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                <title>हाड़ौती का ‘मिनी गोवा’ बेजार, बारिश की आस में पिकनिक स्पॉट</title>
                                    <description><![CDATA[सूखे कुंड और झरनों से पर्यटन स्थलों पर पसरा सन्नाटा ।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/hadauti%E2%80%99s-%E2%80%98mini-goa%E2%80%99-wears-a-desolate-look--picnic-spot-awaits-rain/article-162534"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-08/111200-x-600-px)-(2)31.png" alt=""></a><br /><p>कोटा ।  हाड़ौती अंचल में इस बार मानसून की रफ्तार धीमी रहने और इंद्रदेव की मेहरबानी न होने से कोटा और आसपास के प्रसिद्ध लोकल पिकनिक स्थल वीरान नजर आ रहे हैं। जिन पर्यटन स्थलों पर अगस्त के इन दिनों में सैलानियों का जमावड़ा रहता था और पैर रखने तक की जगह नहीं मिलती थी, वे स्थल अब पर्यटकों की राह तक रहे हैं । जिन रास्तों और चट्टानों पर कभी सैलानियों की आवाजाही से रौनक बनी रहती थी, वहाँ अब सन्नाटा पसरा है। कर्णेश्वर महादेव के शांत परिसर से लेकर आलनिया के प्रागैतिहासिक शैलचित्रों वाले क्षेत्र तक, मानसून का वह जादुई अहसास गायब है जो हर साल हजारों लोगों को अपनी ओर खींच लाता था। स्थानीय लोगों से लेकर दूर से आने वाले पर्यटकों तक, हर किसी की निगाहें अब केवल आसमान की ओर हैं कि मेघ मेहरबान हों तों ये खूबसूरत ठिकाने फिर से खिल उठें।</p>
<p><strong>बरधा डेम : 'मिनी गोवा' में छाया सन्नाटा</strong><br />सवा सौ साल पुराना बरधा बांध, जिसे 'हाड़ौती का मिनी गोवा' भी कहा जाता है, इस समय पानी की आवक कम होने से खाली पड़ा है। ब्रिटिश गवर्नर रॉबर्टसन द्वारा निर्मित 21 फीट भराव क्षमता वाले इस बांध पर सामान्य दिनों में अब तक पानी की चादर (ओवरफ्लो) चलने लगती थी। कोटा से मात्र 25 किलोमीटर की दुरी पर होने के कारण यहां हर वर्ष यहाँ वीकेंड पर हजारों लोगों का आना रहता है। पिछले साल इन दिनो यहां रोजाना हजारों लोग पहुंच रहे थे जबकि विकेण्ड पर यहां 5 हजार से अधिक पर्यटक जलक्रीड़ा करते नजर आये थे।</p>
<p><strong>16 फीट के उपर मुसलाधार बारिश जरूरी</strong><br />21 फीट भराव क्षमता वाले इस बांध में अभी केवल 13 फीट ही पानी भरा है। स्थानीय निवासीयों ने बताय कि इसे 17 फीट से ज्यादा भरने के लिए मुसलाधार बारिश की जरूरत रहती है। </p>
<p><strong>धार्मिक व प्राकृतिक स्थलों पर भी कम रौनक</strong><br />कर्णेश्वर महादेव: अपनी प्राचीनता, दिव्यता और मानसूनी हरियाली के लिए मशहूर कर्णेश्वर महादेव मंदिर में आध्यात्मिक शांति तो है, लेकिन बारिश के अभाव में यहां बहने वाले प्राकृतिक झरना और हरियाली में वैसी रंगत नजर नहीं आ रही है। यहां के प्राकृतिक बहाव के उपर बनाए गए एनीकट के उपर से बहता पानी लोगो के लिए वाटर फाल का आनन्द देता है। कोटा के समीप व होने के कारण यहां पर इन दिनों खासी भीड़ रहती थी। यहां पास ही बसी बस्ती के लोगों के लिए भी अस्थाई रोजगार का साधन बन जाता है। ऐसे में क्षेत्र के लोग और ठेले के उपर व्यापार करने वाले स्थानीय लोग अब केवल तेज बारिश की उम्मीद लगाए बैठे हैं, ताकि नदियां-बांध लबालब हों और हाड़ौती के ये खूबसूरत मुकाम फिर से गुलजार हो सकें।</p>
