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                <title>savan festival - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>सावन आज से : ताड़केश्वर महादेव मंदिर जहां हुआ करते थे ताड़ के पेड़ और मसान, लोककथाओं में उल्लेख-दशकों पूर्व तांत्रिक यहां रात में करते थे रुद्राभिषेक</title>
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                        <![CDATA[मंदिर की स्थापना हुई, उस समय मंदिर अरावली की पहाड़ियों के नजदीक और मंदिर के आस-पास ताड़ के पेड़ों की भरमार थी, इसी कारण ताड़केश्वर महादेव मंदिर नाम पड़ा]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/from-today-onwards-where-tadkeshwar-mahadev-temple-used/article-120093"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/8842roer2.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। सुनने और पढ़ने पर बड़ा ही अजीब सा लगता है कि आज के चौड़ा रास्ता स्थित 'ताड़केश्वर महादेव' मंदिर एक 'मसान' अर्थात श्मसान घाट पर बना हुआ है। 'ताडकेश्वर महादेव मंदिर' जयपुर की स्थापना से पहले से ही आज के चौड़ा रास्ता में विराजित है। उस दौर में मंदिर, अरावली की पहाड़ियों के नजदीक जंगल से घिरा हुआ और आस-पास ताड़ के पेड़ों की भरमार थी। इसी कारण इस मंदिर को ताड़केश्वर महादेव कहा गया अर्थात् ताड़ के वृक्षों में स्थित शिव। लोक मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर जयपुर रियासत की स्थापना 1727 से पहले का है।<br />यह स्थल एक दौर में तांत्रिक साधकों की तपस्थली भी रहा हैं।</p>
<p>शिवलिंग स्वयंभू हैं, लेकिन मंदिर का वर्तमान स्वरूप का निर्माण जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह के शासनकाल में कराया गया। जयपुर की नगर योजना तैयार की जा रही थी, उस समय ज्योतिषीय और वास्तुशास्त्र की दृष्टि से ताड़केश्वर महादेव को नगर के महत्वपूर्ण शकित केंद्र के रूप में चिन्हित किया गया था। लोककथाओं में यह उल्लेख मिलता है कि पहले तांत्रिक यहां रात्रि में रुद्राभिषेक भी करते थे। बाद में यह स्थान सामाजिक पूजा-पद्धति का केंद्र बन गया।</p>
<p><strong>मंदिर की वास्तुकला</strong><br />मंदिर की वास्तुकला विशुद्ध राजस्थानी और नागर शैली की मिश्रित छाया प्रस्तुत करती है। पत्थरों से निर्मित यह मंदिर साधारण परंतु दिव्य अनुभूति से भरा हुआ है। स्वयंभू शिवलिंग और नंदी की मूर्ति विशेष आकर्षण का केंद्र हैं। प्रांगण में प्राचीन ताड़ के वृक्ष आज भी मौजूद हैं, जो मंदिर की ऐतिहासिकता को प्रमाणित करते हैं।</p>
<p><strong>ग्वाले की गाय आकर दूध गिरा देती थी</strong><br />जयपुर बसने से पूर्व इस क्षेत्र के आस-पास मीणा जाति के शासकों का राज था। उस समय यहां घना जंगल था। एक ग्वाले की गाय यहां ताड़ के पेड़ के नीचे आकर दूध गिरा जाती थी। घटना से ग्वाला काफी परेशान था। एक दिन शिवजी ने ग्वाले को स्वप्न में दर्शन देकर निकालने की बात कहीं। ग्वाले ने जब जमीन को खोदा तो उसमें से शिवलिंग निकला। जयपुर की स्थापना के समय सबसे पहले तीन शिवलिंगों की स्थापना करवाई गई थी, जिनमें से ताड़केश्वर महादेव भी एक है।</p>
<p><strong>शिव भक्त ने बनवाया काशी विश्वनाथ मंदिर</strong><br />ताडकेश्वर मंदिर के अहाते में काशी विश्वनाथ महादेव मंदिर भी है। मान्यता है कि विश्वेश्वर महादेव के दर्शनों के बिना ताड़केश्वर महादेव के दर्शन पूरे नहीं माने जाते हैं। यहीं कारण रहा कि ताड़केश्वरजी के साथ इनके भी भोग अर्पित किया जाता है। जयपुर निर्माण के समय किशनराम बंगाली जो महाराजा जयसिंह के मंत्री थे, ताडकेश्वर मंदिर में नित्य पूजा के लिए जाते थे। शिव के प्रति अगाध भक्ति के चलते उनके मन में विशाल शिवालय बनने इच्छा जाग्रत हुई। इसके लिए अपने भांजे राज्य के दीवान विद्याधर के नगर नियोजन से मंदिर बनवाया। बाद में वह पंड़ित गंगाराम पाराशर को सेवा पूजा के लिए सौंप दिया गया। </p>
