>डेढ़ वर्ष तक मां के साथ रहते हैं शावक</strong><br />शावक 2 वर्ष की उम्र से ही वयस्क हो जाते हैं। जन्म के बाद एक से डेढ़ वर्ष की उम्र तक ही शावक अपनी मां के साथ रहते हैं। इसके बाद वे अपनी टेरिटरी की तलाश में जुट जाते हैं। हालांकि, इससे पहले शावकों का पालन पोषण पूरी तरह से मां ही करती है और पिता नर बाघ अन्य जानवरों से उनकी रक्षा करते हैं। </p>
<p><strong>चार जिलों में फैला है मुकुंदरा</strong><br />मुकुन्दरा हिल्स को 9 अप्रेल 2013 को टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। यह करीब 760 वर्ग किमी में चार जिलों कोटा, बूंदी, झालावाड़ व चित्तौडगढ़ में फैला है। करीब 417 वर्ग किमी कोर और 342 वर्ग किमी बफर जोन है। इसमें मुकुन्दरा राष्ट्रीय उद्यान, दरा अभयारण्य, जवाहर सागर व चंबल घड़ियाल अभयारण्य का कुछ भाग शामिल है। मुकुंदरा में शुष्क, पतझड़ी वन, पहाड़ियां, नदी, घाटियों के बीच तेंदू, पलाश, बरगद, पीपल, महुआ, बेल, अमलताश, जामुन, नीम, इमली, अर्जुन, कदम, सेमल और आंवले के घने वृक्ष हैं। साथ ही पादक विविधता अधिक मात्रा में है। औषधी पौधों की भरमार है। वन्यजीवों के लिए मुकुंदरा जन्नत है। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />बाघ एमटी-5 व बाघिन एमटी-4 दोनों ही स्वस्थ है। 24 घंटे इनकी मॉनिटरिंग की जा रही है। दोनों का मिलन हो चुका है और करीब तीन महीने से अधिक समय से साथ रहे हैं। <br /><strong>-बीजो रॉय, डीएफओ मुकुंदरा टाइगर रिजर्व </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Apr 2023 14:55:24 +0530</pubDate>
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                <title>पहली नजर में ही दिल दे बैठा टाइगर एमटी-5</title>
                                    <description><![CDATA[रविवार को बाघ गैपरनाथ में था, वह करीब 30 से 32 किमी चलकर बाघिन के पास पहुंचा। दामोदरपुरा वनक्षेत्र में जब दोनों की एक-दूसरे पर नजर पड़ी तो इनके बीच करीब 150 मीटर की दूरी थी। कुछ देर तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे फिर धीरे-धीरे करीब आ गए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/tiger-mt-5-fell-in-love-at-first-sight/article-33040"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-12/pehli-nazar-mei-hi-dil-de-baitha-tiger-mt-5..kota-news..22.12.2022.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। पहली नजर में ऐसा जादू कर दिया..., तेरा बन बैठा मेरा जिया..., जाने क्या होगा क्या पता..., इस पल को मिलके आ जी ले जरा...बॉलीवुड फिल्म के गीत की यह पंक्तियां इन दिनों मुकुंदरा की खूबसूरत वादियों में बाघ-बाघिन पर सटीक बैठ रही हैं। पिछले तीन दिनों से दोनों राउंठा के जंगलों में साथ विचरण कर रहे हैं। दरअसल, सोमवार की शाम टाइगर  एमटी-5 और टाइग्रेस एमटी-4 की पहली मुलाकात हो चुकी है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बाघ और बाघिन दोनों की तीन दिन पहले ही मुलाकात हो चुकी है अ‍ैर राउंठा रेंज के जंगलों में साथ घूम रहे हैं। इससे पूर्व रविवार को बाघ गैपरनाथ में था, वह करीब 30 से 32 किमी चलकर बाघिन के पास पहुंचा। दामोदरपुरा वनक्षेत्र में जब दोनों की एक-दूसरे पर नजर पड़ी तो इनके बीच करीब 150 मीटर की दूरी थी। कुछ देर तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे फिर धीरे-धीरे करीब आ गए। हमसफर का साथ मिलने के साथ ही बाघिन का अकेलापन भी समाप्त हो गया। </p>