<p><strong>चट्टानेश्वर महादेव आलनिया</strong><br />आलनिया बांध के पास पहाड़ों के बीच स्थित यह स्थल अपने 3600 साल पुराने प्रागैतिहासिक शैलचित्रों और मानसूनी झरनों के लिए जाना जाता है। बारिश न होने के कारण यहाँ भी सैलानियों की आवाजाही थम सी गई है। आलनिया डेम में पानी की आवक नही होने से यहां बहने वाला पानी अभी बंद है। ऐसे में पिकनिक स्पॉट पर जलक्रीड़ा का आनंद लेने वाले लोग अच्छे मानसून होने का इंतजार कर रहे है। महावीर नगर निवासी गोविन्द बताते है कि अगस्त के पहले तक तो हर बार दो तीन बार बाहर पिकनीक हो जाती थी इस बार बाहर जाने की तो हिम्मत ही नहीं हो रही।</p>
<p><strong>मौसम की बेरुखी और खाली पड़े पिकनिक स्पॉट</strong><br />आषाढ़ बीतकर सावन का महीना आधा ढल चुका है, लेकिन कोटा और आसपास के इलाकों में बदरा झूमकर नहीं बरसे। आसमान में घुमड़ते काले बादलों को देख चेहरे खिलते तो हैं, लेकिन बिन बरसे गुजर जाने से आस टूट जाती है। मानसून की इस बेरुखी का सीधा असर स्थानीय पर्यटन पर पड़ा है। बरधा बांध की पथरीली चट्टानों से लेकर चट्टानेश्वर के प्राकृतिक झरनों तक—जहाँ पानी की छलांग और कलकल बहती धाराएं देखने को मिलती थीं, वहाँ अब सिर्फ सन्नाटा पसरा हुआ है।</p>
<p><strong>पिछले साल मनाई थी पिकनिक इस बार मायूसी</strong><br />वीकेंड पर दूर-दराज और शहर से आने वाले सैलानी जब पूरे उत्साह के साथ पिकनिक मनाने पहुँचते हैं, तो पानी न मिलने पर उनकी उम्मीदें अधूरी रह जाती हैं। कर्नेश्वर पहुंचे श्रीनाथपुरम-सी निवासी रविन्द्र बताते है कि पिछले साल पुरे परिवार के साथ यहां जमकर पिकनिक मनाई थी आज यहां आया तो मन में मायूसी आई है। साथ आई पुजा ने बताया कि गर्मी के कारण केवल भोलेनाथ के दर्शन करके वापस जा रहे है। जो पानी में उतरकर नहाने और मस्ती करने का मन बनाकर आते हैं, सूखे पड़े कुंड और खाली बांध देखकर मायूस हो जाते हैं। हरियाली और छांव के अभाव में सैलानियों को मानसून के मौसम में भी गर्मी और उमस से दो-चार होना पड़ रहा है।</p>
<p> यहां स्थित प्राचीन कुण्ड़ लगभग खाली ही पड़ा है आस-पास से चलने वाले सारे झरने पूरी तरह सुखे है। सावन के महीने में बाबा कनेश्वर के दर्शन करने वाले भक्तों की अपार भीड़ इस बार नदारद है हांलाकि बाबा के लिए सोमवार को फिर भी भक्त आ रहे है लकिन पहले वाला माहौल नही बन पा रहा।<br /><strong>-ब्रजेश आसोपा,सेवादार समिति कर्णेश्वर महादेव मंदिर</strong></p>
<p> इस बार बरधा बांध में पानी की आवक ज्यादा नहीं होने के कारण यहां पर पर्यटकों का आना न के बराबर है। पिछले साल यहां इन दिनों सैकडों गाडियां प्रतिदिन आया करती थी। यहां का सड़क केवल 15 फीट की हाेने के कारण यातायात व सुरक्षा के लिए तालेडा थाने से अतिरिक्त जाप्ता लगाना पड़ता था। अभी केवल सामान्य गस्त से ही काम हो रहा है। आसपास के ग्रामीणाे को छोटा-मोटा रोजगार मिलने के कारण उनमें भी पर्यटकों के प्रति रूझान रहता है।<br /><strong>-राजेश रायपुरिया प्रधान तालेडा</strong></p>