<p>ताड़केश्वर महादेव मंदिर के दर्शनों से काशी विश्वनाथ के दर्शनों जितना पुण्य मिलता है। प्राण प्रतिष्ठा के बाद किशनाराम बंगाली व विद्याधर दीवान ने मंदिर को पुजारी पांचायणजी के वंशज गंगाराम पाराशर को सेवा के लिए सौंपा। पूर्वजों ने बताया है कि भगवान की मूर्ति स्वयं ही उत्पन्न हुई थी और यहां पर मसान हुआ करता था, तभी तो ताड़ के पेड़ हैं। तांत्रिक साधना का केन्द्र भी इसे बताया जाता है। भगवान शिव का अद्भुत स्थान है। <br />-पुजारी अमित कुमार पाराशर, ताड़केश्वर महादेव मंदिर, चौड़ा रास्ता  </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 11 Jul 2025 10:01:30 +0530</pubDate>
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                <title>घुश्मेश्वर महादेव मंदिर में श्रावण महोत्सव नजदीक, व्यवस्था का कार्य शुरू </title>
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                        <![CDATA[शिव लहरी सेवा प्रमुख आर एस एस राजस्थान गौतम आश्रम से शोभायात्रा का शुभारंभ कर ध्वजारोहण करेंगे।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/tonk/shravan-festival-near-in-ghushmeshwar-mahadev-temple--arrangement-work-started/article-14261"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-07/shivad.jpg" alt=""></a><br /><p>शिवाड़। घुश्मेश्वर महादेव मंदिर में श्रावण महोत्सव नजदीक आने के साथ ही ट्रस्ट पदाधिकारियों के द्वारा मंदिर परिसर घुश्मेश्वर गार्डन, धर्मशाला में डेकोरेशन, सफाई व्यवस्था, श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था का कार्य युद्ध स्तर पर जारी है। श्रावण महोत्सव पर भोले के जलाभिषेक,रुद्राभिषेक दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालुओं की संख्या में आने को ध्यान में रखते हुए मंदिर ट्रस्ट पदाधिकारी व्यवस्था में जुटे हैं मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष प्रेम प्रकाश शर्मा ने बताया कि बुधवार से 10 सितंबर तक चलने वाले महोत्सव पर श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार की परेशानी ना हो इसके लिए ट्रस्ट पदाधिकारियों ने सदस्यों को अपनी अपनी जिम्मेदारियां सौंपने के साथ साथ धर्मशाला में श्रद्धालुओं के ठहरने की विशेष सुविधाएं की जा रही है ।14 जुलाई गुरुवार को मुख्य अतिथि शिव लहरी सेवा प्रमुख आर एस एस राजस्थान गौतम आश्रम से शोभायात्रा का शुभारंभ कर ध्वजारोहण करेंगे।</p>
<p><br />श्रावण में कांवड़ यात्रा: शिवभक्त सावन का महीना शुरू होते ही गंगा नदी की तरफ चल पड़ते हैं जिसका पवित्र जल लाकर भगवान शिव पर चढ़ाते हैं लेकिन जिन क्षेत्रों में गंगा नदी बहुत दूर है वहां दूसरी पवित्र नदियों का जल लाकर शिव पर चढ़ाया जाता है कावड़िया कावड़ यात्रा धार्मिक और सांस्कृतिक यात्रा उत्तर भारत की जीवन परंपरा का हिस्सा है हरिद्वार ऋषिकेश से इन दिनों जलाकर शिव भक्त पूरे देश के शिव मंदिरों में जाते हैं जिसके कारण पश्चिम, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, उत्तरांचल का एक बड़ा हिस्सा श्रावण में का और यात्राओं से सरोबार हो जाता है अगर माइथोलॉजी पर जाए तो माना जाता है कि रावण परशुराम भगवान राम दुनिया के पहले कावड़िए थे जिन्होंने पवित्र नदियों का पवित्र जल लाकर के भगवान शिव का अभिषेक किया था के पिछले इसके पीछे धार्मिक बात है कि पौराणिक काल में जब देवताओं  ने मिलकर समुद्र मंथन किया था उस समुद्र मंथन से 14 रत्न निकले थे इन रत्नों में एक रत्न हलाहल विष भी था जिसे देवता की अनुपम पर शिव ने पी लिया था कि जब भगवान शिव ने वह जहर पिया तो वह बहुत ही असहनीय था उसे पीते ही उनका पूरा गला नीला पड़ गया इसलिए उनका नाम नीलकंठ भी है, भगवान शिव के शरीर से गर्मी को दूर करने के लिए देवता ने उन पर जल की बारिश की तथा भक्तों ने उनका जलाभिषेक किया तबसे पूरे सावन के महीने में भगवान का जलाभिषेक होता है।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Wed, 13 Jul 2022 13:24:52 +0530</pubDate>
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