<p><strong>बाघिन के नजदीक आकर वापस चला गया था दूर  </strong><br />बाघ एमटी-5 गत शुक्रवार को बाघिन से करीब 4 किमी की दूरी पर था। ऐसे में दोनों के मिलन की संभावना तेज हो गई थी। लेकिन, बाघ के कदम आगे बढ़ने के बाद वापस पीछे की ओर मुड़ गए और वह बाघिन एमटी-4 से करीब 20 किमी दूर गैपरनाथ चला गया था। इसके बाद वह अगले दिन शनिवार को कोलीपुरा के जंगलों में पहुंच गया।  दोपहर को वाटर प्वाइंट के पास आराम करने के बाद रात को मूवमेंट किया। इस बीच उसने जगह-जगह पेड़ों पर पंचमार्क स्थापित किया। इस दौरान करीब 32 किमी की दूरी तय कर बाघिन के पास पहुंचा। </p>
<p><strong>सीसीएफ व डीएफओ ने नहीं उठाया फोन</strong><br />राउंठा रेंज में बाघ एमटी-5 व बाघिन एमटी-4 के मिलन के बारे में जानकारी चाहने के लिए सीसीएफ एसपी सिंह व डीएफओ बीजो रॉय को फोन किया था लेकिन उन्होंने फोन अटैंड नहीं किया। जबकि, सीसीएफ को मैसेज भी किए थे, जिसका भी जवाब उन्होंने नहीं दिया। </p>
<p><strong>ऐसे करता है टेरिटरी का चुनाव</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि बाघ जब अपनी पुरानी जगह छोड़ नई जगह आते हैं तो वह पूरे एरिया को सर्च करता है। क्षेत्र को देखता और समझता है। जहां-जहां से वह गुजरता है वहां-वहां अपने स्कैट, यूरिन व पेड़ों पर पंजों के निशान छोड़ता है। इसके बाद वह उसी क्षेत्र में दोबारा फिर से आता है और मॉनिटरिंग करता है कि कहीं यहां दूसरा बाघ तो नहीं है। इस तरह से वह अपनी टेरिटरी का चुनाव करता है। जब वे पूरे इलाके से परिचित हो जाते हैं तो फिर वह टेरिटरी के लिए ऐसी जगह का चुनाव करते हैं, जहां भोजन-पानी की पर्याप्त उपलब्धता मौजूद हो।</p>
<p><strong>मुकुंदरा के आबाद होने की जगी उम्मीद</strong><br />मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में बाघ और बाघिन का जोड़ा बनने से वन्यजीव प्रेमियों में खुशी का माहौल है। दोनों के मिलन से आने वाले दिनों में मुकुंदरा में शावकों की अठखेलियां देखने को मिल सकती है। एक बार फिर से मुकुंदरा बाघों से आबाद होने की उम्मीद जगी है।  </p>
<p><strong>रामगढ़ से कभी भी आ सकती है खुशखबरी</strong><br />रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व से कभी भी वन्यजीव प्रेमियों को खुशखबरी मिल सकती है। यहां बाघ आरवीटी-1 व बाघिन आरवीटी-2 का मिलन सितम्बर माह में हो चुका है। जल्द ही रामगढ़ की वादियों में शावकों की अठखेलियां नजर आ सकती है। यहां भी बाघ और बाघिन दोनों साथ रह रहे हैं। आगामी नव वर्ष में रामगढ़ शावकों से आबाद होने की उम्मीद जताई जा रही है।  बता दें, आरवीटी-1 रामगढ़ रिजर्व में करीब ढाई साल से अकेला रह रहा था। वह अपनी टेरेटरी बना चुका है। उसका जोड़ा बनाने के लिए गत 16 जुलाई को रणथम्भौर के आमाघाटी वन क्षेत्र से बाघिन आरवीटी-2 को रामगढ़ शिफ्ट किया गया था। इसके 46 दिन बाद उसे सॉफ्ट एनक्लोजर से खुले जंगल में छोड़ दिया गया था। इसी के बाद से वह 1501 वर्ग किमी में फैले खुले जंगल में विचरण रह रही है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 22 Dec 2022 16:26:30 +0530</pubDate>