<p>बरसात की स्थितियों को देखते हुए सभी संभावित स्थनों पर अतिरिक्त जाप्ता लगाया जाता है। डूब क्षेत्रों में सभी थाना क्षेत्रों में हमारी गाडियां रूटीन गस्त कर रही है। हांलाकि अभी तक किसी भी पिकनिक स्थल पर भारी भीड नहीं जुटने के कारण अलग से जाप्ता नहीं लगाया गया है ।<br /><strong>-मनीष शर्मा वृत्ताधिकारी चतुर्थ  कोटा पुलिस</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 16:07:37 +0530</pubDate>
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                <title>असर खबर का : किसी भी पक्षी का नेचुरल फूड नहीं है ज्वार-बाजरा, 90% कीटभक्षी व 10% बीजभक्षी होते हैं पक्षी</title>
                                    <description><![CDATA[अपना प्राकृतिक भोजन भूले कबूतर, अब आर्टिफिशल फूड पर हो गए निर्भर]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of-the-news--sorghum-and-millet-are-not-the-natural-food-of-any-bird--90--of-birds-are-insectivores-and-10--are-seed-eaters/article-127185"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/_4500-px)-(1)11.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। अनाज, ज्वार-बाजरा किसी भी पक्षी का प्राकृतिक भोजन नहीं है। लेकिन, लोग ज्वार-बाजरा खिलाकर प्रकृति के फूड चैन तोड़ रहे हैं। जिसके दुष्परिणाम घातक बीमारियों के रूप में सामने आ रहे हैं। आज सार्वजनिक स्थानों से घरों की छतों तक कबूतरों का कब्जा हो गया। कबूतरों को दाना डालकर लोग न केवल ईको सिस्टम को बर्बाद कर रहे बल्कि मानव जीवन को घातक संक्रमण व बीमारियों की ओर भी धकेल रहे हैं। कबूतरों के फड़फड़ाहट के दौरान पंखों से निकलने वाले बारीक रेशें व बीट से हवा में फैलते बैक्टेरिया सांस के साथ शरीर में जाते हैं और गंभीर बीमारियों को जन्म देते हैं। यह बात वन्यजीव विभाग की ओर से सरकारी स्कूलों में आयोजित जागरूकता शिविर में उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर ने बच्चों को जागरूक करते हुए कही। वाइल्ड लाइफ कोटा द्वारा बुधवार को राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय पुलिस लाइन व श्रीपुरा स्थित पीएमश्री राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय में जागरूकता शिविर आयोजित किया गया। जिसमें बच्चों को पक्षियों के जीवन चक्र से रुबरू कराया।</p>
<p><strong>आस्था के नाम पर पक्षियों को गुलाम बनाना नेचर के खिलाफ</strong><br />उन्होंने बताया कि कबूतर के सम्पर्क में आने से  फंग्ल इंफेक्शन हिस्टोप्लासमोसिस और क्रिप्टोकोकोसिस जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा रहता है। ऐसे में घर के आंगन, बालकनी या छत पर दाना डालने से बचें। प्रकृति ने उन्हें खुद भोजन जुटाने और जीवन जीने के लायक बनाया है। उन्हें दाना डालकर प्रकृति के ईको सिस्टम से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। आस्था के नाम पर पक्षियों को गुलाम बनाना नेचर के खिलाफ है।   यदि, दान पुण्य करना है तो मवेशियों को हरा चारा, गुड़ खिला सकते हैं।  </p>
