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                <title>loneliness - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>युवाओं में बढ़ता एकांत कितना खतरनाक</title>
                                    <description><![CDATA[वर्तमान दौर में भारत तेजी से आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/how-dangerous-is-increasing-loneliness-among-youth/article-133544"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-11/1200-x-600-px--(3)2.png" alt=""></a><br /><p>वर्तमान दौर में भारत तेजी से आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है। तकनीक, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, रोजगार और जीवनशैली में हो रहे परिवर्तनों ने हमारे समाज को अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ाया है। इस विकास यात्रा में युवा वर्ग सबसे अधिक ऊर्जावान, रचनात्मक और बदलाव का वाहक माना जाता है। युवा सपनों, साहस और संभावनाओं से भरे होते हैं। परंतु इसी चमकदार परिदृश्य के भीतर एक गहरा और लगातार बढ़ता संकट जन्म ले चुका है-एकांत, अकेलापन और भावनात्मक विखंडन। आज यह अकेलापन केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि एक मौन मानसिक महामारी का रूप लेने लगा है। प्रश्न यह है कि इतनी आधुनिकता, इतनी सुविधा और इतनी तकनीक के बीच भी युवा कहां और क्यों अकेले पड़ते जा रहे हैं। स्मार्टफोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने दावा किया था कि वे लोगों को दुनिया से जोड़ देंगे। पर विडम्बना यह है कि यही तकनीक युवाओं को अपने भीतर कैद करने लगी है।</p>
<p><strong>संवाद का अभाव : </strong></p>
<p>दिन-रात ऑनलाइन रहने के बावजूद युवाओं में असली संवाद का अभाव बढ़ता गया है। बातचीत शब्दों से सिमटकर इमोजी में बदल गई है और दोस्ती गहरे रिश्तों से हटकर फॉलोअर्स और लाइक्स की गिनती बनकर रह गई है। युवा घंटों ऑनलाइन रहते हैं, लेकिन दिल का बोझ साझा करने के लिए एक भरोसेमंद व्यक्ति ढूंढ़ना उनके लिए कठिन हो गया है। आज का युवा अपने भविष्य को लेकर अत्यधिक सजग है। करियर, नौकरी, प्रतियोगी परीक्षाएं, आर्थिक सुरक्षा और जीवन में कुछ बड़ा कर दिखाने की चाह उसे लगातार दौड़ने पर मजबूर करती है। इस निरंतर दबाव में वह अक्सर यह महसूस करने लगता है कि वह अकेला है, पीछे छूट रहा है, और यदि वह सफल नहीं हुआ, तो जीवन का मूल्य कम हो जाएगा। समाज की अपेक्षाएं, प्रतिस्पर्धा की अंधी होड़ और असफलता का भय युवा मन में एक ऐसी बेचैनी पैदा करते हैं, जो धीरे-धीरे उसे भीतर ही भीतर तोड़ने लगती है। वे खुद को परफॉर्मर समझने लगते हैं, इंसान होने की सादगी और भावनाओं से दूर हो जाते हैं।</p>
<p><strong>एकाकी बना देता है :</strong></p>
<p>असफलता की स्थिति में यह अकेलापन अत्यधिक बढ़ जाता है। ऐसे में उन्हें लगता है कि कोई उनकी स्थिति समझ भी नहीं सकता, और यही विचार उन्हें मानसिक रूप से और अधिक एकाकी बना देता है। भारतीय परिवार पारंपरिक रूप से भावनात्मक सहारा और सुरक्षा का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता रहा है। लेकिन आधुनिक जीवनशैली ने इस नींव को भी हिला दिया है। व्यस्त माता-पिता, ऑफिस के लंबे घंटे, मोबाइल स्क्रीन पर बढ़ता समय, अलग-अलग कमरों में रहने की आदत, और साझा समय का कम होना,इन सबने युवाओं को परिवार से दूरी की ओर धकेल दिया है। जिस उम्र में उन्हें सबसे अधिक मार्गदर्शन, संवाद और समझ की आवश्यकता होती है, उसी उम्र में उनके पास सुनने वाला कोई नहीं होता। परिणामस्वरूप वे अपनी भावनाएं भीतर दबाते रहते हैं, और धीरे-धीरे भावनात्मक खालीपन बढ़ने लगता है। सोशल मीडिया ने सफलता की एक ऐसी कृत्रिम दुनिया निर्माण कर दी है, जिसमें हर कोई खुश, सफल, धनी और संतुष्ट दिखता है।</p>