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                <title>भाईदूज के बाद खोजा जाएगा टाइगर टी-110</title>
                                    <description><![CDATA[बाघ विचरण क्षेत्र ज्यादा बड़ा होने व भगौलिक बसावट के कारण टीम को ट्रैकिंग के दौरान काफी दिक्कातों का सामना करना पड़ता है।  इसके बावजूद टीम पूरी मुस्तैदी से संभावित मार्ग पर बाघ की तलाश में जुटी रहती है। 
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/tiger-t-110-will-be-searched-after-bhai-dooj-field/article-27917"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-10/bhai-dooj-ke-baad-khoja-jayega-tiger-t--110...kota-news-27.10.2022.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। रणथम्भौर से मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में लाए जाने वाले बाघ टी-110 की तलाश के लिए सर्चिंग अभियान भाईदूज के बाद से शुरू किए जाने की संभावना है। बुधवार को गोवर्धन पूजा के चलते फलौदी रेंज में ट्रैकिंग को लेकर कोई गतिविधियां नजर नहीं आई। हालांकि वन विभाग ने दिवाली पर्व के चलते अभियान को कुछ दिनों के लिए स्थिगित किया हुआ है। गुरुवार को भाईदूज है, ऐसे में शुक्रवार से ही सर्चिंग अभियान शुरू किए जाने की उम्मीद है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार वर्तमान में टाइगर का मूवमेंट फलौदी रेंज के जोन नम्बर-9 स्थित क्वालीजी इलाके में है। इस क्षेत्र का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा ही जोन-9 में आता है, जबकि 80 प्रतिशत हिस्सा आमली सफारी नॉन ट्यूरिज्म इलाके में शामिल है। इस क्षेत्र में चाकन नदी, खाळ, पहाड़ी इलाका, विलायती बबूल, झाड़ियां सहित घने पेड़ होने से बाघ दिखाई नहीं देता है। बाघ विचरण क्षेत्र ज्यादा बड़ा होने व भगौलिक बसावट के कारण टीम को ट्रैकिंग के दौरान काफी दिक्कातों का सामना करना पड़ता है।  इसके बावजूद टीम पूरी मुस्तैदी से संभावित मार्ग पर बाघ की तलाश में जुटी रहती है। </p>
<p><strong>क्लावजी इलाके में लगे हैं 40 कैमरा ट्रैप</strong><br />मुकुंदरा के लिए चिन्हित किए बाघ टी-110 का मूवमेंट इन दिनों क्वालजी इलाके में बना हुआ है। यहां 40 कैमरा ट्रैप लगे हुए हैं। रेस्क्यू, ट्रैंकुलाइज व ट्रैकिंग टीम पगमार्क, किल, स्कैट के साथ-साथ कैमरा ट्रैप के फुटेजों के आधार पर बाघ को तलाश करती है। बाघ की साइटिंग नहीं होने पर रिकॉर्डेड अन्य बाघ की दहाड़ सुनाई जाती है ताकि वह इधर-उधर झाड़ियों में छुपा हो तो बाहर आ जाए। इसके अलावा दिनभर में 3 से 4 बार कैमरा ट्रैप के फुटेजों को खंगाला जाता है। क्योंकि, कई जगह ऐसी है जहां मिट्टी सख्त होने के कारण पगमार्क स्पष्ट नजर नहीं आते। हालांकि पिछले चार दिनों में एक मौका ऐसा भी आया जब देर रात कुछ नए कैमरा ट्रैप लगाए गए थे। </p>
<p><strong>लंबे समय तक बूंदी जिले के जंगलों में रहा टी-110</strong><br />बाघ टी- 110 करीब तीन साल की उम्र के बाद से ही अपनी मां से अलग हो गया था। इस बीच वह लंबे समय तक बूंदी जिले के इंद्रगढ़, लाखेरी व सखावदा के जंगलों में रहा। इसके बाद वह वापस रणथम्भौर लौटा और फलौदी रेंज के जोन-9 में अपनी जगह बनाई। यहां विचरण करने वाले नर बाघ टी-62 को खदेड़ दिया। जबकि, यह जोन-9 का शक्तिशाली बाघ था।  </p>