<p><strong>वन्यजीवों की जान ले रहे गुब्बारे</strong><br />उप वन संरक्षक भटनागर बताते हैं, जन्मदिवस या अन्य खुशी के मौके पर गुब्बारों का उपयोग नहीं करना चाहिए। क्योंकि, यह वन्यजीव व जलीय जीवों की मौत के कारण बनते हैं। गुब्बारें दो तरह के होते हैं, पहला-बायोडिग्रेडेबल जो लेटेक्स होते हैं। वहीं,  नॉन बायोडिग्रेडेबल होते हैं, जो बेहद खतरनाक होते हैं। गैस निकलने पर इनके दो ही जगह जंगल और नदियां-समुद्र में गिरने से कछुआ, उद बिलाव,  व्हेल,  डॉल्फिन, पक्षी गुब्बारों में उलझने या इनक टुकड़े निगलने से उनकी मौत हो जाती है। </p>
<p><strong>इंसानी दखल से टूटी पक्षियों की खाद्य श्रृंखला </strong><br />डीएफओ भटनागर ने बच्चों को बताया कि दुनिया में 90% पक्षी कीटभक्षी और 10% बीजभक्षी होते हैं, जिसमें कबूतर भी शामिल है।  अनाज, ज्वार व बाजरा किसी भी पक्षी का नेचुरल फूड नहीं है। जाने-अनजाने में इंसानी दखल से पक्षियों की खाद्यय शृखंला टूट रही है। वर्तमान में स्थिति यह हो गई कि कबूतर अब अपना मुख्य भोजन बीज खाना भूल गया, अब वह आर्टिफिशल फूड पर निर्भर हो गया। इतना ही नहीं कबूतरों को ज्वार-बाजरा खिलाना इंसान की दिनचर्या में शामिल हो गया। नियमित भोजन मिलने से उनकी संख्या में तेजी से इजाफा हुआ। जबकि, इनके पंखों व बीट से हाइपर सेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस, फंग्ल इंफेक्शन हिस्टोप्लासमोसिस और क्रिप्टोकोकोसिस जैसी गंभीर बीमारियों  का खतरा बढ़ गया है। कबूतरों की सूखी बीट के वायरस हवा के साथ शरीर में पहुंचकर फेफड़े डेमेज कर रहे हैं।</p>
<p><strong>बंदरों को भोजन व चीटिंयों को न खिलाएं आटा</strong><br />सहायक वनपाल प्रेम कंवर ने बच्चों को जागरूक करते हुए कहा, बंदरों व लंगूर को भोजन, चीटिंयों को आटा नहीं खिलाना चाहिए। बंदर बड़े बीज वाले फल जैसे तेंदु, बेल पत्र, आम के फलों को खाकर बीज को एक स्थान से दूसरे स्थान पर फैलाते हैं, जिससे पड़ों की संख्या बढ़ती है। लेकिन, रेडिमेड फूड खिलाने से वे जंगल से आबादी के बीच बस गए। इनके काटे जाने से रेबीज तक का खतरा रहता है। इसी तरह चीटिंयों को आटा नहीं खिलाना चाहिए। इस दौरान  कोटा ग्रीन कम्यूनिटी के प्रणव सिंह खींची, ज्योत्सा खींची मौजूद रहें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Thu, 18 Sep 2025 14:34:57 +0530</pubDate>
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                <title>रसायन रहित बागवानी खेती ही कारगर प्राकृतिक उद्यानिकी खेती को मिले बढ़ावा : बागड़े</title>
                                    <description><![CDATA[राज्यपाल हरिभाऊ किसनराव बागडे ने कृषि उद्यानिकी के तहत प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिए जाने का आह्वान करते हुए कहा है कि कृषि विश्वविद्यालयों को देश में रसायन रहित कृषि के लिए वातावरण निर्माण किए जाने की जरूरत है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/only-chemical-free-horticulture-farming-is-effective-natural-horticulture-farming-should/article-99026"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-09/governor-haribau-bagde.