<p><strong>जीवन की तुलना :</strong></p>
<p>युवा इस सजावट को वास्तविकता मान बैठते हैं और अपने जीवन की तुलना दूसरों से करने लगते हैं। धीरे-धीरे उनके भीतर यह भावना घर कर जाती है कि मेरे पास वह सब नहीं है जो दूसरों के पास है। मेरी जिंदगी पीछे चल रही है। तुलना का यह दबाव उन्हें आत्मसंतोष से दूर कर देता है और वे अपने ही भीतर एकांत का महल बना लेते हैं। आज के रिश्ते पहले जैसे गहरे, स्थिर और दीर्घकालिक नहीं रह गए हैं। अवास्तविक अपेक्षाएं, जल्दबाजी में बनने वाले संबंध, भरोसे की कमी, और सोशल मीडिया की सतही नजदीकियां युवाओं को भावनात्मक रूप से कमजोर कर देती हैं। ब्रेकअप, धोखा या रिश्तों में असफलता का दर्द युवा मन के लिए अत्यंत भारी हो जाता है। बड़े शहरों में रहने वाला युवा दिनभर हजारों लोगों को देखता है, भीड़ में चलता है, भीड़ के बीच काम करता है,परंतु उसके पास दिल की बात कहने वाला कोई नहीं होता। उसके पास होता है, एक छोटा-सा कमरा,एक मोबाइल स्क्रीन,किताबों और असाइनमेंट का दबाव,और मन में पलता अनकहा तनाव।</p>
<p><strong>भावनात्मक मजबूती :</strong></p>
<p>परिवार में प्रतिदिन कम से कम कुछ समय ऐसा होना चाहिए, जब न फोन हो, न टीवी, न अन्य व्यवधान सिर्फ एक-दूसरे की बात सुनने का समय। यही संवाद मानसिक सुरक्षा की पहली सीढ़ी है। स्क्रीन से बाहर की दुनिया को फिर से जीवन का हिस्सा बनाना होगा। दोस्तों के साथ वास्तविक बातचीत, समूह गतिविधियां, खेल, सांस्कृतिक आयोजन और सामुदायिक कार्यक्रम युवाओं को पुन: जीवन से जोड़ सकते हैं। युवाओं को यह समझाना अत्यंत आवश्यक है कि हर व्यक्ति का विकास पथ अलग होता,सोशल मीडिया पर दिखने वाली सफलताएं वास्तविकता का पूरा चित्र नहीं होतीं। असफलता को अंत नहीं, बल्कि नए आरंभ का अवसर समझाया जाए। युवाओं को अपनी भावनाओं को पहचानने, उन्हें व्यक्त करने और उन्हें स्वस्थ तरीके से संभालने की कला सिखानी चाहिए। यह कौशल उन्हें जीवन भर मानसिक रूप से मजबूत बनाए रखेगा।</p>
<p><strong>-डॉ. वीरेन्द्र भाटी मंगल</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 25 Nov 2025 12:49:15 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>डिजिटल भीड़ में तन्हा इंसान</title>
                                    <description><![CDATA[दुनिया में इस वक्त हर घंटे 100 लोग मर रहे हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/loneller-in-digital-crowd/article-119505"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/rt112roer15.png" alt=""></a><br /><p>दुनिया में इस वक्त हर घंटे 100 लोग मर रहे हैं। यह सौ लोग न तो किसी युद्ध में मारे जा रहे हैं, न किसी दुर्घटना में। न तो कोई बीमारी इन्हें लील रही है, न कोई प्राकृतिक आपदा। यह सौ लोग मर रहे हैं अकेलेपन से। जी हां, अकेलापन अब इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन बन गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ की जारी एक नई रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की 17 प्रतिशत आबादी यानी हर छह में से एक व्यक्ति अकेलेपन का शिकार है। 2014 से 2023 के बीच अकेलेपन की वजह से सालाना 8 लाख 71 हजार लोगों की मौत हुई है। यह संख्या कई छोटे देशों की पूरी आबादी से भी ज्यादा है। सोचिए, कितनी विडंबना है कि इंसान ने चांद पर कदम रखा है, मंगल की मिट्टी की जांच कर रहा है, लेकिन अपने ही घर में, अपने ही दिल में पनप रहे अकेलेपन से हार रहा है।</p>
<p><strong>एक मानसिक महामारी :</strong></p>