<p><strong>वॉकी-टॉकी से होता है कम्यूनिकेशन</strong><br />रणथम्भौर टाइगर रिजर्व में मोबाइल नेटवर्क नहीं आते। ट्रैकिंग में जुटी टीम कम्यूनिकेशन के लिए वॉकी-टॉकी का उपयोग करते हैं। बाघ मूवमेंट क्षेत्रों में  तैनात टीम के सदस्यों को बाघ विचरण से संबधित कुछ सुराग मिलते हैं तो वह वॉकी-टॉकी के माध्यम से वाइल्ड लाइफ रिसर्च इंस्टीट्यूट के सदस्यों को सूचित किया जाता है। </p>
<p><strong>कहां लगाए जाते हैं कैमरा ट्रैप</strong><br />विशेषज्ञों ने बताया कि कैमरा ट्रैप बाघ के संभावित विचरण क्षेत्र में लगाए जाते हैं। जिसमें उसके आने जाने के तीन से चार मार्ग, वाटर प्वाइंट, शिकार आसानी से उपलब्ध होने वाले क्षेत्र शामिल हैं। संभावना जताई जाती है कि इन जगहों पर टाइगर का मूवमेंट एक से दो दिन में जरूर होगा। </p>
<p><strong>ट्रैंकुलाइज के दौरान ये बरती जाती है सावधानियां</strong><br />वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट ने बताया कि बाघ को ट्रैंकुलाइज करना आखिरी आॅपशन होता है। हालांकि, शिफ्टिंग के लिए ट्रैंकुलाइज के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है। इस दौरान कुछ विशेष बातों का ध्यान रखा जाता है। जिनमें बाघ का बॉडी वेट, ट्रैंकुलाइज टीम से बाघ की दूरी 15 से 30 मीटर के बीच रखनी होती है। वहीं, आसपास नदी, नाला या पानी से भरा कोई गड्ढ़ा या खाळ न हो इसका ध्यान रखना होता है। इसके अलावा समय का चयन महत्वपूर्ण है। गर्मियों के दिनों में सुबह 6 से 9 के बीच तथा सर्दियों में सुबह 11 से दोपहर 1 बजे के बीच ट्रैंकुलाइज किया जाता है। इस दौरान वन्यजीव का टेम्प्रेचर मेंटन करना जरूरी होता है।  </p>
<p><strong>पिछले 4 दिन यूं चला सर्चिंग अभियान</strong><br />जानकारी के अनुसार बाघ टी-110 की ट्रैकिंग के लिए करीब 8 सदस्यीय  टीम लगी हुई है। टीम को तीन भागों में बांटा गया है, जो बाघ के संभावित मूवमेंट क्षेत्र में तैनात रहती है। सुबह 6 बजे से ही सर्चिंग अभियान शुरू होता है जो रात 10 बजे तक जारी रहता है। इस बीच टीम के कुछ सदस्य वाहनों में तो कुछ पैदल ही मूवमेंट क्षेत्र में ट्रैकिंग करते हैं। इस दौरान सबसे पहले पगमार्क का विशलेषण कर बाघ या बाघिन होने का पता लगाया जाता है। इसके बाद कैमरा ट्रैप से मिले फुटेज का अवलोकन किया जाता है। जिसमें बाघ दिखाई देने पर ही संबंधित क्षेत्र में बाघ का मूवमेंट होने की पुष्टि की जाती है। कैमरा ट्रैप में फुटेज के अलावा टाइगर के किस दिशा में जाने, उसका समय की जानकारी भी मिलती है। </p>
<p>पिछले दिनों बाघ शिफ्टिंग के लिए सघन सर्चिंग अभियान चलाया था लेकिन वह नहीं मिला। पर्व को देखते हुए दीपावली के बाद फिर से सर्च अभियान चलाने का निर्णय लिया था। भाईदूज के बाद अभियान शुरू किया जाएगा। <br /><strong>- संग्राम सिंह, डीएफओ, रणथम्भौर बाघ परियोजना, सवाईमाधोपुर</strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 27 Oct 2022 14:47:19 +0530</pubDate>
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                <title> मुकुंदरा का नया सुल्तान बनेगा बाघ टी-110 </title>