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राज्यपाल हरिभाऊ किसनराव बागडे ने कृषि उद्यानिकी के तहत प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिए जाने का आह्वान करते हुए कहा है कि कृषि विश्वविद्यालयों को देश में रसायन रहित कृषि के लिए वातावरण निर्माण किए जाने की जरूरत है। बागडे अखिल भारतीय कृषि विश्वविद्यालय कुलपति संघ द्वारा ''उद्यानिकी फसलों के संरक्षण  विषयक आयोजित 16वीं राष्ट्रीय संगोष्ठी में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि रासायनिक उर्वरकों के अधिक प्रयोग से रोग ही नहीं बढ़ रहे, बल्कि धरती की उर्वरा शक्ति भी नष्ट हो रही है। उन्होंने उद्यानिकी फसलों की संरक्षित खेती के लिए कार्य किए जाने पर जोर दिया। उन्होंने पानी बचाकर उसके निर्माण के लिए भी देशभर में कार्य करने का आह्वान किया। <br /><br />उन्होंने कम पानी से होने वाली फसलों, फल, फसलों को प्राकृतिक प्रकोप से बचाने के लिए सभी स्तरों पर प्रयास किए जाने पर भी जोर दिया। उन्होंने सभी कृषि विश्वविद्यालयों में सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए भी आवश्यक रूप से कार्य करने की आवश्यकता जताई। राज्यपाल ने प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन द्वारा 2008 में प्रस्तुत कृषि सुधारों की बनी समिति के सुझावों पर चर्चा करते हुए कहा कि लाभकारी कृषि के लिए केंद्र सरकार निरंतर कार्य कर रही है। उन्होंने कृषि उद्यानिकी के प्राचीन ज्ञान के आलोक में कृषि की नवीन तकनीक से खेती को लाभकारी किए जाने पर जोर दिया।</p>
<p>बागडे ने कहा कि हमारे यहां धीरे धीरे जंगल कम होता जा रहा है। पहले अनाज जब नहीं होता था और खेती की पैदावार नहीं थी तब उद्यानिकी फसलों पर ही मनुष्य निर्भर था। पर धीरे धीरे इस दिशा में ध्यान नहीं देने के कारण जंगलों में बहुत सी उद्यानिकी फसलें लोप हो गई। उन्होंने स्थान विशेष की जलवायु के अनुरूप उद्यानिकी फसलों के अधिकाधिक उत्पादन के लिए कार्य किए जाने का आह्वान किया। राज्यपाल ने आरंभ में विश्वविद्यालय के अंतर्गत सेंटर ऑफ एक्सीलेंसी फॉर टिश्यू कल्चर का शिलान्यास किया। उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तहत गेंहू और अन्य नवीन कृषि उत्पाद प्रौद्योगिकी का भी शुभारंभ किया वहीं उन्होंने माइक्रोस्कोप से फसलों में सूक्ष्म कीट परीक्षण भी किया और विश्वविद्यालय के प्रकाशनों का लोकार्पण किया। आरंभ में श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बलराज सिंह ने संरक्षित खेती के साथ राष्ट्रीय सिंपोजियम के बारे में जानकारी दी। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 29 Dec 2024 18:25:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>घर पर बनाएं सीसी क्रीम, मिलेगा नेचुरल ग्लो </title>