<p>यह अकेलापन कोई साधारण समस्या नहीं है। यह एक मानसिक महामारी है, जो चुपचाप, बिना आवाज किए लाखों लोगों की जान ले रही है। जब कोई व्यक्ति अकेलेपन से घिरता है, तो उसका दिल सिकुड़ने लगता है, उसकी सांसें भारी होने लगती हैं और वह धीरे-धीरे मौत की तरफ बढ़ने लगता है। यह एक ऐसी मौत है, जिसमें न तो खून बहता है, न चीखें निकलती हैं, बस व्यक्ति चुपचाप अपने आप को खत्म होते देखता है। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में हमने रिश्तों को दरकिनार कर दिया है। हम स्मार्टफोन से जुड़े हैं, लेकिन अपने परिवार से कटे हुए हैं। हमारे फेसबुक पर हजारों दोस्त हैं, लेकिन हकीकत में हमारा कोई सच्चा मित्र नहीं है। हमने घरों में दीवारें खड़ी कर ली हैं, लेकिन दिलों के बीच की दूरी और भी बढ़ा दी है। बूढ़े मां-बाप अकेले बैठे अपने बच्चों का इंतजार करते हैं और बच्चे अपनी व्यस्तताओं में इतने डूबे होते हैं कि उन्हें यह एहसास ही नहीं होता कि घर में कोई तड़प रहा है।</p>
<p><strong>असल जिंदगी में अकेला :</strong></p>
<p>शहरीकरण की अंधी दौड़ में हमने अपनी जड़ों को छोड़ दिया है। गांव से शहर, शहर से महानगर की यात्रा में हमने अपने पुराने रिश्ते-नाते खो दिए हैं। आज का युवा ऊंची इमारतों के फ्लैट में रहता है, लेकिन उसे अपने पड़ोसी का नाम तक नहीं पता। वह डिजिटल दुनिया में हजारों लोगों से जुड़ा है, लेकिन असल जिंदगी में अकेला है। यह अकेलापन सिर्फ बुजुर्गों की समस्या नहीं है। यह युवाओं, बच्चों और हर उम्र के लोगों को प्रभावित कर रहा है। कॉलेज के छात्र अपने कमरों में बैठकर डिप्रेशन में जी रहे हैं। घर की महिलाएं चारदीवारी के बीच घुटन महसूस कर रही हैं। यहां तक कि भीड़ भरी जगहों में भी लोग अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं।</p>
<p><strong>बदलती जीवनशैली :</strong></p>
<p>इस समस्या की जड़ें हमारी बदलती जीवनशैली में छुपी हैं। हमने प्रगति के नाम पर इंसानियत को दरकिनार कर दिया है। हमने पैसा कमाने में खुद को इतना व्यस्त कर लिया है कि रिश्तों के लिए वक्त ही नहीं बचा। हमने सुविधाओं का जमावड़ा कर लिया है, लेकिन सुकून गंवा बैठे हैं। सबसे दुखद बात यह है कि अकेलेपन से मरने वाले लोग चुपचाप मर जाते हैं। उनकी कोई आवाज नहीं सुनाई देती, कोई विरोध नहीं होता। वे बस धीरे-धीरे अवसाद में डूबते जाते हैं और एक दिन इस दुनिया को छोड़ देते हैं। यह एक ऐसी त्रासदी है ,जिसका कोई शोर नहीं होता, कोई सुर्खियां नहीं बनतीं। लेकिन यह समस्या असाध्य नहीं है। इसका इलाज हमारे पास है। वह इलाज है-प्रेम, करुणा, और इंसानी रिश्तों को फिर से जिंदा करना। हमें अपने परिवार के साथ वक्त बिताना होगा, अपने दोस्तों से मिलना-जुलना होगा, और अपने पड़ोसियों से रिश्ता बनाना होगा। हमें समझना होगा कि तकनीक का इस्तेमाल रिश्तों को जोड़ने के लिए होना चाहिए, न कि तोड़ने के लिए।</p>
<p><strong>हम सबकी जिम्मेदारी :</strong></p>
<p>आज जरूरत है कि हम अपने आसपास देखें। कहीं कोई अकेला तो नहीं बैठा है, कहीं कोई मदद की गुहार तो नहीं लगा रहा है, थोड़ा सा प्रेम, थोड़ी सी देखभाल और थोड़ा सा समय यही तो चाहिए एक अकेले इंसान को। हमें समझना होगा कि इंसान एक सामाजिक प्राणी है और उसे प्रेम और स्रेह की उतनी ही जरूरत है, जितनी रोटी और पानी की। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट बताती है कि हमारी प्राथमिकताएं गलत हैं। हम भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे भागते रहे हैं और अपनी आत्मा को भूल गए हैं। अब वक्त आ गया है कि हम अपनी राह बदलें, अपनी सोच बदलें और एक ऐसा समाज बनाएं जहां कोई भी व्यक्ति अकेला न रहे। अकेलेपन से लड़ाई सिर्फ सरकारों और संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। यह हम सबकी जिम्मेदारी है। हर व्यक्ति को अपने आसपास के लोगों की देखभाल करनी होगी। हमें एक ऐसा समाज बनाना होगा, जहां हर व्यक्ति को लगे कि वह महत्वपूर्ण है कि उसकी कोई परवाह करता है। अकेले व्यक्ति से बात करें, अपना वक्त दें, एहसास दिलाएं कि वह अकेला नहीं है। यही हमारी इंसानियत की असली परीक्षा है।</p>