                                    <description><![CDATA[ वन विभाग ने बाघ शिफ्टिंग के लिए 4 बाघों का चिन्हित किया था। इनमें से एक बाघ टी-113 को सरिस्का में शिफ्ट भी किया जा चुका है। इसके बाद  मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में बाघ टी-110 को शिफ्ट किया जाना था। लेकिन विभाग ने एन वक्त पर शिफ्टिंग रोक दी थी। अब विभाग की ओर से एक बार फिर से मुकुंदरा में बाघ शिफ्ट करने की तैयारी की गई है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/tiger-t-110-will-become-the-new-sultan-of-mukundra/article-27520"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-10/mukundra-ka-naya-sultan-banega-bagh-t-110..kota-news-22.10.2022.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में जल्द ही बाघ टी-110 की एंट्री होने वाली है। वन विभाग दिवाली से पहले ही कोटावासियों को सौगात दे सकता है। रणथम्भौर टाइगर रिजर्व में शुक्रवार को ट्रैंकुलाइज टीम दिनभर बाघ टी-110 की तलाश करती रही। पगमार्ग व कैमरा ट्रैप से मिले फुटेज से बाघ की लोकेशन फलौदी रेंज में ट्रेस हुई। लेकिन टीम के वहां पहुंचने से पहले ही टाइगर जोन नम्बर-10 में चला गया। यहां कुंवालजी नामक जगह पर उसका मूवमेंट नजर आया लेकिन यह क्षेत्र विलायती बबूल से घिरा हुआ होने के कारण नजर नहीं आया। हालांकि टीम के सदस्यों ने दिनभर डेरा डाल रखा लेकिन रात 11.00 बजे तक भी बाघ दिखाई नहीं आया। जिसकी वजह से ट्रैंकुलाइज नहीं किया जा सका। उसे ढूंढने के लिए क्ंवालजी में कुछ नये कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं।   बाघ शिफ्टिंग की प्रक्रिया मुकुंदरा व रणथम्भौर दोनों रिजर्व के सीसीएफ के नेतृत्व में चल रही है।  सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के मुख्य वन संरक्षक व फील्ड निदेशक एसपी सिंह गुरुवार से ही रणथम्भौर में डेरा डाले हुए हैं।</p>
<p><strong>ट्रैंकुलाइज होते ही मुकुंदरा पहुंचेगा टाइगर </strong><br />सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार ट्रैंकुलाइज टीम दिनभर फलौदी रेंज के जोन नम्बर 9 व 10 के आसपास डेरा डाले रही। पहले उसकी लोकेशन चाखन बांध के पास मिली। इस पर टीम मौके पर पहुंची तो उसके पगमार्क रेंज नम्बर-10 की दिशा में नजर आए। यहां बाघ की ताजा लोकेशन क्वालजी में मिली। जंगल का घना क्षेत्र होने के कारण देर शाम तक बाघ नजर नहीं आया। मौके की तलाश में बैठी ट्रैंकुलाइज टीम को वापस बैरंग लौटना पड़ा। वन अधिकारियों का कहना है, टैÑकुलाइज होने के बाद बाघ को मुकुंदरा में शिफ्ट कर दिया जाएगा। </p>
<p><strong>चार बाघों को किया था चिन्हित</strong><br />जानकारी के अनुसार पूर्व में वन विभाग ने बाघ शिफ्टिंग के लिए 4 बाघों का चिन्हित किया था। इनमें से एक बाघ टी-113 को सरिस्का में शिफ्ट भी किया जा चुका है। इसके बाद  मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में बाघ टी-110 को शिफ्ट किया जाना था। लेकिन विभाग ने एन वक्त पर शिफ्टिंग रोक दी थी। अब विभाग की ओर से एक बार फिर से मुकुंदरा में बाघ शिफ्ट करने की तैयारी की गई है। शुक्रवार को दिनभर लगातार बाघ टी-110 की ट्रैकिंग कराई गई। हालांकि अब तक विभागीय टीम को सफलता नहीं मिली है।</p>