                                    <description><![CDATA[ज्यादातर महिलाएं चेहरे पर सीसी क्रीम का इस्तेमाल करती हैं। इसे लगाने से हमारा चेहरा फ्लॉलेस नजर आता है। यह हमारे चेहरे पर मौजूद किसी भी ब्लेमिश और मार्क्स को छिपा सकता है। सबसे अच्छी बात यह है कि आप फाउंडेशन की जगह इसका उपयोग कर सकती हैं। इसे लगाने से आपको वही ग्लो और टेक्सचर मिलेगा, जैसा आप चाहती हैं।  ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/health/make-cc-cream-at-home-you-will-get-natural-glow/article-13458"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-07/ee.jpg" alt=""></a><br /><p>ज्यादातर महिलाएं चेहरे पर सीसी क्रीम का इस्तेमाल करती हैं। इसे लगाने से हमारा चेहरा फ्लॉलेस नजर आता है। यह हमारे चेहरे पर मौजूद किसी भी ब्लेमिश और मार्क्स को छिपा सकता है। सबसे अच्छी बात यह है कि आप फाउंडेशन की जगह इसका उपयोग कर सकती हैं। इसे लगाने से आपको वही ग्लो और टेक्सचर मिलेगा, जैसा आप चाहती हैं।  हर बार मंहगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स को खरीदना संभव नहीं होता है। ऐसे में महिलाएं सस्ते और लो क्वालिटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल अपने चेहरे पर करती हैं।  जिससे त्वचा को नुकसान पहुंचता है। लेकिन अगर हम आपसे कहें कि आपको सीसी क्रीम बाजार से खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी।  अगर आपकी स्किन ड्राई है, तो आपको बीबी क्रीम का इस्तेमाल करना चाहिए। बीबी क्रीम में हाइड्रेटिंग प्रॉपर्टीज पाई जाती हैं। वहीं एक्ने और आॅयली स्किन की महिलाओं को सीसी क्रीम लगानी चाहिए।</p>
<p><br /><strong>सीसी क्रीम के फायदे</strong><br />    सीसी क्रीम में विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो स्किन को बाहरी तत्वों से प्रोटेक्ट करता है। <br />    सीसी क्रीम में ग्रीन टी, सोया और शीया बटर पाया जाता है, जो हमारी स्किन को स्मूद बनाता है। <br />    सीसी क्रीम में एंटी एजिंग प्रॉपर्टीज पाई जाती हैं, जिससे चेहरा फ्लॉलेस नजर आता है।<br />    इसे लगाकर आप सन डैमेज से बच सकती हैं, क्योंकि इसमें एसपीएफ के गुण पाए जाते हैं। </p>
<p><br /><strong>क्या होती है सीसी क्रीम</strong><br />    सीसी क्रीम कलर कंट्रोल और कॉम्प्लेक्शन करेक्टर है। सीसी क्रीम को खासतौर पर स्किन डिस्कलरेशन के लिए बनाया गया है। <br />आप इसकी मदद से डार्क सर्कल, एक्ने के निशान और डार्क स्पॉट छिपा सकती हैं। यह क्रीम बेहद लाइट होती है।  </p>
<p><br /><strong> कैसे बनाएं</strong><br />आप घर पर आसानी से कुछ चीजों की मदद से सीसी क्रीम बना सकती हैं।  <br />    1 चम्मच मॉइश्चराइजर <br />    1 चम्मच एलोवेरा जेल <br />    फाउंडेशन <br />    सनस्क्रीन <br />    कॉम्पैक्ट पाउडर <br />लाइट पिंक ब्लश पाउडर <br />एक बाउल में 1 चम्मच मॉइश्चराइजर, 1 चम्मच एलोवेरा जेल, थोड़ा सा फाउंडेशन, सनस्क्रीन, कॉम्पैक्ट पाउडर और लाइट पिंक ब्लश पाउडर मिलाएं। <br />अब सभी चीजों को अच्छे से मिक्स कर लें। इसका एक स्मूद पेस्ट बना लें। <br />लीजिए तैयार है आपकी होममेड सीसी क्रीम।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 Jul 2022 14:53:11 +0530</pubDate>
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