<p><strong>-देवेन्द्रराज सुथार</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/loneller-in-digital-crowd/article-119505</link>
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                <pubDate>Sat, 05 Jul 2025 12:03:40 +0530</pubDate>
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                <title>टूटे भेदभाव की दीवार, दूर हो अकेलापन', जेकेके में 'द ज़ू स्टोरी' नाटक का मंचन </title>
                                    <description><![CDATA[जयपुर। इंसान की खींची गयी लकीरें जो उसे एक दूसरे से अलग-थलग कर रही हैं। कहीं रंग भेद, कहीं धर्म तो कहीं जाति और राजनीतिक हित साधने के लिए पैदा किया गया भेदभाव व आर्थिक ऊंच-नीच, ये सभी इंसान के जीवन के लिए घातक बनते जा रहे हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/break-the-wall-of-discrimination--overcome-loneliness--the-zoo-story-staged-at-jkk/article-13530"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-07/9.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। इंसान की खींची गयी लकीरें जो उसे एक दूसरे से अलग-थलग कर रही हैं। कहीं रंग भेद, कहीं धर्म तो कहीं जाति और राजनीतिक हित साधने के लिए पैदा किया गया भेदभाव व आर्थिक ऊंच-नीच, ये सभी इंसान के जीवन के लिए घातक बनते जा रहे हैं। इन सभी भावों को व्यक्त करने के उद्देश्य से जवाहर कला केंद्र में  शनिवार रात को 'द ज़ू स्टोरी' नाटक का मंचन किया गया। रमेश भाटी नामदेव के निर्देशन में हुए नाटक ने दर्शकों की खूब वाहवाही लूटी। जेकेके की पाक्षिक नाट्य योजना के तहत कार्यक्रम का आयोजन किया गया था।<br /><br /><strong>'ज़ू की तरह है इंसानी जीवन'</strong> <br />द ज़ू स्टोरी अमरीकी लेखक एडवर्ड एल्बी द्वारा लिखा गया है। इसके दो पात्रों जैरी व पीटर की कहानी को रंगकर्मियों ने मंच पर जाहिर किया। दर्शाया गया कि जैरी जो अति वाचाल प्रवृत्ति का है, स्वयं से हो रहे भेदभाव से बुरी तरह कुंठित है। चीड़िया घर में जानवरों से होने वाले विभेद का उदाहरण देते हुए जैरी इंसानी वर्ग भेद को जाहिर करता है। भेदभाव की जंजीरों में जकड़ा जैरी चाहता है कि इंसान आपस में भेदभाव नहीं करे।</p>
<p><strong>...सहयोग नहीं दिखावा!</strong><br />अकेलेपन जूझ रहे जैरी को सहयोग का दिखावा करने की दुनिया की आदत रास नहीं आती। अब वह अपनी जीवन लीला समाप्त करना चाहता है। इस पर पीटर उसे सार्वभौमिक नियम समझाने का प्रयास करता है कि सब को सब कुछ नहीं मिलता। पीटर की अंतरमुखी प्रवृत्ति से ऐसा प्रतीत होता है कि वह सभ्य इंसान है। अंतत: उकसाने पर पीटर के भीतर छिपा जानवर बाहर आ जाता है और जैरी की हत्या हो जाती है। <br /><br /><strong>इन्होंने डाली नाटक में जान</strong><br /> नाटक की जान बने जैरी और पीटर का रोल क्रमश: डॉ. हितेंद्र गोयल व श्री  मज़ाहिर सुल्तान जई ने निभाया। मंच से परे श्री गगन मिश्रा ने लाइट, श्री एस.पी रंगा और श्री नेमीचंद ने संगीत, श्री अरुण पुरोहित व श्री एस. पी रंगा ने मंच की व्यवस्था संभाली।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 03 Jul 2022 18:20:27 +0530</pubDate>
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