<p><strong>एमटी-4 का हमसफर बनेगा टी-110</strong><br />मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में करीब दो साल से बाघिन एमटी-4 अकेली ही विचरण कर रही है। बाघ टी-110 के आने के साथ ही उसका एकाकी जीवन समाप्त हो जाएगा। उम्मीद जताई जा रही है कि रविवार से पहले ही बाघ मुकुंदरा की खूबसूरत वादियों के बीच होगा।  जल्द ही बाघ आने की खबर से कोटा के वन्यजीव प्रेमियों में जश्न का माहौल है। बोराबांस रैंज के सेल्जर में शिफ्ट किया जाएगा। पहले कुछ दिनों तक बाघ को यहां सॉफ्ट एनक्लोजर में रखा जाएगा। इसके बाद ही उसे सेल्जर के खुले क्षेत्र में छोड़ दिया जाएगा। </p>
<p><strong>मुकुंदरा में तैयारियां पूरी, शेल्जर होगा नया ठिकाना</strong><br />रणथम्भौर से बाघ आने को लेकर मुकुंदरा प्रशासन ने भी अपनी तैयारियां पूरी कर ली है। वन अधिकारियों का कहना है कि बाघ को सबसे पहले बोराबांस रेंज के सेलजर में शिफ्ट किया जाएगा। यह एरिया बाघ के लिए पूरी तरह से मुफीद है। इसके पश्चिम दिशा में भैंसरोडगढ़ जंगल है तो उत्तर की ओर सदानीरा बहती चंबल नदी है। वहीं, दक्षिण पूर्व में कोलीपुरा का जंगल आता है। हालांकि पूर्व दिशा में बोराबांस का रिहायशी इलाका है। </p>
<p><strong>15 अक्टूबर से चल रहा शिफ्टिंग आॅपरेशन</strong><br />गौरतलब है कि रणथम्भौर टाइगर रिजर्व से चार बाघ टी-110, टी-112, टी-113 व एक अन्य बाघ को चिन्हित किया गया था। जिसके लिए 15 अक्टूबर से ही शिफ्टिंग आॅपरेशन चलाया जा रहा है। ट्रैंकुलाइज टीम भी अलर्ट मोड़ पर रखी गई थी। टीम चारों बाघों की लोकेशन ट्रैस करने करने में जुटी रही। हाल ही में टीम ने 5 साल के बाघ टी-113 को बूंदी जिले के तालड़ा रेंज में टेंकुलाइज किया। इसके बाद मेडिकल जांच कर रणथंभौर से सरिस्का शिफ्ट कर दिया। अब टी-110 को मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में शिफ्ट करने की तैयारियां की जा रही है। </p>
<p>रणथम्भौर टाइगर रिजर्व में टी-110 को टैंÑकुलाइज करने के लिए दिनभर टीम लगी रही। फलौदी रेंज के जोन 9 व 10 में इसकी लॉकेशन ट्रैस हुई है। शनिवार को फिर से कोशिश की जाएगी। जल्द ही बाघ को मुकुंदरा शिफ्ट किया जाएगा।<br /><strong>- संग्राम सिंह, उपवन संरक्षक, रणथम्भौर बाघ परियोजना, सवाईमाधोपुर</strong></p>
<p>मुकुंदरा में टाइगर बसाने की तैयारियां पूरी कर ली गई है। बोराबांस रैंज के सेल्जर में बाघ को शिफ्ट किया जाएगा। <br /><strong>- बीजो रॉय, उपवन संरक्षक, मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 22 Oct 2022 16:17:37 +0530</pubDate>
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                <title>मुकुंदरा में बाघ लाने की तैयारी, बाघिन को मिलेगा हमसफर!</title>
                                    <description><![CDATA[मुकुंदरा में बाघ लाने की कोशिश लगातार जारी है। हाल ही में एनटीसीए की तकनीकी टीम ने टाइगर लाने की मौखित स्वीकृति मिल चुकी है, लेकिन लिखित स्वीकृति का इंतजार है। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/preparations-to-bring-tiger-to-mukundra--tigress-will-get-humsafar/article-22591"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-09/mukundara-mei-bagh-lane-ki-taiyari..kota-news-12.9.2022.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में करीब दो साल से अकेली रह रही बाघिन एमटी-4 को जल्द ही हमसफर का साथ मिलेगा। हाल ही में राष्टÑीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की बैठक में तकनीकी टीम ने टाइगर लाने की स्वीकृति प्रदान कर दी है। इसी के साथ मुकुंदरा प्रशासन ने भी अपनी तैयारियां भी शुरू कर दी है। रिजर्व अधिकारियों ने बताया कि कुछ समय पहले एनटीसीए की तकनीकी टीम के साथ बैठक हुई थी। जिसमें उच्चाधिकारियों द्वारा रणथम्भौर से बाघ लाने की मौखिक स्वीकृति दे दी गई है। लेकिन, बाघ लाने से पहले घना के जंगल, माचिया बायलॉजिकल पार्क सहित अन्य जगहों से करीब 550 पे्र-बेस लाए जाएंगे। जिसकी तैयारियां की जा रही है। वहीं, स्टाफ की कमी दूर करने के लिए उच्चाधिकारियों को पत्र लिखे हैं, ताकि, बाघ-बाघिन सहित वन्यजीवों की प्रोपर तरीके से मॉनिटरिंग हो सके। हालांकि, वन रक्षकों की कमी पूरी करने के लिए बॉर्डर व होमगार्ड मिले हैं, जिससे जंगल की नफरी में मदद मिल जाती है। </p>
<p><strong>ढाई साल से अकेली रह रही बाघिन एमटी-4</strong><br />वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट डॉ. कृष्णनेंद्र सिंह नामा ने बताया कि बाघिन एमटी-4 की बाघ एमटी-1 के साथ जोड़ी बनाई गई थी। वर्ष 2020 में उसके लापता होने के बाद से ही वह अकेली रह गई। लगातार नर बाघ से दूर रहने के कारण टाइग्रेस की फर्र्टिलिटी प्रभावित हो सकती है। अकेले रहने से तनाव बढ़ रहा है। उग्रता हावी होने पर वह नर बाघ को स्वीकार करेगी या नहीं यह भी बड़ा सवाल है।  बाधिन की प्रजन्न क्षमता पर विपरीत असर पड़ने से साल में एक बार होने वाली एस्ट्रस सायकल प्रभावित होगी। वहीं, मदचक्र (एस्ट्रस सायकल) व्यर्थ जाने से गर्भ धारण पर  विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका बन रही है। ऐसे में जल्द ही बाघिन का जोड़ा बनाए जाने की जरूरत है। </p>
<p><strong>एमटी-3 के बाद एमटी-2 की भी हो गई मौत</strong><br />मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में 23 जुलाई 2020 को बाघ एमटी-3 की बीमारी के कारण असमय मौत हो गई थी। इसके 12 दिन बाद ही बाघिन एमटी-2 की भी मौत हो गई। बाघिन ने 3 अगस्त 2020 को दुनिया से अलविदा कह दिया। मौत से 6 माह पहले ही बाघिन ने दो शावकों को जन्म दिया था। रिजर्व में बाघों का कुनबा बढ़ने से सभी खुश थे, लेकिन कुछ दिनों बाद ही दोनों बाघों की मौत से खुशियां गम में बदल गई। </p>
<p><strong>एमटी-1 लापता, शावकों के जीवत होने की उम्मीद नहीं</strong><br />मुकुंदरा की वादियों से 19 अगस्त 2020 में ओझल हुआ बाघ एमटी-1 का 2 साल बाद भी सुराग नहीं लगा। बाघ एमटी-1 को खो देने के बाद 3 अगस्त 2020 को बाघिन एमटी-2 का एक शावक भी लापता हो गया। इसके अगले ही महीने 22 मई को एमटी-4 का शावक भी गायब हो गया। जिनका दो साल से कोई पता नहीं चला। इन शावकों के जीवित होने की उम्मीद वन विभाग के अधिकारी भी छोड़ चुके है।  </p>
<p><strong>लिखित स्वीकृति का इंतजार</strong><br /> मुकुंदरा में बाघ लाने की कोशिश लगातार जारी है। हाल ही में एनटीसीए की तकनीकी टीम ने टाइगर लाने की मौखित स्वीकृति मिल चुकी है, लेकिन लिखित स्वीकृति का इंतजार है। हालांकि, बाघ लाने की तैयारियां पूरी कर ली गई है। जैसे ही लिखित परमिशन मिलती है, वैसे ही रणथम्भौर से बाघ ले आएंगे। इससे पहले 550 प्रे-बेस लाए जाएंगे।  <br /><strong>- एसपी सिंह, सीसीएफ मुकुंदरा टाइगर रिजर्व </strong></p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Tue, 13 Sep 2022 14:42:13 +0530</pubDate>
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